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गुरुवार, 28 जुलाई 2016

वैचारिक दरिद्रता का शिकार 'आप' [राज एक्सप्रेस और अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत

राज एक्सप्रेस
दिल्ली में आम आदमी पार्टी को सत्ता में आए लगभग डेढ़ वर्ष का समय हुआ है, इस दौरान यह सरकार अपने जनहित के अपने सकारात्मक कामों के लिए कम, फिजूल के हंगामों के लिए बहुत अधिक चर्चा में रही है। कभी दिल्ली पुलिस की मांग के जरिये तो कभी राज्यपाल नजीब जंग से बिना बात जंग छेड़कर यह पार्टी बवाल करती रही है। आजकल यह अपने विधायकों की गिरफ्तारी को लेकर धरती-आकाश एक किए हुए है। गिरफ्तारी तो खैर सत्ता में आने के बाद से अबतक इनके ११ विधायकों की हो चुकी है, लेकिन ताज़ा मामला ओखला के विधायक अमानतुल्लाह खान और महरौली से विधायक नरेश यादव को क्रमशः दिल्ली और पंजाब पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का है। अमानतुल्लाह साहब की गिरफ्तारी एक महिला द्वारा कार से कुचलने की कोशिश करने का आरोप लगाने पर हुई तो वहीँ नरेश यादव महोदय को पंजाब पुलिस ने मलेरकोटला में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया। पुलिस का कहना है कि प्रथम दृष्टि में आरोप सत्य प्रतीत होने पर ही उसने अदालत से वारंट हासिल करके नरेश यादव को गिरफ्तार किया। इन ताज़ा गिरफ्तारियों को आप द्वारा हमेशा की तरह केंद्र सरकार की साज़िश बताया जा रहा है तथा इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय में जाने की बात भी कही जा रही है।
  दरअसल सत्ता में आने के बाद से ही आम आदमी पार्टी का ये दस्तूर रहा है कि उसके नेताओं के खिलाफ जब भी कोई कानूनी कार्रवाई होती है, उसे केंद्र सरकार की साज़िश बता दिया जाता है और अगर कार्रवाई उचित सिद्ध हो जाती है, तो आम आदमी पूरी बेशर्मी के साथ अपनी ही बातों से पलट जाती है। अमानतुल्लाह की गिरफ्तारी के मामले में भी इस पार्टी ने पीड़ित महिला का एक स्ट्रिंग वीडियो जिसमे वो कह रही है कि उसने आप विधायक पर पुलिस के दबाव में आरोप लगाया है, जारी करके हंगामा मचाने और विधायक का बचाव करने की पूरी कोशिश की। लेकिन, जब एक खबरिया चैनल ने इस वीडियो की पुष्टि हेतु उस महिला से बात की तो उसने कहा कि वीडियो में वो है जरूर, पर आवाज उसकी नहीं है। यानी कि वीडियो से छेड़छाड़ की गई है। इस तरह अपने विधायक के बचाव में रचे गए ‘आप’ के स्ट्रिंग का पर्दाफाश हुआ।
अमर उजाला
   इस पार्टी को राजनीति में आए हुए तो ठीकठाक लम्बा समय हो गया है, लेकिन अभी भी इसमे न तो राजनीतिक परिपक्वता दिखती है और न ही एक सांगठनिक अनुशासन ही नज़र आता है। इसके जनप्रतिनिधियों का आचरण ऐसा स्वच्छंद है कि जैसे उनके ऊपर अपने पद का कोई नैतिक व संवैधानिक दायित्व ही न हो। इसी कारण कभी कोई विधायक किसी महिला के साथ बदसलूकी कर बैठता हैं तो कभी कोई सांसद संसद भवन में वीडियो रिकॉर्डिंग करने लगता है। इन जनप्रतिनिधियों में यह प्रवृत्ति यूँ ही नहीं है। दरअसल पार्टी के आचरण को देखते हुए इसके उनके दिमाग में यह बात बैठ गयी है कि वे कुछ भी कर दें, पार्टी उसपर होने वाली कार्रवाई को केंद्र की साज़िश बताते हुए उनके साथ ही खड़ी रहेगी। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में ही अनुशासनहीनता और गैर-जिम्मेदाराना रवैये का स्तर इतना प्रबल है कि उसे देखकर भी इसके जनप्रतिनिधियों को अनुशासन की धज्जियां उड़ाने की पूरी प्रेरणा मिल रही है।
   किसी भी संगठन में अनुशासन ऊपर से आता है। अगर संगठन का शीर्ष नेतृत्व गंभीरता और परिपक्वता का परिचय देता है तो उसका प्रभाव पूरे संगठन और उसके निचले स्तर पर तक पड़ता है तथा सब उसी तरह का आचरण दिखाते हैं। पर आम आदमी पार्टी में तो जो शीर्ष नेतृत्व है, सबसे ज्यादा अगम्भीरता और अनुशासनहीनता वहीँ दिखाई देती है। फिर चाहें वो प्रधानमंत्री को लेकर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग हो या निजी बातचीत में अपने पूर्व नेताओं को अपशब्द कहना हो अथवा विपक्षी दलों के नेताओं पर बिना किसी आधार के हवा-हवाई आरोप लगाना हो या फिर अपने पर होने वाली किसी भी कानूनी कार्रवाई के लिए केंद्र सर्कार पर आरोप लगा देना, ये सब गैर-जिम्मेदाराना और अनुशासनविहीन  कृत्य आप के शीर्ष नेतृत्व यानी अरविन्द केजरीवाल द्वारा किए जाते रहे हैं। विपक्षी नेताओं पर बिना सबूत के आरोप लगाने में तो इनका कोई सानी ही नहीं है। केजरीवाल के अनगिनत ऐसे बयान मिल जाएंगे, जिनमे वे अन्य दलों खासकर भाजपा के नेताओं पर बिना किसी सबूत के घोटाले आदि आरोप लगाए हैं। हाल ही में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी पर भी उन्होंने घोटाले का आरोप लगाया था, जिसपर गडकरी ने मानहानि का मुकदमा कर दिया। अब केजरीवाल महोदय के पास अपने आरोप को सिद्ध  करने के लिए कोई सबूत तो था नहीं कि मुकदमे का सामना करते, इसलिए गडकरी से निजी भेंट करके संभवतः माफ़ी मांगकर इस मामले में अपनी जान छुड़ाए। ऐसे ही, केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली पर भी डीडीसीए में घोटाले का आरोप लगा दिए तो जेटली ने भी क्रिमिनल और सिविल मानहानि के दो मुकदमे कर दिए, जिनपर स्टे लगवाने के लिए केजरीवाल अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। और हद तो ये हो गई है कि अब केजरीवाल ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया है कि वे उन्हें मरवा सकते हैं। अगर इस विषय में उनसे कोई प्रमाण माँगा जाय तो निश्चित ही हमेशा की तरह अब भी उनके पास कोई जवाब नहीं होगा। लेकिन, ऐसे बेतुके बयान देकर चर्चा में रहना तो जैसे अब केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का चरित्र ही बन गया है।
   कुल मिलाकर यही प्रतीत होता है कि यह पार्टी वैचारिक रूप से पूरी तरह से  दरिद्रता की स्थिति में है। इसकी न तो देश-समाज के विकास को लेकर कोई सोच है और न ही कोई विचारधारा। ये ऐसी विचारविहीन और पाखंडपूर्ण पार्टी है, जिसका नेता अपने शासनक्षेत्र दिल्ली में डॉ। पंकज नारंग की हत्या होने पर संवेदना जताने नहीं पहुँच पाता, पर रोहित वेमुला की आत्महत्या पर हैदराबाद पहुँचकर केंद्र सरकार पर निराधार आरोप लगाने में उसे तनिक भी देरी नहीं लगती। इस पार्टी की बस इतनी वैचारिकता है कि सबूत हो या न हो, दूसरों पर आरोप लगाने में कोई देरी मत करो और अगर कोई अपने पर आरोप लगा दे तो उसके लिए तुरंत केंद्र को जिम्मेदार ठहरा दो। इसी सिद्धांत पर ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी पार्टी डूबी हुई है।
   अन्ना आन्दोलन के दौरान जब यह पार्टी बनी थी तो कांग्रेसी कुशासन से त्रस्त आम जनता को निश्चय ही इससे उम्मीदें थीं कि ये कुछ नए तरह की साफ़-सुथरी और मुद्दों की राजनीति का विकास करेंगे। लेकिन, पहली बार कांग्रेस से गठबंधन करके और अब दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद दोनों ही मौकों पर गाड़ी-बंगला-सुरक्षा न लेने से लेकर तमाम और वादों पर इस पार्टी की कथनी-करनी में अंतर का जो दोहरा चरित्र सामने आया है, उसने न केवल इसके प्रति बल्कि किसी भी नए राजनीतिक दल के प्रति आम लोगों के विश्वास की भ्रूण हत्या कर दी है। बहरहाल, इस विचारविहीन पार्टी से निपटने का आदर्श समाधान यही है कि इसके बयानों-आरोपों को नज़रन्दाज करते हुए बड़ी और गंभीर राजनीतिक पार्टियां उसपर प्रतिक्रिया ही न दें। यानी कि इसका  पूर्णतः राजनीतिक बहिष्कार कर दिया जाय। यह भारतीय राजनीति में शेष वैचारिक गंभीरता और दायित्वबोध की भावना की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

गुरुवार, 12 मई 2016

पीएम की डिग्री पर बेजां हंगामा मचा रहे केजरीवाल [दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दबंग दुनिया 
खुद को आम आदमी और अपनी सरकार को आम आदमी की सरकार बताने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल इन दिनों आम आदमी के मुख्यमंत्री कम विवादों के नेता अधिक लग रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे उन्होंने विवादों में रहकर सस्ती  लोकप्रियता हासिल करने को अपनी राजनीतिक रणनीति ही बना लिया है। इसीलिए कभी राज्यपाल नजीब जंग से, कभी न्यायालय से, कभी केंद्र सरकार के मंत्रियों से तो कभी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बिना बात उलझ  जा रहे हैं। हालिया मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्रियों के सम्बन्ध में है। दरअसल मामला कुछ यूँ है कि विगत दिनों अरविन्द केजरीवाल ने प्रधानमंत्री मोदी की शैक्षणिक योग्यताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए केन्द्रीय सूचना आयुक्त को एक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री की डिग्रियों को सार्वजनिक करने की मांग की थी, जिसके बाद केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश पर गुजरात विश्वविद्यालय ने प्रधानमंत्री की परास्नातक की डिग्री को सार्वजनिक कर दिया। लेकिन, इसके बाद आम आदमी पार्टी उस परास्नातक की डिग्री पर सवाल उठाते हुए उनके स्नातक की डिग्री की मांग करने लगी। दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्नातक की डिग्री भी सार्वजनिक कर दी। लेकिन आम आदमी पार्टी तो जैसे ये कसम खाकर बैठी थी कि प्रधानमंत्री की डिग्री को हर हाल में फर्जी ही बताना हैं। अपनी इस बात को सही सिद्ध करने के लिए आप के बेचैनी का आलम यह रहा कि उसने पहले जन्म की तारीखों के जरिये भ्रम फैलाया और उसके बाद नया शिगूफा यह छेड़ा कि डीयू द्वारा जारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक की डिग्री उनकी नहीं किसी और मोदी की है। हालांकि अपने इन सभी आरोपों के पक्ष में सिवाय चंद कुतर्कों के आप कोई पुख्ता सबूत नहीं पेश कर सकी। लेकिन फिर भी, आप के इन खोखले से दिख रहे आरोपों में कांग्रेस आदि अन्य विपक्षी दलों ने भी स्वाभाविक रूप से अपना सुर मिलाया। वैसे अरविन्द केजरीवाल का तो यह दस्तूर बनता जा रहा है कि बिना किसी सबूत या तथ्य के किसीके भी खिलाफ कुछ भी कहकर चर्चा बटोर लो और अगर वो कोई मुकदमा वगैरह करता है तो फिर चोरी-छिपे उससे माफ़ी मांगकर जान छुड़ा लो। उदाहरण के तौर पर गौर करें तो केन्द्रीय सड़क, परिवहन और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी पर भी केजरीवाल ने गत वर्ष कुछ हवा-हवाई आरोप लगाए थे और जब गडकरी ने मानहानि का मुकदमा किया तो चुप-चाप उनसे माफ़ी मांगकर मामले को सलटा लिए। अरुण जेटली मामले में भी कुछ-कुछ यही हुआ। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले केजरीवाल साहब दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर तमाम तरह के आरोप लगाते फिरते थे और उनके खिलाफ कई सौ पन्नों के सबूत होने का दावा भी करते थे, लेकिन जबसे वे सरकार में आए हैं तबसे वह आरोप और सैकड़ों पन्नों के सबूत जाने कहाँ खो गए हैं कि अब उनका जिक्र ही नहीं आता। यहाँ भी केजरीवाल बुरी तरह से अपनी भद्द पिटवा चुके हैं। लेकिन, अपनी इन फजीहतों से शायद उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा या यूँ कहें कि शायद अभी भी वे अपने पुराने सामजिक कार्यकर्ता वाले मोड से बाहर ही नहीं आ पाए हैं। उन्हें शायद अब भी यही लग रहा है कि वे विपक्ष में हैं और सिर्फ आरोप लगाना उनका काम है। पर उनकी इन विचित्र गतिविधियों से निष्कर्षतः यही सन्देश जाता दिख रहा है कि सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए वे किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। 
बहरहाल, मौजूदा डिग्री विवाद में भी अब धीरे-धीरे उनकी फजीहत की गुंजाइश ही पैदा होती दिख रही है। क्योंकि बीते सोमवार को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और भाजपा नेता तथा केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने प्रेस कांफ्रेंस कर प्रधानमंत्री  की स्नातक और परास्नातक दोनों ही शैक्षणिक डिग्रियों को सार्वजनिक करते हुए कहा है कि केजरीवाल ने बिना किसी सबूत के इतना बड़ा हंगामा कैसे खड़ा कर दिया; यदि इस सम्बन्ध में उनके पास सबूत हैं तो देश के सामने रखें अथवा माफ़ी मांगें। अब इस मामले में भी केजरीवाल ने अभी तक कोई पुख्ता सबूत तो पेश किया नहीं है, बस जुबानी तीर ही चलाए हैं। ऐसे में, प्रधानमंत्री की इन आधिकारिक और विश्वविद्यालय द्वारा सत्यापित डिग्रियों को फर्जी कहने के पक्ष में वे सबूत दे पाएंगे, ये तो मुश्किल ही है। परिणाम वही होगा कि वे अपने चिर-परिचित पलटी मारने वाले अंदाज के साथ इस मामले से भी धीरे से पीछे हट जाएंगे। 
केजरीवाल के समर्थन में यह तर्क बहुतायत दिया जा रहा है कि प्रधानमंत्री की डिग्री के विषय में जानकारी माँगना कोई अपराध नहीं है। बेशक, प्रधानमंत्री के विषय में जानने का जनता को अधिकार है और इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन, हर चीज का एक तरीका होता है। प्रधानमंत्री के पद की अपनी एक गरिमा और प्रतिष्ठा होती है, जिसका सम्मान करना देश के प्रत्येक व्यक्ति का संवैधानिक कर्तव्य है। तिसपर अरविन्द केजरीवाल का तो यह दायित्व और अधिक है क्योंकि, वे एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं। लेकिन, अरविन्द केजरीवाल ने तो प्रधानमंत्री को मानसिक रोगी कहने से लेकर अब फर्जी डिग्री वाला बताने तक केवल प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर कुठाराघात करने का ही काम किया है। अगर उन्हें प्रधानमंत्री की डिग्री पर संदेह था तो वे पहले इस सम्बन्ध में जानकारी जुटाते, उसकी प्रमाणिकता की जांच करते और ठोस सबूतों के साथ देश के सामने अपना पक्ष रखते तो न केवल प्रधानमंत्री पद की गरिमा सुरक्षित रहती बल्कि उनकी बात को गंभीरता से भी लिया जाता। लेकिन उनकी तो सियासत का मूल मन्त्र बन चुका है कि जिसके बारे में जो दिमाग में आए बिना आगे-पीछे विचार किए बोल दो और जब खुद पर पड़े तो चुपके से माफ़ी मांग लो। उनकी खुद की हालत तो ये है कि दिल्ली जैसा छोटा-सा अपूर्ण राज्य जहां उनपर जिम्मेदारियों का भार अपेक्षाकृत  कम ही है, उनसे संभल नहीं रहा। दिल्ली के लोग बिजली, पानी जैसी समस्याओं से त्रस्त हैं और उनके मुख्यमंत्री महोदय  दूसरों पर तरह-तरह के आरोप लगाने में मशगूल हैं। 
हालांकि यह भी एक तथ्य है कि प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्रियों के सम्बन्ध में जन्म की तारीख, नाम तथा खुद प्रधानमंत्री के पूर्व वक्तव्य आदि के कारण  कुछ भ्रमयुक्त स्थिति जरूर पैदा हुई है, जिनपर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। चूंकि, प्रधानमंत्री मोदी ने अबसे काफी पूर्व में ये डिग्रियां हासिल की हैं तो ये भी हो सकता है कि तब जन्मतिथि थोड़ी आगे-पीछे लिखा गई हो। अब पहले के समय में आज की तरह सबकुछ कम्पूटरकृत तो था नहीं, इस नाते भूल की गुंजाईश से इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, इस सम्बन्ध में उचित होगा कि प्रधानमंत्री खुद वस्तुस्थिति देश के सामने रखें और अगर भूलवश कुछ त्रुटियाँ रही रह गई हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उन्हें यथाशीघ्र सुधार जाय। 
वैसे भी, भारतीय लोकतंत्र की चुनाव प्रणाली में किसी भी प्रत्याशी के निर्वाचन से लेकर मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के पद तक जाने में डिग्री जैसी चीज का कोई विशेष महत्व नहीं होता है। जनता के चयन में प्रत्याशी की डिग्री की भूमिका अत्यल्प ही होती है। निर्वाचन के लिए डिग्री से महत्वपूर्ण कई और मानदंड होते हैं।  कुछ प्रमुख मानदंड यह हैं कि अमुक नेता जनता से कितना जुड़ा है, उसकी छवि और लोगों के बीच पैठ कैसी है आदि। बस ऐसे ही मानदंडों के आधार पर एक बेहद कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी जनप्रतिनिधि निर्वाचित होकर संसद-विधानसभा में पहुँच जाता है, कभी वही मंत्री बनकर अत्यधिक शिक्षित आइएस-पीसीएस आदि अधिकारियों को आदेश-निर्देश देने का अधिकार भी पा जाता है। कहना गलत नहीं होगा कि यह भी भारतीय लोकतंत्र की एक विशिष्टता ही है, जिसके अपने सुपरिणाम और कुपरिणाम दोनों हैं।

शनिवार, 23 मई 2015

टकराव का जिम्मेदार कौन [दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दैनिक जागरण 
राजधानी दिल्ली की नवनिर्वाचित आप सरकार के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग के बीच कार्यकारी मुख्य सचिव की नियुक्ति को लेकर उपजी असहमति ख़त्म होने की बजाय संवैधानिक अधिकारों के एक बड़े विवाद का रूप लेती जा रही है। दोनों पक्षों ने जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाक़ात की तो लगा कि अब यह विवाद समाप्त हो जाएगा, मगर फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा। हालिया हालातों पर नज़र डालें तो मुख्यमंत्री केजरीवाल ने दिल्ली के नौकरशाहों को कोई भी फाइल उपराज्यपाल से पहले सम्बंधित विभाग के मंत्रियों के पास भेजने को कहा तो वहीँ जवाब में उपराज्यपाल नजीब जंग साहब ने अरविन्द केजरीवाल को पत्र लिख कर राष्ट्रपति द्वारा प्रदत्त अपने विशिष्ट संवैधानिक अधिकारों से उन्हें अवगत कराया साथ ही दिल्ली के अधिकारियों को दिल्ली सरकार द्वारा विगत एक सप्ताह के भीतर की गई सभी नियुक्तियों को रद्द कर पूर्व स्थिति को जारी रखने  का निर्देश भी दे दिया। दरअसल यह पूरा मामला तब शुरू हुआ कि जब अभी हाल ही में दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव दस दिन की छुट्टी पर चले गए, तो उनकी जगह उपराज्यपाल नजीब जंग ने कार्यवाहक मुख्य सचिव के रूप शकुन्तला गैमलीन को नियुक्त कर दिया। बस इसी बात को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री साहब भड़क गए, उनका कहना था कि इस नियुक्ति का अधिकार दिल्ली सरकार को है। इस नियुक्ति से मुख्यमंत्री महोदय का गुस्सा इतना बढ़ा कि उन्होंने शकुन्तला गैमलिन की नियुक्ति के आदेश को पारित करने वाले प्रधान सचिव अनिंदों मजूमदार (सेवा विभाग) को बड़े ही भद्दे ढंग से उनके पद से हटाकर उनकी जगह राजिंदर कुमार को नियुक्त कर दिया। मुख्यमंत्री की इस कारवाई को उपराज्यपाल ने असंवैधानिक बताया और यहीं से यह विवाद बड़ा रूप लेता गया। यहाँ सवाल यह उठता है कि उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री में आखिर कौन सही है और कौन गलत ? सवाल यह भी कि कौन किसके अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहा है ?
   गौर करें तो इस विवाद के लिए कमोबेश दोनों ही पक्ष जिम्मेदार हैं, मगर सर्वाधिक और पहले जिम्मेदार तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ही हैं। उपराज्यपाल ने भी अवश्य ही थोड़ी अनावश्यक हठधर्मिता दिखाई जो कि उनकी गलती है, मगर इस विवाद को पैदा करने और इतना बड़ा बनाने का सर्वाधिक श्रेय केजरीवाल को ही जाता है। कानूनी रूप से देखें तो भी केजरीवाल गलत और उपराज्यपाल सही दिखते हैं। चूंकि, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र होने के नाते दिल्ली एक अपूर्ण राज्य है जिसकी अपनी विधानसभा भी है, मगर अन्य पूर्ण राज्यों की तरह इसके पास अधिकार नहीं हैं। राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते इससे सम्बंधित कई अधिकार केंद्र सरकार के पास हैं। सन १९९१ में ६९ वे सविधान संशोधन के तहत दिल्ली में मंत्रिपरिषद और विधानसभा का प्रावधान किया गया, लेकिन भूमि, पुलिस एवं क़ानून व्यवस्था को राज्य सरकार के दायरे से बाहर रखा गया। और यह सही भी है क्योंकि देश की राजधानी का अधिकाधिक नेतृत्व देश की सरकार के हाथ में ही होना चाहिए। बावजूद इन नियमों  के केजरीवाल  ने यह आदेश दिया कि भूमि, पुलिस आदि मामलों से सम्बंधित फाइलें भी उपराज्यपाल से पहले राज्य सरकार के सम्बंधित विभाग के मंत्रियों के पास भेजी जाएं। उनका तर्क था कि भूमि, पुलिस आदि मामलों में उपराज्यपाल को निर्णय लेने से पहले मुख्यमंत्री से सलाह लेने का नियम है। बेशक ऐसा नियम है, मगर यह तब हो सकता है जब राष्ट्रपति इस सम्बन्ध में एक अधिसूचना जारी करें। पर यहाँ ऐसी किसी  अधिसूचना के बगैर ही केजरीवाल ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर की फाइलों को भी पहले अपने मंत्रियों के पास भेजने का आदेश सुना दिया। मुख्य सचिव की नियुक्ति पर आएं तो यहाँ भी केजरीवाल बेकार में ही बवाल मचाए दिखते हैं। नियमों के अनुसार  मुख्य सचिव, पुलिस कमिश्नर, राज्य गृह सचिव और सचिव (भूमि  की नियुक्ति का अधिकार उपराज्यपाल के पास है। बाकी अन्य नियुक्तियां आमतौर पर राज्य कैबिनेट की सलाह के आधार पर की जाती हैं।  इन नियमों की पुष्टि केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा इस सम्बन्ध में जारी अधिसूचना में भी की गई है।  स्पष्ट है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल अपने दायरों से बाहर जाकर निर्णय लिए और जब उन्हें रोका गया तो ये हंगामा मचा दिए। ऐसा तो कत्तई नहीं होगा कि उन्हें उपर्युक्त नियमों की समझ न हो, मगर फिर भी वे या तो अपने निरर्थक अहंकार की तुष्टि अथवा केंद्र सरकार को इस मामले में घसीट कर घटिया राजनीति करने के उद्देश्य से इस मामले को इतना बड़ा बनाए हैं। हालांकि केन्द्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचना को छोड़ दें तो इस मामले से केंद्र सरकार ने जिस तरह से एक निश्चित दूरी बना रखी है, उससे उसको  इसमें घसीटने की केजरीवाल की मंशा पर तो पानी फिरता  दिख ही रहा है, उलटे उनके इस रवैये से दिल्ली की जनता और नौकरशाहों में भी उनकी सरकार के प्रति अच्छा सन्देश जाता नहीं दिख रहा।

  चूंकि, दिल्ली की जनता ये समझ सकती है कि अबसे पहले भी दिल्ली में पूर्ण बहुमत की सरकारें रही हैं और उपराज्यपाल भी रहे हैं, पर अबतक ऐसा कोई विवाद नहीं हुआ। क्योंकि उन सरकारों ने अपने संवैधानिक दायरे में रहते हुए काम किया है, जबकि मौजूदा मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को शायद किसी दायरे में रहने की आदत ही नहीं है। उन्हें तो संभवतः ऐसा शासन चाहिए जिसमे उनके ऊपर कोई न हो और जो वे कहें वही पत्थर की लकीर की तरह चले। खबर है कि दिल्ली के लगभग दो दर्जन आईएएस अधिकारी दिल्ली सरकार के तानाशाही रवैये से परेशान होकर दिल्ली से बाहर तबादला चाहते हैं। उनका कहना है कि यह सरकार अपनी बात का शब्दशः पालन चाहती है, अब ऐसे माहौल में काम करना कठिन है। केजरीवाल सरकार के रुख को इन अधिकारियों की बातों से भी समझा जा सकता है। यह सही है कि दिल्ली ने केजरीवाल को ऐतिहासिक बहुमत दिया है, लेकिन इसलिए नहीं कि वे बेवजह की  लड़ाई ठाने और विवादों में उलझे रहें। यह बहुमत उन्हें उनके द्वारा किए गए वादों को पूरा करने के लिए मिला है, जिसमे वो अबतक कोई खास सफल नहीं दिख रहे हैं। उचित होगा कि केजरीवाल और उनकी सरकार अपनी ऊर्जा को ऐसे विवादों में खपाने की बजाय अपने वादों को पूरा करने में लगाएं। यह करना न केवल दिल्ली के लिए बल्कि उनकी सरकार के लिए भी ठीक रहेगा।