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गुरुवार, 2 जुलाई 2020

हिंदी भाषी राज्य में हिंदी की दुर्दशा (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश में हिंदी को लेकर चलने वाली समकालीन चर्चाओं में मोटे तौर पर दो पक्ष दिखाई देते हैं। एक, जो यह मानता है कि देश में हिंदी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, क्योंकि उसे देश के अहिंदीभाषी राज्यों में पहुंचाने के लिए कुछ भी ठोस नहीं किया जा रहा। दूसरा पक्ष मानता है कि देश में हिंदी की हालत बेहतर हो रही है और अब वो दुनिया में भी अपनी धमक बढ़ाने लगी है। परन्तु, इस भाषाई विमर्श की परिधि से बाहर हिंदी की जो जमीनी स्थिति है, वो उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्य की बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में गत वर्ष भी सामने आई थी और अबकी भी आई है। बीते वर्ष राज्य की दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में लगभग दस लाख बच्चे हिंदी में अनुत्तीर्ण हो गए थे, तो माना गया कि इस वर्ष यह हो गया होगा, आगे स्थिति सुधर जाएगी। परन्तु, इसबार अभी जब परीक्षा परिणाम आए तो यह आंकड़ा जरा-सी कमी के साथ आठ लाख के करीब सामने आया। आंकड़ों में कमी को लेकर कुछ लोग यह कह सकते हैं कि स्थिति में सुधार तो आया है, परन्तु प्रश्न ये है कि देश के सबसे बड़े हिंदी भाषी राज्य में हिंदी को लेकर यह स्थिति पैदा ही क्यों हुई?  
अतः हिंदी पर होने वाली चर्चाओं में बात अहिंदीभाषी राज्यों में हिंदी के प्रसार या हिंदी की वैश्विक धमक से पहले इस बिंदु पर होनी चाहिए कि एक हिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी की शैक्षिक स्थिति ऐसी क्यों हो गयी है? हिंदी का कायाकल्प करने वाले युगांतकारी लेखक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, कथा-सम्राट प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, हरिवंश राय बच्चन जैसे हिंदी साहित्य के अनेक महान हस्ताक्षरों की जन्मभूमि यूपी में इस तरह लाखों की तादाद में छात्रों का हिंदी की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाना, निश्चित रूप से अपनी भाषा के प्रति हमारी निष्ठा और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

दरअसल हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी विषय को लेकर अभिभावकों और अध्यापकों से होते हुए छात्रों तक में यह मानसिकता गहरे पैठी हुई है कि ये आसान विषय है और इसके अध्ययन में बहुत अधिक समय व श्रम खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। इस मानसिकता के कारण न तो अध्यापक ढंग से हिंदी पढ़ाने में ध्यान देते हैं और न अभिभावक ही बच्चों को इसपर ध्यान देने के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि कोई बच्चा यदि हिंदी में अधिक रुचि ले रहा हो तो उसे अभिभावकों से हिंदी की बजाय गणित आदि विषयों के जरूरी होने और उनपर जोर लगाने की नसीहत मिल जाती है।
हिंदी विषय पर ध्यान न देने के कारण छात्र इसके अध्ययन को लेकर कोई रणनीति नहीं बना पाते। हिंदी में साहित्यिक पाठ के अलावा व्याकरण का भी एक भाग होता है, लेकिन परीक्षा के समय जल्दबाजी में छात्र अक्सर साहित्यिक पाठों के तो प्रश्नोत्तर रटकर काम चला लेते हैं, मगर व्याकरण वाले हिस्से को यथोचित समय देकर समझ नहीं पाते। हिंदी व्याकरण को लेकर छात्रों के अज्ञान और अगम्भीरता का आलम यह है कि बहुतायत छात्रों को नाउन-प्रोनाउनतो पता होता है, मगर संज्ञा-सर्वनामपूछने पर बगले झाँकने लगते हैं। यही छात्र जब आगे विश्वविद्यालयी अध्ययन में पहुँचते हैं, तो वहां भी यह भाषाई अज्ञान उनके साथ बना रहता है। ‘की’ और ‘कि’ का भेद न होना, अनुस्वार के उपयोग में नासमझी, अल्पविराम और पूर्णविराम के दोष सहित वाक्य-विन्यास की समस्याएँ तक ऐसे छात्रों की लेखनी में प्रायः दृष्टिगत होती हैं। इस पूरी समस्या के मूल में हिंदी भाषा के प्रति छात्र के घर से विद्यालय तक व्याप्त अगंभीरता ही कारण है और इस अगंभीरता के पीछे अंग्रेजी माध्यम शिक्षा का बड़ा हाथ है, जिसमें सिवाय हिंदी किताब के बाकी पूरी पाठ्यसामग्री अंग्रेजी में होती है। इस स्थिति में हिंदी का हाशिये की भाषा बनकर रह जाना स्वाभाविक है।
यहाँ महात्मा गांधी का उल्लेख समीचीन होगा। गांधीजी कितने उदार थे, यह कहने की जरूरत नहीं, परंतु भाषा के मामले में वे अंग्रेजी के प्रति किसी प्रकार की उदारता के पक्ष में नहीं थे। हिन्द स्वराज में उन्होंने लिखा, करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली, वह सचमुच गुलामी की नींव थी।अंग्रेजी शिक्षण स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है।‘ इस गुलामी से मुक्ति के लिए गांधी का मत था कि भारतीय भाषाओं को चमकाना चाहिए और हिंदी तो सबको आनी चाहिए। गांधीजी यह बात उस दौर में कह रहे थे, जब देश में विदेशी शासन था, परन्तु स्वशासन स्थापित होने के बाद भी हमने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि आज अच्छी पढ़ाई का मतलब अंग्रेजी माना जा चुका है। देश में अंग्रेजी का प्रभाव ऐसा हो गया है कि कोई साधारण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी अंग्रेजी में चार बातें बोलकर लोगों के बीच अपना एक अलग औरा बना लेता है जबकि हिंदी बोलने वाले ज्ञानी व्यक्ति को भी वैसा महत्व नहीं मिलता। यह एक विदेशी भाषा की मानसिक गुलामी के अतिरिक्त और क्या है?
सवाल उठता है कि एक हिंदी भाषी देश में हिंदी में ही हर विषय की शिक्षा क्यों नहीं प्राप्त की जा सकती? तर्क दिया जाता है कि विज्ञान और अभियांत्रिकी जैसे विषयों के अध्ययन के लिए अधिकांश सामग्री अंग्रेजी में ही उपलब्ध है, इसलिए अंग्रेजी आवश्यक है। ऐसे में, सवाल उठता है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी उस सामग्री का हिंदी रूपांतरण क्यों नहीं किया जा सका? जाहिर है, इस दिशा में काम करने की इच्छाशक्ति ही हमारी सरकारों में नहीं है। ऊपर से शुरू हुई ये समस्या ही नीचे तक पहुंचकर यह स्थिति उत्पन्न कर रही है कि एक हिंदी भाषी राज्य में ही लाखों की संख्या में छात्र हिंदी में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल पर नकेल कब [राज एक्सप्रेस और दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण) में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
अभी देश में बोर्ड परीक्षाओं का मौसम है। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां समाप्त होने के साथ ही बोर्ड परीक्षाएं शुरू हो गयी हैं। इसबार की परीक्षा में हाईस्कूल और इंटर के तकरीबन ६० लाख विद्यार्थी भाग ले रहे हैं।   लेकिन, हर वर्ष की तरह ही इस वर्ष भी बोर्ड परीक्षाओं में जिस बात को लेकर सर्वाधिक चर्चा है, वो है इनमे होने वाली नक़ल। प्रत्येक वर्ष राज्य सरकारों और राज्य के शिक्षा बोर्ड द्वारा यह कहा जाता है कि वो नक़ल रहित और प्रमाणिक परीक्षा करवाने के लिए पूरी व्यवस्था करेंगे लेकिन, उनकी ये व्यवस्था सिर्फ ढांक के तीन पात ही साबित होती है। नक़ल कभी नहीं रूकती। इस साल भी बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल को लेकर कई तस्वीरें सामने आई हैं। यूपी में परीक्षा केन्द्रों में कहीं दीवारों पर चढ़कर तो कहीं खिडकियों आदि के जरिये नक़ल कराते तो कई एक परीक्षा केन्द्रों पर खुलेआम छात्र-छात्राओं द्वारा किताब से देखकर नक़ल करने की तस्वीरें भी सामने आई हैं। गौरतलब है कि गत वर्ष भी यूपी में नक़ल की ऐसी ही स्थिति सामने आई थी। बिहार की बात करें तो वो तो खैर नक़ल के लिए बदनाम ही रहा है। वर्ष २०१५ में बिहार में दसवीं की बोर्ड परीक्षा में नक़ल का ऐसा हल्ला मचा कि वहां के तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने यह तक कह दिया कि नक़ल रोकना उनके बस की बात नहीं, जिसपर उन्हें उच्च न्यायालय से फटकार भी सुननी पड़ी थी।

ऐसा नहीं है कि ये नक़ल विद्यार्थी अपने घर से छिप-छिपा के करते हैं, अधिकांश नकलची विद्यार्थियों के परिवाजनों का भी इसमे समर्थन सहयोग होता है। अब जब अभिभावकों को ही नक़ल से कोई गुरेज नहीं तो समझा जा सकता है कि स्थिति कितनी ख़राब है। कितने विद्यार्थियों के परिवारजन तो उनका दाखिला ही यही देखकर कराते हैं कि अमुक विद्यालय में नक़ल आदि की व्यवस्था है या नहीं। परीक्षा के समय जब परीक्षा केंद्र का नाम सामने आता है तो नकलची इस फिराक में लग जाते हैं कि परीक्षा केंद्र जिस  विद्यालय में है, वहां कोई पहचान निकल जाए या नक़ल की कोई व्यवस्था हो जाय। लड़कियों को तो अब यह भी चिंता नहीं रहती, क्योंकि यूपी बोर्ड में उनके लिए स्वकेंद्र (होम सेंटर) का नियम लागू है।

राज एक्सप्रेस
वैसे नक़ल की इस तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि विद्यार्थियों की नक़ल की आवश्यकता को देखते हुए परीक्षा केन्द्रों में नक़ल के लिए पूरा एक तंत्र बना पड़ा है। ये कहना एकदम समीचीन होगा कि परीक्षा कक्षों के भीतर नक़ल का एक पूरा बाजार ही चलता है, जहाँ विषयवार नक़ल की कीमत तय होती है, मोल-भाव होता है और परीक्षार्थी के रूप में खरीददार होते हैं। अन्दर की स्थिति कुछ यूँ होती है कि परीक्षा शुरू होने से पहले विद्यालय उच्च अधिकारियों द्वारा विद्यार्थियों को विषयों की कठिनतानुसार सुविधा शुल्क से अवगत करा दिया जाता है। सुविधा शुल्क अदा कर देने वाले विद्यार्थियों के लिए नक़ल पर्चियों से लेकर अध्यापकों की मौखिक सहायता तक सब उपलब्ध रहता है।  इस प्रकार तमाम व्यवस्थाओं के जरिये नक़ल प्रक्रिया होती है। ऐसे में यदि बोर्ड से किसी जांच अधिकारी के केंद्र पर आने की सूचना मिले तो   फिर तो परीक्षा कक्ष में ऐसी भगदड़ मचती है कि जैसे ये परीक्षा कक्ष नहीं, कोई युद्ध का मैदान हो। जिन परीक्षार्थियों के पास नक़ल की पर्चियां आदि होती हैं, वे उन्हें अध्यापकों के पूर्व निर्देशानुसार मुहँ के हवाले कर लेते हैं। कुछ इधर-उधर फेंक देते हैं। कुल मिलाकर जांच अधिकारी के आने तक परीक्षा कक्ष की स्थिति ऐसी हो जाती है, जैसे इससे अधिक सभ्य तो कोई परीक्षा कक्ष होंगे और ही परीक्षार्थी। और जांच अधिकारी के जाने के बाद जैसे ही अध्यापक संकेत देते हैं, वैसे ही पुनः नक़ल-नारायण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इन सब वितंडों के दौरान सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि जो कुछ एक काबिल और परिश्रम  से पढ़े हुए परीक्षार्थी होते हैं, वे भी परिक्षायोग्य वातावरण के अभाव में ठीक ढंग से परीक्षा नहीं दे पाते। यह स्थिति केवल शर्मनाक और चिंताजनक है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के सम्बन्ध में भयभीत भी करती है।  
दैनिक जागरण

नक़ल की इस समस्या का सबसे बड़ा कारण तो खैर विद्यार्थियों में मौजूद वह मानसिकता है, जो उन्हें परिश्रम से बचने या शॉर्टकट से सफलता पाने के अनुचित सिद्धांत का रास्ता दिखाती है। लेकिन इसके बावजूद सब दोष विद्यार्थियों को नहीं दे सकते। कारण कि हमारे विद्यालय उनको उस स्तर की शिक्षा भी तो नहीं दे पाते कि वे बिना नक़ल के परीक्षा में बैठकर अच्छे से उत्तीर्ण हो सकें। अगर विद्यालय उन्हें समुचित ढंग से शिक्षा दे तो शायद उन्हें नक़ल की आवश्यकता ही महसूस हो। मूल बात जिम्मेदारी की है कि यदि विद्यालय, अभिभावक तदुपरांत विद्यार्थी सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारी को समझ लें तो नक़ल की यह समस्या स्वतः समाप्त हो जाएगी।   

संदेह नहीं कि  परीक्षाओं में नक़ल की इस समस्या से सर्वाधिक प्रभावित राज्य यूपी और बिहार हैं। मध्य प्रदेश भी अब धीरे-धीरे इस कतार में शामिल होता जा रहा है। यूपी-बिहार में तो आलम ये है कि इन राज्यों के नकलची विद्यार्थी इस आधार पर साल भर आश्वस्त रहते हैं कि पढ़ें या पढ़ें क्या फर्क पड़ता है! राज्य में फलां पार्टी की सरकार है, फिर उत्तीर्ण तो हो ही जाएंगे। वैसे, नकलचियों की इस सोच में काफी हद तक सच्चाई भी है क्योंकि, इन राज्यों की सरकारों द्वारा जब-तब बोर्ड परीक्षाओं में ढिलाई बरतते हुए नक़ल की छूट दे-देकर ही नकलची विद्यार्थियों के दिमाग में ऐसी सोच को स्थापित किया गया है। यहाँ तक कि राजनीतिक दलों का यह भी एक गुप्त चुनावी एजेंडा ही होता है कि हमारी सरकार आई तो नक़ल की छूट रहेगी। बेशक यह सवाल उठाया जा सकता है कि एक सरकार कैसे नक़ल जैसी चीज पर विराम लगा सकती है ? यह भी कहा जा सकता है कि नक़ल सरकार की कोशिश से नहीं, अभिभावकों और विद्यालयों की मजबूत इच्छाशक्ति से रुकेगी। यह बातें एक हद तक सही हैं, लेकिन हमें मानना होगा कि सरकार बहुत शक्तिशाली होती है। उसके पास शक्ति और संसाधन होते हैं और अगर वह ठान ले तो नक़ल पर भी नियंत्रण कर सकती है। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय होगा कि १९९२ में भाजपा की कल्याण सिंह सरकार द्वारा नक़ल को लेकर यूपी बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में बेहद कड़ाई दिखाई गई थी, जिसका परिणाम यह सामने आया था कि लड़का-लड़की मिलाकर केवल १४.७० प्रतिशत विद्यार्थी ही उस वर्ष परीक्षा में उत्तीर्ण हो सके। उस वर्ष के बाद अगले कई वर्षों तक वो कड़ाई जारी रही और उत्तीर्णता प्रतिशत का ग्राफ बहुत ऊपर नहीं उठ सका। कहने का अर्थ यही है कि सरकार चाहे तो नक़ल पर नियंत्रण कर सकती है, बशर्ते कि वो इस सम्बन्ध में दृढ इच्छाशक्ति का परिचय दे। नक़ल के सम्बन्ध में दंड के नियम कड़े किए जाएं जैसे कि नक़ल होते पाए जाने पर केवल विद्यार्थी बल्कि विद्यालय पर भी कड़ी कार्रवाई हो। हर जगह निगरानी की व्यवस्था रहे। निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरा आदि अत्याधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया जा सकता है। सरकार यदि करना चाहे तो ऐसे और भी बहुत से तरीके हैं, जिनसे नक़ल पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है। यूपी में अब नयी सरकार है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वो नक़ल को लेकर सख्त रुख अपनाएगी और इसपर अंकुश लगेगा।