राज एक्सप्रेस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राज एक्सप्रेस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

पीएनबी घोटाले से बढ़ेंगी बैंकों की मुश्किलें [हरिभूमि और राज एक्सप्रेस में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
अभी भारतीय बैंक जहां एक तरफ फँसे कर्ज (एनपीए) के बोझ से हलकान हैं और सरकार विशेष पैकेज का ऐलान कर उनकी सेहत सुधारने की कवायदों में लगी है, तभी पीएनबी जैसे देश के एक बड़े सरकारी बैंक में ११५०० करोड़ का अबतक का सबसे बड़ा बैंकिंग घोटाला सामने आना, बैंकों की मुश्किलों में वृद्धि ही करेगा। गत दिनों पीएनबी द्वारा इस बात की जानकारी सार्वजनिक की गयी कि उसकी मुंबई स्थिति एक शाखा में १.७७ अरब डॉलर का बड़ा घोटाला हुआ है। अगर इस घोटाले को समझने का प्रयत्न करें तो पीएनबी के  मुताबिक़ यह बैंकों द्वारा जारी किए जाने वाले गारंटी पत्रों (एलओयू) से सम्बंधित फर्जीवाड़े का मामला है। एलओयू बैंकों द्वारा अपने किसी निश्चित खाताधारक को प्रदान की जाने वाली एक विशेष गारंटी होती है, जिसके आधार पर वो किसी अन्य बैंक की शाखा से भी कर्ज प्राप्त कर सकता है। कर्ज लेने के बाद यदि वो व्यक्ति उसे नहीं चुकाता तो गारंटी देने वाले बैंक की जिम्मेदारी होती है कि वो अमुक बैंक का कर्ज चुकता करे। इस मामले में भी यही खेल हुआ है। पीएनबी के कुछ अंदरूनी लोगों की मिलीभगत से लगभग १५० गारंटी पत्र हासिल कर उसके द्वारा इलाहाबाद बैंक, यूनियन बैंक, एक्सिस बैंक आदि से कर्ज लिया गया है। इस घोटाले का मुख्य आरोपी आभूषण कारोबारी नीरव मोदी को बताया जा रहा है। दरअसल पिछले दिनों पीएनबी की ही तरफ से २८० करोड़ रूपये के फर्जीवाड़े का आरोप नीरव मोदी पर लगाया गया था, जिसके बाद सीबीआई ने इस मामले की जाँच शुरू की थी। इस जाँच के दौरान ही जब गारंटी पत्रों के इस घोटाले का खेल उजागर हुआ। नीरव मोदी के अलावा गीतांजलि, नक्षत्र और गिन्नी आदि आभूषण कम्पनियां भी संदेह के घेरे में हैं। अनुमान लगाए जा रहे हैं कि इन सबने पीएनबी की मुंबई शाखा के कर्मचारियों से साठ-गाँठ करके इस फर्जीवाड़े को अंजाम दिया है। इस फर्जीवाड़े का पता जनवरी महीने में तब चला जब पहले के गारंटी पत्रों की अवधि खत्म हो गई और भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं को कर्ज की रकम वापस नहीं मिली तो उन्होंने पीएनबी से संपर्क किया। मगर पीएनबी ने इसे सार्वजनिक अब जाके किया है।

इस सम्बन्ध में पीएनबी ने अपने दस कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है। हालांकि मुख्य आरोपी नीरव मोदी देश छोड़कर फरार हो गया है, जिससे फिलहाल उसके क़ानून की गिरफ्त में आने की संभावना न के बराबर ही है। लेकिन, संतोषजनक बात यह है कि नीरव मोदी के विभिन्न ठिकानों पर छापेमारी के दौरान प्रवर्तन निदेशालय ने 5,100 करोड़ के हीरे, आभूषण और सोना जब्त किया है। यह निस्संदेह एक अच्छा और सख्त कदम है। खैर, जांच एजेंसियां तो अपने काम में लगी हैं और उम्मीद है कि देर-सबेर दोषी सलाखों के पीछे पहुँच जाएंगे, मगर इस फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद बैंकों के समक्ष विश्वसनीयता का एक बड़ा संकट उपस्थित हो गया है।
गौर करें तो घोटाले की बात सामने आते ही पीएनबी के शेयरों की कीमत दस फीसद की गिरावट दर्ज की गयी। अन्य कई बैंकों के शेयरों ने भी जमीन का रुख किया। हालांकि वित्त मंत्रालय का कहना है कि ये ऐसा कोई बड़ा मामला नहीं है, जिसे काबू से बाहर बताया जाए। लेकिन, समझा जा सकता है कि वित्त मंत्रालय का यह बयान कहने की बात अधिक है। वास्तव में तो पहले से ही आर्थिक खींचतान से जूझ रहे भारतीय बैंकों पर इस फर्जीवाड़े से मुश्किलों के बादल और गहरे हो जाएंगे।

इस घोटाले के सबसे बड़े प्रभाव की बात करें तो आम लोगों में यह सन्देश जा सकता है कि बैंक पूंजीपतियों की हाथ की कठपुतली बन गए हैं और उनके इशारों पर काम करने लगे हैं। दूसरी चीज कि इस फर्जीवाड़े ने बैंकों में फैले भ्रष्टतंत्र को भी बड़े स्तर पर सामने लाने का काम किया है, ये भी भारतीय बैंकिंग प्रणाली के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। इन सब बातों का सम्मिलित परिणाम यह हो सकता है कि बैंकों के जो छोटे खाताधारक हैं, उनमें बैंकों के प्रति अविश्वसनीयता या अरुचि का भाव घर करने लगे। दरअसल ये आशंकाएं इसलिए इतनी प्रबल हैं क्योंकि आए दिन होने वाले छोटे-बड़े साइबर अटैकों, सामान्य फर्जीवाड़ों सहित बैंकों द्वारा बात-बेबात लगाए जाने वाले करों से आम आदमी के मन में बैंकों के प्रति पहले से ही काफी असुरक्षा और खीझ का भाव भरा हुआ है। साथ ही, बड़े पूंजीपतियों का कर्ज न वसूल पाने और आम लोगों से कर्ज वसूली के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ जाने की बैंकों की पुरानी प्रवृत्ति भी सामान्य जन में उनकी साख को काफी ख़राब कर चुकी है। इन सबके बाद अब इस तरह के घोटाले के सामने आने से बैंकों को लेकर लोगों के यह सोचने पर क्या आश्चर्य होगा कि बैंक धन्नासेठों के हितों के लिए समर्पित हैं। ध्यान रहे कि देश का आम आदमी किसी भी मामले के तकनीकी पक्षों में अधिक नहीं उलझता, उसका एक सीधा-सादा और जमीनी आकलन होता है, जिसके आधार पर वो अपनी राय बनाता है और इस मामले में आम जन की राय बैंकों के विरुद्ध बननी तय है। इससे बचना है तो एकमात्र उपाय है कि दोषियों को तो दण्डित किया ही जाए साथ ही साथ बैंक अपनी कार्यप्रणाली में भी इस ढंग से परिवर्तन करें कि एलओयू जैसी व्यवस्थाओं का कोई इस तरह से दुरूपयोग न कर सके। सरकार को भी इसमें आवश्यक हस्तक्षेप करना चाहिए। बैंकों की विश्वसनीयता और साख के लिए यह आवश्यक है।

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

निरर्थक विमर्शों का ठिकाना बनता सोशल मीडिया (अमर उजाला कॉम्पैक्ट और राज एक्सप्रेस में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत
वर्तमान समय तकनीक का है और सोशल मीडिया सम्प्रेषण तथा संचार का एक समुन्नत तकनीकी माध्यम है। सोशल मीडिया आज एक ऐसी शक्ति के रूप में मौजूद है, जिसके द्वारा पलक झपकते ही मात्र एक क्लिक के द्वारा व्यक्ति अपने विचारों को लाखों-करोड़ों लोगों तक न केवल पहुँचा सकता है, बल्कि तमाम प्रतिक्रियाएं भी प्राप्त कर सकता है। सम्प्रेषण और संचार की इस सहजता ने स्वाभाविक रूप से व्यक्ति में अभिव्यक्ति की भावना को प्रबल किया है। अब लोग फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम आदि इन विविध तकनीकी संचार माध्यमों के द्वारा अपने विचारों और भावों को खुलकर अभिव्यक्त करने लगे हैं। निस्संदेह यह एक अच्छी बात है और इसे सोशल मीडिया के एक सकारात्मक परिणाम के रूप में देखा जा सकता है। परन्तु, जैसा कि कहा जाता है, हर अच्छी चीज की कुछ बुराइयाँ भी होती हैं। अतः सोशल मीडिया पर अक्सर अभिव्यक्ति के अतिरेक में तमाम ऐसे निरर्थक विमर्श और वितंडे खड़े किए जाने लगे हैं, जो न केवल उसके वातावरण को खराब कर लोगों के मन में कुवृत्तियां जगाने वाले होते हैं, बल्कि कई बार तो राष्ट्र और समाज को क्षति पहुँचाने वाले भी हो जाते हैं।


इस सम्बन्ध में अगर कुछ मामलों पर दृष्टि डालें तो सबसे ताजा मामला फिल्म ‘पैडमैन’ का उल्लेखनीय होगा। बीते दिनों अभिनेता अक्षय कुमार ने अपनी फिल्म ‘पैडमैन’ का प्रचार करते हुए ट्विटर पर सेनिटरी नैपकिन के साथ अपनी फोटो साझा करते हुए कई और नामचीन लोगों को ऐसा करने के लिए चुनौती दी। इसके बाद तो ऐसा करने का सोशल मीडिया पर सिलसिला ही चल पड़ा। औरतों ने इसे ‘नारी मुक्ति’ का विमर्श बना दिया और देखते-देखते ट्विटर-फेसबुक सेनिटरी नैपकिन लिए हुए पुरुषों-महिलाओं की तस्वीरों से पट गए। इनमें महिला-पुरुष तथा ख़ास-आम सब तरह के लोग शामिल थे। हर कोई अपनी तस्वीर डालने तथा अक्षय की ही तर्ज पर अपने मित्रों को ऐसा करने की चुनौती देने लगा। कुछ लोगों ने इस प्रवृत्ति का विरोध भी किया, तो तमाम लोग इस भेड़चाल का हिस्सा बनते हुए भी नजर आए। कुल मिलाकर सोशल मीडिया पर सेनिटरी नैपकिन से सम्बंधित एक निरर्थक और अनुत्पादक विमर्श खड़ा हो गया। विमर्श के प्रश्न कुछ यूँ थे कि महिलाओं में माहवारी की प्राकृतिक प्रक्रिया के प्रति घृणित दृष्टि क्यों रखी जाती है, इसे छुपाया क्यों जाता है, सेनिटरी नैपकिन को छुपाकर क्यों खरीदा जाता है, पुरुष महिलाओं की इस समस्या को क्यों नहीं समझते आदि इत्यादि।

इस संदर्भ में गौर करें तो माहवारी में महिलाओं से निकसित रक्त, बिलकुल वैसा ही अपशिष्ट उत्सर्जन होता है, जैसा कि मल-मूत्र का उत्सर्जन होता है। ऐसे में, सैनिटरी नैपकिन के विमर्शकारों को बताना चाहिए कि क्या वे मल-मूत्र के लिए ढोल पीटकर जाते हैं। क्या पुरुष को महिलाओं के समक्ष और महिलाओं को पुरुषों के समक्ष अपने इस तरह के नित्यकर्म के लिए उद्घोषणा करके जाना चाहिए। गौर करें तो व्यक्ति यथासंभव प्रयास करता है कि नित्यकर्म से सम्बंधित इन क्रियाओं को किसी की जानकारी में आए बिना कर ले। बस यही स्थिति माहवारी को लेकर भी है। 


चूंकि, पुरुषों के साथ यह प्राकृतिक प्रक्रिया घटित नहीं होती, इसलिए महिलाएं उन्हें इस विषय में जानकारी नहीं होने देने का ही प्रयत्न करती हैं। ये उनकी निजता होती है, जिसका पुरुष भी सम्मान करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे पुरुषों को भी कुछ ऐसी एकदम अन्तरंग या निजी बीमारियाँ व परेशानियाँ होती हैं, जिन्हें वे महिलाओं से साझा नहीं करते वरन चुपचाप स्वयं ही उनका उपचार करा लेते हैं। यहाँ महिलाओं को भी प्रायः पुरुष की परेशानी का ज्ञान हो ही जाता है, पर बहुत आवश्यक न होने तक वे उनकी निजता का सम्मान करते हुए उसमे अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करतीं। हाँ, माहवारी के  सम्बन्ध में इतना अवश्य सही है कि अशिक्षित और ग्रामीण लोगों में इसे लेकर कुछ छुआछूत जैसी भावना रही है, मगर जैसे-जैसे लोग शिक्षित और जागरूक हो रहे हैं, इसका भी निर्मूलन होता जा रहा है। मगर, ऐसे विषय पर सोशल मीडिया पर विमर्श खड़ा कर देना, पूरी तरह से समझ से परे है।    

इस पूरे विमर्श से अगर किसीको कोई लाभ हुआ है, तो वो मात्र अक्षय कुमार और उनकी फिल्म को हुआ है। इन विमर्शकारों ने अक्षय की फिल्म ‘पैडमैन’ का मुफ्त में जमकर प्रचार कर दिया। इसी तरह बीते दिनों ‘पद्मावत’ फिल्म को लेकर भी स्थिति देखने को मिली। जमीन पर करणी सेना फिल्म को लेकर जितना शोर-शराबा मचा रही थी, उससे कम शोर सोशल मीडिया पर भी उसे लेकर नहीं था। इस पूरे विमर्श का परिणाम क्या निकला कि आखिर फिल्म प्रसारित होकर न केवल सफल रही, बल्कि जिस करणी सेना का पक्ष लेकर सोशल मीडिया के तमाम धुरंधर फिल्म का विरोध कर रहे थे, उस करणी सेना ने फिल्म को बेहतरीन करार दे दिया। निष्कर्ष यह कि जिस फिल्म का विरोध कर लोगों ने उसका भरपूर नकारात्मक प्रचार करने का ही काम किया।

कहने का आशय सिर्फ इतना है कि सोशल मीडिया धीरे-धीरे ऐसे ही कुछ फिजूल विमर्शों का ठिकाना बनता जा रहा है। कभी ये विमर्श सामाजिक होते हैं, कभी राजनीतिक तो कभी किसी अन्य विषय पर केन्द्रित होते हैं। किसी राजनेता ने कोई बयान दिया नहीं कि सोशल मीडिया के विमर्शकारों में उसपर प्रतिक्रिया देने की होड़ मच जाती है। अभी हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपने एक साक्षात्कार में रोजगार पर बोलते हुए पकौड़े वालों का जिक्र क्या किया गया कि सोशल मीडिया पर ‘पकौड़ा पॉलिटिक्स’ का विषय चल पड़ा। ऐसा नहीं कह रहे कि इन विषयों पर बात नहीं होनी चाहिए, मगर किसी विषय की गंभीरता और बारीकी को समझे बिना सिर्फ अभिव्यक्ति के नाम पर उसपर कुछ भी कह देना न केवल उस विषय के साथ अन्याय करना हुआ, बल्कि ऐसा करने वाला व्यक्ति स्वयं को भी धोखा देता है।

विचार करें तो दरअसल जब अभिव्यक्ति का अतिरेक होने लगता है, तो उसके आवेग में व्यक्ति की विवेकशक्ति बह जाती है। त्वरित प्रतिक्रिया देने और उसपर लोगों की राय पाने का आकर्षण जब व्यक्ति में अभिव्यक्ति का अतिरेक उत्पन्न कर देता है, तो वहीं से उपर्युक्त प्रकार के निरर्थक विमर्शों का जन्म होता है। सोशल मीडिया सम्प्रेषण का जितना सहज माध्यम है, उसकी संवेदनशीलता भी उतनी ही है। वहाँ अभिव्यक्त कोई भी अनुचित और गैरजिम्मेदाराना विचार किसी बड़े सामाजिक उत्पात और विद्वेष का कारण बन सकता है। अतः आवश्यक है कि इसके प्रति लोग अपनी जिम्मेदारी को समझें तथा सोशल मीडिया के एक जिम्मेदार सदस्य की तरह सोच-समझकर स्वयं को अभिव्यक्त करें। ये न केवल उनके लिए बल्कि समग्र समाज के लिए हितकारी और आवश्यक है।

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

केरल में भाजपा की बढ़ती धमक [राज एक्सप्रेस में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

केरल की राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा जनरक्षा यात्रा की शुरुआत के गहरे अर्थ हैं। दरअसल केरल में आजादी के बाद से ही संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं पर हमले होते रहे हैं, जिनमें अबतक तीन सौ के आसपास कार्यकर्ताओं की जान जा चुकी है। इनमें सर्वाधिक हत्याएं केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन के क्षेत्र कन्नूर में होने की बात भी कही जाती रही है। संघ-भाजपा द्वारा इन हत्याओं के लिए राज्य के वामपंथी संगठनों को जिम्मेदार ठहराया जाता है।

चूंकि, राज्य में भाजपा न तो कभी सत्ता में रही है और न ही उसका कोई ठोस राजनीतिक वजूद ही रहा है, ऐसे में उसके कार्यकर्ताओं की हत्या की जांच को यदि सत्ताधारी दलों द्वारा प्रभावित किया जाता हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भाजपा की तरफ से सत्ताधारी वामपंथी दलों पर ऐसे आरोप लगाए भी जाते रहे हैं। हालांकि केरल में सत्तारूढ़ वामपंथी मोर्चे का कहना है कि भाजपा-संघ के लोगों द्वारा उसके कार्यकर्ताओं की भी हत्या की गयी है। अब जो भी हो, मगर वस्तुस्थिति यही है कि केरल की राजनीतिक हिंसा को कभी मीडिया में उतनी चर्चा नहीं मिलती जितनी कि मिलनी चाहिए।

गौरी लंकेश, इखलाक आदि की हत्या पर देश भर में हंगामा मचा देने वाले असहिष्णुता विरोधी समूह की तरफ से भी इन हत्याओं पर खामोशी की चादर ओढ़ ली जाती है। इस स्थिति के मद्देनज़र ही भाजपाध्यक्ष अमित शाह द्वारा केरल की राजनीतिक हत्याओं के विरुद्ध जनरक्षा यात्रा का आरम्भ किया गया है, जिससे स्थानीय लोगों समेत समूचे देश का इस तरफ ध्यान आकर्षित किया जा सके। यात्रा के दूसरे दिन योगी आदित्यनाथ भी केरल पहुंचकर उसमें सम्मिलित हुए और उन्होंने इस्लामिक आतंक को संरक्षित करने का आरोप भी राज्य की वामपंथी सरकार पर लगाया। इधर पिछले दिनों अमित शाह ने दिल्ली में भी जनरक्षा यात्रा निकालकर देश में राजनीतिक हत्याओं के विरुद्ध एक माहौल बनाने की कोशिश की। 18 अक्टूबर तक चलने वाली इस यात्रा में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के सम्मिलित होने की योजना है।      

प्रश्न उठता है कि आखिर केरल, जहां भाजपा का कोई राजनीतिक वजूद नहीं रहा, में संघ-भाजपा के कार्यकर्ताओं की राजनीतिक हत्या क्यों की जा रही ? इस प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए हमें देश में वामपंथ की राजनीतिक स्थिति पर दृष्टि डालनी होगी। दरअसल ये वो वक्त है जब दुनिया में हाशिये पर जा चुका वामपंथ भारत में भी अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है। बंगाल में इनका कबका सफाया हो चुका है। अन्य किसी राज्य में वामपंथी दलों और नेताओं की कोई चर्चा तक नहीं होती। हालिया उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पहली बार भाकपा, माकपा और भाकपा (माले) ने विधानसभा चुनावों के लिए साझा प्रत्याशी उतारे। उन्होंने सौ सीटों पर कम से कम प्रति सीट 10 से 15 हजार वोट हासिल करने का लक्ष्य रखा। यही नहीं, इनके बेहतर प्रदर्शन करने के लिए वामदलों से सीताराम येचुरी, डी. राजा, वृंदा करात, दीपांकर भट्टाचार्य जैसे करीब 70 दिग्गज नेताओं ने प्रचार किया। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। आंकड़े बताते हैं कि करोड़ों की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में वामदल कुल मिलाकर 1 लाख 38 हजार 763 वोट ही हासिल कर सके। यह कुल मतों को .2 प्रतिशत होता है। वहीं नोटा के लिए प्रदेश की जनता ने 7 लाख 57 हजार 643 वोट दिए, यह करीब .9 फीसदी बैठता है। इन आंकड़ों से देश में वामपंथ की राजनीतिक बदहाली का अनुमान लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर वामपंथियों के पास फिलहाल केरल और त्रिपुरा सिर्फ ये दो राज्य बचे हैं। इनमें केरल में संघ ने धीरे-धीरे अपनी अच्छी पैठ स्थापित कर ली है। पिछले कई चुनावों के दौरान केरल और त्रिपुरा दोनों राज्यों में भाजपा के मत प्रतिशत में लगातार इजाफा देखने को मिला है। केरल में भाजपा का ये बढ़ता प्रभाव वाम दलों को बेहद खल रहा है, इस कारण राजनीतिक हिंसा का उनका स्वभाव अब और उग्र रूप में सामने आने लगा है। एक अनुमान के मुताबिक़ पी. विजयन द्वारा केरल की सत्ता संभालने के बाद से अबतक औसतन हर पच्चीस दिन पर एक संघ या भाजपा के कार्यकर्ता की हत्या हुई है।

अब जनरक्षा यात्रा के जरिये भाजपा ने राज्य में अपनी बढ़ती धमक की एक बानगी भी दिखा दी है। वामपंथी दल भले यह कहते रहें कि इस यात्रा का कोई असर नहीं पड़ेगा, मगर वास्तविकता यही है कि ये केरल में वामपंथी शासन के समक्ष भाजपा की चुनौती के एक आधिकारिक ऐलान की तरह है। यदि राजनीतिक हत्याओं का ये मुद्दा चल गया तो भाजपा केरल में सत्ता भले न पाए, मगर आधिकारिक रूप से विपक्ष की भूमिका में जरूर आ सकती है। केरल के अलावा अब भाजपा की नजरें आसन्न विधानसभा चुनाव में त्रिपुरा में अच्छा प्रदर्शन करने के साथ 2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्वोत्तर में 20-25 सीटें जीतने पर हैं। अगले वर्ष त्रिपुरा में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी भाजपा ने शुरू कर दी है। इसी कड़ी में पिछले दिनों अमित शाह वहां रैली कर चुके है। त्रिपुरा की कुल 38 लाख आबादी में 21 लाख मतदाता हैं। चार विधानसभा क्षेत्रो में कुल 2 लाख मतदाता मणिपुरी हैं। मणिपुर में भाजपा सत्ता हासिल कर चुकी है और भाजपा को इन पर काफी भरोसा है।
अब अपने आखिरी बचे इन गढ़ों में भाजपा की धमक से वामपंथी हुक्मरान अंदर ही अंदर सन्नाटे में हैं। उन्हें समझना चाहिए कि भाजपा यदि आज देश में भर में बेहतर प्रदर्शन कर रही है, तो इसके पीछे मुख्य कारण केंद्र और राज्यों में उसकी सरकारों का बेहतरीन प्रदर्शन तथा संगठन के रूप में जमीनी मेहनत है। सत्तारूढ़ दल होने के बावजूद भाजपाध्यक्ष अमित शाह लगातार कार्यकर्ताओं और जनता से संवाद कर रहे हैं। राष्ट्रव्यापी भ्रमण कर रहे हैं। ये भाजपा की विजय का कारण है। अगर वामपंथियों को भाजपा का मुकाबला करना है, तो उन्हें भी शासन और संगठन दोनों स्तरों पर जनता से जुड़ना चाहिए। लोकतंत्र का यही दस्तूर है। अब यदि वे राजनीतिक हिंसा से भाजपा को रोकने की कोशिश करेंगे तो भाजपा को तो रोक नहीं पाएंगे, मगर अपना बड़ा नुकसान अवश्य कर लेंगे।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

अप्रासंगिक होता जा रहा सेंसर बोर्ड [दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण), राज एक्सप्रेस और अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
भारतीय राजनीति के काले अध्याय आपातकाल पर आधारित मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदु सरकार’ की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रहीं। कांग्रेस द्वारा शुरू से ही इसका विरोध किया जा रहा है। अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देने वाली कांग्रेस देश में अभिव्यक्ति के सबसे बड़े हनन यानी आपातकाल पर बनी इस फिल्म के विरोध में लाव-लश्कर सहित उतर पड़ी है। यहाँ तक कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के आक्रामक विरोध के चलते मधुर भंडारकर को फिल्म का प्रचार टालना पड़ गया। लेकिन जब-तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर शोर मचाने वाले किसी पैरोकार की आवाज इस प्रकरण पर नहीं सुनाई दे रही।

दूसरी तरफ अब सेंसर बोर्ड ने भी इस फिल्म पर अपनी कैंची चलाने का संकेत दे दिया है। सेंसर बोर्ड द्वारा मधुर भंडारकर को फिल्म से १४ दृश्य हटाने को कहा गया है। इनमें फिल्म के कुछ संवाद तथा एक अखबार की प्रति शामिल है। इसपर मधुर भंडारकर का कहना है कि वे इसके खिलाफ समीक्षा समिति के पास जाएंग और उन्हें उम्मीद है कि वहाँ इन दृश्यों सहित फिल्म को मंज़ूरी मिल जाएगी। मधुर भंडारकर ने यह सवाल भी उठाया है कि जिन संवादों को ट्रेलर में रखने की अनुमति बोर्ड ने दे दी, अब उन्हें किस आधार पर फिल्म से हटाने को कह रहा है ? बेशक यह एक जायज सवाल है, जिसका जवाब बोर्ड को देना चाहिए।

अभी हाल ही में प्रकाश झा की ‘लिपस्टिक अंडर माय बुरका’ नामक एक फिल्म को लेकर भी सेंसर बोर्ड ऐसे ही विवादों में आया था। इसमें अश्लील दृश्यों और संवादों को लेकर सेंसर बोर्ड को आपत्ति थी। इस फिल्म पर बोर्ड ने प्रतिबन्ध लगा दिया था। मगर, फिल्म से जुड़े लोगों ने अदालतों में दौड़-भाग करके फिल्म पर से प्रतिबन्ध हटवाया और तब जाके इसकी रिलीज का रास्ता खुला। ऐसी ही अनेक फ़िल्में मिलेंगी जिनपर पहले सेंसर बोर्ड ने रोक-टोक की, विवाद मचा और अंततः निर्माता-निर्देशकों द्वारा उन्हें किन्ही अन्य माध्यमों से मंजूरी दिलवा ली गयी।  इस तरह अब धीरे-धीरे सेंसर बोर्ड और विवादों का साथ एकदम आम हो गया है। अब इसमें कुछ भी नया नहीं लगता।

दैनिक जागरण
गौर करें तो बोर्ड के निर्देशों का अनुपालन तो खैर फिल्म निर्माताओं द्वारा कम ही होता है, मगर उनपर मचे विवादों से फिल्मों को अनायास ही भरपूर प्रचार ज़रूर मिल जाता है। यानी कि सेंसर बोर्ड अब सिर्फ कहने भर के लिए एक फिल्म नियामक संस्था रह गया है, व्यावहारिक रूप से इसकी प्रासंगिकता दिन-प्रतिदिन समाप्त होती जा रही है। 

अतः ये स्पष्ट है कि सेंसर बोर्ड भले ही फिल्मों में कांट-छाट के निर्देशादेश देता रहे, मगर उसका फिल्मों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। बोर्ड द्वारा काट-छांट की शिकार फ़िल्में प्रायः अन्य माध्यमों से अनुमति प्राप्त कर बोर्ड को धता बताते हुए अपने मूल रूप में प्रसारित हो जा रही हैं। समझा जा सकता है कि सेंसर बोर्ड फिल्मों की सामग्री के नियमन को लेकर कितना लाचार हो चुका है। मगर बोर्ड की लाचारी इतनी भर ही नहीं है।

राज एक्सप्रेस
यहाँ उल्लेखनीय होगा कि ऐसी अनगिनत छोटी-बड़ी फ़िल्में हैं जो सीधे यूट्यूब और वहाँ से फेसबुक, ट्विटर आदि  सोशल माध्यमों पर आ जाती हैं, जिनकी सामग्री पर सेंसर बोर्ड का दूर-दूर तक कोई जोर नहीं है। जबकि वास्तव में जिस प्रकार के आअपत्तिजनक दृश्यों और संवादों की काट-छांट सेंसर बोर्ड मुख्यधारा की फिल्मों में करता है, उससे कहीं अधिक आपत्तिजनक सामग्री इन फिल्मों में होती है। यूट्यूब पर ऐसी लघु से लेकर बड़ी फिल्मों तक  की भरमार है, जो प्रमाणन के लिए किसी सेंसर बोर्ड या प्रसारण के लिए किसी सिनेमा घर में नहीं पहुँचती, मगर सोशल माध्यमों के ज़रिये लाखों-लाख दर्शकों तक कुछ ही समय में पहुँच जाती हैं। दिक्कत यह है कि ये फ़िल्में ऐसे माध्यम पर सवार हैं, जिसपर पूर्णतः नियंत्रण के लिए सेंसर बोर्ड के पास फिलहाल कोई पुख्ता तंत्र नहीं है। अब ऐसी स्थिति में सेंसर बोर्ड जैसी किसी संस्था की कितनी ज़रूरत रह गयी है, ये विचारणीय है।
अमर उजाला कॉम्पैक्ट

दूसरी चीज कि बोर्ड के प्रमाणपत्र भी सिवाय प्रतीकात्मकता के कुछ अधिक नहीं होते। क्या बोर्ड जिन फिल्मों को 'ए' प्रमाणपत्र देता है, उन्हें १८ वर्ष कम उम्र के बच्चे नहीं देखते ? माता-पिता भले से बच्चों को वे फ़िल्में दिखाने अपने साथ न ले जाएं, मगर इन्टरनेट आदि माध्यमों से वे उन फिल्मों को देखने में सक्षम हैं। ऐसे में, सेंसर बोर्ड के प्रमाणपत्र का क्या मतलब रह गया ?

उपर्युक्त बातों के आलोक में यह कहना गलत नहीं होगा कि सेंसर बोर्ड अब धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। कुछ अपने बेसिर-पैर की काट-छाँट के रवैये तो कुछ वर्तमान समय में सोशल मीडिया के बढ़ चुके प्रभाव के कारण सेंसर बोर्ड की कैंची की धार लगभग ख़त्म हो चुकी है। हालांकि बावजूद इस स्थिति के सेंसर बोर्ड को ख़त्म करने की बात नहीं की जा सकती, लेकिन ये समय की आवश्यकता है कि इसका पूरी तरह से कायाकल्प किया जाए। इसके स्वरूप और शक्तियों को समय की आवश्यकतानुरूप विस्तार दिया जाए, जिससे ये न केवल मुख्यधारा की फिल्मों बल्कि सोशल माध्यमों पर आने वाली फिल्मों की निगरानी भी कर सके।