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गुरुवार, 8 मई 2014

भ्रष्टाचार पर न्यायालय का एक और वार [अमर उजाला कॉम्पैक्ट और आईनेक्स्ट इंदौर में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत

अभी हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने एक ऐतिहासिक फैसले में वरिष्ठ नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के पूर्व सरकार से अनुमति लेने संबंधी ‘दिल्ली पुलिस इस्टेबलिशमेंट’ क़ानून की धारा ६-ए को असंवैधानिक व भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाली प्रवृत्ति से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया गया । सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश आर एम लोढा की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निवारण क़ानून के तहत अपराध की जांच के मकसद से अधिकारियों को कत्तई वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, छोटा-बड़ा कोई भी अधिकारी हो, सबके साथ समान व्यवहार होना चाहिए । इसलिए हम धारा ६-ए को अवैध और संविधान के अनुच्छेद १४ का हनन करने वाली घोषित करते हैं । न्यायालय ने ये भी कहा कि धारा ६-ए के तहत जांच से पहले अनुमति लेना अप्रत्यक्ष तौर पर जांच में बाधा डालने जैसा है । सन २००३ में न्यायालय द्वारा धारा ६-ए को एकबार पहले भी खत्म किया गया था, लेकिन एक संशोधन के जरिए सरकार इसे पुनः ले आयी । इस संदर्भ में अगर इस धारा पर सरकार के पक्ष को जानने का प्रयास करें तो सरकार की तरफ से अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल के वी विश्वनाथ का तर्क है कि सरकार किसी भी भ्रष्ट नौकरशाह को कत्तई संरक्षण नहीं देना चाहती और ये प्रावधान (धारा ६-ए) सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए है कि वरिष्ठ नौकरशाहों से बगैर किसी समुचित सुरक्षा के पूछताछ नहीं की जा सके, क्योंकि वे नीति निर्धारण की प्रक्रिया में शामिल होते हैं । दरअसल, वरिष्ठ नौकरशाहों की जांच से पूर्व अनुमति लेने का ये मामला तकरीबन १७ साल पहले न्यायालय के संज्ञान में आया था । इस संबंध में पहली याचिका सन १९९७ में सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर की गई थी । इसके बाद सन २००४ में पुनः सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की तरफ से एक याचिका दायर की गई ।
अमर उजाला
   बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद अब नौकरशाहों के भ्रष्टाचार की जांच में सीबीआई को काफी मदद मिलेगी । इससे पहले उसे किसी भी उच्च नौकरशाह की जांच के लिए सरकार से अनुमति मांगनी पड़ती थी । ऐसे में ये सरकार के विवेक पर निर्भर था कि वो किस मामले में जांच की अनुमति दे और किस मामले में नहीं दे । लेकिन, सर्वोच्च न्यायालय के धारा ६-ए को खारिज करने संबंधी इस निर्णय के बाद अब सीबीआई न सिर्फ वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके जांच कर सकती है, बल्कि चार्जशीट दायर करने से लेकर आवश्यक होने पर उन्हें गिरफ्तार भी कर सकती है । कहने का अर्थ है कि इस निर्णय से सीबीआई की शक्तियों में काफी इजाफा हुआ है । दुसरे शब्दों में इसे सीबीआई की स्वायत्ता के संबंध में एक छोटा, किन्तु अच्छा कदम भी कह सकते हैं ।
  वैसे, अगर दिमाग पर जोर डालें तो स्पष्ट होता है कि ये कोई पहली दफा नहीं है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार पर चोट करने वाला कोई निर्णय लिया हो । अब से पहले भी कई दफे सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से भ्रष्टाचार की रोकथाम व व्यवस्था पारदर्शिता लाने से सम्बंधित तमाम निर्णय लिए जाते रहे हैं । फिर चाहें वो अभी हाल ही में काले धन के स्वामियों के नाम उजागर न करने के कारण सरकार को फटकार लगाना हो या बीते मार्च में भ्रष्टाचार सिद्ध होने पर सरकारी मुलाजिमों को तत्काल नौकरी से निकाल दिए जाने का निर्णय हो अथवा  पिछले साल अक्तूबर में पार्षदों को भी भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून के दायरे में लाने का निर्णय हो ।
आईनेक्स्ट
इनके अलावा सरकार के मंत्रियों के २जी, कोयला घोटाला आदि भ्रष्टाचार के तमाम मामलों में भी समय दर समय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जांच का संज्ञान लेते हुए तमाम दिशानिर्देश दिए जाते रहे हैं । साथ ही, सरकार के गलत निर्णयों, योजनाओं आदि पर भी न्यायालय द्वारा रोक लगाई जाती रही है । जैसे, अभी कुछ ही दिन पहले न्यायालय ने सरकार द्वारा तय ‘आधार’ की अनिवार्यता को समाप्त किया । सर्वोच्च न्यायालय की इन्ही गतिविधियों के कारण आज आम लोगों के बीच उसके प्रति काफी विश्वास बढ़ा है । लोगों में ये धारणा सी हो रही है कि अगर सरकार उनकी बात नहीं सुनती है और अपनी मनमर्जी करती है, तो उनके पास सर्वोच्च न्यायालय में जाने का एक मजबूत विकल्प है । अब जहाँ आम जन के बीच न्यायालय ने अपने प्रति भरोसा कायम किया है, वहीँ सरकार अपने कार्यों या अपने दायरों में न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण उससे काफी नाराज दिखती रही है । सरकार के कुछेक मंत्रियों की तरफ से कहा भी जाता रहा है कि न्यायपालिका अपने दायरे में रहे और कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप न करे । पर सरकार की इन दलीलों से न्यायालय पर कोई विशेष प्रभाव हुआ हो, ऐसा नहीं कह सकते । अब जो भी हो, पर इतना तो तय है कि भ्रष्टाचार की समस्या को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से जिस तरह की गंभीरता दिखाई जाती रही है, उसके अनुपात में सरकार तनिक भी गंभीर नहीं दिखती । सरकार की तरफ से तो न्यायालय के निर्णयों को रोकने व बदलने के लिए ही कवायदें की जाती रही हैं, बल्कि एकाध निर्णयों को तो बदला भी गया है । जैसे, पिछले साल राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के अंतर्गत लाने वाले न्यायालय के निर्णय को सरकार द्वारा संविधान संशोधन के जरिए बदल दिया गया । इसके अलावा दागियों के चुनाव न लड़ने के न्यायालय के निर्णय को भी बदलने के लिए सरकार द्वारा अध्यादेश लाया गया था, पर संयोगवश सरकार इसमें सफल नहीं हो पाई । बहरहाल, वरिष्ठ नौकरशाहों के भ्रष्टाचार की जांच के लिए सीबीआई को छूट देने वाला न्यायालय का ये ताज़ा निर्णय भ्रष्टाचार पर एक बड़ी चोट सिद्ध हो सकता है, बशर्ते कि व्यवहारिक तौर पर इसका सही ढंग से क्रियान्वयन हो ।

गुरुवार, 27 मार्च 2014

दागियों से कब मुक्त होगा लोकतंत्र [दैनिक जागरण राष्ट्रीय, आईनेक्स्ट इंदौर और डीएनए में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

डीएनए 
अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति के आपराधिकरण को रोकने से सम्बंधित अपने एक फैसले में निचली अदालतों को निर्देश देते हुए कहा कि अब से दागी नेताओं के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के एक साल के अंदर ही निचली अदालतों को उनपर फैसला सुनाना होगा । हालांकि ये कोई पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजनीति के आपराधिकरण को रोकने के लिए कोई निर्णय लिया गया हो, इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में कई अहम फैसले लिए जाते रहे हैं । लेकिन, इसे भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि जहाँ एक तरफ हमारी न्यायपालिका भारतीय राजनीति को शुचितापूर्ण करने के लिए इतनी गंभीर है, वहीँ इस राजनीति के खेवनहार अर्थात हमारे सियासी हुक्मरान राजनीतिक शुचिता से बेपरवाह इस आम चुनाव में भी हर बार की तरह लगातार दागी नेताओं को टिकट बांटे जा रहे हैं । राजनीतिक शुचिता की बात करने में तो हर दल एक दूसरे से आगे है, पर जब बात यथार्थ के धरातल पर आकर टिकट देने की होती है तो कोई ऐसा दल नहीं दिखता जो सिर्फ स्वच्छ छवि वाले लोगों को टिकट दिया हो । फिर चाहें बात कांग्रेस की करें या भाजपा की अथवा अन्य तमाम क्षेत्रीय दलों की, कमोबेश हर दल में कुछ ना कुछ दागी उम्मीदवार मौजूद हैं । अगर बात कांग्रेस के उम्मीदवारों की करें तो इस चुनाव कांग्रेस के उम्मीदवारों के चयन का जिम्मा खुद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपने हाथ में लिया है और इससे पहले वो बार-बार राजनीति में शुचिता लाने की बात भी करते रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि इस आम चुनाव में कांग्रेस के एक चौथाई से ज्यादा उम्मीदवार दागी हैं । उदाहरणार्थ, कांग्रेस के कुछ प्रमुख दागी उम्मीदवारों पर गौर करें तो मुर्शिदाबाद से कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुल मन्नान हुसैन. प्रतापगढ़ से रतन सिंह, बहरामपुर से अधीर रंजन चौधरी आदि, ये सिर्फ वो नाम हैं जिन पर हत्या अथवा हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामले हैं । इनके अलावा और भी तमाम आरोपी उम्मीदवारों को देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस द्वारा टिकट दिया गया है । इसी क्रम में अब अगर बात भाजपा की करें तो दागी उम्मीदवारों के मामले में वो भी कांग्रेस से कत्तई उन्नीस नहीं है । सर्बानंद सोनवाल, किरीट सोमैया, गोपीनाथ मुंडे, येदियुरप्पा समेत और भी तमाम छोटे-बड़े  ऐसे भाजपाई नेता हैं जिनपर हत्या, लूट, डकैती जैसे बेहद गंभीर मामले हैं । बावजूद इसके इनमे से अधिकांश को पार्टी द्वारा लोकसभा का टिकट दिया जा चुका है । देश के इन दो सबसे बड़े राजनीतिक दलों के बाद अन्य छोटे व क्षेत्रीय दलों में भी दागी उम्मीदवारों को खुलकर टिकट दिया गया है । राजनीतिक दलों से इस संबंध में सवाल पूछने पर एक ही जवाब मिलता है कि हमारे उम्मीदवारों पर अभी सिर्फ आरोप हैं, दोष साबित नहीं हुआ है, अतः वो दागी नहीं हैं । अब सवाल ये उठता है कि क्या एक ऐसे व्यक्ति को जनता का प्रतिनिधी बनने की चयन प्रक्रिया अर्थात चुनाव में उतारा जा सकता है जिसके अपराधी होने की भी गुंजाइश हो ?
दैनिक जागरण 
  एक अत्यंत गंभीर सवाल ये भी है कि आखिर राजनीतिक दलों द्वारा दागी उम्मीदवारों को टिकट देने का कारण क्या होता है ? इस सवाल पर विचार करें तो ऐसी कई बातें सामने आती हैं जो दागी उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने की साफ़-साफ़ वकालत करती हैं । दागी उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने का सबसे बड़ा कारण तो ये है कि किसी भी स्वच्छ छवि उम्मीदवार की अपेक्षा दागियों के  जीत के आने की संभावना अधिक होती है । कारण कि प्रायः दागी उम्मीदवार आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं तथा उनके क्षेत्र के लोगों में उनके प्रति भय का भाव भी होता है, अतः दागी उम्मीदवार कुछ लोगों के मत पैसे के बदले खरीद लेते हैं तो तमाम ऐसे लोग भी होते हैं जो अनिच्छा होते हुए भी भयवश दागी उम्मीदवारों को ही अपना मत दे देते हैं । परिणामस्वरूप, तमाम आपराधिक आरोप होने के बावजूद भी दागी उम्मीदवार विजेता हो जाता है और कई दफे स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार को मुँह की खानी पड़ जाती है । हालांकि पिछले आम चुनाव में जनता द्वारा तमाम दागी उम्मीदवारों को नकार स्वच्छ छवि वाले नेताओं को चुना गया था । पर बावजूद इसके आज संसद में कुल मिलाकर सभी दलों के १६२ सांसद ऐसे हैं जिनपर किसी न किसी तरह का आरोप है । इन बातों को देखते हुए कह सकते हैं कि दागी उम्मीदवार कहने को तो एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनकर संसद में पहुँचते हैं जबकि वास्तविकता ठीक इसके उलट होती है । अधिकाधिक दागी उम्मीदवारों द्वारा लोकतंत्र के मूल्यों को ध्वस्त करते हुए गलत तरीकों से जीत हासिल की जाती है । अब सवाल ये है कि जो उम्मीदवार जीत ही लोकतांत्रिक मूल्यों की शर्त पर हासिल कर रहा हो, वो जीतने के बाद लोकतंत्र का कितना मान रखेगा और जनता की क्या सुनवाई करेगा ?
आईनेक्स्ट 
   बहरहाल, आज संतोष की बात ये है कि राजनीति में आपराधिकरण को रोकने के संबंध में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के कुछ फैसलों के कारण अगर किसी दागी सांसद या विधायक पर दोष साबित हो जाता है और उसे दो वर्ष से अधिक की सज़ा हो जाती है तो उसकी संसद सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाएगी । लेकिन, ये पूरी तरह से पर्याप्त नहीं है, आज जरूरत ये भी है कि आम जनता भी जागरुक हो और अपने उम्मीदवार की पूरी जांच-परख के बाद बिना किसी भय या दबाव के मतदान करे । क्योंकि, बिना जनता के जागरूक और निडर हुए हमारे लोकतंत्र का दागियों से मुक्त होना बेहद कठिन है । 

रविवार, 19 जनवरी 2014

तम्बाकू के विरोधाभास [जनसत्ता रविवारी, आईनेक्स्ट इंदौर, दैनिक जागरण राष्ट्रीय, कल्पतरु एक्सप्रेस और प्रजातंत्र लाइव में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

जनसत्ता 
किसी भी राष्ट्र का प्रगतिशील रहना काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि वहाँ के नागरिक शारीरिक-मानसिक रूप से कितने स्वस्थ और सुदृढ़ हैं ! ये सर्वस्वीकार्य है कि जिस राष्ट्र के लोग जितना अधिक स्वस्थ और सुदृढ़ रहेंगे, वो राष्ट्र उतनी ही तीव्रता से प्रगति को प्राप्त होगा ! लोगों के स्वस्थ  रहने के लिए मुख्य रूप से तीन चीजें आवश्यक होती हैं ! पौष्टिक व पर्याप्त आहार, समुचित चिकित्सा व्यवस्था और नुकसानदेह चीजों से दूरी ! इनमे से प्रथम दो चीजों की समुचित व्यवस्था करने का दायित्व तो मुख्यतः सरकार का होता है, पर अंतिम बात के लिए सरकार के साथ-साथ देश के नागरिकों को भी सजग और सचेत रहने की जरूरत होती है ! नागरिकों के लिए आवश्यक होता है कि वो ऐसे अवशिष्ट तत्वों के सेवन से बचें जिनका उनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो ! ऐसे ही अवशिष्ट तत्वों में से एक है तम्बाकू ! ये एक मादक और उत्तेजक पदार्थ है ! बात अगर इसके निर्माण की करें तो एक विशेष प्रजाति के पौधे (निकोशियाना) के पत्तों को सुखाकर तम्बाकू बनाया जाता है जिसका कि उपयोग तमाम तरह से नशा करने के लिए होता है ! भारत में तम्बाकू का पौधा सर्वप्रथम पुर्तगालियों द्वारा लाया गया था और बस तभी से इसकी खेती का चलन शुरू हो गया ! दुनिया में सर्वाधिक तम्बाकू उत्पादन के मामले में अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर भारत का ही नाम आता है ! पर यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने उत्पादन के एक बड़े हिस्से की खपत नशाखोरी के कारण देश में ही हो जाती है और निर्यात के लिए काफी कम तम्बाकू बचता है ! कोई गुटके, खैनी आदि के रूप में तम्बाकू चबाता है तो कोई इसे बीड़ी-सिगरेट के रूप में लेता है ! हर नशे की ही तरह तम्बाकू का भी व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ता है ! यह व्यक्ति के स्वास्थ्य पर धीमे जहर की तरह असर करता है ! आंकड़े की माने तो देश में हर साल लगभग दस लाख मौतें तम्बाकूजनित बीमारियों के कारण होती हैं तथा ६.१ प्रतिशत लोग तम्बाकू के सेवन के कारण तमाम तरह की बीमारियों से ग्रस्त अस्वस्थ जीवन जीने को मजबूर होते हैं ! पर बावजूद इन सबके अगर भारत में तम्बाकू उत्पादन पूरी तरह से वैध है तो इसके लिए कारण है कि इसके व्यापार से भारत सरकार को राजस्व का भारी लाभ होता है ! इस भारी राजस्व लाभ के कारण ही भारत सरकार द्वारा जहाँ एक तरफ तम्बाकू की खेती को वैध घोषित किया गया है, वहीँ दूसरी तरफ तम्बाकू के नशे के उन्मूलन के लिए तमाम कार्यक्रम व क़ानून भी बनाए गए हैं ! इसी संबंध में सन २००८ में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान को वर्जित करने सम्बन्धी क़ानून बनाया गया !
दैनिक जागरण
आईनेक्स्ट इंदौर 

इसके अतिरिक्त विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा २००२ में तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्र की स्थापना भी की गई जिसका उद्देश्य लोगों को तम्बाकू छोड़ने के लिए प्रेरित करना व तम्बाकू छोड़ने के उपाय बताना था ! धीरे-धीरे ऐसे और भी कई केन्द्र खोले गए और इन्होने काफी अच्छे ढंग से अपना काम भी किया ! तम्बाकू नशा उन्मूलन के लिए सरकार के इन कार्यक्रमों व कानूनों आदि के कारण आज भारत में तम्बाकू का नशा करने वाले लोगों की संख्या में पहले की अपेक्षा काफी कमी आयी है, पर बावजूद इसके अब भी देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा तम्बाकू के नशे की चपेट में है !
कल्पतरु एक्सप्रेस
   एक आंकड़े के मुताबिक देश में १५ साल से ऊपर की आयु के लगभग ३५ प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में तम्बाकू का सेवन करते हैं ! इनमे से २१ प्रतिशत लोग गुटका आदि के रूप में तम्बाकू चबाते हैं, जबकि बाकी लोग बीड़ी-सिगरेट आदि के द्वारा तम्बाकू का सेवन करते हैं ! हालांकि बीड़ी-सिगरेट का सेवन करने वाले लोगों की संख्या में पहले की तुलना में काफी गिरावट आयी है, पर फिर भी आज देश के लगभग २६ प्रतिशत लोग बीड़ी-सिगरेट आदि का नशा  करते हैं जिनमे कि ३ प्रतिशत महिलाऐं भी हैं ! शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा तम्बाकू का अधिक सेवन  ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाता है ! ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ ५७ प्रतिशत पुरुष तम्बाकू का सेवन करते हैं, वहीँ १९ प्रतिशत महिलाऐं भी तम्बाकू का नशा करती हैं ! अगर विचार करें तो शहरी लोगों की अपेक्षा ग्रामीण लोगों के तम्बाकू   का अधिक सेवन करने के लिए मुख्य कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य नशा सामग्रियों की अपेक्षा इसका सहजता से उपलब्ध हो जाना है ! अब चूंकि, शहरी क्षेत्रों में तो नशे के लिए लोगों को विभिन्न प्रकार की शराबों समेत कई तरह की ड्रग्स आदि बड़े आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, इसलिए वो तम्बाकू को अधिक तवज्जो नही देते हैं ! जबकि ग्रामीण इलाकों में तम्बाकू ही एकमात्र ऐसी सामग्री है जो नशे के लिए आसानी से मिल सकती है ! ग्रामीण इलाकों के बड़े बाजारों से लेकर पंसेरी की दुकान तक हर जगह तम्बाकू मौजूद होती है ! तम्बाकू की इस सहज उपलब्धता के कारण ही ग्रामीण लोगों में तम्बाकू का नशा शहरी लोगों की अपेक्षा अधिक पाया जाता है ! पर इन सब बातों के ठीक उलट भारत सरकार के तम्बाकू नशा उन्मूलन सम्बन्धी कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा अधिकाधिक रूप से शहरों में चलाए जाते हैं जबकि इनकी असल जरूरत ग्रामीण क्षेत्रों में है ! साफ़ है कि सरकार द्वारा इस समस्या का ठीक ढंग से अध्ययन किए बिना ही समाधान बनाया और लागू किया गया जिससे आज स्थिति ये हो गई है कि रोग कहीं और है और निदान कहीं और हो रहा है ! ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि क्या ग्रामीण क्षेत्रों पर सरकार  के इस अनदेखेपन के होते हुए इस देश का पूरी तरह से तम्बाकू के नशे से मुक्त हो पाना संभव है ?
   एक तरफ तम्बाकू उद्योग से जहाँ देश को राजस्व की भारी आमद होती है, वही इससे बड़ी तादाद में लोगों को रोजगार भी मिला है ! ऐसे में तम्बाकू नशा मुक्ति के लिए जल्दबाजी और उत्तेजना में इसकी खेती पर प्रतिबन्ध लगाने की बात करना, किसी लिहाज से उचित नही है ! लेकिन सरकार को इस बात का एकबार पुनः अवश्य अध्ययन करना चाहिए कि तम्बाकू की खेती से होने वाले राजस्व लाभ और उसके नशे के रोकथाम पर होने वाले खर्च के बीच कितना अंतर है ! इसके बाद जो तथ्य सामने आएं उनके आधार पर ये तय होना चाहिए  कि तम्बाकू की खेती कितनी लाभकारी है और कितनी नुकसानदेह तथा इसपर प्रतिबन्ध लगना चाहिए या नही ! इसके अलावा सरकार को चाहिए कि वो अपने  तम्बाकू नशा मुक्ति कार्यक्रमों का गांवों तक विस्तार भी करे जिससे ग्रामीण लोगों को भी तम्बाकू से मुक्त होने में सहायता मिले ! अगर सरकार द्वारा इन सब चीजों पर सही ढंग से अमल किया जाए तो इसमे कोई दोराय नही कि आने वाले समय में हम तम्बाकू के नशे से पूरी तरह मुक्त राष्ट्र होंगे ! 

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

शीतकालीन सत्र में सरकार की चुनौतियां [आईनेक्स्ट इंदौर और डीएनए में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

डीएनए 
संसद के शीतकालीन सत्र का आगाज़ हो चुका है ! इससे पहले हम देख चुके हैं कि कैसे संसद के पिछले कई सत्र बिना किसी काम-काज के सत्तापक्ष के अड़ियल रवैये और विपक्ष के हंगामे की भेट चढ़ गए ! उन संसदीय सत्रों में कुछ काम नही होने के कारण आज स्थिति ये है कि सरकार के तमाम महत्वपूर्ण विधेयक अब भी कतार में खड़े अपने पारित होने का इंतज़ार कर रहे हैं ! यहाँ ये भी गौर करना होगा कि संसद के पिछले सत्र जिन मुद्दों के कारण बर्बाद हुए अबतक उन मुद्दों की सूची में कोई खासा कमी होने की बजाय बढोत्तरी हुई है ! पिछले सत्रों की नाकामी के कारण इस संसदीय सत्र में सरकार के सामने काफी सारी चुनौतियाँ हैं ! मसलन, अब लोकसभा चुनाव २०१४ में बहुत अधिक समय शेष नही है, पर अपनी नीतिजन्य विफलता तथा केंद्रीय मंत्रियों के भ्रष्टाचार के कारण जनता के सामने सरकार की छवि पूरी तरह से खराब हो चुकी है ! तिसपर पिछले कई संसदीय सत्रों में कुछ काम-काज न होने के कारण भी सरकार की बड़ी भारी किरकिरी हुई है ! इन सब बातों को देखते हुए इस संसदीय सत्र में सरकार की कोशिश होगी कि वो काफी समय से अटके पड़े कई  महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवाके लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र जनता के बीच अपनी धूमिल हुई छवि को कुछ ठीक कर सके ! पर वहीँ विपक्ष का प्रयास होगा कि लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र बेहद महत्वपूर्ण संसद के इस शीतकालीन सत्र में सरकार की नाकामियों व भ्रष्टाचार के मुद्दों के जरिए उसकी घेराबंदी करके उसे इस संसदीय सत्र का सियासी लाभ नही लेने दिया जाए ! कहा जाता है कि राजनीति में अवसर और मुद्दा सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते हैं और फ़िलहाल ये दोनों ही विपक्ष के पास हैं ! कारण कि फ़िलहाल कहीं भी सरकार के लिए कुछ अच्छा नही चल रहा है ! बात चाहें आर्थिक नीतियों की हो या विदेश नीति की अथवा देश के आतंरिक हालात की इनमे से किसी भी मोर्चे पर सरकार के पास नाकामियों की फेहरिस्त के सिवा कुछ नही है ! अतः इस संसदीय सत्र में मौका और मुद्दा दोनों विपक्ष के पास है और पूरी संभावना है कि इनके जरिये वो सरकार पर हावी होने की पूरी कोशिश करेगा !
आईनेक्स्ट 
हालांकि सरकार के संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ द्वारा शीतकालीन सत्र को बिना किसी गतिरोध के सुचारू ढंग से चलाने के लिए सभी दलों की बैठक जरूर की गई, पर नही लगता कि इस सर्वदलीय बैठक में ऐसी कोई सहमति बनी होगी जिससे कि सरकार की समस्या कुछ कम हो ! क्योंकि इस बैठक के बाद कुछेक दलों की तरफ से जिस तरह के बयान आए हैं वो सरकार के लिए कोई अच्छा संकेत नही दे रहे हैं ! सपा की तरफ से कहा गया है कि अगर सरकार महिला आरक्षण विधेयक संसद में नही लाती है तो वो संसद में हंगामा नही करेगी ! मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने भी अपना रुख साफ़ करते हुए कह दिया कि सरकार सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक जो कि बहुसंख्यक विरोधी है, को हटाए ! वर्ना भाजपा द्वारा संसद में उसका विरोध किया जाएगा ! भाजपा की इस मांग पर सरकार दंगा विरोधी बिल में कुछ संसोधन के लिए राजी भी हुई है ! इसके अतिरिक्त भाजपा द्वारा तेलंगाना समेत और भी कई महत्वपूर्ण विधेयकों को संसद में पेश और पारित करवाने की बात कही गई है ! लिहाजा साफ़ है कि अब अगर सरकार भाजपा, सपा आदि दलों की इन मांगों को मान लेती है तभी संसद का सत्र सुचारू ढंग से चलाने में इन सभी दलों का सहयोग मिल सकेगा ! 

  इसी संदर्भ में अगर एक नज़र पारित होने की कतार में खड़े सरकार के कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों पर डालें तो इस संसदीय सत्र में सरकार द्वारा लगभग ३० विधेयकों को सूचीबद्ध किया गया है ! जिनमे कई साल से अटके लोकपाल बिल समेत पदोन्नति मे आरक्षण विधेयक, सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक, महिला आरक्षण विधेयक, तेलंगाना विधेयक आदि और भी कई छोटे-बड़े विधेयक शामिल हैं ! अब चूंकि संसद का ये सत्र ५ से २० दिसंबर तक चलना है जिसमे कि महज १२ बैठकें ही होनी हैं ! इस नाते इतने कम समय में सरकार के लिए इन सभी विधेयकों को संसद में पेश करके इनपर चर्चा करवाना और इन्हें पारित करवाना एक बड़ी चुनौती होगी ! स्थिति को देखते हुए स्पष्ट है कि यहाँ हर हाल में सत्तारूढ़ कांग्रेस ये चाहेगी कि इस संसदीय सत्र में पेश सब विधेयकों में से सभी नही तो कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों को ही पारित करवा लिया जाए जिससे कि लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरने के लिए कुछ साजो-समान हो जाए ! पर वहीँ मुख्य विपक्षी दल भाजपा की सोच होगी कि इन विधेयकों को जिस-तिस तरह से भी पारित होने से रोककर सरकार को इस संसदीय सत्र का चुनावी लाभ न लेने दिया जाए ! अब ये देखना दिलचस्प होगा कि संसद के इस शीतकालीन सत्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा में किसका दाव किसपर भारी पड़ता है और कौन किसे मात देता है ? आखिर में अब जो भी हो, पर इस बात के पूरे संकेत हैं कि चुनावी लाभ की प्रत्याशा में राजनीतिक दलों के बीच मचे इस सिरफुटौव्वल के कारण संसद के पिछले कुछ सत्रों की तरह ही ये सत्र भी बेवजह के हंगामे की भेट चढ़ सकता है ! 

सोमवार, 18 नवंबर 2013

सीबीआई जीत सकेगी अस्तित्व की लड़ाई [आईनेक्स्ट इंदौर में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

आईनेक्स्ट 
देश की सर्वोच्च जाँच एजेंसी सीबीआई अपनी विश्वसनीयता और कार्यशैली के लिए तो हमेशा से ही विवादों में रही है, पर अब इन विवादों के क्रम में एक और विवाद जुड़ गया है और ये कोई ऐसा-वैसा विवाद नही है ! कारण कि अबतक तो सिर्फ सीबीआई की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लगते थे, पर इस विवाद ने तो उसके अस्तित्व को ही संदेह के घेरे में ला दिया है ! अभी हाल ही में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने नवेन्द्र कुमार नामक व्यक्ति द्वारा दायर एक याचिका पर अपने फैसले में कहा कि सीबीआई कोई पुलिस फ़ोर्स नही है, अतः वह न तो अपराधों की जांच कर सकती है और न ही चार्जशीट दायर कर सकती है ! दरअसल हुआ यूँ था कि सन २००१ में एक बीएसएनएल कर्मचारी नवेन्द्र कुमार के खिलाफ सीबीआई द्वारा आपराधिक षड्यंत्र रचने और धोखाधड़ी करने का मामला दर्ज किया गया था ! जिसके बाद नवेन्द्र कुमार ने सीबीआई के गठन की वैधानिकता को चुनौती देती एक याचिका उच्च न्यायालय में दायर की थी ! उनका मत था कि सीबीआई को अवैधानिक घोषित करते हुए उनपर दायर मामला खारिज कर दिया जाए ! बस इसी मामले में अब गुवाहाटी उच्च न्यायालय का फैसला आया है जिससे कि सीबीआई के अस्तित्व पर ही संकट के बादल मडराने लगे हैं ! ये कहना गलत होगा कि अपने अस्तित्व पर आए इस संकट से सिर्फ सीबीआई परेशान होगी, बल्कि इस चुनावी मौसम में ये फैसला सीबीआई से कहीं अधिक सरकार को चिंतित करने वाला होगा ! शायद यही कारण है कि गुवाहाटी उच्च न्यायालय का फैसला आते ही सरकार द्वारा आनन्-फानन में इस फैसले पर रोक लगाने के लिए न सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डाली गई, बल्कि अनुरोध करके छुट्टी के दिन ही मामले की सुनवाई भी करवाई गई ! अंततः परिणाम ये रहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा  मामले की सुनवाई ६  दिसंबर को तय करते हुए फ़िलहाल के लिए गुवाहाटी उच्च न्यायालय के इस फैसले पर रोक लगा दिया गया ! अब फ़िलहाल के लिए भले ही सीबीआई पर से संकट कुछ कम हो गया है, पर इसका ये कत्तई अर्थ नही कि अब सीबीआई को लेकर पूरी तरह से निश्चिंत हो लिया जाए ! अभी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गुवाहाटी उच्च न्यायालय के फैसले पर सिर्फ एक निश्चित अवधी तक की रोक लगाई गई है, उसे ख़ारिज नही किया गया है ! अभी सारी कहानी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ६ दिसंबर को होने वाली सुनवाई पर निर्भर है ! सर्वोच्च न्यायालय मामले का अध्ययन करेगा और फिर सुनवाई में सभी पक्षों की बातों को सुनने के बाद कोई निर्णय लेगा ! अब जो भी हो, पर अभी सवाल ये उठता है कि क्या वाकई में सन १९६३ में हुए सीबीआई के गठन में ऐसी कुछ कमी रह गई थी कि आज गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा उसे अवैधानिक घोषित कर दिया गया है ? इस सवाल का उत्तर तलाशने के लिए हमें गुवाहाटी उच्च न्यायालय के तर्कों की कसौटी पर सीबीआई के गठन के इतिहास को रखना होगा ! इतिहास को देखने पर हमें पता चलता है कि भारत में सीबीआई के गठन की बुनियाद आजादी से लगभग आधा दशक पहले अंग्रेजी हुकूमत द्वारा रख दी गई थी ! उल्लेखनीय होगा कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय युद्ध आपूर्ति विभाग में व्यापक तौर पर फैले भ्रष्टाचार की जांच व रोकथाम के लिए ब्रिटिश हुकूमत द्वारा विशेष पुलिस प्रतिष्ठान की स्थापना की गई ! कालांतर में दिल्ली विशेष पुलिस अधिनियम बना और ये पुलिस प्रतिष्ठान गृहमंत्रालय को हस्तांतरित कर दिया गया ! आजादी के बाद १ अप्रैल, सन १९६३ में गृहमंत्रालय द्वारा इसी दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान को ‘केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो’ (सीबीआई) के रूप में एक नया और लोकप्रिय नाम दिया गया ! अब आज गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई की अवैधानिकता के संबंध ये तर्क दिया जा रहा है कि सीबीआई के गठन को न तो कैबिनेट के सामने रखा गया था और न ही राष्ट्रपति से मंजूरी दिलाई गई थी ! सीबीआई के गठन के इतिहास को देखते हुए तो गुवाहाटी उच्च न्यायालय ये तर्क काफी हद तक सही ही प्रतीत होता है ! पर अब जब मामला सर्वोच्च न्यायालय के पास है तो ऐसे में कुछेक ऐसी बातें दिखती है जो सीबीआई के पक्ष में जा सकती हैं ! सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि सन १९६३ में सीबीआई का नए सिरे से कोई गठन नही किया गया था, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पूर्व में ही स्थापित किए गए दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान को ही एक नया नाम देकर सीबीआई बना दिया गया था ! साफ़ है कि सीबीआई का गठन दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान के नाम से अंग्रेजी हुकूमत द्वारा ही हो गया था ! भारतीय शासन के दौरान सिर्फ इसका नाम परिवर्तित किया गया ! अंग्रेजी शासन की व्यवस्था से कई बातें हमने ग्रहण की हैं और कई पारम्परिक रूप से प्राप्त हुई हैं, सीबीआई भी इसीका एक हिस्सा है ! लिहाजा हम ये नही कह सकते कि राष्ट्रपति से मंजूरी न मिलने अथवा हमारी अन्य संसदीय प्रक्रियाओं से नही गुजरने के कारण सीबीआई का गठन अवैधानिक है !
  बहरहाल अभी स्थिति ये है कि सीबीआई का अस्तित्व सर्वोच्च न्यायालय के स्टे के सहारे है ! कहना कठिन है कि ६ दिसंबर को होने वाली सुनवाई में क्या आएगा ! पर इतना जरूर है कि आज अगर सीबीआई वैधानिकता पर किसी तरह का कोई सवाल उठता है तो इसका सीधा प्रभाव उसके अधीन जांच और सुनवाई के लिए पड़े मामलों पर पड़ेगा ! कुछ प्रभाव तो दिखने भी लगा है कि सीबीआई जांच का सामने कर रहे तमाम आरोपी इस स्थिति का लाभ लेते हुए अपने पर लगे आरोपों को ख़ारिज करने के लिए न्यायालय में अपील दायर करने लगे हैं ! कुल मिलाकर आज जहाँ ६ दिसंबर की तारीख पर सारे देश की नज़रें टिकी हैं, वहीँ यही तारीख सरकार और सीबीआई की उम्मीदों के लिए एकमात्र सहारा भी है !


शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

पाक के खिलाफ़ सख्त कूटनीति जरूरी [आईनेक्स्ट इंदौर में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत
इसे मात्र एक संयोग कहा जाए या आतंकियों की सोची-समझी रणनीति कि जब अमेरिका में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच मेलजोल की तैयारी हो रही थी, तब जम्मू-कश्मीर के केरन सेक्टर में पाक-प्रेरित घुसपैठियों द्वारा हमारी सीमा लांघकर हमारे इलाके पर कब्जे की कोशिश की जा रही थी ! पर ये हमारे बहादुर जवानों का हौसला ही था जिसने उन घुसपैठियों के काले मंसूबों को कामयाब नही होने दिया ! घुसपैठियों और सेना के जवानों के बीच पन्द्रह दिन तक भीषण मुठभेड़ चली जिसमे सात घुसपैठियों के शव सेना द्वरा बरामद किए गए हैं ! सेना ने अबतक मारे गए घुसपैठियों के पास से जो युद्धक सामग्री बरामद की है उसे देखते हुए इसकी पूरी संभावना जताई जा रही है कि यहाँ किसी बड़े युद्ध की तैयारी चल रही थी ! अब सवाल ये उठता है कि जवानों की तैनाती होने के बावजूद भी आखिर किस प्रकार हमारी सीमा के भीतर घुसपैठ हो गई ? यहाँ कुछ बिंदुओं पर विचार करें तो तमाम ऐसे सवाल सामने आते है जो चाहे-अनचाहे इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में पाक सेना की संलिप्तता को ही पुख्ता करते हैं ! जैसे कि बिना पाकिस्तानी सेना की शह के भारी संख्या में आतंकी पाक सीमा से भारतीय सीमा में कैसे घुस सकते हैं ? दूसरी चीज कि इन घुसपैठियों को रसद तथा लंबे समय तक भारतीय जवानों का सामना करने के लिए गोली-बंदूकें कहाँ से प्राप्त हो रही थीं ? जाहिर है कि बगैर पाक सेना की मदद के सिर्फ आतंकी संगठनों द्वारा इतने दिनों तक भारतीय सीमा में घुसकर भारतीय फ़ौज का मुकाबला करना संभव नही है ! अतः संशय नही कि इसमे आतंकियों को पाक सेना द्वारा हर स्तर पर भरपूर सहयोग दिया जा रहा होगा ! भारतीय सेना की तरफ से तो खुले तौर पर ये संकेत भी दिए जा रहे हैं कि इस घुसपैठ में आतंकियों के साथ पाक सेना के विशेष जवान भी मौजूद थे, पर ये हमारे सियासी महकमे की कूटनीतिक विफलता ही है कि हमारे सियासी हुक्मरान इस संबंध में पाकिस्तान पर अबतक किसी तरह का कोई दबाव नही बना पाए हैं ! इस संबंध में हमारे हुक्मरान अबतक सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों के हवाई किले बनाने में ही लगे हैं, यथार्थ के धरातल पर अबतक कोई ठोस कदम नही उठाया गया है ! पाकिस्तान के द्वारा तो हमेशा की ही तरह इसबार भी इस घुसपैठ अपनी संलिप्तता से साफ़ इंकार किया जा रहा है ! पर आश्चर्य इस बात का है कि हमारे नेता भी आँख-कान बंद किए पाकिस्तान की बात पर ही यकीन किए बैठे हैं ! ऐसा लगता है जैसे हमारे हुक्मरान पाकिस्तान को अपना बहुत बड़ा हमदर्द और सच्चा मित्र मान चुके हैं जिस कारण वो उसकी बात पर कोई संदेह नही कर रहे ! अगर ऐसा नही होता तो क्या अबतक अपनी सीमा में इस पाक समर्थित आतंकी घुसपैठ को मुद्दा बनाकर  सरकार द्वारा पाकिस्तान के ऊपर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कूटनैतिक दबाव बनाने की कोशिश नही  गई होती ! पर हमारे सियासी आकाओं द्वारा ये दबाव बनाने की सिर्फ बातें ही की जा रही है, जमीनी हकीकत ये है कि अबतक पाकिस्तान पर किसी तरह का कोई दबाव नही बनाया जा सका है !
आईनेक्स्ट इंदौर
  पाकिस्तान को लेकर हमारी नीतियों की असल खामी भी यही है कि हम उसकी नापाक हरकतों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा नही बना पाते हैं या कहें कि बनाना चाहते ही नही हैं ! पाकिस्तान की हालत हर स्तर पर हमारे सामने बौनी है, पर बावजूद इसके वो हमारे खिलाफ लगातार आक्रामक रुख अपनाए रहता है जबकि विश्व बिरादरी में एक मजबूत साख रखने वाले हम हमेशा ही उसकी मान-मनौव्वल में लगे रहते हैं ! हमने कभी भी स्वयं को पाकिस्तान के समक्ष एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत ही नही किया ! पाकिस्तान सदैव से हर स्तर पर हमारे हितों का विरोध करने की नीति पर चलता रहा है, पर हमने हमेशा ही पाकिस्तान के प्रति नरम रुख अपनाने में विश्वास किया है ! यहाँ उल्लेखनीय होगा कि आचार्य चाणक्य ने कभी कहा था कि आदमी को थोड़ा टेढ़ा भी होना चाहिए, सिर्फ सीधा होना उसके हितों के लिए हानिकारक हो सकता है ! भारत के साथ यही समस्या है कि वो शांति समर्थन के अपने सनातन सिद्धांत को निभाने के अन्धोत्साह में इस कदर मशगूल है कि उसे इसका तनिक भी भान नही कि इस कारण विश्व समुदाय में उसकी छवि एक ऐसे राष्ट्र की बनती जा रही है जो शक्तिसंपन्न होते हुए भी अपने हितों की रक्षा नही कर सकता ! निश्चित ही शांति का समर्थन हमारे सनातन सिद्धांतों में से एक रहा है, पर ये भी एक सत्य है कि समय के साथ हर सिद्धांत परिवर्तन चाहता है ! दूसरी बात कि कोई भी सिद्धांत राष्ट्र से बड़ा नही हो सकता ! ऐसे सिद्धांतों के प्रति मोह का क्या अर्थ जिनसे कि राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता को ही खतरा उत्पन्न हो जाय ! कोई दोराय नही कि युद्ध कोई विकल्प नही है, पर राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए एकबार इसपर भी विचार किया जा सकता है ! पर फिलहाल स्थिति इतनी विकट नही है ! अगर हमारे सियासी हुक्मरान थोड़ी सूझबूझ का परिचय दें तो बिना किसी जंग के कूटनैतिक स्तर पर पाकिस्तान को दबाया जा सकता है !
  आज जरूरत इस बात की है कि हम विश्व समुदाय के सामने पाकिस्तान को एक समस्या के रूप में पेश करें ! साथ ही उसकी नापाक हरकतों का कच्चा-चिठ्ठा विश्व बिरादरी में खोले ! उल्लेखनीय होगा कि मुंबई हमलों से जुड़े तमाम सबूत हम अबतक पाकिस्तान को सौप चुके हैं, पर इसका कोई सकारात्मक परिणाम नही निकला है ! अब जरूरत इस बात की है कि उन सबूतों को विश्व समुदाय के समक्ष पेश करते हुए पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को उजागर किया जाए ! साथ ही पाकिस्तान से किसी तरह की कोई भी बातचीत तबतक न की जाए जबतक कि वो अपनी ज़मीन से हमारे खिलाफ चल रही आतंकी गतिविधियों पर विराम लगाने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नही करता है ! हमारी कोशिश होनी चाहिए कि पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा दबाव बने कि वो अपनी ज़मीन पर स्थित आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को सैन्य कार्रवाई के द्वारा जल्द से जल्द नेस्तनाबूद करे ! बहरहाल, इन सभी चीजों के लिए आवश्यक है कि हमारे सियासी आका शांति के नाम पर हर समझौते के लिए तैयार रहने वाली अपनी घिसी-पिटी सोच को छोड़कर दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए पाकिस्तान के प्रति सख्त रुख अपनाएं ! क्योंकि बिना दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के इन सब बातों का कोई विशेष अर्थ नही है !

सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

अध्यादेश वापसी के बहाने नई राजनीति [आईनेक्स्ट इंदौर और डीएनए में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत

आईनेक्स्ट
डीएनए
जैसा कि पूरी उम्मीद थी कि दागी नेताओं को बचाने वाले अध्यादेश पर राहुल गाँधी के खुले विरोध के बाद सरकार द्वारा इसे वापस ले लिया जाएगा, बिलकुल वैसा ही हुआ ! बेशक ये बहुत अच्छी बात है कि इस अध्यादेश की वापसी के बाद अब दागी नेताओं के बचने का रास्ता बंद हो गया, पर बात यहीं खत्म नही होती ! यहाँ कुछ बातो पर विचार करना आवश्यक होगा ! सबसे पहले तो ये समझना होगा कि सरकार ने ये अध्यादेश वापस जरूर ले लिया है, पर जब और जिस स्थिति में ये फैसला किया गया है, वो सरकार की नीयत को संदेह के घेरे में लाता है ! इसी  संदर्भ में उल्लेखनीय होगा कि जिस कांग्रेस कोर ग्रुप द्वारा २१ सितम्बर को इस अध्यादेश को मंजूरी दी गई थी, उसीके द्वारा इसे वापस लेने का निर्णय भी लिया गया है ! साथ ही ये भी कि जिन राहुल गाँधी ने इस अध्यादेश को फाड़कर फेंकने की बात कही है, वो भी इसपर चर्चा के दौरान मौजूद रहे थे ! इन सब बातो को देखते हुए अब सवाल ये उठता है कि क्या सरकार उसवक्त अंधी और बहरी हो रही थी जब जनता और विपक्ष के विरोध के बावजूद भी वो दागियों को बचाने वाले संशोधन विधेयक पर अध्यादेश ले आयी ? तिसपर जो कांग्रेसी नेता आज इस अध्यादेश को गलत ठहरा रहे हैं, क्या वो उस कैबिनेट में मौजूद नही थे जिसके द्वारा इस अध्यादेश को मंजूरी दी गई ? और तो और, क्या सरकार को इस अध्यादेश के बकवासपने का तब अंदाज़ा नही था जब इसे राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा गया ? सरकार के पास तो इन सवालों के जवाब के रूप में हजारों कुतर्क हैं, पर थोड़ा विचार करते ही सारी असलियत हमारे सामने आ जाती है ! बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि सरकार की ये अध्यादेश वापसी पूरी तरह से अवसरवादी राजनीति से प्रेरित है जिसके तहत सरकार का उद्देश्य लोकसभ चुनाव में राजनीतिक लाभ लेने का है ! यहाँ समझना होगा कि तबतक सरकार ये अध्यादेश आगे बढ़ाती रही जबतक इसपर जनता और विपक्ष का विरोध था, पर जब स्वयं राष्ट्रपति ने भी इसके प्रावधानों पर संदेह जताया तब सरकार के लिए मुश्किल हो गई ! तब सरकार की स्थिति ऐसी हो गई कि उसके लिए इस अध्यादेश को न उगलते बनता न निगलते ! ऐसे में कांग्रेस द्वारा राहुल गाँधी के द्वारा इस अध्यादेश का खुला विरोध करवाके वो चाल चली गई जिससे कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे ! मतलब कि सरकार को अध्यादेश वापसी का आधार भी मिल जाए औए विपक्ष को इसका श्रेय भी न मिल सके ! साथ ही राहुल गाँधी को जनता के सामने सरकार से अलग जनता के लिए लड़ने वाले एक जननेता के रूप में प्रस्तुत भी किया जा सके ! पर दुर्भाग्य कि अपने राजनीतिक लाभ के इस अन्धोत्साह में शायद सरकार ये भूल गई कि वो एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत जनता द्वारा चुनकर सत्ता में आयी है और उसपर किसी व्यक्ति विशेष की नही समूचे राष्ट्र की भावनाओं का ख्याल रखने का दायित्व है ! ये कितना अजीब है कि जनता और विपक्ष के विरोध के बावजूद भी एक अध्यादेश राष्ट्रपति के पास स्वीकृति तक के लिए चला जाता है और तभी अचानक सरकार का एक नेता उस अध्यादेश को बकवास करार दे देता है और फिर तो सारी कहानी ही बदल जाती है ! ये देखते हुए सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि इस सरकार के लिए किसी जनभावना का कोई महत्व नही है, ये पूरी तरह से वन मैन आर्मी सरकार हो गई है ! कुल मिलाकर इस अध्यादेश के लाए जाने, राहुल गाँधी द्वारा इसका विरोध करने तथा इसे वापस लिए जाने तक के सम्पूर्ण घटनाक्रम को देखने पर जो एक तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आता है वो ये कि हमारी सरकार इस कदर व्यक्ति केंद्रित हो गई है कि उसे इसका तनिक भी भान नही हो रहा कि वो कुछ लोगों की संतुष्टि मात्र के लिए लगातार लोकतंत्र का मज़ाक उड़ा रही है ! लोकतंत्र का इससे बड़ा अपमान और क्या होगा कि राहुल गाँधी जिन्हें सरकार में कोई पद तक प्राप्त नही है, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट के निर्णय को बकवास कह देते हैं और प्रधानमंत्री उनकी बात को स्वीकारने के सिवाय कुछ नही कर पाते ! ये देखते हुए एक सीधा-सा सवाल उठता है कि सरकार मनमोहन सिंह चला रहे हैं या राहुल गाँधी ?
  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर तो हमेशा से ही कमजोर प्रधानमंत्री होने जैसी टिप्पणियां जनता समेत विपक्षी नेताओं द्वारा भी की जाती रही हैं ! कहा जाता रहा है कि बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का हर निर्णय सोनिया-राहुल का होता है ! विचार करने पर ये बातें लगभग सही ही प्रतीत होती हैं ! कारण कि मनमोहन सिंह के दो बार के प्रधानमंत्री काल में एक भी निर्णय ऐसा नही दिखता जो उनकी अपनी इच्छाशक्ति व सूझबूझ को दर्शाता हो ! बल्कि उलट उनके बयानों में सोनिया-राहुल के लिए जो समर्पण दिखाता है उससे यही स्पष्ट होता है कि वो स्वयं भी खुद को प्रधानमंत्री नही मानते बल्कि इसे सोनिया गाँधी की मेहरबानी ही समझते हैं ! अभी हाल ही में आया उनका ये बयान कि मुझे राहुल के नेतृत्व में कार्य करके खुशी होगी, उनकी कमजोर सोच और राजनीतिक सूझबूझ के अभाव को दर्शाने वाला होने के साथ-साथ लोकतंत्र के लिए अपमानकारी भी है ! प्रधानमंत्री की इस कमजोर मानसिकता के कारण ही आज उनकी स्थिति ये है कि उनका इस्तेमाल बलि के बकरे की तरह किया जा रहा है ! जब कोई गलत कार्य होता है तो उसकी जवाबदेही प्रधानमंत्री पर आती है जबकि सभी अच्छे कार्यों का सारा सेहरा कांग्रेसी युवराज के सिर बंधता है ! यही कारण है कि व्यक्तिगत रूप से स्वच्छ चरित्र होते हुए भी वो दूसरों के दागों को ढो रहे हैं ! दागियों पर  अध्यादेश मामले में भी यही हुआ है ! पर दुर्भाग्य कि हमारे प्रधानमंत्री इन बातों को जानने और समझने की बजाय मौन रूप से इन्हें स्वीकारते जा रहे हैं ! अब उनको ये कौन समझाए कि वो एक लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए उनपर उछलने वाले कीचड़ से सिर्फ वो नही हमारा लोकतंत्र भी दागदार हो रहा है ! अतः ये समय मौन रहने तथा किसीके इशारों पर चलने का नही बल्कि स्वयं की सूझबूझ से स्वतन्त्रतापूर्वक निर्णय लेने का है !