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सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

शहादतों का अंत कब (राज एक्सप्रेस में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

गत 14 फरवरी की शाम जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सेना के जवानों पर हुए आत्मघाती आतंकी हमले ने देश में शोक और आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। आत्मघाती आतंकी ने साढ़े तीन सौ किलो विस्फोटक से लदी गाड़ी सीआरपीएफ के काफिले में घुसाकर विस्फोट कर दिया, जिसमें 44 जवान शहीद हो गए और कितने ही जवान ज़ख़्मी हालत में जीवन-मरण से जूझ रहे हैं। शहीद जवानों की संख्या के हिसाब से ये वर्ष 2017 में हुए उड़ी हमले से भी बड़ा हमला है। हमले की खबर आने के बाद से ही सोशल मीडिया पर लोगों की शोक और रोष से भरी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। चूंकि, उड़ी हमले के बाद मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक कर शहादतों का बदला लिया था, इसलिए अबकी लोग और बड़े बदले की उम्मीद कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से कहा गया है कि आतंकियों ने बड़ी गलती की है, उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। विपक्ष की तरफ से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो सरकार और सेना के साथ खड़े होने की बात कही है, लेकिन उन्हीकी पार्टी की पंजाब सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने इस पाक प्रेरित आतंकी हमले पर कहा है कि आतंकवाद का कोई देश नहीं होता। कहने की जरूरत नहीं कि सिद्धू का हाल के कुछ समय में उपजा पाक प्रेम अब भी हिलोरे मार रहा है। ऐसे में, राहुल गांधी यदि सरकार और सेना के साथ वास्तव में खड़े दिखना चाहते हैं, तो अपने ऐसे बड़बोले नेताओं की जबान पर जरा कसकर रखें।
पुलवामा हमले के बाद केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा मामलों की कबिनेट समिति (सीसीएस) की बैठक बुलाई गयी। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली इस समिति में वित्त मंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री सहित कई और प्रमुख लोग होते हैं। समिति की बैठक में लिए गए जिन निर्णयों के विषय में जानकारी दी गयी, उनमें प्रमुख पाकिस्तान से ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा वापस लेने का निर्णय है। यह बात काफी समय से उठ रही थी कि पाकिस्तान की भारी भारत विरोधी गतिविधियाँ करने के बावजूद उसे एमएफएन का दर्जा क्यों दिया गया है? आखिर इस हमले ने सरकार के सब्र का भी अंत किया और पाकिस्तान से एमएफएन का दर्जा वापस लेने का निर्णय लिया गया।

गौर करें तो किसी देश को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने का मतलब यह होता है कि उस देश को व्यापार में अधिक प्राथमिकता दी जाएगी। एमएफएन का दर्जा प्राप्त देश को आयात-निर्यात में विशेष छूट मिलती है। इसमें दर्जा पाने वाला देश सबसे कम आयात शुल्क पर कारोबार करता है। इससे इन देशों को एक बड़ा बाजार मिलता है, जिससे वे अपने सामान को वैश्विक बाजार में आसानी से पहुंचा सकते हैं। जाहिर है, विकासशील देशों के लिए एमएफएन दर्जा फायदे का सौदा है और पाकिस्तान जैसे आर्थिक बदहाली से गुजर रहे देश के लिए तो यह बड़ी चीज था। परन्तु अब उसके लिए ये सारी सहूलियतें बंद हो जाएंगी जिससे उसकी पहले से ही डांवाडोल आर्थिक हालत के और भी डांवाडोल होने की संभावना है। यह ठीक है कि सिर्फ इतने से हमारे जवानों की शहादत का प्रतिशोध पूरा नहीं होता, लेकिन ये एक जरूरी काम था, जिसे करने में अब और देर करने में अब और देर नहीं की जा सकती थी।
बताया जा रहा कि इस तरह का कोई हमला होने की सूचना इंटेलिजेंस द्वारा दी गयी थी और इसलिए सीआरपीएफ की तरफ से गोलीबारी या बमबाजी जैसी चीजों बचने के लिहाज से सुरक्षा इंतजाम भी किए गए थे। लेकिन इस तरह वाहन बम के जरिये हमला होगा, इसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी। परिणामस्वरूप 44 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
सब बातों के बाद यह प्रश्न बना हुआ है कि आखिर हमारे जवानों की शहादतों का अंत कब होगा? दस के बदले सौ और चालीस के बदले चार सौ जैसी भावावेश से भरी बातें अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन हमें इस बिंदु पर अधिक गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि किस तरह अपने वीर जवानों को आए दिन शहीद होने से बचा सकें। सरहद पार से आने वाले आतंकियों से निपटने के लिए तो हम स्मार्ट फेंसिंग कर रहे हैं, जिससे जवानों का जोखिम कम होगा। लेकिन जो दहशतगर्द घर के भीतर बैठे हैं, उनसे बचने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। 
इस हमले में पाकिस्तानी आतंकी संगठन की योजना अवश्य है, लेकिन इसे अंजाम देने वाले जम्मू-कश्मीर में ही बैठे हैं। ये वही लोग हैं जो कभी पत्थरबाज बनकर दहशतगर्दों की हिफाजत करने उतर पड़ते हैं। ऐसे में केवल पाकिस्तान में घुसकर कुछ आतंकियों के खात्मे या उसपर किसी भी प्रकार की कार्यवाही से ऐसे हमलों को नहीं रोका जा सकता, ऐसे हमलों को रोकने के लिए जरूरी है कि कश्मीर में जो आतंकियों के मददगार हैं, उनकी पहचान कर पहले उन्हें ख़त्म किया जाए। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 35ए के तहत राज्य को मिले विशेषाधिकारों को समाप्त कर उसे कुछ समय के लिए सैन्य-नियंत्रण में दे देने की जरूरत है। जब राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं रहेगा तो हमारी सेना राज्य के भीतर-बाहर दोनों जगह बैठे दहशतगर्दों का अपने तरीके से खात्मा कर सकेगी। निश्चित ही ये कड़ा कदम होगा, लेकिन बड़े बदलाव के लिए सरकार को ये  साहस दिखाना ही होगा।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

पाकिस्तानी लोकतंत्र की मजबूती का बेसुरा राग [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पनामा पेपर्स मामले में वहाँ की अदालत द्वारा संसद सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराए जाने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा क्या दिया कि इधर भारत में सोशल मीडिया पर उनका नाम ट्रेंड करने लगा। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक पाकिस्तान और नवाज शरीफ की चर्चा चल पड़ी। नवाज पर कार्रवाई के आधार पर पाकिस्तानी लोकतंत्र की मजबूती का बखान भी किया जाने लगा। कहा जाने लगा कि पाकिस्तानी अदालत ने प्रधानमंत्री के खिलाफ कार्रवाई करके लोकतंत्र की मजबूती का सन्देश दिया है। यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने पाकिस्तानी लोकतंत्र को भारतीय लोकतंत्र से बेहतर बताते हुए यह दलील दे डाली कि भारत में भी कई लोगों के नाम पनामा पेपर्स में सामने आए हैं, मगर उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई जबकि पाकिस्तान ने अपने प्रधानमंत्री के खिलाफ भी कार्रवाई कर दी। अब ऐसी बेतुकी तुलना करने वालों को कौन समझाए कि पनामा में भारतीय लोगों से सम्बंधित जो डाटा सामने आया है, यदि उसमें वाकई में कुछ दम होगा तो देश की जांच एजेंसियों से लेकर न्यायपालिका जैसी संस्थाएं आवश्यक कार्रवाई अवश्य करेंगी। इस देश में न्यायपालिका ने प्रधानमंत्रियों पर तक कार्रवाई की है, फिर किसी और को क्यों बख्शेगी ? हमें अपनी लोकतान्त्रिक संस्थाओ और व्यवस्थाओं पर धैर्यपूर्वक इतना विश्वास तो रखना ही चाहिए। संभव है कि अंदरूनी स्तर पर प्राप्त डाटा का परीक्षण चल भी रहा हो। बहरहाल, यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या वाकई में नवाज शरीफ पर हुई कार्रवाई से पाकिस्तान में लोकतंत्र की मजबूती का कोई संकेत मिलता है ? इसके लिए पहले हमें इस पूरे मामले को समझना होगा।

दरअसल पनामा पेपर काण्ड में नवाज शरीफ समेत उनके दोनों बेटों और बेटी का नाम सामने आया था। इसके बाद पाकिस्तान की विपक्षी पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ और अन्य विपक्षी दलों की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डालकर नवाज शरीफ को पद से हटाने की मांग की गयी थी। इसके बाद बीते मई महीने में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले की जांच के लिए संयुक्त जांच दल का गठन किया गया था, जिसने बीती दस जुलाई को अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी थी। रिपोर्ट में नवाज के पास घोषित संपत्ति से अधिक संपत्ति और विदेशों में जायदाद होने का खुलासा हुआ था। माना गया कि ये संपत्ति काला धन है, जिसे पनामा कंपनियों के जरिये बाहर भेजा गया है। इसी रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने उनकी संसद सदस्यता समाप्त की और प्रधानमंत्री पद छोड़ने का आदेश दिया। नवाज को हटाने का मुख्य आधार यह था कि उन्होंने अपनी संपत्ति की वास्तविक जानकारी सामने नहीं रखी थी। इसलिए अदालत ने उन्हें पाकिस्तानी संसद और अदालत के प्रति ईमानदार न मानते हुए बर्खास्त करने का फैसला सुनाया है।

दैनिक जागरण
यह तीसरी बार है जब नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने और बिना कार्यकाल पूरा किए पद से हट गए। साथ ही, यह भी एक तथ्य है कि अपनी आज़ादी का सत्तरवां वर्ष पूरा करने जा रहे पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक ढंग से निर्वाचित अबतक एक भी प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ है, जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया हो। किसीको तख्तापलट करके सेना ने तो किसीको न्यायालय ने पद से हटा दिया तो कोई किसी अन्य कारण से पद से हट गया। ये दिखाता है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिति कितनी डांवाडोल रही है। समूचे देश की कमान संभालने वाले पद पर बैठे व्यक्ति जो जनादेश से निर्वाचित होकर प्रधानमंत्री बनता है, को बिना कार्यकाल पूरा किए पद से हटा उसकी जगह मनमाफिक लोगों को बिठाया जाता रहा है। नवाज शरीफ के बाद अब शहीद खकान अब्बासी पाकिस्तान के अंतरिम प्रधानमंत्री बने हैं। वे तबतक पद पर रहेंगे जबतक नवाज के भाई शाहबाज शरीफ नेशनल एसेम्बली का चुनाव जीतकर संसद पहुँच नहीं जाते। इसके बाद शाहबाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री होंगे।   

हकीकत यह है कि पाकिस्तान में किसी भी लोकतान्त्रिक संस्था से ऊपर सेना काम करती है। सत्ता में कोई रहे, सरकार सेना ही चलाती है। कार्यपालिका हो या न्यायपालिका, सेना के नियंत्रण से बाहर कोई नहीं है। सेना के इशारे पर ही वहाँ की सामाजिक-आर्थिक से लेकर विदेशनीतियों तक का निर्धारण होता है। भारत से अगर आज तक पाकिस्तान के सम्बन्ध नहीं सुधरे तो इसके लिए वहाँ के राजनयिकों से कहीं अधिक जिम्मेदार पाकिस्तानी सेना ही है। जो सरकार या राजनयिक सेना की मुखालफत करता है या सेना की कसौटियों पर खरा नहीं उतरता, उसे किसी न किसी तरह पद से हटा दिया जाता है। पाकिस्तान में यही दस्तूर रहा है।

हाल के महीनों में नवाज़ शरीफ से पाकिस्तानी सेना के नाखुश होने की बात चर्चा में रही है। ऐसा अनुमान है कि भारत के मोर्चे पर कूटनीतिक नाकामी समेत अमेरिका आदि से भी सम्बन्ध बिगड़ने के कारण नवाज शरीफ से पाकिस्तानी सेना संतुष्ट नहीं थी। इन चीजों के कारण इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पनामा केस की आड़ में सेना ने नवाज को हटवाने की अपनी मंशा को पूरा करवा लिया है।

उपर्युक्त बातें पाकिस्तानी लोकतंत्र की मजबूती की पोलपट्टी खोल रही हैं। इनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि पाकिस्तान में जो है, वहाँ की सेना है, उसके बाद ही कोई और है। ऐसे में, आज नवाज शरीफ की बर्खास्तगी के बाद से पाकिस्तानी लोकतंत्र पर भारत के जो लोग मुग्ध हो रहे उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि भारत जैसे देश, जिसकी सेना पाकिस्तानी सेना से कई गुना अधिक शक्तिशाली होते हुए भी संविधान और संसद के प्रति पूर्णतः निष्ठावान रहती है, के लोकतंत्र की तुलना वे किस आधार पर फौज के आगे नतमस्तक रहने वाले पाकिस्तानी लोकतंत्र से कर रहे ? वास्तव में तुलना तो बड़ी चीज है, पाकिस्तानी लोकतंत्र तो अब इस लायक भी नहीं रह गया है कि महान भारतीय लोकतंत्र के साथ उसकी चर्चा भी की जाए।

बुधवार, 1 मार्च 2017

कश्मीर पर पाकिस्तान की भाषा क्यों बोल रहे चिदंबरम ? [हरिभूमि और राज एक्सप्रेस में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
कश्मीर की अलगाववादी ताकतों के प्रति मोदी सरकार के कड़े रुख और सेना को दी गयी खुली छूट के कारण ये ताकतें एकदम बौखलाई हुई हैं, इसी कारण कश्मीर में इन दिनों कभी  हथियारबंद आतंकियों तो कभी पत्थरबाजों के जरिये वे सेना की कार्रवाई को कुंद करने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन, हमारे जवान इन चीजों से बेपरवाह कश्मीर से आतंकियों का सफाया करने के लिए कमर कसकर मोर्चा संभाले हुए हैं। कुल मिलाकर स्थिति ये है कि सरकार और सेना के इन संयुक्त प्रयासों से कश्मीर में अलगाववादियों की ज़मीन कमज़ोर होती नज़र आ रही है। घाटी में परिवर्तन के संकेत दिखाई देने लगे हैं।  

राज एक्सप्रेस
लेकिन इन्हीं सबके बीच देश के स्वघोषित सबसे पुराने दल कांग्रेस के नेता और पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम साहब का एक ऐसा बयान आया है, जो न केवल राष्ट्रीय अखंडता पर कुठाराघात की तरह है, बल्कि  घाटी में अपनी जान हथेली पर लेकर संघर्ष कर रहे हमारे जवानों के मनोबल को भी गिराने वाला है। चिदंबरम ने अपने एक बयान में देश को यह दिव्यज्ञान दिया है कि मोदी सरकार की गलत नीतियों के कारण कश्मीर आज हमारे हाथ से निकल चुका है। हालांकि इस ज्ञान के पीछे क्या आधार है, इस बारे में चिदंबरम महोदय कुछ नहीं बोले। चिदंबरम के इस बयान से स्पष्ट होता है कि कांग्रेस का वैचारिक दिवालियापन लगातार बढ़ता जा रहा है। तभी तो एक तरफ जिस कश्मीर में शांति और सुव्यवस्था के लिए हमारे जवान अपनी जान जोखिम में डालकर लगे हुए हैं, उस कश्मीर के सम्बन्ध में देश के एक पूर्व गृहमंत्री का ऐसा गैर-जिम्मेदाराना बयान शर्मनाक होने के साथ–साथ आतंक के खिलाफ लड़ाई को कमज़ोर करने वाला भी है। विडंबना तो यह है कि अपने नेता के ऐसे आपत्तिजनक बयान के बाद भी कांग्रेस की तरफ से इसपर किसी तरह की सफाई या खंडन तक व्यक्त नहीं किया गया है। ऐसे में यह क्यों नहीं समझा जाए कि कांग्रेस अपने नेता के इस राष्ट्र-विरोधी बयान का मौन समर्थन व्यक्त कर रही है।        

हरिभूमि
दरअसल यह कोई पहली बार नहीं है, जब कांग्रेस के किसी नेता की तरफ से इस तरह का बयान दिया गया हो। अबसे पहले भी अनेक अवसरों पर हम देख चुके हैं कि कांग्रेस के नेताओं द्वारा किस तरह से आतंक के खिलाफ लड़ाई को कमज़ोर करने और सेना के मनोबल को गिराने वाले बयान दिए जाते रहे हैं। इशरत जहां एनकाउंटर मामलों से लेकर अभी हाल ही में हुई सर्जिकल स्ट्राइक तक आतंक के विरुद्ध लड़ाई को कमज़ोर करने वाला कांग्रेस का रुख एकदम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। लश्कर आतंकी इशरत जहाँ के एनकाउंटर को भी फर्जी बताने का काम कांग्रेस करती रही है। यहाँ तक कि अभी जो चिदंबरम साहब ‘कश्मीर के हाथ से निकलने’ की बात कह रहे, गृहमंत्री रहते हुए इशरत जहाँ को आतंकवादी साबित नहीं होने देने और एनकाउंटर को फर्जी साबित करने के लिए उन्होंने जांच रिपोर्टों में कैसे फेर-बदल किया, ये भी अब कोई छुपी बात नहीं रह गयी है। अभी गत वर्ष सितम्बर में हमारे जवानों द्वारा पीओके में घुसकर आतंकी ठिकानों पर की गयी सर्जिकल स्ट्राइक की गयी, जिसके बाद सारा देश जवानों के प्रति अपना समर्थन व सम्मान व्यक्त कर रहा था; वहीँ कांग्रेस सर्जिकल स्ट्राइक की प्रामाणिकता पर सवाल उठाने में लगी थी। इस प्रकार स्पष्ट है कि कांग्रेस ने आतंक के विरुद्ध लड़ाइयों को अपने बयानों व गतिविधियों से अक्सर कमज़ोर करने का ही काम किया है। दरअसल कांग्रेस जब खुद सत्ता में थी, तो आतंक और उसके प्रायोजक पाकिस्तान के विरुद्ध उसका रुख एकदम लचर ही रहा था। कश्मीर के अलगाववादियों के प्रति भी कांग्रेस ने नरम रुख ही रखा था। इसके विपरीत मोदी सरकार ने न केवल आतंकवाद और पाकिस्तान दोनों के प्रति बेहद कठोर रुख का परिचय दिया है। कश्मीर के अलगाववादियों से निपटने में भी सरकार किसी तरह से कोई नरमी दिखाने के मूड में नहीं दिख रही। सरकार के इस रुख का अत्यंत सकारात्मक प्रभाव भी दिखने लगा है। इस कारण कांग्रेस बौखलाई हुई है और कहीं न कहीं चिदम्बरम का ताज़ा बयान इस बौखलाहट का ही परिणाम है। मगर, ऐसे बयानों से हमारे सैन्य बलों का मनोबल गिरने से लेकर कूटनीतिक स्तर पर तक देश को कितनी हानि उठानी पड़ सकती है, क्या कांग्रेस को इसका अंदाज़ा है ? क्या देश के एक पूर्व गृहमंत्री के इस तरह के बयान से कश्मीर मामले पर पाकिस्तान के रुख को बल नहीं मिलेगा ? कहने की आवश्यकता नहीं कि कश्मीर पर चिदंबरम का ताज़ा बयान एकदम पाकिस्तान की भाषा बोलने जैसा है। अतः उचित होगा कि इसके लिए वे देश से माफ़ी मांगें और कश्मीर मसले पर अपना रुख स्पष्ट करे।