गुरुवार, 16 जून 2016

कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की गुत्थी [हरिभूमि में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

हरिभूमि 
गत वर्ष २०१४ में जब भाजपा की सरकार पहले केंद्र तथा उसके बाद जम्मू-कश्मीर चुनावोपरांत राज्य सरकार में भी सहयोगी भूमिका में आई तो लगभग ढाई दशक से विस्थापन का दंश झेल रहे कश्मीरी पंडितों के मन में उम्मीद जगी कि संभवतः अब उनका  पुनर्वास हो जाएगा। उन्हें लगा कि अब वे अपने उन पैतृक आवासों को पुनः प्राप्त कर सकेंगे जहाँ से उन्हें आज से ढाई दशक पहले समुदाय विशेष के तथाकथित झंडाबरदारों द्वारा  अपने मजहब की जाने किस हिफाजत के लिए आतंकित और प्रताड़ित करके खदेड़ दिया गया था। तबसे अपने पुनर्वास की आस में जी रहे इन कश्मीरी पंडितों के माँ खीरी भवानी दर्शन को जा रहे  एक काफिले पर विगत दिनों जिस तरह से ईंट-पत्थरों द्वारा हमला किया गया, उसने देश को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि वे कितनी क्रूर मानसिकता के मजहबी लोग हैं, जिन्हें इन हिन्दू पंडितों को वर्षों पहले विस्थापित और बर्बाद करने के बावजूद भी अबतक चैन नहीं मिला है ? इस संदर्भ में अगर  कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के इतिहास पर एक दृष्टि डालें तो आज से लगभग २६ वर्ष पहले सन १९९० में कश्मीर के मुसलमानों के साथ एकता और प्रेम से रहने वाले इन कश्मीरी पंडितों यानी हिन्दुओं पर समुदाय विशेष के रहनुमाओं का ऐसा कहर बरपा कि उन्होंने अपने मजहब की हिफाजत के नाम पर पाकिस्तान से प्रेरित होकर हिन्दू पंडितों को उनके ठिकानों से खदेड़ना आरम्भ कर दिया। इन पंडितों को चुन-चुनकर मारा गया। यहाँ तक कि कश्मीर दूरदर्शन के निदेशक लसा कौल, राजनीतिक कार्यकर्त्ता टीकालाल टप्लू, नर्स सरला भट्ट, जज नीलकंठ गुर्टू, साहित्यकार सर्वानन्द प्रेमी, बाल कृष्ण गंजू आदि दर्जनों बेकसूर पंडितों को भी तथाकथित इस्लामिक रहनुमाओं द्वारा बेरहमी से मौत के घाट उतार देने का मामला भी सामने आया। बताया जाता है कि उस समय कश्मीर की मस्जिदों की गुम्बदों पर लगे माइकों से अजान की बजाय हिन्दुओं के लिए  धमकी भरे संदेश प्रसारित होते रहते थे। उनके घरों की दीवारों पर सूचना चिपकाई जाती कि अपनी पत्नियों को छोड़कर यहाँ से भाग जाएं, अन्यथा मारे जाएंगे। उनके सामने ही उनकी पत्नियों से सामूहिक दुष्कर्म कर जिंदा जला दिया जाता और उनके बच्चों की निर्ममता से हत्या कर दी जाती। समझा जा सकता है कि ऐसी स्थिति में बेचारे शांतिप्रिय कश्मीरी पंडितों की क्या दशा हुई होगी और कितनी विवशता में उन्हें अपनी जान की सलामती के लिए अपनी जन्मभूमि को छोड़कर पलायन करना पड़ा होगा। एक आंकड़े के मुताबिक़ उस दौर में हजारों की संख्या में कश्मीरी पंडितों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और लगभग 3.5 लाख पंडित पलायन करने को विवश हुए। जब यह फसाद शुरू हुआ उस समय केंद्र में जनता दल की सरकार थी और राज्य में फारुक अब्दुल्ला सरकार के जाने के बाद राष्ट्रपति शासन लग गया था। जून १९९१ में जनता दल की सरकार चली गई और केंद्र में कांग्रेस की सरकार आई तथा नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। अब भी जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन यानी अप्रत्यक्ष रूप से केंद्र का शासन ही था। लेकिन, कश्मीरी पंडितों पर जुल्म होते रहे और उक्त किसी भी दौर की सरकार ने जाने किस कारण उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछ नहीं किया। ये असंवेदनशीलता सिर्फ सरकारी स्तर पर ही नहीं थी बल्कि आज कहीं किसी दादरी की झड़प में एक समुदाय विशेष के आदमी के मारे जाने पर अपने पुरस्कार वापस कर असहिष्णुता का विलाप करने वाले इस देश के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के कानों में भी तब हजारों-लाखों कश्मीरी पंडितों के चीत्कार के स्वर नहीं पड़े। ये बुद्धिजीवी वर्ग भी धरती का स्वर्ग कहीं जाने वाली घाटी के उस खुनी खेल पर पूरी संवेदनहीनता का परिचय देते हुए मूकदर्शक बना बैठा रहा। निष्कर्षतः देश की धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले सत्ता से लेकर समाज तक सबने तब उन कश्मीरी पंडितों पर मजहबी उन्माद के कारण हो रहे भीषण अत्याचार की तरफ से ऐसे आँखें मूँद ली थी, जैसे जम्मू-कश्मीर इस देश का अंग ही न हो। भारतीय सेना भी आदेश के अभाव में कुछ नहीं कर सकी। ऐसे में, उन हिन्दू पंडितों की बेबसी के आलम का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। पंडितों पर सन नब्बे में शुरू हुआ ये जुल्म अगले कई वर्षों तक चला और धीरे-धीरे घाटी इन कश्मीरी पंडितों से खाली हो गई। इनमे से तमाम पंडित वर्षों से सरकार की राहत शिविरों में इसी उम्मीद के साथ अपने दिन काट रहे हैं  कि कभी न कभी उन्हें अपने पैतृक आवास में लौटने का सुअवसर मिलेगा। हालांकि अबतक उन्हें केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक से वादों और दिलासों के अलावा और कुछ नहीं मिला है। ऐसे में, अब सवाल यह उठता है कि केंद्र की भाजपा सरकार जिसने अपने एजेंडे में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की बात कही है और इस सम्बन्ध में पैकेज का ऐलान भी कर चुकी है, के पास  कश्मीर के मौजूदा जमीनी हालात के मद्देनज़र अपने वादे को पूरा करने के लिए क्या योजना है ? 
हालांकि कश्मीरी पंडितों के मंदिर जा रहे काफिले पर हुए ताज़ा हमले के बाद जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने न केवल माँ खीरी भवानी मंदिर में जाकर पूजा की है, बल्कि यह सकारात्मक बयान भी दिया है कि कश्मीरी पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा है और उनके पुनर्वास के लिए पूरा प्रयास किया जा रहा है। अब महबूबा मुफ़्ती जैसी कट्टर इस्लामिक और अलगाववादी प्रेमी दल की नेता का ये धर्मनिरपेक्ष रवैया और बयान पहले पहल चौंकाता भले हो, लेकिन इसमे निहित राजनीतिक मजबूरी को समझने पर यह सब सामान्य ही लगता है। दरअसल कश्मीरी पंडितों के प्रति महबूबा मुफ़्ती की ये मधुर भाषा सिर्फ और सिर्फ इसलिए है कि उनकी सरकार  हिन्दुत्ववादी विचारधारा वाली भाजपा के दम पर चल रही है। बस इसी राजनीतिक मजबूरी से ये बयान उपजा है और अगर इस सम्बन्ध में महबूबा सरकार कुछ काम करेगी तो वो भी इस राजनीतिक मजबूरी के कारण ही होगा जिसका पूरा श्रेय भाजपा को ही जाएगा। ये भाजपा की बड़ी सफलता भी होगी। यह देखते हुए समझा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर चुनाव के बाद आखिर क्यों भाजपा ने सभी विरोधों और आरोपों को नज़रन्दाज कर पीडीपी संग न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत सरकार बनाने का निर्णय लिया था। मौजूदा राजनीतिक हालात भाजपा के उस निर्णय को सही साबित करते ही दिख रहे हैं। अगर भाजपा उसवक्त यह नहीं करती तो संभव था कि पुनः चुनाव की स्थिति में पीडीपी को पूर्ण बहुमत मिल जाता और फिर भाजपा के पास राज्य में कुछ शेष नहीं रह जाता। लेकिन, अभी वो राज्य सरकार के साथ सहयोगी भूमिका में है और उसकी इच्छा के विरुद्ध महबूबा मुफ़्ती कोई निर्णय नहीं ले सकती। तिसपर केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार है। ऐसे में, कहना गलत नहीं होगा कि गठबंधन में भाजपा की स्थिति अधिक मजबूत है और इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम की सरकार में अगर भाजपा अपने एजेंडे से दो कदम पीछे हटेगी तो महबूबा मुफ़्ती को चार कदम पीछे हटना पड़ेगा। ये स्थिति कश्मीरी पंडितों के लिए अच्छा संकेत तो है, लेकिन फिर भी उनका पुनर्वास अभी दूर की कौड़ी ही नज़र आता है। क्योंकि केंद्र सरकार पैकेजों के जरिये उन्हें भौतिक रूप से तो पुनर्वासित कर सकती है, लेकिन ठोस योजना और सुरक्षा सुनिश्चित किए बगैर कश्मीर के मौजूदा सामाजिक हालात में उनका ये पुनर्वास पुनः उन्हें आफत में डालने जैसा ही होगा। निश्चित ही सरकार का ध्यान इन पहलुओं पर भी होना चाहिए और होगा भी। सरकार इन सब गुत्थियों को सुलझाए बिना कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास पर आगे नहीं ही बढ़ेगी।

शुक्रवार, 10 जून 2016

अमेरिकी कांग्रेस को सशक्त भारत का संबोधन [राज एक्सप्रेस और दैनिक जागरण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

राज एक्सप्रेस 
इसमे  कोई संदेह नहीं कि दो वर्ष पूर्व मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से अबतक विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के सूझबूझ और कूटनीति से पूर्ण प्रयासों के मिश्रित फलस्वरूप भारतीय विदेश नीति को न केवल एक नई ऊँचाई और आयाम प्राप्त हुआ है बल्कि बतौर  वैश्विक  इकाई भारत की स्थिति भी विश्व पटल और अधिक मजबूत तथा मुखर हुई है। विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्व भर के तमाम छोटे-बड़े देशों की तमाम यात्राओं का  भारत की ये नवीन वैश्विक छवि गढ़ने में अत्यंत महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व योगदान रहा है। हालांकि वैश्विक महाशक्ति अमेरिका से तो भारत के सम्बन्ध संप्रग-१ के कार्यकाल के समय से ही एक हद तक गतिशील हो गए थे, लेकिन बावजूद इसके संप्रग के कार्यकाल के अंतिम वर्षों तक उनमे अस्थिरता की स्थिति ही मौजूद रही साथ ही तत्कालीन संबंधों में भारत  काफी हद तक   अमेरिका  के समक्ष याचक की भूमिका में ही रहा। लेकिन मोदी सरकार के इन दो वर्षों में इस वैश्विक महाशक्ति से भारत के सम्बन्ध एकदम नए रूप में उभरकर सामने आते दिख रहे हैं और इसका बड़ा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है, जिन्होंने अपने दो वर्षों के कार्यकाल में ही अमेरिका की चार यात्राएं की हैं। और ये यात्राएं पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह सिर्फ व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने या भारत को अमेरिकी सहायता दिलाने जैसी बातों पर आधारित नहीं रही, बल्कि प्रत्येक यात्रा का अपना एक अलग और ठोस महत्व रहा है। इसी तरह से उनकी इस वर्तमान अमेरिकी यात्रा  का भी अपना अलग महत्व और उद्देश्य है, इस यात्रा के दौरान उन्होंने अमेरिकी संसद को संबोधित भी किया, जिसमे उनके द्वारा भारत समेत समूचे विश्व की तमाम चुनौतियों और संभावनाओं तथा इनके बीच भारत-अमेरिका संबंधों के महत्व को बेहद तार्किक  ढंग से  रेखांकित किया गया।
दैनिक जागरण 
प्रधानमन्त्री मोदी ने अपने तकरीबन ४२ मिनट के संबोधन में २१वीं सदी को संभावनाओं और चुनौतियों की सदी बताया तथा यह आह्वान किया कि इस दौरान भारत-अमेरिका अपने संबंधों के इतिहास की कटुता को भुलाते हुए भविष्य की मजबूती के लिए साथ मिलकर कदम बढ़ाएं। उनकी इस बात में निहित उस ऐतिहासिक तथ्य को यहाँ रेखांकित करना आवश्यक है जिसमे कि एक समय तक अमेरिका द्वारा अक्सर भारत की उपेक्षा की जाती रही और पाकिस्तान को महत्व दिया जाता रहा, जिसका एक सशक्त प्रमाण यह भी है कि नेहरु से लेकर इंदिरा तक भारत के किसी भी प्रधानमन्त्री को अमेरिकी संसद में संबोधन करने का निमंत्रण अमेरिका ने नहीं दिया जबकि इसी कालावधि पाकिस्तान के कई प्रधानमंत्रियों को यह निमंत्रण मिला और उन्होंने अमेरिकी संसद को संबोधित भी किया। भारत की ऐतिहासिक उपेक्षा को  रेखांकित कर प्रधानमंत्री मोदी ने कहीं न कहीं अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका को उसकी इस ऐतिहासिक भूल का स्मरण भी दिलाया। प्रधानमंत्री मोदी के वक्तव्य की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह रही कि उन्होंने आतंकवाद को वर्तमान समय में विश्व की सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने आतंकवाद से लड़ाई में भारत और अमेरिका के सैनिकों की शहादत को स्मरण करते हुए पूरा जोर देकर यह भी रेखांकित किया कि भारत के तो  पड़ोस में ही आतंकवाद का परिपोषण हो रहा है, जिसको अमेरिकी संसद द्वारा न केवल कड़ा सन्देश दिया जाना चाहिए  बल्कि उसके विरुद्ध संघर्ष में अमेरिका और भारत को साथ-साथ लड़ना भी चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ प्रधानमंत्री मोदी ने  एकबार फिर अपने कूटनीतिक कौशल का परिचय देते हुए बिना नाम लिए पाकिस्तान को कड़ा सन्देश देने का काम किया। हम देख चुके हैं कि प्रधानमंत्री मोदी कभी भी इस तरह के किसी वैश्विक मंच से पाकिस्तान का नाम नहीं लेते, लेकिन इशारों-इशारों में ही उसे कड़ा सन्देश अवश्य दे देते हैं। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के बिंदु पर भी उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर भारत को यह सदस्यता मिलती है तो वैश्विक स्तर  पर उसका सहयोग और अधिक हो जाएगा, लेकिन इसके लिए विश्व के कुछ देशों को अपनी पिछड़ी सोच से आगे बढ़कर वर्तमान समय की सच्चाई को स्वीकारते हुए भारत की सदस्यता का समर्थन करना होगा। समझना सरल है कि यह उस चीन के लिए एक सन्देश था जो संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता की राह में सबसे बड़ा रोड़ा रहा है। साथ ही, इस कथन में कहीं न कहीं यह भी भाव निहित था कि भारत को यह सदस्यता मिलना सिर्फ भारत की ही आवश्यकता नहीं है, बल्कि विश्व समुदाय के लिए भी इसका बराबर महत्व है। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री मोदी  वक्तव्य में भारत और अमेरिका की विभूतियों का भी उचित और समयानुकूल स्मरण किया गया। उन्होंने अमेरिकी गांधी कहे जाने वाले मार्टिन लूथर किंग को महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत से प्रेरित बताया तथा कभी शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में सम्पूर्ण विश्व को भारत के सत्य सनातन धर्म के महत्व अनुगूंजित और आप्यायित करने वाले स्वामी विवेकानंद का भी उल्लेख किया। प्रधानमंत्री मोदी के इस पूरे संबोधन में कही गई इन सब बातों पर अमेरिकी संसद की गंभीरता और समर्थन को इसी बात से समझा जा सकता है कि इस संबोधन के दौरान अमेरिकी सांसदों ने नौ बार खड़े होकर ताली बजाई तो बैठे-बैठे सत्तर बार से भी अधिक तालियों की गूँज से अमेरिकी संसद गहगहा उठी। यह सही है कि मोदी अमेरिकी संसद को संबोधित करने वाले पांचवे भारतीय प्रधानमन्त्री हैं, इससे पहले राजीव गांधी, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह भी यह संबोधन कर चुके हैं। लेकिन, मोदी के वक्तव्य के दौरान अमेरिकी सांसदों की तालियों के रूप में उन्हें मिली प्रतिक्रिया निश्चित तौर पर अभूतपूर्व है। यह दिखाती है कि भारत अब पहले की तरह अमेरिका के समक्ष नज़रे झुकाए खड़ा याचक नहीं, नज़रें मिलाकर खड़ा होने वाला एक सहयोगी मित्र है। यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिका बिना लाभ के कुछ नहीं करता यानी यह सब स्वागत लाभ से प्रेरित है। निस्संदेह यह बात सत्य है और अमेरिका के इस रुख में कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि किसी भी सफल विदेशनीति का मूल तत्व ही राष्ट्रहित की प्रमुखता होती है। अब समझने वाली बात यह है कि अगर अमेरिका बिना लाभ के भारत से नहीं जुड़ रहा तो भारत भी उससे कोई निस्वार्थ प्रेम नहीं दिखा रहा है। अगर भारतीय बाजार अमेरिका की आवश्यकता है तो वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भारत को भी अमेरिका का सहयोग अपेक्षित है। अतः  यह स्वार्थ आधारित सम्बन्ध है और कहीं न कहीं यही इसकी सुदृढ़ता का आधार भी है। 

बुधवार, 18 मई 2016

बोतलबंद पानी पर लगे पूर्ण प्रतिबन्ध [जनसत्ता, सामना, हरिभूमि और दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

सामना 
देश में बोतलबंद पानी के नफा-नुकसान को लेकर बहस तो जब-तब होती ही रहती है, लेकिन अबकी केंद्र सरकार द्वारा सरकारी कार्यक्रमों में बोतलबंद पानी का उपयोग नहीं करने का निर्णय लेने से यह विषय फिर एकबार प्रासंगिक हो गया है। सरकार का कहना है कि बोतलबंद पानी से बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा निकलता है, जो कि पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके मद्देनज़र सरकार ने अपने मंत्रालयों, विभागों और सभी सार्वजनिक उपक्रमों में बोतलबंद पानी का उपयोग बंद करने का निर्णय लिया है। केन्द्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय द्वारा इस सम्बन्ध में पहल की गई है। साथ ही, केंद्र सरकार राज्य सरकारों से भी अपने यहाँ बोतलबंद पानी का उपयोग बंद करने का अनुरोध करने की बात कह रही है। केंद्र सरकार का मानना है कि उसके ऐसा करने से आम लोगों के बीच एक सन्देश जाएगा जिससे वे भी बोतलबंद पानी का उपयोग करने से परहेज करेंगे। समझना आसान है कि यहाँ मामला मुख्यतः उदाहरण प्रस्तुत करने का है। 
इसमे कोई संदेह नहीं कि सरकारी स्तर पर बोतलबंद पानी के उपयोग से परहेज करने का केंद्र सरकार का निर्णय एक अच्छी पहल है लेकिन, ऐसा करके वो यदि यह सोचती है कि आम लोग भी बोतलबंद पानी का उपयोग करना कम या बंद देंगे तो निश्चित ही ये उसकी बहुत बड़ी गलतफहमी है। ये वो दौर नहीं है जब नेताओं के आह्वान पर जनता उनका अनुसरण कर लेती थी। अब न तो वैसे नेता रहे हैं और न ही जनता। दूसरी बात यह भी है कि सरकार का कार्य उपदेश देकर और आदर्श प्रस्तुत कर देश-समाज का सुधार करना नहीं होता है, बल्कि उपयुक्त सुधार के लिए कायदे-क़ानून बनाकर उनका अनुपालन सुनिश्चित करवाना होता है। ऐसे में केंद्र सरकार यदि बोतलबंद पानी को हानिकारक मानती है और उसके उपयोग की रोकथाम के प्रति वास्तव में गंभीर है, तो उसे इसके उपयोग को सिर्फ सरकारी कार्यक्रमों में ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर  क़ानून लाकर प्रतिवंधित करना चाहिए।
दैनिक जागरण 
दरअसल बोतलबंद पानी हर तरह से सिर्फ हानिकारक है। यह प्लास्टिक कचरे के रूप में न केवल पर्यावरण को हानि पहुंचाता है, बल्कि कई एक परीक्षणों के अनुसार इस पानी के सेवन से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के एक शोध के मुताबिक़ भारत में मौजूद बोतलबंद पानी के अधिकांश ब्रांड स्वास्थ्य की दृष्टि से पूर्णतः सुरक्षित नहीं हैं। शोध में  कहा गया है कि देश के अधिकांश ब्रांडों के बोतलबंद पानी में उन खतरनाक कीटनाशकों की मिलावट पाई गई है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं और जिन्हें भारत सरकार द्वारा पहले से ही प्रतिबंधित किया जा चुका है। एक आंकड़े के मुताबिक़ देश की राजधानी दिल्ली के बोतलबंद पानी के ब्राण्ड्स में कीटनाशकों की निर्धारित मात्रा ०.०५ से ३६.४ फीसदी अधिक कीटनाशक पाए गए हैं तो आर्थिक राजधानी मुंबई में यह मात्रा तय सीमा से ७.२ फीसदी अधिक रही है। इसके अलावा नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल का अध्ययन है कि बोतलबंद पानी और साधारण पानी लगभग समान है। मिनरल वाटर के नाम पर बेचे जाने वाले बोतलबंद पानी के बोतलों को बनाने के दौरान एक खास किस्म के रसायन पैथलेट्स का प्रयोग  किया जाता है जो बोतलों को मुलायम बनाता है। यही रसायन सौंदर्य प्रसाधनों, इत्र, खिलौनों आदि के निर्माण में भी प्रयुक्त होता है। सामान्य से थोड़ा अधिक तापमान होते ही यह रसायन पानी में घुलने लगता है और हमारे शरीर में जाकर अनेक प्रकार के दुष्प्रभाव डालता है।  ऐसे रसायनों से बनी बोतल में बंद पानी जितना पुराना होता जाता है उसमें रसायन की मात्रा बढ़ने से उसका उपयोग करने वाले को जी मचलना, उल्टी और डायरिया की शिकायत हो सकती है।  ऐसे में, बोतलबंद पानी की कंपनियों द्वारा भले ही यह दावा किया जाता रहा हो कि उनका पानी स्वास्थ्य के लिए हर तरह से सुरक्षित है लेकिन, उपर्युक्त तथ्यों को देखने के बाद समझना आसान है कि वास्तविकता उनके दावे के एकदम विपरीत है। 
हरिभूमि 
गौर करें तो भारत में बोतलबंद पानी के कारोबार की शुरुआत १९९० के आखिर में हुई। तब बिसलेरी ने देश में पहली बार बोतलबंद पानी को बाजार में उतारा था। इसके साथ ही अंधाधुंध विज्ञापन चलाकर यह साबित करने की कोशिश की गई कि बोतलबंद पानी पूरी तरह से सुरक्षित है। दरअसल बोतलबंद पानी का कारोबार सस्ता और बेहद कम जोखिमवाला होता है, जिस कारण इसमे मोटा मुनाफा कमाने की भरपूर संभावना होती है, इसलिए इससे सम्बद्ध कम्पनियाँ हर हाल में इस कारोबार को बढ़ाना चाहती हैं। इसी कारण वे इसकी गुणवत्ता के सम्बन्ध में बढ़ा-चढ़ाकर दावे करती रहती हैं। अपने-अपने ब्रांड के प्रचार पर अच्छा-ख़ासा निवेश करती रहती हैं और उन्हें इसका लाभ भी मिलता  है, जिसका उदाहरण देश में बोतलबंद पानी के कारोबार की २२ फीसदी जैसी उच्चस्तरीय   वृद्धि दर है। आज देश में बोतलबंद पानी का कारोबार काफी तेजी से अपने पैर पसार रहा है। सन २०१३ में  इसका कारोबार लगभग ६० अरब रूपये का रहा और अनुमान व्यक्त किया जा रहा है कि २०१८ तक यह डेढ़ ख़रब से अधिक हो सकता है। आश्चर्य है कि हम मुफ्त पानी की बात तो करते हैं और सरकारों द्वारा इसका वादा किए जाने को मान भी लेते हैं, लेकिन बोतलबंद पानी के लिए पंद्रह से बीस रुपए चुकाते समय एक क्षण के लिए भी सोचते तक नहीं। क्या कभी किसी ने भारत में बोतलबंद पानी की मनमानी कीमत के विरोध में जन आंदोलन का समाचार सुना है? शायद नहीं। स्पष्ट है कि अन्य वस्तुओं के मूल्यों में मामूली वृद्धि तो हमें बेशक आंदोलित करती है, परंतु बोतलबंद पानी के अनियंत्रित दाम से हमें कोई शिकायत नहीं। समझना आसान है कि लोग बोतलबंद पानी की गुणवत्ता के भ्रमजाल में एकदम उलझे हुए से हैं, जिसका भरपूर लाभ इनसे सम्बंधित कंपनियों को मिल रहा है।   ऐसे में, वे कम्पनियाँ कभी नहीं चाहेंगी कि उनके इस कारोबार पर कोई लगाम लगे। लेकिन, पर्यावरण और जनता के स्वास्थ्य के लिए सरकार को तो इस सम्बन्ध में ठोस कदम उठाने ही चाहिए।  
जनसत्ता 
यह तो स्पष्ट है कि बोतलबंद पानी प्लास्टिक कचरे के रूप में पर्यावरण और पेय के रूप में व्यक्ति के स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है। ऐसे में, एक बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि सरकार अगर बोतलबंद पानी पर प्रतिबन्ध लगा देती है तो क्या उसके स्थान पर उपयोग करने के लिए सरकार के पास कोई बेहतर और हर तरह से सुरक्षित विकल्प है ? बिलकुल है और इससे कहीं बेहतर विकल्प है। ऐसा विकल्प जो न केवल हर तरह से सुरक्षित है बल्कि कई मायनों में लाभकारी भी है। सरकार पानी के पात्र के रूप में प्लास्टिक बोतल की जगह मिटटी के बर्तनों को उपयोग में लाने पर विचार कर सकती है। ये बर्तन मिटटी के होने के कारण न केवल पर्यावरण की दृष्टि से एकदम सुरक्षित हैं बल्कि इनको अपनाने से देश को आर्थिक दृष्टि से भी लाभ होगा। मिटटी के बर्तन प्लास्टिक की तरह नाशहीन नहीं होते, वे तो नष्ट होने पर मिटटी के मिटटी में मिल जाएंगे यानी इनसे कोई कचरा नहीं होगा और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। 
दरअसल मिटटी के बर्तन बनाना भारत का प्राचीन कुटीर उद्योग रहा है, जो अब मांग न के बराबर होने के कारण आज काफी हद तक शिथिल पड़ चुका है। अब यदि सरकार मिटटी के बर्तनों में पैक्ड पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था लागू कर दे तो उससे बोतलबंद पानी का एक देशी और सुरक्षित विकल्प तो मिल ही जाएगा, देश के मिटटी बर्तन के कुटीर उद्योग में नवीन प्राणशक्ति का संचार भी हो सकेगा। साथ ही, इससे सम्बंधित लोगों को रोजगार भी मिलेगा। निश्चित ही सुराही, छोटे आकार के मटके आदि मिटटी के बर्तनों में पानी उपलब्ध कराना बोतलबंद पानी से कई गुना बेहतर विकल्प होगा। कम्पनियाँ और ब्रांड जो हैं वही रहें, बस किया यह जाय कि वे बोतल की जगह मटके और सुराही में पैक्ड पानी को प्रयुक्त करें। सरकार को यह करना होगा कि मिटटी बर्तन के कुटीर उद्योग को आर्थिक व तकनिकी सहयोग देकर पुनर्स्थापित करे और फिर प्लास्टिक बोतल की जगह विकल्प के रूप में रखकर उसके लिए एक बड़ा बाजार उपलब्ध करवा दे। कहने की जरूरत नहीं कि यह करना हर तरह से देश और समाज के हित में होगा।  
अब जहाँ तक बात पानी की गुणवत्ता की है तो इस सम्बन्ध में सरकार को अवश्य सजग रहना होगा। उचित होगा कि इस सम्बन्ध में एक निगरानी तंत्र ही स्थापित कर दिया जाय जो पैक्ड पानी के सुरक्षा मानकों की निगरानी करता रहे। अगर गंभीरता के साथ और मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए सरकार इस सम्बन्ध में आगे बढे तो यह सब करना कुछ कठिन नहीं है। सरकार के पास शक्ति और साधन दोनों हैं, अतः उचित होगा कि सरकार सिर्फ सरकारी स्तर पर बोतलबंद पानी का उपयोग रोककर अपने दायित्वों की इतिश्री न समझे और उपर्युक्त कदम उठाते हुए इस समस्या का समूल समाधान करे।

गुरुवार, 12 मई 2016

पीएम की डिग्री पर बेजां हंगामा मचा रहे केजरीवाल [दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दबंग दुनिया 
खुद को आम आदमी और अपनी सरकार को आम आदमी की सरकार बताने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल इन दिनों आम आदमी के मुख्यमंत्री कम विवादों के नेता अधिक लग रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे उन्होंने विवादों में रहकर सस्ती  लोकप्रियता हासिल करने को अपनी राजनीतिक रणनीति ही बना लिया है। इसीलिए कभी राज्यपाल नजीब जंग से, कभी न्यायालय से, कभी केंद्र सरकार के मंत्रियों से तो कभी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बिना बात उलझ  जा रहे हैं। हालिया मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्रियों के सम्बन्ध में है। दरअसल मामला कुछ यूँ है कि विगत दिनों अरविन्द केजरीवाल ने प्रधानमंत्री मोदी की शैक्षणिक योग्यताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए केन्द्रीय सूचना आयुक्त को एक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री की डिग्रियों को सार्वजनिक करने की मांग की थी, जिसके बाद केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश पर गुजरात विश्वविद्यालय ने प्रधानमंत्री की परास्नातक की डिग्री को सार्वजनिक कर दिया। लेकिन, इसके बाद आम आदमी पार्टी उस परास्नातक की डिग्री पर सवाल उठाते हुए उनके स्नातक की डिग्री की मांग करने लगी। दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्नातक की डिग्री भी सार्वजनिक कर दी। लेकिन आम आदमी पार्टी तो जैसे ये कसम खाकर बैठी थी कि प्रधानमंत्री की डिग्री को हर हाल में फर्जी ही बताना हैं। अपनी इस बात को सही सिद्ध करने के लिए आप के बेचैनी का आलम यह रहा कि उसने पहले जन्म की तारीखों के जरिये भ्रम फैलाया और उसके बाद नया शिगूफा यह छेड़ा कि डीयू द्वारा जारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक की डिग्री उनकी नहीं किसी और मोदी की है। हालांकि अपने इन सभी आरोपों के पक्ष में सिवाय चंद कुतर्कों के आप कोई पुख्ता सबूत नहीं पेश कर सकी। लेकिन फिर भी, आप के इन खोखले से दिख रहे आरोपों में कांग्रेस आदि अन्य विपक्षी दलों ने भी स्वाभाविक रूप से अपना सुर मिलाया। वैसे अरविन्द केजरीवाल का तो यह दस्तूर बनता जा रहा है कि बिना किसी सबूत या तथ्य के किसीके भी खिलाफ कुछ भी कहकर चर्चा बटोर लो और अगर वो कोई मुकदमा वगैरह करता है तो फिर चोरी-छिपे उससे माफ़ी मांगकर जान छुड़ा लो। उदाहरण के तौर पर गौर करें तो केन्द्रीय सड़क, परिवहन और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी पर भी केजरीवाल ने गत वर्ष कुछ हवा-हवाई आरोप लगाए थे और जब गडकरी ने मानहानि का मुकदमा किया तो चुप-चाप उनसे माफ़ी मांगकर मामले को सलटा लिए। अरुण जेटली मामले में भी कुछ-कुछ यही हुआ। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले केजरीवाल साहब दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर तमाम तरह के आरोप लगाते फिरते थे और उनके खिलाफ कई सौ पन्नों के सबूत होने का दावा भी करते थे, लेकिन जबसे वे सरकार में आए हैं तबसे वह आरोप और सैकड़ों पन्नों के सबूत जाने कहाँ खो गए हैं कि अब उनका जिक्र ही नहीं आता। यहाँ भी केजरीवाल बुरी तरह से अपनी भद्द पिटवा चुके हैं। लेकिन, अपनी इन फजीहतों से शायद उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा या यूँ कहें कि शायद अभी भी वे अपने पुराने सामजिक कार्यकर्ता वाले मोड से बाहर ही नहीं आ पाए हैं। उन्हें शायद अब भी यही लग रहा है कि वे विपक्ष में हैं और सिर्फ आरोप लगाना उनका काम है। पर उनकी इन विचित्र गतिविधियों से निष्कर्षतः यही सन्देश जाता दिख रहा है कि सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए वे किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। 
बहरहाल, मौजूदा डिग्री विवाद में भी अब धीरे-धीरे उनकी फजीहत की गुंजाइश ही पैदा होती दिख रही है। क्योंकि बीते सोमवार को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और भाजपा नेता तथा केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने प्रेस कांफ्रेंस कर प्रधानमंत्री  की स्नातक और परास्नातक दोनों ही शैक्षणिक डिग्रियों को सार्वजनिक करते हुए कहा है कि केजरीवाल ने बिना किसी सबूत के इतना बड़ा हंगामा कैसे खड़ा कर दिया; यदि इस सम्बन्ध में उनके पास सबूत हैं तो देश के सामने रखें अथवा माफ़ी मांगें। अब इस मामले में भी केजरीवाल ने अभी तक कोई पुख्ता सबूत तो पेश किया नहीं है, बस जुबानी तीर ही चलाए हैं। ऐसे में, प्रधानमंत्री की इन आधिकारिक और विश्वविद्यालय द्वारा सत्यापित डिग्रियों को फर्जी कहने के पक्ष में वे सबूत दे पाएंगे, ये तो मुश्किल ही है। परिणाम वही होगा कि वे अपने चिर-परिचित पलटी मारने वाले अंदाज के साथ इस मामले से भी धीरे से पीछे हट जाएंगे। 
केजरीवाल के समर्थन में यह तर्क बहुतायत दिया जा रहा है कि प्रधानमंत्री की डिग्री के विषय में जानकारी माँगना कोई अपराध नहीं है। बेशक, प्रधानमंत्री के विषय में जानने का जनता को अधिकार है और इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन, हर चीज का एक तरीका होता है। प्रधानमंत्री के पद की अपनी एक गरिमा और प्रतिष्ठा होती है, जिसका सम्मान करना देश के प्रत्येक व्यक्ति का संवैधानिक कर्तव्य है। तिसपर अरविन्द केजरीवाल का तो यह दायित्व और अधिक है क्योंकि, वे एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं। लेकिन, अरविन्द केजरीवाल ने तो प्रधानमंत्री को मानसिक रोगी कहने से लेकर अब फर्जी डिग्री वाला बताने तक केवल प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर कुठाराघात करने का ही काम किया है। अगर उन्हें प्रधानमंत्री की डिग्री पर संदेह था तो वे पहले इस सम्बन्ध में जानकारी जुटाते, उसकी प्रमाणिकता की जांच करते और ठोस सबूतों के साथ देश के सामने अपना पक्ष रखते तो न केवल प्रधानमंत्री पद की गरिमा सुरक्षित रहती बल्कि उनकी बात को गंभीरता से भी लिया जाता। लेकिन उनकी तो सियासत का मूल मन्त्र बन चुका है कि जिसके बारे में जो दिमाग में आए बिना आगे-पीछे विचार किए बोल दो और जब खुद पर पड़े तो चुपके से माफ़ी मांग लो। उनकी खुद की हालत तो ये है कि दिल्ली जैसा छोटा-सा अपूर्ण राज्य जहां उनपर जिम्मेदारियों का भार अपेक्षाकृत  कम ही है, उनसे संभल नहीं रहा। दिल्ली के लोग बिजली, पानी जैसी समस्याओं से त्रस्त हैं और उनके मुख्यमंत्री महोदय  दूसरों पर तरह-तरह के आरोप लगाने में मशगूल हैं। 
हालांकि यह भी एक तथ्य है कि प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्रियों के सम्बन्ध में जन्म की तारीख, नाम तथा खुद प्रधानमंत्री के पूर्व वक्तव्य आदि के कारण  कुछ भ्रमयुक्त स्थिति जरूर पैदा हुई है, जिनपर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। चूंकि, प्रधानमंत्री मोदी ने अबसे काफी पूर्व में ये डिग्रियां हासिल की हैं तो ये भी हो सकता है कि तब जन्मतिथि थोड़ी आगे-पीछे लिखा गई हो। अब पहले के समय में आज की तरह सबकुछ कम्पूटरकृत तो था नहीं, इस नाते भूल की गुंजाईश से इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, इस सम्बन्ध में उचित होगा कि प्रधानमंत्री खुद वस्तुस्थिति देश के सामने रखें और अगर भूलवश कुछ त्रुटियाँ रही रह गई हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उन्हें यथाशीघ्र सुधार जाय। 
वैसे भी, भारतीय लोकतंत्र की चुनाव प्रणाली में किसी भी प्रत्याशी के निर्वाचन से लेकर मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के पद तक जाने में डिग्री जैसी चीज का कोई विशेष महत्व नहीं होता है। जनता के चयन में प्रत्याशी की डिग्री की भूमिका अत्यल्प ही होती है। निर्वाचन के लिए डिग्री से महत्वपूर्ण कई और मानदंड होते हैं।  कुछ प्रमुख मानदंड यह हैं कि अमुक नेता जनता से कितना जुड़ा है, उसकी छवि और लोगों के बीच पैठ कैसी है आदि। बस ऐसे ही मानदंडों के आधार पर एक बेहद कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी जनप्रतिनिधि निर्वाचित होकर संसद-विधानसभा में पहुँच जाता है, कभी वही मंत्री बनकर अत्यधिक शिक्षित आइएस-पीसीएस आदि अधिकारियों को आदेश-निर्देश देने का अधिकार भी पा जाता है। कहना गलत नहीं होगा कि यह भी भारतीय लोकतंत्र की एक विशिष्टता ही है, जिसके अपने सुपरिणाम और कुपरिणाम दोनों हैं।

भुखमरी के अभिशाप से मुक्ति कब [दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

मानव जाति की मूल आवश्यकताओं की बात करें तो प्रमुखतः रोटी, कपड़ा और मकान का ही नाम आता है । इनमे भी रोटी अर्थात भोजन सर्वोपरि है । भोजन की अनिवार्यता के बीच आज विश्व के लिए शर्मनाक तस्वीर यह है कि वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी भुखमरी का शिकार है । अगर भुखमरी की इस समस्या को भारत के संदर्भ में देखें तो अभी विगत वर्ष ही संयुक्त राष्ट्र द्वारा भुखमरी पर जारी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक भुखमरी से पीड़ित भारत में हैं । अभी देश में लगभग १९.४ करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं । इसे स्थिति की विडम्बना ही कहेंगे कि श्रीलंका, नेपाल जैसे राष्ट्र जो आर्थिक या अन्य किसी भी दृष्टिकोण से हमारे सामने कहीं नही ठहरते, उनके यहाँ भी हमसे कम मात्रा में भुखमरी की स्थिति है । ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) द्वारा जारी भुखमरी पर नियंत्रण करने वाले देशों की सूची में इस वर्ष भारत को श्रीलंका व नेपाल से नीचे ५५ वे स्थान पर रखा गया है। अभी ये हालत तब है जब भारत ने अपनी स्थिति में काफी सुधार किया है। गौर करें तो ग्लोबल हंगर इंडेक्स की ही २०१३ की सूची  में भुखमरी पर नियंत्रण करने वाले देशों में भारत को ६३ वा स्थान दिया गया था। तब भारत श्रीलंका, नेपाल के अतिरिक्त पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे था। लेकिन वर्ष २०१४ की रिपोर्ट में भारत ने अपनी हालत में सुधार किया और पाकिस्तान व बांग्लादेश को पीछे छोड़ते हुए ६३ वे स्थान से ५५ वे पर पहुँचा।  लेकिन बावजूद इस सुधर के अभी तमाम सवाल हैं जो भुखमरी को लेकर भारत की सरकारों की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं।  जी एच आई की रिपोर्ट में भी यही कहा गया है कि औसत से नीचे वजन के बच्चों (अंडरवेट चाइल्ड) की समस्या से निपटने में प्रगति करने के कारण भारत की स्थिति में ये सुधार आया है, लेकिन अभी भी यहाँ भुखमरी की समस्या गंभीर रूप से है जिससे निपटने के लिए काफी काम करने की जरूरत है। 
   उल्लेखनीय होगा कि नेपाल और श्रीलंका भारत से सहायता प्राप्त करने वाले देशों की श्रेणी में आते हैं,  ऐसे में ये सवाल  गंभीर हो उठता है कि जो श्रीलंका, नेपाल हमसे आर्थिक से लेकर तमाम तरह की मोटी मदद पाते हैं, भुखमरी पर रोकथाम  के मामले में हमारी हालत उनसे भी बदतर क्यों हो रही है ?  इस सवाल पर ये तर्क दिया जा सकता है कि श्रीलंका व नेपाल जैसे कम आबादी वाले देशों से भारत की तुलना नहीं की जा सकती। यह बात सही है, लेकिन साथ ही इस पहलु पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि  भारत की  आबादी  श्रीलंका, नेपाल से जितनी अधिक है,  भारत के पास क्षमता व संसाधन भी उतने ही अधिक हैं।  अतः यह नहीं कह सकते कि अधिक आबादी के कारण भारत भुखमरी पर नियंत्रण करने के मामले में श्रीलंका आदि से पीछे रह रहा है। इसका असल कारण तो यही है कि हमारे देश में सरकारों द्वारा भुखमरी को लेकर कभी भी उतनी गंभीरता दिखाई ही नहीं गई जितनी कि होनी चाहिए। यहाँ सरकारों द्वारा हमेशा भुखमरी से निपटने के लिए सस्ता अनाज देने सम्बन्धी योजनाओं पर ही विशेष बल दिया गया, कभी भी उस सस्ते अनाज की वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने को लेकर कुछ ठोस नहीं किया गया । 
   महत्वपूर्ण सवाल ये भी है कि हर वर्ष हमारे देश में खाद्यान्न का रिकार्ड उत्पादन होने के बावजूद क्यों देश की लगभग एक चौथाई आबादी को भुखमरी से गुजरना पड़ता है ? यहाँ मामला ये है कि  हमारे यहाँ प्रायः हर वर्ष अनाज का रिकार्ड उत्पादन तो होता है, पर उस अनाज अनाज का एक बड़ा हिस्सा लोगों तक पहुंचने की बजाय कुछ सरकारी गोदामों में तो कुछ इधर-उधर अव्यवस्थित ढंग से रखे-रखे सड़ जाता है । संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के मुताबिक देश का लगभग २० फिसद अनाज, भण्डारण क्षमता के अभाव में बेकार हो जाता है। इसके अतिरिक्त जो अनाज गोदामों आदि में सुरक्षित रखा जाता है, उसका भी एक बड़ा हिस्सा  समुचित वितरण प्रणाली के अभाव में जरूरतमंद लोगों तक पहुँचने की बजाय बेकार पड़ा रह जाता है। खाद्य की बर्बादी की ये समस्या सिर्फ भारत में नही बल्कि पूरी दुनिया में है। संयुक्त राष्ट्र के ही  मुताबिक पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष १.३ अरब टन खाद्यान्न खराब होने के कारण फेंक दिया जाता है । कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक तरफ दुनिया में इतना खाद्यान्न बर्बाद होता है और दूसरी तरफ दुनिया के लगभग ८५ करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं । क्या यह अनाज इन लोगों की भूख मिटाने के काम नहीं आ सकता ? पर व्यवस्था के अभाव में ये नहीं हो रहा ।
  उल्लेखनीय होगा कि पिछली संप्रग-२ सरकार के समय सोनिया गांधी की महत्वाकांक्षा से प्रेरित ‘खाद्य सुरक्षा क़ानून’ बड़े जोर-शोर से लाया गया था। संप्रग नेताओं का  कहना था कि ये क़ानून देश से भुखमरी की समस्या को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम होगा। गौर करें तो इसके तहत कमजोर व गरीब परिवारों को एक निश्चित मात्रा तक प्रतिमाह सस्ता अनाज उपलब्ध कराने की योजना थी। लेकिन इस विधेयक में भी खाद्य वितरण को लेकर कुछ ठोस नियम व प्रावधान नहीं सुनिश्चित किए गए जिससे कि नियम के तहत लोगों तक सही ढंग से सस्ता अनाज पहुँच सके। अर्थात कि मूल समस्या यहाँ भी नज़रन्दाज ही की गई। बहरहाल, संप्रग सरकार चली गई है, अब केंद्र में भाजपानीत राजग सरकार है, लेकिन खाद्य सुरक्षा क़ानून अब भी है।  और मौजूदा सरकार इस कानून को चलाने की इच्छा भी जता चुकी है। ऐसे में सरकार से ये उम्मीद की जानी चाहिए कि वो इस क़ानून के तहत वितरित होने वाले अनाज के लिए ठोस वितरण प्रणाली आदि की व्यवस्था पर ध्यान देगी।  जरूरत यही  है कि एक ऐसी पारदर्शी वितरण प्रणाली का निर्माण किया जाए जिससे कि वितरण से सम्बंधित अधिकारियों व दुकानदारों की निगरानी होती रहे तथा गरीबों तक सही ढंग से अनाज पहुँच सकें । साथ ही, अनाज की रख-रखाव के लिए गोदाम आदि की भी समुचित व्यवस्था की जाए जिससे कि जो हजारों टन अनाज प्रतिवर्ष रख-रखाव की दुर्व्यवस्था के कारण बेकार हो जाता है, उसे बर्बाद होने से बचाया और जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाया जा सके । इसके अतिरिक्त जमाखोरों के लिए कोई सख्त क़ानून लाकर उनपर भी नियंत्रण की  जरूरत है । ये सब करने के बाद ही खाद्य सम्बन्धी कोई भी योजना या क़ानून जनता का हित करने में सफल होंगे, अन्यथा वो क़ानून वैसे ही होंगे जैसे किसी मनोरोगी का ईलाज करने के लिए कोई तांत्रिक रखा जाए ।

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

संघमुक्त भारत का दिवास्वप्न [दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दबंग दुनिया 
कभी भारतीय जनता पार्टी नीत एनडीए के महत्वपूर्ण घटक रहने वाले जेडीयू के नवनिर्वाचित अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर इन दिनों संघमुक्त भारत की एक अजीब सी धुन सवार दिख रही है और अक्सर जहाँ-तहां वे इस धुन का आलाप भी कर दे रहे हैं। अभी कुछ रोज पहले उन्होंने ये बयान दिया था कि भारत को संघमुक्त करके रहेंगे तो इसपर काफी हो-हंगामा हुआ था। उनका मजाक भी बना और उनके बयान पर सवाल भी उठे। लेकिन, लगता नहीं कि इन सब से उन्हें कुछ सबक मिला है क्योंकि, अब एकबार फिर अपने जेडीयू अध्यक्ष निर्वाचित होने के अवसर पर उन्होंने संघमुक्त भारत की अपनी इसी बात को पूरे दमखम के साथ दोहराया है। विगत दिनों जेडीयू की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक में जब नीतीश कुमार को औपचारिक रूप से जेडीयू का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, उसी अवसर पर उन्होंने ये बात कही। दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव में लालू और काग्रेस के साथ हुए उनके महागठबंधन को जिस तरह से अप्रत्याशित सफलता मिली, कहीं न कहीं उसीने उन्हें इतने आत्मविश्वास या यूँ कहें कि अति-आत्मविश्वास से भर दिया है कि अब वे सीधे संघमुक्त भारत की ही बात करने लगे हैं। यह अति-आत्मविश्वास ऐसा है कि बिहार में सफ़ल हुए महागठबंधन की तर्ज पर अब वे राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन बनाकर उसके द्वारा संघमुक्त भारत की अपनी संकल्पना को फलीभूत करने की सोचने लगे हैं। अपने अध्यक्ष बनने के अवसर पर उन्होंने कहा कि भाजपा संघ की विचारधारा पर चलती है, इसलिए वे संघमुक्त भारत पर जोर दे रहे हैं। समझने का प्रयास करें तो नीतीश बाबू का आशय यह है कि वे मिटाना भाजपा को चाहते हैं लेकिन, इसके लिए उन्हें संघ को समाप्त करना पड़ेगा। अब नीतीश कुमार को तो देश उनके इमानदार छवि के साथ-साथ व्यावहारिक बुद्धि के लिए भी जानता है लेकिन, सवाल है कि उनकी व्यावहारिक बुद्धि कहाँ चली गई है कि संघ के सम्बन्ध में ऐसी बचकानी सोच उनमे उत्पन्न हो रही है कि भाजपा को समाप्त या कमजोर करने के लिए संघमुक्त भारत जैसी असंभव कल्पना करने लगे हैं। यह तो वही बात हुई कि समुद्र में रहने वाले किसी विशाल जीव को मिटाने के सारे प्रयास विफल होने पर कोई समुद्र को ही सुखाने चल दे। अब ऐसे अव्यवहारिक मार्ग पर चलने वाले को सफलता तो खैर मिल ही नहीं सकती, पर उसके विनाश की संभावना जरूर पैदा हो जाती है। दुर्योग यह है कि बिहार की जनता द्वारा विश्वास दिखाकर सत्ता सौंपे जाने के बाद अपनी जिम्मेदारियों पर ध्यान देने की बजाय नीतीश कुमार उपर्युक्त प्रकार के मार्ग का अनुसरण करते नज़र आ रहे हैं। जिससे न तो उनका हित हो सकता है और न ही बिहार की जनता का।   
वैसे, नीतीश कुमार से तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि कई एक विन्दुओं पर तो भाजपा और संघ में ही विरोध प्रत्यक्ष हो जाता है, फिर वे भाजपा और संघ को एक ही चश्मे से क्यों देख रहे हैं ? एक ताज़ा उदाहरण द्रष्टव्य है कि बिहार चुनाव के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी, जिससे भाजपा ने सीधे-सीधे कन्नी काटते हुए आरक्षण के वर्तमान स्वरुप को लेकर अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया था। ऐसे ही श्रम कानूनों में जब केंद्र की भाजपा नीत राजग सरकार ने संशोधन किए तो संघ के श्रमिक संगठन भारतीय मजदूर संघ ने कई विन्दुओं पर उसका भी विरोध किया था। इसके अलावा और भी तमाम बातें हैं, जहाँ भाजपा और संघ आमने-सामने आते रहे हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि बेशक भाजपा का वैचारिक स्रोत संघ हो तथा प्रधानमंत्री मोदी समेत भाजपा के तमाम नेता संघ से सम्बद्ध रहे हों लेकिन, इसका यह कत्तई अर्थ नहीं कि संघ और भाजपा को एक ही पहलू में रखकर देखा जाय। भाजपा एक राजनीतिक दल है, जिसकी स्वाभाविक रूप से अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और उन्हीसे सम्बद्ध उत्तरदायित्व भी हैं, जबकि संघ सत्य सनातन धर्म अर्थात हिंदुत्व का संवाहक एक स्वयंसेवी संगठन है जिसकी देश भर में पचास हजार से अधिक शाखाएं, लगभग तीन दर्जन  आनुषांगिक संगठन और करोड़ों की संख्या में स्वयंसेवक हैं जो बिना किसी सामजिक-आर्थिक लालसा के सदैव सेवा भाव से देशभर में कार्यरत रहते हैं। वहीँ, राजनीतिक दल होने के कारण भाजपा के लिए पूर्णतः शासन में होना या शासन का हिस्सा भी होना अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि, ऐसी स्थिति में ही वो अपनी चीजों को आगे बढ़ा सकती है। लेकिन, संघ के लिए सत्ता जैसी कोई चीज है ही नहीं। भाजपा सत्ता में रहे यां न रहे, संघ की गतिविधियाँ सतत गतिशील रहती हैं। गौर करें तो संघ के प्रकल्पों ने प्रत्येक क्षेत्र में देश को सशक्त बनाने और गति देने का कार्य किया है। फिर चाहें वो दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से देश के गांवों को स्वावलंबी बनाना हो जिसमे संघ के हजारों स्वयंसेवक बिना किसी लोभ-लालसा के कठिन परिश्रम और समर्पण के साथ काम कर रहे हैं या फिर विद्या भारती जैसी शिक्षा क्षेत्र की सबसे बड़ी गैरसरकारी संस्था हो, जिसके तहत देश भर में लगभग १८००० शिक्षण संस्थान बिना किसी सरकारी सहयोग के कार्यरत हैं अथवा वनवासी कल्याण आश्रम जैसी संस्था को ही लीजिये जिसके द्वारा देश के वनवासी लोगों के रहन-सहन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की समुचित व्यवस्था कर उनका सर्वांगीण विकास किया जा रहा है। आंकड़े के अनुसार संघ की यह संस्था फिलहाल देश के लगभग ८ करोड़ वनवासी लोगों के लिए कार्य कर रही है। ऐसे ही, सेवा भारती जैसी संस्था के रूप में संघ स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय रूप से देश के दूर-दराज के उन क्षेत्रों तक पहुँच के कार्य कर रहा है जहां सरकारी मिशनरी भी ठीक ढंग से नहीं पहुंची है। भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान मंच के द्वारा मजदूरों और किसानों के लिए भी संघ सदैव संघर्ष करता रहा है। इनके अलावा संघ के और भी तमाम प्रकल्प हैं, जिनके माध्यम से वो देश के कोने-कोने तक न केवल मौजूद है बल्कि देशवासियों के लिए अथक रूप से कार्य भी कर रहा है। ये यूँ ही तो नहीं हो जाता कि देश में कहीं भी, कोई भी आपदा आए तो वहां संघ के स्वयंसेवक तुरंत मौजूद हो राहत कार्य में जुट जाते हैं। स्पष्ट है कि संघ इस देश के हर हिस्से में, हर स्तर पर सक्रियता से मौजूद है। अब नीतीश कुमार साहब यह बताएं कि देश की रग-रग में मौजूद इस संघ को वे कहाँ-कहाँ से और कैसे ख़त्म करेंगे ? उनके पास कोई जवाब नहीं होगा क्योंकि, वे सिर्फ संघमुक्ति का एक दिवास्वप्न देख रहे हैं।
दिवास्वप्न ही सही मगर, सवाल तो यह भी है कि ऐसे राष्ट्रव्यापी स्वयंसेवी संगठन जो देश की प्रगति के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहा है, से नीतीश कुमार साहब को तकलीफ क्यों हो रही है ? और संदेह नहीं कि उनकी इस तकलीफ में देश के अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल भी पूर्णतः सहमति जताएँगे। दरअसल संघ के सब कार्यों के साथ उसकी पहचान हिन्दुत्ववादी संगठन की है। बस यही विन्दु हमारे देश के इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों को नहीं पचती। क्योंकि हिंदुत्व की बात करने से उनकी धर्मनिरपेक्षता आहत होती है। हालांकि इस्लाम या अन्य किसी मजहब की पैरोकारी से उस धर्मनिरपेक्षता को कोई हानि नहीं होती। इसीलिए वे कभी गांधी की हत्या तो कभी सांप्रदायिक दंगों आदि से संघ का नाम जोड़कर उसे बदनाम करने की साज़िश करते रहते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि गांधी की हत्या में संघ का नाम साजिशन लाया गया और रही बात दंगों की तो तथ्य यही है कि ताली कभी भी एक हाथ से नहीं बजती। संघ किसीके भी अहित की बात नहीं करता, वो तो केवल हिन्दू हितों की रक्षा के प्रति कृत संकल्पित हैं और सच्ची बात यह है कि उसके इसी हिन्दुत्ववादी रुख से इस देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्षों को पीड़ा होने लगती है। अब जब संघ के सहयोग से ही भाजपा सत्तारूढ़ है तो वे दल और बेचैन हैं। इसी बेचैनी में नीतीश कुमार का संघमुक्त भारत जैसा बयान आया है, जो उन्हें हानि छोड़ लाभ नहीं दे सकता।

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा: अजीब लड़कियों की सुनी-अनसुनी कहानियां

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

अगर आपको कुछ बेबाक तो कुछ बेबाकीयत के लिबास में छिपी अश्लील; कुछ सच्ची, जमीनी और संदेशप्रद तो कुछ बस यूँ ही अनोखी कल्पना पर आधारित और अमान्य तर्कों से पुष्ट कहानियां एक साथ एक ही खर्चे में पढ़नी है तो प्रियंका ओम का कहानी संग्रह ‘वो अजीब लड़की’ बेशक आप ही के लिए है। इसमें आपको उपर्युक्त प्रकार का सब ‘मटेरियल’ बड़ी सहजता से मिल जाएगा। प्रियंका की इस किताब में कुल चौदह कहानियाँ हैं, जिनमे अधिकांश कहानियाँ चरित्र प्रधान हैं। हाँ, कुछेक कहानियों में घटना और चरित्र के बीच प्रधानता के लिए अंतर्द्वंद्व भी प्रतीत होता है। इन चौदह कहानियों में निरपवाद रूप से प्रधान चरित्र कोई न कोई स्त्री ही है, यहाँ तक कि जो कहानियां किसी पुरुष पात्र को केंद्र में रखकर शुरू हुई हैं, उनमे भी अंत आते-आते कोई न कोई स्त्री प्रधान चरित्र के रूप में स्थापित हो जाती है। प्रियंका एक स्त्री हैं तो उनकी कहानियों में ऐसी स्थिति होना कोई अस्वाभाविक बात भी नहीं है। स्त्री चरित्र की प्रधानता वाली इन कहानियों में स्त्रियों से सम्बंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं, विसंगतियों और उनके प्रतिक्रियास्वरुप स्त्रियों की मनोदशाओं को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। किसी कहानी में ये प्रयास पूर्णतः सफल है तो किसी में इसकी विफलता के चिन्ह भी दिखते हैं।
इन कहानियों में से कुछ कहानियाँ स्त्रियों के प्रति पुरुष समाज की मानसिकता को बड़ी ही कटुता से उजागर करती हैं तो कुछ स्त्रियों के अतिभावुक स्वभाव और उससे होने वाली समस्याओं को रेखांकित करती हैं। स्त्री के निकट होने पर पुरुषों की समस्त विचारशक्ति  घूम-फिरकर अंततः उसकी देह पर ही कैसे केन्द्रित हो जाती है, इसकी प्रस्तुति संग्रह की कहानी ‘दोगला’ में अच्छे ढंग से हुई है। हम देखते हैं कि कैसे दिल्ली के एक बड़े अख़बार के अतिसंभ्रांत और सुप्रसिद्ध मुख्य संपादक महोदय यूपी से आई एक सामान्य सी लड़की पर या उसकी देह पर एकदम न्योछावर हो जाते हैं। किसी सामान्य व्यक्ति को आश्चर्यजनक लग सकता है कि कैसे एक बड़ा और प्रतिष्ठित संपादक एक मामूली सी लड़की के आगे बेबस और लाचार हो जाता है! हालांकि उन लोगों को इस बेबसी और लाचारियत में छिपे निर्दय ढोंग का अंदाज़ा शायद ही हो। लेकिन, जो साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े लोग हैं, वे इस स्थिति को भलीभांति जानते और समझते हैं कि वास्तविकता इस कहानी से अधिक भिन्न नहीं है। एक बड़ी साहित्यिक पत्रिका के ख्यातिलब्ध दिवंगत संपादक महोदय के विषय में तो इस किस्म के किस्से काफी प्रसिद्ध हैं।
अधिकांश स्त्रियाँ व्यावहारिक कम भावुक अधिक होती हैं और भावुकता में अक्सर कैसे गलत रास्तों को चुन लेती हैं, संग्रह की कहानी ‘मृगमरीचिका’ इस बात को बाखूबी सामने लाती है। सोशल साईट पर एक लड़के के लुभावने शब्दजाल में फंसकर प्रीती उसमे न केवल अपने बचपन का बिछड़ा प्यार देखने लगती है, बल्कि अपने पति को भूल उसके प्रति आकर्षण भी महसूसने लगती है। हालांकि वो जल्दी ही चेत भी जाती है और उसे आभास होता है कि जिंदगी भावनाओं और मखमली शब्दों से नहीं चलती, उसके लिए व्यवहारिक दृष्टिकोण की जरूरत होती है और उसका पति उससे मखमली बातें भले न करता हो, मगर वो उससे सच्चा और व्यवहारिक प्रेम करता है जिसके रहते वो कभी अकेली नहीं होगी। हालांकि इस कहानी का प्लाट पुराना है। पहले भी इस तरह की कुछेक कहानियाँ लिखी जा चुकी हैं, लेकिन इसका प्रस्तुतिकरण इसे अलग बनाता है। कथ्य-शिल्प हर स्तर पर दुरुस्त होने के कारण इसे इस संग्रह की सबसे अच्छी कहानी भी कह सकते हैं। ऐसे ही, ‘लावारिश लाश’, ‘वो अजीब लड़की’, ‘इमोशन’, ‘मौत की ओर’ आदि कहानियाँ भी स्त्रियों से जुड़े सामाजिक-मानसिक-आर्थिक आदि जीवन के विभिन्न पहलुओं को उद्घाटित करने का सफल-असफल प्रयत्न करती हैं।  
प्रियंका की कहानियों में सेक्स का भी भरपूर चित्रण है। अब कई कहानियों में यह सेक्स जहां कथा-तत्व की आवश्यकता के रूप में आया है तो कई में एकदम गैरजरूरी रूप में भी इसकी मौजूदगी नज़र आती है और जहाँ ये गैरजरूरी रूप में आया है, वहां इसने बड़ी सहजता से वह रूप ले लिया है जिसे साहित्य का पोर्नोग्राफीकरण कहते हैं। ‘सॉरी’ कहानी का यह अंश – “वो शायद महारानी कैथरीन है जिसने बहुत भारी-भरकम गाउन अपने हाथों से उठाया हुआ है जबकि मुँह आधा खुला है और वो पीछे देख रही है। सोल्जर जैसे कपड़ों में एक नवयुवक घुटनों पर बैठा है व उसकी जीभ महारानी कैथरीन के दोनों जाँघों के बीच में है।” – देखें तो यह एक अतिकामुक चित्र का अक्षरशः वर्णन है। इस कहानी के कथानक में इस अंश के होने न होने से कोई बहुत अंतर नहीं पड़ने वाला इसलिए इस अंश को बड़े आराम से छोड़ा जा सकता था या सांकेतिक रूप में लिखा जा सकता था। लेकिन अनावश्यक रूप से इसका पूरा वर्णन किया गया है। ऐसे ही, एक कहानी है – लाल बाबू। इस कहानी में न तो कोई कथानक है और न ही कोई अन्य कथा-तत्व। है तो सिर्फ और सिर्फ पोर्नोग्राफी। कहानी के केन्द्रीय पात्र लाल बाबू शुरू से अंत तक कभी अपनी चाची के साथ, कभी भाभी के साथ तो कभी किसी और के साथ सेक्सरत रहते हैं। यहाँ तक कि अपनी बहू पर भी उनकी नियत डोल जाती है। और आश्चर्य तो यह देखकर भी होता है कि उनकी चाची और भाभी कैसी स्त्रियाँ होती हैं कि वे झट उनके आगे बिछ जाती हैं! सवाल यह है कि लाल बाबू जैसे पुरुष होते कहाँ हैं ? भारत में तो कम से कम नहीं ही होते। फिर ऐसी कहानी लिखकर लेखिका क्या सन्देश देना चाहती हैं ? अगर लेखिका का उद्देश्य स्त्री को देह समझने की पुरुष समाज की मानसिकता को दिखाना है तो इस उद्देश्य की सिद्धि में उनकी यह कहानी एकदम विफल रही है। क्योंकि, बेशक समाज में स्त्रियों को सिर्फ देह समझने वाले मानसिक विकृति के शिकार पुरुष हैं बल्कि काफी अधिक हैं लेकिन, उनके प्रतिनिधि पात्र लाल बाबू तो कत्तई नहीं हो सकते। क्योंकि लाल बाबू की स्थिति स्त्री को देह समझने की मानसिकता से कहीं अधिक विकृत हैं, जो उन्हें सिर्फ और सिर्फ एक सेक्सहोलिक मनोरोगी व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। ऐसे ही, कुछेक और भी कहानियाँ हैं, जिनमे पूरी व्यवस्था के साथ सेक्स का आयोजन कर पोर्न प्रस्तुति की गई है। ये बिलकुल नहीं कह रहे कि कहानी में सेक्स का वर्णन-चित्रण वर्जित है। कत्तई नहीं! लेकिन, उसका एक तरीका है और उसके लिए जहाँ तक संभव हो सांकेतिकता का प्रयोग करने का प्रयास होना चाहिए न कि जानबूझकर ऐसी परिस्थितियों और संवादों का आयोजन किया जाय जिससे कि सेक्स उभरकर सामने आने लगे। ऐसा करने पर कहानी को फौरी तौर पर एक ख़ास किस्म का पाठकवर्ग जरूर मिल सकता है और कहानीकार को एक क्षणिक लोकप्रियता भी प्राप्त हो सकती है, मगर ऐसी कहानियों का कोई चिरस्थायी अस्तित्व नहीं होता।

बहरहाल, प्रियंका की कहानियों की जो एक ख़ास बात है वो ये कि उनमे शैली के स्तर पर काफी हद तक प्रयोग का दर्शन होता है। तमाम कहानियों में एक ही साथ वर्णनात्मक, पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक), नाटकीय आदि विभिन्न शैलियों का प्रयोग हुआ है। कई कहानियों में ये प्रयोग सफल और सार्थक रहा है तो कई में इस प्रयोग ने कहानी को काफी उलझाने  का भी काम किया है। अर्थात कि यह प्रयोग जहाँ कुछ कहानियों के लिए सफल रहा है तो कुछ की विफलता का कारण भी बना है। बावजूद इसके कहना होगा कि शैली के स्तर पर प्रियंका थोड़ी गंभीरता बरतते हुए लेकिन ऐसे ही बेबाकी के साथ अगर लिखती रहें तो इस दिशा में उनके अन्दर काफी संभावनाएं प्रतीत होती हैं और वे काफी अच्छा कर सकती हैं। यह उनका पहला कहानी संग्रह है तो इसके लिए शुभकामनाएँ देते हुए आशा करते हैं कि भविष्य में उनकी रचनाओं में और व्यापकता, तथ्यात्मकता, सुग्राह्यता, शालीनता और उद्देश्यपरकता आएगी। 

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

लोकरंजन और लोककल्याण का महोत्सव [दोपहर का सामना में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दोपहर का सामना 
आगामी २२ अप्रैल से मध्य प्रदेश के उज्जैन में आरम्भ हो रहे आस्था के महोत्सव यानी कुम्भ मेले को लेकर देश भर के श्रद्धालुओं के बीच उत्साह और उल्लास का वातावरण एकदम प्रत्यक्ष है। इस सिंहस्थ कुम्भ मेले के प्रति  लोगों में कितनी आस्था है, इसे इसी से समझा जा सकता है कि इसमें तकरीबन ५ करोड़ श्रद्धालुजनों के पहुँचने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है, जिसके मद्देनज़र  मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पिछले वर्ष से ही व्यवस्थाएं की जा रही हैं। दरअसल इस कुम्भ मेले में सिर्फ देश से ही नहीं वरन विदेशों से भी भारी संख्या में सैलानी आते हैं। इसके मद्देनज़र मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सुरक्षा व्यवस्था से लेकर घाटों आदि को सम्यक प्रकार  से व्यवस्थित रूप  देने का कार्य किया जा रहा है।
उल्लेखनीय होगा कि यह अभी केवल एक अर्धकुम्भ है, जिसका आयोजन प्रत्येक छः वर्ष में  किया जाता है। इससे इतर प्रत्येक बारह वर्ष में, एक विशेष ग्रह स्थिति आने पर, महाकुम्भ का आयोजन होता है। सांस्कृतिक तौर पर देखें तो भारतीय संस्कृति के समन्वयकारी स्वरुप का एक विराट दर्शन हमें इस कुम्भ मेले में होता है, जहाँ साधू-संतों से लेकर आम जन और नेता तथा विदेशी पर्यटकों तक का एक विशाल हुजूम उमड़ता है और ऊँच-नीच, जाति-धर्म, अमीरी-गरीबी के भेदभाव से मुक्त होकर महाकुंभ के स्नान का अक्षय पुण्य या विशेष संतोष प्राप करता है। हालांकि, वर्तमान समय में कुम्भ मेले में बड़े साधु-संतों को मिलने वाली विशेष व्यवस्थाओं आदि के जरिये कुम्भ की इस समानता की अवधारणा का क्षरण अवश्य है, जो कि अपनी परम्पराओं को विकृत रूप दे देने की हमारी प्रवृत्ति का ही एक उदाहरण है।
बहरहाल, कुम्भ के विषय में अगर पौराणिक मान्यताओं पर गौर करें, तो प्रसंग है कि समुन्द्र-मंथन से उत्पन्न अमृत के घड़े (कुम्भ) को असुरों से बचाने के लिए देवताओं ने बारह दिन तक समूचे ब्रह्मांड में छुपाया था, इस दौरान उन्होंने इसे धरती के जिन चार स्थानों पर रखा, वो ही चारो कुम्भ के आयोजन स्थल बन गए। इलाहाबाद और हरिद्वार में गंगा का तट तथा नासिक की गोदावरी और उज्जैन की क्षिप्रा के तट, ये कुम्भायोजन के चार स्थल हैं। इन चारों स्थानों पर कुम्भ के आयोजन के लिए ज्योतिष की विभिन्न अवधाराणाएं हैं, जिनके अनुसार जब जीवनवर्द्धक ग्रहों का स्वामी बृहस्पति किसी जीवनसंहारक ग्रह की राशि में प्रवेश करता है, तो इस संयोग को शुभ तिथी के रूप में माना जाता है और इसी क्रम में एक समय ऐसा भी आता है, जब बृहस्पति का प्रवेश मान्यतानुसार जीवनसंहारक ग्रहों के प्रधान शनि की राशि कुम्भ में होता है और इसका प्रभाव बिंदु हरिद्वार बनता है। इस स्थिति में कुम्भायोजन हरिद्वार में होता है। ठीक इसी प्रकार बृहस्पति का शुक्र में और सूर्य-चन्द्र का शनि की मकर राशि में प्रवेश इलाहाबाद के लिए कुम्भायोजन का योग बनाता है और यही वो समय भी होता है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं, जिसे शुभ मानते हुए मकर संक्रांति के रूप में मनाया भी जाता है। कुछ इसी प्रकार जब बृहस्पति का प्रवेश सूर्य की सिंह राशि में होता है, तो ये संयोग नासिक की गोदावरी के लिए कुम्भायोजन का सुयोग उत्पन्न करता है । बृहस्पति की सिहंस्थ स्थिति में ही अगर सूर्य मेष राशि और चंद्रमा तुला राशि में पहुँच जाए, तो ये उज्जैन के लिए कुम्भ के आयोजन का संकेत होता है। वर्तमान में यही ग्रह स्थिति बनी है, जिस कारण उज्जैन में कुम्भायोजन हो रहा है। वैसे, सामान्य जनों की समझ के लिए ये ज्योतिषीय अवधारणाएं निस्संदेह बड़ी ही जटिल प्रतीत होती हैं, पर पुरातन काल से इन्ही के आधार पर कुम्भ का आयोजन होते आ रहा है। यूँ तो इन चारो ही स्थानों का कुम्भस्नान फलदायी आस्था से पुष्ट है, पर इलाहाबाद के संगम तट का कुम्भस्नान इनमे भी श्रेष्ठ माना जा सकता है। क्योंकि, यह गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम का वो अद्भुत स्थल है, जिसके प्रति लोगों के मन में अनायास ही अनंत श्रद्धा का भंडार है, उसपर यदि कुम्भ का शुभ योग बने तो कहना ही क्या! वैसे, ज्योतिष-विज्ञान की उपर्युक्त मान्यताओं से अलग श्रद्धालु जनों की अपनी एक सीधी और सरल मान्यता भी है कि सकारात्मक शक्तियों द्वारा नकारात्मक शक्तियों के दुष्प्रभाव  को रोकने का एकजुट प्रयास ही  कुम्भ  की  पृष्ठभूमि  है।
अब चूंकि, अधिकांश भारतीय पर्वों में लोकरंजन ही नहीं लोककल्याण का भाव भी निहित होता है और इस कुम्भ के सम्बन्ध में भी श्रद्धालुओं का यही मत है कि कुंभ के स्नान से मानव के दोष तो मिटते ही हैं, संसार की विपत्तियों का भी नाश होता है। लेकिन श्रद्धालुओं के इस आस्थापूर्ण मत से इतर यदि तार्किक दृष्टि से विचार करें तो भी यही स्पष्ट होता है कि कुम्भ पर्वों का उद्देश्य केवल आस्थापूर्ति और लोकरंजन ही नहीं है, बल्कि इसमे लोककल्याण का भाव भी निहित है। विचार करें तो पालक-पोषक होने के कारण और कुछ पौराणिक आस्थाओं  के कारण भी, भारत में पुरातन काल से ही नदियों को माँ का स्थान प्राप्त रहा है। ऐसे में, बहुत से विद्वानों का ऐसा  मानना है कि प्राचीनकाल से निरंतर आयोजित हो रहे इन कुंभ पर्वों का एक प्रमुख उद्देश्य नदी-संरक्षण भी है। अगर हम स्वयं भी आस्था व अध्यात्म के दायरे से थोड़ा बाहर आकर तार्किकता से कुंभ के उद्देश्य पर विचार करें, तो विद्वानों का ये कथन काफी हद तक उचित व व्यवहारिक ही प्रतीत होता है । चूंकि, इस बात की पूरी संभावना है कि हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों द्वारा नदियों के प्रति मातृगत आस्था का प्रतिस्थापन व उनमे स्नान को धर्म से जोड़ने का विधान, उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए ही किया गया होगा तथा इसी क्रम में नदियों में स्नान को और महत्वपूर्ण रूप देने के लिए कुम्भ जैसे स्नान पर्व की परिकल्पना भी की गई होगी। कहीं न कहीं उनका यह मानना रहा होगा कि लोग यदि नदियों के प्रति श्रद्धालु होंगे तो उनकी देख-रेख, साफ़-सफाई और संरक्षण करेंगे तथा कुम्भ जैसे स्नान पर्वों के समय एकजुट होकर नदियों के लिए कार्य करेंगे ताकि उनमे स्नान आदि कर सकें। किन्तु उन्हें तब संभवतः इस बात का आभास न रहा हो कि भविष्य निरपवाद रूप से ऐसे पाखण्डी जनों का है, जिनके वचन और कर्म में विराट अंतर होगा और जिनकी श्रद्धा का आधार आचरण नहीं, केवल बातें होंगी। आज यही हो रहा है कि नदियों के प्रति लोगों में श्रद्धा तो है और देश का बहुसंख्य समाज उन्हें माँ भी मानता है लेकिन, इसके बावजूद नदियों की दशा बद से बदतर होती जा रही है। क्योंकि, एक तरफ लोग उन्हें माँ कहते हैं और दूसरी तरफ उनमे अपशिष्ट विसर्जन में भी नहीं हिचकते। हमारे पूर्वज यह कल्पना थोड़े किए होंगे कि भविष्य में ऐसे पूत होंगे जिन्हें अपनी माँ को गन्दा करने में भी लज्जा या संकोच का अनुभव नहीं होगा। अब जो भी हो, लेकिन  इतना तो स्पष्ट है कि कुम्भ  केवल लोकरंजन का महोत्सव ही नहीं, लोककल्याण का साधन भी है। आवश्यकता है तो इसके महत्व को समझने की।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

सेना को बदनाम करने की साज़िश [राज एक्सप्रेस में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

राज एक्सप्रेस 
जम्मू-कश्मीर के हंदवाड़ा में कथित तौर पर भारतीय सेना के जवान द्वारा युवती से छेड़-छाड़ तथा इसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों को रोकने के लिए सेना की फायरिंग में चार लोगों के जान गंवाने का मामला सामने आने के बाद से जम्मू-कश्मीर समेत देश भर में ऐसे उथल-पुथल मच गई, जैसे जम्मू-कश्मीर पर कोई बहुत बड़ी आपदा आ गई हो। इस मामले पर गौर करें तो प्राप्त खबरों के अनुसार विगत दिनों जम्मू-कश्मीर के हंदवाड़ा में सेना की चौकी के नजदीकी शौचालय में एक युवती गई, जहाँ सेना का एक जवान भी पहुंचकर उसे छेड़ने लगा। लोगों की नज़र में आने पर वो जवान भाग पड़ा। इसीसे आक्रोशित होकर लोगों ने सेना की चौकी पर पथराव करना तथा तरह-तरह से हंगामा मचाना शुरू कर दिया, जिसको रोकने के लिए सेना की तरफ से फायरिंग की गई जिसमे चार लोगों की जान चली गई तथा बहुत से लोग घायल भी हुए। इस पूरे प्रकरण के बाद जम्मू-कश्मीर में सेना के प्रति जो आक्रोश दिखा सो दिखा ही, देश के राजनीति से लेकर मीडिया तथा बुद्धिजीवो वर्ग तक के उन कुछ विचारधारा विशेष के लोगों जो जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना की तैनाती का विरोध करना ही अपना परम कर्तव्य मानते हैं, को भी जैसे बिन मांगे मुराद  मिल गई। उनके हाथ फिर एक मौका लग गया कि जम्मू-कश्मीर में सेना की तैनाती को गलत बताते हुए उसकी बर्बरता का खोखला ढोल पीट सकें। हालांकि भारतीय सेना पर सवाल उठाने वालों को अधिक समय तक यह सब करने का अवसर नहीं मिल सका क्योंकि सेना ने अपने पर लग रहे आरोपों का खंडन करते हुए पीड़ित लड़की का एक विडियो जारी किया जिसमे वो स्पष्ट रूप से कह रही है कि उसे सेना के जवान ने नहीं, चार अन्य  लड़कों ने छेड़ा था बल्कि सेना तो उसे बचाने का जतन कर रही थी। इस विडियो के सामने आने के बाद से इस पूरे मामले की पोल खुल गई है कि यह मामला और कुछ नहीं, सिर्फ और सिर्फ भारतीय सेना को बदनाम करने की एक  साज़िश भर है। दरअसल इसमें कुछ नया नहीं है क्योंकि जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों द्वारा अक्सर भारतीय सेना पर इस तरह के आरोप लगाकर जम्मू-कश्मीर में उसकी तैनाती का विरोध किया जाता रहा है। बस यह साजिश भी उसी विरोध को एक तार्किक पुष्टि देने की नाकाम कोशिश है।
दरअसल अलगाववादियों द्वारा जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना की तैनाती का विरोध करने के पीछे केवल एक मंशा काम करती है कि किसी भी तरह उसे जम्मू-कश्मीर से वापस बुला लिया जाय जिससे वहां अलगाववादी खुलेआम अपनी तानाशाही चला सकें और पाक प्रेरित भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे सकें। चूंकि सेना के होने से उनकी ये मंशा पूरी नहीं हो पाती और उनपर पूरी तरह से नकेल कसी रहती है, इसीलिए सेना से वे खुन्नस खाए रहते हैं। अतः उनकी वजह को तो समझा जा सकता है कि क्यों वे भारतीय सेना का विरोध कर रहे। लेकिन देश के उन कुछ मुट्ठीभर राजनेताओं, मीडिया के लोगों और बुद्धिजीवियों का क्या उद्देश्य है कि वे भी जम्मू-कश्मीर के उन अलगाववादियों के सुरों का समर्थन करते रहते हैं और उन्हिकी भाषा में भारतीय सेना को जम्मू-कश्मीर से वापस बुला लेने का विलाप मचाए रहते हैं।  साथ ही, अपनी इस अनुचित और राष्ट्रहित के प्रतिकूल बात को सिद्ध करने के लिए अक्सर तरह-तरह के मौके तलाशने और कुतर्क गढ़ने में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि अपनी बात सही सिद्ध करने के चक्कर में वे परम श्रेष्ठ और कर्तव्यनिष्ठ भारतीय सेना पर अलगाववादियों की ही तरह विभिन्न घिनौने आरोप लगाने से भी बाज नहीं आते। एक तर्क वे यह देते हैं कि बन्दूक के जोर से जम्मू-कश्मीर को अपना नहीं बनाया जा सकता, इसलिए वहां से सेना हटा देनी चाहिए। उन से पूछा जाना चाहिए कि वहां से सेना को हटा देने से क्या वहां हालात बदल जाएंगे और सबकुछ ठीक हो जाएगा ?  अब इतने भोले तो वे हैं नहीं कि ये न समझ सकें कि सेना के हटते ही जम्मू-कश्मीर को भारत में आतंकियों का गढ़ बनते देर नहीं लगेगी जो न केवल जम्मू-कश्मीर बल्कि पूरे देश के लिए अत्यंत घातक होगा। अतः जम्मू-कश्मीर से सेना को हटाने का फ़िलहाल तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। पर वे यह सब करते हैं क्योंकि उन्हें तथाकथित सेकुलर कहलाना है और उसके लिए आवश्यक है कि उस मजहब विशेष का तुष्टिकरण किया जाय जिसका जमू-कश्मीर में बाहुल्य है तथा अलगावादी भी जिससे सम्बंधित हैं। पर ये सब करते हुए शायद वे यह भूल जाते हैं कि इस देश के लोगों में सेना के प्रति अकूत श्रद्धा, विश्वास और आदर है जो उनके लाख-करोड़ आरोप लगाने के बाद भी नहीं हिलने वाला बल्कि ऐसा करके वे अपनी छवि को ही धूमिल करने का काम कर रहे हैं। भारतीय सेना है तो ही यह देश पाकिस्तान और चीन जैसे संदिग्ध पड़ोसियों से घिरे होने के बावजूद सुरक्षित वातावरण में प्रगति कर पा रहा है, हमारे जवान दिन-रात सर्दी-गर्मी-बरसात से बेपरवाह देश कि रक्षा में तत्पर रहते हैं, अतः उनपर प्रश्न उठाना किसी लिहाज से उचित नहीं और निश्चित ही ऐसा करने वालों का राष्ट्रप्रेम संदिग्ध माना जाना चाहिए।

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

निजी ट्यूशन के बढ़ते चलन के निहितार्थ [जनसत्ता और दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

जनसत्ता 
स्कूलों-कॉलेजों में तो शिक्षा का भरपूर व्यावसायीकरण हो ही रहा है, इनसे बाहर भी निजी ट्यूशन के रूप में शिक्षा के जरिये धनार्जन का धंधा आज धीर-धीरे काफी जोर पकड़ चुका है। हालांकि ऐसा नहीं है कि  ट्यूशन का ये चलन अकस्मात् जन्मा हो। अध्यापकों द्वारा बच्चों को निजी ट्यूशन देने का कार्य तो काफी पूर्व से किया जाता रहा है लेकिन, विगत कुछ वर्षों से निजी ट्यूशन के इस चलन में काफी वृद्धि देखने को मिल रही है। दरअसल पहले ट्यूशन शिक्षा के अंतर्गत एक विशेष सुविधा के रूप में होती थी, पर समय के साथ यह एक अनिवार्य व्यवस्था का रूप लेती जा रही है। इस बात का प्रमाण ‘राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थान’ (एनएसएसओ) की हाल ही में आई एक रिपोर्ट को देखने पर मिल जाता है। एनएसएसओ की  रिपोर्ट के अनुसार इस वक़्त देश में निजी ट्यूशन ले रहे विद्यार्थियों की कुल संख्या लगभग ७.१ करोड़ है जो कि कुल विद्यार्थियों की संख्या का २६ फीसद है। हालांकि यह सिर्फ सीमित आंकड़ों का अनुमानित विस्तार करके जुटाया गया आंकड़ा है, इसलिए विद्यार्थियों की यह संख्या और भी अधिक  होने की संभावना है। इस रिपोर्ट में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आई है कि बच्चों को ट्यूशन भेजने में अब पारिवारिक पृष्ठभूमि का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है। पहले यही होता था कि प्रायः सपन्न परिवार के ही बच्चे ट्यूशन में जाते थे मगर, अब इस स्थिति में परिवर्तन आ गया है। संपन्न परिवार हो  या गरीब परिवार, सब अपनी पूरी क्षमता के अनुसार अपने बच्चे को निजी ट्यूशन के लिए भेजने लगे हैं। इस बात को इस आंकड़े के जरिये और अच्छे से समझा जा सकता है कि शहरी इलाकों में ३८ फीसदी संपन्न परिवारों के छात्र ट्यूशन जाते हैं तो इनसे बहुत थोड़ी कमी के साथ गरीब परिवार के भी ट्यूशन जाने वाले बच्चों की संख्या ३० फीसदी हैं। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में भी जहाँ संपन्न परिवारों के २५ फीसदी बच्चे ट्यूशन जाते हैं, वहीँ गरीब परिवारों के भी १७ फीसदी बच्चे ट्यूशन का सहारा लिए हुए हैं। ये अलग बात है कि संपन्न परिवार के बच्चे कथित तौर पर ज्यादा अच्छे ट्यूटर के पास ट्यूशन लेने जाते हैं तो गरीब परिवार के बच्चे शायद थोड़े कम अच्छे ट्यूटर के पास। लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि ट्यूशन लेने के प्रति संपन्न-विपन्न में अब कोई भेद नहीं रह गया है और सब अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने बच्चों को ट्यूशन भेजने लगे हैं। वैसे ट्यूशन लेने वाले इन छात्रों में उच्च शिक्षा के छात्र कम हैं, अधिक छात्र स्कूली शिक्षा से  ही सम्बंधित हैं। ट्यूशन के प्रति लोगों के इस अति-आकर्षण का ही परिणाम है कि लोगों के घर खर्च में अब ट्यूशन की हिस्सेदारी बढ़कर १२ फीसदी हो गई है। इस स्थिति का स्वाभाविक रूप से अध्यापकों द्वारा लाभ लेने की कामयाब कोशिश की जा रही है। इसके लिए वे विभिन्न प्रकार के उपाय अपना रहे हैं। जैसे कि कहीं  वे स्कूल के बाद निजी ट्यूशन कक्षा चलाने लग रहे तो तमाम अध्यापक ऐसे भी हैं जो घर-घर जाकर भी ट्यूशन देने को तैयार हैं। बहुत से अध्यापक बच्चों को कक्षा और विषय के अनुसार समूह में विभाजित कर अपने घर बुलाकर भी ट्यूशन देने का तरीका अपनाए हुए हैं तो कितने अध्यापक जिनकी विश्वसनीयता और साख थोड़ी स्थापित हो गई है, वे अपनी शर्तों जैसे कि सप्ताह में  दो या तीन दिन वो भी कोई एक विषय ही पढ़ाना तथा इसकी भी अत्यधिक फीस लेना आदि, पर ट्यूशन दे रहे हैं। इनके अलावा और भी तमाम तरीके हैं जिनके जरिये अध्यापकों द्वारा बच्चों को ट्यूशन दी जा रही है। अध्यापकों से इतर ऐसे तमाम लोग जो किसी स्कूल आदि में नहीं पढ़ाते और कुछ अन्य कार्य करते हैं, वे भी अतिरिक्त समय में बच्चों को ट्यूशन देकर अच्छी-खासी आमदनी कमा ले रहे हैं। खासकर ग्रामीण तबकों में तो ऐसे भी ट्यूटर्स की भरमार मिलेगी, जिनकी शिक्षा बेहद सामान्य रही है और अपने समय में वे संभवतः औसत विद्यार्थी  रहे हैं, लेकिन लोगों में ट्यूशन के प्रति पनपे इस भारी लगाव का लाभ लेकर वे भी आज गुरूजी बन गए हैं। कुल मिलाकर तस्वीर यही है कि ट्यूशन की तरफ लोगों का रुझान  बहुत बढ़ा है, जिसकी गवाही एनएसएसओ के उपर्युक्त आंकड़े तो देते ही हैं, जमीनी हालात देखने पर भी इसकी पुष्टि होती है।
अब सवाल यह उठता है कि ट्यूशन को लेकर लोगों में इस आकर्षण के बढ़ते जाने का कारण क्या है ? उल्लेखनीय होगा कि अपने बच्चों को ट्यूशन भेजने वाले अभिभावकों से जब एनएसएसओ ने अपने सर्वेक्षण के दौरान यही सवाल पूछा तो उनमे ८९ फीसदी का कहना था कि अपने बच्चों को ट्यूशन भेजकर वे उनकी शैक्षिक बुनियाद को मजबूत कर रहे हैं। इनमे कितनों ने स्कूल के वृहद् पाठ्यक्रम के मद्देनज़र ट्यूशन लेने को आवश्यक बताया तो बहुतों अभिभावकों का तो स्पष्ट रूप से यही कहना रहा कि स्कूली शिक्षा का स्तर अच्छा नहीं होने के कारण उन्हें अपने बच्चों को ट्यूशन भेजना पड़ रहा है। यह देखते हुए समझना आसान है कि ट्यूशन के प्रति लोगों में बढ़ रहे इस अत्याकर्षण का मुख्य कारण स्कूली शिक्षा पर से उनके विश्वास का कम होते जाना है।
दैनिक जागरण 
इसी संदर्भ में अगर भारत की शिक्षा खासकर प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था पर एक नज़र डालें और यह पड़ताल करने का प्रयास करें कि क्या वाकई में स्थिति इतनी ख़राब है कि लोगों का इसपर से विश्वास ही उठ रहा है और वे अपने बच्चों को ट्यूशन का सहारा देने लगे हैं। दरअसल स्थिति खराब तो है ही और फिलवक्त देश की प्राथमिक शिक्षा एक नहीं, विभिन्न प्रकार की अनेक समस्याओं से ग्रस्त है। इनमे गुणवत्तायुक्त शिक्षा से लेकर ढांचागत सुविधाओं तक हर स्तर पर समस्याएँ हैं। ढांचागत सुविधाओं को एकबार के लिए छोड़ भी दें तो गुणवत्तायुक्त शिक्षा के स्तर को कत्तई नज़रन्दाज नहीं किया जा सकता। देश में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता के संदर्भ में एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन की इस रिपोर्ट पर गौर करना उपयुक्त होगा जिसके मुताबिक देश की कक्षा पाँच के आधे से अधिक बच्चे कक्षा दो की किताब ठीक से पढ़ने में असमर्थ हैं। ये तथ्य हमारी प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता के सरकारी दावों के खोखलेपन को सामने लाने के लिए पर्याप्त है। विचार करें तो प्राथमिक या उच्च किसी भी शिक्षा में गुणवत्ता के लिए मुख्य रूप से दो बातें सर्वाधिक आवश्यक होती हैं – श्रेष्ठ व पर्याप्त शिक्षक और उत्तम पाठ्यक्रम। शिक्षकों की कमी की बात तो आए दिन उठते ही रहती है, पर इसके अलावा एक सवाल यह भी उठता है कि जो शिक्षक हैं, क्या वे इतने योग्य और कुशल हैं कि बच्चों को समुचित रूप से शिक्षा दे पाएं ? इस सम्बन्ध में तथ्य यही है कि शिक्षकों की कमी तो है, पर सरकारी स्कूलों में अधिक। निजी स्कूल इस समस्या से कम ग्रस्त हैं। अब रही बात उत्तम पाठ्यक्रम की तो यहाँ भी सबकुछ ठीक नहीं दिखता। हालत ये है कि एक एलकेजी कक्षा का बच्चा जब स्कूल निकलता है तो पीठ पर लदे बस्ते के बोझ के मारे उससे चला नही जाता। ये समस्या अंग्रेजी माध्यम या निजी स्कूल से शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों के साथ कुछ अधिक ही है। अंग्रेजी माध्यम के पाठ्यक्रम पर नज़र डाले तो उसमे केजी कक्षा के बच्चों के लिए तैयार पाठ्यक्रम दूसरी-तीसरी कक्षा के बच्चों के पाठ्यक्रम जैसा है। उदाहरण के तौर पर देखें तो जिन बच्चों  की बौद्धिक अवस्था गिनती-पहाड़ा सीखने की है, उनके लिए जोड़-घटाव सिखाने वाला पाठ्यक्रम निर्धारित है। अब ऐसे पाठ्यक्रम से ये उम्मीद बेमानी है कि बच्चे कुछ नया जानेंगे, बल्कि सही मायने में तो वे ऐसी पाठ्यक्रम के बोझ तले दबकर बच्चे पढ़ी चीजें भी भूल जाएंगे। इस प्रकार स्पष्ट है कि सरकारी स्कूल जहाँ कम शिक्षकों की समस्या से जूझ रहे, वहीँ निजी विद्यालय अनुचित पाठ्यक्रम चला रहे हैं। बच्चे पढ़ें तो कैसे और क्या पढ़ें ?
   निश्चित ही इन्हीं समस्याओं के मद्देनज़र आज अभिभावकों का स्कूली शिक्षा से विश्वास डगमगाने लगा है और वे ट्यूशन की शरण ले रहे हैं। लेकिन उन्हें कौन समझाए कि ट्यूशन में भी सबकुछ अच्छा नहीं है। ट्यूशन के प्रति उनके इस अन्धोत्साह का काफी अयोग्य शिक्षकों द्वारा अनुचित लाभ भी लिया जा रहा है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है कि देश के में गली-गली खासकर शहरी इलाकों में खुले छोटे-छोटे निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले तमाम शिक्षक-शिक्षिकाओं द्वारा स्कूल से छूटते ही सीधे वहीँ से बच्चों को अपने घर लाकर निजी ट्यूशन के नाम पर एक साथ चालीस-पचास बच्चों तक को ट्यूशन देने का चलन खूब देखने को मिल रहा है। परीक्षा में ये शिक्षक-शिक्षिकाएं स्कूल में मौजूद रहते हैं तो अपने पास पढ़ने वाले बच्चों की सहायता कर देते हैं जिससे उनके नंबर अच्छे आ जाते हैं और अभिभावक यह मान लेते हैं कि उनका बच्चा ट्यूशन के कारण पढ़ने में तेज हो रहा है, जबकि वास्तविकता कुछ और ही होती है। यह एक उदाहरण है, ऐसी ही और भी तमाम विसंगतियां ट्यूशन में मौजूद हैं। अब इन सब स्थितियों के मद्देनज़र यही कह सकते हैं कि देश की स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने की तरफ सरकार को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए जिसमे कि ऊपरी टीप-टाप से अधिक ध्यान शिक्षा की गुणवत्ता पर केन्द्रित हो। इसके अलावा शिक्षित अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चों को अन्धोत्साह में ट्यूशन  भेजने की बजाय यदि स्वयं समय निकालकर नियमित रूप से उन्हें पढाएं तो वे बच्चे ट्यूशन ले रहे बच्चों की अपेक्षा अधिक सुशिक्षित होंगे।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

परमाणु सुरक्षा पर वास्तव में गंभीर हों महाशक्ति देश [दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दैनिक जागरण 
विगत दिनों अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में चौथा परमाणु सुरक्षा सम्मलेन संपन्न हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल पर सं २०१० में इसकी शुरुआत की गई थी। तबसे अबतक २०१०, २०१२, और २०१४ में तीन बार यह सम्मेलन हो चुका है और यह चौथा आयोजन था। इसका उद्देश्य परमाणु सुरक्षा को लेकर विश्वव्यापी नीति बनाना और परमाणु प्रसार को नियंत्रित करना है। यह परमाणु सुरक्षा सम्मेलन इस नाते अत्यंत महत्वपूर्ण था कि हाल के दिनों में परमाणु सुरक्षा को लेकर चिंताएं बेहद बढ़ी हैं। पर सवाल यह उठता है कि इस सम्मेलन से परमाणु सुरक्षा को लेकर जो वर्तमान चिंताएं हैं, उनके निवारण के लिए  क्या दुनिया के देशों द्वारा कुछ कदम भी उठाए गए या यह सिर्फ बातों का ही मंच बनकर रह गया ? इस सम्मेलन में दुनिया के पचास देशों के शीर्ष नेताओं ने शिरकत की, मगर दुनिया का द्वितीय अघोषित महाशक्ति रूस इसमें शामिल नहीं हुआ, जिसने इसकी सफलता को प्रारंभ में ही संदिग्ध बना दिया। रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का सदस्य देश भी है, इस नाते भी उसका इस सम्मेलन में शामिल न होना चिंतित करता है। दरअसल रूस के इस सम्मेलन में उपस्थित न होने का कारण यह माना जा रहा है कि उसे सम्मेलन का एजेंडा तय करने की प्रक्रिया से दूर रखा गया, इस नाते नाराजगी के कारण वो इसमें शामिल नहीं हुआ। बहरहाल एक तरफ यह परमाणु सुरक्षा सम्मेलन हो रहा था और दूसरी तरफ उत्तर कोरिया के बैलिस्टिक परीक्षण की खबर सामने आई। इस परिक्षण ने कहीं न कहीं यह सिद्ध किया कि ऐसे सम्मेलन की वर्तमान दौर में अत्यंत प्रासंगिकता है।
भारत की बात करें तो इस सम्मेलन में शामिल भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के नेताओं को भारत की परमाणु सुरक्षा के विषय में आश्वस्त किया तथा आतंकियों के रूप में परमाणु सुरक्षा के खतरे को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हम किसी गुफा में छिपे आदमी की तलाश नहीं कर रहे हैं, अब हमें उस आतंकी की तलाश है, जो शहर में मौजूद है और जिसके पास एक कंप्यूटर और स्मार्टफोन है। तीसरा, परमाणु तस्करों और आतंकियों के साथ मिलकर काम करने वाले सरकारी तत्व सबसे बड़ा खतरा पैदा करते हैं’ आतंकवाद के विकसित हो जाने की बात कहते हुए पीएम मोदी ने कहा कि आतंकी 21वीं सदी की तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, ‘लेकिन हमारी प्रतिक्रियाएं अब भी पुराने जमाने की हैं। पीएम ने स्पष्ट किया कि  आतंकवाद की पहुंच और आपूर्ति श्रृंखला वैश्विक है लेकिन देशों के बीच स्वाभाविक सहयोग वैसा नहीं है। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए दुनिया के सामने विभिन्न उपाय भी रखे जिनमे उनका मुख्य जोर तकनीक के द्वारा परमाणु सुरक्षा को करने पर रहा। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने मेरा आतंकी और दूसरे का आतंकी जैसी अवधारणा को भी खारिज करते हुए दुनिया से एकजुट होकर आतंकवाद के विरुद्ध लड़ने और परमाणु सुरक्षा का आह्वान किया। भारत की तरफ से तो ये जो बातें कही गईं हैं, भारत उनका समुचित पालन भी करता है। लेकिन दुनिया के अन्य देशों की कथनी-करनी में ऐसी समानता नहीं दिखती।
इसी प्रकार इस सम्मेलन में आए सभी राष्ट्राध्यक्षों ने परमाणु सुरक्षा को लेकर तरह-तरह की बातें की और सुझाव दिए। लेकिन सवाल यही है कि क्या परमाणु सुरक्षा को लेकर दुनिया के सभी देश वास्तव में प्रतिबद्ध हैं ? चूंकि, इस सम्मेलन में शामिल तमाम देशों का व्यवहार तो ऐसा नहीं दिखाता कि वे परमाणु सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं। २०१० में जिस अमेरिका की पहल पर इस सम्मेलन की शुरुआत हुई थी, खुद उसका रुख ही परमाणु सुरक्षा और प्रसार को लेकर गंभीर नहीं दिखता। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा परमाणु सुरक्षा की बात कर रहे, तो वही दूसरी तरफ उन्हीके देश में राष्ट्रपति के लोकप्रिय उम्मीदवार के रूप में उभर रहे डोनाल्ड ट्रंप ने अभी एक बयान में कहा कि अमेरिका को दक्षिण कोरिया आदि देशों की सुरक्षा नहीं करनी चाहिए बल्कि इन देशों को भी परमाणु शक्ति विकसित कर लेनी चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के संभावित राष्ट्रपतियों में से एक हैं, इसलिए उनका यह बयान हलके में नहीं लिया जा सकता। चीन की बात करें तो अघोषित रूप से ही सही पर इस बात में किसीको कोई संदेह नहीं कि उत्तर कोरिया जैसा कंगाल देश अगर एक से बढ़कर परमाणु परीक्षण कर रहा है तो इसके पीछे चीन का ही सहयोग है। रूस ने तो इस बार इस सम्मेलन से किनारा ही कर लिया। ये सब दुनिया के परमाणु शक्ति संपन्न और शक्तिशाली देश हैं, अतः इनका यह रुख चिंताजनक है। अगर परमाणु सुरक्षा करनी है तो समय की आवश्यकता है कि दुनिया के ये महाशक्ति देश निजी हितों से ऊपर से उठकर परमाणु सुरक्षा पर ध्यान केन्द्रित करें।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

चीन-पाक गठजोड़ पर क्या हो भारत की रणनीति ? [दैनिक जागरण राष्ट्रीय और हरिभूमि में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दैनिक जागरण 
एक कथन है कि शत्रु का शत्रु सबसे अच्छा मित्र होता है। चीन यह बात बहुत अच्छे से जानता है। इसी नाते वह भारत से शत्रुता मानने वाले देश पाकिस्तान को साधने तथा उसका भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की लगातार कोशिश करता रहता है, जिसमे कि उसे अपेक्षित कामयाबी भी मिली है। इसका सबसे ताजा उदाहरण तब देखने को मिला जब अभी हाल में भारत द्वारा पठानकोट हमले तथा देश में हुए अन्य कई और आतंकी हमलों के गुनाहगार जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबन्ध लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पेश किया गया। भारत के इस प्रस्ताव पर विचार करने को १५ में से १४ देश सहमत थे लेकिन, अकेले चीन इसके विरुद्ध खड़ा था और उसने भारत के इस प्रस्ताव के खिलाफ अपने वीटो का प्रयोग कर इसे निष्प्रभावी कर दिया। चीन ने तर्क यह दिया कि मसूद अज़हर आतंकी होने के संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित मानदंडों को पूरा नहीं करता है, इसलिए उसपर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता। भारत ने इसपर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया जरूर जाहिर की है, मगर उससे चीन पर कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिख रहा। दरअसल यह तो एक मौका है जब चीन का पाक-प्रेम और भारत विरोध अंतर्राष्ट्रीय पटल पर सामने आया है, अन्यथा तो वो लम्बे समय से और विभिन्न स्तरों पर भारत के खिलाफ पाक का साथ देता रहा है। विगत दिनों चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पाकिस्तान दौरे के दौरान भी चीन का ऐसा ही कुछ रुख देखने को मिला था, जब उसने इस दौरे के दौरान भारत की तमाम आपत्तियों के बावजूद गुलाम कश्मीर से होकर गुजरने वाले ४६ अरब डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर की शुरुआत कर दी थी। इसके अलावा तमाम चीन की तरफ से पाकिस्तान को घोषित-अघोषित रूप से तमाम आर्थिक व तकनिकी सहयोग आदि मिलता ही रहता है। साथ ही, जमू-कश्मीर विवाद को लेकर भी चीन अकसर पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा होता रहा है और पाक अधिकृत कश्मीर में तो उसके सैनिकों की मौजूदगी की बात भी सामने आ चुकी है।
  अब वैसे तो चीन का पाक-प्रेम नया नहीं है मगर, हाल के एकाध वर्षों में ये प्रेम काफी ज्यादा बढ़ता दिख रहा है। इसका कारण यही प्रतीत होता है कि विगत वर्ष भारत में नई सरकार के गठन के बाद से ही  भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारतीय विदेश नीति को जिस तरह से साधा गया है, उसने कहीं न कहीं भीतर ही भीतर चीन को परेशानी में डाल दिया है। फिर चाहें वो एशिया हो या योरोप।।मोदी भारतीय विदेश नीति को सब जगह साधने में पूर्णतः सफल रहे हैं। एशिया के नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव, जापान  आदि देश हों, विश्व की द्वितीय महाशक्ति रूस हो या फिर यूरोप के फ़्रांस, जर्मनी हों अथवा स्वयं वैश्विक महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका हो, इन सबके दौरों के जरिये प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले 2०-२२ महीनों के दौरान भारतीय विदेशनीति को एक नई ऊँचाई दी है। साथ ही इनमें से अधिकांश देशों के राष्ट्राध्यक्षों का भारत में आगमन भी हुआ है, जिसने न केवल एशिया में वरन पूरी दुनिया में भारत की साख में भारी इजाफा किया। भारत की यह बढ़ती वैश्विक साख ने चीन को परेशान किया हुआ था कि तभी भारत के दबाव में आकर श्रीलंका ने चीन को अपने यहाँ बंदरगाह बनाने की इजाजत देने से इंकार कर दिया। वहीँ दूसरी तरफ भारतीय प्राधानमंत्री नरेंद्र मोदी मॉरीशस और सेशेल्स में एक-एक द्वीप निर्माण की अनुमति प्राप्त कर लिए। इन बातों ने चीन को और परेशान कर के रख दिया। कहीं न कहीं भारत की इन्हीं सब कूटनीतिक सफलताओं से भीतर ही भीतर बौखलाए चीन की बौखलाहट इन दिनों  पाकिस्तान पर हो रही भारी मेहरबानी के रूप में सामने रही है। कहने की जरूरत नहीं कि इन सब गतिविधियों के मूल में चीन का  एक ही उद्देश्य है कि पाकिस्तान के जरिये भारत को दबाया जाय और परेशान किया जाय। चूंकि, पाकिस्तान भारत का ऐसा निकटतम पडोसी है, जिससे भारत के सम्बन्ध अत्यंत खटास भरे रहते आए हैं और विदेश नीति तमाम सफलताओं के बावजूद भारत-पाक सम्बन्ध आज भी पूर्व की ही तरह अस्थिर हैं। चीन भारत-पाक संबंधों की इसी अस्थिरता का लाभ लेने की कोशिश में रहता है और कूटनीतिक दृष्टिकोण से उसका ये करना गलत भी नहीं कहा जा सकता। ऐसे में, सवाल यह है कि चीन-पाक के इस गठजोड़ का भारत के लिए कितना महत्व है ? क्या इसमें भारत के लिए चिंतित होने जैसा कुछ है ? निस्संदेह चीन की असीमित शक्ति और पाकिस्तान की कुटिल प्रवृत्ति का ये एका भारत के लिए चिंताजनक है और इस सम्बन्ध में भारत को पूरी तरह से सचेत रहने की आवश्यकता है।
हरिभूमि 
   अब सवाल यह उठता है कि भारत चीन-पाक के इस गठजोड़ के खिलाफ किस रणनीति के तहत चले कि चीन को जवाब भी मिल जाए और भारत को कोई हानि भी न हो। मतलब कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। इस संदर्भ में किसी विद्वान का यह कथन उल्लेखनीय होगा कि अटैक इज द बेस्ट डिफेंस। भारत के प्रति चीन की विदेश व कूटनीति हमेशा से इसी कथन पर आधारित रही है। वो शुरू से ही भारत के प्रति यही नीति अपनाता रहा है, पर भारत ने हमेशा से चीन के प्रति रक्षात्मक रवैया अख्तियार करने में ही विश्वास किया है। मगर अब समय बदल गया है तो भारत को अपने इस रक्षात्मक रुख में परिवर्तन लाना चाहिए और कहीं न कहीं भारत द्वारा ऐसा किया भी जा रहा है। चीन के प्रति आक्रामक रुख अपनाते हुए भारत चाहे तो उसे उसीकी नीतियों के जरिये दबा सकता है। अब जैसे कि चीन-पाक गठजोड़ का प्रश्न है तो चीन के इस वार का प्रतिकार भारत जापान के रूप में कर सकता है। चूंकि, विगत कुछ वर्षों से चीन-जापान संबंधों में समुद्री द्वीपों को लेकर काफी खटास आई है। भारत इस स्थिति का लाभ लेते हुए जापान को अपनी ओर कर चीन को काफी हद तक परेशान कर सकता है। इसके अलावा अन्य छोटे और कमजोर एशियाई देशों से अपने संबंधों को बेहतर कर तथा उनका समर्थन हासिल करके भी भारत चीन-पाक गठजोड़ की चीनी कूटनीति को जवाब दे सकता है। सुखद बात यह है कि मोदी सरकार के आने के बाद इस दिशा में कदम उठाए गए हैं, लेकिन जरूरत है कि इन संबंधों को और मजबूती दी जाय तथा कूटनीतिक दृष्टिकोण से इनका लाभ लेने के लिए कदम भी उठाए जाएं। ऐसे ही, जम्मू-कश्मीर मामले में चीन के हस्तक्षेप को जवाब देने के लिए भारत का सबसे उपयुक्त अस्त्र तिब्बत है। वैसे भी, तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा भारत से अत्यंत प्रभावित रहते आए हैं। ऐसे में, भारत को चाहिए कि वो दलाई लामा को अपने साथ जोड़कर चीनी नाराजगी की परवाह किए बगैर तिब्बत मामले को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए चीन पर दबाव बनाए कि वो तिब्बत को स्वतंत्र करे। इनके अतिरिक्त और भी तमाम उपाय हो सकते हैं, जिनके जरिये भारत चीन की कूटनीतिक चालों का समुचित उत्तर दे सकता है। बशर्ते कि भारत अब अपनी अतिरक्षात्मक और किसी भी कीमत पर शांति की नीति को तिलांजलि देकर आक्रामक रूख अपनाए और यह स्मरण रखे कि विदेश नीति में सबसे ऊपर केवल और केवल राष्ट्रहित होता है।