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शुक्रवार, 15 मार्च 2019

चीन का क्या है इलाज? [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

गत 14 फरवरी को हुए पुलवामा हमले सहित पठानकोट, उरी आदि देश में हुए अनेक और हमलों के साजिशकर्ता जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) द्वारा वैश्विक आतंकी घोषित करने की राह में चीन ने एकबार फिर रोड़ा लगा दिया है। बीती 27 फरवरी को अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस ने यूएनएससी में मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव पेश किया था, जिसपर इस समूह में एक हद तक आम सहमति नज़र आ रही थी। लेकिन जैसी कि आशंका थी, यूएनएससी के स्थायी सदस्य के रूप में मिले वीटो का इस्तेमाल करते हुए चीन ने इस प्रस्ताव को पारित होने से रोक दिया।  

पहले भी लगाता रहा है अड़ंगा
यह चौथी बार है जब चीन ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने की राह में अड़ंगा लगाया है। इससे पहले 2017, 2016 और 2009 में भी चीन जैश सरगना को वैश्विक आतंकी घोषित होने से बचा चुका है। 2017 में चीन ने मसूद के बचाव में तर्क दिया था कि वह बहुत बीमार है और अब सक्रिय नहीं है और न जैश का सरगना ही है।

सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में शामिल चीन अब तक यह कहता आया है कि अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। वहीं पुलवामा हमले के बाद वैश्विक आक्रोश के मद्देनजर अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस को उम्मीद थी कि इस बार चीन समझदारी से काम लेगा और उनके कदम को बाधित नहीं करेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अमेरिका की तरफ से तो इसबार कड़ी चेतावनी भी दी गयी थी कि चीन यदि अपने रुख में परिवर्तन नहीं करता है तो क्षेत्रीय स्थिरता और शांति के लिए संकट पैदा हो सकता है। परन्तु, इस चेतावनी का भी चीन पर कोई असर नहीं हुआ और एकबार फिर उसने अपने पुराने रुख को कायम रखा।


क्यों जरूरी है चीन की मंजूरी?
अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ़्रांस और चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इस समय ये कुल पांच स्थायी सदस्य हैं। नियमों के मुताबिक़ परिषद् में कोई भी प्रस्ताव इन पाँचों सदस्यों की सहमति के बिना पारित नहीं हो सकता। इन सभी सदस्यों को वीटो की तकनीकी शक्ति मिली हुई है, जिसके जरिये वे किसी भी प्रस्ताव को असहमत होने की स्थिति में रोक सकते हैं। चीन अपने इसी अधिकार का दुरूपयोग करते हुए न केवल मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित होने से रोकता है, बल्कि इस परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की राह में भी अड़ंगा लगाता रहा है। शेष चारों सदस्य सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता पर सहमत हैं, परन्तु चीन की चालबाजी के कारण भारत को अबतक इस सदस्यता से वंचित रहना पड़ा है।

इसे दुर्योग ही कहेंगे कि आज जिस यूएनएससी की स्थायी सदस्यता के बलबूते चीन भारत के लिए कई मोर्चों पर परेशानी बना हुआ है, आजादी के बाद वो सदस्यता भारत को मिल रही थी, लेकिन देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू के कारण वो चीन के पास चली गयी। गौरतलब है कि सन 1953 में सोवियत संघ द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव भारत के समक्ष रखा गया था, लेकिन चीन-प्रेम में डूबे प्रधानमंत्री नेहरू ने उस सदस्यता को लेने से इनकार करते हुए उसे चीन को देने की पैरवी कर दी। इस बारे में कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने अपनी किताब ‘नेहरू – दि इनवेंशन आफ इंडिया’ में लिखा है, ‘जिन भारतीय राजनयिकों ने उस दौर की विदेश मंत्रालय की फाइलों को देखा है, वे इस बात को मानेंगे कि नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थायी सदस्य बनने की पेशकश को ठुकरा दिया था।‘ यहां तक की रूस ने भारत के लिए छठी सीट बनाने तक की बात की लेकिन नेहरू पहले चीन का मामला हल करने पर अड़े रहे। नेहरू की परवर्ती कांग्रेसी सरकारों का रुख भी इस मामले ढीला-ढाला  रहा और अंततः 1971 में चीन को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता मिल गयी।

जाहिर है, नेहरू की ये एक गलती आज दशकों बाद तक देश के लिए कठिनाई का सबब बनी हुई है। सैकड़ों निर्दोषों की जान बचाने के लिए मसूद अजहर को रिहा करने के कारण आज भाजपा पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस को नेहरू की इस कूटनीतिक चूक पर भी एक नजर जरूर डालनी चाहिए।

चीन को घेरने का सही अवसर
अब प्रश्न यह उठता है कि चीन की मनमानियों पर भारत की क्या प्रतिक्रिया हो? देखा जाए तो चीन हमेशा से भारत के प्रति आक्रामक रवैया रखता आया है, जबकि आजादी के बाद से ही भारत ने उसके प्रति रक्षात्मक नीति अपनाई है। हालांकि वर्ष 2017 में घटित डोकलाम प्रकरण के बाद भारत की इस रक्षात्मक नीति में परिवर्तन का संकेत जरूर मिला, लेकिन उस घटना के बाद भी जिस तरह से चीन के भारत विरोधी और पाक-परस्त रुख में कोई परिवर्तन नहीं आया है, उससे लगता है कि अभी हमें उसके प्रति और गंभीरतापूर्वक आक्रामक रणनीति अपनाने की जरूरत है।

बहरहाल, अगर भारत चाहे तो कूटनीतिक रूप से चीन को घेरने का यह सही अवसर है। सुरक्षा परिषद में मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के प्रस्ताव का विरोध करने के कारण अबकी चीन उसके शेष सदस्य देशों को नाराज कर बैठा है। भारत को इस अवसर का लाभ लेते हुए उसे वैश्विक मंचों पर घेरने की कोशिश करनी चाहिए। चीन की इस हरकत को आतंकवाद को प्रश्रय देने के रूप में विश्व पटल पर प्रचारित और स्थापित करना भारतीय कूटनीति का वर्तमान लक्ष्य होना चाहिए। उचित होगा कि भारतीय जांच एजेंसियां व ख़ुफ़िया ब्यूरो आदि मिलकर इस विषय में चीनी भूमिका की गुप्त जांच करें और उसकी संलिप्तता पाए जाने पर, उसे ससाक्ष्य विश्व समुदाय के सामने लाकर, चीन के ढोंगी चरित्र का पर्दाफाश करें। अगर भारत दुनिया को यह सन्देश देने में कामयाब रहता है कि पाकिस्तान में पनपे आतंकवाद को खाद-पानी व संरक्षण चीन से मिल रहा, तो ये चीन पर एक बड़ी कूटनीतिक बढ़त होगी। इस प्रकार चीन को विश्व बिरादरी में सामाजिक स्तर पर प्रतिष्ठाशून्य और कमजोर किया जा सकता है।

आर्थिक चोट देने का प्रश्न
वो समय गया जब तलवारों और बंदूकों के दम पर साम्राज्य स्थापित होते थे। वर्तमान दौर आर्थिक-साम्राज्यवाद का है और चीन ये बात बहुत अच्छे से जानता है। इसीलिए वो अपनी  बेटिकाऊ किन्तु, सस्ती वस्तुओं के द्वारा भारतीय बाजारों को लुभाने का प्रयास कर रहा है और बड़े पैमाने पर सफल भी है। अक्सर कहा जाता है कि भारत को चीनी उत्पादों का बहिष्कार या उसके उत्पादों के आयात को हतोत्साहित करना चाहिए, इसके जरिये चीन को कमजोर किया जा सकता है। ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने चीनी वस्तुओं पर 300 फीसदी टैरिफ लगाने का सुझाव दिया है ताकि उनके सामान की खपत को हतोत्साहित किया जा सके। लेकिन कड़वा सच यह है कि इस विषय में लाख चाहने पर भी भारत चीन को रोकने की स्थिति में नही है। डब्लूटीओ की संधि के कारण भारत के हाथ बंधे हुए है। डब्लूटीओ किसी भी देश को आयात पर भारी-भरकम प्रतिबंध लगाने से रोकता है।  2016 में राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में तत्कालीन वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने खुद कहा था कि भारत विश्व व्यापार संगठन के नियमों की वजह से चीनी वस्तुओं पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकता है। वैसे भी इस वैश्वीकरण के दौर में एकदूसरे के उत्पादों का बहिष्कार न तो आर्थिक दृष्टि से सही है और न ही व्यावहारिक रूप से ही इसका कोई लाभ है। लेकिन भारत को इतना तो अवश्य करना चाहिए कि वो स्वनिर्माण के क्षेत्र में अधिकाधिक निवेश के द्वारा चीनी बाजारों पर से अपनी निर्भरता को कम करते हुए, आत्मनिर्भर होने के लिए यथासंभव प्रयास करे। भारत का स्वदेशी बाजार यदि मजबूत होगा तो बिना किसी प्रतिबन्ध के चीनी उत्पादों का बाजार देश में सिमटता जाएगा।

चीन का पाक-प्रेम
चीन के एक प्राचीन विद्वान सुनुत्से ने अपनी एक किताब में लिखा है कि दुश्मन को हराने का सबसे अचूक हथियार है कि उसे, उसके दुश्मनों से भिड़ा दो। चीन के पाकिस्तान प्रेम का यह एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा सीपीईसी के रूप में उसने पाक में जो भारी-भरकम निवेश किया है, इस कारण भी पाकिस्तान के साथ खड़ा होना उसके लिए जरूरी है।

भारत के लिहाज से इस मोर्चे पर जापान एक कारगर साथी हो सकता है। गौरतलब है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद जापान, चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है, वहीं चीन जापान का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। दोनों देशों के बीच लगभग साढ़े तीन सौ अरब डॉलर का व्यापार है। भारत इस व्यापार को तो बहुत प्रभावित नहीं कर सकता, लेकिन जापान के सहयोग से क्षेत्रीय स्तर पर चीन को जवाब देने का काम कर सकता है। मोदी सरकार के आने के बाद इस दिशा में देश की सक्रियता दिख भी रही है, जिसका प्रमाण चीन की ओबोर (OBOR) परियोजना के जवाब में भारत और जापान द्वारा मिलकर शुरू की गयी एशिया अफ्रीका ग्रोथ कोरिडोर (एएजीसी) परियोजना है। एएजीसी के तहत अफ्रीका के साथ दक्षिण, पूर्व और पूर्वी एशिया की अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से एकीकृत करने की साझेदार पहल हुई है। इसके तहत भारत, अफ्रीका और अन्य सहयोगी देशों के बंदरगाहों को एक नए रूट से जोड़ा जाएगा। इसके अलावा बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार और भूटान के साथ मिलकर भारत सासेक कॉरिडोर (South Asian Sub-Regional Economic Cooperation-SASEC) परियोजना पर भी काम कर रहा है। जाहिर है कि भारत क्षेत्रीय स्तर पर चीन को हावी न होने देने की दिशा में उपलब्ध विकल्पों के अनुसार काम कर रहा है।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में चीन के प्रति देश के रक्षात्मक रुख में कुछ परिवर्तन अवश्य आया है, परन्तु अभी आवश्यकता है कि इसे और अधिक सुस्पष्ट और सुनियोजित ढंग से आक्रामक रूप दिया जाए। स्पष्ट दृष्टि और ठोस रणनीति के बिना चीन का मुकाबला नहीं किया जा सकता।

शनिवार, 18 नवंबर 2017

बाजार के चक्रव्यूह में समाज [जनसत्ता में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

दिल्ली धुंध से क्या हलकान हुई कि फोन पर वायु प्रशोधक उपकरणों की (एयर प्योरीफायर) कंपनियों के प्रचार संदेशों का आना शुरू हो गया। जितनी कम्पनियाँ, उतने दावे। कोई पांच तो कोई पच्चीस हजार में हमें स्वच्छ सांसें देने का दावा कर रहा है। कम्पनियों की तरफ से प्राप्त सूचना के अनुसार, धुंध (स्मोग) के बाद से वायु प्रशोधक की बिक्री में भारी इजाफा हुआ है। किसीकी दैनिक बिक्री में आठ गुना की वृद्धि हुई है, तो कोई मासिक बिक्री में तीन गुना वृद्धि की उम्मीद लगाए बैठा है। एक कंपनी ने तो अपनी साप्ताहिक बिक्री पचास गुना तक बढ़ने की बात कही है। साफ़ है कि दिल्ली और उससे सटे इलाके धुंध और धुएं से हलकान हुए, तो बाजार की बांछें खिल उठीं। ये  बाजार द्वारा समाज के नियंत्रित होते जाने का सिर्फ एक उदाहरण भर है। वास्तव में, आज बाजार लगभग प्रत्येक विषय में आदमी के जीवन में घुसपैठ करता जा रहा है।

अगर आप अगल-बगल नजर डालें तो आपको हर तरफ और लगभग हर वस्तु पर किसी न किसी प्रकार बाजार का प्रभाव दिखाई देगा। पर्वों-त्योहारों का बाजारीकरण अब सामान्य हो चला है। स्थिति ऐसी प्रतीत होती है कि जैसे समाज के लिए बाजार की नहीं, बाजार के लिए समाज की स्थापना की गयी हो। रोटी, कपड़ा, मकान आदि बुनियादी आवश्यकताओं की वस्तुओं पर तो खैर प्रत्येक युग में कमोबेश बाजार का नियंत्रण रहता आया है, परन्तु अब बाजार इनसे कहीं आगे अपने पाँव पसार रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर भी बाजार ने डंके की चोट पर कब्ज़ा जमा रखा है।  इन सबके बाद अब वो पानी, हवा जैसी प्राकृतिक वस्तुओं पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर रहा है। हवा बिकने की कहानी तो हम ऊपर देख ही चुके हैं, अब पानी के बाजारीकरण पर भी एक संक्षिप्त दृष्टि डालिए।

पानी जैसी सर्वसुलभ वस्तु पर बाजार ने किस कदर कब्ज़ा जमा लिया है, इसका उदाहरण हमें जल प्रशोधक (वाटर प्योरीफायर) उपकरणों के बढ़ते बाजार के माध्यम से मिलता है। इस बात को हम इस साल की शुरुआत में आई ट्रांसपेरेसी मार्केट रिसर्च नामक एक अमेरिकी संस्था की रिपोर्ट में प्रस्तुत आंकड़ों के द्वारा बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वाटर प्योरीफायर का बाजार, जो २०१५ में १.१ बिलियन डॉलर का था, २०२४ तक ४.१ बिलियन डॉलर तक पहुँच जाने की संभावना है। परन्तु, पानी का धंधा सिर्फ जल प्रशोधक उपकरणों तक सीमित नहीं है, अब शहरी इलाकों में ख़राब हो रहे पानी के आधार पर लोगों का भयादोहन करते हुए गली-गली में फिल्टर किए पानी का पूरा एक व्यापारिक ढांचा खड़ा हो गया है। सामान्यतः बीस लीटर फ़िल्टर पानी घर पहुंचाने की कीमत शहरी इलाकों में लगभग दस रूपये से लेकर तीस रूपये तक है। शुक्र है कि ग्रामीण इलाके अभी इस बीमारी से काफी हद तक बचे हुए हैं। हवा, पानी जैसी प्राकृतिक वस्तुओं पर बाजार का ये बढ़ता वर्चस्व सोचने को विवश तो करता है, मगर सुरसामुखी बाजार की तृप्ति इतने से भी होती नहीं दिख रही। भौतिक और प्राकृतिक वस्तुओं के बाद अब वो नींद, भूख, सेक्स, शांति, सुकून जैसी आदमी के शरीर और मन से जुड़ी आंतरिक आवश्यकताओं को भी अपने चंगुल में लेने की कामयाब हो रही कोशिश में लगा हुआ है।

थोड़ा गूगल कीजिये तो पाएंगे कि बाजार में आज दो सौ से लेकर दो हजार और उससे भी अधिक मूल्य तक के कथित स्मार्ट गद्दा, रजाई और तकिये मिल रहे हैं, जिनके विषय में ऐसा दावा किया जा रहा कि इनपर सोते ही नींद आ जाएगी। आश्चर्य यह है कि लोग इन्हें खरीदने में रूचि भी दिखा रहे हैं। वेश्यावृत्ति का बाजार तो चल ही रहा था, अब सेक्स टॉयज के रूप में बाजार ने व्यक्ति की इस विकट शारीरिक आवश्यकता पर एक और निशाना लगा दिया है। विविध प्रकार के छोटे-बड़े सेक्स टॉयज अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ बाजार में उपलब्ध हैं। हालांकि भारत में अभी इनकी खपत बहुत नहीं है, मगर दुनिया के अन्य देशों में इनका बाजार अपनी मजबूत पैठ बना चुका है। इसके अलावा सेक्स की ताकत बढ़ाने वाली अलग-अलग दवाएं भी सेक्स के बाजारीकरण का ही एक उदाहरण हैं। इतना ही नहीं, दिमाग को तरोताजा करने के नुस्खे तक बाजार के पास उपलब्ध हैं। ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर पड़ताल करिए तो पाएंगे कि दिमाग को तरोताजा करने के लिए कई तरह के खिलौनों से लेकर संगीत की कैसेटें तक बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। मोटे तौर पर कहें तो स्थिति ये है कि आप अपनी किसी आवश्यकता के लिए किसी वस्तु की कल्पना करिए, उससे पहले बाजार वो वस्तु लेकर हाजिर हो जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बाजार किस तरह व्यक्ति के जीवन के हर पहलू में घुसता जा रहा है और आदमी जाने-अनजाने उसे घुसने की पूरी सहूलियत भी देने में लगा हुआ है।

विचार करें तो बाजार की स्थिति हमें उस चिकित्सक जैसी प्रतीत होती है, जो पहले रोग को बढ़ाता है, फिर धीरे-धीरे उसका उपचार करता है। विद्रूप यह कि कमाता वो दोनों ही स्थितियों में है। बाजार का भी यही चरित्र हो चला है। गौर करें तो आज जिन समस्याओं के समाधान के रूप में तरह-तरह के उत्पाद बेचकर बाजार मोटा माल कमा रहा है, उन समस्याओं का भी स्रोत वही है। हवा और पानी के प्रदूषण के लिए आज बाजार एक तरफ प्योरीफायर बेच रहा, तो दूसरी तरफ प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियाँ और विविध केमिकल्स का माध्यम भी बाजार ही है। इसे ऐसे भी समझिये कि जो कम्पनी मोबाइल और एसी जैसे प्रदूषणकारी उत्पाद बना रही है, वही एयर प्योरीफायर के जरिये शुद्ध हवा का भरोसा भी दे रही है। मोटे तौर पर कहें तो समस्या और समाधान दोनों का स्रोत बाजार ही है और दोनों ही से कमाने में भी लगा है।

वास्तव में बाजार तो अपने चरित्र का ही अनुपालन कर रहा है। दोष बाजार का नहीं, समाज का है। विशेष तौर पर शहरी समाज में लगातार बढ़ रही अतिविलासिता और सुविधाभोग की प्रवृत्ति ने उसे बाजार के हाथों की कठपुतली बना दिया है। हर तरफ बाजार के हाथों की कठपुतली बना आदमी उसके इशारों पर या तो नाच रहा है अथवा नाचने को आतुर है। दूसरे शब्दों में कहें तो जिसके पास जितनी आर्थिक क्षमता है, वो बाजार के हिसाब से उतना नाच रहा है और जिसके पास क्षमता नहीं है, वो क्षमता को अर्जित करने की कवायदों में लगा है ताकि बाजार के हिसाब से नाच सके। साथ ही, अब सुविधाभोग की वस्तुओं को अपने स्टेटस से जोड़कर देखने का चलन भी जोर पकड़ चुका है। ये सब वो कारण हैं, जिससे समाज, जिसे बाजार का नियमन करना चाहिए, बाजार की गुलामी कर रहा है। संतोष की भावना लगभग समाप्त हो चुकी है। जरूरत है कि समाज संतोष के मार्ग को अपनाकर बाजार की इस गुलामी से बाहर आए और उसके नियंत्रक की अपनी वास्तविक भूमिका को निभाए। बाजार का गुलाम समाज कभी सही अर्थों में उन्नति को प्राप्त नहीं कर सकता।

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

प्रदूषण के वास्तविक कारणों पर हो चोट [अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत

राजधानी दिल्ली भयंकर धुंध और धुंए की चपेट में है। इस दौरान पूरी दिल्ली की वायु की गुणवत्ता की बात करें को सीपीसीबी वायु गुणवत्ता सूचकांक के मुताबिक सोमवार को यह 354 के स्तर पर था, जो 'बेहद खराब' की श्रेणी में आता है। इससे पहले रविवार को यह स्तर 368 दर्ज किया गया था। गत वर्ष दीपावली के बाद ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हुई थी, तो पर्यावरणवादियों ने दलील दी कि ये पटाखों के कारण हुआ है। इस कारण अबकी सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में दीपावली पर पटाखों की बिक्री प्रतिबंधित कर दी थी। पटाखे न के बराबर ही फोड़े गए, मगर बावजूद इसके दीपावली के लगभग बीस दिन बाद राजधानी का धुंध की चपेट में आ जाना स्पष्ट करता है कि पटाखों, पराली जैसे छोटे कारकों को महत्व देकर किस तरह प्रदूषण के वास्तविक कारणों से मुंह चुराया जा रहा है। ये चीजें साल में कभी-कभार बार होती हैं, मगर प्रदूषण की समस्या तो सार्वकालिक रूप से देश भर में मौजूद है। इसके खात्मे के लिए जरूरी है कि प्रदूषण के छोटे-छोटे कारकों पर रोक लगाकार मन बहलाने की बजाय इसके बड़े और वास्तविक कारणों से निपटने के लिए कुछ कड़े कदम उठाए जाएं।     

देश में प्रदूषण की स्थिति पर दृष्टि डालें तो गत वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण को लेकर एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें वायु प्रदूषण के मामले में भारत की स्थिति को काफी चिंताजनक बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के प्रत्येक दस में से नौ व्यक्ति प्रदूषित वायु में सांस लेने को मजबूर हैं और वायु प्रदूषण से होने वाली हर तीन में से दो मौतें भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में होती हैं। समझा जा सकता है कि भारत में वायु प्रदूषण बेहद चिंताजनक स्तर पर है। इस स्थिति को और अच्छे से समझने के लिए अगर गौर करें तो गत वर्ष ही केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा देश के २१ चुनिन्दा शहरों की वायु गुणवत्ता पर एक रिपोर्ट जारी की गयी थी, जिसके अनुसार उन २१ में से महज एक शहर हरियाणा का पंचकुला ही रहा, जहाँ वायु गुणवत्ता का स्तर संतोषजनक था। इसके अतिरिक्त मुंबई और पश्चिम बंगाल के शहर हल्दिया में भी वायु की गुणवत्ता कुछ ठीक मिली, लेकिन शेष सभी शहरों की हवा का स्तर मध्यम और ख़राब से लेकर बहुत ख़राब तक पाया गया। इनमें मुजफ्फरपुर, लखनऊ, राजधानी दिल्ली, वाराणसी, पटना, फरीदाबाद, कानपुर, आगरा आदि शहरों का प्रदूषण स्तर क्रमशः बहुत ख़राब पाया गया। इन शहरों में दिल्ली तीसरे सबसे अधिक प्रदूषित शहर के रूप में मौजूद था। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ये आंकड़े भले ही अभी सिर्फ चुनिन्दा २१ शहरों की तस्वीर पेश कर रहे हों, लेकिन वास्तविकता यही है कि वायु प्रदूषण दिन ब दिन पूरे देश के लिए भीषण संकट बनता जा रहा है। ये अलग बात है कि दिल्ली इससे कुछ अधिक प्रभावित है। दिल्ली चूंकि देश की राजधानी है, इसलिए उसका इस तरह से जहरीली हवा से युक्त होना चिंताजनक है।


प्रदूषण के वास्तविक कारणों पर गौर करें तो पूर्व केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा राज्य सभा में जारी एक आंकड़े के मुताबिक़ देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण जनित बीमारियों से प्रतिदिन लगभग ८० लोगों की मौत होती है। नासा सैटेलाइट द्वारा इकट्‌ठा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में पीएम-25 जैसे छोटे कण की मात्रा बेहद अधिक है। औद्योगिक उत्सर्जन और वाहनों द्वारा निकासित धुंए से हवा में पीएम-2.5 कणों की बढ़ती मात्रा घनी धुंध का कारण बन रही है। अभी बीते अक्टूबर में एनवायर्मेंट पॉल्यूशन बोर्ड द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली की हवा में प्रति घन मीटर 200 माइक्रोग्राम पीएम2.5 प्रदूषक तत्व दर्ज किये गये. यह विश्व स्वास्थ्य संगठन की सेफ लिमिट से 8 गुना ज्यादा है। 25 माइक्रोग्राम को सेफ लिमिट माना जाता है। देश की राजधानी की ये स्थिति चौंकाती भले हो, लेकिन यही सच्चाई है। इंकार नहीं कर सकते  कि इसी कारण दिल्ली दुनिया के दस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल है। यह हाल सिर्फ दिल्ली का नहीं है, वरन देश के अन्य महानगरों की भी कमोबेश यही स्थिति है। इन स्थितियों के कारण ही वातावरण में सुधार  के मामले में भारत की स्थिति में काफी गिरावट आई है। बीते दिनों एक अध्ययन में सामने आया था कि वायु प्रदूषण के मामले में भारत की स्थिति ब्रिक्स देशों में सबसे खस्ताहाल है।  इस वायु प्रदूषण के कारण देश में प्रतिवर्ष लगभग छः लाख लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। इस पर तर्क यह दिया जा सकता है कि पाकिस्तान, श्रीलंका आदि देशों की जनसख्या, औद्योगिक प्रगति और वाहनों की मात्रा भारत की अपेक्षा बेहद कम है, इसलिए वहां वायु प्रदूषण का स्तर नीचे है। लेकिन इस तर्क पर सवाल यह उठता है कि स्विट्ज़रलैंड, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि देश क्या औद्योगिक प्रगति नहीं कर रहे या उनके यहाँ वाहन नहीं हैं, फिर भी वो दुनिया के सर्वाधिक वातानुकूलित देशों में कैसे शुमार हैं ? और क्या ऐसी दलीलों के जरिये देश के कर्णधार इसको प्रदूषण मुक्त करने की अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं ?

बहरहाल, इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में वायु प्रदूषण अत्यंत विकराल रूप ले चुका है। दुर्योग यह है कि देश इसको लेकर बातों में तो चिंता व्यक्त करता है, पर इसके निवारण व रोकथाम के लिए ठोस ढंग से कुछ करता नहीं दिखता। इन बातों के आलोक में हम प्रदूषण के वास्तविक कारणों की पहचान भी कर सकते हैं, परन्तु इन कारणों को रोकने के लिए सरकार से लेकर न्यायालय तक किसीके द्वारा कोई पहल कभी की गई हो, ऐसा याद नहीं आता।   

दरअसल वायु प्रदूषण औद्योगिक प्रगति से अधिक इस बात पर निर्भर करता है कि आप प्रगति और प्रकृति के मध्य कितना बेहतर संतुलन रख रहे हैं। अगर प्रगति और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित किया जाय तो न केवल वायु प्रदूषण वरन हर तरह के प्रदूषण से निपटा   जा सकता है। पर इस संतुलन के लिए कानूनी स्तर से लेकर जमीनी स्तर पर तक मुस्तैदी दिखानी पड़ती है, जिस मामले में यह देश काफी पीछे है। प्रदूषण को लेकर हमारे हुक्मरानों की उदासीनता को इसीसे समझा जा सकता है कि देश का कोई भी राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में प्रदूषण नियंत्रण से सम्बंधित कोई वादा नहीं करता। ऐसे किसी वादे से इसलिए परहेज नहीं किया जाता  कि प्रदूषण नियंत्रण कठिन कार्य है, क्योंकि इससे कठिन-कठिन वादे हमारे हुक्मरानों द्वारा कर दिए जाते हैं। लेकिन वे प्रदूषण नियंत्रण जैसे वादे से सिर्फ इसलिए परहेज करते हैं कि उनकी नज़र में ये कोई मुद्दा नहीं होता।

उपर्युक्त सभी बातों को देखते हुए आज जरूरत यही प्रतीत होती है कि सरकार और नागरिक दोनों इस सम्बन्ध में चेत जाएं और वायु को जीवन के अनुकूल रखने के लिए न केवल बातों से वरन अपने आचरण से भी गंभीरता का परिचय दें। इस सम्बन्ध में अपने-अपने स्तर पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। क्योंकि सारी प्रगति तभी होगी जब हम जीएंगे और हम जीएंगे तभी, जब धरती पर स्वच्छ और सांस लेने योग्य वायु होगी।