- पीयूष द्विवेदी भारत
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| दैनिक जागरण |
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| जनसत्ता |
दरअसल सब्सिडी ख़त्म करने की यह अक्ल सरकार को गत वर्ष की शुरुआत में देश के कुछ अर्थशास्त्रियों द्वारा दी गयी थी। अर्थव्यवस्था को उच्च आर्थिक वृद्धि दर के मार्ग पर लाने को अर्थशास्त्रियों ने आम बजट 2016-17
में कुछ अलोकप्रिय कदम उठाने और कठोर राजकोषीय अनुशासन में ढिलाई बरतने का सुझाव दिया था। अर्थशास्त्रियों का कहना था कि सरकार को रसोई गैस सब्सिडी को खत्म कर देना चाहिए। इसके बाद ही सरकार द्वारा गत वर्ष से सब्सिडी में प्रतिमाह दो रूपये की कटौती की योजना पर अमल शुरू किया गया।
बहरहाल, अब सवाल यह उठता है कि सरकार का सब्सिडी ख़त्म करने का यह कदम कितना उचित है ? यह ठीक है कि भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था और राजकोषीय घाटे से जूझ रहे देश के लिए सब्सिडी कोई अच्छी चीज नहीं कही जा सकती। परन्तु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि संवैधानिक रूप से भारत एक कल्याणकारी राज्य है, अतः सरकार का दायित्व बनता है कि समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से संसाधनों का वितरण सुनिश्चित करे। क्योंकि, अर्थव्यवस्था की मजबूती के महत्वाकांक्षी मोह में गरीब जनता की अनदेखी करना एक कल्याणकारी राष्ट्र का चरित्र नहीं होता है। दूसरी बात कि सरकार का सब्सिडी खत्म करने का यह तरीका भी बेहद गलत है। धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म करने के इस तरीके को आर्थिक विशेषज्ञ भले से इस तर्क के आधार पर उचित ठहराएं कि इससे एकबार में उपभोक्ता पर अधिक बोझ नहीं पड़ेगा। मगर इस तरीके से सरकार की यह मंशा भी प्रतीत होती है कि वो धीरे-धीरे आम आदमी को महंगाई के प्रति अभ्यस्त बना देना चाहती है।
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| अमर उजाला कॉम्पैक्ट |
गौर करें तो अभी सरकार द्वारा निर्धारित ३२ रूपये प्रति व्यक्ति दैनिक आय के गरीबी रेखा निर्धारित करने वाले अनुचित मानक के बावजूद आधिकारिक तौर पर देश की लगभग २२ फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन-निर्वाह कर रही है। इस आबादी की आर्थिक दशा यह है कि सब्सिडी के बावजूद रसोई गैस का नियमित रूप से उपयोग कर पाना इसके लिए संभव नहीं है। ऐसे में, रसोई गैस पर से सब्सिडी समाप्त कर देना, इस आबादी की मुश्किलें और बढ़ाने वाला कदम ही कहा जाएगा। रसोई गैस जीवन की भोजन जैसी एक बुनियादी जरूरत से सम्बंधित संसाधन है, अतः देश की गरीब जनता के लिए उसके उपयोग को और महंगा बनाना उचित नहीं कहा जा सकता।
इस संदर्भ में यह तथ्य भी उल्लेखनीय होगा कि केंद्र सरकार द्वारा १ मई, २०१६ को प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत की गयी, जिसके तहत देश के पांच करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन वितरित करने का लक्ष्य रखा गया था। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार अबतक इस योजना के तहत दो करोड़ चौंसठ लाख से अधिक गैस कनेक्शन वितरित किए जा चुके हैं। अब सरकार को बताना चाहिए कि जिन गरीब परिवारों की आर्थिक दशा ऐसी भी नहीं थी कि कुछ हजार रूपये जुटाकर एक अदद गैस कनेक्शन ले सकें, वे परिवार क्या सब्सिडी समाप्त होने के बाद महँगी दरों पर उज्ज्वला योजना के तहत मिले गैस सिलिंडर का नियमित उपयोग कर पाएंगे ? प्रधानमंत्री कहते हैं कि इस योजना के जरिये वे माताओं-बहनों को धुएं से मुक्ति दिलाना चाहते हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या रसोई गैस सब्सिडी ख़त्म करके सरकार अपनी इसी योजना के लक्ष्यों की मिट्टीपलीद नहीं कर रही ? एक आंकड़े के मुताबिक़ अभी देश में साढ़े
उन्नीस करोड़ से
अधिक एलपीजी कनेक्शन हैं । सरकार ने २०१९ तक देश की पंचानवे प्रतिशत आबादी को रसोई गैस उपलब्ध
कराने का लक्ष्य रखा है।
संभव है कि सरकार अपने इस लक्ष्य में कामयाब भी हो जाए। मगर, गैस भरवाना महँगा होने पर इसमें से बहुतायत गरीब लोग गैस सिलिंडर होते हुए भी लकड़ी-चूल्हे का ही रुख कर लेंगे, ऐसे में सरकार द्वारा घर-घर में रसोई गैस सिलिंडर पहुँचाने के लक्ष्य का क्या अर्थ रह जाएगा ? घर में सिलिंडर गैस होने के बावजूद लोग लकड़ी के चूल्हे का रुख कर धुएँ से जूझने को मजबूर होंगे। जरूरत है कि सरकार इस स्थिति को समझे और फिलहाल रसोई गैस सब्सिडी समाप्त करने के अपने इरादे पर विराम लगाए। भोजन जैसी बुनियादी जरूरत से जुड़े संसाधन रसोई गैस की सब्सिडी तबतक जारी रखना हमारा दायित्व है, जबतक हम देश के गरीब तबके की प्रति व्यक्ति आय को एक उचित स्तर तक पहुंचाने में कामयाब नहीं हो जाते।
अब रही बात राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए खर्चों में कटौती की, तो सरकार उसके लिए केन्द्रीय वेतन आयोगों समेत अन्य सरकारी खर्चों में कटौती करने जैसे अन्य विकल्पों पर विचार कर सकती है। लेकिन, रसोई गैस से सब्सिडी खत्म करना इसका उचित विकल्प नहीं है।



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