मंगलवार, 1 अगस्त 2017

पाकिस्तानी लोकतंत्र की मजबूती का बेसुरा राग [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पनामा पेपर्स मामले में वहाँ की अदालत द्वारा संसद सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराए जाने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा क्या दिया कि इधर भारत में सोशल मीडिया पर उनका नाम ट्रेंड करने लगा। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक पाकिस्तान और नवाज शरीफ की चर्चा चल पड़ी। नवाज पर कार्रवाई के आधार पर पाकिस्तानी लोकतंत्र की मजबूती का बखान भी किया जाने लगा। कहा जाने लगा कि पाकिस्तानी अदालत ने प्रधानमंत्री के खिलाफ कार्रवाई करके लोकतंत्र की मजबूती का सन्देश दिया है। यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने पाकिस्तानी लोकतंत्र को भारतीय लोकतंत्र से बेहतर बताते हुए यह दलील दे डाली कि भारत में भी कई लोगों के नाम पनामा पेपर्स में सामने आए हैं, मगर उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई जबकि पाकिस्तान ने अपने प्रधानमंत्री के खिलाफ भी कार्रवाई कर दी। अब ऐसी बेतुकी तुलना करने वालों को कौन समझाए कि पनामा में भारतीय लोगों से सम्बंधित जो डाटा सामने आया है, यदि उसमें वाकई में कुछ दम होगा तो देश की जांच एजेंसियों से लेकर न्यायपालिका जैसी संस्थाएं आवश्यक कार्रवाई अवश्य करेंगी। इस देश में न्यायपालिका ने प्रधानमंत्रियों पर तक कार्रवाई की है, फिर किसी और को क्यों बख्शेगी ? हमें अपनी लोकतान्त्रिक संस्थाओ और व्यवस्थाओं पर धैर्यपूर्वक इतना विश्वास तो रखना ही चाहिए। संभव है कि अंदरूनी स्तर पर प्राप्त डाटा का परीक्षण चल भी रहा हो। बहरहाल, यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या वाकई में नवाज शरीफ पर हुई कार्रवाई से पाकिस्तान में लोकतंत्र की मजबूती का कोई संकेत मिलता है ? इसके लिए पहले हमें इस पूरे मामले को समझना होगा।

दरअसल पनामा पेपर काण्ड में नवाज शरीफ समेत उनके दोनों बेटों और बेटी का नाम सामने आया था। इसके बाद पाकिस्तान की विपक्षी पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ और अन्य विपक्षी दलों की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डालकर नवाज शरीफ को पद से हटाने की मांग की गयी थी। इसके बाद बीते मई महीने में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले की जांच के लिए संयुक्त जांच दल का गठन किया गया था, जिसने बीती दस जुलाई को अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी थी। रिपोर्ट में नवाज के पास घोषित संपत्ति से अधिक संपत्ति और विदेशों में जायदाद होने का खुलासा हुआ था। माना गया कि ये संपत्ति काला धन है, जिसे पनामा कंपनियों के जरिये बाहर भेजा गया है। इसी रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने उनकी संसद सदस्यता समाप्त की और प्रधानमंत्री पद छोड़ने का आदेश दिया। नवाज को हटाने का मुख्य आधार यह था कि उन्होंने अपनी संपत्ति की वास्तविक जानकारी सामने नहीं रखी थी। इसलिए अदालत ने उन्हें पाकिस्तानी संसद और अदालत के प्रति ईमानदार न मानते हुए बर्खास्त करने का फैसला सुनाया है।

दैनिक जागरण
यह तीसरी बार है जब नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने और बिना कार्यकाल पूरा किए पद से हट गए। साथ ही, यह भी एक तथ्य है कि अपनी आज़ादी का सत्तरवां वर्ष पूरा करने जा रहे पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक ढंग से निर्वाचित अबतक एक भी प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ है, जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया हो। किसीको तख्तापलट करके सेना ने तो किसीको न्यायालय ने पद से हटा दिया तो कोई किसी अन्य कारण से पद से हट गया। ये दिखाता है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिति कितनी डांवाडोल रही है। समूचे देश की कमान संभालने वाले पद पर बैठे व्यक्ति जो जनादेश से निर्वाचित होकर प्रधानमंत्री बनता है, को बिना कार्यकाल पूरा किए पद से हटा उसकी जगह मनमाफिक लोगों को बिठाया जाता रहा है। नवाज शरीफ के बाद अब शहीद खकान अब्बासी पाकिस्तान के अंतरिम प्रधानमंत्री बने हैं। वे तबतक पद पर रहेंगे जबतक नवाज के भाई शाहबाज शरीफ नेशनल एसेम्बली का चुनाव जीतकर संसद पहुँच नहीं जाते। इसके बाद शाहबाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री होंगे।   

हकीकत यह है कि पाकिस्तान में किसी भी लोकतान्त्रिक संस्था से ऊपर सेना काम करती है। सत्ता में कोई रहे, सरकार सेना ही चलाती है। कार्यपालिका हो या न्यायपालिका, सेना के नियंत्रण से बाहर कोई नहीं है। सेना के इशारे पर ही वहाँ की सामाजिक-आर्थिक से लेकर विदेशनीतियों तक का निर्धारण होता है। भारत से अगर आज तक पाकिस्तान के सम्बन्ध नहीं सुधरे तो इसके लिए वहाँ के राजनयिकों से कहीं अधिक जिम्मेदार पाकिस्तानी सेना ही है। जो सरकार या राजनयिक सेना की मुखालफत करता है या सेना की कसौटियों पर खरा नहीं उतरता, उसे किसी न किसी तरह पद से हटा दिया जाता है। पाकिस्तान में यही दस्तूर रहा है।

हाल के महीनों में नवाज़ शरीफ से पाकिस्तानी सेना के नाखुश होने की बात चर्चा में रही है। ऐसा अनुमान है कि भारत के मोर्चे पर कूटनीतिक नाकामी समेत अमेरिका आदि से भी सम्बन्ध बिगड़ने के कारण नवाज शरीफ से पाकिस्तानी सेना संतुष्ट नहीं थी। इन चीजों के कारण इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पनामा केस की आड़ में सेना ने नवाज को हटवाने की अपनी मंशा को पूरा करवा लिया है।

उपर्युक्त बातें पाकिस्तानी लोकतंत्र की मजबूती की पोलपट्टी खोल रही हैं। इनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि पाकिस्तान में जो है, वहाँ की सेना है, उसके बाद ही कोई और है। ऐसे में, आज नवाज शरीफ की बर्खास्तगी के बाद से पाकिस्तानी लोकतंत्र पर भारत के जो लोग मुग्ध हो रहे उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि भारत जैसे देश, जिसकी सेना पाकिस्तानी सेना से कई गुना अधिक शक्तिशाली होते हुए भी संविधान और संसद के प्रति पूर्णतः निष्ठावान रहती है, के लोकतंत्र की तुलना वे किस आधार पर फौज के आगे नतमस्तक रहने वाले पाकिस्तानी लोकतंत्र से कर रहे ? वास्तव में तुलना तो बड़ी चीज है, पाकिस्तानी लोकतंत्र तो अब इस लायक भी नहीं रह गया है कि महान भारतीय लोकतंत्र के साथ उसकी चर्चा भी की जाए।

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