गुरुवार, 20 मार्च 2014

मोदी के बनारस से लड़ने के मायने [डीएनए में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

डीएनए 
बनारस, एक ऐसा शहर जो विकास के लिहाज से अभी काफी पीछे होने के बावजूद अपने रहन-सहन, सौंदर्य, पर्यटन स्थलों और जीने के एक अलग अंदाज के कारण हमेशा चर्चा में रहता है । बनारस के विषय में पौराणिक मान्यता है कि ये शिव का अत्यंत प्रिय स्थल है, जिस कारण उन्होंने इसे अपने त्रिशूल पर रख रखा है । इसी कारण बनारस को बाबा विश्वनाथ की नगरी भी कहा जाता है ।  इसबार के आम चुनावों  में भाजपा द्वारा अपने पीएम पद के दावेदार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को संसदीय क्षेत्र बनारस से उम्मीदवार बनाने के साथ ही बनारस वर्तमान राजनीति के केन्द्र में आ गया है । यहाँ एक गंभीर सवाल ये उठता है कि गुजरात में जन्मे और लगातार तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने नरेंद्र मोदी को गुजरात की किसी सीट से उम्मीदवार बनाने की बजाय आखिर बनारस से क्यों उम्मीदवार बनाया गया ? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें यूपी के  राजनीतिक प्रभाव व यूपी में भाजपा की स्थिति पर एक नज़र डालनी होगी । गौरतलब है कि यूपी देश की सर्वाधिक ८० लोकसभा सीटों वाला राज्य है, इस नाते केन्द्र की सत्ता में यूपी की अत्यंत महत्वपूर्ण या कि निर्णायक भूमिका रहती है । लेकिन, यूपी की राजनीति एक अरसे के बाद से कांग्रेस-भाजपा को दरकिनार करते हुए अधिकांशतः सपा-बसपा के बीच ही घूमती रही है । हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी में कांग्रेस ने तो अपने प्रदर्शन में सुधार लाते हुए २१ सीटों पर जीत दर्ज की थी, पर भाजपा  को तब भी सिर्फ १० सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था । जाहिर है कि पिछले लोकसभा चुनाव की सीटों के लिहाज से यूपी में भाजपा की हालत फ़िलहाल बेहद खराब नज़र आती है । ऐसे में, मोदी लहर के सहारे केन्द्र की सत्ता तक पहुँचने का ख्वाब सजाए बैठी भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी को गुजरात से उठाकर बनारस लाने के पीछे कहीं ना कहीं यही सोच दिखती है कि मोदी के बनारस से लड़ने से यूपी में मोदी लहर को और धार मिलेगी जिससे संभव है कि यूपी में भाजपा के प्रदर्शन का स्तर सुधरे और वो यूपी से ठीकठाक सीटें निकाल ले । विचार करें तो भाजपा की ये सोच राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी हद तक सही भी है । चूंकि, अगर भाजपा को केन्द्र की सत्ता तक पहुंचना है तो उसे हर हाल में यूपी में बेहतर प्रदर्शन करना होगा और खासकर मुलायम की समाजवादी पार्टी की सीटें भी कम करनी होंगी । अगर बसपा की सीटों में इजाफा होता है तो भाजपा के लिए एकबार चल भी सकता है और इसमे भाजपा अपने लिए संभावनाएं भी तलाश सकती है, पर अगर सपा की सीटें बढ़ती है तो ये सीधे-सीधे कांग्रेसनीत यूपीए को मजबूत करने वाली बात होगी और ऐसे में भाजपा के लिए केन्द्र तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा ।

   इसमे तो संदेह की बेहद कम गुंजाईश है कि बनारस से नरेंद्र मोदी जीत दर्ज करेंगे । हाँ, अब बनारस में मुकाबला कैसा होगा,  ये तो बनारस सीट से अन्य दलों के उम्मीदवारों के ऐलान के साथ ही पता चल पाएगा । गौरतलब है कि बनारस भाजपा के लिए काफी सुरक्षित क्षेत्र रहा है, एक अरसे से वहाँ से भाजपा के मुरली मनोहर जोशी कम-बेश मतों से जीत हासिल करते रहे हैं । हालांकि एक तस्वीर ये भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में ये सीट मुरली मनोहर जोशी बमुश्किल ही भाजपा की झोली में डाल पाए थे । उसवक्त जोशी को मुख़्तार अंसारी द्वारा ख़ासा टक्कर मिली थी और वो मात्र कुछ हजार सीटों से ही मुख़्तार अंसारी को मात दे पाए थे । अब इसबार जब भाजपा के पीएम दावेदार नरेंद्र मोदी वहाँ से लड़ रहे हैं, तो मुकाबला एक तरफा प्रतीत होते हुए भी दिलचस्प लग रहा है । इस दिलचस्पी का कारण ये है कि सभी दलों द्वारा बनारस में नरेंद्र मोदी को मात देने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया जाएगा । वैसे, कांग्रेस बनारस से मोदी के खिलाफ किसे उतारेगी, ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि नई नवेली आम आदमी पार्टी (आप) की तरफ से बनारस में कौन उम्मीदवार होगा । जैसा कि आप नेताओं की तरफ से कहा जा रहा है, अगर उसको मानें तो आप संयोजक अरविन्द केजरीवाल खुद बनारस से मोदी के खिलाफ लड़ेंगे । पर अरविन्द केजरीवाल ने अबतक इस मामले में स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा है । उनकी तरफ से तो २३ तारीख को होने वाली अपनी बनारस रैली में जनता से राय लेने के बाद वहाँ से मोदी के खिलाफ लड़ने, ना लड़ने के विषय में निर्णय लेने की बात कही गई है । अब अगर अरविन्द केजरीवाल बनारस से लड़ते हैं तो भी वो अकेले तो मोदी को नहीं रोक पाएंगे, लेकिन संदेह नहीं कि ऐसी स्थिति में यूपी में सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के नाम पर सपा आदि दलों द्वारा केजरीवाल का समर्थन कर दिया जाएगा और फिर मोदी के लिए कुछ मुश्किल जरूर हो जाएगी । बनारस की सीट का गणित कुछ ऐसा है कि यहाँ तकरीबन ९ लाख मतदाता हैं जिनमे कि ढाई लाख ब्राह्मण और साढ़े तीन लाख मुस्लिम मत है, बाकी मत पिछड़े वर्ग का है । उल्लेखनीय होगा कि मोदी भी अपनी कई रैलियों में खुद को पिछड़ा बता चुके हैं । ऐसे में, मुस्लिम को छोड़ दें तो भी ब्राह्मण और पिछड़े वर्ग का मत हासिल करके मोदी बड़ी आसानी से विजेता बन सकते हैं । और इन सब समीकरणों के बाद जो एक सबसे बड़ी बात मोदी के पक्ष में है वो ये कि इसवक्त देश में उनकी भारी लहर है और कहीं ना कहीं इस लहर का लाभ उन्हें और भाजपा को बनारस और यूपी में जरूर मिलेगा । 

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