मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

सतर्कता के कारण कम हुई तबाही [अप्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

तूफ़ान से बचने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते लोग 
संभवतः मानव द्वारा प्रकृति के साथ की जा रही अनावश्यक छेड़-छाड़ से कुपित प्रकृति का कोप विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं के रूप में लगातार मानव को झेलना पड़ रहा है. अभी देश जम्मू-कश्मीर बाढ़ के कहर से ठीक से उबर भी नहीं पाया था कि तभी ओड़िसा और आंध्रा में ‘हुदहुद’ नामक ये तूफ़ान तबाही मचाने आ पहुँचा. २०० किमी प्रति घंटे के आसपास की रफ़्तार से ये तूफ़ान विशाखापत्तनम के तट से टकराया और अनेकों लोगों की हंसती-खेलती व वर्षों के परिश्रम से बसी-बसाई घर-गृहस्थी को उजाड़ गया. हालांकि अगले छः घंटे में तूफ़ान की रफ़्तार में कुछ कमी आ गई, पर फिर भी उसकी गति ऐसी थी कि वो तबाही के लिए काफी था. चूंकि, तूफ़ान एक प्राकृतिक आपदा है, अतः इसे रोका तो नहीं जा सकता. लेकिन, इस दौरान कोशिश यही होती है कि तूफ़ान में कम से कम क्षति हो. हुदहुद तूफ़ान की भयावहता के अनुसार देखें तो इस तूफ़ान जो अब काफी धीमा पड़ चुका है, से अबतक लोगों के जान की कोई बहुत क्षति हुई नहीं कही जा सकती. लोगों के घर-बार आदि अचल संपत्तियां जरूर तबाह हो गईं, पर छोटे से छोटे तूफ़ान के दौरान भी इन तबाहियों को रोकना संभव नहीं होता है. संभव इतना ही होता है कि लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाकर अधिक से अधिक संख्या में उनकी जान बचाई जाय और यही किया भी जाता है. इस तूफ़ान में अबतक कुल २४ लोगों के मरने की ही खबर है, जो कि इस २०० किमी प्रति घंटा की रफ़्तार के भयानक तूफ़ान के अनुसार कुछ भी अधिक नहीं कही जा सकती. ऐसा कत्तई नहीं है कि इस तूफ़ान में अधिक जानें न जाना यूँ ही संभव हो गया. ऐसा इसलिए हो सका कि हमारे मौसम विभाग ने न सिर्फ समय रहते इस तूफ़ान के विषय में सटीक भविष्यवाणी कर दी थी, बल्कि तूफ़ान के बढ़ने की दिशा आदि की भी जानकारी भी सरकार को उससे मिलती रही थी. पूर्व की कुछ प्राकृतिक आपदाओं में मौसम विभाग की चेतावनियों को अनदेखा करने या गंभीरता से न लेने के कारण ही सरकार द्वारा तमाम बचाए जा सकने वाले लोगों की जिंदगियां भी नहीं बचाई जा सकीं थी. अभी हाल ही की जम्मू-कश्मीर आपदा को ही देखें तो उसमे मौसम विभाग की तरफ से केंद्र व राज्य दोनों ही सरकारों को भारी बारिश की चेतावनी दी गई थी, पर शायद किसीने भी समय रहते उस चेतावनी पर बहुत गंभीरता से ध्यान नहीं दिया. परिणाम यह हुआ कि बहुत सी ऐसी जानें जो बच सकती थीं, नहीं बच पाईं. लेकिन, इस दफे मौसम विभाग ने हुदहुद के विषय में जो जानकारी  दी, उसपर केंद्र व राज्य दोनों ही सरकारें एकदम गंभीर रहीं. सही मायने में इन जानकारियों के लिए मौसम विभाग बधाई व धन्यवाद का पात्र है. बहरहाल, मौसम विभाग द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर ही केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा इस तूफ़ान से निपटने के लिए पहले ही से भरपूर तैयारी कर ली गई. एनडीआरएफ की कई टीमें ओडिसा और आंध्र में तैनात कर दी गईं, साथ ही तूफ़ान से काफी पहले ही लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया गया. एक आंकड़े के अनुसार करीब साढ़े तीन लाख लोगों जो इस तूफ़ान की चपेट में आ सकते थे, को ओड़िसा और आंध्र की सरकारों ने समय रहते ही सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया था. यही कारण रहा है कि हुदहुद जैसा बड़ा तूफ़ान अबतक २४  लोगों की जान ही ले पाया है. हालांकि अब ये तूफ़ान काफी हद तक शांत हो चुका है, पर बारिश का संकट अब भी बना हुआ है. ऐसा अंदेशा जताया जा रहा है कि भारी बारिश के चलते इससे प्रभावित  राज्यों के कुछ इलाकों में बाढ़ आ सकती है, जो कि एक अलग तबाही होगी. साथ ही, झारखंड, बिहार आदि राज्यों की तरफ भी इस तूफ़ान से पड़ने वाले प्रभावों पर नज़र रखी जा रही है. लेकिन, इन सब खतरों की जानकारी पहले से ही होने से केंद्र व राज्य सरकारें इन सभी चीजों पर पूरी तरह से चौकस हैं और हर स्थिति से निपटने के लिए एकदम तैयार भी.
तूफ़ान में लोग 
  हुदहुद तूफ़ान से लोगों की जानों को कोई विशेष क्षति भले न हो, लेकिन ढांचागत विनाश तो इसने भरपूर किया है. अभी जितनी जानकारी मिल रही है उसके अनुसार इस तूफ़ान ने मोबाइल टॉवरों व हवाई अड्डों को काफी क्षति पहुंचाई है. इसके अतिरिक्त और भी भारी तबाही इस तूफ़ान की वजह से हुई है, जिसका पता तूफ़ान के पूरी तरह से थमने के बाद ही पता चलेगा. अब आंध्रा के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू तो यह इच्छा तक जता दिए हैं कि हुदहुद को भी जम्मू-कश्मीर आपदा की ही तरह राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाय. साथ ही, उन्होंने केंद्र सरकार से इसके लिए दो हजार करोड़ के राहत पैकेज की मांग भी की है. इसमें तो कोई शक नहीं कि आन्ध्र और ओड़िसा दोनों ही राज्यों को केन्द्रीय मदद मिलनी चाहिए और मिलेगी भी. वहां अनगिनत लोग बेघर हो गए होंगे, जिनका पुनर्वास केंद्र व राज्य सरकार दोनों ही के लिए एक बड़ी चुनौती है. इसमें न सिर्फ मोटी रकम खर्च होगी, बल्कि और भी तमाम तरह की मुश्किलातें आएंगी. कहना गलत नहीं होगा कि अभी जम्मू-कश्मीर आपदा के विस्थापितों का पूरी तरह पुनर्वास हुआ नहीं, तभी हुदहुद जैसी इस आपदा का आ जाना कहीं न कहीं देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर ही डालेगा. पर विद्रूप यह है कि कोई चाहकर भी इन प्राकृतिक आपदाओं के विषय में सिवाय इनका सामना करने के कुछ नहीं कर सकता.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें