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बुधवार, 21 दिसंबर 2016

निकाय चुनावों में भाजपा की जीत के निहितार्थ [राज एक्सप्रेस और हरिभूमि में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
हाल ही में पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में निकाय चुनावों के परिणाम आये। इन चुनावों में जनता ने भाजपा को ऐतिहासिक रूप से विजयी बनाया है। चंडीगढ़ निकाय के कुल 26 वार्डों में से 22 वार्डों में भाजपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 20 में उसे जोरदार जीत हासिल हुई है। भाजपा की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल को सिर्फ एक सीट हाथ लगी, वहीँ पिछली बार के चुनावों में ११ सीटें जीतने वाली कांग्रेस को महज़ चार सीटों से संतोष करना पड़ा। इससे पहले महाराष्ट्र और गुजरात के निकाय चुनावों में भी भाजपा ने बड़ी जीतें हासिल की थी, लेकिन, चंडीगढ़ निकाय चुनावों की ये जीत उन सबसे भी अधिक शानदार रही है। साथ ही, इन सब निकाय चुनावों से पहले मध्य प्रदेश, असम, अरुणाचल प्रदेश आदि राज्यों में खाली हुई लोकसभा और विधानसभा सीटों पर भी उपचुनाव हुए थे, उनमें भी ज्यादातर सीटों पर भाजपा को जनता ने विजयी बनाया था। इन सब चुनावों की सबसे विशेष बात ये रही है कि यह सब नोटबंदी के उस निर्णय के बाद हुए है, जिसके विरोध में पूरा का पूरा विपक्षी खेमा एक सुर में लामबंद हुआ पड़ा है और जिसके विरोध के नाम पर विपक्षी खेमे ने संसद के शीतकालीन सत्र को अपने हंगामें की भेंट चढ़ा दिया। अब इन चुनाव परिणामों के बाद विपक्ष के विरोध की कलई भी पूरी तरह से खुल चुकी है कि नोटबंदी के कारण जनता की जिस कथित पीड़ा और आक्रोश का गान करते हुए ये भाजपा सरकार को बिना मतलब ही भरपूर कोस रहे हैं, वो जनता हर स्तर पर चुनाव में इन्हें लगातार खारिज़ और सत्ताधारी दल को स्वीकार रही है। इसका एक अर्थ यह भी है कि जनता नोटबंदी के निर्णय से बिलकुल भी नाराज़ नहीं है, बल्कि इसका बेमतलब विरोध करने वालों से उसे अधिक नाराजगी हो रही है।
 
राज एक्सप्रेस
अब तर्क यह दिया जा रहा है कि निकाय चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं होते, इसलिये उनमें नोटबंदी कोई मुद्दा ही नहीं था। ये बात एक हद तक सही है कि निकाय चुनाव स्थानीय मुद्दों पर आधारित होते हैं, लेकिन नोटबंदी देशव्यापी मुद्दा है और इससे इन चुनावसंपन्न निकायों की जनता भी प्रभावित हुई है। अब अगर उस जनता के मन में नोटबंदी के प्रति जरा-सा भी आक्रोश होता या इस निर्णय को वो गलत मानती तो हाल के सभी निकाय चुनावों में भाजपा को बम्पर रूप से विजयी बनाने का काम क्यों करती ? अगर जनता को लगता कि नोटबंदी पर विपक्ष का विरोध तार्किक और उचित है, तो वो विपक्षी दलों को इन निकायों में तवज्जों क्यों नहीं देती ?  सीधा निष्कर्ष है कि इन चुनावों में नोटबंदी मुद्दा रहा है और कहीं न कहीं भाजपा की बम्पर जीत को सुनिश्चित करने में इसका  महत्वपूर्ण योगदान भी रहा है। इन सबके बाद, एक बार के लिये अगर मान लें कि इन निकाय चुनावों में नोटबंदी कोई मुद्दा नहीं रहा, तो भी विपक्ष की जो दुर्दशा इनमें हुई है, वो क्या कम हो जाती है। अच्छी बात होगी कि विपक्षी खेमा अब भी वास्तविकता को समझे कि सरकार के प्रति अंधविरोधी रुख और जनता की नब्ज़ को पकड़ पाने में उसकी नाकामयाबी के कारण उसका जनाधार अब धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। यह विपक्ष के लिये चेतने का समय है।
हरिभूमि

चूंकि, पंजाब में कुछ ही समय बाद विधानसभा चुनाव भी होने हैं, इसलिये नोटबंदी से इतर इन निकाय चुनाव परिणामों के कुछ राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। अभी पंजाब में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के गठबंधन की सरकार है और ऐसा कहा जा रहा है कि राज्य में सत्ता-विरोधी रुझान बहुत ज्यादा है, जिस कारण अबकी सरकार बदलने की संभावना है। यह कयास एक हद तक सही भी है, क्योंकि अकाली दल के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के शासन में नेतृत्वहीनता और उससे उपजी अव्यवस्था बहुत ज्यादा रही है। भाजपा इस सरकार की सहयोगी है, इस स्थिति में उसे अकालियों के प्रति जनाक्रोश का भागीदार बनना पड़ सकता है। लेकिन, एक समीकरण है कि भाजपा अकाली दल से अलग होकर अगर चुनाव में उतर जाये तो उसकी मुश्किलें आसान हो सकती हैं। क्योंकि, पंजाब की जनता में अकालियों के प्रति अधिक गुस्सा है, अकाली दल से अलग हो जाने की स्थिति में भाजपा पर वो नरम रह सकती है। इस बात का संकेत उसने चंडीगढ़ के निकाय चुनावों अकाली दल को महज़ एक और भाजपा 20 सीटों पर विजयी बनाकर दिया भी है। स्पष्ट है कि जनता ने अपना मिज़ाज़ जाहिर कर दिया है, अब ये भाजपा पर निर्भर करता है कि वो चंडीगढ़ निकाय चुनावों में छिपे जनता के इस संकेत को कितने बेहतर ढंग से समझ पाती है। भाजपा यह निश्चित रूप से समझ ले कि पंजाब चुनाव उसके लिये किसी भी तरह आसान नहीं रहने वाले और पंजाब में उसका कल्याण होने का सिर्फ एक मार्ग है कि वो पंजाब की नाकाम अकाली सरकार का साथ छोड़े और अकेले चुनाव में उतरे। चंडीगढ़ निकाय चुनाव में उसके लिये यही जनसंकेत उभरकर आया है, इसका अनुपालन करना ही पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव में उसकी विजय का मार्ग का प्रशस्त करेगा।

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल पर नकेल कब [अमर उजाला कॉम्पैक्ट और पंजाब केसरी में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

पंजाब केसरी 
अभी देश में बोर्ड परीक्षाओं का मौसम है। यूपी आदि कई एक राज्यों में परीक्षाएं हो गई हैं तो कुछ में हो रही हैं और कुछ में आगे होनी हैं। लेकिन, हर वर्ष की तरह ही इस वर्ष भी बोर्ड परीक्षाओं में जिस बात को लेकर सर्वाधिक चर्चा है, वो है इनमे होने वाली नक़ल। प्रत्येक वर्ष राज्य सरकारों और राज्य के शिक्षा बोर्ड द्वारा यह कहा जाता है कि वो नक़ल रहित और प्रमाणिक परीक्षा करवाने के लिए पूरी व्यवस्था करेंगे लेकिन, उनकी ये व्यवस्था सिर्फ ढांक के तीन पात ही साबित होती है। नक़ल कभी नहीं रूकती। इस साल भी बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल को लेकर कई तस्वीरें सामने आई हैं। यूपी सरकार के नक़ल पर सख्ती के तमाम दावों के बावजूद वहां के कई परीक्षा केन्द्रों में कहीं दीवारों पर चढ़कर तो कहीं खिडकियों आदि के जरिये लोग अपने बच्चों को नक़ल कराते दिखे तो कई एक परीक्षा केन्द्रों पर खुलेआम छात्र-छात्राओं द्वारा किताब से देखकर नक़ल करने की तस्वीरें भी सामने आई। एक आंकड़े के मुताबिक़ यूपी बोर्ड की इंटर की परीक्षा के पहले ही दिन २७६ नकलची छात्रों को पकड़ा गया। कहना न होगा कि यह अभी  सिर्फ पकड़े गए छात्रों की संख्या है, अनगिनत छात्र ऐसे होंगे जो जम के नक़ल करने बावजूद पकड़ में नहीं आ पाए होंगे। बिहार की बात करें तो वो तो खैर नक़ल के लिए बदनाम ही रहा है। विगत वर्ष बिहार में दसवीं की बोर्ड परीक्षा में नक़ल का ऐसा हल्ला मचा कि वहां के तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने यह तक कह दिया कि नक़ल रोकना उनके बस की बात नहीं, जिसपर उन्हें उच्च न्यायालय से फटकार भी सुननी पड़ी थी। हालांकि पिछले साल से कुछ सबक लेते हुए इस साल बिहार सरकार वहां नक़ल पर नकेल कसने के लिए पूरा जोर लगाने का दावा किया और इस वर्ष की परीक्षाओं में संभवतः इसका कुछ असर भी दिखा लेकिन, फिर भी बिहार में कई एक जगहों पर नक़ल करते हुए विद्यार्थी पकड़े गए। समझा जा सकता है कि यहाँ भी यूपी की ही तरह बहुत से विद्यार्थी नक़ल करने के बावजूद पकड़ में नहीं आए होंगे। ऐसा नहीं है कि ये नक़ल विद्यार्थी अपने घर से छिप-छिपा के करते हैं, अधिकांश नकलची विद्यार्थियों के परिवाजनों का भी इसमे समर्थन व सहयोग होता है। अब जब अभिभावकों को ही नक़ल से कोई गुरेज नहीं तो समझा जा सकता है कि स्थिति कितनी ख़राब है। कितने विद्यार्थियों के परिवारजन तो उनका दाखिला ही यही देखकर कराते हैं कि अमुक विद्यालय में नक़ल आदि की व्यवस्था है या नहीं। परीक्षा के समय जब परीक्षा केंद्र का नाम सामने आता है तो नकलची इस फिराक में लग जाते हैं कि परीक्षा केंद्र जिस  विद्यालय में है, वहां कोई पहचान निकल जाए या नक़ल की कोई व्यवस्था हो जाय। लड़कियों को तो  में अब यह भी चिंता नहीं रहती क्योंकि, यूपी बोर्ड में उनके लिए तो स्वकेंद्र (होम सेंटर) का नियम लागू है।
  वैसे नक़ल की इस तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि विद्यार्थियों की नक़ल की आवश्यकता को देखते हुए परीक्षा केन्द्रों में नक़ल के लिए पूरा एक तंत्र बना पड़ा है। ये कहना एकदम समीचीन होगा कि परीक्षा कक्षों के भीतर नक़ल का एक पूरा बाजार ही चलता है, जहाँ विषयवार नक़ल की कीमत तय होती है, मोल-भाव होता है और परीक्षार्थी के रूप में खरीददार होते हैं। अन्दर की स्थिति कुछ यूँ होती है कि परीक्षा शुरू होने से पहले विद्यालय के कोई उच्च अधिकारी आते है और कुछ इस प्रकार की सामूहिक उद्घोषणा करते हैं कि अगर परीक्षा उत्तीर्ण करनी है तो इतना ‘व्यवस्था शुल्क’ देना पड़ेगा। अब जिन परीक्षार्थियों ने व्यवस्था शुल्क जो प्रायः विषय की कठिनता पर निर्भर करता है, दे दिया, उनके लिए तुरंत नक़ल सामग्री आने लगती है और सम्बंधित विषय के अध्यापक प्रश्नों को बोलकर भी हल कराने लगते हैं आदि इत्यादि तमाम व्यवस्थाओं के जरिये नक़ल प्रक्रिया चल निकलती है। व्यवस्था शुल्क अदा किए सब परीक्षार्थी एक ही जगह झुण्ड में होकर नक़ल पर्चियों का लाभ लेने लगते हैं। ऐसे में यदि बोर्ड से किसी जांच अधिकारी के केंद्र पर आने की सूचना मिले तो   फिर तो परीक्षा कक्ष में ऐसी भगदड़ मचती है कि जैसे ये परीक्षा कक्ष नहीं, कोई युद्ध का मैदान हो। जिन परीक्षार्थियों के पास नक़ल की पर्चियां आदि होती हैं, वे उन्हें अध्यापकों के पूर्व निर्देशानुसार मुहँ के हवाले कर लेते हैं। कुछ इधर-उधर फेंक देते हैं। कुल मिलाकर जांच अधिकारी के आने तक परीक्षा कक्ष की स्थिति ऐसी हो जाती है, जैसे इससे अधिक सभ्य न तो कोई परीक्षा कक्ष होंगे और न ही परीक्षार्थी। और जांच अधिकारी के जाने के बाद जैसे ही अध्यापक संकेत देते हैं, वैसे ही पुनः नक़ल-नारायण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इन सब वितंडों के दौरान सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि जो कुछ एक काबिल और परिश्रम  से पढ़े हुए परीक्षार्थी होते हैं, वे भी परिक्षायोग्य वातावरण के अभाव में ठीक ढंग से परीक्षा नहीं दे पाते। यह स्थिति न केवल शर्मनाक और चिंताजनक है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के सम्बन्ध में भयभीत भी करती है।
अमर उजाला 
 
  नक़ल की इस समस्या का सबसे बड़ा कारण तो खैर विद्यार्थियों में मौजूद वह मानसिकता है, जो उन्हें परिश्रम से बचने या शॉर्टकट से सफलता पाने के अनुचित सिद्धांत का रास्ता दिखाती है। लेकिन इसके बावजूद सब दोष विद्यार्थियों को नहीं दे सकते। कारण कि हमारे विद्यालय उनको उस स्तर की शिक्षा भी तो नहीं दे पाते कि वे बिना नक़ल के परीक्षा में बैठकर अच्छे से उत्तीर्ण हो सकें। अगर विद्यालय उन्हें समुचित ढंग से शिक्षा दे तो शायद उन्हें नक़ल की आवश्यकता ही न महसूस हो। मूल बात जिम्मेदारी की है कि यदि विद्यालय, अभिभावक तदुपरांत विद्यार्थी सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारी को समझ लें तो नक़ल की यह समस्या स्वतः समाप्त हो जाएगी।   
  संदेह नहीं कि  परीक्षाओं में नक़ल की इस समस्या से सर्वाधिक प्रभावित राज्य यूपी और बिहार हैं। मध्य प्रदेश भी अब धीरे-धीरे इस कतार में शामिल होता जा रहा है। यूपी-बिहार में तो आलम ये है कि इन राज्यों के नकलची विद्यार्थी इस आधार पर साल भर आश्वस्त रहते हैं कि पढ़ें या न पढ़ें क्या फर्क पड़ता है! राज्य में फलां पार्टी की सरकार है, फिर उत्तीर्ण तो हो ही जाएंगे। वैसे, नकलचियों की इस सोच में काफी हद तक सच्चाई भी है क्योंकि, इन राज्यों की सरकारों द्वारा जब-तब बोर्ड परीक्षाओं में ढिलाई बरतते हुए नक़ल की छूट दे-देकर ही नकलची विद्यार्थियों के दिमाग में ऐसी सोच को स्थापित किया गया है। यहाँ तक कि राजनीतिक दलों का यह भी एक गुप्त चुनावी एजेंडा ही होता है कि हमारी सरकार आई तो नक़ल की छूट रहेगी। बेशक यह सवाल उठाया जा सकता है कि एक सरकार कैसे नक़ल जैसी चीज पर विराम लगा सकती है ? यह भी कहा जा सकता है कि नक़ल सरकार की कोशिश से नहीं, अभिभावकों और विद्यालयों की मजबूत इच्छाशक्ति से रुकेगी। यह बातें एक हद तक सही हैं, लेकिन हमें मानना होगा कि सरकार बहुत शक्तिशाली होती है। उसके पास शक्ति और संसाधन होते हैं और अगर वह ठान ले तो नक़ल पर भी नियंत्रण कर सकती है। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय होगा कि १९९२ में नक़ल को लेकर यूपी बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में सरकार द्वारा बेहद कड़ाई दिखाई गई थी, जिसका परिणाम यह सामने आया था कि लड़का-लड़की मिलाकर केवल १४.७० प्रतिशत विद्यार्थी ही उस वर्ष परीक्षा में उत्तीर्ण हो सके। उस वर्ष के बाद अगले कई वर्षों तक वो कड़ाई जारी रही और उत्तीर्णता प्रतिशत का ग्राफ बहुत ऊपर नहीं उठ सका। कहने का अर्थ यही है कि सरकार चाहे तो नक़ल पर नियंत्रण कर सकती है, बशर्ते कि वो इस सम्बन्ध में दृढ इच्छाशक्ति का परिचय दे। नक़ल के सम्बन्ध में दंड के नियम कड़े किए जाएं जैसे कि नक़ल होते पाए जाने पर न केवल विद्यार्थी बल्कि विद्यालय पर भी कड़ी कार्रवाई हो। हर जगह निगरानी की व्यवस्था रहे। निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरा आदि अत्याधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया जा सकता है। सरकार यदि करना चाहे तो ऐसे और भी बहुत से तरीके हैं, जिनसे नक़ल पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

आतंकवाद पर अमेरिकी नूरा-कुश्ती [पंजाब केसरी और दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

पंजाब केसरी 
ये विडम्बना ही है कि एक तरफ अमेरिकी जेल में बंद आतंकी हेडली द्वारा २६/११ हमले की ऑनलाइन पूछताछ में भारत के समक्ष पाकिस्तान पोषित आतंकवाद की पोल खोली जा रही थी, तो वहीँ दूसरी तरफ अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर ८६० मिलियन डॉलर की मदद समेत अमेरिकी वायुसेना द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एफ-१६ जैसा  अत्याधुनिक लड़ाकू विमान देने की कवायद कर रहा था। यह लड़ाकू विमान पाकिस्तान को बेचे जाने के प्रस्ताव का अमेरिकी रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दलों के प्रभावशाली सांसदों द्वारा विरोध किया गया तथा इधर भारत ने भी अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा को तलब कर इस सम्बन्ध में अपनी नाखुशी जाहिर की, लेकिन इन सब विरोधों को नज़रंदाज़ कर ओबामा प्रशासन ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ा दिया। इस सम्बन्ध में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कांग्रेस को अधिसूचित किया है कि वह पाकिस्तान सरकार को एफ-१६ ब्लॉक ५२ विमान, उपकरण, प्रशिक्षण और साजो सामान से जुड़ी संभावित विदेशी सैन्य बिक्री करने को मंजूरी दे रहा है। हालांकि  अभी यह प्रस्ताव कांग्रेस के पास जाएगा और वहां से मंजूरी के बाद ही आगे बढ़ सकेगा। कांग्रेस की आपत्ति की स्थिति में प्रक्रियाएं बेहद जटिल हो जाएंगी और मामला लम्बा खींचने की स्थिति में आ जाएगा।  अतः कह सकते हैं कि प्रक्रियाओं के दृष्टिकोण से पाकिस्तान को अभी यह विमान बेचने का रास्ता ओबामा प्रशासन के लिए साफ़ नहीं हुआ है लेकिन, यहाँ सवाल विमानों के बिकने से अधिक अमेरिका की नीयत का है। सवाल यह कि अमेरिका के सामने जब अनेक माध्यमों से यह बात आती रही है और अमेरिका खुद कई दफे इस बात को स्वीकार भी चुका है कि पाकिस्तान आतंकवाद के नाम पर मिल रही अमेरिकी मदद का इस्तेमाल आतंकियों के संरक्षण और संवर्द्धन तथा भारत विरोधी अभियानों में करता है,  इसके बावजूद वह पाकिस्तान को एफ-१६ जैसा अत्याधुनिक विमान देने का फैसला कैसे कर सकता है ? सामरिक विशेषज्ञों का मत है कि आम तौर पर एफ-१६ को आतंकवाद से लड़ाई के लिए प्रयोग भी नहीं किया जाता है, इसका प्रयोग विशेष रूप से दो देशों के बीच होने वाले युद्धों में ही होता है। फिर इस विमान का पाकिस्तान की आतंक विरोधी लड़ाई में क्या काम जो ओबामा प्रशासन अपने सांसदों के विरोध को नज़रन्दाज करके भी यह विमान पाकिस्तान को देने पर अड़ा हुआ है ? ये प्रश्न कहीं न कहीं आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में अमेरिकी निष्ठा पर गहरे सवाल खड़े करते हैं और अमेरिका पर लगने वाले इस पुराने आरोप को बल देते हैं कि अमेरिका की आतंकवाद से लड़ाई सिर्फ एक नूरा-कुश्ती ही है, जिसके तहत पहले वो आतंकी पैदा करता है, उनका पोषण करता है और फिर जब वे उसे ही चुनौती देने लगते हैं तो उन्हें मिटा देता है। 
दैनिक जागरण 
      एक तथ्य यह भी गौर करने लायक है कि अभी भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब फ़्रांसिसी राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलांद भारत आए थे तो भारत और फ़्रांस के बीच   राफेल जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान जो फ़्रांसिसी सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं, की खरीद के समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते के तहत फ़्रांस से भारत को १२६ राफेल विमान मिलने हैं जो कुछ प्रक्रियाओं के बाद मिल जाएंगे। यूँ तो अभी भी भारतीय वायुसेना के समक्ष पाकिस्तानी वायुसेना कहीं नहीं ठहरती, तिसपर राफेल के भारतीय वायुसेना में शामिल होने के बाद तो भारतीय वायुसेना की ताकत और बढ़ जाएगी। अब चूंकि, भारत ने ऐसे अत्याधुनिक विमानों की खरीद के लिए रूस और अमेरिका को छोड़ फ़्रांस को चुना तो पूरी संभावना है कि अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को एफ-१६ बेचने के निर्णय के जरिये कहीं न कहीं भारत के राफेल सौदे का जवाब देने की भी एक कोशिश की गई है। तभी तो ओबामा प्रशासन अपने सांसदों के विरोध तक को नज़रंदाज़ कर रहा है, अन्यथा पाकिस्तान को मदद देना ऐसा कोई विषय नहीं है जिसको टाला या परिवर्तित न किया जा सके। लेकिन ऐसा किया जा रहा है तो इसके पीछे कहीं न कहीं अमेरिका द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से भारत को यह सन्देश देने या ब्लैकमेल करने की कोशिश है कि अगर तुम हमारी साझीदारी नहीं चुनोगे तो हम पाकिस्तान को साझीदार बना लेंगे। दरअसल शुरूआती समय में भारत का केवल एक रक्षा सहयोगी था - रूस। मनमोहन सरकार के कार्यकाल में इस स्थिति में परिवर्तन आया और रूस के साथ अमेरिका भी भारत की प्राथमिकता में आ गया। हालांकि इस अवधि में अमेरिका से भारत ने अधिकांशतः सिर्फ कागज़ी समझौते ही किए, जमीन पर उसे अमेरिका से कोई विशेष लाभ नहीं मिला।  लेकिन वर्ष २०१४ में मोदी सरकार के आने के बाद जब देश का नेतृत्व बदला तो धीरे-धीरे नीति में भी परिवर्तन आया। अब भारत रक्षा सहयोग के मामले में रूस और अमेरिका तक केन्द्रित रहने की बजाय बहुविकल्पीय नीति पर चलने लगा है। अब उसने फ़्रांस, इजरायल, आदि देशों की तरफ भी अपना ध्यान केन्द्रित किया है। निष्कर्ष यह कि वर्तमान में भारत कई राष्ट्रों से रक्षा सहयोग लेने लगा है जिससे भारत के बाजार से अमेरिका का वर्चस्व कम हुआ है। अब भारत जैसे बड़े बाजार में अपने अधिकार कम होने की यह बात अमेरिका को निश्चित ही खटक रही होगी, जिस खटक को भारत-फ़्रांस के हालिया राफेल समझौते ने और बढ़ा दिया। संभवतः इसीका परिणाम है  कि वो तमाम विरोधों के बावजूद पाकिस्तान को एफ-१६ बेचने पर उतारू है। लेकिन, अपनी इस हठधर्मिता के अन्धोत्साह में अमेरिका संभवतः यह नहीं समझ पा रहा कि उसकी ये गतिविधियाँ और कुछ करें न करें, पर दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ का माहौल ज़रूर पैदा करेंगी। अगर उसे लगता है कि पाकिस्तान को एफ-१६ देकर वो उसे भारत के बराबर शक्तिशाली बना देगा या भारत को इससे अपनी तरफ झुका लेगा तो वो बड़े मुगालते में है। उसे समझना होगा कि अब भारत पहले की तरह दूसरों पर निर्भर रहने वाली स्थिति से बाहर आकर एक सशक्त और समर्थ राष्ट्र बन चुका है और वो अब अगर किसीको दबाएगा नहीं तो किसीसे दबेगा भी नहीं। रही बात पाकिस्तान की तो वो भारत के समक्ष सामजिक, आर्थिक और राजनीतिक  से लेकर सैन्य व्यवस्था तक किसी भी स्तर पर कहीं नहीं ठहरता। इसलिए पाकिस्तान को ताकत देकर अमेरिका सिर्फ और सिर्फ दक्षिण एशिया का माहौल और अपनी छवि ही ख़राब करेगा। इससे सीधे-सीधे भारत को कोई समस्या नहीं होने वाली है।

       वैसे, मौजूदा स्थिति के मद्देनज़र भारत को चाहिए कि वो अबसे पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के सम्बन्ध में अमेरिका से शिकायत करने की नीति को ख़त्म करे। निश्चित ही मोदी सरकार के आने के बाद से पाकिस्तान के सम्बन्ध में भारत की अमेरिका परस्ती में कमी  आई है, लेकिन उचित होगा कि इसे पूरी तरह से ख़त्म किया जाय। भारत, पाकिस्तान और उसके आतंकवाद दोनों से निपटने में खुद ही सक्षम है, इसलिए उसकी शिकायतें अमेरिका से करना बंद करे और अपने स्तर पर जो कर सकता है, कार्रवाई करे। भारत की अमेरिका सम्बन्धी नीति यह हो कि अमेरिका को पाक तथा रक्षा सहयोग के सम्बन्ध में किसी भी विषय में आवश्यकता से अधिक  महत्व न दिया जाय। भारत के पास आज रक्षा सहयोगियों की कोई कमी नहीं है, इसलिए इस सम्बन्ध में अमेरिका को कोई विशेष तवज्जो न दे। भारत इस नीति पर चले तो अमेरिका खुद अपनी सारी अकड़ भूल भारत की तरफ आएगा क्योंकि, भारत का बाजार उसकी ज़रुरत है और इसे वो छोड़ नहीं सकता।