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गुरुवार, 28 जुलाई 2016

वैचारिक दरिद्रता का शिकार 'आप' [राज एक्सप्रेस और अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत

राज एक्सप्रेस
दिल्ली में आम आदमी पार्टी को सत्ता में आए लगभग डेढ़ वर्ष का समय हुआ है, इस दौरान यह सरकार अपने जनहित के अपने सकारात्मक कामों के लिए कम, फिजूल के हंगामों के लिए बहुत अधिक चर्चा में रही है। कभी दिल्ली पुलिस की मांग के जरिये तो कभी राज्यपाल नजीब जंग से बिना बात जंग छेड़कर यह पार्टी बवाल करती रही है। आजकल यह अपने विधायकों की गिरफ्तारी को लेकर धरती-आकाश एक किए हुए है। गिरफ्तारी तो खैर सत्ता में आने के बाद से अबतक इनके ११ विधायकों की हो चुकी है, लेकिन ताज़ा मामला ओखला के विधायक अमानतुल्लाह खान और महरौली से विधायक नरेश यादव को क्रमशः दिल्ली और पंजाब पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का है। अमानतुल्लाह साहब की गिरफ्तारी एक महिला द्वारा कार से कुचलने की कोशिश करने का आरोप लगाने पर हुई तो वहीँ नरेश यादव महोदय को पंजाब पुलिस ने मलेरकोटला में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया। पुलिस का कहना है कि प्रथम दृष्टि में आरोप सत्य प्रतीत होने पर ही उसने अदालत से वारंट हासिल करके नरेश यादव को गिरफ्तार किया। इन ताज़ा गिरफ्तारियों को आप द्वारा हमेशा की तरह केंद्र सरकार की साज़िश बताया जा रहा है तथा इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय में जाने की बात भी कही जा रही है।
  दरअसल सत्ता में आने के बाद से ही आम आदमी पार्टी का ये दस्तूर रहा है कि उसके नेताओं के खिलाफ जब भी कोई कानूनी कार्रवाई होती है, उसे केंद्र सरकार की साज़िश बता दिया जाता है और अगर कार्रवाई उचित सिद्ध हो जाती है, तो आम आदमी पूरी बेशर्मी के साथ अपनी ही बातों से पलट जाती है। अमानतुल्लाह की गिरफ्तारी के मामले में भी इस पार्टी ने पीड़ित महिला का एक स्ट्रिंग वीडियो जिसमे वो कह रही है कि उसने आप विधायक पर पुलिस के दबाव में आरोप लगाया है, जारी करके हंगामा मचाने और विधायक का बचाव करने की पूरी कोशिश की। लेकिन, जब एक खबरिया चैनल ने इस वीडियो की पुष्टि हेतु उस महिला से बात की तो उसने कहा कि वीडियो में वो है जरूर, पर आवाज उसकी नहीं है। यानी कि वीडियो से छेड़छाड़ की गई है। इस तरह अपने विधायक के बचाव में रचे गए ‘आप’ के स्ट्रिंग का पर्दाफाश हुआ।
अमर उजाला
   इस पार्टी को राजनीति में आए हुए तो ठीकठाक लम्बा समय हो गया है, लेकिन अभी भी इसमे न तो राजनीतिक परिपक्वता दिखती है और न ही एक सांगठनिक अनुशासन ही नज़र आता है। इसके जनप्रतिनिधियों का आचरण ऐसा स्वच्छंद है कि जैसे उनके ऊपर अपने पद का कोई नैतिक व संवैधानिक दायित्व ही न हो। इसी कारण कभी कोई विधायक किसी महिला के साथ बदसलूकी कर बैठता हैं तो कभी कोई सांसद संसद भवन में वीडियो रिकॉर्डिंग करने लगता है। इन जनप्रतिनिधियों में यह प्रवृत्ति यूँ ही नहीं है। दरअसल पार्टी के आचरण को देखते हुए इसके उनके दिमाग में यह बात बैठ गयी है कि वे कुछ भी कर दें, पार्टी उसपर होने वाली कार्रवाई को केंद्र की साज़िश बताते हुए उनके साथ ही खड़ी रहेगी। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में ही अनुशासनहीनता और गैर-जिम्मेदाराना रवैये का स्तर इतना प्रबल है कि उसे देखकर भी इसके जनप्रतिनिधियों को अनुशासन की धज्जियां उड़ाने की पूरी प्रेरणा मिल रही है।
   किसी भी संगठन में अनुशासन ऊपर से आता है। अगर संगठन का शीर्ष नेतृत्व गंभीरता और परिपक्वता का परिचय देता है तो उसका प्रभाव पूरे संगठन और उसके निचले स्तर पर तक पड़ता है तथा सब उसी तरह का आचरण दिखाते हैं। पर आम आदमी पार्टी में तो जो शीर्ष नेतृत्व है, सबसे ज्यादा अगम्भीरता और अनुशासनहीनता वहीँ दिखाई देती है। फिर चाहें वो प्रधानमंत्री को लेकर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग हो या निजी बातचीत में अपने पूर्व नेताओं को अपशब्द कहना हो अथवा विपक्षी दलों के नेताओं पर बिना किसी आधार के हवा-हवाई आरोप लगाना हो या फिर अपने पर होने वाली किसी भी कानूनी कार्रवाई के लिए केंद्र सर्कार पर आरोप लगा देना, ये सब गैर-जिम्मेदाराना और अनुशासनविहीन  कृत्य आप के शीर्ष नेतृत्व यानी अरविन्द केजरीवाल द्वारा किए जाते रहे हैं। विपक्षी नेताओं पर बिना सबूत के आरोप लगाने में तो इनका कोई सानी ही नहीं है। केजरीवाल के अनगिनत ऐसे बयान मिल जाएंगे, जिनमे वे अन्य दलों खासकर भाजपा के नेताओं पर बिना किसी सबूत के घोटाले आदि आरोप लगाए हैं। हाल ही में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी पर भी उन्होंने घोटाले का आरोप लगाया था, जिसपर गडकरी ने मानहानि का मुकदमा कर दिया। अब केजरीवाल महोदय के पास अपने आरोप को सिद्ध  करने के लिए कोई सबूत तो था नहीं कि मुकदमे का सामना करते, इसलिए गडकरी से निजी भेंट करके संभवतः माफ़ी मांगकर इस मामले में अपनी जान छुड़ाए। ऐसे ही, केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली पर भी डीडीसीए में घोटाले का आरोप लगा दिए तो जेटली ने भी क्रिमिनल और सिविल मानहानि के दो मुकदमे कर दिए, जिनपर स्टे लगवाने के लिए केजरीवाल अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। और हद तो ये हो गई है कि अब केजरीवाल ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया है कि वे उन्हें मरवा सकते हैं। अगर इस विषय में उनसे कोई प्रमाण माँगा जाय तो निश्चित ही हमेशा की तरह अब भी उनके पास कोई जवाब नहीं होगा। लेकिन, ऐसे बेतुके बयान देकर चर्चा में रहना तो जैसे अब केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का चरित्र ही बन गया है।
   कुल मिलाकर यही प्रतीत होता है कि यह पार्टी वैचारिक रूप से पूरी तरह से  दरिद्रता की स्थिति में है। इसकी न तो देश-समाज के विकास को लेकर कोई सोच है और न ही कोई विचारधारा। ये ऐसी विचारविहीन और पाखंडपूर्ण पार्टी है, जिसका नेता अपने शासनक्षेत्र दिल्ली में डॉ। पंकज नारंग की हत्या होने पर संवेदना जताने नहीं पहुँच पाता, पर रोहित वेमुला की आत्महत्या पर हैदराबाद पहुँचकर केंद्र सरकार पर निराधार आरोप लगाने में उसे तनिक भी देरी नहीं लगती। इस पार्टी की बस इतनी वैचारिकता है कि सबूत हो या न हो, दूसरों पर आरोप लगाने में कोई देरी मत करो और अगर कोई अपने पर आरोप लगा दे तो उसके लिए तुरंत केंद्र को जिम्मेदार ठहरा दो। इसी सिद्धांत पर ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी पार्टी डूबी हुई है।
   अन्ना आन्दोलन के दौरान जब यह पार्टी बनी थी तो कांग्रेसी कुशासन से त्रस्त आम जनता को निश्चय ही इससे उम्मीदें थीं कि ये कुछ नए तरह की साफ़-सुथरी और मुद्दों की राजनीति का विकास करेंगे। लेकिन, पहली बार कांग्रेस से गठबंधन करके और अब दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद दोनों ही मौकों पर गाड़ी-बंगला-सुरक्षा न लेने से लेकर तमाम और वादों पर इस पार्टी की कथनी-करनी में अंतर का जो दोहरा चरित्र सामने आया है, उसने न केवल इसके प्रति बल्कि किसी भी नए राजनीतिक दल के प्रति आम लोगों के विश्वास की भ्रूण हत्या कर दी है। बहरहाल, इस विचारविहीन पार्टी से निपटने का आदर्श समाधान यही है कि इसके बयानों-आरोपों को नज़रन्दाज करते हुए बड़ी और गंभीर राजनीतिक पार्टियां उसपर प्रतिक्रिया ही न दें। यानी कि इसका  पूर्णतः राजनीतिक बहिष्कार कर दिया जाय। यह भारतीय राजनीति में शेष वैचारिक गंभीरता और दायित्वबोध की भावना की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

सोमवार, 25 नवंबर 2013

राजनीतिक दुष्चक्र का शिकार होती आप [दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दैनिक जागरण में इस लेख के कुछ अंश 
अगर दिल्ली के संसदीय इतिहास पर एक नज़र डालें तो अब से पहले दिल्ली की सियासत अधिकाधिक रूप से सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के बीच ही गुमटी-सिमटी रही थी ! पर इसबार आम आदमी पार्टी (आप) के आ जाने से ये मुकाबला तीन तरफा हो गया है ! अभी हाल ही में हुए कुछ मीडिया सर्वेक्षणों में ‘आप’ की जो स्थिति सामने आई है वो काफी हद तक इस बात की तस्दीक करती है कि इस बार के दिल्ली चुनाव में कांग्रेस-भाजपा किसीके भी लिए ‘आप’ से पार पाना आसान नही होगा ! पर शायद सच ही कहा जाता है कि जैसे-जैसे आपकी ताकत बढ़ती है वैसे-वैसे आपके दुश्मन भी बढ़ते जाते हैं ! फ़िलहाल ये उक्ति केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पर पूरी तरह से सटीक बढ़ रही है ! क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र  काफी लोकप्रियता होने के बावजूद भी केजरीवाल की ‘आप’ के लिए सबकुछ आसान नज़र नही आ रहा ! हालत ये है कि अभी एक मुश्किल का हल वो तलाश रहे होते हैं कि दूसरी मुश्किल आ धमकती है ! इस प्रकार एक के बाद एक मुश्किलातें उनके आगे आती जा रही हैं ! फिर चाहें वो अन्ना के पत्र का प्रकरण हो या आप के कुछ नेताओं का एक संस्थान द्वारा किया गया स्ट्रिंग ऑपरेशन हो  अथवा केजरीवाल आईआरएस विभाग द्वारा केजरीवाल के बयान के विरोध में लिखी गई चिट्ठी हो, ये सब चीजे लगातार आप के राजनीतीक सफर को उसके आरम्भ में ही समाप्त करने की कोशिश कर रही हैं !

  अब अगर आप के रास्ते में आ रही इन सब मुश्किलों को विस्तृत रूप से समझने का प्रयास करें तो ‘आप’ के नेताओं पर हुए स्ट्रिंग के वीडियो की जांच फ़िलहाल चुनाव आयोग कर रहा है अतः इसपर अभी कुछ भी कहना उचित नही होगा ! अब इस स्ट्रिंग की जो भी सत्यता होगी, वो चुनाव आयोग की जांच पूरी होने के बाद सामने आ ही जाएगी ! इसके बाद अब अगर एक नज़र अन्ना द्वारा केजरीवाल को भेजे गए  पत्र के प्रकरण पर डालें तो इस पत्र में अन्ना की तरफ से उनके आंदोलन के समय चंदे में मिले पैसे तथा दिल्ली चुनाव में उनका नाम इस्तेमाल करने के विषय में केजरीवाल से कुछ सवाल पूछे  गए हैं ! अब चूंकि केजरीवाल एक राजनीतिक व्यक्ति हो चुके हैं ! ऐसे में उनके माथे पर शिकन लाने वाली हर बात उनके विपक्षियों के लिए वरदान के समान ही है ! अतः अन्ना के इस पत्र के सामने आते ही दिल्ली में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के विपक्षी दल  कांग्रेस-भाजपा आदि ने उनपर बयानों के तीर छोड़ने शुरू कर दिए ! दरअसल हुआ यूँ था कि अभी कुछ ही दिन पहले अरविन्द केजरीवाल ने अन्ना का एक पत्र सार्वजनिक किया था जिसमे कि उन्होंने आंदोलन के चंदे आदि के संबंध में कुछ सवाल उठाए थे ! हालाकि बाद में अन्ना द्वारा खुद इस मामले में सफाई देते हुए स्पष्ट किया गया कि उन्होंने केजरीवाल से सिर्फ चंदे के पैसे के विषय में पूछा था, उनपर कोई आरोप नही लगाया था ! अन्ना ने ये भी स्पष्ट किया कि उन्हें चंदे के पैसे से अधिक इस बात की चिंता थी कि कहीं ‘आप’ चुनाव में उनका नाम तो इस्तेमाल नही कर रही ! अब इस मामले में अन्ना द्वारा भले ही सफाई दे दी गई हो, पर ये कहना कठिन है कि इससे केजरीवाल को कोई बड़ी राहत मिल जाएगी और वो अपने विपक्षियों के निशाने पर आने से बच जाएंगे ! क्योंकि राजनीति में सबसे अधिक महत्व अवसर और मुद्दे का होता है ! अतः कांग्रेस और भाजपा ‘आप’ के खिलाफ हाथ आए इस अवसर और मुद्दे को बमुश्किल ही जाने देंगी ! यहाँ अगर विचार करें तो बड़ी आसानी से समझ सकते हैं कि आम आदमी पार्टी के दिल्ली में बड़ी जल्दी लोकप्रिय होने के लिए  के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारण अरविन्द केजरीवाल की स्वच्छ छवि और पार्टी का जनप्रिय मुद्दों से जुड़ाव है ! अतः अगर इस अन्ना के पत्र वाले प्रकरण में अरविन्द केजरीवाल की छवि खराब होती है तो ये आम आदमी पार्टी के लिए इस चुनाव के समय बहुत बड़ा झटका होगा ! लिहाजा इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता कि अन्ना के पत्र का ये सारा प्रकरण अरविन्द केजरीवाल और आप की छवि को खराब करने के उद्देश्य से उनके राजनीतिक विरोधियों द्वारा ही रचा गया हो ! हो सकता है कि ये सब सच्चाई से परे सिर्फ एक प्रायोजित षड्यंत्र हो ! क्योंकि बेशक अन्ना हजारे व्यक्तिगत रूप से पूर्णतः ईमानदार और स्वच्छ छवि व्यक्ति हैं, पर ये आवश्यक नही कि जो लोग उनके साथ हैं वो भी ईमानदार हों ! वैसे भी अन्ना से अभी जो लोग जुड़े हैं उनमे से अधिकाधिक ऐसे हैं जो किन्ही न किन्ही कारणों से केजरीवाल के विरोधी हैं ! कुछ बातों पर विचार करने पर केजरीवाल के खिलाफ किसी राजनीतिक साजिश का ये अंदेशा काफी हद तक सही ही प्रतीत होता है ! पहली बात कि अगर वाकई में अन्ना को चंदे के पैसे को लेकर कोई शक था तो वो अबतक चुप क्यों बैठे थे ? उन्होंने ये बात पहले क्यों नही कही ? अब जब दिल्ली चुनाव में मतदान होने में गिने-चुने दिन शेष हैं तो ही उन्हें उस चंदे के पैसे की याद क्यों आई ? इन प्रश्नों को देखते हुए जाहिर है कि हो न हो भोले-भाले अन्ना को बरगला कर के ये पत्र किसी राजनीतिक साजिश के तहत लिखवाया गया है जिससे कि केजरीवाल की छवि खराब को किया जा सके !  बहरहाल अब जो भी हो, पर इतना जरूर है कि अगर आम आदमी पार्टी और केजरीवाल वाकई में निर्दोष होंगे तो वे इन सब बाधाओं को पार करते हुए चुनाव की आग में तपकर खरा सोना होके निकलेंगे !