शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

अच्छे दिन आने के संकेत [डीएनए]


  • पीयूष द्विवेदी भारत
डीएनए
मोदी सरकार जब सत्ता में आई थी तो उसकी सबसे बड़ी चुनौती बेलगाम हो रही खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने की थी. इस सरकार से आम लोगों की अपेक्षाएं भी यही थीं कि ये महंगाई को नियंत्रण में लाकर उन्हें कुछ राहत देगी. सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार की तरफ से जनता की इस उम्मीद को पूरा करने की दिशा में छोटे-मोटे प्रयास भी शुरू किए गए, पर तत्काल में उन प्रयासों का कोई ठोस प्रभाव दृष्टिगत नहीं हुआ. जिस कारण विपक्षी दलों द्वारा सरकार को तरह-तरह से कोसा जाने लगा. कांग्रेस आदि दलों की तरफ से कहा गया कि ये झूठे वादों की सरकार है जिसने जनता को धोखा दिया है. पर मोदी सरकार ने इन बातों पर बहुत ध्यान नहीं दिया और  महंगाई कम करने के लिए जमाखोरों की धर-पकड़, महँगी वस्तुओं के निर्यात में कमी, दैनिक जरूरत की वस्तुओं के दाम को नियंत्रित रखने के लिए विशेष फंड की व्यवस्था  समेत और भी तमाम प्रयास करती रही. जमाखोरों पर अंकुश से बाजार से खाने-पीने की वस्तुओं की किल्लत में कमी आई, जिससे कि उनके दाम बहुत ऊपर नहीं गए. मोदी सरकार के उन सभी  प्रयासों का परिणाम धीरे-धीरे अब लोगों के सामने आ रहा है जब महंगाई का स्तर नीचे हो रहा है. अभी सामने आए आंकड़ों के मुताबिक इस महीने खुदरा महंगाई दर पिछले ३३ महीनों के सबसे निचले स्तर ६.४६ प्रतिशत पर आ गई है. इसके अलावा थोक महंगाई दर में भी भारी गिरावट देखी जा रही है. इस महीने थोक महंगाई दर पिछले पांच सालों के सबसे निचले स्तर २.३८ प्रतिशत पर पहुँच गई है. स्पष्ट है कि मोदी सरकार द्वारा किए गए प्रयासों के परिणाम स्वरूप महंगाई दर में ये कमी दिख रही है. हालांकि इसका एक कारण यह भी है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटने से देश में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में काफी गिरावट आई है. इनकी कीमते कई दफे कम की गई हैं. डीजल की कीमत में तो रिकार्ड ३ रूपये से अधिक की कमी अभी की गई है. अब यातायात शुल्क के कारण पेट्रोल-डीजल की कीमतों का प्रभाव अन्य सभी चीजों की कीमतों पर भी पड़ता है, अतः जब इनकी कीमते कम हुई तो खाने-पीने की चीजों के दामों में भी गिरावट आई. अब यूँ तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर सरकार का कोई विशेष अधिकार नहीं होता, इनकी कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार भाव के हिसाब से तय होती हैं. इसबार भी कुछ ऐसा ही हुआ है. लेकिन, यहाँ सवाल ये उठता है कि पिछली संप्रग सरकार के समय में भी तो यही अंतर्राष्ट्रीय बाजार थे और भारत की तेल कम्पनियाँ भी यही थीं, फिर भी देश में डीजल-पेट्रोल की कीमतों में आए दिन इजाफा ही क्यों होते रहता था ? एक आंकड़े के अनुसार संप्रग-२ सरकार ने अपने पांच साल के शासनकाल में तकरीबन ५१ बार पेट्रोल तो ३३ बार डीजल की कीमतों में इजाफा किया. इसका परिणाम यह हुआ कि इन दोनों ही चीजों की कीमत क्रमशः ६२ और ६५ फिसद बढ़ गई. अगर इसमें संप्रग-१ के शासनकाल को भी जोड़ दें तो ये आंकड़े  सैकड़ा पार कर जाते हैं.  ऐसा कत्तई नहीं था कि संप्रग के समय में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी नहीं आती थी, पर समुचित देख-रेख व नियंत्रण न होने के अभाव में उस कमी का लाभ आम जनता तक पहुँचने की बजाय तेल कंपनियों व सरकार के नुमाइंदों की भेंट चढ़ जाता था. इन चीजों को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि भले ही डीजल-पेट्रोल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार से तय होती हों, पर अबकी मोदी सरकार के समुचित प्रबंधन के कारण ही उनका लाभ आम लोगों तक पहुँच पा रहा है.
    हालांकि एक बेहद गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि क्या महंगाई दर में कमी आने से बाजार में भी महंगाई कम होगी ? यह वाजिब सवाल है. क्योंकि, अक्सर होता ये है कि कागज़ में महंगाई  तो कम हो जाती है, पर चीजों के बाजार भाव में कोई गिरावट नहीं आती, जिससे आम जन को घटती महंगाई का कुछ भी लाभ नहीं मिल पाता. इसका मुख्य कारण होता है थोक व्यापारियों के अतिरिक्त मुनाफा कमाने की दुष्प्रवृत्ति.  होता ये है कि थोक महंगाई दर में कमी आने के बाद भी अधिकांश थोक व्यापारी खुदरा व्यापारियों को पुरानी व अधिक कीमतों पर ही चीजें देते हैं. विवशता में खुदरा व्यापारी भी उसी कीमत पर चीजे ले लेते हैं और फिर उसमे और बढ़ोत्तरी करके बाजार में बेचते हैं. परिणाम ये होता है कि महंगाई दर में कमी सिर्फ आंकड़ों में ही रह जाती है और जनता के बीच उसका पूरा लाभ नहीं पहुँच पाता. ऐसा नहीं है कि ऐसे  व्यापारियों पर अंकुश के लिए हमारे यहाँ कोई क़ानून नहीं है. इस सम्बन्ध में देश में ‘उपभोक्ता फोरम अधिनियम’ नामक क़ानून है, जिसके तहत देश के प्रत्येक जिले में ‘उपभोक्ता फोरम’ का गठन किया गया है. उपभोक्ता फोरम में किसी भी तरह की व्यापारिक धोखाधड़ी करने वाले व्यक्ति के खिलाफ शिकायत की जा सकती है. लेकिन, कुछ जागरूकता के अभाव में तो कुछ खुद भी अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में हमारे खुदरा व्यापारी थोक व्यापारियों की शिकायत नहीं करते हैं और इस कारण ये गोरखधंधा यथावत चलता रहता है. अतः स्पष्ट है कि इस समस्या के निवारण के लिए उपभोक्ता की जागरूकता ही पहली आवश्यकता है. इसके अलावा सरकार भी इस बात की निगरानी के लिए कोई व्यवस्था बनाए कि कागज़ में जो महंगाई कम हो रही है, क्या वो आम लोगों तक उसी रूप में पहुँच पा रही है.

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