हिंदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिंदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

हिंदी भाषी राज्य में हिंदी की दुर्दशा (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश में हिंदी को लेकर चलने वाली समकालीन चर्चाओं में मोटे तौर पर दो पक्ष दिखाई देते हैं। एक, जो यह मानता है कि देश में हिंदी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, क्योंकि उसे देश के अहिंदीभाषी राज्यों में पहुंचाने के लिए कुछ भी ठोस नहीं किया जा रहा। दूसरा पक्ष मानता है कि देश में हिंदी की हालत बेहतर हो रही है और अब वो दुनिया में भी अपनी धमक बढ़ाने लगी है। परन्तु, इस भाषाई विमर्श की परिधि से बाहर हिंदी की जो जमीनी स्थिति है, वो उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्य की बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में गत वर्ष भी सामने आई थी और अबकी भी आई है। बीते वर्ष राज्य की दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में लगभग दस लाख बच्चे हिंदी में अनुत्तीर्ण हो गए थे, तो माना गया कि इस वर्ष यह हो गया होगा, आगे स्थिति सुधर जाएगी। परन्तु, इसबार अभी जब परीक्षा परिणाम आए तो यह आंकड़ा जरा-सी कमी के साथ आठ लाख के करीब सामने आया। आंकड़ों में कमी को लेकर कुछ लोग यह कह सकते हैं कि स्थिति में सुधार तो आया है, परन्तु प्रश्न ये है कि देश के सबसे बड़े हिंदी भाषी राज्य में हिंदी को लेकर यह स्थिति पैदा ही क्यों हुई?  
अतः हिंदी पर होने वाली चर्चाओं में बात अहिंदीभाषी राज्यों में हिंदी के प्रसार या हिंदी की वैश्विक धमक से पहले इस बिंदु पर होनी चाहिए कि एक हिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी की शैक्षिक स्थिति ऐसी क्यों हो गयी है? हिंदी का कायाकल्प करने वाले युगांतकारी लेखक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, कथा-सम्राट प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, हरिवंश राय बच्चन जैसे हिंदी साहित्य के अनेक महान हस्ताक्षरों की जन्मभूमि यूपी में इस तरह लाखों की तादाद में छात्रों का हिंदी की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाना, निश्चित रूप से अपनी भाषा के प्रति हमारी निष्ठा और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

दरअसल हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी विषय को लेकर अभिभावकों और अध्यापकों से होते हुए छात्रों तक में यह मानसिकता गहरे पैठी हुई है कि ये आसान विषय है और इसके अध्ययन में बहुत अधिक समय व श्रम खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। इस मानसिकता के कारण न तो अध्यापक ढंग से हिंदी पढ़ाने में ध्यान देते हैं और न अभिभावक ही बच्चों को इसपर ध्यान देने के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि कोई बच्चा यदि हिंदी में अधिक रुचि ले रहा हो तो उसे अभिभावकों से हिंदी की बजाय गणित आदि विषयों के जरूरी होने और उनपर जोर लगाने की नसीहत मिल जाती है।
हिंदी विषय पर ध्यान न देने के कारण छात्र इसके अध्ययन को लेकर कोई रणनीति नहीं बना पाते। हिंदी में साहित्यिक पाठ के अलावा व्याकरण का भी एक भाग होता है, लेकिन परीक्षा के समय जल्दबाजी में छात्र अक्सर साहित्यिक पाठों के तो प्रश्नोत्तर रटकर काम चला लेते हैं, मगर व्याकरण वाले हिस्से को यथोचित समय देकर समझ नहीं पाते। हिंदी व्याकरण को लेकर छात्रों के अज्ञान और अगम्भीरता का आलम यह है कि बहुतायत छात्रों को ‘नाउन-प्रोनाउन’ तो पता होता है, मगर ‘संज्ञा-सर्वनाम’ पूछने पर बगले झाँकने लगते हैं। यही छात्र जब आगे विश्वविद्यालयी अध्ययन में पहुँचते हैं, तो वहां भी यह भाषाई अज्ञान उनके साथ बना रहता है। ‘की’ और ‘कि’ का भेद न होना, अनुस्वार के उपयोग में नासमझी, अल्पविराम और पूर्णविराम के दोष सहित वाक्य-विन्यास की समस्याएँ तक ऐसे छात्रों की लेखनी में प्रायः दृष्टिगत होती हैं। इस पूरी समस्या के मूल में हिंदी भाषा के प्रति छात्र के घर से विद्यालय तक व्याप्त अगंभीरता ही कारण है और इस अगंभीरता के पीछे अंग्रेजी माध्यम शिक्षा का बड़ा हाथ है, जिसमें सिवाय हिंदी किताब के बाकी पूरी पाठ्यसामग्री अंग्रेजी में होती है। इस स्थिति में हिंदी का हाशिये की भाषा बनकर रह जाना स्वाभाविक है।
यहाँ महात्मा गांधी का उल्लेख समीचीन होगा। गांधीजी कितने उदार थे, यह कहने की जरूरत नहीं, परंतु भाषा के मामले में वे अंग्रेजी के प्रति किसी प्रकार की उदारता के पक्ष में नहीं थे। हिन्द स्वराज में उन्होंने लिखा, ‘करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली, वह सचमुच गुलामी की नींव थी।…अंग्रेजी शिक्षण स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है।‘ इस गुलामी से मुक्ति के लिए गांधी का मत था कि भारतीय भाषाओं को चमकाना चाहिए और हिंदी तो सबको आनी चाहिए। गांधीजी यह बात उस दौर में कह रहे थे, जब देश में विदेशी शासन था, परन्तु स्वशासन स्थापित होने के बाद भी हमने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि आज अच्छी पढ़ाई का मतलब अंग्रेजी माना जा चुका है। देश में अंग्रेजी का प्रभाव ऐसा हो गया है कि कोई साधारण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी अंग्रेजी में चार बातें बोलकर लोगों के बीच अपना एक अलग औरा बना लेता है जबकि हिंदी बोलने वाले ज्ञानी व्यक्ति को भी वैसा महत्व नहीं मिलता। यह एक विदेशी भाषा की मानसिक गुलामी के अतिरिक्त और क्या है?
सवाल उठता है कि एक हिंदी भाषी देश में हिंदी में ही हर विषय की शिक्षा क्यों नहीं प्राप्त की जा सकती? तर्क दिया जाता है कि विज्ञान और अभियांत्रिकी जैसे विषयों के अध्ययन के लिए अधिकांश सामग्री अंग्रेजी में ही उपलब्ध है, इसलिए अंग्रेजी आवश्यक है। ऐसे में, सवाल उठता है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी उस सामग्री का हिंदी रूपांतरण क्यों नहीं किया जा सका? जाहिर है, इस दिशा में काम करने की इच्छाशक्ति ही हमारी सरकारों में नहीं है। ऊपर से शुरू हुई ये समस्या ही नीचे तक पहुंचकर यह स्थिति उत्पन्न कर रही है कि एक हिंदी भाषी राज्य में ही लाखों की संख्या में छात्र हिंदी में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

बॉलीवुड सितारों का अंग्रेजी प्रेम (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इसी हिंदी सिनेमा के सितारों का व्यक्तिगत व सार्वजनिक जीवन में हिंदी के प्रति जो रवैया दिखाई देता है, वो चकित करने के साथ-साथ उनपर कई सवाल भी खड़े करता है। सवाल ये कि हिंदी में फ़िल्में बनाकर अकूत पैसा और लोकप्रियता प्राप्त करने वाले बॉलीवुड के ये सितारे परदे से बाहर आते ही हिंदी से परहेज क्यों करने लगते हैं? क्या हिंदी इनके लिए केवल कैमरे के सामने रटकर बोली जाने वाली एक भाषा है, जिसमें बड़े-बड़े संवाद बोलकर वे लाखों-करोड़ों दर्शकों की तालियाँ और वाहवाही हासिल कर अपनी ‘स्टारडम’ बना लेते हैं? क्या इससे अधिक हिंदी का उनके लिए कोई महत्व नहीं है? इन सवालों का जवाब बॉलीवुड के सितारों को देना चाहिए, लेकिन इसका कोई तर्कसंगत जवाब उनके पास होगा, इसकी संभावना बहुत कम है।

ऐसा लगता है कि बॉलीवुड के लोगों, फिर चाहें वो निर्माता-निर्देशक हों या अभिनेता-अभिनेत्री, के लिए हिंदी एक व्यावसायिक मजबूरी से अधिक कुछ और नहीं है। व्यावसायिक मजबूरी के ही कारण परदे पर वे हिंदी को समर्पित होते हैं और उससे बाहर आते ही अंग्रेजीदां हो जाते हैं। परदे से बाहर की उनकी ज्यादातर गतिविधियों की भाषा अंग्रेजी होती है। एकबार फिल्म बन गयी, उसके बाद फिल्म के प्रचार आदि सभी कार्य अंग्रेजी में होते हैं। फिल्म के ट्रेलर को प्रसारित करने पर होने वाली प्रेसवार्ता हो या फिल्म के प्रचार से सम्बंधित विविध साक्षात्कार हों, इन सबकी अधिकांश बातचीत अंग्रेजी में होती है। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर नए-पुराने सभी बॉलीवुड कलाकारों के साथ यही स्थिति है।
हालांकि बॉलीवुड के पुरस्कार समारोहों में जरूर हिंदी को जगह मिलती है, लेकिन उसके मूल में भी कोई हिंदी प्रेम नहीं बल्कि विशुद्ध व्यावसायिकता ही होती है। चूंकि उन पुरस्कार कार्यक्रमों का प्रसारण जिन टीवी चैनलों पर होता है, उनका बहुत बड़ा दर्शकवर्ग हिंदीभाषी होता है, अतः उस दर्शकवर्ग के मद्देनजर वे कार्यक्रम हिंदी में होते हैं। हालांकि ऐसे कार्यक्रमों में जो हिंदी बोली जाती है, उसमें भी आधे से अधिक अंग्रेजी ही होती है।  
इसके अलावा बॉलीवुड कलाकारों के सोशल मीडिया पर अगर नजर डाली जाए तो वहां भी अंग्रेजी का ही वर्चस्व दिखता है। अमिताभ बच्चन, आशुतोष राणा जैसे कुछेक लोग जरूर यहाँ भी एक अपवाद की तरह हैं, जो अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। लेकिन अंग्रेजीप्रेमी सितारों की भीड़ में ऐसे लोगों की संख्या गिनती की ही है।
साथ ही, यह भी देखा जा सकता है कि बॉलीवुड के लोगों की आत्मकथा हो, जीवनी हो या किसी और विधा पर कोई किताब हो, अधिकांश का मूल लेखन अंग्रेजी में ही होता। बेशक बाद में उसका हिंदी अनुवाद भी ला दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर करण जौहर की आत्मकथा ‘एन अनसूटेबल बॉय’ अंग्रेजी में है, जिसका हिंदी अनुवाद बाद में ‘एक अनोखा लड़का’ के नाम से आया। दिलीप कुमार की आत्मकथा ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ 2014 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई, जिसका हिंदी अनुवाद 2017 में ‘वजूद और पहचान’ के नाम से आया। ऋषि कपूर की आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ भी पहले अंग्रेजी में आई और उसके लगभग साल भर बाद इसी नाम से हिंदी में उसका प्रकाशन हुआ। आत्मकथाओं के अलावा अन्य प्रकार के लेखन में भी बॉलीवुड की पसंद अंग्रेजी ही है। अभिनेत्री से लेखिका बनीं ट्विंकल खन्ना अबतक तीन किताबें ‘मिस फनीबोन्स’, ‘द लीजेंड ऑफ़ लक्ष्मी प्रसाद’, ‘पायजामाज आर फोर्गिविंग’ लिख चुकी हैं और तीनों ही अंग्रेजी में हैं। अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता नंदा ने हाल ही में अपने पहले उपन्यास ‘पैराडाइस टावर्स’ के साथ लेखन के क्षेत्र में प्रवेश किया जो कि अंग्रेजी में ही है। श्वेता बॉलीवुड में सक्रिय नहीं हैं, लेकिन उनके पिता का हिंदी प्रेम देखते हुए ये उम्मीद कोई ज्यादा नहीं थी कि वे अपने लेखन की शुरुआत हिंदी में करतीं। हालांकि यहाँ भी कुछेक अपवाद हैं जैसे कि आशुतोष राणा जो न केवल सोशल मीडिया पर जमकर हिंदी में लिखते हैं बल्कि अपनी किताब ‘मौन मुस्कान की मार’ (व्यंग्य-संग्रह) भी उन्होंने हिंदी में ही लिखी है। मगर कुल मिलाकर इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि बॉलीवुड में अंग्रेजी का कैसा वर्चस्व है।
बॉलीवुड सितारों के अंग्रेजी प्रेम के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि ऐसा वे अपनी पहुँच को भारत के अहिन्दीभाषी क्षेत्रों सहित वैश्विक स्तर तक विस्तार देने के लिए करते हैं। सवाल ये है कि अगर उन्हें अपनी वैश्विक पहुँच की इतनी ही चिंता है तो फिर फ़िल्में भी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं बनाते? कितना विचित्र है कि फ़िल्में हिंदी में बनाएंगे और उससे देश की बहुसंख्यक हिंदीभाषी जनता के जरिये पैसा और वाहवाही भी बटोरेंगे, लेकिन जब बात हिंदी को अपनाने की आएगी तो अंग्रेजी के जरिये अपनी वैश्विक पहुँच बनाने चल देंगे। निस्संदेह अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा है और उसकी पहुँच बहुत अधिक है, लेकिन हमारे कलाकारों को समझना चाहिए कि अंग्रेजी चाहें कितनी भी बड़ी भाषा हो, लेकिन उनके लिए हिंदी का महत्त्व सबसे ऊपर है। वे आज जो कुछ भी हैं, उनको जो भी नाम-पैसा मिला है, उसकी बुनियाद में अंग्रेजी नहीं, हिंदी और हिन्दीभाषी लोग हैं। ऐसे में बोलने-लिखने से जितना अधिक संभव हो, उनके व्यवहार की भाषा हिंदी ही होनी चाहिए। यहाँ यह सफाई भी नहीं चल सकती कि हमें हिंदी ठीक से आती नहीं, इसलिए अंग्रेजी में सबकुछ करना पड़ता है। अगर हिंदी अच्छे-से नहीं आती तो उसे आवश्यक मानकर, सिर्फ फ़िल्मी जरूरतों के लिए नहीं बल्कि एक भाषा के रूप में गंभीरता से सीखने की जरूरत है।
किसी भी भाषा का विस्तार और विकास उसके बोलने-लिखने वालों के जरिये ही होता है। अंग्रेजी की जिस वैश्विक पहुँच पर आज बॉलीवुड सितारे मुग्ध हैं, उसके बनने में अंग्रेजीभाषी लोगों का अंग्रेजी के प्रति समर्पित रुख एक बड़ा कारण है। हिंदी में बाबू देवकीनंदन खत्री का उदाहरण समीचीन है, जिन्होंने हिंदी में लिखा और ऐसा लिखा कि उसे पढ़ने के लिए हजारों-लाखों लोग हिंदी सीखने पर मजबूर हो गए। बॉलीवुड के हिंदी कलाकारों की प्रशंसक श्रृंखला भारत ही नहीं, दुनिया भर में फैली हुई है, ऐसे में यदि वे हिंदी में ही अपना समस्त भाषा-व्यवहार करेंगे तो देश-विदेश के बहुत से अहिंदीभाषी लोग हिंदी सीखने-समझने को प्रेरित हो सकते हैं। उनका यह रुख हिंदी को वैश्विक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मगर यह तभी होगा जब वे हिंदी को दीन-हीन और साधारण लोगों की भाषा समझने की अपनी मानसिकता से बाहर आकर उसे देश की भाषा समझते हुए एक गर्व की अनुभूति के साथ अपनाएंगे और अधिकाधिक रूप से उसका व्यवहार करेंगे।

मंगलवार, 11 जून 2019

संकीर्ण राजनीति की शिकार हिंदी [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस नयी शिक्षा नीति का लम्बे समय से देश को इन्तजार था, जब उसका प्रारूप सामने आया तो स्वस्थ व सार्थक चिंतन-मनन की बजाय विवाद का विषय बनकर रह गया। समग्र शिक्षा नीति पर चर्चा हाशिये पर चली गयी और सारा ध्यान उसमें उल्लिखित त्रिभाषा नीति पर केन्द्रित हो गया। इसमें हिंदी को वरीयता देने को लेकर तमिलनाडू के राजनीतिक गलियारों से विरोध की आवाज सुनाई देने लगी। त्रिभाषा नीति के विरोध में उतरे दलों व नेताओं ने इतनी-सी बात समझने तक की जहमत नहीं उठाई कि ये प्रारूप केवल विचारार्थ रखा गया है, यह कोई अंतिम निर्णय नहीं है। इसे सबकी राय लेकर ही लागू किया जाएगा। अब खबर आ रही है कि विरोध के मद्देनजर सरकार ने इस शिक्षा नीति में उल्लिखित हिंदी की अनिवार्यता वाले प्रावधान को खत्म कर दिया है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि आखिर त्रिभाषा नीति में हिंदी की मौजूदगी को लेकर विरोध की आवाजें उठ क्यों रही हैं? हिंदी अगर भारत में नहीं, तो और कहाँ पढ़ी-लिखी और बोली-समझी जाएगी? बहरहाल, इस विरोध को समझने के लिए त्रिभाषा नीति के स्वरूप और इतिहास पर दृष्टि डालना समीचीन होगा।
क्या है त्रिभाषा नीति?
त्रिभाषा नीति कोई आज का विषय नहीं है, बल्कि इसकी चर्चा आजादी के बाद विश्वविद्यालयी शिक्षा सम्बन्धी सुझावों के लिए गठित राधाकृष्णन आयोग की रिपोर्ट से ही शुरू हो गयी थी, जिसमें तीन भाषाओं में पढ़ाई की व्यवस्था का परामर्श दिया गया था। आयोग का कहना था कि माध्यमिक स्तर पर प्रादेशिक भाषा, संघीय भाषा और अंग्रेजी भाषा की शिक्षा दी जाए। इसके बाद 1955 में डॉ लक्षमणस्वामी मुदालियर के नेतृत्व में माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन किया गया, जिसने प्रदेश की मातृभाषा के साथ हिंदी के अध्ययन का द्विभाषा सूत्र देते हुए अंग्रेजी व संस्कृत को वैकल्पिक बनाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया। फिर 1964 में यूजीसी के प्रमुख दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन हुआ जिसने 1966 में पेश अपनी रिपोर्ट में त्रिभाषा नीति का सुझाव दिया।

यहाँ एक बात उल्लेखनीय होगी कि मुदालियर आयोग को छोड़कर ज्यादातर शिक्षा व भाषा आयोगों ने भाषा-समस्या के समाधान हेतु प्रस्तावित त्रिभाषा नीति में अंग्रेजी को अधिक महत्व देते हुए हिंदी का पक्ष कमजोर ही किया। कोठारी आयोग का प्रस्ताव भी ऐसा ही था, जिसमें कक्षा 8 से 10 तक छात्रों के लिए तीन भाषाओं (स्थानीय मातृभाषा, हिंदी और अंग्रेजी) के अध्ययन की बात कही गयी थी, वहीं विश्वविद्यालयी स्तर पर अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम रखने का प्रस्ताव किया गया था। इसी कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गयी, जिसमें त्रिभाषा फार्मूला शामिल था। उस समय तमिलनाडू के मुख्यमंत्री थे अन्नादुरई जिन्होंने इस त्रिभाषा नीति को राज्य में हिंदी थोपने की कोशिश करार देते हुए इसका कड़ा विरोध किया और राज्य के विद्यालयों से हिंदी को हटा दिया गया। इसके बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कुछेक बार परिवर्तन हुए, लेकिन तमिलनाडू में अंग्रेजी और तमिल की द्विभाषा नीति ही शिक्षा का माध्यम बनी रही।
दक्षिण का हिंदी विरोध
दक्षिण में हिंदी विरोध की शुरुआत आजादी से पहले ही हो गयी थी। 1937 में हुए प्रांतीय चुनावों में मद्रास प्रेसिडेंसी में कांग्रेस को बहुमत मिला था और शासन की बागडोर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के हाथ आई, जिन्होंने जल्द-ही राज्य में हिंदी की शिक्षा को बढ़ावा देने को लेकर अपने इरादे जाहिर कर दिए। एक प्रमुख मीडिया संस्थान के वेबपोर्टल पर प्रकाशित खबर के मुताबिक़, अप्रैल 1938 में मद्रास प्रेसिडेंसी के 125 सैकेंडरी स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य भाषा के तौर पर लागू कर दिया गया। तमिलों में इस निर्णय के प्रति कड़ी प्रतिक्रिया दिखी और जल्द-ही ये विरोध एक जनांदोलन का रूप ले लिया। पेरियार और अन्नादुरई ने इस आन्दोलन को अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने का उपकरण बना लिया। यह आन्दोलन लगभग दो वर्ष तक चला। 1939 में राजाजी की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया और फिर अंग्रेज हुकूमत ने सरकार के फैसले को वापस लेते हुए हिंदी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। तब ये आन्दोलन थम जरूर गया, मगर यहाँ से राज्य में हिंदी विरोधी राजनीति का जो बीजारोपण हुआ, वो आगे फलता-फूलता ही गया।
आजादी के तत्काल बाद भी हिंदी विरोध की राजनीति की आंच में राज्य को जलना पड़ा, तो वहीं 1963 में राजभाषा विधेयक के पारित होने के बाद भी हिंसक रुख लेकर यह आन्दोलन शुरू हो गया। सत्तर के दशक का प्रथमार्ध इस लिहाज से बेहद उथल-पुथल भरा रहा। 1967 में आखिर इस हिंदी विरोधी आन्दोलन पर चढ़कर डीएमके तमिलनाडु की सत्ता हासिल करने में कामयाब हो गयी। इसीके साथ हिंदी विरोध दक्षिण, खासकर तमिलनाडू की राजनीति का एक आवश्यक उपकरण बन गया जो कि आज भी यथावत कायम है। आज भी वहाँ के नेताओं को हिंदी विरोध में अपने लिए राजनीतिक संभावनाएं दिखाई देती हैं, जिस कारण वे तथ्य और यथार्थ से परे आँख बंद करके हिंदी सम्बन्धी किसी भी बात का विरोध करने लगते हैं। यही कारण है कि अभी त्रिभाषा नीति की चर्चा आते ही हिंदी थोपने की बात कहते हुए राज्य से विरोधी आवाजें उठने लगीं।

कितना जायज है हिंदी विरोध?
दक्षिण भारत के हिंदी विरोध का मूल स्वर यह है कि हिंदी कथित हिंदीपट्टी वाले राज्यों की भाषा है, जिसे उनपर थोपा जा रहा है। इसमें द्रविड़ और आर्य वाली ऐतिहासिक अवधारणा भी एक हद तक काम करती है, जिसके अनुसार बाहर से आए आर्यों ने देश के मूल निवासी द्रविड़ों को दक्षिण में खदेड़ दिया और स्वयं उत्तर में बस गए। हालांकि जिस तरह से ये आर्य आगमन सिद्धांत ऐतिहासिक तथ्यों के धरातल पर भ्रामक सिद्ध होता है, उसी तरह दक्षिण का हिंदी विरोध भी तथ्यात्मक रूप से फिजूल ही लगता है। इस विषय में पटना निफ्ट में प्राध्यापक रत्नेश्वर सिंह कहते हैं, ‘आज हिंदीपट्टी कहे जाने वाले जो राज्य हैं, वास्तव में हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं है। लेकिन आजादी के बाद देश की एकता के लिए उन्होंने उदारता दिखाते हुए हिंदी को अपनी मातृभाषा से ऊपर रखा। दक्षिण के राज्य वैसी उदारता नहीं दिखा पाए। इसका कारण वो क्षेत्रवादी राजनीति है, जिसने ऐसी हवा बना दी कि हिंदी कुछ खास प्रदेशों की भाषा है और उनपर थोपी जा रही। वास्तव में न तो कथित हिन्दीपट्टी राज्यों पर हिंदी थोपी गयी थी, न किसी और पर थोपी जा सकती है। कोई भी भाषा किसीपर जबरन थोपकर प्रभाव में लाई ही नहीं जा सकती। दूसरी चीज कि हिंदी को जिन राज्यों ने आत्मसात किया, उनकी मातृभाषा खत्म नहीं हो गयी है। वो भी हिंदी के साथ-साथ फल-फूल रही है। अतः तमिलनाडू आदि गैर-हिन्दीभाषी राज्यों के लोगों को भी राजनीति का शिकार होने से बचते हुए देश की एकता के लिए हिंदी को स्वीकारना चाहिए।‘ जाहिर है कि हिंदी को कुछ प्रदेशों की मातृभाषा मानकर उसका विरोध करना तमिलों की सबसे बड़ी भूल है। देखा जाए तो हिंदी का स्वरूप भारतीय संस्कृति के ही समान महासमन्वयकारी है। संस्कृत से जन्मी इस भाषा में कुछ खड़ी, कुछ राजस्थानी, कुछ अवधी, कुछ ब्रज, कुछ भोजपुरी सहित और भी अनेक भारतीय भाषाओं एवं कुछ अंग्रेजी, कुछ उर्दू, कुछ फारसी जैसी विदेशी भाषाओं के शब्दों का महासंगम है। ऐसे में, राष्ट्रीयता की भावना के साथ यदि विचार किया जाए तो किसीके लिए भी हिंदी के विरोध का कोई कारण नजर नहीं आता। परन्तु, दक्षिण के राजनेताओं ने अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए वहाँ के लोगों में राष्ट्रीयता की बजाय क्षेत्रीयता की भावना का पोषण किया है। राजनीति ने तमिलों के विवेक को इस कदर ग्रस लिया है कि उन्हें विदेशी भाषा अंग्रेजी से अपनी मातृभाषा को कोई खतरा नहीं लगता, लेकिन अपने देश की भाषा हिंदी से लगता है। 
हिंदीभाषी राज्य भी जिम्मेदार
उक्त बातों से यह तो स्पष्ट हो गया है कि गैर-हिंदीभाषी राज्यों के हिंदी विरोध का मुख्य कारण वहाँ की राजनीति है। परन्तु, इस राजनीति के लिए वहाँ के राजनेताओं को अवसर देने के लिए एक हद तक हिंदीभाषी राज्यों के लोगों का दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्रति उदासीन रवैया भी जिम्मेदार है। तमिलनाडू को छोड़ दें तो आंध्र प्रदेश, केरला, कर्णाटक आदि दक्षिणी राज्यों में कुछ हद तक हिंदी की मौजूदगी मिलती है, वहाँ के स्थानीय लोग हिंदी बोलते दिख जाते हैं, जिससे जाहिर होता है कि इन राज्यों में कम ही सही मगर लोग हिंदी सीख रहे हैं। लेकिन इसके उलट हिंदीभाषी राज्यों में तमिल-तेलुगू जैसी भाषाओं को सीखने-सिखाने के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाई देता। इस विषय में डीयू के रामानुजन महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक डॉ आलोक रंजन पाण्डेय कहते हैं, ‘दिल्ली में कुछ विद्यालय हैं जहां तमिल-तेलुगु आदि दक्षिण भारतीय भाषाएँ पढ़ाई जाती हैं, मगर उनकी संख्या कम है। यह सही है कि हिंदीभाषी प्रदेशों के लोग दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने में बहुत रुचि नहीं लेते जो कि उन्हें लेनी चाहिए। हमारा विरोध तमिल या तेलुगु से न कभी था, न है। लेकिन हिंदी के बजाय अंग्रेज़ी का हम सदैव विरोध करते रहे हैं।‘ हालांकि एक पक्ष यह भी है कि हिंदी किसी राज्य-विशेष की भाषा नहीं है जो उसको अपनाने के बदले कोई अमुक राज्य से अपनी क्षेत्रीय भाषा को सीखने की उम्मीद करे, लेकिन फिर भी हिन्दीभाषी राज्यों को दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने के प्रति गंभीर होना चाहिए। ऐसा करने से जो अविश्वास की खाई उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीति ने पैदा की है, उसे पाटना कुछ आसान होगा।

त्रिभाषा नीति पर प्राध्यापकों की राय
वर्तमान भाषाई विवाद को सुलझाने का सबसे सटीक समाधान त्रिभाषा फ़ार्मूला है। जब यह बना था तो इसमें सभी राज्यों की सहमति थी एवं संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्व सम्मति से इसे पारित किया गया था। आज इसका विरोध जायज़ नहीं लगता। यह विरोध कुछ नेता केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रहे हैं। विश्व के जिस देश ने विकास किया अपनी भाषा में किया, पिछड़ेपन का कारण विदेशी भाषा रही है। यदि अभी भी मोदी की बहुमत वाली सरकार भाषा के मसले पर नेहरु की तरह ढुलमुल रहेगी तो दोनो में क्या अंतर रहेगा?
- प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय
अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय

सरकार कई बार हिंदीतर क्षेत्रों को नाराज़ नहीं करना चाहती है, क्योंकि हम लोकतंत्र में रह रहे हैं और  यहाँ वोटबैंक की राजनीति है। त्रिभाषा सूत्र सबसे उपयुक्त समाधान है-इसमें अंग्रेज़ी, क्षेत्रीय भाषाएँ और हिंदी सभी सुरक्षित हैं। हम शुरू से अपनी क्षेत्रीय भाषाओं का समर्थन करते हैं, हमारा अंग्रेज़ी से भी विरोध नहीं है, लेकिन हिंदी की क़ीमत पर अंग्रेज़ी का विकास हो, यह ठीक नहीं है।
- प्रो. पूरनचंद टंडन
प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय

निष्कर्ष
कुल मिलाकर बात यही निकलती है कि दक्षिण की हिंदी विरोधी राजनीति को रोकने के लिए केंद्र को दृढ़ता एवं हिंदीभाषी लोगों को दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि दिखानी होगी। अभी विरोधों के कारण जिस तरह से केंद्र ने शिक्षा नीति के प्रस्ताव में संशोधन कर दिया, यह रुख सही नहीं है। इससे समस्या खत्म नहीं होगी। केंद्र को दृढ़तापूर्वक दक्षिण खासकर तमिलनाडू में हिंदी को स्थापित करने के लिए बिना किसी प्रकार के दबाव में आए कदम उठाने चाहिए। दक्षिण भारतीय लोगों को एकबार यह समझ में आ गया कि हिंदी से उनकी मातृभाषा को कोई खतरा नहीं है, तो वे इसे स्वीकारने में कभी पीछे नहीं हटेंगे। मगर उन्हें ये तबतक समझ नहीं आएगा जबतक हिंदी वहाँ पहुंचेंगी नहीं। एकबार तमिलनाडू में हिंदी का पढ़ना-लिखना शुरू हो गया तो फिर कोई राजनीतिक दल या नेता हिंदी विरोध को हवा नहीं दे पाएंगे।

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

दुनिया में बढ़ रही हिंदी की धाक (दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश की न्यायपालिका में हिंदी को भले उपेक्षा झेलनी पड़ती हो, लेकिन पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की राजधानी अबुधाबी के न्यायिक विभाग से इस विषय में एक अच्छी खबर आई। खबर यह कि अबुधाबी की अदालत में हिंदी को तीसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा प्रदान किया गया है। इससे पूर्व अरबी और अंग्रेजी ही वहाँ न्यायपालिका की आधिकारिक भाषा थीं। अबुधाबी के न्यायिक विभाग की तरफ से बयान जारी कर कहा गया है, ‘हमारा लक्ष्य हिंदी भाषियों को मुक़दमों की प्रक्रिया सीखने में मदद करना है। इसके अलावा हम उन्हें उनके अधिकारों और कर्तव्यों को भाषाई अड़चनों के बिना समझाना चाहते हैं।‘
गौरतलब है कि यूएई की कुल आबादी लगभग 92 लाख है, जिसमें तकरीबन 26 लाख की जनसंख्या के साथ भारतीय लोग वहाँ के सबसे बड़े प्रवासी समुदाय हैं। ऐसे में, माना जा रहा है कि भारतवासियों को खुश करने के लिए यूएई की तरफ से हिंदी को न्यायपालिका में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है।      
हिंदी के न्यायिक भाषा बनने की वजह
अबुधाबी न्यायिक विभाग के सचिव यूसुफ सईद अल आबरी ने हिंदी के न्यायिक भाषा बनने पर कहा कि ‘कई भाषाओं में याचिकाओं, आरोपों और अपीलों को स्वीकार करने के पीछे हमारा मकसद 2021 के विजन को देखते हुए सभी के लिए न्याय व्यवस्था को प्रसारित करना है। हम न्यायिक व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाना चाहते हैं।‘
आबरी की तरफ से यह भी स्पष्ट किया गया कि शेख मंसूर बिन जायद अल नाह्यान, यूएई के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और अबुधाबी न्यायिक विभाग के अध्यक्ष के निर्देशों पर न्यायपालिका में कई भाषाओं की ये व्यवस्था लाई गयी है। इस व्यवस्था के पहले चरण की शुरुआत नवंबर 2018 में हुई थी।

आबरी के कथनानुसार यह काम यूएई के जिस विजन-2021 के तहत किया गया है, उस विजन की शुरुआत 2010 में यूएई सरकार द्वारा की गयी थी, जिसके तहत देश के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। निर्धारित लक्ष्यों में से ही एक लक्ष्य प्रभावी न्याय प्रणाली की व्यवस्था करना भी है। इसी विजन के तहत यूएई ने अपनी आबादी के लगभग तीस प्रतिशत हिस्से के रूप में मौजूद भारतीयों के न्याय की चिंता की है। स्पष्ट है कि विजन-2021 यूएई द्वारा हिंदी को न्यायिक भाषा बनाए जाने का एक प्रमुख कारण है, लेकिन एकमात्र यही कारण नहीं है। भारतीय विदेशनीति का भी इसमें प्रमुख योगदान माना जाना चाहिए। वर्ना भारतीय तो बहुत समय से यूएई में हैं और विजन-2021 भी 2010 में शुरू हो गया था, फिर यूएई को उनको न्याय मिलने में भाषाई अड़चन की चिंता पहले क्यों नहीं हुई? यूएई को अब भारतीयों की चिंता होने के पीछे कहीं न कहीं मोदी राज में भारत-यूएई संबंधों में आई गर्मजोशी भी एक बड़ा कारण है।  
गौर करें तो मोदी सरकार के आने के बाद से यूएई के साथ भारत के संबंधों में काफी प्रगाढ़ता आई है। गत वर्ष मोदी खुद वहाँ गए थे और अबुधाबी के क्राउन प्रिंस के साथ उनके बहुक्षेत्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए। इसके अलावा संबंधों की ये प्रगाढ़ता हाल में भी स्पष्ट हुई जब यूएई ने अगस्ता वेस्टलैंड मामले में पहले क्रिश्चियन मिशेल और फिर राजीव सक्सेना का प्रत्यपर्ण भारत को किया। ऐसे में, संभव है कि हिंदी को न्यायिक भाषा का दर्जा देने के पीछे भी यूएई की भारत के प्रति सदेच्छा प्रकट करने की मंशा हो। बहरहाल, एक बात तो साफ़ है कि यूएई के इस निर्णय से न केवल अबुधाबी में रहने वाले भारतीयों के लिए न्याय पाना सुगम होगा, बल्कि वैश्विक तौर पर हिंदी की साख में भी वृद्धि होगी।

संयुक्त राष्ट्र में हिंदी का मुद्दा
हिंदी की वैश्विक साख के संदर्भ में उल्लेखनीय होगा कि भारत की तरफ से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाए जाने की मांग भी लम्बे समय से होती रही है। वर्तमान में अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रसियन और अंग्रेजी इन छः भाषाओं को संयुक्त राष्ट्र द्वारा आधिकारिक मान्यता प्रदान की गयी है। देखा जाए तो इनमे अरबी, चाइनीज, रसियन आदि के मुकाबले बोले और समझे जाने के मामले में हिंदी का प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। गौर करें तो 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की 1.2 अरब आबादी में से 41.03 फीसदी की मातृभाषा हिंदी है। हिन्दी को दूसरी भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने वाले अन्य भारतीयों को मिला लिया जाए तो देश के लगभग 75 प्रतिशत लोग हिन्दी बोल सकते हैं। भारत के इन 75 प्रतिशत हिंदी भाषियों सहित पूरे विश्व में तकरीबन 80 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो इसे बोल या समझ सकते हैं। नेपाल, मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, यूगांडा, दक्षिण अफ्रीका, अरब सहित ट्रिनिडाड एवं टोबेगो और कनाडा आदि में हिंदी बोलने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। इसके आलावा इंग्लैंड, अमेरिका आदि में भी इसे बोलने और समझने वाले अच्छे-खासे लोग हैं। लेकिन बावजूद इसके हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा न मिल पाना बेहद अखरने वाली बात है।
सवाल उठता है कि आखिर हिंदी को यूएन की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलने में अड़चन क्या है? इस सवाल का जवाब भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा सदन में चर्चा के दौरान दी गयी जानकारी में मिलता है। सुषमा स्वराज ने बताया था कि यूएन के नए नियम के तहत उसके सदस्य देश जिस भाषा को आधिकारिक भाषा बनाने के प्रस्ताव का समर्थन करेंगे, उन्हें प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद अपने यहाँ उस भाषा के प्रचार-प्रसार में आने वाले खर्च को खुद ही उठाना पड़ेगा। ऐसे में, छोटे और कम संपन्न देश चाहते हुए भी हिंदी के समर्थन में नहीं खड़े होते। यह समस्या सिर्फ हिंदी के साथ ही हो, ऐसा भी नहीं है; जापानी और जर्मन भाषा को आधिकारिक दर्जा दिलाने की राह में भी इसी कारण रोड़ा खड़ा हुआ। हालांकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज यह भी कह चुकी हैं कि भारत संयुक्त राष्ट्र के इस नियम में बदलाव के लिए प्रयास कर रहा है और इस नियम को ऐसा बनाने पर जोर दे रहा है जिससे हिंदी को यूएन की भाषा बनाने के बाद सभी सम्बंधित खर्च भारत ही करे जिससे अन्य किसी देश पर कोई भार न पड़े। जाहिर है कि नियमवाली के पेंचों के कारण हमारी हिंदी को पात्रता होते हुए भी यूएन की आधिकारिक भाषा के दर्जे से वंचित रहना पड़ रहा है।
भारतीय न्यायपालिका और हिंदी
अबुधाबी के न्यायिक विभाग ने बेशक हिंदी को अपनी आधिकारिक भाषा का दर्जा दे दिया है, लेकिन हमारे यहाँ न्यायालय अभी भी इससे नाक-भौं ही सिकोड़ते हैं। दिक्कत ये है कि उन्हें ऐसा करने का अधिकार संविधान ने ही दे रखा है। दरअसल आज़ादी के बाद सन 1949 में हिंदी को भारतीय राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, लेकिन साथ ही यह भी निश्चित हुआ कि आज़ाद भारत के कानून और प्रशासन की भाषा हिंदी के साथ-साथ पूर्ववत ढंग से अंग्रेजी भी रहेगी। तब यह कहा गया था कि इन क्षेत्रों में धीरे-धीरे हिंदी को लाया जाएगा और जब हिंदी पूरी तरह से इन क्षेत्रों में आ जाएगी तो अंग्रेजी को समाप्त कर दिया जाएगा। परन्तु, ऐसा कभी नहीं हो सका। अंग्रेजी ख़त्म तो नहीं हुई, बल्कि प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के साथ स्थायी रूप से स्थापित होती गयी। न्यायालयों में तब भी अंग्रेजी को यही तर्क देकर रहने दिया गया था कि क़ानून हिंदी में नहीं हैं, इस तरह वहाँ हिंदी के लिए कोई स्थान ही नहीं रह गया। आज स्थिति यह हो गयी है कि न्यायालय वहाँ हिंदी को स्थान देने के लिए तैयार ही नहीं हैं; क्योंकि उन्हें वो अपने लिए व्यावहारिक ही नहीं लगती।
ऐसे में महात्मा गांधी द्वारा सन 1909 जब भारत पराधीन था, में लिखित पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ का यह अंश उल्लेखनीय होगा जिसमें उन्होंने भारतीयों द्वारा अंग्रेजी के प्रयोग पर क्षोभ पूर्ण कटाक्ष करते हुए लिखा था, ‘यह क्या कम जुल्म की बात है कि अपने देश में मुझे इन्साफ पाना हो, तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए। बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा में बोल ही नहीं सकता। दूसरे आदमी को मेरे लिए तरजुमा कर देना चाहिए। यह कुछ कम दंभ है। यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है? इसमें मैं अंग्रेजों का दोष निकालूं या अपना? हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले लोग ही हैं। राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं पड़ेगी, बल्कि हम पर पड़ेगी।‘ दुखद यह है कि गांधी आज़ादी से पहले भारतीयों की जिस अंग्रेजीदां मानसिकता से व्यथित थे, आज़ादी के बाद भी वो देश की व्यवस्थाओं में यथावत बनी और फल-फूल रही है।
विचार करें तो ये थोड़ा कठिन अवश्य था, परन्तु असंभव नहीं कि आज़ादी के बाद न्यायपालिका की समस्त सामग्रियों के हिंदी अनुवाद के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास किए गए होते; कानूनों का हिंदी अनुवाद कर लिया गया होता; और सभी भारतीय भाषाओं में न सही, कम से कम राजभाषा हिंदी में तो न्याय की व्यवस्था कर ही दी गयी होती। लेकिन, तब भी इस कार्य को आवश्यक न समझते हुए यथास्थिति को चलने दिया गया और आज भी वही किया जा रहा है।
बहरहाल, तब जो हुआ सो हुआ, आज न्यायपालिका की कार्यवाहियों में भारतीय भाषाओं को धीरे-धीरे सम्मिलित करने का प्रयास  किया जाना चाहिए। इसकी शुरुआत हिंदी को न्यायपालिका की प्रमुख भाषा बनाकर की जा सकती है। फिर धीरे-धीरे अन्य भारतीय भाषाओं को भी स्थान दिया जाता रहेगा। आज हमारे पास तकनीक की वो शक्ति है, जिसके ज़रिये ये कार्य बहुत कठिन नहीं है। दुनिया में हिंदी अपनी क्षमता से अपनी धाक बढ़ा रही है, ऐसे में अपने ही देश में उसकी उपेक्षा होना शर्मनाक ही है। सरकार को इस दिशा में गंभीर होकर विचार करना चाहिए। चूंकि, न्यायपालिका में इस दिशा में कुछ करने की मंशा नहीं दिखाई देती, ऐसे में संसद को ही अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए क़ानून के जरिये हिंदी को न्याय की भाषा का दर्ज़ा दिलाने की दिशा में प्रयास करने की जरूरत है।

सोमवार, 11 सितंबर 2017

हिंदी दिवस : अंग्रेजीदां मानसिकता से हिंदी को बचाने की जरूरत [पाञ्चजन्य में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
कुछ दिन पहले हिंदी के प्रयोग से संबंधित एक संसदीय समिति की रपट आई है। इसकी सिफारिशों के अनुसार राष्ट्रपति और सरकार के मंत्रियों समेत सभी प्रतिष्ठित पदों पर आसीन व्यक्तियों, जिन्हें हिंदी आती हो, के लिए अपने वक्तव्य हिंदी में देना जरूरी हो जाएगा। साथ ही समिति द्वारा केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) तथा अन्य केन्द्रीय विद्यालयों में दसवीं तक की शिक्षा में हिंदी को अनिवार्य कर देने की सिफारिश भी की गई है। इसी प्रकार की और भी कई सिफारिशें इस समिति द्वारा की गई हैं, जिन्हें राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है। हालांकि अभी इन सिफारिशों को सिर्फ राष्ट्रपति की तरफ से मंजूरी मिली है, अभी ये लागू नहीं हुई हैं, मगर अभी से ही इन पर देश के गैर-हिंदी भाषी राज्यों के दलों की भृकुटियां तन गई हैं। इस रपट के स्वीकृत होने के बाद द्रमुक नेता एम. के. स्टालिन ने झटपट केंद्र सरकार पर यह आरोप लगा दिया कि वह गैर-हिंदीभाषी राज्यों पर हिंदी को थोप रही है।
 
बहरहाल, यह लड़ाई बेहद पुरानी है। जब भी देश में हिंदी के हित में कोई राष्ट्रव्यापी पहल की बात आती है, उस पर तमिलनाडु आदि राज्यों के राजनेताओं का रुख बिना सोचे-विचारे तल्ख हो जाता है। गैर-हिंदीभाषी राज्यों का हिंदी के प्रति यह विद्वेष समझ से परे है कि  एक तरफ तो वे अपने यहां एक विदेशी भाषा अंग्रेजी को अपनाए बैठे हैं,  दूसरी तरफ हिंदी के नाम ही भी उन्हें चिढ़ मच जाती है। यदि उन्हें सिर्फ अपनी क्षेत्रीय भाषाओं से ही लगाव होता और वे इसी कारण हिंदी का विरोध कर रहे होते तो उन्हें विदेशी भाषा अंग्रेजी को भी नहीं अपनाना चाहिए था। लेकिन, ऐसा नहीं है। देखा जा सकता है कि उन्हें अंग्रेजी से कोई दिक्कत नहीं है, मगर इस देश, जिसके वे अंग हैं, की संविधान स्वीकृत राजभाषा हिंदी से उन्हें समस्या हो जाती है। प्रश्न यह है कि यदि इन गैर-हिंदीभाषी क्षेत्रों के लोग अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी को अपना सकते हैं, तो हिंदी को अपनाने में उन्हें दिक्कत क्या है? कहना न होगा कि हिंदी को लेकर देश के इन प्रदेशों का विरोध तार्किक कम, पूर्वाग्रह प्रेरित अधिक है। सीधे शब्दों में कहें तो ये अनुचित हठधर्मिता है, जिसने आज से पांच दशक पहले हिंसक आंदोलन का रूप ले लिया था। दरअसल, तत्कालीन सरकार ने तब उस हिंदी विरोधी आंदोलन के आगे झुक कर बड़ी भूल की थी, जिसके फलस्वरूप आज दक्षिण का हिंदी विरोध इतना बढ़ गया है कि इस भाषा को लेकर एक छोटी-सी राष्ट्रव्यापी पहल भी उसे स्वीकार नहीं होती।
 
यहां यह कहना उल्लेखनीय होगा कि हिंदी की महत्ता की बात करने का कतई यह अर्थ नहीं है कि अन्य भारतीय भाषाओं को कमतर समझा जा रहा है। निस्संदेह कोई भी भारतीय भाषा हिंदी से कम नहीं है। सबका बराबर स्थान है। लेकिन, राष्ट्र को एकसूत्र में पिरोए रखने और संस्कृतियों का संवहन करने की सामर्थ्य यदि किसी भाषा में है, तो वह हिंदी में ही है। हिंदी ही ऐसी भाषा है, जो अंग्रेजी का मुकाबला कर देश के अंग्रेजीकरण को रोक सकती है। कोई अन्य भारतीय भाषा फिलहाल अंग्रेजी का मुकाबला कर पाने की स्थिति में नजर नहीं आती। उदाहरणस्वरूप हिंदी का विरोध करने वाले तमिलनाडु का उल्लेख करें तो उसने हिंदी को स्वीकार नहीं किया, फलस्वरूप आज उसकी अपनी क्षेत्रीय भाषा के साथ अंग्रेजी का पूर्ण वर्चस्व है, बल्कि अंग्रेजी अधिक ही है।
 
इसी क्रम में विचार करें तो आज हिंदी के लिए जितनी भी चुनौतियां आ रही हैं, इनके लिए कहीं न कहीं स्वतंत्रता के पश्चात् के हमारे नीति-नियंताओं की ऐतिहासिक भूलें जिम्मेदार हैं। अंग्रेजी आज हिंदी के लिए सबसे बड़ा संकट बन चुकी है। हर मोर्चे पर हिंदी को अपने अस्तित्व के लिए अंग्रेजी से संघर्ष और समझौता करना पड़ रहा है। रोजगार के क्षेत्र में तो अंग्रेजी का लगभग एकछत्र राज कायम हो ही चुका है, अब धीरे-धीरे वह आम बोलचाल में हिंदी का जो संप्रभु अस्तित्व था, उसे भी चुनौती देने लगी है। इसी का परिणाम है कि आज हिंग्लिश के रूप में एक कथित भाषा चलन में आ गई है। इस स्थिति के लिए सबसे ज्यादा दोषी आजादी के बाद अंग्रेजी को हिंदी के बराबर रूप में स्वीकारते जाने की हमारी अनावश्यक उदारता है। तब हमने अंग्रेजी को राजकाज की भाषा के रूप में सिर्फ दशक भर के लिए रखा था कि धीरे-धीरे हिंदी के चलन में आ जाने के बाद इसे हटा दिया जाएगा, लेकिन ऐसा आज तक नहीं हो सका। इस तरह मैकाले ने अंग्रेजी के जरिए भारतीयता को मिटाने का जो तरीका रखा था, उसका अनुसरण आजाद भारत की सरकारें भी करने लगीं।
 
आज इस देश में अंग्रेजी सिर्फ एक भाषाभर नहीं रह गई है, बल्कि उच्चता- बोध का साधन और प्रतीक बन गई है। लोगों में अंग्रेजी को लेकर यह अवधारणा गहराई तक पैठ चुकी है कि अंग्रेजी जानना विशिष्टता का चिह्न है। यहां तक कि किसी व्यक्ति के विविध विषयों के ज्ञान से अधिक महत्व उसके अंग्रेजी ज्ञान का है। ज्यादातर लोग इस मानसिकता से ग्रस्त हैं कि अंग्रेजी का ज्ञान विद्वान होने का लक्षण है। ऐसे में, उन्हें यह बात समझाना मुश्किल है कि ब्रिटेन का एक अनपढ़ व्यक्ति भी अंग्रेजी में ही बात करता है। यानी कि अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा है, ज्ञान का आधार नहीं।
 
इस स्थिति के मद्देनजर आज हिंदी को बढ़ावा देने की जरूरत तो है ही, साथ ही इस अंग्रेजीदां मानसिकता को समाप्त करने की भी है। इसके लिए सबसे बेहतर रास्ता यही है कि देश में अंग्रेजी माध्यम शिक्षा को पूर्णत: समाप्त कर दिया जाए। और शिक्षा का माध्यम हिंदी समेत भारतीय भाषाएं हों। अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा के रूप में पढ़ाए जाने तक सीमित रहे, इससे अधिक कुछ नहीं। वास्तव में तो यह कार्य आजादी के तुरंत बाद ही कर लेना चाहिए था। गांधीजी भी यही चाहते थे। उनका कथन था, ''राष्ट्र के बालक अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं, तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूं।'' यह इस देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य रहा कि आजादी के छह महीने बाद ही गांधी की हत्या हो गई। यदि वे कुछ वर्ष भी जीवित रहते तो संभवत: आज हिंदी की यह दशा न होती।
 
मगर, तब नहीं हुआ तो न सही, अब इस तरह का कदम उठाने में सरकार को पीछे नहीं हटना चाहिए। इतना अवश्य है कि इससे अस्थायी तौर पर थोड़ी असुविधा हो सकती है। उच्च शिक्षा में विज्ञान आदि विषयों की अध्ययन सामग्री का हिंदी में अधिक न होना समस्या उत्पन्न करेगा, मगर अपने देश की भाषा के उत्थान और औपनिवेशिक भाषा के चंगुल से छूटने के लिए हमें इन समस्याओं से लड़ना ही होगा। हम थोड़ी-सी असुविधा के भय से हिंदी को इस तरह अंग्रेजी के समक्ष हाशिए पर जाते हुए नहीं छोड़ सकते। वैसे भी ये समस्याएं कोई बहुत बड़ी नहीं हैं। हिंदी में अनुपलब्ध पठन सामग्री का अनुवाद कराकर धीरे-धीरे इस प्रकार की समस्याओं को समाप्त किया जा सकता है।
 
हिंदी के उत्थान और अंग्रेजीदां मानसिकता के उन्मूलन के लिए सरकार को इस तरह के कदम उठाने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी, अन्यथा देश में व्याप रही अंग्रेजीदां मानसिकता हिंदी को धीरे-धीरे निगल जाएगी। स्मरण रहे, अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ एक भाषा पर संकट नहीं होगा, बल्कि इस देश की सांस्कृतिक विरासत पर भी कुठाराघात होगा।