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शनिवार, 14 नवंबर 2020

जेएनयू में नए युग का आगाज

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

गत 12 नवम्बर की तारीख दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के लिए ऐतिहासिक रही। इस दिन वामपंथी विचारधारा की नर्सरी माने जाने वाले इस विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अनावरण किया। निश्चित रूप से जेएनयू देश का एक अत्यंत प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान है, लेकिन स्थापना के समय से ही इसकी वैचारिक पहचान मार्क्सवादी विचारधारा पर आधारित रही है। संस्थान की छात्र राजनीति पर वामपंथी छात्र संगठनों का वर्चस्व रहा है। अतः आज जब इस विश्वविद्यालय में देश की सांस्कृतिक पहचान व भारतीयता की भावना से विश्व को परिचित कराने वाले महान राष्ट्रवादी चिंतक स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा की स्थापना हुई है, तो इससे एक उम्मीद जगती है कि अब यहाँ आयातित वामपंथी विचारधारा का वर्चस्व कम होगा तथा भारतीयता के विचारों को प्रोत्साहन मिलेगा।

स्वामीजी की प्रतिमा का अनावरण करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कई महत्वपूर्ण बातें कही। प्रधानमंत्री के वक्तव्य की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि राष्ट्र के विरोध में रहने वाली कोई भी विचारधारा स्वीकार्य नहीं हो सकती। इस कथन के माध्यम से कहीं न कहीं प्रधानमंत्री ने बिना नाम लिए इशारों-इशारों में वामपंथी विचारधारा के छात्र संगठनों व अनुयायियों को ही नसीहत देने का काम किया है। दरअसल इस विचारधारा के अनुयायी जेएनयू में अनेक बार ऐसी-ऐसी चीजों के लिए चर्चा में आए हैं, जो राष्ट्र के विरुद्ध रही हैं। फिर चाहें नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों की मृत्यु पर जश्न मनाना हो या आतंकवादी अफज़ल गुरु की बरसी पर कार्यक्रम आयोजित कर देशविरोधी नारे लगाना हो अथवा नवरात्र में महिषासुर शहादत दिवस मनाना हो। इस तरह के अनेक आपत्तिजनक कृत्य इस संस्थान में वामपंथी छात्र संगठनों द्वारा न केवल किए जाते रहे हैं, बल्कि उल-जुलूल दलीलें देकर उन्हें सही ठहराने की कोशिश भी की जाती रही है। यहाँ तक कि स्वामी विवेकानंद की मूर्ति के इस अनावरण पर भी वामपंथी छात्र संगठनों ने सवाल उठाया है और इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया है।

दरअसल जेएनयू को सरकार से भारी सब्सिडी मिलती रही है, जिस कारण यहाँ रहने-खाने और पढ़ने का खर्च अपेक्षाकृत रूप से काफी कम है। इसके हॉस्टल के कमरों का किराया लम्बे समय से दस और बीस रूपये था तथा अन्य खर्च भी कम थे, जिसमें गत वर्ष वृद्धि की गयी तो छात्रों ने बवाल मचा दिया था। खैर तब किसी तरह ये मामला सुलझा था। लेकिन आज सवाल ये है कि देश के करदाताओं के पैसे से मिली सब्सिडी पर जेएनयू में नाममात्र के खर्च पर पढ़ने वाले ये छात्र, वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में आकर, आखिर कैसे देश के ही खिलाफ बातें करने लगते हैं ? प्रधानमंत्री द्वारा अपने उक्त कथन में विचारधारा के इन्हीं अनुयायियों की तरफ इशारा किया है।

इसके अलावा प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता को लेकर भी महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत का अर्थ केवल संसाधनों की ही नहीं, बल्कि सोच और संस्कारों की आत्मनिर्भरता भी है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री स्वामी विवेकानंद से जुड़ा बड़ा रोचक प्रसंग भी सुनाया कि विदेश में एकबार स्वामी विवेकानंद से किसीने पूछा कि आप ऐसे कपड़े क्यों नहीं पहनते जिससे जेंटलमैन लगें। इसपर स्वामीजी ने बड़ी विनम्रता से कहा कि आपके कल्चर में एक टेलर जेंटलमैन बनाता है, लेकिन हमारे कल्चर में चरित्र तय करता है कि कौन जेंटलमैन है। कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वामी विवेकानंद का ये कथन भारतीय संस्कृति की तेजस्विता और आत्मनिर्भरता को ही दर्शाता है। वास्तव में, आज जब देश का युवा, विशेषकर शहरी युवा वर्ग, पश्चिमी संस्कृति के आकर्षण में डूबता जा रहा है और इसके कई दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं, तब भारत की इस सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता पर बात करना और इससे युवाओं को परिचित कराना बेहद जरूरी हो जाता है। प्रधानमंत्री का ‘सोच और संस्कारों की आत्मनिर्भरता’ का कथन मुख्यतः युवा वर्ग के प्रति ही है। देश का युवा सही अर्थों में तब ‘ब्रांड इंडिया’ का ब्रांड एम्बेसडर  बन पाएगा जब वो अपने देश की सांस्कृतिक विशिष्टता को समझ व ग्रहण कर लेगा। क्योंकि, भारत की पहचान उसकी सनातन संस्कृति से ही है, अतः बिना इसको अपनाए ‘ब्रांड इंडिया’ की वैश्विक प्रतिष्ठा नहीं हो सकती।

दैनिक जागरण आई-नेक्स्ट
अपने वक्तव्य में स्वामी विवेकानंद से जुड़े एक और महत्वपूर्ण प्रसंग की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि एक बार स्वामीजी से किसीने कहा कि संतों को केवल अपने देश की नहीं, पूरे विश्व की चिंता करनी चाहिए. इसपर स्वामीजी ने बड़ी सहजता से यह सुन्दर उत्तर दिया कि जो अपनी माँ की पीड़ा को नहीं समझ सकता वो अन्य किसीकी पीड़ा को कैसे समझेगा. इस कथन के माध्यम से उन्होंने राष्ट्र को ‘माँ’ मानने वाली सनातन भारतीय संस्कृति का ही परिचय दिया था. आज की पीढ़ी में अपने राष्ट्र के प्रति आत्मगौरव का ऐसा ही भाव होना चाहिए. दरअसल स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े अनेक ऐसे प्रसंग हैं जिनके द्वारा न केवल उनके व्यक्तित्व और विचारों को समझा जा सकता है, बल्कि प्रेरणा भी ग्रहण की जा सकती है। स्वामी विवेकानंद के विचारों का प्रभाव इतना व्यापक था कि किसी भी विचारधारा का व्यक्ति हो, वो उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता था. उनके विचारों से बाल गंगाधर तिलक से लेकर महात्मा गाँधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस से लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू और बाबा साहब भीमराव आंबेडकर से लेकर वामपंथी नेता तक सब उनसे प्रभवित थे। यही कारण था कि विवेकानंद जी के स्मारक निर्माण के लिए समाजवादी नेता श्री राम मनोहर लोहिया, साम्यवादी नेता रेणु चक्रवर्ती द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) के संस्थापक और तमिलनाडु  के  प्रथम मुख्यमंत्री अन्नादुराई  ने  सहयोग भी दिया थाI स्वामीजी के विचारों का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि  एकबार गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था, ”आपको भारत को जानना है तो स्वामी विवेकानंद जी को पढ़िए उनमें सबकुछ सकारात्मक है, कुछ भी नकारात्मक नहीं”। स्वामी विवेकानंद के विचारों के प्रभाव का सबसे बड़ा उदाहरण ‘मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल’ का भगिनी निवेदिता बन जाना है। मार्गरेट नोबेल नवम्बर, 1895 में स्वामी विवेकानंद से उनके एक व्याख्यान के दौरान मिली थीं।  मार्गरेट स्वामीजी के दार्शनिक ज्ञान, व्यक्तित्व और धर्म को अनुभूति के तौर पर देखने वाली चर्चा से प्रभावित हुईंI मार्गरेट आने वाले दिनों में उनके अनेक व्याख्यानों में सम्मलित होने लगीं और निरंतर अपनी जिज्ञासाओं के कारण प्रश्न भी करती रहती थींI तब वो स्वामीजी के विचारों से इतनी प्रभावित हुईं कि एक पत्र में उन्होंने अपने मित्र को लिखा – ”मानो यदि स्वामीजी उस समय लंदन में आते ही नहीं तो मेरा जीवन निष्प्राण पुतले जैसा होताI” स्वामीजी ने निवेदिता से भारत में आकर सेवा कार्य करने का आह्वान किया. उन्होंने पत्र में लिखा, ‘”भारत के कार्य में आपका भविष्य उज्जवल है, ऐसा मुझे विश्वास हैI आवश्यकता है एक स्त्री की, पुरुष की नहीं I भारत की स्त्रियों के लिए कार्य करने वाली एक सिंह के सदॄश्य धैर्यवान स्त्री कीI अपनी विद्या, मन की शुद्धता और केल्टिक वंश से होने के कारण इस कार्य के लिए जैसी स्त्री की आवश्यकता है संयोग से तुम वैसी ही होI” वे भारत आईं और भारत आने के बाद 25 मार्च, 1898 को स्वामी विवेकानंद ने उनको ब्रह्मचर्य की दीक्षा और निवेदिता नाम दोनों दियाI                 

स्वामी विवेकानंद जब शिकागो के अंतर्राष्ट्रीय धर्म सम्मेलन में पहुँचे थे, तो भारत को लेकर विश्व का दृष्टिकोण पूर्वग्रहों पर आधारित था। इसी कारण स्वामीजी को एकदम अंत में बोलने का अवसर दिया गया। लेकिन इस उपेक्षा के कारण उनमें अपने भारतीय संस्कृति और दर्शन को लेकर कोई हीनताबोध नहीं विकसित हुआ, बल्कि जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो वो वक्तव्य इतिहास की धरोहर बन गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि स्वामीजी के शब्दों में भारतीय सभ्यता, संस्कृति और दर्शन का सारगर्भित समावेश था। उनके स्वर में भारत की सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता का आत्मविश्वास था।  इसी आत्मविश्वास की जरूरत आज के युवाओं को भी है। उम्मीद कर सकते हैं कि ऐसा ही आत्मविश्वास, जेएनयू में स्थापित स्वामीजी की प्रतिमा विश्वविद्यालय परिसर के युवाओं में भी पैदा करेगी। संभव है कि यह जेएनयू में एक नए वैचारिक युग के आगाज की मजबूत आधारशिला भी बने।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

वैचारिक असहिष्णुता से ग्रस्त वामपंथी बुद्धिजीवी [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]


  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश का जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय एकबार फिर चर्चा में है और चर्चा का कारण इसबार भी नकारात्मक है। पिछले दिनों कुछ नकाबपोश लोगों के विश्वविद्यालय परिसर में घुसकर छात्रों के साथ मारपीट करने की खबर आई और उसके बाद से ही इस मामले में बवाल मचा हुआ है। विडंबना ही है कि देश का ये प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अपनी अकादमिक उपलब्धियों के कारण कम बेमतलब विवादों के कारण अधिक चर्चा में रहता है। 
दिल्ली पुलिस ने प्रेस कांफ्रेंस कर नौ आरोपियों के नाम सार्वजनिक किए हैं। इनमें छात्र संघ अध्यक्ष आईशी घोष का नाम भी शामिल है। पुलिस का कहना था कि अभी उसकी जांच चल रही है, लेकिन अफवाहों को देखते हुए उसे बीच में ही ये जानकारी साझा करनी पड़ी।
वास्तव में, सोशल मीडिया से सड़क पर तक छात्रों के प्रति समर्थन व्यक्त करने में जुटे बुद्धिजीवियों की भी अफवाह फैलाने में बड़ी भूमिका है। उनका रवैया किसी न्यायाधीश की तरह रहा है। ऐसा लगता है कि उन्होंने पीड़ित और पीड़क का निर्णय कर लिया है और उसीके आधार पर अभियान चलाने में लगे हैं।
यह ठीक है कि लोकतंत्र में सबको अपने विचार व्यक्त करने और सरकार के निर्णयों का लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध करने अधिकार है, लेकिन उसका भी एक तरीका होता है। विरोध को तथ्यपरक और भाषाई मर्यादा के दायरे में होना चाहिए। उसपर भी अगर आप बौद्धिक रूप से एक विशिष्ट पहचान रखते हैं तो आपका दायित्व और बढ़ जाता है। लेकिन नरेंद्र मोदी जिस दल और विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसके प्रति इस देश के वामपंथी बुद्धिजीवियों का विरोध घृणा के स्तर तक जा पहुंचा है, जिसका प्रकटीकरण इनकी भाषा से लेकर कुतर्कों तक में देखा जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर उल्लेखनीय होगा कि लेखक, शायर जावेद अख्तर ने जेएनयू छात्र संघ अध्यक्षा आईशी घोष के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर तंज करते हुए बीते दिनों ट्विट किया कि ‘जेएनयूएसयू अध्यक्ष के ख़िलाफ़ एफ़आईआर पूरी तरह से समझ में आती है। उसने अपने सिर से एक राष्ट्रवादी, देश प्रेमी लोहे की छड़ को रोकने की हिम्मत कैसे की।’ सवाल यह है कि जावेद अख्तर इसमें ‘राष्ट्रवादी’ शब्द का प्रयोग किस आधार पर कर रहे हैं? ऐसी क्या अधीरता है जो वे जांच पूरी होने तक का इंतजार करने की बजाय खुद ही दोषी तय करने में लगे हैं। साथ ही, अब जब पुलिस ने आरोपियों के नाम सार्वजनिक कर दिए हैं और उसमें आइशी घोष का नाम भी बतौर आरोपी शामिल है, तो इसपर वे क्या कहेंगे?
ज्यादा दिन नहीं हुए जब इनके पुत्र फरहान अख्तर सीएए के विरोध में उतर पड़े थे, लेकिन जब पूछा गया कि क्यों विरोध कर रहे तो बगले झाँकने लगे और कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाए। ऐसे में यही प्रतीत होता है कि इन लोगों के विरोध के पीछे कोई व्यावहारिक आधार नहीं, केवल और केवल वैचारिक असहिष्णुता है। यह असहिष्णुता फिल्म जगत से जुड़े तमाम और लोगों में भी है और इस कदर है कि वे प्रधानमंत्री के प्रति तू-तड़ाक की भाषा के इस्तेमाल करने पर तक उतर चुके हैं। फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप इसके ताजा उदाहरण हैं।      
इससे पूर्व सीएए के विरोध के दौरान भी हमें बुद्धिजीवी वर्ग का यही असहिष्णु चरित्र दिखाई दिया था। बीते दिनों केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने राष्ट्रीय इतिहास कांग्रेस में अपना वक्तव्य देते हुए सीएए का जिक्र करना शुरू किया तो इसपर मार्क्सवादी इतिहासकार इरफ़ान हबीब एकदम से बौखला गए और राज्यपाल को रोकने के लिए बढ़ने लगे। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का कहना था कि अगर उनके एडीसी ने इन्हें नहीं रोका होता तो ये उनपर हमला कर देते। अब जो व्यक्ति राज्यपाल के प्रति सार्वजनिक रूप से इतनी आक्रामकता दिखा सकता है, उसमें विपरीत विचारों के लिए कितनी असहिष्णुता भरी होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
इन बुद्धिजीवियों की असहिष्णुता का एक और उदाहरण तो पिछले साल तब भी दिखा जब जेएनयू में बतौर  प्रोफेसर एमिरेट्स जुड़ीं रोमिला थापर विश्वविद्यालय प्रशासन के बायोडाटा मांगने पर बिगड़ गयीं। इसे वामपंथियों ने सरकार द्वारा बुद्धिजीवियों को दबाने की कोशिश करार दे दिया। सवाल है कि ये कैसी बुद्धिजीविता है जो मन से दंभ और असहिष्णुता को खत्म नहीं कर सकी।        
इतना ही नहीं, अपने अंधविरोध में इन बुद्धिजीवियों की भाषा का स्तर भी एकदम सतही होता जा रहा है। उदाहरण के तौर पर नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के दौरान ही लेखिका अरुंधती रॉय दिल्ली विश्वविद्यालय के एक विरोध प्रदर्शन में छात्रों के बीच पहुँचीं। वहां उन्होंने लोगों को सलाह देते हुए कहा कि एनपीआर में जब नाम-पता पूछा जाए तो वे रंगा-बिल्ला और सात रेसकोर्स बताएं। उनका इशारा मोदी और अमित शाह की तरफ था। अरुंधती रॉय को बताना चाहिए कि देश की जनता द्वारा बहुमत से निर्वाचित प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रति इस तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करके इन्होने कौन-सी बौद्धिकता का परिचय दिया है?
आश्चर्य है कि इसके बाद भी ये लोग कहते फिरते हैं कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है और सरकार तानाशाही कर रही है। रामचंद्र गुहा, अमर्त्य सेन से लेकर साहित्य जगत के भी अनेक नाम हैं जो 2014 के बाद से सत्ता-विरोध की आड़ में किसी न किसी बहाने से अपने मोदी विरोध के एकसूत्रीय एजेंडे को हवा देने की कोशिश में लगे रहते हैं।
बुद्धिजीवी होने का अर्थ होता है कि आप की बौद्धिक चेतना किसी भी तरह के पूर्वाग्रह और वैचारिक संकीर्णता से मुक्त, बुद्धि और ज्ञान के विस्तृत धरातल पर प्रतिष्ठित हो। बुद्धिजीवियों से अपेक्षा की जाती है कि वे देश को दिशा दिखाएंगे। लेकिन क्या हमारे इन बुद्धिजीवियों से ऐसी कोई अपेक्षा की जा सकती है। एक आयातित विचारधारा के संकीर्ण दायरे में बैठकर इन तथाकथित बुद्धिजीवियों ने दूसरी विचारधारा को निशाने पर लेने को ही अपना शगल बना लिया है। विपरीत विचार के विरोध में ये घृणा के स्तर तक जा पहुँचते हैं, लेकिन जब उसी स्वर में इनका प्रतिवाद होता है तो तानाशाही और अभिव्यक्ति की आजादी का विलाप भी करने लगते हैं। इनकी सारी बौद्धिकता केवल एक विचारधारा का विरोध करने मात्र के लिए समर्पित लगती है, उसके अलावा इन्हें देश में कोई और समस्या व चुनौती नहीं नजर आती। इनकी इस हालत पर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की यह पंक्ति बिलकुल सटीक लगती है कि ‘इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं’।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

शिक्षण संस्थानों पर वामपंथियों की कुदृष्टि [हरिभूमि में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत अवस्थित रामजस महाविद्यालय विवादों में बना हुआ है। दरअसल ये सारा विवाद शुरू तब हुआ जब गत २१ फ़रवरी को रामजस महाविद्यालय के एक सेमिनार में वामपंथी छात्र संगठन आईसा द्वारा जेएनयू के छात्र और राष्ट्रद्रोह के आरोपी उमर ख़ालिद व शेहला रशीद को बुलाया गया, जिसका छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् द्वारा विरोध हुआ। फिर विश्वविद्यालय प्रशासन ने उमर खालिद और शेहला रशीद के आने पर रोक लगा दी। इसके विरोध में वामपंथी छात्र संगठन आईसा द्वारा विरोध मार्च निकाला गया और इसी दौरान आईसा तथा एबीवीपी के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई। तत्पश्चात पुलिस ने कार्रवाई करते हुए झड़प के लिए जिम्मेदार संदिग्धों को गिरफ्तार कर लिया। फिर क्या था! कामरेड ने सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का प्रलाप आरम्भ कर दिया। शायद उनके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का आशय यह था कि उमर ख़ालिद जैसे देशविरोधी नारे लगाने वाले देशद्रोह के आरोपियों को दिल्ली विश्वविद्यालय में भाषणबाजी क्यों नहीं करने दी  गयी ? इनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या ज्ञानगर्भा भारत-भूमि में विद्वानों का अकाल पड़ गया है जो दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान के कार्यक्रम में, पुलिस की कमज़ोर जांच व भारतीय न्याय-प्रणाली की लचरता के कारण बाहर घूम रहे, उमर खालिद जैसे देशद्रोह के आरोपियों को बुलाया जाएगा। इस तरह की अभिव्यक्तियों पर निस्संदेह अंकुश लगाया जाना चाहिए। एबीवीपी ने यही किया जिसमें कुछ भी अनुचित नहीं कहा जा सकता। खैर! अभी वामपंथी ख़ेमे का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का पाखंडी प्रलाप चल ही रहा था कि तभी अचानक एक और मामला सामने आ गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के ही लेडी श्रीराम महाविद्यालय में पढ़ने वाली भारतीय सेना के एक शहीद जवान की पुत्री गुरमेहर कौर का परिदृश्य में आगमन हुआ।

हरिभूमि
गुरमेहर कौर पहले तो एबीवीपी के विरोध में खड़ी हुईं और उसके बाद मीडिया में यह रोना रोने लगीं कि इस विरोध के बाद उन्हें बलात्कार की धमकी मिल रही है। आरोप का आधार यह था कि सोशल साईट पर विरोध प्रदर्शित करने के लिए लगाई गयी उनकी तस्वीर पर टिप्पणी के माध्यम से कुछ लोगों ने बलात्कार आदि की धमकी दी थी। लेकिन, विडंबना देखिये कि इतने बड़े शिक्षण संस्थान में पढ़ने वाली इस लड़की को इतना भी नहीं सूझा कि ऐसे मामलों में सबसे पहले पुलिस के पास जाना चाहिए न कि मीडिया और सोशल मीडिया पर निरर्थक  प्रलाप करना चाहिए। मगर, यहाँ तो शायद उद्देश्य ही इतना था कि स्वयं को पीड़ित के रूप में पेश करके एबीवीपी के ख़िलाफ़ माहौल बनाया जा सके। खैर, गुरमेहर प्रकरण आते ही कभी जेएनयू के ‘अनमोल रतन काण्ड’ पर बेशर्म खामोशी की चादर ओढ़ लेने वाला वामपंथी ब्रिगेड नारी अस्मिता की आवाज उठाने लगा। मार्च निकाला जाने लगा। इसी बीच गुरमेहर की गत वर्ष की एक तस्वीर वायरल हो गई जिसमें वे ‘मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा है’ की तख्ती लिए हुए दिख रही हैं। हालांकि अपने पिता की शहादत का दुरूपयोग कर रही इस लड़की को इतना भी नहीं पता कि उनके पिता युद्ध में नहीं, आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे और वे आतंकी कहीं और से नहीं, पाकिस्तान से ही आए थे। खैर, फिर इस तस्वीर को लेकर भी बवाल शुरू हो गया। विवाद की इस बहती गंगा में चर्चा से दूर पड़े कुछ फ़िल्मी सितारों और खिलाड़ियों आदि को भी जैसा-तैसा पक्ष पकड़कर चर्चा में आने का मौका मिला गया और उन्होंने इसे भुना भी लिया। राजनेता भी मैदान में कूद गए। वामपंथी नेता सीताराम येचुरी तो विरोध मार्च में शामिल होने महाविद्यालय तक पहुँच गए। लेकिन, इतने सब के बीच न तो गुरमेहर कौर को और न ही उनके कथित खैरख्वाहों में से ही किसीको ये सूझा कि गुरमेहर को बलात्कार की धमकी मिलने की पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी जाए। ये काम किया तो उसी एबीवीपी ने जिसके लोगों पर धमकी देने का गुरमेहर कौर आरोप लगा रही थीं। इतना सब बवाल मचाने के बाद गुरमेहर कौर को अचानक ही जाने क्या आत्मज्ञान हुआ कि उन्होंने एबीवीपी के खिलाफ चलाई अपनी मुहीम से अपना नाम वापस ले लिया और शांति से जीने की इच्छा प्रकट करने लगी। सवाल यह है कि उनसे उनकी शांति छीन कौन रहा था ? आखिर इस पूरे विवाद में अनावश्यक रूप से कूदने और अपने पिता की शहादत का अनुचित इस्तेमाल कर लोगों का समर्थन प्राप्त करने का काम तो उन्होंने खुद ही किया था।

अब इस पूरे प्रकरण के दौरान रामजस महाविद्यालय समेत पूरे दिल्ली विश्वविद्यालय में मौजूद अध्ययन के परिवेश को कितनी क्षति पहुंची होगी, इसे समझा जा सकता है। दरअसल वामपंथी चाहते ही यही हैं। देश के शिक्षण संस्थानों के शैक्षिक वातावरण को प्रदूषित कर उनके प्रति आम जनमानस में गलत सन्देश प्रसारित करना हाल के दिनों में वामी ब्रिगेड का मुख्य शगल बनता जा रहा है। दुर्भाग्यवश जेएनयू जैसे बड़े शिक्षण संस्थान जहां वामियों का वर्चस्व है, के विषय में वे इस तरह का कुप्रचार करने में लगभग सफल भी हुए हैं। गत वर्ष जेएनयू में हुई राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के फलस्वरूप लोगों में ऐसा सन्देश गया है कि अब इस विश्वविद्यालय का नाम आते ही ‘देशद्रोहियों का अड्डा’ जैसी बातें जनसामान्य के मुंह से यूँ ही निकल पड़ती हैं। यहाँ तक कि अब तो जेएनयू को बंद करने जैसी मांग तक सामने आने लगी हैं। इस प्रकार जेएनयू की प्रतिष्ठा को नष्ट कर चुके इन वामियों की दृष्टि अब देश के अन्य शिक्षण संस्थानों पर गड़ी हुई है। इसी क्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय में मचे इस बवाल को भी देखा जा सकता है।

इसके अतिरिक्त देश के एक अन्य प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान बीएचयू पर भी इनकी गिद्ध-दृष्टि पड़ चुकी है। गत दिनों इंडिया टुडे समूह के एक वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई जो कि वाम विचारधारा के सन्निकट और धुर मोदी विरोधी हैं, बीएचयू की चार लड़कियों के साथ वहाँ होने वाले लैंगिक भेदभाव जैसे कि लड़कियों को मांस नहीं खाने देने, लड़कियों के लिए वाई-फाई नहीं होने, राजनीतिक गतिविधियों की अनुमति नहीं होने आदि प्रश्नों पर चर्चा करते दिखाई दिए। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ऐसे किसी भेदभाव से इनकार कर चुका है। और यदि राजदीप से उन लड़कियों की बातचीत सुनें तो ऐसा आभास होता है कि उनके उत्तर पूर्व-नियोजित हैं अथवा प्रश्नों के उलटफेर के जरिये उनसे अपने मनमाफिक बात बुलवाई जा रही है। इस बातचीत में राजदीप यह साबित करने की कोशिश में लगे रहे हैं कि बीएचयू में लड़कियों पर आरएसएस की विचारधारा थोपी जा रही है। खैर, अभी ये बीएचयू पर वामपंथी कुदृष्टि के पड़ने का प्रारंभिक चरण है; लेकिन अगर अभी इसपर सचेत नहीं हुआ गया तो कब ये विचारधारा उस ज्ञान के मंदिर को प्रदूषित करने वहाँ पहुँच जाएगी, पता भी नहीं चलेगा।

दरअसल आज़ादी के बाद लगभग सात दशकों तक कांग्रेसी हुकूमत की छत्रछाया में परिपोषित हुए ये वामपंथी २०१४ में सत्ता-परिवर्तन के बाद से ही बिलबिलाए हुए हैं। अबतक अधिकांश शिक्षण संस्थानों पर इनका जो एकछत्र साम्राज्य रहता आया था, वो अब समाप्त होने लगा है। अन्य विचारधाराओं को भी जगह मिलने लगी है। यह प्रमुख कारण है कि देश के शिक्षण संस्थानों की प्रतिष्ठा को नष्ट करने के कुप्रयास में लगे हैं। इनके इन कुत्सित प्रयासों के प्रति पूरी तरह से सावधानी दिखाने की आवश्यकता है।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

महिषासुर के 'आधुनिक मानस-पुत्र' (दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

महिषासुरमर्दिनी 
जेएनयू प्रकरण पर लोकसभा में हो रही चर्चा के दौरान बोलते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने देश में वामपंथी ब्रिगेड द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरूपयोग से सम्बंधित कई तथ्य प्रस्तुत किए, जिनमे से एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य जेएनयू में मनाया जाने वाला ‘महिषासुर शहादत दिवस’ और इस देश की बहुसंख्य लोगों द्वारा माँ के रूप में पूजित पौराणिक पात्र देवी दुर्गा के लिए ‘वेश्या’ जैसे अश्लील विशेषणों के प्रयोग से सम्बंधित है। हालांकि यह तथ्य एकदम नया नहीं है क्योंकि, देश की राजधानी दिल्ली में रहने वाले कुछेक लोग इन बातों से जरूर परिचित होंगे मगर, देश की बहुसंख्य आबादी तो ऐसी बातों  के विषय में  सोच भी नहीं सकती। देश के किसी भी क्षेत्र और जाति के लोग हों, उनके लिए दुर्गा एक उपास्य देवी और शक्ति की प्रतीक हैं, जो संसार को कष्ट देने वाले महिषासुर और उसके जैसे अनेक दुष्टात्माओं का अंत करने के लिए समय दर समय प्रकट होती रही हैं। लोगों की यह मान्यता पूरी तरह से भारतीय पौराणिक आख्यानों जो दुर्गा-महिषासुर चरित्र का प्रमुख स्रोत रहे हैं, पर आधारित है। दरअसल हमारे पुराणों में यह कथा है कि महिषासुर नामक दैत्य जिसकी उत्पति  पुरुष और महिषी (भैंस) के संयोग से हुई थी, ने तप करके ब्रह्मा से यह वर प्राप्त कर लिया कि उसे कोई न मार सके सिवाय स्त्री के। फिर उसने समस्त देवताओं को पराजित कर उनके भवनों पर अपना आधिपत्य जमा लिया और देवता चूंकि पुरुष थे इसलिए वर के प्रभाव के कारण उसे मार नहीं सके। तब सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों को एकत्रित कर एक सर्वशक्तिमान देवी (स्त्री) को उत्पन्न किया, जिनने महिषासुर को काफी समझाया किन्तु जब वो न माना व कामातुर हो उनसे विवाह प्रस्ताव करने लगा तो विवश हो उसका वध किया। फिर कालांतर में यही देवी अपने कर्मानुसार दुर्गा, काली आदि अनेक नामों से प्रसिद्ध हुईं। देवी और महिषासुर का युद्ध नौ दिन तक चला था और क्वार मॉस की दशमी तिथि को देवी ने महिषासुर का वध किया था, जिसके उपलक्ष्य में देश में आज क्वार महीने में नवरात्र आयोजित कर दशमी तिथि को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। अब इसी पौराणिक आख्यान के पात्रों को उठाकर जेएनयू वासी लाल सलामी प्रज्ञाचक्षुओं  द्वारा एक नए हवा-हवाई इतिहास को गढ़ा गया है कि महिषासुर एक दलितोद्धारक, न्यायप्रिय और जनप्रिय राजा था, जिसको सवर्णों द्वारा प्रेरित एक चरित्रहीन स्त्री दुर्गा ने क्षल से मार दिया। इस प्रकार जब देश नवरात्र मनाता है तो ये गोमांस की दावत का आयोजन करने लगते हैं और विजयदशमी को ये अपने मानसिक पिता महिषासुर की शहादत के रूप में आयोजित करके बैठ जाते हैं। अब ये लाल सलामी मूर्ख देवी दुर्गा के लिए ‘वेश्या’ जैसे घृणित विशेषणों का प्रयोग करते हैं, इनका पूज्य महिषासुर भी यही करने की नाकाम कोशिश किया था। अर्थात कि इनकी और महिषासुर की मानसिकता एकदम समान रूप से स्त्री-विरोधी है, यह देखते हुए इन्हें ‘महिषासुर के आधुनिक मानस-पुत्र’ कहना अत्यंत समीचीन ही होगा।
   हालांकि  हर बात में दूसरों से तथ्य और प्रमाण मांगने वाले ये महिषासुर के मुट्ठी भर आधुनिक मानस-पुत्र अपने इस मनगढ़ंत और वाहियात इतिहास के विषय में आजतक कोई ठोस प्रमाण नहीं दे सके है; बस हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबल्स की तरह इस झूठ को बार-बार रट-रटकर सही साबित करने की नाकाम कोशिश में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि इसपर झूठों, कपोल-कल्पित वाहियात तथ्यों और कुतर्कों से भरी पत्रिका तक निकाल चुके हैं। वैसे, इनके इस बौद्धिक कुकृत्य का विडंबनात्मक पक्ष ये है कि एक तरफ तो ये भारतीय पौराणिक इतिहास को मिथक और कपोल-कल्पित कहके खारिज करते हैं और दूसरी तरफ उसीसे दुर्गा-महिषासुर जैसे चरित्रों को उठाकर मनगढ़ंत ढंग से पेश भी करते हैं। यह देखते हुए कह सकते हैं कि जैसे महिषासुर समय और आवश्यकतानुसार रूप बदल लेता था, वैसे ही उसके ये आधुनिक मानस-पुत्र भी अवसर देखकर चेहरे बदलने की कला में पूरे माहिर हैं।
दैनिक जागरण 
   वे कहते हैं कि यह इस पौराणिक आख्यान की दलित व्याख्या है। ऐसे में मेरी इन महिषासुर-पुत्रों से गुजारिश है कि इस देश के शहरी इलाकों से लेकर दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तक कहीं भी दलितों से अपनी इस तथाकथित ‘दलित-व्याख्या’ की चर्चा करके जरा इसकी जन-स्वीकार्यता की जांच कर लें; दावा है कि इनके इस नवीन इतिहास को सुनने के बाद शायद ही कोई दलित ऐसा होगा जो इनको गरियाता हुआ अपने दरवाजे से न भगा दे। लात-जूते पड़ जाएं तो भी आश्चर्य नहीं। सच्चाई यही है कि इस देश की दलित-सवर्ण आदि कोई भी जाति हों, सबके लिए दुर्गा ही अलग-अलग रूपों में परम पूजनीय हैं न कि महिषासुर! मगर, यह बात दिल्ली के जेएनयू में बैठकर देश के बहुसंख्य दुर्गा भक्त लोगों के टैक्स के पैसे से प्राप्त सब्सिडी पर पढ़ रहे महिषासुर के इन आधुनिक मानस-पुत्रों को समझ में नहीं आ सकती क्योंकि, इन्हें इस देश और इसके सभी जाति-धर्म के वासियों की एक प्रतिशत भी समझ नहीं है। इनकी समझ का दायरा इनके लाल सलाम की बजबजाहट से शुरू होकर कभी महिषासुर को अपना ‘वैचारिक बाप’ तो कभी  अफज़ल गुरु जैसे देशद्रोही दरिंदों को अपना जीवनादर्श मानकर ख़त्म हो जाता है।
  स्मृति ईरानी के वक्तव्य के बाद कांग्रेस-वामदल आदि इनके राजनीतिक संगठनों की तरफ से तर्क यह दिया गया कि पूजा तो देश में कई एक जगहों पर रावण की भी होती है, यह सबकी अपनी-अपनी श्रद्धा का विषय है। पर अपनी दो कौड़ी की राजनीति में अंधे हो रहे इन पतित नेताओं को कौन समझाए कि बेशक सबकी अपनी-अपनी श्रद्धा होती है लेकिन, उसका ये अर्थ नहीं कि किसी और की श्रद्धा का अपमान किया जाय। वे बताएं कि देवी दुर्गा के लिए वेश्या जैसे शब्दों का प्रयोग करना कौन सी श्रद्धा है ? आप बेशक महिषासुर को पूजिए लेकिन, माँ दुर्गा जो देश की बहुसंख्य आबादी के लिए प्राचीन काल से परम पूजनीय रही हैं, के अपमान का आपको कोई अधिकार नहीं। फिर भी, अगर आप अपनी बातों को लेकर इतने ही प्रतिबद्ध हैं तो हिम्मत दिखाइये और पश्चिम बंगाल जो एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ अभी आपके वाम का कुछ राजनीतिक वजूद शेष है, की राजधानी कलकत्ता की सड़कों पर जाकर जरा अपने इस इतिहास का एक वाचन करके देखिये तो कि कितनी स्वीकार्यता है इसकी ? देश में और सब जगहों से तो आप खारिज हो ही चुके हैं, कलकत्ता के कानों में भी जिस दिन आपके इस इतिहास का स्वर गया उसदिन वहां से भी आपका बचा-खुचा सूपड़ा साफ़ हो जाएगा। इसके बाद आराम से जेएनयू में बैठकर महिषासुर के आधुनिक मानस-पुत्र होने का अपना कर्तव्य निभाते हुए उसकी शहादत पर गर्वित होइएगा, विलाप करियेगा या मन करे तो अपना सिर धुनियेगा।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

शहादतों पर कितना 'निर्दय गर्व' करेगा ये देश ?

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

देश के मौजूदा हालात बेहद उथल-पुथल भरे हैं। देश की राजधानी दिल्ली में बुद्धि के स्वघोषित ठेकेदारों द्वारा देशभक्ति और देशद्रोह की नई-नई परिभाषाएँ गढ़कर स्वयं को सही साबित करने की कवायद की जा रही हैं, तो इसीसे सटे हरियाणा राज्य का संभवतः सर्वाधिक संपन्न जाट समुदाय स्वयं को पिछड़ा सिद्ध करने में लगा हुआ है ताकि वंचितों के ‘हितों के रक्षक’ आरक्षण का अनुचित लाभ पा सके। ऐसा नहीं कह रहे कि इन चीजों में केवल गलत हो रहा या सबकुछ गलत ही है लेकिन, इन सब वितंडों से फिलवक्त देश को सिवाय नुकसान के एक लाभ होता हुआ भी तो नहीं दिख रहा। इस कारण ये स्थितियां एक आम हिन्दुस्तानी के मन को कहीं न कहीं बेहद व्यथित करती हैं। वैसे, इन सब वितंडों से हजारों मील दूर भी बहुत कुछ हो रहा है, जहाँ ऋणात्मक ४५ डीग्री के तापमान से भरी बर्फ की पहाड़ियों से लेकर दुश्मन की गोलियों के बीच में तक हमारे जवान इस देश जो उन्हें शायद उन्हें उनकी सेवाओं के बदले कुछ विशेष नहीं देता, की रक्षा के लिए अपना जीवन बीता रहे हैं। ऐसे ही जीवन बिताते-बिताते कभी सियाचिन में कोई हिमस्खलन होता है तो बर्फ में दबकर दस जवान अपनी देशभक्ति साबित कर जाते हैं तो कभी जिस जम्मू-कश्मीर पर दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बौद्धिक विलास हो रहा है, उसके किसी पम्पोर इलाके में न केवल इस देश बल्कि समूची मानवता के दुश्मन आतंकियों से लोहा लेते हुए पांच जवान अपना बलिदान दे जाते हैं। ये सब होता है तो देश की नज़र दिल्ली के बौद्धिक विलास और बेकार वितंडों से कुछ हटकर ज़रा उधर भी जाती है और देश यह देखकर हमेशा की तरह फूलकर चौड़ा हो जाता है कि इस देश के लिए फिर कुछ शहादतें हो गई हैं! यानी देश सुरक्षित है।
   फिर कुछ समय के लिए जवानों की  देशभक्ति पर देश मगन हो जाता है। टीवी मीडिया में उनकी तस्वीरे ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ के पार्श्व संगीत के साथ तैरने लगती हैं, जो बेशक देश के भावुक लोगों की आँखों में गर्वयुक्त प्रसन्नता के आंसू ला देती हैं। इस अवसर पर देश के नेता भी गर्व और वीररस से भरे बयान देने में बिलकुल देरी नहीं करते। तदुपरांत सब शांत हो जाता है और फिर देश, मीडिया, नेता सब पुनः दिल्ली के बौद्धिक विलास की तरफ कूच कर जाते हैं। इस दौरान शहादतों पर मदमस्त देश में इस बात पर विचार करने का विवेक नहीं रह जाता कि इन शहादतों का अंत कब होगा ? देश इस बात पर थोड़ा भी विचार नहीं करता कि गुलामी में आजादी के लिए देश ने शहादतें दीं, लेकिन आज इस आज़ाद देश में भी इतनी शहादतें क्यों कि हर वर्ष कमोबेश हमारे सैकड़ों जवान अपनी जान गंवा बैठते हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि देश ने जवानों की शहादतों को एक अंतहीन प्रक्रिया की तरह स्वीकार लिया है जिस कारण इसके कारणों और निवारणों पर कभी बात ही नहीं करता ? अगर ऐसा है तो देश समझ ले  कि ये बहुत गलत है। क्योंकि, एक आज़ाद मुल्क में जवानों की शहादत यदि प्रतिवर्ष निरंतरता के साथ जारी है तो ये गर्व से अधिक चिंता का विषय है। इस बात पर बेशक गर्व होना चाहिए कि हमारे जवान देश के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं करते, लेकिन शहादत यदि एक निश्चित प्रक्रिया बन जाए तो ये चिंताजनक है। अब जो देश ऐसी शहादतों पर सिर्फ गर्वित होकर अपने दायित्वों की इतिश्री समझ लेता है, निस्संदेह वो अपने जवानों के प्रति बेहद गैर-जिम्मेदार देश है। ऐसी शहादतों पर गर्वित होना, भीषण  निर्दयता है। लिहाजा, दिल्ली में बैठकर कश्मीर हल करने से अगर फुर्सत मिल जाए तो ज़रा इन बातों पर भी विचार करियेगा।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

वामपंथियों का स्याह चेहरा [दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दबंग दुनिया 
कितनी बड़ी और क्रूर विडंबना है कि एक तरफ जिस जम्मू-कश्मीर सीमा की सुरक्षा के लिए देश के दस जवान सियाचिन की बर्फ में दबकर अपनी जान गँवा देते हैं, वहीँ दूसरी तरफ उनकी शहादत के कुछ रोज बाद ही देश के एक तथाकथित प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में उसी कश्मीर की आज़ादी, भारत की बर्बादी और अफज़ल गुरु के समर्थन जैसे देश विरोधी नारे लगने लगते हैं। दरअसल पूरा मामला कुछ यूँ है कि विगत १० फ़रवरी को जेएनयू कैम्पस के कुछ दलित, अल्पसंख्यक और कश्मीरी विद्यार्थियों द्वारा संसद हमले के फांसी पर लटकाए जा चुके गुनाहगार अफज़ल गुरु की तीसरी बरसी पर सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसका अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् द्वारा कड़ा विरोध जताते हुए इस सम्बन्ध में प्रशासन से शिकायत की  गई। स्वाभाविक रूप से प्रशासन द्वारा उन छात्रों के इस देश विरोधी कृत्य पर रोक लगा दी गई। बस फिर क्या था! उन विद्यार्थियों द्वारा प्रशासन के निर्णय के विरोध के नाम पर न केवल हुड़दंग शुरू कर दिया गया, बल्कि कश्मीर की आजादी और भारत की बर्बादी के नारे भी लगाए जाने लगे। ‘कश्मीर मांगे आजादी’, ‘कश्मीर की आज़ादी  तक जंग रहेगी, भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी’ जैसे देश विरोधी नारे लगा रहे इन छात्रों का जब एबीवीपी के छात्रों ने जेएनयू  छात्रसंघ के संयुक्त सचिव के नेतृत्व में विरोध किया तो न केवल उनके खिलाफ भी नारे लगाए गए, बल्कि कट्टा आदि हथियार दिखाकर उन्हें धमकाया भी गया। अब प्राप्त ख़बरों के अनुसार, नारे लगाने वाले उन छात्रों का यह कहना तो और भी चकित करता है कि संविधान द्वारा मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत ही उन्होंने अफज़ल गुरु और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के एक संस्थापक मकबूल भट की याद में उस सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया था और यदि एबीवीपी ने प्रशासन से कहकर उसपर रोक नहीं लगवाई होती तो वे हंगामा नहीं करते। अर्थात यह कि अभियक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्हें यदि देश विरोधी गतिविधियों को  करने दिया जाता तो वे ये हंगामा नहीं होता। अब इन छात्रों को कौन समझाए कि जिस संविधान ने उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकार दिए हैं, उसीने बतौर देश के नागरिक उनके लिए कुछ मौलिक कर्तव्य भी निर्धारित किए हैं और उन्हीं कर्तव्यों में से एक ‘राष्ट्र की एकता और अखण्डता को अक्षुण्ण’ रखना भी है, जिसका वे पालन नहीं कर रहे। अब संविधान के अधिकार अपनाएं और कर्तव्यों को छोड़ दें, ऐसे दोहरे मानदंड तो कत्तई स्वीकार्य नहीं हैं। इनका एक विरोधाभास यह है कि जिस संविधान द्वारा दिए गए एक अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दम पर ये छात्र ‘भारत की बर्बादी’ के नारे जैसी देश विरोधी गतिविधियाँ तक संचालित करने की हिम्मत दिखा रहे हैं, उसी संविधान की एक कार्यस्थली यानी संसद पर हमला करने वाले अफज़ल गुरु का समर्थन भी कर रहे हैं। हालांकि ये पहली बार नहीं है जब जेएनयू के छात्रों पर देशविरोधी हरकतें करने का आरोप लगा है। अभी हाल ही में जेएनयू के वामपंथी छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाकर बेहद अपमानजनक और भद्दे नारे लगाए थे। ३०  जनवरी को वामपंथी छात्र संगठन आईसा और केवाईएस के छात्र हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की मौत को लेकर दिल्ली में आरएसएस दफ्तर के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे। तब इनपर पुलिस ने कार्रवाई की थी तो उसे इन्होने अभिव्यक्ति के हनन से लेकर जाने क्या-क्या बताया था।  स्पष्ट है कि इन छात्रों का विरोध पूरी तरह से तर्क और विवेक से हीन और मृतप्राय हो चुकी अपनी वाम विचारधारा को चर्चा में लाने के एजेंडे पर आधारित है।

  यह सर्वविदित है कि जेएनयू वामपंथियों का गढ़ रहा है और फिलवक्त देश में वही एक ऐसी जगह है जहाँ वामी समुदाय का कुछ अस्तित्व भी है, अन्यथा पूरे देश में इस विचारधारा को छात्र स्तर से लेकर शासन के स्तर तक मतदाताओं द्वारा पूरी तरह से खारिज किया जा चुका है। और अब तो जेएनयू में भी इनकी सत्ता में सेंध लगने लगी हैं। विगत वर्ष के छात्रसंघ चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का संयुक्त सचिव की सीट पर कब्ज़ा करना इसको पूरी तरह से स्पष्ट करता है। कुल मिलाकर वाम विचारधारा पूरी तरह से जनता से दूर किस ऑफ़ लव और महिषासुर को महापुरुष बनाने जैसे जाने किन आसमानी मुद्दों में गुम है और इसी नाते वो दिन ब दिन खारिज हो रही है। लेकिन बावजूद इसके वो स्वयं में सुधार करने की बजाय चर्चा में आने के लिए  अफज़ल गुरु के समर्थन, कश्मीर की आज़ादी और भारत की बर्बादी जैसे देशविरोधी कृत्य करने तक से पीछे नहीं हट रहे। अब उन्हें को कौन समझाए कि ऐसे कृत्यों से उनका तो कोई लाभ नहीं होगा, पर देश की छवि अवश्य ख़राब होगी और देश के दुश्मनों को इसे घेरने का मौका मिलेगा। इन छात्रों के इस विरोध प्रदर्शन के समर्थन में पाकिस्तान में बैठे  भारत के सबसे बड़े दुश्मन हाफ़िज़ सईद का आना इसी बात का उदाहरण है। ऐसा नहीं है कि ये छात्र इन चीजों से अंजान हैं, ये सबकुछ जानते-समझते हुए भी देशविरोधी गतिविधियां करते हैं, अतः इनपर नियंत्रण का सिर्फ एक ही उपाय है कि सख्त से सख्त कार्रवाई की जाय। हालांकि इस सम्बन्ध में कार्रवाई करते हुए दिल्ली पुलिस ने जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष जो वामपंथी छात्र संगठन का नेता है और उस देशविरोधी कार्यक्रम का हिस्सा था, को गिरफ्तार कर लिया है तथा गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दोषियों पर सख्त कारवाई की बात भी कही है। बहरहाल, भारतीय दंड संहिता के अनुसार इन्हें जो सजा मिले सो मिले ही, एक कार्रवाई यह भी हो सकती है कि जेएनयू में कुछ समय के लिए छात्र राजनीति को प्रतिबंधित कर दिया जाय. इसका विरोध तो होगा, पर यह कार्रवाई कारगर बहुत होगी। इस तरह की कार्रवाईयों के जरिये ही इन भटके और बिगड़े छात्रों को  सही रास्ते पर लाया जा सकता है।