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रविवार, 28 मई 2017

पुस्तक समीक्षा : दिल के जज्बातों के टूटे-फूटे दस्तावेज़ [दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
दिमाग की दलीलों को दरकिनार कर अगर केवल दिल की सुनते हुए कहानी लिखी जाए तो वो कैसी होगी, इसीकी बानगी हैं ज्योति जैन के कहानी संग्रह ‘इबादत को इज़ाज़त है’ की कहानियां। इस संग्रह में कहने को तो कुल मिलाकर सोलह कहानियां हैं, मगर उनमें से कई कहानियां ऐसी हैं, जिन्हें कहानी कहने में शायद कहानी के मूलभूत तत्वों की अवमानना हो जाए। सीधे शब्दों में कहें तो लेखिका के दिल में जो उद्गार आए हैं, उसे उन्होंने बिना अतिरिक्त सोच-विचार के कागज़ पर उतार दिया है। कुछ एक कहानियों में कथानक की मौजूदगी रही है, तो कुछ ऐसी भी हैं जिनमें कथानक गौण रहा है। 
 
दैनिक जागरण
फ्रेंड्स फॉरएवर, रॉंग नंबर, बिना आई लव यू का प्यार, एसिड मेरा प्यार जैसी कुछ कहानियों में लेखिका ने प्रकट रूप से एक कच्चा-पका कथानक गढ़ा है; वहीँ इश्क महल, अधूरी, मौत का महापर्व, मुझे बचा लो आदि कहानियों में कथानक गौण रूप से मौजूद रहा है। अपनी कहानियों के चरित्रों को गढ़ने में लेखिका पूरी तरह से आदर्शवादी रही हैं। इन कहानियों के पात्र एकदम दिल से सोचते हैं। दोस्ती, प्यार, सच्चाई, ईमानदारी जैसी चीजों को निभाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार दिखते हैं। आधुनिक जीवन-मूल्यों के अनुसार इन कहानियों काफी कुछ असंभव और विचित्र सा लगता है, लेकिन जब हम इन कहानियों का मूल्यांकन दिल से सोचते हुए करते हैं, तो वो विचित्रता सामान्य प्रतीत होने लगती है। 

अब अगर बात गौण कथानक वाली कहानियों की करें तो ये कहानियां प्रभावोत्पादक हो सकती थीं, बशर्ते कि इनपर लेखिका ने थोड़ी और गंभीरता दिखाई होती। इन्हें थोड़ा और विस्तार दिया होता तथा सिर्फ किसी एक चरित्र के एकालाप तक सीमित रखने की बजाय कुछ और पात्रों के भी अंतर्द्वंद्वों को उकेरने का प्रयास किया होता। संग्रह की एक कहानी ‘डायरी के हर्फ़’ अपने प्रस्तुतिकरण की शैली से प्रभावित करती है। यह कहानी पूरी तरह से डायरी की शैली में लिखी गयी है। लेकिन, आखिर ये भी चरित्रों और कथानक का समुचित विस्तार न होने की समस्या से ग्रस्त दिखाई देती है। फिर भी इसे इस संग्रह की सबसे बेहतर कहानी कहा जा सकता है।

कुल मिलाकर लेखिका ने कहानियां दिल से लिखी हैं, जिस कारण उनमें काफी कुछ अटपटा और विचित्र-सा आ गया है, मगर बावजूद इसके ये प्रभाव छोड़ सकती थीं अगर इनके कथानक पर थोड़ी और गंभीरता, धैर्य और सजगता से काम किया गया होता। फिलहाल ये दिल के जज्बातों के टूटे-फूटे दस्तावेज़ बनकर रह गयी हैं, इन्हें कोई ठोस आकार नहीं मिल सका है। हालांकि शैली और भाषा के मामले में ये कहानियां अवश्य प्रभावित करती हैं।

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा: अजीब लड़कियों की सुनी-अनसुनी कहानियां

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

अगर आपको कुछ बेबाक तो कुछ बेबाकीयत के लिबास में छिपी अश्लील; कुछ सच्ची, जमीनी और संदेशप्रद तो कुछ बस यूँ ही अनोखी कल्पना पर आधारित और अमान्य तर्कों से पुष्ट कहानियां एक साथ एक ही खर्चे में पढ़नी है तो प्रियंका ओम का कहानी संग्रह ‘वो अजीब लड़की’ बेशक आप ही के लिए है। इसमें आपको उपर्युक्त प्रकार का सब ‘मटेरियल’ बड़ी सहजता से मिल जाएगा। प्रियंका की इस किताब में कुल चौदह कहानियाँ हैं, जिनमे अधिकांश कहानियाँ चरित्र प्रधान हैं। हाँ, कुछेक कहानियों में घटना और चरित्र के बीच प्रधानता के लिए अंतर्द्वंद्व भी प्रतीत होता है। इन चौदह कहानियों में निरपवाद रूप से प्रधान चरित्र कोई न कोई स्त्री ही है, यहाँ तक कि जो कहानियां किसी पुरुष पात्र को केंद्र में रखकर शुरू हुई हैं, उनमे भी अंत आते-आते कोई न कोई स्त्री प्रधान चरित्र के रूप में स्थापित हो जाती है। प्रियंका एक स्त्री हैं तो उनकी कहानियों में ऐसी स्थिति होना कोई अस्वाभाविक बात भी नहीं है। स्त्री चरित्र की प्रधानता वाली इन कहानियों में स्त्रियों से सम्बंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं, विसंगतियों और उनके प्रतिक्रियास्वरुप स्त्रियों की मनोदशाओं को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। किसी कहानी में ये प्रयास पूर्णतः सफल है तो किसी में इसकी विफलता के चिन्ह भी दिखते हैं।
इन कहानियों में से कुछ कहानियाँ स्त्रियों के प्रति पुरुष समाज की मानसिकता को बड़ी ही कटुता से उजागर करती हैं तो कुछ स्त्रियों के अतिभावुक स्वभाव और उससे होने वाली समस्याओं को रेखांकित करती हैं। स्त्री के निकट होने पर पुरुषों की समस्त विचारशक्ति  घूम-फिरकर अंततः उसकी देह पर ही कैसे केन्द्रित हो जाती है, इसकी प्रस्तुति संग्रह की कहानी ‘दोगला’ में अच्छे ढंग से हुई है। हम देखते हैं कि कैसे दिल्ली के एक बड़े अख़बार के अतिसंभ्रांत और सुप्रसिद्ध मुख्य संपादक महोदय यूपी से आई एक सामान्य सी लड़की पर या उसकी देह पर एकदम न्योछावर हो जाते हैं। किसी सामान्य व्यक्ति को आश्चर्यजनक लग सकता है कि कैसे एक बड़ा और प्रतिष्ठित संपादक एक मामूली सी लड़की के आगे बेबस और लाचार हो जाता है! हालांकि उन लोगों को इस बेबसी और लाचारियत में छिपे निर्दय ढोंग का अंदाज़ा शायद ही हो। लेकिन, जो साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े लोग हैं, वे इस स्थिति को भलीभांति जानते और समझते हैं कि वास्तविकता इस कहानी से अधिक भिन्न नहीं है। एक बड़ी साहित्यिक पत्रिका के ख्यातिलब्ध दिवंगत संपादक महोदय के विषय में तो इस किस्म के किस्से काफी प्रसिद्ध हैं।
अधिकांश स्त्रियाँ व्यावहारिक कम भावुक अधिक होती हैं और भावुकता में अक्सर कैसे गलत रास्तों को चुन लेती हैं, संग्रह की कहानी ‘मृगमरीचिका’ इस बात को बाखूबी सामने लाती है। सोशल साईट पर एक लड़के के लुभावने शब्दजाल में फंसकर प्रीती उसमे न केवल अपने बचपन का बिछड़ा प्यार देखने लगती है, बल्कि अपने पति को भूल उसके प्रति आकर्षण भी महसूसने लगती है। हालांकि वो जल्दी ही चेत भी जाती है और उसे आभास होता है कि जिंदगी भावनाओं और मखमली शब्दों से नहीं चलती, उसके लिए व्यवहारिक दृष्टिकोण की जरूरत होती है और उसका पति उससे मखमली बातें भले न करता हो, मगर वो उससे सच्चा और व्यवहारिक प्रेम करता है जिसके रहते वो कभी अकेली नहीं होगी। हालांकि इस कहानी का प्लाट पुराना है। पहले भी इस तरह की कुछेक कहानियाँ लिखी जा चुकी हैं, लेकिन इसका प्रस्तुतिकरण इसे अलग बनाता है। कथ्य-शिल्प हर स्तर पर दुरुस्त होने के कारण इसे इस संग्रह की सबसे अच्छी कहानी भी कह सकते हैं। ऐसे ही, ‘लावारिश लाश’, ‘वो अजीब लड़की’, ‘इमोशन’, ‘मौत की ओर’ आदि कहानियाँ भी स्त्रियों से जुड़े सामाजिक-मानसिक-आर्थिक आदि जीवन के विभिन्न पहलुओं को उद्घाटित करने का सफल-असफल प्रयत्न करती हैं।  
प्रियंका की कहानियों में सेक्स का भी भरपूर चित्रण है। अब कई कहानियों में यह सेक्स जहां कथा-तत्व की आवश्यकता के रूप में आया है तो कई में एकदम गैरजरूरी रूप में भी इसकी मौजूदगी नज़र आती है और जहाँ ये गैरजरूरी रूप में आया है, वहां इसने बड़ी सहजता से वह रूप ले लिया है जिसे साहित्य का पोर्नोग्राफीकरण कहते हैं। ‘सॉरी’ कहानी का यह अंश – “वो शायद महारानी कैथरीन है जिसने बहुत भारी-भरकम गाउन अपने हाथों से उठाया हुआ है जबकि मुँह आधा खुला है और वो पीछे देख रही है। सोल्जर जैसे कपड़ों में एक नवयुवक घुटनों पर बैठा है व उसकी जीभ महारानी कैथरीन के दोनों जाँघों के बीच में है।” – देखें तो यह एक अतिकामुक चित्र का अक्षरशः वर्णन है। इस कहानी के कथानक में इस अंश के होने न होने से कोई बहुत अंतर नहीं पड़ने वाला इसलिए इस अंश को बड़े आराम से छोड़ा जा सकता था या सांकेतिक रूप में लिखा जा सकता था। लेकिन अनावश्यक रूप से इसका पूरा वर्णन किया गया है। ऐसे ही, एक कहानी है – लाल बाबू। इस कहानी में न तो कोई कथानक है और न ही कोई अन्य कथा-तत्व। है तो सिर्फ और सिर्फ पोर्नोग्राफी। कहानी के केन्द्रीय पात्र लाल बाबू शुरू से अंत तक कभी अपनी चाची के साथ, कभी भाभी के साथ तो कभी किसी और के साथ सेक्सरत रहते हैं। यहाँ तक कि अपनी बहू पर भी उनकी नियत डोल जाती है। और आश्चर्य तो यह देखकर भी होता है कि उनकी चाची और भाभी कैसी स्त्रियाँ होती हैं कि वे झट उनके आगे बिछ जाती हैं! सवाल यह है कि लाल बाबू जैसे पुरुष होते कहाँ हैं ? भारत में तो कम से कम नहीं ही होते। फिर ऐसी कहानी लिखकर लेखिका क्या सन्देश देना चाहती हैं ? अगर लेखिका का उद्देश्य स्त्री को देह समझने की पुरुष समाज की मानसिकता को दिखाना है तो इस उद्देश्य की सिद्धि में उनकी यह कहानी एकदम विफल रही है। क्योंकि, बेशक समाज में स्त्रियों को सिर्फ देह समझने वाले मानसिक विकृति के शिकार पुरुष हैं बल्कि काफी अधिक हैं लेकिन, उनके प्रतिनिधि पात्र लाल बाबू तो कत्तई नहीं हो सकते। क्योंकि लाल बाबू की स्थिति स्त्री को देह समझने की मानसिकता से कहीं अधिक विकृत हैं, जो उन्हें सिर्फ और सिर्फ एक सेक्सहोलिक मनोरोगी व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। ऐसे ही, कुछेक और भी कहानियाँ हैं, जिनमे पूरी व्यवस्था के साथ सेक्स का आयोजन कर पोर्न प्रस्तुति की गई है। ये बिलकुल नहीं कह रहे कि कहानी में सेक्स का वर्णन-चित्रण वर्जित है। कत्तई नहीं! लेकिन, उसका एक तरीका है और उसके लिए जहाँ तक संभव हो सांकेतिकता का प्रयोग करने का प्रयास होना चाहिए न कि जानबूझकर ऐसी परिस्थितियों और संवादों का आयोजन किया जाय जिससे कि सेक्स उभरकर सामने आने लगे। ऐसा करने पर कहानी को फौरी तौर पर एक ख़ास किस्म का पाठकवर्ग जरूर मिल सकता है और कहानीकार को एक क्षणिक लोकप्रियता भी प्राप्त हो सकती है, मगर ऐसी कहानियों का कोई चिरस्थायी अस्तित्व नहीं होता।

बहरहाल, प्रियंका की कहानियों की जो एक ख़ास बात है वो ये कि उनमे शैली के स्तर पर काफी हद तक प्रयोग का दर्शन होता है। तमाम कहानियों में एक ही साथ वर्णनात्मक, पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक), नाटकीय आदि विभिन्न शैलियों का प्रयोग हुआ है। कई कहानियों में ये प्रयोग सफल और सार्थक रहा है तो कई में इस प्रयोग ने कहानी को काफी उलझाने  का भी काम किया है। अर्थात कि यह प्रयोग जहाँ कुछ कहानियों के लिए सफल रहा है तो कुछ की विफलता का कारण भी बना है। बावजूद इसके कहना होगा कि शैली के स्तर पर प्रियंका थोड़ी गंभीरता बरतते हुए लेकिन ऐसे ही बेबाकी के साथ अगर लिखती रहें तो इस दिशा में उनके अन्दर काफी संभावनाएं प्रतीत होती हैं और वे काफी अच्छा कर सकती हैं। यह उनका पहला कहानी संग्रह है तो इसके लिए शुभकामनाएँ देते हुए आशा करते हैं कि भविष्य में उनकी रचनाओं में और व्यापकता, तथ्यात्मकता, सुग्राह्यता, शालीनता और उद्देश्यपरकता आएगी। 

शनिवार, 1 अगस्त 2015

पुस्तक समीक्षा: आम ज़िन्दगी के मसालों की चाय



  •  पीयूष द्विवेदी भारत

अगर आप कहानी को केवल क्रांति का दूत मानते हैं और उससे किसी परिवर्तन के पुकार की उम्मीद रखते हैं तो मुफ्त सलाह है कि आप दिव्य की ‘मसाला चाय’ से परहेज कीजिए। यह आपके दिमाग का हाजमा बिगाड़ सकती है। ये वो लेखन है जिसके होने की बुनियादी शर्त ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की तरह जीना और उसे उसी रूप में लिख देना है। मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि  मसाला चाय की सभी ग्यारह कहानियों में से ज्यादातर कहानियों के कथानक के लिए दिव्य को ज्यादा सोचना नहीं पड़ा होगा; अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ी होगी। कारण कि ये वो कहानियाँ हैं जो बड़े आराम से रोजमर्रा के जीवन में मिल जाती हैं। ये ज़िन्दगी के वो स्वादु-बेस्वादु मसाले हैं जो रोज तमाम लोगों की ज़िन्दगी को फीका-तीखा-मीठा  करते रहते हैं। इसकी कुछ कहानियों में जीवन के कुछ निश्चित सन्देश और सचाइयां भी हैं, पर हर कहानी में नहीं। कुछ कहानियाँ ऐसी हैं जैसे कि लेखक अपने जीवन के किसी हिस्से को  सीधे-सीधे बता रहा हो। कुछ कहानियाँ तो सिर्फ वो हैं जो लेखक ने देखा, जिया और महसूस किया है। कहने का मतलब ये है कि इसकी हर कहानी एक या उससे अधिक मसालों से छौंकी हुई है और अधिकत्तर कहानियों में अलग-अलग मसाले हैं। जैसे इसकी पहली कहानी ‘विद्या कसम’ बच्चा समाज  की स्थिति और विशेषताओं को दिखाते हुए बच्चों में सहज ही मौजूद मासूमियत, दुनियावी प्रपंचों से  बेखबरी तथा बड़ों की मानसिक कुरूपताओं को दिखाती है, तो वहीँ Fill in the blanks कहानी पति द्वारा छोड़ी हुई लेकिन पूरी तरह से मजबूत और आत्मनिर्भर औरत जो एक बेटी की माँ भी है, के प्रति समाज के दकियानूसी सोच और नज़रिए की कहानी है। पूरी तरह से आत्मनिर्भर होने के बावजूद बस एक पति न होने के कारण कावेरी को लेकर समाज का नजरिया ऐसा हो जाता  है कि सिर्फ घर में उसके होने के कारण उसकी बहन की शादी में अड़चन आने लगती है और उसे अपनी माँ का घर छोड़कर जाना पड़ता है। इसके अलावा keep quit  कहानी सेक्स जैसी प्राकृतिक चीज को लेकर बच्चों के समक्ष बड़ों के छुपा-छुपौव्वल और इससे बच्चों में पैदा होने वाली गलतफहमी के दुष्प्रभाव को दिखाती है। हम देखते हैं कि कैसे बचपन से जवानी की तरफ बढ़ रही धुन सेक्स से अनजान होने के कारण उसीको प्यार समझ लेती है तो उसकी सहेली सुरभि प्यार को गन्दी बात ही समझने लगती है। ‘केवल बालिगों के लिए’ भी इसी तरह के पाखण्ड की ही  कहानी है। ये तो कुछ सन्देश देने वाली कहानियां हुईं, इनके अलावा jeewanshadi  डॉट कॉम, Love you forever, Bed Tea  आदि ऐसी कहानियाँ जिनमे कोई खास सन्देश-वंदेश नहीं, मगर लेखक का अपना या जिस किसीका भी हो, वास्तविक जीवन वर्णन ज्यादा दिखता है। अब बात करते हैं ‘फलाना collage of engineering’  कहानी की जो कि न सिर्फ इस किताब की सबसे लम्बी कहानी है बल्कि सबसे शानदार भी। इसे ‘मसाला चाय’ की हासिल-ए-किताब कहानी कह सकते हैं। यह ऐसी कहानी है जिसपर दिव्य चाहें तो अलग से एक उपन्यास भी लिख सकते हैं।
  दिव्य हैं तो हिंदी के लेखक मगर उनकी भाषा शुद्ध हिंदी नहीं, बल्कि वो हिंग्लिश है जो आज के युवा वर्ग को समझ आती है। ये उनकी कहानियों के नामों से भी जाहिर हो जाता है। इस भाषा से हिंदी के शुद्धतावादियों को बहके दिक्कत हो, मगर यह दिव्य की बड़ी ताकत है। चूंकि वो जो और जिसके लिए लिख रहे हैं, उसके लिए इससे अच्छी भाषा और नहीं हो सकती। इस भाषा में भी जो सहजता दिव्य ने रखी है, वो काबिले तारीफ़ है। संवाद इतने सजीव बन पड़े हैं कि कहानी से पाठक अनायास ही जुड़ जाता है। हालांकि शैली की दृष्टि से लगभग सब सामान्य ही है। हाँ, फलाना collage of engineering  में कुछ नवीनता अवश्य है कि निबंध की तरह हर घटना का अलग से हेडिंग देकर वर्णन किया गया है। इसे कुछ हद तक नया प्रयोग कहा जा सकता है।
  आखिर में कुल मिलाकर यही कहेंगे कि दिव्य की ये कहानियाँ मोटे तौर पर आज के बदलते सामजिक परिवेश और उससे प्रभावित युवा मन की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। दिव्य के अधिकत्तर पात्र शहरी मध्यमवर्ग के हैं। आज जब तमाम लेखकों-लेखिकाओं द्वारा हिंदी कहानी को निरपवाद रूप से विमर्श की वस्तु बनाकर रख दिया गया है और उसमे से उसका कहानीपन लगभग खोता जा रहा है, ऐसे वक़्त में दिव्य की ये कहानियाँ हिंदी कहानी के कर्णधारों को एक नया रास्ता दिखाने का काम जरूर कर सकती हैं। इस बेहतरीन प्रयास के लिए उनको अशेष बधाइयाँ...!


गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

कहानी : पाखंडी [त्रैमासिक पत्रिका कथाबिम्ब में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

भाग : १

“केशरलाल ‘उग्र’…कभी तो कुछ तार्किक व तथ्यात्मक लिख लिया करो कि बस हवाबाजी ही आती है। खुशियाँ मनी थीं तुम्हारे संघ में गोडसे के कृत्य पर…आज खूब गांधी याद आ रहे हैं…तुम जैसे दोगलों से बहस करने में अपना टाइम नहीं ख़राब कर सकती..उगलते रहो तुम, जो जी में आए..पर यहाँ नहीं!” अपनी पोस्ट पर यह टिप्पणी पोस्ट करने के बाद सुप्रिया ने उक्त शख्स की प्रोफाइल खोली और फिर उसका कर्सर सीधे ब्लॉक के विकल्प पर ही आकर रुका। उक्त शख्स को ब्लॉक करने के बाद उसने चैट बॉक्स पर नज़र डाली। ढाई सौ के आसपास लोग ऑनलाइन थे, पर शायद उसके काम का कोई नहीं। अब उसका कर्सर लॉगआउट पर था और वो उसपर क्लिक करने ही जा रही थी कि तभी चैट बॉक्स में एक नाम के आगे की बत्ती हरी हो गई। उसके चेहरे पर हल्की सी क्रोधमिश्रित मुस्कान आई और उसका कर्सर तुरंत लॉगआउट से हटकर उस नाम पर पहुँच गया। नाम पर क्लिक करते ही चैट खुल गई। नाम था विवेक कुमार।
कथाबिम्ब 
“आज आए क्यों नहीं ? पूरे आधे घंटे वेट कीं तुम्हारा, पर तुम तो लापता….नम्बर भी बंद ? थे कहाँ ?” यह लिखकर उसने इंटर का बटन दबाया। विवेक कुमार के आगे यह सन्देश खुला..वह अभी ‘वीर सावरकर’ के विचारों से सम्बंधित एक पोस्ट पर टिप्पणी डालने में मशगूल था। उसने एक नज़र सन्देश पर डाली और हल्का मुस्कुराया…और बिना जवाब दिए टिप्पणी लिखता रहा… ”आज जब  पश्चिमी (कु)लेखकों सहित भारत के भी लाल सलामी प्रज्ञाचक्षुओं द्वारा हमारे इतिहास का कचड़ा किया जा रहा है, ऐसे समय में सावरकर और उनके लिखे की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। इस समय में उनका लिखा हमें हमारे अतीत की सही पहचान करा सकता है।” इस प्रकार टिप्पणी पूरी करके उसने इंटर का बटन दबाया। फिर सुप्रिया के सन्देश की तरफ देखा जो पिछले पांच-छः मिनट से आया पड़ा था। इधर सुप्रिया बेचैन थी कि पांच मिनट हो गए मैसेज भेजे और अबतक जवाब नहीं। कहीं लॉग इन करके कुछ और तो नहीं करने लगा या कहीं किसी और के साथ तो नहीं न…? कर क्या रहा है आखिर…? ‘विवेक इज टाइपिंग’ चैट में ऐसा दिखते ही सुप्रिया को कुछ राहत हुई।
“सॉरी फॉर वेट डियर! कॉलेज के बाद थोड़ा कुछ काम था..उसीमे फंस गया था।” यह सन्देश आया।
“व्हाट सॉरी! कितना वेट करवाए.. और अभी भी रिप्लाई करने में पांच मिनट लग गए? वैसे क्या काम था कि एक फोन तक नहीं कर सके ?”
“अरे यार! कॉलेज के बाद अचानक प्रोग्राम बन गया…गोवध के खिलाफ प्रोटेस्ट करने की तैयारी हो गई। बस उसीमे निकल गया। फिर तो प्रोटेस्ट, पुलिस, खींचतान वगैरह-वगैरह में सच कहूँ तो तुम्हारा ख्याल ही दिमाग से निकल गया।”
“ओह! फिर भी बता दिए होते तो सही रहता । वैसे, ठीक तो हो…कहीं चोट-वोट तो नहीं न लगी ?”
“ठीक हूं… तभी तो तुमसे चैटिया रहा हूं वर्ना तो कहीं पड़ा होता…किसी अस्पताल में..आह-उह कर रहा होता।”
“ओके..ओके…अब ज्यादा नौटंकी नहीं। कहती हूं कि इन फालतू के प्रोटेस्ट वगैरह से दूर रहा करो तो सुनते नहीं हो। खैर छोड़ो! मै भी किसे समझाने लगी। अच्छा! अब जल्दी बताओ कि कब मिल रहे हैं, फिर मै लॉगआउट करूँ। अभी मोटा सा असाइंमेंट भी करना है। जल्दी बताओ?”
“मिलते हैं कल उसी टाइम उसी पार्क में, जहाँ आज मिलना था…लेकिन मेरे प्रोटेस्ट को गलत कहने से पहले याद कर लो कि तुम मेरी इस तरह की समझावन  कितनी सुनती-मानती हो ?” इस मैसेज को पढ़ सुप्रिया के चेहरे पर हल्की-सी  मुस्कान आ गई, उत्तर में भी वो मुस्कान यानि स्माइली ही भेजी  और फिर लॉगआउट कर गई। लॉगआउट के बाद असाइंमेंट करने की तरफ मुड़ी, लेकिन उसके दिमाग में अब भी विवेक के ही ख्याल चल रहे थे। और ख्याल हों भी क्यों न! आखिर विवेक के ही कारण तो आज वो सही-सलामत थी। अपने गांव-घर से हजारों किलोमीटर दूर, इस दिल्ली शहर में जहाँ उसके गिनती के एकाध वो भी बस कहने भर के रिश्तेदार रहते हैं, तब कौन पूछने वाला था उसे, अगर विवेक न होता। लगभग दस महीने ही तो हुए जब एक मंत्री के महिला पहनावों पर दिए विवादित बयान के विरोध में आइसा ने मंत्री के घर के सामने प्रदर्शन का कार्यक्रम बनाया था। वह भी थी बैनर लिए। मंत्री के घर के पास पहुँचते ही पुलिस की धर-पकड़ शुरू हो गई, धक्का-मुक्की हुई, लाठियां चलीं….पता ही नहीं चला कि अहिंसा और एकजुटता के साथ शुरू हुआ विरोध कब हिंसात्मक होकर बिखर  गया। कुछ कंकड़-पत्थर चलाकर गिरफ्तार हुए, कुछ भाग गए। इसी धर-पकड़ में भागते हुए वो एक बाइक की चपेट में आ गई। बाइक एक पाँव को रौंदते हुए निकल गई थी।  चोट बहुत ज्यादा नहीं थी लेकिन इतनी थी कि दर्द के मारे उससे चला नहीं जा रहा था। बाइक वाला तो तुरंत निकल लिया, और कोई भी खुलकर मदद को आगे नहीं आ रहा था। छटपटा रही थी वो कि तभी बगल से गुजर रही एक ऑटो रुकी और उसमे से एक लड़का उतरा। वो था विवेक।  झटपट उसको सहारा देकर ऑटो में बिठाया। ऑटो सीधे अस्पताल पर रुकी थी। डॉक्टर ने जांच के बाद कोई विशेष अंदरूनी क्षति न होने की घोषणा करते हुए मरहम-पट्टी आदि कर दी। वो नहीं चाहती थी कि इस थोड़ी सी चोट के लिए घर पर लोग परेशान हों। घरवालों की परेशानी से भी ज्यादा दिक्कत उसे पापा से थी क्योंकि वे कभी नहीं चाहते थे कि वो पढने के लिए उनसे दूर दिल्ली जाए। वे वाराणसी में सरकारी मुलाजिम थे और चाहते थे कि सुप्रिया वहीँ बीएचयू से अपनी पढ़ाई करे। लेकिन काफी जिद और जिरह के बाद वो यहाँ दिल्ली आई थी। इन्हीं सब कारणों से जब विवेक ने उसके घर सूचना देने के लिए नंबर माँगा तो उसने मना कर दिया कि यह सूचना मिलते ही पापा आकर उसे घर चलने के लिए भाषण सुनाने लगेंगे। सोचा कि जब ठीक हो जाएगी तब बता देगी। एकदिन अस्पताल में रहने के बाद अपने मित्रों जिनके साथ वो रहती थी, को बुलाकर उनके साथ अपने आवास चली गई। लेकिन इस एकदिन में विवेक ने उसकी जो मदद की थी, जो ख्याल रखा था, उस कारण  विवेक को लेकर एक आकर्षण सा महसूसने लगी थी वो। इसीलिए तो रिकवर करने के बाद उसने विवेक से दोस्ती बढ़ा ली। फोन से लेकर मुलाकात तक। बातों-बातों में पता चला कि वो डीयू में राजनीति शास्त्र से परास्नातक कर रहा है। वो खुद भी जेएनयू से यही तो कर रही थी। इस तरह विषय तो मिले, पर विचार नहीं….लेकिन विचार अपनी जगह होते हैं और मानवीय संवेदनाएं अपनी जगह। आखिर सब विचारों, वादों से पहले हर कोई एक मनुष्य ही तो होता है। विवेक की मानवीय संवेदना उसने देखी थी इसलिए विचारों को दरकिनार कर उससे करीबी बढ़ाती गई। उनके बीच वैचारिक चर्चा कभी नहीं छिड़ती। इस तरह दोस्ती बढ़ी….और फिर धीरे-धीरे जाने कब यह दोस्ती उस रिश्ते में बदल गई जिसे इश्क, लव, प्यार वगैरह कहा जाता है…अभी घड़ी में रात के दो बज रहे थे, असाइंमेंट पूरा हो चुका था। उसने लाइट बंद की और नींद के हवाले हो गई।

भाग : २

पार्क काफी हद तक खाली था। काफी दूरी-दूरी पर लोग दिख जाते थे। अधिकत्तर लोग युवा ही थे। इन्हीं के बीच एक किनारे एक पेड़ के नीचे ये जोड़ा मौजूद था। सुप्रिया की जींस ढकित जाँघों पर सिर रखकर लेटे विवेक का हाथ रह-रहके कभी उसके बालों, कभी गालों, कभी उरोजों पर पहुँच जाता था। सुप्रिया के चेहरे से लग रहा था कि वो विवेक की इन हरकतों से अच्छा नहीं महसूस कर रही। असहजता के भाव थे। लेकिन विवेक को उसकी परवाह कहाँ वो तो अपनी धुन में मस्त था। धीरे-धीरे उसके होठ सुप्रिया के चेहरे की तरफ बढ़ने लगे। सुप्रिया के चेहरे पर असहजता बढ़ती जा रही थी।
“विवेक! कब सुधरोगे…यू नो आई डोंट लाइक दिस टाइप ऑफ़ थिंग्स….फिर भी…?” उसने मनचले हो रहे विवेक को झटकते हुए कहा।

“हे हेलो! इतना क्यों भड़क रही हो यार! अब जवान हूं, तुम जैसी मस्त जीएफ पास में है तो क्या इतने से भी गया ?” विवेक उससे थोड़ा अलग हो गया। सुप्रिया को लगा कि वो थोड़ी ज्यादा ही बेरुखी कर गई। स्थिति सम्हालते हुए वो थोड़े हलके लहजे में बोली, “यार जगह तो देखो! कितने लोग हैं…क्या राजनीति की पढाई करते हो, इतना भी नही पता कि  पब्लिक प्लेस में ऐसे उत्तेजक कृत्य की अनुमति  हमारा संविधान भी नहीं देता मिस्टर विवेक!”
“ओहो! हे संविधान की ज्ञानी देवी…तो चलिए न कहीं एकांत में चलकर सहवास करें।” विवेक भी उसीके अंदाज में जवाब दिया। यह सुन वो मुस्कुरा दी और जरा अलग हुए विवेक को अपनी तरफ खींच ली। उसका यह खींचना विवेक को उत्तेजित कर गया और अबकी उसके होठ नहीं रुके। सुप्रिया ने भी कोई विशेष विरोध नहीं किया। अगले कुछ पल तक उन्हें भान नहीं रहा कि वे कहाँ हैं तथा यह बाहरी दुनिया है, वे तो बस एकदुसरे की साँसों और छुअन को महसूसते रहे। कुछ पल बाद दोनों को होश हुआ, लेकिन विवेक का उत्तेजित मन अब भी शांत नहीं था। यह उत्तेजना तो सुप्रिया में भी थी, पर वो जस-तस उसे दबाए हुए थी।
“यार चलो न! कहीं एकदम अकेले में चलते हैं….अभी थोड़ा और मूड है…चलो न!”
“एकदम अकेले में….व्हाट डू यू मीन…….यू नो बेटर आई डोंट लाइ…”
“कितने बार बताओगी…आई नो, यू डोंट लाइक! बट, फिर भी चलो न! ऑनली वन टाइम….फिर नहीं कहूँगा..प्लीज!”
“अजीब है यार..जब कह रही हूं कि मुझे अच्छा नहीं लगता ये सब...इन सब चीजों का भी एक टाइम होता है...कि कभी भी, कहीं भी..”
“कब टाइम होता है...बुढ़ापे में...यही तो टाइम है, थोड़ा एन्जॉय करने का..”
“ये एन्जॉय नहीं पढ़ाई का टाइम है..इन सब एन्जॉयमेंट के लिए आफ्टर मैरिज बहुत टाइम मिलेगा...खैर छोड़ो! तुम अभी नहीं सुनोगे...मै जा रही हूं। दिमाग शांत करो, फिर मिलेंगे।” वह उठने को हुई कि विवेक ने उसका हाथ पकड़कर बिठा लिया, “आफ्टर मैरिज तो ठीक है...पर अगर अभी थोड़ा एन्जॉय कर लेंगे तो क्या हो जाएगा...और तुम कब से शादी के बाद की बात करने लगी...फेसबुक पर तो खूब सेक्स के अधिकार टाइप बातों की पैरवी होती है...तो यहाँ क्या हो गया ?” विवेक ने वैचारिक चीजों को घुसेड़ दिया था।
“वो दूसरी चीज है...उसको और इसको मत जोड़ो..” विवेक की बात पर निरुत्तर थी वो इसलिए ये कहके जान छुड़ाई लेकिन फिर कुछ सोचकर बोली, “और तुम भी तो फेसबुक पर खूब संस्कारों, मर्यादाओं  की ढोल पीटते हो तो अभी...?” उसके ऐसा कहने के बाद विवेक भी निरुत्तर हो गया था। विवेक ने उसके हाथ पर से अपनी पकड़ ढीली कर दी। वो कुछ पल बैठी रही, फिर उठी और, “दिमाग ठंडा हो तो फोन करना...फिर मिलते हैं, ओके! बाय!” कहके चली गई। विवेक कुछ पल वहीँ बैठा रहा फिर एक तरफ निकल गया। आज पहली बार उनके बीच मौजूद वो विचारधारात्मक टकराहट, जिसे जानते हुए भी वे गौण रखना चाहते थे, अचानक प्रत्यक्ष हो गई थी। और संयोग कि इस वैचारिक टकराव में अपने-अपने विचारों के साथ दोनों ही पराजित हुए थे।

भाग : ३

“हेलो विवेक! यार आज नहीं मिल पाऊंगी..कुछ काम आ गया है इसलिए आना मुश्किल है। सो प्लीज डोंट वेट। सॉरी!”
“ओके स्वीटहार्ट! फोकस ऑन योर वर्क...आय विल मैनेज...टेक केयर!”
“थैंक्स यार! लव यू...” ये कहके सुप्रिया ने फोन काट दिया और दोस्तों के हुजूम की तरफ बढ़ी। यह जेएनयू के भीतर का ही कोई स्थान था। लगभग १५-२० लड़के-लड़कियां एक गोलाकार मेंज के अगल-बगल कुर्सियां लगाकर बैठे थे। सुप्रिया ने भी एक कुर्सी लेकर बैठते हुए कहा, “सो, फाइनली...व्हाट इज प्रोग्राम कामरेड...?”
“प्रोग्राम तो फिक्स ही है...बस टाइम एंड प्लेस की बात चल रही है।” एक बोला।
अगले २०-२५ मिनट तक उनकी चर्चा चलती रही और फिर कुछ निर्णय हुआ। उनका जो प्रेसिडेंट था, वो बोला,
“कामरेड्स लिसेन केयरफुली! तो फायनली यह तय रहा कि कल कॉलेज के बाद उन खोखली सभ्यता, नकली मर्यादा वालो के सामने ही हमारा आन्दोलन होगा..उससे पहले आज सोशल साइट्स पर इवेंट्स, पोस्ट्स वगैरह के जरिए इसकी जो प्रोमोशन हो रही है उसे और फैला दिया जाएगा...फिर मिलते हैं कल उन संघियों के कार्यालय के सामने..”
“बिलकुल ऐसा ही होगा, कामरेड!” सब एकसाथ बोले।
“सो ओके! कलतक के लिए लाल सलाम!”
“लाल सलाम!”

‘माय बॉडी माय राईट’, ‘नहीं चलेगी मोरल पुलिसिंग’ जैसे बैनरों, नारों से सजा हुजूम अगले दिन तय कार्यक्रम के हिसाब से निकला। बहुत अधिक संख्या तो नहीं थी, पर जो भी थे उन्मत्त हुए चले। लड़कों की अपेक्षा लड़कियां कम थीं। पर जो थीं उन्हीमे एक सुप्रिया भी थी। संघ कार्यालय के सामने आन्दोलन कहा जाने वाला वह कृत्य कुछ समय तक होता रहा। संघ के कुछेक समर्थकों ने उसे रोकने को जोर लगाया पर जो होना था, होता रहा। बदन से बदन, होठ से होठ रगड़े गए। लड़कियां कम थीं, लड़के ज्यादा....सो एक लड़की कई-कई लड़कों का इस आन्दोलन में सहयोग कर रही थी..मीडिया के कैमरे इस अदभुत आन्दोलन के नज़ारे को कैद कर रहे थे। कुछ समय में पुलिस आ गई। कुछ पकड़े गए, कुछ भाग गए...और फिर ये आन्दोलन अधिक देर तक नहीं टिका। जल्दी ही सब समाप्त!
कथाबिम्ब 
‘सुप्रिया! ये सब क्या है...? ये कैसे फोटोज, वीडियोज दिख रहे हैं मीडिया में ?” कड़क आवाज थी विवेक की।
“मै समझी नहीं...अब अगर तुम कल के आन्दोलन पर कुछ कह रहे हो तो रहने दो..अभी घरवालों को समझा के परेशान हूं...अब मै तुम्हे नहीं समझा सकती..”
“व्हाट! नहीं समझा सकती...मैंने उसदिन थोड़ा सा एन्जॉय करने को कह दिया तो मुझे संविधान, टाइम, शादी के बाद जैसे ज्ञान देने लगी...और आज कितने लड़कों के साथ चुम्मा-चाटी कर रही हो..तो कहती हो कि समझा नहीं सकती..”
“तुम फिर दो अलग बातों को जोड़ने लगे...तुमने उसदिन जो कहा वो अलग बात है..और ये अलग..इट्स जस्ट अ प्रोटेस्ट..”
“अच्छा प्रोटेस्ट बनाया है जी! प्रोटेस्ट के नाम पर मजे लो..क्या आयोजन किया है मार्क्स की औलादों ने..”
“कंट्रोल विवेक! ये कुछ ज्यादा हो रहा है...तुम्हारी ऐसी चीजों में मैंने कभी कोई इंटरफेयर नहीं किया...तुम भी दूर रहो..”
“मै कोई किसीको पकड़ के चूमने-चूसने का आन्दोलन थोड़े न करता हूं...जो तुम्हे इंटरफेयर की जरूरत हो...मै भी जाता हूं किसीके साथ यही करने...फिर मत करना इंटरफेयर..?”
“स्टॉप! यू कैन नॉट अंडरस्टैंड माय फीलिंग्स...जाओ...जिसके साथ...जो दिल में आए करो..बट मुझे छोड़ो...कॉल मी नेवर..!” झुंझलाहट में यह कहके सुप्रिया ने फोन काट दिया। विवेक को लगा था कि सुप्रिया उससे माफ़ी वगैरह मांगेगी लेकिन उसके ऐसे व्यवहार से विवेक का गुस्सा और बढ़ गया। वो समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। एकदम बदहवास सी हालत हो गई थी उसकी।
इधर सुप्रिया ने झुंझलाहट में बोल तो दिया, पर जब थोड़ा शांत हुई तो उसे अपनी गलती का अंदाज़ा हुआ। उसने सोचा कि चलो थोड़े देर बाद विवेक को फोन करेगी, तबतक उसका गुस्सा भी ठंडा हो जाएगा। यह सोच वो तैयार होकर कॉलेज निकल गई। लंच टाइम में उसने विवेक को फोन किया, पर उसका फोन बंद था। कोलेज ख़त्म होने के बाद भी वो लगातार उसका नंबर मिलाती रही, लेकिन वही फोन  बंद। उसकी चिंता बढ़ती जा रही थी कि तभी विवेक आता हुआ दिखा। वो काफी खुश हुई...कि तभी वातावरण उसकी चीखों से भर गया। पास पहुँचते ही विवेक ने उसपर चाक़ू के दनादन कई वार कर दिए थे। वो वहीँ ढेर हो गई। यह देख मौजूद लोग अवाक् थे कि तभी विवेक ने अपने मुँह में कुछ डाल लिया और देखते ही देखते वह भी वहीँ गिर गया। उसके अंतिम शब्द जो सुनाई पड़े – सॉरी जान!