गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

कुपोषण के अभिशाप से मुक्ति कब [राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत

राष्ट्रीय सहारा
आज के बच्चे ही कल  युवा होंगे और राष्ट्र के प्रगति व संरक्षण का दायित्व उनके कन्धों पर होगा, ऐसे में आवश्यक है कि वे शारीरिक-मानसिक स्तर पर स्वस्थ व मजबूत हों । बच्चों को शारीरिक-मानसिक स्तर पर स्वस्थ व मजबूत रखने के लिए बुनियादी जरूरत ये है कि गर्भस्थ अवस्था से लेकर तक़रीबन तीन-चार वर्ष तक उनके पोषण व चिकित्सा का समुचित ध्यान रखा जाए । क्योंकि, ये वो समय होता है, जब बच्चे अपनी भूख-प्यास, बीमारी आदि किसी भी तरह की जरूरत व तकलीफ के विषय में ठीक से बता पाने में सक्षम नहीं होते हैं । साथ ही, यही वो दौर भी होता है जब उनके शारीरिक-मानसिक विकास की बुनियाद पड़ती है । लिहाजा, इसी वक्त उनके आहार, चिकित्सा आदि के प्रति सबसे अधिक सजग व सतर्क होने की जरूरत भी होती है । क्योंकि, यहाँ चूक होने की स्थिति में बच्चे के कुपोषण के साये में जाने से लेकर गंभीर बीमारियों से ग्रस्त होने तथा जान जाने तक का खतरा होता है । इसी संदर्भ में गौर करें तो कुपोषण की समस्या आज इतना विकराल रूप ले चुकी है कि विश्व बैंक द्वारा इसकी तुलना ‘ब्लैक डेथ’ नामक उस महामारी से की गई है जिसने १८ वी सदी में योरोप की एक बड़ी जनसंख्या को नष्ट कर दिया था । इसी क्रम में अगर एक नज़र भारत पर डालें तो बच्चों के स्वास्थ्य व पोषण के मामले में यहाँ स्थिति बेहद खराब नज़र आती है । हालत ये है कि आज दुनिया के तकरीबन ४० फीसद कुपोषित बच्चे अकेले भारत में हैं । इनमे से लगभग  आधे बच्चों का वजन उनकी उम्र के अनुपात में बेहद कम है, तो कितने ही बच्चे एनीमिया से पीड़ित होने के कारण खून की कमी से ग्रस्त हैं । संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल पाँच साल से कम उम्र के लगभग २१ लाख बच्चे समुचित पोषण व स्वास्थ्य सुविधाएँ न मिलने के कारण काल के गाल में चले जाते हैं । इसी क्रम में यह भी उल्लेखनीय होगा कि एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की तीसरी सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था होने के बावजूद स्वास्थ्य और पोषण के मामले में भारत की हालत नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे देशों से भी बदतर है । गौरतलब है कि ये सभी देश भारत से आर्थिक, संसाधनिक आदि तमाम तरह की सहायता प्राप्त करने वाले देशों में शामिल हैं । ऐसे में अगर भारत में बच्चों की स्वास्थ्यजन्य स्थिति  इन देशों से भी बदतर है तो ये भारत के लिए बेहद शर्मनाक बात कही जाएगी । कहना गलत नहीं होगा कि आज जहाँ एक तरफ भारत विश्व पटल पर अपनी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के दम पर अपनी पहचान कायम करके गर्वित हो रहा है, वहीँ दूसरी तरफ उसकी भावी पहचान यानी उसके बच्चों का एक बड़ा हिस्सा कुपोषण के साये में जीने को विवश है । हालांकि ऐसा कत्तई नहीं है कि भारत में बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए कोई सरकारी नीति व कार्यक्रम नहीं है । गौर करें तो भारत सरकार द्वारा जच्चा-बच्चा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘जननी-शिशु सुरक्षा’, ‘आशा’ आदि कई योजनाएं व कार्यक्रम बनाए गए हैं । पर इसे व्यवस्था का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सरकार की अन्य योजनाओं की ही तरह ये योजनाएं व कार्यक्रम भी अधिकाधिक रूप से सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक ही सिमट के रह गए हैं । यथार्थ के धरातल पर इन योजनाओं का कोई ठोस क्रियान्वयन होता नहीं दिखता । इन कार्यक्रमों के कागज़ तक सिमटे रहने के लिए प्रमुख कारण केन्द्र व राज्य सरकारों के बीच सही तालमेल का न होना है और इस तालमेल की कमी का खामियाजा देश के नन्हे मासूमों को अपनी जान तक गँवा के भुगतना पड़ रहा है । 
  बच्चों में कुपोषण दो तरह से आता है । एक जन्म के साथ और एक जन्म के कुछ समय बाद । इन दोनों ही स्थितियों में कुपोषण के लिए जच्चा-बच्चा को समुचित पोषण न दिया जाना ही मुख्य कारण होता है । शिशु अवस्था में कुपोषण से ग्रस्त होने की स्थिति में बच्चा बड़े होने पर भी सुपोषित बच्चों की अपेक्षा शारीरिक-मानसिक स्तर पर बेहद हीन रह जाता है । उदाहरणार्थ, उम्रानुसार कद छोटा होना, शरीर पतला या सूजा हो जाना; याद्दाश्त बेहद कमजोर हो जाना और कोई भी काम करते हुए बहुत ही जल्दी थक जाना आदि कुपोषण के तमाम लक्षण हैं । इनके अलावा कुपोषण युक्त बच्चे पर घेंघा, एनीमिया, मैरेमस आदि बीमारियों  का खतरा भी हमेशा बना रहता है । उसपर कुपोषण की सबसे बड़ी दिक्कत तो ये है कि जो बच्चा जन्म से पाँच वर्ष के भीतर इसकी चपेट में आ गया, उसके लिए आगे इससे मुक्त होना बेहद मुश्किल हो जाता है ।
   कुपोषण के लिए पोषण युक्त आहार की कमी सबसे प्रमुख कारक होती है, लेकिन इसके अलावा और भी कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें कुपोषण के लिए जिम्मेदार कहा जा सकता है । इनमे समाज के एक बड़े हिस्से में व्याप्त अ-जागरूकता और साफ़-सफाई का अभाव प्रमुख है । ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकाधिक लोग पोषण आदि के मामले में बेहद अ-जागरुक होते हैं, ऐसे में वे इस बात को नहीं समझ पाते कि पोषण के लिए क्या और कितना खाना चाहिए । उनकी नज़र में पोषण का सिर्फ एक अर्थ होता है कि जो भी मिले, खूब अधिक खाओ । वे समझते हैं कि खूब अधिक खाने से व्यक्ति तंदुरुस्त रहता है और प्रायः यही चीज वे अपने बच्चों पर भी लागू करते हैं । परिणामतः वे स्वयं तो कुपोषित और अस्वस्थ होते ही हैं, अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी कुपोषण पारम्परिक धरोहर के रूप में दे देते हैं । इसके अलावा साफ़-सफाई की कमी भी कुपोषण के लिए एक अहम कारण है । एक आंकड़े के मुताबिक देश में तकरीबन पच्चीस हजार ऐसी बस्तियां हैं जहाँ साफ़-सफाई का स्तर औसत से भी नीचे है । हालत ये है कि इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के घरों के आसपास कहीं कचरे का ढेर लगा होता है तो कहीं बगल से ही नाली बह रही होती है । ऐसे में, लाख बचाने पर भी खेलते-कूदते बच्चे इन्ही गंदगियों से रूबरू होते हैं जिससे कि प्रदूषण के कारण उनमे तमाम तरह की बीमारियाँ पैदा होती हैं । बीमारियों से उनकी अवस्थानुसार बेहद नाजुक पाचन शक्ति पर  प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिससे उनका खाना ठीक से पचना बंद हो जाता है । इस प्रकार धीरे-धीरे वे कुपोषण की गिरफ्त में आ जाते हैं । जाहिर है कि समुचित पोषण के अलावा भी अ-जागरूकता आदि तमाम ऐसे कारण जिनसे कुपोषण को बल मिलता है । अंततः, इन बातों को देखते हुए कह सकते हैं कि कुपोषण के इस अभिशाप से मुक्ति के लिए जितनी आवश्यकता समुचित पोषण, चिकित्सा व स्वच्छता की है, उतनी या उससे कुछ अधिक ही आवश्यकता स्वास्थ्य के प्रति जन-जागरूकता की भी है । जागरूकता के लिए जितना दायित्व सरकार का है, उतना ही समाज के अन्य जागरुक व जानकार लोगों का भी है कि वे इस विषय में अंजान लोगों को बताएं और अपने स्तर पर जागरूकता लाने का प्रयास करें । क्योंकि, जब तक समाज में पूरी तरह से स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता नहीं आ जाती, कुपोषण के अभिशाप से मुक्ति संभव नहीं है ।            

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

किताबों के कटघरे में पीएम [डीएनए में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

डीएनए 
मनमोहन सिंह के विषय में विपक्षी दलों तथा अन्य तमाम लोगों द्वारा मौखिक तौर पर तो ये हमेशा से ही कहा जाता रहा है कि वे पूरी तरह से दस जनपथ के प्रति उत्तरदायी हैं तथा उनके सभी निर्णय नेहरु-गाँधी परिवार के इशारे पर ही होते हैं । लेकिन अब जब मनमोहन सिंह इस आम चुनाव बाद अपने राजनीतिक सफर के अवसान की घोषणा कर चुके हैं, तब पूर्व में उनके निकटवर्ती रहे  दो व्यक्तियों संजय बारू और पी सी पारेख द्वारा लिखी दो किताबें सामने आई हैं जो कि प्रधानमंत्री को तथ्यों के आधार पर कटघरे में खड़ा करती हैं । पहली किताब प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ है, जिसमे दावा किया गया है कि यूपीए के दूसरे शासनकाल तक बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बेहद कमजोर हो चुके थे, उनके सभी निर्णय पूरी तरह से दस जनपथ के दबाव में लिए जाते थे तथा उनके  मंत्री भी उनकी बात न मानकर दस जनपथ के आदेश की तरफ ही टकटकी बांधे रहते थे । हालत ये थी कि कितनी फाइलें तो प्रधानमंत्री को दिखाई ही नहीं जाती थीं और उनसे सम्बंधित निर्णयों के बारे में प्रधानमंत्री कुछ जान ही नहीं पाते थे । सिर्फ नीतिगत चीजें ही नहीं बड़े पदों पर नियुक्तियां भी सोनिया गाँधी की मर्जी से ही होती थीं । इस संदर्भ में एक उदाहरण देते हुए संजय लिखते हैं कि मनमोहन सिंह सी. रंगराजन को वित्तमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन सोनिया गाँधी ने प्रणब मुखर्जी को वित्तमंत्री बनाया और प्रधानमंत्री कुछ नहीं कर सके । यह भी कि २जी से ठीक पहले प्रधानमंत्री ए राजा को हटाना चाहते थे, लेकिन दस जनपथ के दबाव के चलते वो ऐसा नहीं कर पाए । इसके अलावा पूर्व कोयला सचिव पी सी पारेख की किताब ‘क्रूसेडर ऑर कान्स्पीरेटर’ में भी कोयला घोटाले में मनमोहन सिंह की विवशता से  सम्बंधित तथ्यों के आधार पर यही कहा गया है कि प्रधानमंत्री कैसे इस घोटाले को देखते, समझते हुए भी दस जनपथ के दबाव के कारण रोक नहीं पाए । अब अगर इन किताबों बातों को सही मानें (सही न मानने का कोई ठोस आधार भी तो नहीं दिखता) तो स्पष्ट होता है कि अब तक मनमोहन सिंह के कमजोर और लाचार प्रधानमंत्री होने के विषय में जो बातें बस यूँ ही मौखिक तौर पर कही जाती थीं, ये किताबें उन बातों का दस्तावेजी प्रमाण हैं । इन किताबों के आने के बाद से ही विपक्ष द्वारा यूपीए  सरकार समेत सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री पर लगातार हमले किए जा रहे हैं । हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय समेत कांग्रेस की तरफ से इन दोनों ही किताबों को पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित व निराधार बताते हुए सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री के बचाव की कोशिश जरूर की जा रही है, लेकिन विपक्षी दल इन दलीलों से संतुष्ट होने को तैयार नहीं दिखते और केन्द्र सरकार पर अत्यंत हमलावर रुख अपनाए हुए हैं । हालांकि संजय बारू की किताब के संदर्भ में सरकार के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की ये प्रतिक्रिया बाकी कांग्रेसी नेताओं से थोड़ी अलग अवश्य है कि मनमोहन सिंह एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री थे और उनकी सरकार में सत्ता के दो केन्द्र थे । वहीँ, मुख्य विपक्षी दल भाजपा की तरफ से उसके प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी समेत लालकृष्ण आडवाणी तथा अन्य तमाम नेताओं द्वारा इन किताबों को आधार बनाकर यूपीए सरकार और सोनिया गाँधी को घेरने की तमाम कोशिशें की जा रही है । जहाँ नरेंद्र मोदी इस विषय में सोनिया गाँधी से जवाब मांग चुके हैं तो वहीं लालकृष्ण आडवाणी ने कहा है कि किताब में लिखीं बातें लोग पहले से ही जानते थे, किताब से उन बातों को पुष्टि मिल गई ।
   इन किताबों के प्रकाश में आने के समय पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस की तरफ से कहा जा रहा है कि चुनाव के समय ये किताबें लाना राजनीति से प्रेरित है तथा तुरंत पब्लिसिटी पाने के लिए इनमे तमाम निराधार बातें लिखी गई हैं । ये सही है कि इन किताबों का समय थोड़ा संदेहास्पद लगता है और उसपर सवाल भी उठाए जा सकते हैं, लेकिन इससे इनमे मौजूद बातें अप्रासंगिक नहीं हो जाती । इन किताबों की बातों को निराधार माना जा सकता था, बशर्ते कि प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल में खुद के दम पर कोई नीतिगत निर्णय लेते दिखे होते । लेकिन इन किताबों के आने से पहले यूपीए सरकार के पूरे कार्यकाल के दौरान देश ने निर्णय लेने में प्रधानमंत्री की जो लाचारी देखी है, उसके बाद इन किताबों को गलत मानने का कोई आधार नहीं बचता । अब इस पूरी स्थिति को देखते हुए अगर समझने का प्रयास करें तो स्पष्ट होता है कि यूपीए सरकार में जब भी कोई समस्या उत्पन हुई तो उसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही तो प्रधानमंत्री पर डाली गई, लेकिन उपलब्धियों का श्रेय सोनिया और राहुल को दिया जाता रहा । उदाहरणार्थ, दागियों पर अध्यादेश प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सबकी सम्मति से लाया गया और जब उसपर किरकिरी होने लगी, तो प्रधानमंत्री की गैरमौजूदगी में उसे फाड़कर राहुल तो क्रांतिकारी बन गए और सारी जवाबदेही प्रधानमंत्री पर डाल दी गई । इसी प्रकार खाद्य सुरक्षा विधेयक, मनरेगा आदि कानूनों-कार्यक्रमों के मामले में भी हुआ और इनका भी श्रेय नेहरु-गाँधी परिवार को ही दिया गया । इन सब बातों को देखते हुए अगर ये कहें तो गलत नहीं होगा कि यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की स्थिति एक कठपुतली जैसी रही और दूसरों की गलतियों की जवाबदेही उनपर डाली गई और उनकी सफलताओं का श्रेय सोनिया-राहुल को दिया जाता रहा । खुद संजय बारू ने भी यह बात कही है कि प्रधानमंत्री की उपलब्धियों, जिनका श्रेय उन्हें नही मिला, को देश के सामने लाने के लिए ही उन्होंने ये किताब लिखी है । पर इतने सबके बावजूद भी प्रधानमंत्री जिस तरह से चुप्पी साधे हुए हैं, वो चौंकाने वाला है । अब वो अपने राजनीतिक सफर के अवसान काल में हैं, ऐसे में उचित है कि वे इन बातों पर अपना पक्ष रखते हुए देश को अपने कार्यकाल की हकीकत से अवगत कराएं । 

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

लघुकथा : लिटमस टेस्ट [त्रैमासिक पत्रिका 'हिंदी चेतना' में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

हिंदी चेतना 
"प्रेमहीन जीवन शून्य है, ये मुझे बेहतर पता है । इसलिए उसकी पीड़ा को समझता हूं ।"  आकाश  शून्य की ओर देखते हुवे प्रतीक से बोला ।
"किसकी पीड़ा? तुम्हारी प्रेमिका?" प्रतीक बोला ।
"ना! एक मित्र है, बहुत प्रेम करता है एक से, पर कह नही पा रहा है ।"
“कौन मित्र?”
“अभिनव, कॉलेज वाला... ।”
“जानता हूं । किसको चाहता है? रहती कहाँ है?”
“जैसा कि उसने बताया है, तुम्हारे ही मोहल्ले में ।”
“क्या बात कर रहे हो, ऐसा है, तब तो तुम्हारे दोस्त की समस्या हल.. ।” अबकी प्रतीक उत्तेजित था ।
“पता नही ! आसान नही लगता ।”
“आसान कर देंगे । दो प्रेमियों को मिलाने से बड़ा पुण्य क्या । पर प्रेमिका का नाम तो बताओ?”
“अनुराधा....!”

“क्या, उसकी इतनी हिम्मत, जिन्दा नही छोडूंगा कमीने को, खून कर दूँगा !” प्रतीक अचानक गुस्से में आ गया था । अनुराधा उसकी बहन का नाम था ।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

संतुलिंत और व्यवहारिक है भाजपा का घोषणापत्र [अप्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

घोषणापत्र जारी करते राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और एमएम जोशी 
आख़िरकार बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित भाजपा के घोषणापत्र का ऐलान हो ही गया । बीते सोमवार की सुबह पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह, भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी समेत लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज आदि नेताओं की मौजूदगी में घोषणापत्र समिति के प्रमुख मुरली मनोहर जोशी द्वारा भाजपा के घोषणापत्र का ऐलान किया गया । भाजपा का ये घोषणापत्र एक सप्ताह पहले आने वाला था, लेकिन घोषणापत्र में राम मंदिर के मुद्दे के जिक्र को लेकर नरेंद्र मोदी और मुरली मनोहर जोशी के बीच मतभेद होने के कारण इसके आने में देरी हुई । चूंकि, मोदी का पक्ष था कि घोषणापत्र में राम मंदिर आदि का जिक्र न करते हुए केवल विकास की बात की जाए, जबकि जोशी का कहना था कि राम मंदिर भाजपा का पारम्परिक मुद्दा है और इसको छोड़ने का मतलब अपनी वैचारिक जमीन से हटना है । साथ ही, जोशी को राम मंदिर का जिक्र न करने की स्थिति में भाजपा से साधु-संतों की नाराजगी का भी भय था । बहरहाल, मोदी और जोशी के बीच का ये मतभेद जब संघ के दरवाजे पर पहुंचा तो आखिरकार हल्के-फुल्के परिवर्तन के साथ राम मंदिर मुद्दे को भाजपा के घोषणापत्र में स्थान दे दिया गया । चूंकि, मोदी की लोकप्रियता गुजरात में सफल उनके विकास माडल के कारण ही है और ये चुनाव भी वो उसीके दम पर लड़ रहे हैं, इसलिए वो नहीं चाहते थे कि राम मंदिर मुद्दे के कारण फिर साम्प्रदायिकता का जिन्न भाजपा या उनके पीछे पड़े और उनकी विकास पुरुष की छवि को चोट पहुंचे । बस इसीलिए वो घोषणापत्र में राम मंदिर का जिक्र करने के खिलाफ थे, लेकिन राम मंदिर का जिक्र करना भाजपा की भी मजबूरी थी । ऐसा न करने की स्थिति में भाजपा के पारम्परिक मतदाताओं के बीच भाजपा के प्रति बेहद गलत संदेश जाता और संभवतः इससे भाजपा को चुनाव में हानि भी उठानी पड़ जाती ।
  अभी हाल ही में कांग्रेस ने भी अपना घोषणापत्र जारी किया था जिसमे कि एक से बढ़कर एक जनलुभावन वायदे किए गए हैं । अगर कांग्रेस के घोषणापत्र और भाजपा के घोषणापत्र के बीच एक तुलनात्मक अध्ययन करें तो हम देखते हैं कि कांग्रेसी घोषणापत्र की अपेक्षा भाजपा का घोषणापत्र न सिर्फ कहीं ज्यादा संतुलित है, बल्कि व्यवहारिक भी है । हालांकि इसका ये कत्तई अर्थ नहीं कि भाजपा के घोषणापत्र में खामियां नहीं हैं । बेशक, उसमे भी कई खामियां हैं जिनपर सवाल उठाए जा सकते हैं, मगर सभी खामियों के बावजूद भाजपा का घोषणापत्र कांग्रेस के घोषणापत्र से अधिक बेहतर और विश्वसनीय लगता है । इसी क्रम में अगर दोनों घोषणापत्रों में किए गए कुछ प्रमुख वायदों के जरिए हम इस बात को समझने का प्रयास करें तो स्वास्थ्य के मसले पर जहाँ कांग्रेसी घोषणापत्र का कहना है कि सभी नागरिकों के लिए स्वास्थ्य का अधिकार तथा हेल्थ बीमा होगी, वहीँ भाजपा हर राज्य में एक एम्स की स्थापना, अस्पतालों का आधुनिकीकरण करने तथा आयुर्वेद, योग आदि के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की पक्षधर है । यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि कांग्रेस ने जिस ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ की बात की है उसका लाभ लोगों तक पहुँचने की क्या गारंटी है, इसपर उसने कुछ नहीं कहा है । संदेह नहीं कि ये भी ‘शिक्षा का अधिकार’ क़ानून की तरह मात्र कागजों तक सिमटकर रह जाएगा । जबकि भाजपा द्वारा किए गए हर राज्य में एक एम्स बनाने तथा अस्पतालों के आधुनिकीकरण करने आदि वादों के पूरा होने में कहीं कोई विशेष अड़चन नहीं दिखती । रोजगार के मामले में कांग्रेस ने १० करोड़ युवाओं को हुनर का विकास करने के लिए अवसर देने की बात तो की गई है, लेकिन ये नहीं बताया है कि वो अचानक इतने रोजगार के अवसर कहाँ से लाएगी ? क्योंकि अपने पिछले घोषणापत्र में उसने रोजगार देने का जो लक्ष्य रखा था, वो अब भी अधूरा है । ऐसे में १० करोड़ रोजगार के वायदे के हवा-हवाई ही कहा जा सकता है । वहीँ इस विषय पर भाजपा की तरफ से रोजगार की किसी भी निश्चित संख्या का कोई भी वायदा नहीं किया गया है । इसके अलावा खुद को गरीबों की पार्टी बताने वाली कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में गरीबों के लिए कहा है कि देश में बीपीएल से ऊपर ८० प्रतिशत परिवारों को अगले पाँच साल में मध्यम वर्ग में लाया जाएगा तथा शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों को पेंशन आदि की सुविधा दी जाएगी । अब यहाँ कांग्रेस ने ये नहीं बताया है कि बीपीएल से ऊपर के ८० प्रतिशत परिवारों को मध्यम वर्ग तक किस योजना या कार्यक्रम के द्वारा लाया जाएगा और इसके लिए निवेश करने को धन कहां से आएगा ? भाजपा की बात करें तो इस मसले पर उसका कहना है कि ग्रामीण गरीबों को कृषि आदि के क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध कराकर सशक्त किया जाएगा तथा अनुसूचित व पिछड़ी जातियों में शिक्षा व उद्यमिता के विकास पर जोर दिया जाएगा । जाहिर है कि भाजपा का ये वादा भी कांग्रेस के ८० प्रतिशत परिवारों को मध्यम वर्ग तक लाने के हवा-हवाई वादे से कहीं अधिक व्यवहारिक है । काला धन वापस लाने के लिए कांग्रेस ने एक योजना बनाने की बात कही है तो भाजपा की तरफ से एक टास्क फ़ोर्स बनाने का वायदा किया गया है । इन सबके अलावा संविधान के दायरे में रहते हुए राम मंदिर बनवाने समेत कश्मीर से धारा ३७० हटवाने जैसे भाजपा के पारम्परिक वायदे तो उसके घोषणापत्र में मौजूद हैं ही ।  

आखिर में कुल मिलाकर बात इतनी है कि कांग्रेस पिछले १० वर्षों से लगातार  सत्ता में है जिससे उसकी नीतियों, कार्यक्रमों को व्यवस्थाजन्य खामियों तथा क्रियान्वयन के अभाव में विफल होते लोग देख चुके हैं जबकि भाजपा के पास गुजरात में करिश्मा कर चुका नरेंद्र मोदी जैसा नेतृत्व है जिसपर जनता द्वारा भरपूर विश्वास दिखाया जा रहा है । ऐसे में भाजपा अगर कुछ हवा-हवाई वायदे भी कर देती तो जनता उन्हें ससहज स्वीकार लेती, लेकिन भाजपा की प्रशंसा करनी होगी कि उसने ऐसे वायदे किए हैं जिन्हें दृढ़ इच्छाशक्ति के जरिए यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित किया जा सकता है और चुनाव बाद अगर वो सत्ता में आती है तो निश्चित ही उसे अपने इन व्यवहारिक वायदों का लाभ मिलेगा ।   

गुरुवार, 27 मार्च 2014

दागियों से कब मुक्त होगा लोकतंत्र [दैनिक जागरण राष्ट्रीय, आईनेक्स्ट इंदौर और डीएनए में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

डीएनए 
अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति के आपराधिकरण को रोकने से सम्बंधित अपने एक फैसले में निचली अदालतों को निर्देश देते हुए कहा कि अब से दागी नेताओं के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के एक साल के अंदर ही निचली अदालतों को उनपर फैसला सुनाना होगा । हालांकि ये कोई पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजनीति के आपराधिकरण को रोकने के लिए कोई निर्णय लिया गया हो, इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में कई अहम फैसले लिए जाते रहे हैं । लेकिन, इसे भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि जहाँ एक तरफ हमारी न्यायपालिका भारतीय राजनीति को शुचितापूर्ण करने के लिए इतनी गंभीर है, वहीँ इस राजनीति के खेवनहार अर्थात हमारे सियासी हुक्मरान राजनीतिक शुचिता से बेपरवाह इस आम चुनाव में भी हर बार की तरह लगातार दागी नेताओं को टिकट बांटे जा रहे हैं । राजनीतिक शुचिता की बात करने में तो हर दल एक दूसरे से आगे है, पर जब बात यथार्थ के धरातल पर आकर टिकट देने की होती है तो कोई ऐसा दल नहीं दिखता जो सिर्फ स्वच्छ छवि वाले लोगों को टिकट दिया हो । फिर चाहें बात कांग्रेस की करें या भाजपा की अथवा अन्य तमाम क्षेत्रीय दलों की, कमोबेश हर दल में कुछ ना कुछ दागी उम्मीदवार मौजूद हैं । अगर बात कांग्रेस के उम्मीदवारों की करें तो इस चुनाव कांग्रेस के उम्मीदवारों के चयन का जिम्मा खुद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपने हाथ में लिया है और इससे पहले वो बार-बार राजनीति में शुचिता लाने की बात भी करते रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि इस आम चुनाव में कांग्रेस के एक चौथाई से ज्यादा उम्मीदवार दागी हैं । उदाहरणार्थ, कांग्रेस के कुछ प्रमुख दागी उम्मीदवारों पर गौर करें तो मुर्शिदाबाद से कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुल मन्नान हुसैन. प्रतापगढ़ से रतन सिंह, बहरामपुर से अधीर रंजन चौधरी आदि, ये सिर्फ वो नाम हैं जिन पर हत्या अथवा हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामले हैं । इनके अलावा और भी तमाम आरोपी उम्मीदवारों को देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस द्वारा टिकट दिया गया है । इसी क्रम में अब अगर बात भाजपा की करें तो दागी उम्मीदवारों के मामले में वो भी कांग्रेस से कत्तई उन्नीस नहीं है । सर्बानंद सोनवाल, किरीट सोमैया, गोपीनाथ मुंडे, येदियुरप्पा समेत और भी तमाम छोटे-बड़े  ऐसे भाजपाई नेता हैं जिनपर हत्या, लूट, डकैती जैसे बेहद गंभीर मामले हैं । बावजूद इसके इनमे से अधिकांश को पार्टी द्वारा लोकसभा का टिकट दिया जा चुका है । देश के इन दो सबसे बड़े राजनीतिक दलों के बाद अन्य छोटे व क्षेत्रीय दलों में भी दागी उम्मीदवारों को खुलकर टिकट दिया गया है । राजनीतिक दलों से इस संबंध में सवाल पूछने पर एक ही जवाब मिलता है कि हमारे उम्मीदवारों पर अभी सिर्फ आरोप हैं, दोष साबित नहीं हुआ है, अतः वो दागी नहीं हैं । अब सवाल ये उठता है कि क्या एक ऐसे व्यक्ति को जनता का प्रतिनिधी बनने की चयन प्रक्रिया अर्थात चुनाव में उतारा जा सकता है जिसके अपराधी होने की भी गुंजाइश हो ?
दैनिक जागरण 
  एक अत्यंत गंभीर सवाल ये भी है कि आखिर राजनीतिक दलों द्वारा दागी उम्मीदवारों को टिकट देने का कारण क्या होता है ? इस सवाल पर विचार करें तो ऐसी कई बातें सामने आती हैं जो दागी उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने की साफ़-साफ़ वकालत करती हैं । दागी उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने का सबसे बड़ा कारण तो ये है कि किसी भी स्वच्छ छवि उम्मीदवार की अपेक्षा दागियों के  जीत के आने की संभावना अधिक होती है । कारण कि प्रायः दागी उम्मीदवार आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं तथा उनके क्षेत्र के लोगों में उनके प्रति भय का भाव भी होता है, अतः दागी उम्मीदवार कुछ लोगों के मत पैसे के बदले खरीद लेते हैं तो तमाम ऐसे लोग भी होते हैं जो अनिच्छा होते हुए भी भयवश दागी उम्मीदवारों को ही अपना मत दे देते हैं । परिणामस्वरूप, तमाम आपराधिक आरोप होने के बावजूद भी दागी उम्मीदवार विजेता हो जाता है और कई दफे स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार को मुँह की खानी पड़ जाती है । हालांकि पिछले आम चुनाव में जनता द्वारा तमाम दागी उम्मीदवारों को नकार स्वच्छ छवि वाले नेताओं को चुना गया था । पर बावजूद इसके आज संसद में कुल मिलाकर सभी दलों के १६२ सांसद ऐसे हैं जिनपर किसी न किसी तरह का आरोप है । इन बातों को देखते हुए कह सकते हैं कि दागी उम्मीदवार कहने को तो एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनकर संसद में पहुँचते हैं जबकि वास्तविकता ठीक इसके उलट होती है । अधिकाधिक दागी उम्मीदवारों द्वारा लोकतंत्र के मूल्यों को ध्वस्त करते हुए गलत तरीकों से जीत हासिल की जाती है । अब सवाल ये है कि जो उम्मीदवार जीत ही लोकतांत्रिक मूल्यों की शर्त पर हासिल कर रहा हो, वो जीतने के बाद लोकतंत्र का कितना मान रखेगा और जनता की क्या सुनवाई करेगा ?
आईनेक्स्ट 
   बहरहाल, आज संतोष की बात ये है कि राजनीति में आपराधिकरण को रोकने के संबंध में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के कुछ फैसलों के कारण अगर किसी दागी सांसद या विधायक पर दोष साबित हो जाता है और उसे दो वर्ष से अधिक की सज़ा हो जाती है तो उसकी संसद सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाएगी । लेकिन, ये पूरी तरह से पर्याप्त नहीं है, आज जरूरत ये भी है कि आम जनता भी जागरुक हो और अपने उम्मीदवार की पूरी जांच-परख के बाद बिना किसी भय या दबाव के मतदान करे । क्योंकि, बिना जनता के जागरूक और निडर हुए हमारे लोकतंत्र का दागियों से मुक्त होना बेहद कठिन है । 

मंगलवार, 25 मार्च 2014

पार्टी के भीतर से ही खतरा है भाजपा को [अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

अमर उजाला कॉम्पैक्ट 
यों तो कई दलों में टिकट को लेकर घमासान मचा हुआ है, लेकिन भाजपा में ये घमासान कुछ ज्यादा ही दिखता है । भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी से अपनी पारम्परिक गुजरात की गाँधी नगर सीट की बजाय मध्य प्रदेश के भोपाल से लड़ने की इच्छा जताई थी । यहाँ तक कि भोपाल में आडवाणी के स्वागत में बैनर-पोस्टर भी लग गए थे तथा भोपाल सीट से वर्तमान भाजपा सांसद कैलाश जोशी ने खुले तौर पर आडवाणी के लिए भोपाल सीट छोड़ने की बात भी कह दी थी । लेकिन, भाजपा के संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति ने आडवाणी की इस इच्छा को दरकिनार करते हुए उन्हें गुजरात की गांधीनगर सीट से ही उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया । परिणामतः आडवाणी एकबार फिर नाराज हो गए और हर बार की तरह फिर उनकी मनावन भी शुरू हो गई । बहरहाल, बड़ी मान-मनावन की नौटंकी के बाद आख़िरकार प्रत्याशित रूप से हर बार की तरह इस बार भी आडवाणी मान गए । केवल मानें ही नहीं बल्कि पार्टी के लोगों की बातों से प्रेम-विह्वल होने जैसा भावुक वक्तव्य भी दिए । खैर, सवाल ये उठता है कि आखिर इस चुनाव आडवाणी गांधीनगर की बजाय भोपाल से क्यों लड़ना चाहते थे ?  सवाल ये भी है कि किसी कारण से अगर आडवाणी गांधीनगर की बजाय भोपाल से लड़ना चाहते थे तो आखिर भाजपा द्वारा अपने इस वयोवृद्ध नेता की इस इच्छा को मान देने की बजाय नकार क्यों दिया गया ? इन दोनों ही सवालों के जवाबों की तह में जाएँ तो हमारे सामने भाजपा की वो हकीकत आती है जो बाहर से एकजुट दिख रही भाजपा के भीतर महत्वाकांक्षाओं के टकराव से उपजे कलह की बड़ी ही भयावनी तस्वीर पेश करती है । यहाँ समझना होगा कि बीते वर्ष जब राजनाथ सिंह द्वारा मोदी को आधिकारिक रूप से भाजपा का पीएम उम्मीदवार घोषित किया गया, तब इस निर्णय से आडवाणी समेत सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी आदि  भाजपाई नेता नाखुश ही थे । पर तत्कालीन दौर में आडवाणी को छोड़कर उनमे से बाकी किसी नेता ने अपनी नाराज़गी को बहुत ज्यादा जाहिर नहीं किया । पर आडवाणी की नाराजगी का आलम ये था कि वो मोदी की पीएम उम्मीदवारी के ऐलान में तक नहीं गए ।  हालांकि बाद में काफी मान-मनौव्वल के बाद उन्होंने मोदी की पीएम उम्मीदवारी के निर्णय पर अपनी सहमति दे दी और मोदी के साथ कई मंचों पर देखे भी गए । पर कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने ये सहमति और कोई रास्ता न होने की विवशता के कारण दी थी न कि अपने पूरे मन से । दरअसल, अपने राजनीतिक सफर के अवसान काल में पहुँच चुके आडवाणी अब भी अपनी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को त्याग नहीं सके हैं । इस महत्वाकांक्षा के कारण ही उन्होंने तब मोदी की पीएम उम्मीदवारी का विरोध किया था और उसीके कारण वो अब भी मोदी को पूरी तरह से स्वीकार नहीं पा रहे हैं । संभवतः इसी कारण इस चुनाव आडवाणी ने अपनी पारम्परिक सीट मोदी शाषित गुजरात के गांधीनगर की बजाय अपने अत्यंत प्रिय शिवराज सिंह चौहान शाषित एमपी के भोपाल से लड़ने की इच्छा जताई थी । पर आडवाणी की इस इच्छा को मानना राजनीतिक दृष्टिकोण से भाजपा के लिए कत्तई सही नहीं था I क्योंकि, ऐसा होने की स्थिति में साफ़-साफ़ ये संदेश जाता कि आडवाणी को गुजरात में मोदी से  भीतरघात का डर था इसलिए वो गांधीनगर सीट छोड़कर भोपाल चले गए । साथ ही, ऐसा करने की स्थिति में भाजपा के अंदरखाने में मोदी को लेकर मची कलह भी खुले तौर पर लोगों के सामने आ जाती जो कि चुनाव से पहले भाजपा के लिए ठीक नहीं होता । लिहाजा, आडवाणी को गुजरात में ही रोककर भाजपा ने खुद को फ़िलहाल तो इन विवादों से बचा लिया । पर ये भी एक सच्चाई है कि अभी भले ही भाजपा अपने अंदरखाने की कलह को तोपने-ढंकने की कवायद कर रही हो, लेकिन देर-सबेर या कि चुनाव बाद ये कलह भाजपा और मोदी दोनों ही के लिए कहीं ना कहीं संकट का सबब बन कर सामने अवश्य आएगी । जेटली-सुषमा को डिप्टी पीएम बनाने जैसे बयान तो भाजपानीत एनडीए के कई सहयोगियों द्वारा अभी से कही जाने लगी है । सों, चुनाव बाद क्या-क्या कहा और किया जा सकता है, इसका अनुमान इसीसे से लगाया जा सकता है ।
   भाजपा की ये शाश्वत समस्या रही है कि वो सामने वाले की काबिलियत के कारण कम अपनी कमी के कारण ज्यादा हारती है । कहीं ना कहीं इसी कमी के कारण देश में कई दफे कांग्रेस विरोधी लहर होने के बावजूद भाजपा को सत्ता से वंचित रहना पड़ा है । ये लोकसभा चुनाव राजनीतिक दृष्टिकोण से भाजपा के लिए सबसे अनुकूल स्थिति वाला है । क्योंकि, इस चुनाव एक तरफ जहाँ देश में कांग्रेस विरोधी लहर अपने पूरे उफान पर है, वहीँ भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के पक्ष में भी हवा का भरपूर रुख दिख रहा है । ऐसे में कहा जा सकता है कि अगर भाजपा किसी तरह की कोई बड़ी राजनीतिक गलती नहीं करती है तथा अपनी आपसी कलह को जल्द से जल्द दूर कर लेती है, तो उसके केन्द्र की सत्ता तक पहुँचने की पूरी संभावना है । आज भाजपा को सर्वाधिक खतरा खुद उसीसे है, अगर वो खुद को खुद से बचा लेती है तो देश में मोदी पक्षीय इतनी लहर अवश्य है कि अन्य कोई भी दल उसके केन्द्र तक पहुँचने की राह में कोई बड़ा रोड़ा नही ला सकता ।

गुरुवार, 20 मार्च 2014

मोदी के बनारस से लड़ने के मायने [डीएनए में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

डीएनए 
बनारस, एक ऐसा शहर जो विकास के लिहाज से अभी काफी पीछे होने के बावजूद अपने रहन-सहन, सौंदर्य, पर्यटन स्थलों और जीने के एक अलग अंदाज के कारण हमेशा चर्चा में रहता है । बनारस के विषय में पौराणिक मान्यता है कि ये शिव का अत्यंत प्रिय स्थल है, जिस कारण उन्होंने इसे अपने त्रिशूल पर रख रखा है । इसी कारण बनारस को बाबा विश्वनाथ की नगरी भी कहा जाता है ।  इसबार के आम चुनावों  में भाजपा द्वारा अपने पीएम पद के दावेदार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को संसदीय क्षेत्र बनारस से उम्मीदवार बनाने के साथ ही बनारस वर्तमान राजनीति के केन्द्र में आ गया है । यहाँ एक गंभीर सवाल ये उठता है कि गुजरात में जन्मे और लगातार तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने नरेंद्र मोदी को गुजरात की किसी सीट से उम्मीदवार बनाने की बजाय आखिर बनारस से क्यों उम्मीदवार बनाया गया ? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें यूपी के  राजनीतिक प्रभाव व यूपी में भाजपा की स्थिति पर एक नज़र डालनी होगी । गौरतलब है कि यूपी देश की सर्वाधिक ८० लोकसभा सीटों वाला राज्य है, इस नाते केन्द्र की सत्ता में यूपी की अत्यंत महत्वपूर्ण या कि निर्णायक भूमिका रहती है । लेकिन, यूपी की राजनीति एक अरसे के बाद से कांग्रेस-भाजपा को दरकिनार करते हुए अधिकांशतः सपा-बसपा के बीच ही घूमती रही है । हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी में कांग्रेस ने तो अपने प्रदर्शन में सुधार लाते हुए २१ सीटों पर जीत दर्ज की थी, पर भाजपा  को तब भी सिर्फ १० सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था । जाहिर है कि पिछले लोकसभा चुनाव की सीटों के लिहाज से यूपी में भाजपा की हालत फ़िलहाल बेहद खराब नज़र आती है । ऐसे में, मोदी लहर के सहारे केन्द्र की सत्ता तक पहुँचने का ख्वाब सजाए बैठी भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी को गुजरात से उठाकर बनारस लाने के पीछे कहीं ना कहीं यही सोच दिखती है कि मोदी के बनारस से लड़ने से यूपी में मोदी लहर को और धार मिलेगी जिससे संभव है कि यूपी में भाजपा के प्रदर्शन का स्तर सुधरे और वो यूपी से ठीकठाक सीटें निकाल ले । विचार करें तो भाजपा की ये सोच राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी हद तक सही भी है । चूंकि, अगर भाजपा को केन्द्र की सत्ता तक पहुंचना है तो उसे हर हाल में यूपी में बेहतर प्रदर्शन करना होगा और खासकर मुलायम की समाजवादी पार्टी की सीटें भी कम करनी होंगी । अगर बसपा की सीटों में इजाफा होता है तो भाजपा के लिए एकबार चल भी सकता है और इसमे भाजपा अपने लिए संभावनाएं भी तलाश सकती है, पर अगर सपा की सीटें बढ़ती है तो ये सीधे-सीधे कांग्रेसनीत यूपीए को मजबूत करने वाली बात होगी और ऐसे में भाजपा के लिए केन्द्र तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा ।

   इसमे तो संदेह की बेहद कम गुंजाईश है कि बनारस से नरेंद्र मोदी जीत दर्ज करेंगे । हाँ, अब बनारस में मुकाबला कैसा होगा,  ये तो बनारस सीट से अन्य दलों के उम्मीदवारों के ऐलान के साथ ही पता चल पाएगा । गौरतलब है कि बनारस भाजपा के लिए काफी सुरक्षित क्षेत्र रहा है, एक अरसे से वहाँ से भाजपा के मुरली मनोहर जोशी कम-बेश मतों से जीत हासिल करते रहे हैं । हालांकि एक तस्वीर ये भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में ये सीट मुरली मनोहर जोशी बमुश्किल ही भाजपा की झोली में डाल पाए थे । उसवक्त जोशी को मुख़्तार अंसारी द्वारा ख़ासा टक्कर मिली थी और वो मात्र कुछ हजार सीटों से ही मुख़्तार अंसारी को मात दे पाए थे । अब इसबार जब भाजपा के पीएम दावेदार नरेंद्र मोदी वहाँ से लड़ रहे हैं, तो मुकाबला एक तरफा प्रतीत होते हुए भी दिलचस्प लग रहा है । इस दिलचस्पी का कारण ये है कि सभी दलों द्वारा बनारस में नरेंद्र मोदी को मात देने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया जाएगा । वैसे, कांग्रेस बनारस से मोदी के खिलाफ किसे उतारेगी, ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि नई नवेली आम आदमी पार्टी (आप) की तरफ से बनारस में कौन उम्मीदवार होगा । जैसा कि आप नेताओं की तरफ से कहा जा रहा है, अगर उसको मानें तो आप संयोजक अरविन्द केजरीवाल खुद बनारस से मोदी के खिलाफ लड़ेंगे । पर अरविन्द केजरीवाल ने अबतक इस मामले में स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा है । उनकी तरफ से तो २३ तारीख को होने वाली अपनी बनारस रैली में जनता से राय लेने के बाद वहाँ से मोदी के खिलाफ लड़ने, ना लड़ने के विषय में निर्णय लेने की बात कही गई है । अब अगर अरविन्द केजरीवाल बनारस से लड़ते हैं तो भी वो अकेले तो मोदी को नहीं रोक पाएंगे, लेकिन संदेह नहीं कि ऐसी स्थिति में यूपी में सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के नाम पर सपा आदि दलों द्वारा केजरीवाल का समर्थन कर दिया जाएगा और फिर मोदी के लिए कुछ मुश्किल जरूर हो जाएगी । बनारस की सीट का गणित कुछ ऐसा है कि यहाँ तकरीबन ९ लाख मतदाता हैं जिनमे कि ढाई लाख ब्राह्मण और साढ़े तीन लाख मुस्लिम मत है, बाकी मत पिछड़े वर्ग का है । उल्लेखनीय होगा कि मोदी भी अपनी कई रैलियों में खुद को पिछड़ा बता चुके हैं । ऐसे में, मुस्लिम को छोड़ दें तो भी ब्राह्मण और पिछड़े वर्ग का मत हासिल करके मोदी बड़ी आसानी से विजेता बन सकते हैं । और इन सब समीकरणों के बाद जो एक सबसे बड़ी बात मोदी के पक्ष में है वो ये कि इसवक्त देश में उनकी भारी लहर है और कहीं ना कहीं इस लहर का लाभ उन्हें और भाजपा को बनारस और यूपी में जरूर मिलेगा ।