किस तरह साहित्य के माध्यम से बच्चों के मस्तिष्क को सुसंस्कारित किया जा सकता है, इसका उत्तम उदाहरण हमें दिविक रमेश के बाल-कविता संग्रह ‘छुट्कल मुट्कल बाल कविताएँ’ की कविताओं में मिलता है। इस संग्रह की कविताओं में समय और समाज के विभिन्न विषयों, आवश्यकताओं और विसंगतियों को ऐसे बातचीत के लहजे में पिरोया गया है कि बच्चे उन्हें सहज ही ग्रहण कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ये कविताएँ बच्चों को माँ की तरह बड़े प्यार-दुलार और आत्मीयता के साथ चीजों को सिखाने व समझाने की कोशिश करती हैं।
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| दैनिक जागरण |
संग्रह की कुछ कविताओं पर दृष्टि डालें तो इसकी एक कविता ‘हँसी का इंजक्शन’ में दादा-पोते के संवाद के माध्यम से जहाँ बच्चों में अपने बड़ों के प्रति सेवा और आदर का भाव पैदा करने की सीख दी गयी है, तो वहीं ‘मैं पढ़ता दीदी भी पढ़ती’ जैसी कविता के जरिये बच्चों में परस्पर सहयोग और समानता का भाव विकसित करने का प्रयास नज़र आता है। साथ ही, इस कविता की ये पंक्तियाँ ‘मैं पढ़ता दीदी भी पढ़ती/ क्यों माँ चाहतीं दीदी ही पर/ काम करें घर के सारे’ बड़ों के समक्ष भी एक बड़े प्रश्न की तरह है। सोचने की जरूरत है कि अगर हमारा बच्चा हमसे ऐसा प्रश्न पूछ दे तो क्या इसका कोई तर्कसंगत उत्तर हमारे पास है ? संग्रह की एक अन्य कविता ‘आओ महीनों आओ घर’ में बड़े ही सुन्दर ढंग से बच्चों को साल के महीनों तथा उनमें पड़ने वाले विशेष त्योहारों की जानकारी दी गयी है। खेल-खेल में सिखाने का ये कविता एक अच्छा उदाहरण है। ऐसे ही इस संग्रह की ‘मैं तो सबको प्यार करूंगा’, ‘नाचते रहते भूल के सर्दी’, ‘हमें देश तो लगता जैसे’ आदि विभिन्न विषयों पर केन्द्रित कविताएँ बच्चों में अलग-अलग प्रकार की सीख-समझ और जानकारी का विकास करने का प्रयास करती हैं। बाल-साहित्य की भाषा सरल, सहज और मधुर होनी चाहिए जिससे बच्चे उससे आसानी से जुड़ सकें। इस संग्रह की कविताओं की भाषा इसी प्रकार की है. ये बच्चों को सहज ही आकर्षित कर सकती है। इसके अलावा अच्छी बात यह भी है कि ज्यादातर कविताएँ लयबद्ध हैं और गुनगुनाई जा सकती हैं। बाल-साहित्य की बुनियादी शर्त यही होती है कि उसमें अलग से कुछ सिखाने का आग्रह नहीं होना चाहिए, और इस कसौटी पर ये कविताएँ सौ फीसदी खरी साबित होती हैं।

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