रविवार, 12 अक्टूबर 2014

विधानसभा चुनावों के पूर्व संकेत [अप्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

महाराष्ट्र और हरियाणा, देश के इन दो सूबों में विधानसभा चुनावों की हलचल है. हर राजनीतिक दल अपनी जोर आजमाइश में लगा है. हर किसीकी यही कोशिश है कि मतदाता वर्ग को अधिक से अधिक अपनी तरफ मोड़ा जा सके. बात महाराष्ट्र  की करें तो इसबार यहाँ का चुनाव बेहद दिलचस्प रूप ले चुका है. अब से पहले तक तो महाराष्ट्र की लड़ाई मुख्यतः भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी गठबन्धनों के बीच अर्थात द्विध्रुवीय ही होती आई थी. लेकिन, इसबार संयोग ऐसा है कि महाराष्ट्र की राजनीति के ये दोनों ही गठबंधन सीटों को लेकर हुए मतभेद के कारण ख़त्म हो चुके हैं. इस नाते अब यहाँ लड़ाई राज ठाकरे की मनसे को लेकर पंचकोणीय  हो चुकी है. एक तरफ महाराष्ट्र की सत्ता पर पिछले १५ साल से कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार का कब्ज़ा रहा है, लेकिन अब जब यह गठबंधन टूट चुका है तो कांग्रेस या एनसीपी किसी के लिए भी सरकार लायक या उसके आसपास भी सीटें लाना कत्तई आसन नहीं दिख रहा. दूसरी तरफ ठीक यही हालत भाजपा और शिवसेना की भी है. अबतक दोनों साथ लड़ते थे तो भी सरकार बनाने जितनी सीटें लाने में पिछले विधानसभा चुनावों में असफल ही रहे थे, तो अब जब वे अकेले-अकेले लड़ रहे हैं तो ये मानना कठिन है कि उनमे से किसीको भी पूर्ण बहुमत मिलेगा. हाँ, इसबार अगर भाजपा-शिवसेना साथ लड़ते तो उनके सरकार बनाने की पूरी संभावना थी. क्योंकि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के लम्बे और उबाऊ शासन से ऊब चुकी महाराष्ट्र की जनता का मिजाज इस दफे शिवसेना-भाजपा गठबंधन को मौका देना का ही था, जिसका संकेत वहां की जनता द्वारा बीते लोकसभा चुनावों में शिवसेना-भाजपा को महाराष्ट्र में सर्वाधिक सीटें जिताकर दे भी दिया गया था. लेकिन, महत्वाकांक्षाओं की टकराहट के कारण अब जब ये गठबंधन नहीं रहा तो कहना कठिन है कि जनादेश क्या करवट लेगा. वैसे, गठबंधन टूटने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति के इन चारों प्रमुख दलों द्वारा पूरा जोर लगाया जा रहा है कि अकेले के दम पर ही सरकार बनाने जितनी सीटें आ जाएं. अब जहाँ भाजपा खुद पीएम मोदी से महाराष्ट्र में धुआंधार रैलियां करवा रही है, वहीँ उसकी पूर्व सहयोगी शिवसेना उसे कोसते हुए उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे के चेहरे के दम पर युवाओं को अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस भी महाराष्ट्र चुनाव की कसौटी पर एकबार फिर राहुल गांधी को आजमाने में लगी है, तो एनसीपी भी अपनी ताकत भर जोर लगा रही है. अब ये सभी दल पूर्ण बहुमत के लिए चाहें जितना जोर लगा लें, पर फ़िलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं दिखता जिसके आधार पर यह कहा जाय कि इस बार महाराष्ट्र में किसीको भी अकेले सरकार बनाने जितनी संख्या मिलेगी. खंडित जनादेश आना लगभग तय है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि फिर महाराष्ट्र में सरकार बनेगी कैसे ? उत्तर यही है कि चुनाव के बाद इन टूटे गठबंधनों में से जो भी सरकार बनाने की स्थिति में होंगे, वे पुनः एक होकर सरकार बना लेंगे. संभव है कि वो गठबंधन भाजपा-शिवसेना का ही होगा.

   इसी क्रम में अब अगर कुछ बात हरियाणा चुनाव की करें तो अबकी यहाँ मुकाबला त्रिकोणीय है. हालांकि बसपा, हजकां, वामदल आदि के रूप में कुछ नए खिलाड़ी भी मैदान में जरूर उतरे हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला कांग्रेस, भाजपा और इन्डियन नेशनल लोक दल के बीच ही रहने की संभावना है. सन १९६६ में पंजाब से टूटकर अलग अस्तित्व में आए हरियाणा में अबतक तो मुख्य मुकाबला कांग्रेस और आईएनएलडी के बीच ही रहा है, लेकिन ये पहली बार है जब भाजपा ने यहाँ की कुल ९० सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और इस मुकाबले में एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में नज़र आ रही है. न सिर्फ प्रबल प्रतिद्वंद्वी नज़र आ रही है, बल्कि उसकी जीत की संभावना भी सबसे अधिक दिख रही है. इसका कारण यह है कि हरियाणा के दोनों मजबूत दलों अर्थात कांग्रेस और आईएनएलडी की हालत फ़िलहाल काफी ख़राब ही चल रही है. कांग्रेस जहाँ सत्ता विरोधी रुझान और आतंरिक कलह से जूझ रही है तो वहीँ आईएनएलडी अपने शीर्ष नेता ओ पी चौटाला सजायाफ्ता होने के कारण दिक्कत में है. ऐसे में, स्पष्ट है कि भाजपा के लिए हरियाणा की राह कुछ बहुत मुश्किल नहीं रहने वाली. तिसपर भाजपा पीएम नरेंद्र मोदी के जरिये हरियाणा में माहौल बनाने की कोशिश में लग चुकी है. मोदी दनादन हरियाणा में रैलियां किए जा रहे हैं. इन बातों का निष्कर्ष ये है कि हरियाणा में इसबार जिन तीन दलों के बीच कड़े मुकाबले की संभावना है, उनमे सबसे अच्छी हालत में फ़िलहाल भाजपा ही दिख रही है. हाँ, बीते उपचुनावों में भाजपा के प्रदर्शन स्तर में आई गिरावट भाजपा के लिए चिंता का कारण जरूर है, लेकिन उन परिणामों का असर इन चुनावों पर रहेगा ऐसा नहीं लगता. वैसे, कहीं न कहीं इन राज्यों के चुनाव परिणामों के आधार पर ही भाजपा द्वारा दिल्ली के विषय में भी कुछ निर्णय लिया जाएगा कि दिल्ली में चुनाव में जाया जाय या जोड़-तोड़ की सरकार की कवायद की जाय. बहरहाल, अब जनता के मन में क्या छिपा है, इसका पता तो १९ अक्तूबर को मतगणना के बाद ही चलेगा और उसीके आधार पर आगे के समीकरण साफ़ होंगे. 

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