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गुरुवार, 2 जुलाई 2020

हिंदी भाषी राज्य में हिंदी की दुर्दशा (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश में हिंदी को लेकर चलने वाली समकालीन चर्चाओं में मोटे तौर पर दो पक्ष दिखाई देते हैं। एक, जो यह मानता है कि देश में हिंदी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, क्योंकि उसे देश के अहिंदीभाषी राज्यों में पहुंचाने के लिए कुछ भी ठोस नहीं किया जा रहा। दूसरा पक्ष मानता है कि देश में हिंदी की हालत बेहतर हो रही है और अब वो दुनिया में भी अपनी धमक बढ़ाने लगी है। परन्तु, इस भाषाई विमर्श की परिधि से बाहर हिंदी की जो जमीनी स्थिति है, वो उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्य की बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में गत वर्ष भी सामने आई थी और अबकी भी आई है। बीते वर्ष राज्य की दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में लगभग दस लाख बच्चे हिंदी में अनुत्तीर्ण हो गए थे, तो माना गया कि इस वर्ष यह हो गया होगा, आगे स्थिति सुधर जाएगी। परन्तु, इसबार अभी जब परीक्षा परिणाम आए तो यह आंकड़ा जरा-सी कमी के साथ आठ लाख के करीब सामने आया। आंकड़ों में कमी को लेकर कुछ लोग यह कह सकते हैं कि स्थिति में सुधार तो आया है, परन्तु प्रश्न ये है कि देश के सबसे बड़े हिंदी भाषी राज्य में हिंदी को लेकर यह स्थिति पैदा ही क्यों हुई?  
अतः हिंदी पर होने वाली चर्चाओं में बात अहिंदीभाषी राज्यों में हिंदी के प्रसार या हिंदी की वैश्विक धमक से पहले इस बिंदु पर होनी चाहिए कि एक हिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी की शैक्षिक स्थिति ऐसी क्यों हो गयी है? हिंदी का कायाकल्प करने वाले युगांतकारी लेखक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, कथा-सम्राट प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, हरिवंश राय बच्चन जैसे हिंदी साहित्य के अनेक महान हस्ताक्षरों की जन्मभूमि यूपी में इस तरह लाखों की तादाद में छात्रों का हिंदी की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाना, निश्चित रूप से अपनी भाषा के प्रति हमारी निष्ठा और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

दरअसल हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी विषय को लेकर अभिभावकों और अध्यापकों से होते हुए छात्रों तक में यह मानसिकता गहरे पैठी हुई है कि ये आसान विषय है और इसके अध्ययन में बहुत अधिक समय व श्रम खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। इस मानसिकता के कारण न तो अध्यापक ढंग से हिंदी पढ़ाने में ध्यान देते हैं और न अभिभावक ही बच्चों को इसपर ध्यान देने के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि कोई बच्चा यदि हिंदी में अधिक रुचि ले रहा हो तो उसे अभिभावकों से हिंदी की बजाय गणित आदि विषयों के जरूरी होने और उनपर जोर लगाने की नसीहत मिल जाती है।
हिंदी विषय पर ध्यान न देने के कारण छात्र इसके अध्ययन को लेकर कोई रणनीति नहीं बना पाते। हिंदी में साहित्यिक पाठ के अलावा व्याकरण का भी एक भाग होता है, लेकिन परीक्षा के समय जल्दबाजी में छात्र अक्सर साहित्यिक पाठों के तो प्रश्नोत्तर रटकर काम चला लेते हैं, मगर व्याकरण वाले हिस्से को यथोचित समय देकर समझ नहीं पाते। हिंदी व्याकरण को लेकर छात्रों के अज्ञान और अगम्भीरता का आलम यह है कि बहुतायत छात्रों को ‘नाउन-प्रोनाउन’ तो पता होता है, मगर ‘संज्ञा-सर्वनाम’ पूछने पर बगले झाँकने लगते हैं। यही छात्र जब आगे विश्वविद्यालयी अध्ययन में पहुँचते हैं, तो वहां भी यह भाषाई अज्ञान उनके साथ बना रहता है। ‘की’ और ‘कि’ का भेद न होना, अनुस्वार के उपयोग में नासमझी, अल्पविराम और पूर्णविराम के दोष सहित वाक्य-विन्यास की समस्याएँ तक ऐसे छात्रों की लेखनी में प्रायः दृष्टिगत होती हैं। इस पूरी समस्या के मूल में हिंदी भाषा के प्रति छात्र के घर से विद्यालय तक व्याप्त अगंभीरता ही कारण है और इस अगंभीरता के पीछे अंग्रेजी माध्यम शिक्षा का बड़ा हाथ है, जिसमें सिवाय हिंदी किताब के बाकी पूरी पाठ्यसामग्री अंग्रेजी में होती है। इस स्थिति में हिंदी का हाशिये की भाषा बनकर रह जाना स्वाभाविक है।
यहाँ महात्मा गांधी का उल्लेख समीचीन होगा। गांधीजी कितने उदार थे, यह कहने की जरूरत नहीं, परंतु भाषा के मामले में वे अंग्रेजी के प्रति किसी प्रकार की उदारता के पक्ष में नहीं थे। हिन्द स्वराज में उन्होंने लिखा, ‘करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली, वह सचमुच गुलामी की नींव थी।…अंग्रेजी शिक्षण स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है।‘ इस गुलामी से मुक्ति के लिए गांधी का मत था कि भारतीय भाषाओं को चमकाना चाहिए और हिंदी तो सबको आनी चाहिए। गांधीजी यह बात उस दौर में कह रहे थे, जब देश में विदेशी शासन था, परन्तु स्वशासन स्थापित होने के बाद भी हमने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि आज अच्छी पढ़ाई का मतलब अंग्रेजी माना जा चुका है। देश में अंग्रेजी का प्रभाव ऐसा हो गया है कि कोई साधारण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी अंग्रेजी में चार बातें बोलकर लोगों के बीच अपना एक अलग औरा बना लेता है जबकि हिंदी बोलने वाले ज्ञानी व्यक्ति को भी वैसा महत्व नहीं मिलता। यह एक विदेशी भाषा की मानसिक गुलामी के अतिरिक्त और क्या है?
सवाल उठता है कि एक हिंदी भाषी देश में हिंदी में ही हर विषय की शिक्षा क्यों नहीं प्राप्त की जा सकती? तर्क दिया जाता है कि विज्ञान और अभियांत्रिकी जैसे विषयों के अध्ययन के लिए अधिकांश सामग्री अंग्रेजी में ही उपलब्ध है, इसलिए अंग्रेजी आवश्यक है। ऐसे में, सवाल उठता है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी उस सामग्री का हिंदी रूपांतरण क्यों नहीं किया जा सका? जाहिर है, इस दिशा में काम करने की इच्छाशक्ति ही हमारी सरकारों में नहीं है। ऊपर से शुरू हुई ये समस्या ही नीचे तक पहुंचकर यह स्थिति उत्पन्न कर रही है कि एक हिंदी भाषी राज्य में ही लाखों की संख्या में छात्र हिंदी में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं।

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

पद्म सम्मानों का लोकतांत्रीकरण [दैनिक जागरण में प्रकाशित

  • पीयूष द्विवेदी भारत

वर्ष 2014 के बाद से बीते तीन-चार वर्षों में पद्म सम्मानों के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व और सकारात्मक परिवर्तन नजर आया है। इस दौरान ऐसे नामों की घोषणा देखने को मिली है, जो बिना किसी संपत्ति या सम्मान की लालसा के लम्बे समय से अपने-अपने क्षेत्र में उत्तम कार्य कर रहे। वर्ष 2017 में जब पद्म सम्मानों के नामों का ऐलान हुआ तो सम्मान पाने वालों में बिपिन गणात्रा, मीनाक्षी अम्मा, बाबा बलबीर सिंह, चिंताकिंदी मल्लेशम जैसे सामान्य पृष्ठभूमि के कई अचर्चित नाम शामिल थे, लेकिन उनका योगदान और समाज सेवा का भाव बड़ा था। इस तरह के नामों के ऐलान के साथ ही सिफारिशों और लॉबियों से मुक्त पद्म सम्मानों की एक नवीन परम्परा का सूत्रपात हुआ, जिसको बेहतर ढंग से आगे बढ़ाने का काम 2018 और 2019 से लेकर इस वर्ष तक सरकार ने किया है।
इस बार विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित कुल 141 व्यक्तियों को पद्म सम्मानों के लिए चुना गया है, जिनमें सात प्रमुख हस्तियों को पद्म विभूषण, 16 लोगों को पद्म भूषण और 118 लोगों को पद्मश्री दिया जाएगा। जार्ज फर्नांडीज, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, श्री विश्वेशतीर्थ जी को मरणोपरांत यह सम्मान प्रदान करने की घोषणा हुई है, वहीं मुक्केबाज मैरीकोम, सुप्रसिद्ध लोकगायक पंडित छन्नूलाल मिश्र और मारीशस के पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ को भी पद्म विभूषण देने का ऐलान हुआ है। पद्म भूषण की श्रेणी में भी मुजफ्फर हुसैन बेग, मनोहर पर्रीकर, आनंद महिंदा, पीटी उषा आदि नाम शामिल हैं।
लेकिन पद्म श्री की श्रेणी बीते वर्षों की तरह ही इसबार भी अनूठी है जिसमें सम्मानित व्यक्तियों में ज्यादातर नाम ऐसे हैं, जो लम्बे समय से संघर्षपूर्ण ढंग से अपने-अपने क्षेत्र में बिना किसी लोभ-लालसा के उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोई व्यापक पहचान नहीं है। हालांकि इसे विडंबना ही कहेंगे कि पद्म श्री के लिए जितनी चर्चा करण जौहर, कंगना रानाउत, अदनान सामी, एकता कपूर जैसे पहले से ही प्रसिद्ध लोगों की हो रही, उतनी इन अचर्चित लोगों की नहीं हो रही। जबकि चर्चा के केंद्र में यही लोग होने चाहिए।
आज जब चिकित्सा एक विशुद्ध व्यावसायिक कर्म बन गया है और सरकार को पहल करके मुफ्त चिकित्सा का प्रबंध करना पड़ रहा है, ऐसे वक़्त में उत्तराखंड के डॉ. योगी एरन किसी अजूबे की तरह ही हैं, जो अबतक जले-कटे हजारों मरीजों की निशुल्क प्लास्टिक सर्जरी करके उन्हें एक नया रूप दे चुके हैं। हालांकि अबसे पूर्व डॉ. योगी के विषय में शायद ही उनके निकटस्थ लोगों के सिवा किसीको कुछ पता रहा हो, लेकिन इसबार पद्म श्री के लिए चुने जाने के बाद उनके इस सेवा-कार्य को व्यापक पहचान मिलने की उम्मीद है। इसी तरह पंजाब के जगदीश लाल आहूजा सैकड़ों गरीब मरीजों को हर दिन मुफ्त भोजन व कपड़े आदि मुहैया करवाते हैं। बीते 15 सालों से यह उनका नित्य नियम बना हुआ है और इस कारण स्थानीय स्तर पर उनकी पहचान लंगर बाबा के रूप में स्थापित हो गयी है।
ऐसे ही चाचा शरीफ के नाम से मशहूर मोहम्मद शरीफ  25 सालों से फैजाबाद और उसके निकट के क्षेत्रों में हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। उनके इस कार्य में न तो उनका मज़हब कभी आड़े आया और न ही इस सेवा-कार्य के लिए कोई पहचान न मिलने का विचार ही उन्हें रोक पाया। निष्काम भाव से अपने कर्म में लगे मोहम्मद शरीफ को अबकी पद्म श्री देने की घोषणा हुई है।
तुलसी गावड़ा ने औपचारिक शिक्षा कुछ भी नहीं ली है, लेकिन पेड़-पौधों के विषय में उनकी जानकारी ऐसी है कि उन्हें ‘जंगल का इनसाइक्लोपीडिया’ कहा जाता है। आज जब प्रकृति को बचाने की चुनौती से मानवता दो-चार हो रही है, ऐसे वक़्त में प्रकृति संरक्षण के प्रति उनका समर्पण प्रेरणादायक है। बताते हैं कि वे अभी तक लाखों पौधों को पेड़ बना चुकी हैं, जिस कारण कर्णाटक सरकार ने उन्हें वन विभाग में नौकरी भी दी है। इस वर्ष पद्म श्री के लिए उनका चयन निःसंदेह पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्यरत अनेक गुमनाम लोगों को और बेहतर करने की ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करेगा।

इसके अलावा संतरे बेचकर गरीब बच्चों के लिए स्कूल चलाने वाले हरेकला हजब्बा हों, पश्चिम बंगाल के सुन्दरवन में दो दशक से अधिक समय से सप्ताह में दो दिन गरीबों का मुफ्त इलाज करने वाले डॉ. अरुणोदय मंडल हों, खुद लकवाग्रस्त होते हुए भी दिव्यांग बच्चों के लिए कार्यरत एस रामकृष्णन हों या देश भर में घूमकर किसानों को आर्गेनिक खेती के गुर सिखाने वाले ओडिशा के राधामोहन और साबरमती हों अथवा अच्छी सरकारी नौकरी को ठुकराकर कम पानी में खेती की विधि पर काम करते हुए किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बने सुंडाराम वर्मा हों, ऐसे अनेक लोगों के नामों से इसबार के पद्म श्री सम्मानों की सूची भरी पड़ी है। यह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उस सूची में देखते ही पहचान में आने वाले नाम गिनती के हैं, अधिकांश नामों का परिचय पाने के लिए खोजबीन करनी पड़ती है।  
पद्म सम्मान तो बीते साढ़े छः दशकों से दिए जा रहे हैं, लेकिन इस तरह जनसामान्य के बीच से अचर्चित नायक-नायिकाओं को सम्मानित करने का काम इतने व्यापक रूप से पहले नहीं हुआ। दरअसल राजधानी में बैठी लॉबी के इशारों पर सम्मानों के वितरण का खेल देश में लम्बे समय तक चला है, जिसके लिए सम्मान की प्रमुख कसौटी सत्ता की जी-हुजूरी रही है। लेकिन 2014 के बाद मोदी सरकार ने इन सम्मानों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए नामांकन प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया। जनवरी 2018 में पद्म सम्मानों की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कहा था, ‘नामांकन प्रक्रिया में बदलाव का परिणाम है कि सामान्य लोगों ने सम्मान की श्रेणियों में जगह बनाई है. ऑनलाइन नामांकन इसमें पारदर्शिता लाया है... अब व्यक्ति की पहचान नहीं, उसका कार्य सम्मान के लिए महत्व रखता है.’ सरकार के इन प्रयासों का ही परिणाम है कि आज देश के दूसरी, तीसरी और चौथी वरीयता के ये सर्वोच्च नागरिकता सम्मान, सही अर्थों में अपने लिए सुपात्र नागरिकों तक पहुँच रहे हैं। यह भी कहना अनुचित नहीं होगा कि भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पद्म सम्मान भले साढ़े छः दशकों से प्रदान किए जा रहे हों, लेकिन वास्तविक अर्थों में इनका लोकतांत्रिकरण अब जाकर हुआ है, जिसके लिए वर्तमान सरकार निश्चित ही सराहना की पात्र है।

बुधवार, 22 जनवरी 2020

शोध की गुणवत्ता का प्रश्न [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

किसी भी देश की उच्च शिक्षा में शोध का विशेष महत्व होता है। कहीं न कहीं इसीसे अमुक देश की उच्च शिक्षा की स्थिति का पता भी चलता है। लेकिन दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इस मामले में भारत की स्थिति चिंताजनक है। यह चिंता शोध की मात्रा को लेकर नहीं है, क्योंकि भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध की मात्रा में कोई कमी नहीं है बल्कि उसमें तो लगातार वृद्धि ही हो रही है, लेकिन जब प्रश्न शोध की गुणवत्ता और उपयोगिता का आता है तो स्थिति चिंताजनक लगने लगती है। देश में शोध की मात्रा में किस प्रकार वृद्धि हो रही है, इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की इस रिपोर्ट से समझा जा सकता है जिसके अनुसार वर्ष 2014-15 में देश के विश्वविद्यालयों में जहां कुल 25 हजार शोध हुए थे, वहीं 2018-19 में इनकी संख्या बढ़कर 41 हजार तक जा पहुंची है।
शोध की इस मात्रा-वृद्धि के पीछे के कारणों को समझने का प्रयत्न करें तो इसका एक प्रमुख कारण इंटरनेट के प्रसार से बीते कुछ सालों के दौरान हुई देशव्यापी सूचना क्रांति प्रतीत होती है क्योंकि इन दोनों का कालखंड लगभग समानांतर ही है। 2014 के बाद से ही इंटरनेट का प्रसार देश में बढ़ने लगा था और फिर जिओ के आगमन ने तो इसे सर्वसुलभ ही बना दिया। सो प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं इंटरनेट के द्वारा हर प्रकार की सूचनाओं की सुलभता ने छात्रों के मन में शोध की कठिनाइयों का एक सीमा तक सरलीकरण करने का काम किया है, जिस कारण इसके प्रति उनमें रुझान बढ़ा है। यहाँ तक तो कोई समस्या नहीं है, लेकिन यह प्रश्न यथावत है कि क्या मात्रा के अनुरूप शोध की गुणवत्ता और उपयोगिता में भी कोई वृद्धि हुई है? इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक ही है।

इस स्थिति को देखते हुए ही यूजीसी अब ऐसे दिशानिर्देश तैयार करने में जुटा है, जिसके जरिये शोध की गुणवत्ता ही नहीं, उसकी उपयोगिता भी सुनिश्चित की जा सके। इसके जरिये सरकार की कोशिश देश में होने वाले ऐसे तमाम शोधों, जो समाज या उद्योग के हितों की दृष्टि से कोई महत्व नहीं रखते और केवल शैक्षिक दिखावे के लिए हो रहे हैं, पर लगाम लगाने की है। अतः यूजीसी जिन नए दिशानिर्देशों को बना रहा है, उनके तहत किसी भी नए शोध को मंजूरी दिलाने के लिए उसे सामाजिक और औद्योगिक उपयोगिता की कसौटी पर खरा सिद्ध होना होगा। जाहिर है, इस पहल के जरिये सरकार का प्रयास सही और योग्य छात्रों को अवसर देकर शोध की गुणवत्ता व उपयोगिता में सुधार लाना  तो है ही, साथ ही शोध क्षेत्र से सम्बंधित संसाधनों का अनुचित लाभ लेने वाले दिखावे के शोधार्थियों पर अंकुश लगाना भी है। सरकार का मानना है कि किसी भी शोध का मूल उद्देश्य समाज और आम जनजीवन से जुड़ी समस्याओं के समाधान का मार्ग दिखाना होना चाहिए लेकिन देखा जाए तो भारत में होने वाले अधिकांश शोध इस कसौटी पर बिलकुल खरे नहीं उतरते।
आईआईटी आदि संस्थानों के कुछ शोधों को अपवाद मान लें तो ऐसा न के बराबर ही सुनने में आता है कि देश के किसी शैक्षिक संस्थान में समाज व आम आदमी के जीवन की किसी समस्या का समाधान करने वाला कोई शोध हुआ है। देश की पत्र-पत्रिकाओं में भी अक्सर येल, ऑक्सफ़ोर्ड आदि अनेक विदेशी शैक्षिक संस्थानों में हुए विविध शोधों की ख़बरें दिखती रहती हैं, लेकिन क्या यह सवाल कभी आपके मन में उठा है कि किसी भारतीय विश्वविद्यालय के शोध की खबर क्यों नहीं दिखाई देती? कहना न होगा कि ये बातें भारतीय विश्वविद्यालयी शोध की गुणवत्ता की वस्तुस्थिति का परिचय देने के लिए पर्याप्त हैं।
वस्तुतः यह समस्या ऐसी है जिसमें किसी एक व्यक्ति, संस्था या कारण को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। नीति-निर्धारकों की समस्या यह है कि वे छात्रों के प्रति दोष-दृष्टि तो रखते हैं, परन्तु व्यवस्था की विसंगतियों पर नजर नहीं डालते। यह नहीं देखते कि विश्वविद्यालय के जिन शिक्षकों के मार्गदर्शन में छात्र शोध करते हैं, वे कितने योग्य हैं। विश्वविद्यालयी शिक्षकों की अयोग्यता की बातें जब-तब सामने आती रही हैं जो कि विश्वविद्यालयी शिक्षण व शोध से जुड़ी एक बड़ी समस्या है।
दूसरी तरफ छात्रों पर यह आरोप लगता है कि वे शोध के लिए मिलने वाली अनुदान राशि का उपयोग पारिवारिक दायित्वों के निर्वाह तथा रोजगार खोजने के लिए करते हैं और जैसे ही अच्छा रोजगार मिलता है, शोध को अधूरा छोड़ निकल जाते हैं या फिर जैसे-तैसे पूरा कर लेते हैं। चूंकि शोध करते वक्त छात्र की उम्र पारिवारिक दायित्व उठाने वाली हो जाती है, अतः यदि वो प्राप्त अनुदान राशि का कुछ उपयोग इस रूप में करता है तो गलत नहीं है, लेकिन यदि कोई छात्र शोध अधूरा छोड़कर, अपने विषय से अलग किसी अन्य क्षेत्र में कोई रोजगार प्राप्त कर चला जाता है, तो इसे नैतिक रूप से ठीक नहीं कहा जा सकता। ऐसे छात्रों से अनुदान राशि वापस लेने पर विचार किया जा सकता है।
इन सबसे अलग शोध की गुणवत्ता में कमी का एक प्रमुख कारण इसके प्रति शोधार्थियों की अगंभीर मानसिकता है। चूंकि स्नातकोत्तर के बाद पीएचडी रोजगार के लिए आवश्यक है, इसलिए बहुत-से छात्र बेमन से भी शोध में संलग्न होते हैं और शोध ग्रन्थ की गुणवत्ता से इतर इस प्रयत्न में रहते हैं कि किसी भी तरह शोधकार्य पूरा हो और डाक्टरेट की उपाधि मिल जाए। कई बार शिक्षकों की अयोग्यता भी इसमें सहयोगी भूमिका निभाती है। फिर अलग-अलग शोधों और इंटरनेट से लम्बी-लम्बी नकल उतार लेने से लेकर पैसे देकर के थीसिस लिखवाने जैसे कृत्य तक किए जाते हैं। हालांकि शोधकार्य में नकल रोकने के लिए यूजीसी ने कुछ सख्त नियम बनाए हैं और सॉफ्टवेयर भी लाया गया है, लेकिन शोध के प्रति छात्रों में अगम्भीरता और बेपरवाही की मानसिकता तथा शिक्षकों में योग्यता का अभाव जबतक खत्म नहीं होता, इन सब चीजों से बहुत लाभ की उम्मीद बेमानी है।
छात्रों को समझना चाहिए कि शोध केवल एक डिग्री प्राप्ति का उपक्रम भर नहीं होता बल्कि उसके द्वारा देश और समाज को दिशा देने का काम भी किया जाता है। इससे किसी भी देश की उच्च शैक्षिक व्यवस्था के स्तर का परिचय भी मिलता है। अतः यदि शोधकार्य में हाथ डालते हैं, तो उसे पूरे मनोयोग से, अपना एक लक्ष्य बनाकर करें। इस प्रकार से किया गया शोध न केवल व्यक्तिगत रूप से उनके लिए बल्कि देश-समाज के लिए भी हितकारी होगा।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

वैचारिक असहिष्णुता से ग्रस्त वामपंथी बुद्धिजीवी [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]


  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश का जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय एकबार फिर चर्चा में है और चर्चा का कारण इसबार भी नकारात्मक है। पिछले दिनों कुछ नकाबपोश लोगों के विश्वविद्यालय परिसर में घुसकर छात्रों के साथ मारपीट करने की खबर आई और उसके बाद से ही इस मामले में बवाल मचा हुआ है। विडंबना ही है कि देश का ये प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अपनी अकादमिक उपलब्धियों के कारण कम बेमतलब विवादों के कारण अधिक चर्चा में रहता है। 
दिल्ली पुलिस ने प्रेस कांफ्रेंस कर नौ आरोपियों के नाम सार्वजनिक किए हैं। इनमें छात्र संघ अध्यक्ष आईशी घोष का नाम भी शामिल है। पुलिस का कहना था कि अभी उसकी जांच चल रही है, लेकिन अफवाहों को देखते हुए उसे बीच में ही ये जानकारी साझा करनी पड़ी।
वास्तव में, सोशल मीडिया से सड़क पर तक छात्रों के प्रति समर्थन व्यक्त करने में जुटे बुद्धिजीवियों की भी अफवाह फैलाने में बड़ी भूमिका है। उनका रवैया किसी न्यायाधीश की तरह रहा है। ऐसा लगता है कि उन्होंने पीड़ित और पीड़क का निर्णय कर लिया है और उसीके आधार पर अभियान चलाने में लगे हैं।
यह ठीक है कि लोकतंत्र में सबको अपने विचार व्यक्त करने और सरकार के निर्णयों का लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध करने अधिकार है, लेकिन उसका भी एक तरीका होता है। विरोध को तथ्यपरक और भाषाई मर्यादा के दायरे में होना चाहिए। उसपर भी अगर आप बौद्धिक रूप से एक विशिष्ट पहचान रखते हैं तो आपका दायित्व और बढ़ जाता है। लेकिन नरेंद्र मोदी जिस दल और विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसके प्रति इस देश के वामपंथी बुद्धिजीवियों का विरोध घृणा के स्तर तक जा पहुंचा है, जिसका प्रकटीकरण इनकी भाषा से लेकर कुतर्कों तक में देखा जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर उल्लेखनीय होगा कि लेखक, शायर जावेद अख्तर ने जेएनयू छात्र संघ अध्यक्षा आईशी घोष के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर तंज करते हुए बीते दिनों ट्विट किया कि ‘जेएनयूएसयू अध्यक्ष के ख़िलाफ़ एफ़आईआर पूरी तरह से समझ में आती है। उसने अपने सिर से एक राष्ट्रवादी, देश प्रेमी लोहे की छड़ को रोकने की हिम्मत कैसे की।’ सवाल यह है कि जावेद अख्तर इसमें ‘राष्ट्रवादी’ शब्द का प्रयोग किस आधार पर कर रहे हैं? ऐसी क्या अधीरता है जो वे जांच पूरी होने तक का इंतजार करने की बजाय खुद ही दोषी तय करने में लगे हैं। साथ ही, अब जब पुलिस ने आरोपियों के नाम सार्वजनिक कर दिए हैं और उसमें आइशी घोष का नाम भी बतौर आरोपी शामिल है, तो इसपर वे क्या कहेंगे?
ज्यादा दिन नहीं हुए जब इनके पुत्र फरहान अख्तर सीएए के विरोध में उतर पड़े थे, लेकिन जब पूछा गया कि क्यों विरोध कर रहे तो बगले झाँकने लगे और कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाए। ऐसे में यही प्रतीत होता है कि इन लोगों के विरोध के पीछे कोई व्यावहारिक आधार नहीं, केवल और केवल वैचारिक असहिष्णुता है। यह असहिष्णुता फिल्म जगत से जुड़े तमाम और लोगों में भी है और इस कदर है कि वे प्रधानमंत्री के प्रति तू-तड़ाक की भाषा के इस्तेमाल करने पर तक उतर चुके हैं। फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप इसके ताजा उदाहरण हैं।      
इससे पूर्व सीएए के विरोध के दौरान भी हमें बुद्धिजीवी वर्ग का यही असहिष्णु चरित्र दिखाई दिया था। बीते दिनों केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने राष्ट्रीय इतिहास कांग्रेस में अपना वक्तव्य देते हुए सीएए का जिक्र करना शुरू किया तो इसपर मार्क्सवादी इतिहासकार इरफ़ान हबीब एकदम से बौखला गए और राज्यपाल को रोकने के लिए बढ़ने लगे। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का कहना था कि अगर उनके एडीसी ने इन्हें नहीं रोका होता तो ये उनपर हमला कर देते। अब जो व्यक्ति राज्यपाल के प्रति सार्वजनिक रूप से इतनी आक्रामकता दिखा सकता है, उसमें विपरीत विचारों के लिए कितनी असहिष्णुता भरी होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
इन बुद्धिजीवियों की असहिष्णुता का एक और उदाहरण तो पिछले साल तब भी दिखा जब जेएनयू में बतौर  प्रोफेसर एमिरेट्स जुड़ीं रोमिला थापर विश्वविद्यालय प्रशासन के बायोडाटा मांगने पर बिगड़ गयीं। इसे वामपंथियों ने सरकार द्वारा बुद्धिजीवियों को दबाने की कोशिश करार दे दिया। सवाल है कि ये कैसी बुद्धिजीविता है जो मन से दंभ और असहिष्णुता को खत्म नहीं कर सकी।        
इतना ही नहीं, अपने अंधविरोध में इन बुद्धिजीवियों की भाषा का स्तर भी एकदम सतही होता जा रहा है। उदाहरण के तौर पर नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के दौरान ही लेखिका अरुंधती रॉय दिल्ली विश्वविद्यालय के एक विरोध प्रदर्शन में छात्रों के बीच पहुँचीं। वहां उन्होंने लोगों को सलाह देते हुए कहा कि एनपीआर में जब नाम-पता पूछा जाए तो वे रंगा-बिल्ला और सात रेसकोर्स बताएं। उनका इशारा मोदी और अमित शाह की तरफ था। अरुंधती रॉय को बताना चाहिए कि देश की जनता द्वारा बहुमत से निर्वाचित प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रति इस तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करके इन्होने कौन-सी बौद्धिकता का परिचय दिया है?
आश्चर्य है कि इसके बाद भी ये लोग कहते फिरते हैं कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है और सरकार तानाशाही कर रही है। रामचंद्र गुहा, अमर्त्य सेन से लेकर साहित्य जगत के भी अनेक नाम हैं जो 2014 के बाद से सत्ता-विरोध की आड़ में किसी न किसी बहाने से अपने मोदी विरोध के एकसूत्रीय एजेंडे को हवा देने की कोशिश में लगे रहते हैं।
बुद्धिजीवी होने का अर्थ होता है कि आप की बौद्धिक चेतना किसी भी तरह के पूर्वाग्रह और वैचारिक संकीर्णता से मुक्त, बुद्धि और ज्ञान के विस्तृत धरातल पर प्रतिष्ठित हो। बुद्धिजीवियों से अपेक्षा की जाती है कि वे देश को दिशा दिखाएंगे। लेकिन क्या हमारे इन बुद्धिजीवियों से ऐसी कोई अपेक्षा की जा सकती है। एक आयातित विचारधारा के संकीर्ण दायरे में बैठकर इन तथाकथित बुद्धिजीवियों ने दूसरी विचारधारा को निशाने पर लेने को ही अपना शगल बना लिया है। विपरीत विचार के विरोध में ये घृणा के स्तर तक जा पहुँचते हैं, लेकिन जब उसी स्वर में इनका प्रतिवाद होता है तो तानाशाही और अभिव्यक्ति की आजादी का विलाप भी करने लगते हैं। इनकी सारी बौद्धिकता केवल एक विचारधारा का विरोध करने मात्र के लिए समर्पित लगती है, उसके अलावा इन्हें देश में कोई और समस्या व चुनौती नहीं नजर आती। इनकी इस हालत पर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की यह पंक्ति बिलकुल सटीक लगती है कि ‘इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं’।

बुधवार, 1 जनवरी 2020

ध्यान खींचने में कामयाब किताबें [दैनिक जागरण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

2019 बीतने को है, तो यह प्रश्न मौजू हो जाता है कि हिंदी लेखन क्षेत्र के लिए ये साल कैसा रहा? यह भी कि साहित्य, इतिहास, दर्शन आदि सभी प्रकार के विषयों से सम्बद्ध कैसी किताबें इस साल आईं और उनका कैसा प्रभाव रहा? बात की शुरुआत ‘सेपियंस’ नामक किताब के जरिये दुनिया भर में छा जाने वाले लेखक युवाल नोआ हरारी की एक और किताब ‘होमो डायस’ से करना उपयुक्त होगा। यह किताब मूलतः अंग्रेजी में है, लेकिन इसका हिंदी अनुवाद इस साल आया है। यह किताब इस मायने में अनूठी है कि इसमें भविष्य का इतिहास लिखने की कोशिश की गयी है। भविष्य का मनुष्य कैसा होगा और दुनिया की क्या स्थिति होगी, इसका तथ्यपरक और रोचक वर्णन यह किताब करती है।
इतिहास पुस्तकों की चर्चा में युवा लेखक प्रवीण झा की ‘कुली लाइंस’ भी उल्लेखनीय है। यह गिरमिटिया मजदूरों और उनके वंशजों पर केन्द्रित एक गंभीर, शोधपूर्ण एवं रोचक पुस्तक है। पाठकों द्वारा इस किताब को मिला अच्छा प्रतिसाद दिखाता है कि युवा लेखक कथा-कविता के सुरक्षित घेरे को छोड़ने का साहस यदि कर सकें तो अन्य क्षेत्रों में भी उनके लिए भरपूर संभावनाएं बनी हुई हैं।

वरिष्ठ भाजपा नेता और गंभीर चिंतक-लेखक ह्रदय नारायण दीक्षित की इस साल ‘ज्ञान का ज्ञान’ नामक एक महत्वपूर्ण किताब आई है। ईशावास्योपनिषद, प्रश्नोंपनिषद, माण्डुक्योपनिषद और कठोपनिषद इन चारों उपनिषदों के श्लोकों का भाष्य इस पुस्तक में लिखा गया है। भारत के उपनिषदीय ज्ञान को सामान्य लोगों के लिए सहज प्रस्तुति देने में यह पुस्तक उपयोगी प्रतीत होती है।
इस क्रम में वरिष्ठ लेखक प्रमोद भार्गव की पुस्तक ‘दशावतार’ का जिक्र जरूरी होगा। भगवान विष्णु के दस अवतारों की विज्ञानसम्मत दृष्टि के साथ व्याख्या करती इस औपन्यासिक कृति में रोचकता और गंभीरता का बहुत सुंदर समावेश मिलता है। जिन अवतारों को मिथकीय प्रसंग मानकर देखा जाता है, उन्हें जैविक विकास की प्रक्रिया से जोड़ते हुए वैज्ञानिक धरातल देने का अच्छा प्रयास इस पुस्तक में किया गया है।
राजनीतिक किताबों के लिहाज से भी ये साल अच्छा रहा है। चर्चित लेखक विजय त्रिवेदी की पुस्तक ‘बीजेपी : कल, आज और कल’ इसी साल आई जो भारतीय जनता पार्टी को उसकी विकास यात्रा के आईने में समझने का प्रयास करती है। प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू पर केन्द्रित पत्रकार पीयूष बबेले की किताब ‘नेहरू : मिथक और सत्य’ भी उल्लेखनीय है। यह किताब दावा करती है कि इसमें नेहरू को लेकर फैलाए गए कथित झूठ और विभ्रमों को ख़त्म कर उनके सत्य को सामने लाया गया है। अपने दावे पर यह किताब कितनी खरी है, इसकी पड़ताल तो इतिहासकार ही करेंगे, लेकिन संशय नहीं कि अपने विषय और प्रस्तुति के लिहाज से यह एक पढ़े जाने लायक किताब है।
हिंदी माध्यम से आईएएस की परीक्षा निकालकर अधिकारी बने निशांत जैन की प्रेरणादायक (मोटिवेशनल) पुस्तक ‘रुक जाना नहीं’ बीते नवम्बर में आई है। यह किताब प्रतियोगी परीक्षाओं के छात्रों को ध्यान में रखकर लिखी गयी है। इसमें व्यक्तित्व विकास, परीक्षा के दौरान तनावमुक्त रहने, समय प्रबंधन, लेखन कौशल आदि पर बात की गयी है। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए यह पुस्तक सहायक सिद्ध हो सकती है।
कविता कोश वेबसाइट से इंटरनेट पर सक्रिय कोई साहित्यप्रेमी शायद ही अपरिचित हो,  इसी कविता कोश के संस्थापक ललित कुमार की किताब ‘विटामिन जिंदगी’ भी इस साल आई है और निश्चित ही साल की एक ख़ास किताब है। यूँ तो यह किताब लेखक के निजी संस्मरणों की है, लेकिन पढ़ने में यह केवल एक व्यक्ति के जीवन का दस्तावेज मात्र नहीं लगती बल्कि जीवन-संघर्ष में जूझते हर व्यक्ति के लिए प्रेरणास्पद प्रतीत होती है।   
नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास ‘औघड़’ भी इस साल आई एक उल्लेखनीय किताब है। यह ठीक है कि गंभीर से गंभीर विषय को हल्के-फुल्के और मजेदार अंदाज में प्रस्तुत करने का कौशल नयी वाली हिंदी के लेखकों के पास है, लेकिन इस कौशल का असल लाभ हिंदी साहित्य को तब मिलेगा जब वे अपने समय से आगे देखते हुए उस भविष्य को अपने साहित्य में लाने का साहस करेंगे। समय से आगे देखने के संदर्भ में इस साल आए रत्नेश्वर सिंह के उपन्यास ‘एक लड़की पानी पानी’ का जिक्र समीचीन होगा। यह उपन्यास भावी जल संकट की आधार कथा के साथ स्त्री-नेतृत्व की बात भी करता है। इससे पूर्व ‘रेखना मेरी जान’ उपन्यास में रत्नेश्वर ग्लोबल वार्मिंग के भावी दुष्परिणामों पर लिख चुके हैं। ये किताबें उन विषयों को छू रही हैं जिनपर आज हिंदी में बहुत कम साहित्य मिलता है लेकिन आने वाले समय की चुनौतियाँ यही हैं।
चर्चित लेखक यतीन्द्र मिश्र के संपादन में इस साल आई अख्तरी भी साल की एक चर्चित किताब है जो मशहूर गायिका बेगम अख्तर के व्यक्तित्व, संगीत और उनके जीवन-वृत्त में समाहित दुर्लभ किस्सों-कहानियों को समेटे हुए है। यह किताब साल की शुरुआत में आई और पूरे साल चर्चा में रही। संगीत से ही सम्बंधित एक और किताब ‘माया का मालकौंस’ भी उल्लेखनीय है। पत्रकार व लेखक सुशोभित की इस किताब में हिंदी फिल्मों के गीतों का उसके बोल, संगीत, उसमें चल रहे दृश्य, अभिनय आदि विभिन्न बिन्दुओं के आधार पर विश्लेषण किया गया है। हालांकि इसका आकार में काफी छोटा होना इसके प्रभाव को कुछ कम अवश्य करता है, लेकिन तब भी तमाम किताबों की भीड़ में यह अपनी अलग उपस्थिति दर्ज कराती है।
लोकप्रिय अपराध कथा लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा ‘हम नहीं चंगे बुरा न कोय’ भी साल की एक उल्लेखनीय किताब है। गौरतलब है कि हिंदी साहित्य के विचारधारा विशेष के मठाधीशों ने सुरेन्द्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा जैसे लोकप्रिय लेखकों के लेखन को लुगदी साहित्य कहकर मुख्यधारा से बाहर रखा लेकिन आज जब हिंदी का एक प्रतिष्ठित प्रकाशन सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा को प्रकाशित कर रहा है, तो लगता है कि अब साहित्य में लोकप्रिय लेखन से परहेज की प्रवृत्ति का क्षरण होने लगा है जो हिंदी साहित्य के लिए एक शुभ संकेत ही है।
लोकप्रिय लेखन की तरह ही मंचीय कविता के प्रति भी हिंदी साहित्य की मुख्यधारा के मठाधीश बौद्धिकों में एक उपेक्षा की भावना रही है। वे इस प्रकार की कविता और इसके कवियों को उपेक्षात्मक दृष्टि से देखते रहे हैं। लेकिन इस साल आई लोकप्रिय मंचीय कवि डॉ. कुमार विश्वास की किताब ‘फिर मेरी याद’ ने पाठकों में जो लोकप्रियता प्राप्त की, इसके बाद इन बौद्धिकों को अपनी राय बदलने पर अवश्य विचार करना चाहिए। स्पष्ट है कि लगभग हर तरह के विषयों व विधाओं में कोई न कोई अच्छी किताब इस साल आई है, अतः हिंदी किताबों के मामले में यह साल विविधतापूर्ण और समृद्ध कहा जा सकता है।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

सॉफ्ट पॉर्न पर भी लगे अंकुश (दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

बीते दिनों हैदराबाद में प्रियंका रेड्डी के बलात्कार और जलाए जाने का मामला सामने आने के बाद एकबार फिर देश में बलात्कार को लेकर आक्रोश देखने को मिला। इस मामले के चार आरोपियों का भागने की कोशिश के दौरान हैदराबाद पुलिस एनकाउंटर कर चुकी है, जिसपर मानवाधिकार की अलग चर्चा चल रही है। इन सब के बीच देश में कई और बलात्कार के मामले सामने आ चुके हैं यानी कि इतने शोर-शराबे के बाद भी ऐसी घटनाएं रुक नहीं रहीं। ऐसे में प्रश्न यह है कि बलात्कार की समस्या का मूल कारण क्या है और किस तरह इसे रोका जा सकता है? कुछ लोग मानते हैं कि कड़ा क़ानून बनाकर बलात्कार पर अंकुश लगाया जा सकता है तो कुछ का मानना है कि बलात्कारियों को गोली मार देना इसका उपाय है। लेकिन विचार करें तो वास्तव में इन सब बातों में अज्ञान आधारित भावुकता ही अधिक है, ठोस समाधान नहीं। देश में बलात्कार को लेकर पहले से ही बहुत सख्त क़ानून मौजूद है, उसे और कितना भी सख्त कर लिया जाए, बलात्कार को रोकने में बहुत अधिक कारगर नहीं हो सकता। कारण यह कि बलात्कार चोरी-तस्करी जैसा कोई पेशेवर अपराध नहीं है, बल्कि यौन कुंठाओं और मानसिक विकृति से अभिप्रेरित एक बर्बर आपराधिक कृत्य है।

अब प्रश्न यह उठता है कि फिर बलात्कार को रोकने का उपाय क्या है? बलात्कार पर अंकुश के लिए आवश्यक है कि लोगों में यौन कुंठा और विकृति पैदा करने वाले कारकों पर लगाम लगाई जाए जिनमें एक प्रमुख कारक है - पॉर्न। उल्लेखनीय होगा कि प्रियंका रेड्डी प्रकरण में ही जहां एक तरफ लोग बलात्कार को लेकर आक्रोश व्यक्त कर रहे थे, वहीं यह घृणास्पद जानकारी भी सामने आई कि बहुत से लोग पॉर्न  वेबसाइटों पर पीड़िता के नाम से वीडियो खोज रहे थे।
इसके बाद सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने पॉर्न पर प्रतिबन्ध की बात उठाई तो वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर केंद्र सरकार से सभी पॉर्न वेबसाइटों पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की है। इस प्रकरण के दौरान केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए बताया कि सरकार ने तीन सौ के करीब चाइल्ड पॉर्न की वेबसाइटों को प्रतिबंधित किया है। यह अच्छा है कि अब बलात्कार के पीछे पॉर्न को जिम्मेदार मानकर बहस होने लगी है, लेकिन पॉर्न की ये समस्या सिर्फ इसकी वेबसाइटों तक सीमित नहीं है बल्कि टीवी, सिनेमा जैसे मनोरंजन के क्षेत्रों को भी इसने अपनी चपेट में ले लिया है।
आजकल तमाम फिल्मों में रोमांस के नामपर जिस प्रकार नायक-नायिका के अंतरंग दृश्यों का एकदम नग्न और खुला प्रदर्शन होने लगा है, उसे पॉर्न  तो नहीं लेकिन ‘मिनी पॉर्न’ अवश्य कहा जा सकता है। ऐसे अंतरंग दृश्य हेट स्टोरी, जिस्म, मर्डर, रागिनी एमएमएस जैसी कितनी ही फिल्मों की पहचान हैं। इन फिल्मों का हर भाग इसी दावे के साथ आता है कि उसमें पिछले भाग की तुलना में अधिक अंतरंग दृश्य हैं। हालांकि मुख्यधारा की सिनेमा में तो फिर भी सेंसर बोर्ड के कारण थोड़ी मर्यादा रहती है, लेकिन इससे अलग ओटीटी माध्यमों पर प्रसारित वेबसीरीजों में तो जैसे होड़ मची है कि कौन सेक्स दृश्यों को कितनी अधिक नग्नता और मर्यादाहीनता के साथ दिखा सकता है।
आज सेक्रेड गेम्स, लस्ट स्टोरीज, मिर्ज़ापुर, फोर मोर शॉट्स, गंदी बात, बेकाबू जैसी अश्लीलता की सब सीमाएं पार करतीं वेबसीरिजें नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, एल्ट बालाजी आदि देश के कई प्रमुख ओटीटी माध्यमों पर प्रसारित हो रही हैं। इन वेबसीरीजों में न तो संबंधों की मर्यादा का ध्यान रखा जाता है और न ही लोकलाज की भावना का। इनके अलावा कितने ही छोटे-छोटे ओटीटी माध्यम भी हैं, जिनका निर्माण ही शायद वेबसीरिज के नाम पर सॉफ्ट पॉर्न दिखाने के लिए हुआ है। उनपर मौजूद सामग्रियों में और कुछ होता ही नहीं है। साथ ही वीडियो के सबसे सहज और लोकप्रिय माध्यम यूट्यूब पर भी इस तरह की सामग्री की भरमार है। लेकिन समस्या यह है कि इन माध्यमों के लिए कोई नियामक संस्था नहीं है, इस कारण ‘कलात्मक आजादी’ के नामपर इन्हें मनमानी चीजें प्रस्तुत करने में कोई बाधा नहीं होती।
दुखद किन्तु सत्य है कि इस प्रकार की कथित मनोरंजन सामग्री के समर्थक भी हैं। उनका तर्क होता है कि जो समाज में हो रहा है, उसीको दिखाया जा रहा है। यहाँ सवाल है कि क्या सिनेमा समाज की कोरी नकल होती है? क्या उसकी अपनी कोई मौलिकता और अंतर्दृष्टि नहीं होती? क्या वो सबकुछ वैसे ही प्रस्तुत करती है जैसे समाज में हो रहा होता है? इन सवालों का कोई संतोषप्रद जवाब इन कथित मनोरंजन सामग्रियों के समर्थकों के पास शायद ही हो।
एक तर्क यह भी दिया जाता है कि अगर यह चीजें दर्शकों को पसंद आईं तो वे देखेंगे वर्ना नहीं देखेंगे। अब अगर दर्शकों की इच्छाओं को आधार बनाकर ही चला जाए तब तो दर्शक और भी बहुत कुछ देखना व करना चाहते हैं, तो क्या उन्हें उसकी आजादी दे दी जाएगी। ऐसा नहीं होता। सिनेमा निर्माण एक सामाजिक एवं नैतिक दायित्व से पूर्ण कर्म है जिसका ध्यान इससे जुड़े लोगों को रखना चाहिए।
रही बात कलात्मक आजादी की तो कलात्मकता तो इस बात में है जब आप किसी अश्लील लगने वाले दृश्य को भी ऐसे फिल्मा लें कि बात संप्रेषित भी हो जाए और अश्लीलता का प्रदर्शन भी न हो। पुरानी फिल्मों में फिल्माए जाने वाले अंतरंग रुमानी दृश्य या बलात्कार के दृश्य इसका उदाहरण हैं, जिनमें संबंधित व्यक्तियों की एक झलक देने के बाद कैमरा बंद दरवाजे, दीये, चलते पंखे, खुली खिड़की या किसी अन्य वस्तु की तरफ घूम जाता था और संगीत के माध्यम से पार्श्व में हो रही क्रिया का आभास दर्शक को दिया जाता था। वास्तव में इसे ही कला कहते हैं। फिर आज के इस तकनीक संपन्न समय में अंतरंग दृश्यों को फिल्माने के लिए ऐसे कुछ नए सांकेतिक तरीके क्यों नहीं इजाद किए और अपनाए जा सकते?
निःसंदेह सेक्स कोई वर्जित या दूषित चीज नहीं है, लेकिन समाज में उसको लेकर कुछ मर्यादाएं निश्चित की गयी हैं ताकि समाज व्यभिचार के मार्ग पर न बढ़े। आज मनोरंजन के नाम पर उक्त प्रकार की सामग्रियों द्वारा उन मर्यादाओं को नष्ट करने का तो प्रयास किया ही जा रहा है, यहीं से लोगों के मन-मस्तिष्क में यौन विकृति भी पनप रही है जो कि बलात्कार जैसी घटनाओं का एक प्रमुख कारण है। अतः सरकार को न केवल पॉर्न  वेबसाइटों पर प्रतिबंध की दिशा में काम करना चाहिए बल्कि मनोरंजन की आड़ में परोसे जा रहे इस सिनेमाई सॉफ्ट पोर्न पर अंकुश लगाने के लिए भी कदम उठाने चाहिए। अगर पॉर्न और सॉफ्ट पॉर्न  दोनों को पूरी तरह से रोका जा सके तो निःसंदेह बलात्कार के मामलों में बड़ी मात्रा में कमी आ सकती है।

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

इतिहास के पुनर्लेखन का प्रश्न (दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

गत 17 सितम्बर को केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में ‘गुप्तवंशक वीर : स्कंदगुप्त विक्रमादित्य का ऐतिहासिक पुन:स्मरण एवं भारत राष्ट्र का राजनीतिक भविष्य' विषय पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि इतिहास में गड़बड़ियों के लिए अंग्रेजों व वामपंथियों को दोष देने से कुछ नहीं होगा बल्कि वर्तमान में भारतीय दृष्टि से इतिहास का पुनर्लेखन किए जाने की जरूरत है। उन्होंने मौर्य वंश, गुप्त वंश से लेकर शिवाजी तक का उदाहरण देते हुए कहा कि इन महापुरुषों के विषय में आज ढूँढने पर कोई संदर्भ ग्रन्थ नहीं मिलता तो यह हमारी कमी है।

अमित शाह के इस वक्तव्य में भारतीय इतिहास का एक व्यापक परिप्रेक्ष्य मौजूद है। दरअसल आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू पर पश्चिम का गहरा प्रभाव था। समाजवाद को वे देश की समस्याओं का सबसे बेहतर समाधान मानते थे। पश्चिम का यह प्रभाव उनकी इतिहास-दृष्टि पर भी रहा। पश्चिमी विद्वानों द्वारा स्थापित आर्य आक्रमण सिद्धांत, जो इतिहास का एक विवादास्पद विषय रहा है, में उनकी आस्था थी। ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ पुस्तक में संकलित एक पत्र में उन्होंने लिखा है, ‘..हिंदुस्तान के रहने वाले द्रविड़ कहलाते थे। ये वही लोग हैं, जिनकी संतान आजकल दक्षिण हिंदुस्तान में मद्रास के आसपास रहती है। उनपर आर्यों ने उत्तर से आकर हमला किया, उस जमाने में मध्य एशिया में बेशुमार आर्य रहते होंगे... आर्य एक मजबूत लड़ने वाली जाति थी, उसने द्रविड़ों को भगा दिया।’


प्रथम प्रधानमंत्री की इस पश्चिम-प्रभावित दृष्टि का प्रभाव देश के इतिहास लेखन पर भी पड़ा और इतिहासकारों ने पूर्वग्रहयुक्त अभारतीय दृष्टि के साथ भारतीय इतिहास का लेखन किया, जिसमें विदेशी आक्रान्ताओं के पराक्रम व शासन का वर्णन तो खूब हुआ, परन्तु देश के अनेक महापुरुष उचित स्थान नहीं पा सके।  ये इतिहास कुछ यूँ रहा, जिसमें साम्राज्य-विस्तार की लालसा में खून की नदियाँ बहाने वाले  मुग़ल शासक अकबर को महान बना दिया गया, लेकिन उसके खिलाफ जंगल-जंगल भटककर संघर्ष करने वाले महाराणा प्रताप की कोई विशेष चर्चा नहीं की गयी।
रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह, मंगल पाण्डेय, तात्या टोपे जैसे 1857 के स्वाधीनता संग्राम के अनेक नाम हैं, जिन्हें इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। शाह ने ठीक ही कहा कि अगर सावरकर न होते तो 1857 के स्वाधीनता संग्राम को हम प्रथम स्वतंत्रता संग्राम नहीं, विद्रोह ही मान रहे होते। कुल मिलाकर अमित शाह ने अपने वक्तव्य में इतिहास में गड़बड़ी की समस्या को तो रेखांकित किया ही, लेकिन उससे कहीं अधिक जोर भारतीय दृष्टि से इतिहास का पुनर्लेखन कर इस समस्या को दूर करने पर दिया।            

शाह इतिहास के जिस भारतीय दृष्टि से युक्त पुनर्लेखन की बात कर रहे, संस्थागत रूप से वर्तमान में उसके लिए कोई संभावनापूर्ण स्थिति नहीं दिखती। भारतीय अनुसन्धान इतिहास परिषद की वेबसाइट खंगालने पर किसी भी नए ऐतिहासिक शोध या स्थापना से सम्बंधित किसी किताब की जानकारी नहीं मिलती। ऐसी किसी किताब की कोई चर्चा भी कहीं नहीं सुनाई देती।  
इससे इतर स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य कर रहे नए लेखकों को देखें तो आज  हिंदी का ज्यादातर नया लेखन कथा-कविता पर केन्द्रित हो रहा है, शोध-इतिहास की तरफ नए लेखक जाना ही नहीं चाहते। जो भी नया लेखक आ रहा, वो कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह या उपन्यास के साथ आ रहा है। कथा-कविता की पुस्तकों की भीड़ में ऐसी पुस्तकें बहुत कम दिखती हैं जो इतिहास में उपेक्षित रहे किसी विषय पर प्रकाश डालती हों या किसी ऐतिहासिक स्थापना को निरस्त कर नयी स्थापना करती हों।  

हालांकि ऐसा नहीं है कि रचनात्मक साहित्य लिखते हुए ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं लिखे जा सकते। आचार्य शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर दिनकर तक हिंदी साहित्य में कई ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने रचनात्मक साहित्य के साथ इतिहास पर भी जमकर कलम चलाई और उनका लिखा आज हमारी थाती है। परन्तु, ये कर्म असीम धैर्य, श्रम और समर्पण के साथ-साथ साहस भी मांगता है, जिसका आज के ‘फास्ट फ़ूड लेखन’ की संस्कृति में जी रही नए लेखकों की पीढ़ी में ख़ासा अभाव है। इतिहास ग्रन्थ तो छोड़िये, अच्छे ऐतिहासिक उपन्यास भी अब नहीं लिखे जा रहे, बल्कि उनका स्थान ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की कल्पित कथाओं ने ले लिया है। विश्वविद्यालयों के इतिहास विभाग में भी शोध के स्तर पर कुछ बेहतर होता नजर नहीं आता। कुल मिलाकर इस बात से अधिकांश लोग सहमत मिलेंगे कि भारतीय इतिहास में सबकुछ ठीक नहीं है, किन्तु कोई इसे ठीक करने की जहमत नहीं उठाना चाहता।  

एक प्रश्न यह भी उठता है कि नए सिरे से इतिहास-लेखन की दिशा क्या होनी चाहिए और उसमें किन बिन्दुओं पर काम किया जाना चाहिए। इसके लिए कुछ-कुछ दिशा तो गृहमंत्री ने अपने भाषण में ही दे दी कि इतिहास के उपेक्षित महापुरुषों और साम्राज्यों पर संदर्भ ग्रन्थ तैयार किए जाएं। इसके अलावा अबतक जो इतिहास लेखन हुआ है, उसका अधिकांश हिस्सा ईसा के बाद का है जबकि भारतीय सभ्यता की जड़ें बहुत गहरी, बहुत पुरातन हैं। दिक्कत यही है कि हमने भारतीयता युक्त इतिहास दृष्टि से कभी उनको देखने का प्रयत्न ही नहीं किया। यह अभारतीय दृष्टि ही है, जिसने रामायण और महाभारत जैसे हमारी सभ्यता-संस्कृति के महान ऐतिहासिक ग्रंथों को मिथक के रूप में निरुपित किया है, जबकि भारत सहित दुनिया भर में प्राप्त अनेक प्रमाण यह इंगित कर चुके हैं कि यह ग्रन्थ इतिहास हैं। 

राखीगढ़ी में प्राप्त बसावट के अवशेष हों या सिनौली में प्राप्त रथ, मुकुट हों या इंडोनेशिया के समुद्र में मौजूद भगवान् विष्णु का पांच हजार साल पुराना मंदिर हो अथवा काफी पहले जर्मनी में प्राप्त हुई नरसिंह भगवान की कई हजार साल पुरानी प्रतिमा हो, इस तरह के तमाम साक्ष्य हमारी विस्तृत, पुरातन और समृद्ध सभ्यता की कथा कहते हैं। ऐसे ही रामायण और महाभारत  से जुड़े विश्व भर में प्राप्त सभी साक्ष्यों को संकलित कर इन महाकाव्यों का मिथक से ऐतिहासिक निरूपण करने वाले इतिहास ग्रंथों के लेखन की दिशा में कार्य किया जा सकता है। निस्संदेह यह कार्य आसान नहीं है, और इसके लिए जैसा कि अमित शाह ने कहा हमें हमारी ‘मेहनत करने की दिशा को केन्द्रित’ करने की जरूरत है।

गृहमंत्री के इस वक्तव्य के पश्चात् यह उम्मीद कर सकते हैं कि देश के बौद्धिक वर्ग में इसका असर होगा और वे इतिहास की बात आने पर अंग्रेजों और वामपंथियों को कोसने की बजाय नया इतिहास लिखने में ऊर्जा खर्च करना शुरू करेंगे।