- पीयूष द्विवेदी भारत
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| राष्ट्रीय सहारा |
बच्चों
में कुपोषण दो तरह से आता है । एक जन्म के साथ और एक जन्म के कुछ समय बाद । इन
दोनों ही स्थितियों में कुपोषण के लिए जच्चा-बच्चा को समुचित पोषण न दिया जाना ही मुख्य
कारण होता है । शिशु अवस्था में कुपोषण से ग्रस्त होने की स्थिति में बच्चा बड़े
होने पर भी सुपोषित बच्चों की अपेक्षा शारीरिक-मानसिक स्तर पर बेहद हीन रह जाता है
। उदाहरणार्थ, उम्रानुसार कद छोटा होना, शरीर पतला या सूजा हो जाना; याद्दाश्त
बेहद कमजोर हो जाना और कोई भी काम करते हुए बहुत ही जल्दी थक जाना आदि कुपोषण के
तमाम लक्षण हैं । इनके अलावा कुपोषण युक्त बच्चे पर घेंघा, एनीमिया, मैरेमस आदि
बीमारियों का खतरा भी हमेशा बना रहता है ।
उसपर कुपोषण की सबसे बड़ी दिक्कत तो ये है कि जो बच्चा जन्म से पाँच वर्ष के भीतर इसकी
चपेट में आ गया, उसके लिए आगे इससे मुक्त होना बेहद मुश्किल हो जाता है ।
कुपोषण के लिए पोषण युक्त आहार की कमी सबसे प्रमुख कारक होती है, लेकिन
इसके अलावा और भी कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें कुपोषण के लिए जिम्मेदार कहा जा सकता
है । इनमे समाज के एक बड़े हिस्से में व्याप्त अ-जागरूकता और साफ़-सफाई का अभाव
प्रमुख है । ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकाधिक लोग पोषण आदि के मामले में बेहद
अ-जागरुक होते हैं, ऐसे में वे इस बात को नहीं समझ पाते कि पोषण के लिए क्या और
कितना खाना चाहिए । उनकी नज़र में पोषण का सिर्फ एक अर्थ होता है कि जो भी मिले, खूब
अधिक खाओ । वे समझते हैं कि खूब अधिक खाने से व्यक्ति तंदुरुस्त रहता है और प्रायः
यही चीज वे अपने बच्चों पर भी लागू करते हैं । परिणामतः वे स्वयं तो कुपोषित और
अस्वस्थ होते ही हैं, अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी कुपोषण पारम्परिक धरोहर के रूप
में दे देते हैं । इसके अलावा साफ़-सफाई की कमी भी कुपोषण के लिए एक अहम कारण है । एक
आंकड़े के मुताबिक देश में तकरीबन पच्चीस हजार ऐसी बस्तियां हैं जहाँ साफ़-सफाई का
स्तर औसत से भी नीचे है । हालत ये है कि इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के घरों
के आसपास कहीं कचरे का ढेर लगा होता है तो कहीं बगल से ही नाली बह रही होती है । ऐसे
में, लाख बचाने पर भी खेलते-कूदते बच्चे इन्ही गंदगियों से रूबरू होते हैं जिससे
कि प्रदूषण के कारण उनमे तमाम तरह की बीमारियाँ पैदा होती हैं । बीमारियों से उनकी
अवस्थानुसार बेहद नाजुक पाचन शक्ति पर
प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिससे उनका खाना ठीक से पचना बंद हो जाता है । इस
प्रकार धीरे-धीरे वे कुपोषण की गिरफ्त में आ जाते हैं । जाहिर है कि समुचित पोषण
के अलावा भी अ-जागरूकता आदि तमाम ऐसे कारण जिनसे कुपोषण को बल मिलता है । अंततः,
इन बातों को देखते हुए कह सकते हैं कि कुपोषण के इस अभिशाप से मुक्ति के लिए जितनी
आवश्यकता समुचित पोषण, चिकित्सा व स्वच्छता की है, उतनी या उससे कुछ अधिक ही
आवश्यकता स्वास्थ्य के प्रति जन-जागरूकता की भी है । जागरूकता के लिए जितना
दायित्व सरकार का है, उतना ही समाज के अन्य जागरुक व जानकार लोगों का भी है कि वे
इस विषय में अंजान लोगों को बताएं और अपने स्तर पर जागरूकता लाने का प्रयास करें ।
क्योंकि, जब तक समाज में पूरी तरह से स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता नहीं आ जाती,
कुपोषण के अभिशाप से मुक्ति संभव नहीं है ।









