पीएम के कश्मीर दौरे के निहितार्थ [दैनिक जागरण राष्ट्रीय (कुछ अंश) और डीएनए में प्रकाशित]
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| दैनिक जागरण |
जम्मू-कश्मीर की बाढ़ आपदा
को गुजरे कुछ वक़्त हो चुका है, लेकिन उसने प्रदेश में जो तबाही मचाई, उसके निशान
अब भी मौजूद हैं. ऐसे अनगिनत लोग जिनके आशियाने इस बाढ़ में तबाह हो गए, अब भी राहत
शिविरों में पड़े अपने भविष्य को प्रश्नसूचक निगाहों से देख रहे हैं. ऐसे में आज जब
देश में दिवाली का अवसर आया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपनी दिवाली
जम्मू-कश्मीर के बाढ़ पीड़ितों के साथ बीताना, कई मायनों में महत्वपूर्ण है. अब
चूंकि, कुछ समय बाद ही जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में पीएम के
इस कश्मीर दौरे को कांग्रेस, एनसीपी समेत जम्मू-कश्मीर के एक स्थानीय दल पैंथर्स
पार्टी आदि के द्वारा राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है जो कि बतौर विपक्ष उनके
राजनीतिक चरित्र के अनुरूप ही है. यह सही है कि पीएम का ये दौरा कहीं न कहीं जम्मू-कश्मीर
के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र भी था, लेकिन इसके अतिरिक्त इस दौरे के और भी
कई मायने हैं. अगर इस दौरे पर गंभीरता से विचार करें तो स्पष्ट होता है कि पीएम का
ये कश्मीर दौरा न सिर्फ उनके दल भाजपा को कश्मीर विधानसभा चुनाव में राजनीतिक लाभ
देने वाला हो सकता है, बल्कि कश्मीर समस्या के सन्दर्भ में ये भारत के राष्ट्रीय
हित को भी सांधने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. अब चूंकि, भाजपा हमेशा से
जम्मू-कश्मीर से धारा ३७० जिसके तहत
जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों से इतर तमाम विशेषाधिकार प्राप्त हैं, हटाने
की बात कहती आई है. इस आम चुनाव भी उसने
अपने घोषणापत्र में कश्मीर से धारा ३७० को हटाने का वादा किया है. लेकिन, यह काम
कत्तई सरल नहीं है. धारा ३७० हटाने के लिए वहां की विधानसभा की मंजूरी आवश्यक है
और वहां की मौजूदा नेशनल कांफ्रेंस सरकार धारा ३७० की कट्टर समर्थक है. जम्मू-कश्मीर
के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ये बात
जब-तब जाहिर भी कर चुके हैं. इसके अलावा जम्मू-कश्मीर के स्थानीय दलों के नेता अपनी
राजनीति चाक-चौबंद रखने के लिए भोले-भाले कश्मीरियों को भारतीय हुकूमत के प्रति लगातार बरगलाते रहे हैं.
भारतीय हुकूमत व सेना आदि के प्रति उनके मन में ज़हर भरते रहते हैं. परिणामतः जम्मू-कश्मीर
के स्थानीय निवासियों के मन में कुछ बरगलाने के कारण तो कुछ परिस्थितिजन्य कारणों
से भारत की केन्द्रीय हुकूमत व भारतीय सेना आदि के प्रति काफी दुर्भावना का माहौल घर
कर लिया है.
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| डीएनए |
ऐसे में स्पष्ट है कि अगर भाजपा को कश्मीर से धारा ३७० हटाना है तो वो
बिना कश्मीर की सत्ता में आए संभव नहीं है; और सत्ता में आने के लिए आवश्यक है कि
वहां के स्थानीय निवासियों के मन में भारत की केन्द्रीय हुकूमत जो अभी भाजपा के
पास है, के प्रति बैठी दुर्भावना का खात्मा हो. और बस यही करने की दिशा में
प्रधानमंत्री मोदी सत्ता सम्हालने के बाद से लगातार प्रयासरत दिख रहे हैं.
जम्मू-कश्मीर को लेकर पीएम की गंभीरता को इसी बात से समझा जा सकता है कि अपने
चार-पांच महीने के शासनकाल में ही पीएम का ये (वर्तमान दौरा) चौथा जम्मू-कश्मीर
दौरा था. अभी जम्मू-कश्मीर आपदा को जिस तरह से राष्ट्रीय आपदा घोषित किया गया,
आर्थिक-संसाधनिक सहायता दी गई; तथा हमारी भारतीय सेना ने जिस तरह से बाढ़ के बीच से
वहां के लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए अपना खून-पसीना एक कर दिया, इन सब चीजों
से जम्मू-कश्मीर के स्थानीय लोगों के नज़रिए में भारत सरकार व सेना के प्रति
कुछ-कुछ बदलाव जरूर आया है. ये बदलाव बाढ़ के बाद वहां के तमाम लोगों से खबरिया
चैनलों द्वारा की गई बातचीत में दिखा. लेकिन, यह सिर्फ एक छोटी-सी शुरुआत है, इस
दिशा में अभी बहुत प्रयास की जरूरत है जिससे कश्मीरी लोगों के मन में भारत के
प्रति पूरी तरह से विश्वास का माहौल कायम हो सके.
उपर्युक्त सभी बातों के
बाद अब यह समझना बेहद सरल है कि पीएम नरेंद्र मोदी का मौजूदा जम्मू-कश्मीर दौरा
केवल उनकी दलीय राजनीति से प्रेरित नहीं था, वरन ये कश्मीर समस्या के समाधान के सन्दर्भ में किए जा
रहे उनके प्रयासों की एक और कड़ी भी था. इस दौरे को अकेले नहीं, वरन इससे पहले हुए
प्रधानमंत्री मोदी के पिछले तीन कश्मीर दौरों के साथ ही जोड़कर देखा जाना चाहिए.
हमने देखा है कि लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जम्मू-कश्मीर में
भी कई रैलियां की थीं और परिणाम ये हुआ कि वहां के मतदाताओं ने भाजपा को हाथो-हाथ
लिया. वहां की छः में से दो सीटें भाजपा ने जीतीं. इसको देखते हुए इस संभावना से
इंकार नहीं किया जा सकता कि वहां का मतदाता वहां के स्थानीय दलों से बहुत खुश नहीं
है. कहीं न कहीं इन्हीं चीजों को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी कश्मीर को लेकर हर
तरह से अत्यंत गंभीर हैं. उनका प्रयास होगा कि कश्मीर के जिस मतदाता ने लोकसभा में
भाजपा को छः में से दो सीटें जिताई, वो विधानसभा में भी उसे कहीं अच्छी जीत दे. अतः
प्रधानमंत्री के जम्मू-कश्मीर बाढ़ पीड़ितों संग दिवाली मनाने को सिर्फ राजनीतिक
सन्दर्भ में नहीं, वरन उससे ऊपर उठकर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है.
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