मंगलवार, 25 मार्च 2014

पार्टी के भीतर से ही खतरा है भाजपा को [अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

अमर उजाला कॉम्पैक्ट 
यों तो कई दलों में टिकट को लेकर घमासान मचा हुआ है, लेकिन भाजपा में ये घमासान कुछ ज्यादा ही दिखता है भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी से अपनी पारम्परिक गुजरात की गाँधी नगर सीट की बजाय मध्य प्रदेश के भोपाल से लड़ने की इच्छा जताई थी यहाँ तक कि भोपाल में आडवाणी के स्वागत में बैनर-पोस्टर भी लग गए थे तथा भोपाल सीट से वर्तमान भाजपा सांसद कैलाश जोशी ने खुले तौर पर आडवाणी के लिए भोपाल सीट छोड़ने की बात भी कह दी थी लेकिन, भाजपा के संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति ने आडवाणी की इस इच्छा को दरकिनार करते हुए उन्हें गुजरात की गांधीनगर सीट से ही उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया परिणामतः आडवाणी एकबार फिर नाराज हो गए और हर बार की तरह फिर उनकी मनावन भी शुरू हो गई बहरहाल, बड़ी मान-मनावन की नौटंकी के बाद आख़िरकार प्रत्याशित रूप से हर बार की तरह इस बार भी आडवाणी मान गए केवल मानें ही नहीं बल्कि पार्टी के लोगों की बातों से प्रेम-विह्वल होने जैसा भावुक वक्तव्य भी दिए खैर, सवाल ये उठता है कि आखिर इस चुनाव आडवाणी गांधीनगर की बजाय भोपाल से क्यों लड़ना चाहते थे ?  सवाल ये भी है कि किसी कारण से अगर आडवाणी गांधीनगर की बजाय भोपाल से लड़ना चाहते थे तो आखिर भाजपा द्वारा अपने इस वयोवृद्ध नेता की इस इच्छा को मान देने की बजाय नकार क्यों दिया गया ? इन दोनों ही सवालों के जवाबों की तह में जाएँ तो हमारे सामने भाजपा की वो हकीकत आती है जो बाहर से एकजुट दिख रही भाजपा के भीतर महत्वाकांक्षाओं के टकराव से उपजे कलह की बड़ी ही भयावनी तस्वीर पेश करती है यहाँ समझना होगा कि बीते वर्ष जब राजनाथ सिंह द्वारा मोदी को आधिकारिक रूप से भाजपा का पीएम उम्मीदवार घोषित किया गया, तब इस निर्णय से आडवाणी समेत सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी आदि  भाजपाई नेता नाखुश ही थे पर तत्कालीन दौर में आडवाणी को छोड़कर उनमे से बाकी किसी नेता ने अपनी नाराज़गी को बहुत ज्यादा जाहिर नहीं किया पर आडवाणी की नाराजगी का आलम ये था कि वो मोदी की पीएम उम्मीदवारी के ऐलान में तक नहीं गए  हालांकि बाद में काफी मान-मनौव्वल के बाद उन्होंने मोदी की पीएम उम्मीदवारी के निर्णय पर अपनी सहमति दे दी और मोदी के साथ कई मंचों पर देखे भी गए पर कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने ये सहमति और कोई रास्ता न होने की विवशता के कारण दी थी न कि अपने पूरे मन से दरअसल, अपने राजनीतिक सफर के अवसान काल में पहुँच चुके आडवाणी अब भी अपनी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को त्याग नहीं सके हैं इस महत्वाकांक्षा के कारण ही उन्होंने तब मोदी की पीएम उम्मीदवारी का विरोध किया था और उसीके कारण वो अब भी मोदी को पूरी तरह से स्वीकार नहीं पा रहे हैं संभवतः इसी कारण इस चुनाव आडवाणी ने अपनी पारम्परिक सीट मोदी शाषित गुजरात के गांधीनगर की बजाय अपने अत्यंत प्रिय शिवराज सिंह चौहान शाषित एमपी के भोपाल से लड़ने की इच्छा जताई थी पर आडवाणी की इस इच्छा को मानना राजनीतिक दृष्टिकोण से भाजपा के लिए कत्तई सही नहीं था I क्योंकि, ऐसा होने की स्थिति में साफ़-साफ़ ये संदेश जाता कि आडवाणी को गुजरात में मोदी से  भीतरघात का डर था इसलिए वो गांधीनगर सीट छोड़कर भोपाल चले गए साथ ही, ऐसा करने की स्थिति में भाजपा के अंदरखाने में मोदी को लेकर मची कलह भी खुले तौर पर लोगों के सामने आ जाती जो कि चुनाव से पहले भाजपा के लिए ठीक नहीं होता लिहाजा, आडवाणी को गुजरात में ही रोककर भाजपा ने खुद को फ़िलहाल तो इन विवादों से बचा लिया पर ये भी एक सच्चाई है कि अभी भले ही भाजपा अपने अंदरखाने की कलह को तोपने-ढंकने की कवायद कर रही हो, लेकिन देर-सबेर या कि चुनाव बाद ये कलह भाजपा और मोदी दोनों ही के लिए कहीं ना कहीं संकट का सबब बन कर सामने अवश्य आएगी जेटली-सुषमा को डिप्टी पीएम बनाने जैसे बयान तो भाजपानीत एनडीए के कई सहयोगियों द्वारा अभी से कही जाने लगी है सों, चुनाव बाद क्या-क्या कहा और किया जा सकता है, इसका अनुमान इसीसे से लगाया जा सकता है
   भाजपा की ये शाश्वत समस्या रही है कि वो सामने वाले की काबिलियत के कारण कम अपनी कमी के कारण ज्यादा हारती है कहीं ना कहीं इसी कमी के कारण देश में कई दफे कांग्रेस विरोधी लहर होने के बावजूद भाजपा को सत्ता से वंचित रहना पड़ा है ये लोकसभा चुनाव राजनीतिक दृष्टिकोण से भाजपा के लिए सबसे अनुकूल स्थिति वाला है क्योंकि, इस चुनाव एक तरफ जहाँ देश में कांग्रेस विरोधी लहर अपने पूरे उफान पर है, वहीँ भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के पक्ष में भी हवा का भरपूर रुख दिख रहा है ऐसे में कहा जा सकता है कि अगर भाजपा किसी तरह की कोई बड़ी राजनीतिक गलती नहीं करती है तथा अपनी आपसी कलह को जल्द से जल्द दूर कर लेती है, तो उसके केन्द्र की सत्ता तक पहुँचने की पूरी संभावना है आज भाजपा को सर्वाधिक खतरा खुद उसीसे है, अगर वो खुद को खुद से बचा लेती है तो देश में मोदी पक्षीय इतनी लहर अवश्य है कि अन्य कोई भी दल उसके केन्द्र तक पहुँचने की राह में कोई बड़ा रोड़ा नही ला सकता

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