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शुक्रवार, 11 मार्च 2016

बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल पर नकेल कब [अमर उजाला कॉम्पैक्ट और पंजाब केसरी में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

पंजाब केसरी 
अभी देश में बोर्ड परीक्षाओं का मौसम है। यूपी आदि कई एक राज्यों में परीक्षाएं हो गई हैं तो कुछ में हो रही हैं और कुछ में आगे होनी हैं। लेकिन, हर वर्ष की तरह ही इस वर्ष भी बोर्ड परीक्षाओं में जिस बात को लेकर सर्वाधिक चर्चा है, वो है इनमे होने वाली नक़ल। प्रत्येक वर्ष राज्य सरकारों और राज्य के शिक्षा बोर्ड द्वारा यह कहा जाता है कि वो नक़ल रहित और प्रमाणिक परीक्षा करवाने के लिए पूरी व्यवस्था करेंगे लेकिन, उनकी ये व्यवस्था सिर्फ ढांक के तीन पात ही साबित होती है। नक़ल कभी नहीं रूकती। इस साल भी बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल को लेकर कई तस्वीरें सामने आई हैं। यूपी सरकार के नक़ल पर सख्ती के तमाम दावों के बावजूद वहां के कई परीक्षा केन्द्रों में कहीं दीवारों पर चढ़कर तो कहीं खिडकियों आदि के जरिये लोग अपने बच्चों को नक़ल कराते दिखे तो कई एक परीक्षा केन्द्रों पर खुलेआम छात्र-छात्राओं द्वारा किताब से देखकर नक़ल करने की तस्वीरें भी सामने आई। एक आंकड़े के मुताबिक़ यूपी बोर्ड की इंटर की परीक्षा के पहले ही दिन २७६ नकलची छात्रों को पकड़ा गया। कहना न होगा कि यह अभी  सिर्फ पकड़े गए छात्रों की संख्या है, अनगिनत छात्र ऐसे होंगे जो जम के नक़ल करने बावजूद पकड़ में नहीं आ पाए होंगे। बिहार की बात करें तो वो तो खैर नक़ल के लिए बदनाम ही रहा है। विगत वर्ष बिहार में दसवीं की बोर्ड परीक्षा में नक़ल का ऐसा हल्ला मचा कि वहां के तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने यह तक कह दिया कि नक़ल रोकना उनके बस की बात नहीं, जिसपर उन्हें उच्च न्यायालय से फटकार भी सुननी पड़ी थी। हालांकि पिछले साल से कुछ सबक लेते हुए इस साल बिहार सरकार वहां नक़ल पर नकेल कसने के लिए पूरा जोर लगाने का दावा किया और इस वर्ष की परीक्षाओं में संभवतः इसका कुछ असर भी दिखा लेकिन, फिर भी बिहार में कई एक जगहों पर नक़ल करते हुए विद्यार्थी पकड़े गए। समझा जा सकता है कि यहाँ भी यूपी की ही तरह बहुत से विद्यार्थी नक़ल करने के बावजूद पकड़ में नहीं आए होंगे। ऐसा नहीं है कि ये नक़ल विद्यार्थी अपने घर से छिप-छिपा के करते हैं, अधिकांश नकलची विद्यार्थियों के परिवाजनों का भी इसमे समर्थन व सहयोग होता है। अब जब अभिभावकों को ही नक़ल से कोई गुरेज नहीं तो समझा जा सकता है कि स्थिति कितनी ख़राब है। कितने विद्यार्थियों के परिवारजन तो उनका दाखिला ही यही देखकर कराते हैं कि अमुक विद्यालय में नक़ल आदि की व्यवस्था है या नहीं। परीक्षा के समय जब परीक्षा केंद्र का नाम सामने आता है तो नकलची इस फिराक में लग जाते हैं कि परीक्षा केंद्र जिस  विद्यालय में है, वहां कोई पहचान निकल जाए या नक़ल की कोई व्यवस्था हो जाय। लड़कियों को तो  में अब यह भी चिंता नहीं रहती क्योंकि, यूपी बोर्ड में उनके लिए तो स्वकेंद्र (होम सेंटर) का नियम लागू है।
  वैसे नक़ल की इस तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि विद्यार्थियों की नक़ल की आवश्यकता को देखते हुए परीक्षा केन्द्रों में नक़ल के लिए पूरा एक तंत्र बना पड़ा है। ये कहना एकदम समीचीन होगा कि परीक्षा कक्षों के भीतर नक़ल का एक पूरा बाजार ही चलता है, जहाँ विषयवार नक़ल की कीमत तय होती है, मोल-भाव होता है और परीक्षार्थी के रूप में खरीददार होते हैं। अन्दर की स्थिति कुछ यूँ होती है कि परीक्षा शुरू होने से पहले विद्यालय के कोई उच्च अधिकारी आते है और कुछ इस प्रकार की सामूहिक उद्घोषणा करते हैं कि अगर परीक्षा उत्तीर्ण करनी है तो इतना ‘व्यवस्था शुल्क’ देना पड़ेगा। अब जिन परीक्षार्थियों ने व्यवस्था शुल्क जो प्रायः विषय की कठिनता पर निर्भर करता है, दे दिया, उनके लिए तुरंत नक़ल सामग्री आने लगती है और सम्बंधित विषय के अध्यापक प्रश्नों को बोलकर भी हल कराने लगते हैं आदि इत्यादि तमाम व्यवस्थाओं के जरिये नक़ल प्रक्रिया चल निकलती है। व्यवस्था शुल्क अदा किए सब परीक्षार्थी एक ही जगह झुण्ड में होकर नक़ल पर्चियों का लाभ लेने लगते हैं। ऐसे में यदि बोर्ड से किसी जांच अधिकारी के केंद्र पर आने की सूचना मिले तो   फिर तो परीक्षा कक्ष में ऐसी भगदड़ मचती है कि जैसे ये परीक्षा कक्ष नहीं, कोई युद्ध का मैदान हो। जिन परीक्षार्थियों के पास नक़ल की पर्चियां आदि होती हैं, वे उन्हें अध्यापकों के पूर्व निर्देशानुसार मुहँ के हवाले कर लेते हैं। कुछ इधर-उधर फेंक देते हैं। कुल मिलाकर जांच अधिकारी के आने तक परीक्षा कक्ष की स्थिति ऐसी हो जाती है, जैसे इससे अधिक सभ्य न तो कोई परीक्षा कक्ष होंगे और न ही परीक्षार्थी। और जांच अधिकारी के जाने के बाद जैसे ही अध्यापक संकेत देते हैं, वैसे ही पुनः नक़ल-नारायण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इन सब वितंडों के दौरान सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि जो कुछ एक काबिल और परिश्रम  से पढ़े हुए परीक्षार्थी होते हैं, वे भी परिक्षायोग्य वातावरण के अभाव में ठीक ढंग से परीक्षा नहीं दे पाते। यह स्थिति न केवल शर्मनाक और चिंताजनक है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के सम्बन्ध में भयभीत भी करती है।
अमर उजाला 
 
  नक़ल की इस समस्या का सबसे बड़ा कारण तो खैर विद्यार्थियों में मौजूद वह मानसिकता है, जो उन्हें परिश्रम से बचने या शॉर्टकट से सफलता पाने के अनुचित सिद्धांत का रास्ता दिखाती है। लेकिन इसके बावजूद सब दोष विद्यार्थियों को नहीं दे सकते। कारण कि हमारे विद्यालय उनको उस स्तर की शिक्षा भी तो नहीं दे पाते कि वे बिना नक़ल के परीक्षा में बैठकर अच्छे से उत्तीर्ण हो सकें। अगर विद्यालय उन्हें समुचित ढंग से शिक्षा दे तो शायद उन्हें नक़ल की आवश्यकता ही न महसूस हो। मूल बात जिम्मेदारी की है कि यदि विद्यालय, अभिभावक तदुपरांत विद्यार्थी सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारी को समझ लें तो नक़ल की यह समस्या स्वतः समाप्त हो जाएगी।   
  संदेह नहीं कि  परीक्षाओं में नक़ल की इस समस्या से सर्वाधिक प्रभावित राज्य यूपी और बिहार हैं। मध्य प्रदेश भी अब धीरे-धीरे इस कतार में शामिल होता जा रहा है। यूपी-बिहार में तो आलम ये है कि इन राज्यों के नकलची विद्यार्थी इस आधार पर साल भर आश्वस्त रहते हैं कि पढ़ें या न पढ़ें क्या फर्क पड़ता है! राज्य में फलां पार्टी की सरकार है, फिर उत्तीर्ण तो हो ही जाएंगे। वैसे, नकलचियों की इस सोच में काफी हद तक सच्चाई भी है क्योंकि, इन राज्यों की सरकारों द्वारा जब-तब बोर्ड परीक्षाओं में ढिलाई बरतते हुए नक़ल की छूट दे-देकर ही नकलची विद्यार्थियों के दिमाग में ऐसी सोच को स्थापित किया गया है। यहाँ तक कि राजनीतिक दलों का यह भी एक गुप्त चुनावी एजेंडा ही होता है कि हमारी सरकार आई तो नक़ल की छूट रहेगी। बेशक यह सवाल उठाया जा सकता है कि एक सरकार कैसे नक़ल जैसी चीज पर विराम लगा सकती है ? यह भी कहा जा सकता है कि नक़ल सरकार की कोशिश से नहीं, अभिभावकों और विद्यालयों की मजबूत इच्छाशक्ति से रुकेगी। यह बातें एक हद तक सही हैं, लेकिन हमें मानना होगा कि सरकार बहुत शक्तिशाली होती है। उसके पास शक्ति और संसाधन होते हैं और अगर वह ठान ले तो नक़ल पर भी नियंत्रण कर सकती है। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय होगा कि १९९२ में नक़ल को लेकर यूपी बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में सरकार द्वारा बेहद कड़ाई दिखाई गई थी, जिसका परिणाम यह सामने आया था कि लड़का-लड़की मिलाकर केवल १४.७० प्रतिशत विद्यार्थी ही उस वर्ष परीक्षा में उत्तीर्ण हो सके। उस वर्ष के बाद अगले कई वर्षों तक वो कड़ाई जारी रही और उत्तीर्णता प्रतिशत का ग्राफ बहुत ऊपर नहीं उठ सका। कहने का अर्थ यही है कि सरकार चाहे तो नक़ल पर नियंत्रण कर सकती है, बशर्ते कि वो इस सम्बन्ध में दृढ इच्छाशक्ति का परिचय दे। नक़ल के सम्बन्ध में दंड के नियम कड़े किए जाएं जैसे कि नक़ल होते पाए जाने पर न केवल विद्यार्थी बल्कि विद्यालय पर भी कड़ी कार्रवाई हो। हर जगह निगरानी की व्यवस्था रहे। निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरा आदि अत्याधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया जा सकता है। सरकार यदि करना चाहे तो ऐसे और भी बहुत से तरीके हैं, जिनसे नक़ल पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

आतंकवाद पर अमेरिकी नूरा-कुश्ती [पंजाब केसरी और दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

पंजाब केसरी 
ये विडम्बना ही है कि एक तरफ अमेरिकी जेल में बंद आतंकी हेडली द्वारा २६/११ हमले की ऑनलाइन पूछताछ में भारत के समक्ष पाकिस्तान पोषित आतंकवाद की पोल खोली जा रही थी, तो वहीँ दूसरी तरफ अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर ८६० मिलियन डॉलर की मदद समेत अमेरिकी वायुसेना द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एफ-१६ जैसा  अत्याधुनिक लड़ाकू विमान देने की कवायद कर रहा था। यह लड़ाकू विमान पाकिस्तान को बेचे जाने के प्रस्ताव का अमेरिकी रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दलों के प्रभावशाली सांसदों द्वारा विरोध किया गया तथा इधर भारत ने भी अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा को तलब कर इस सम्बन्ध में अपनी नाखुशी जाहिर की, लेकिन इन सब विरोधों को नज़रंदाज़ कर ओबामा प्रशासन ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ा दिया। इस सम्बन्ध में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कांग्रेस को अधिसूचित किया है कि वह पाकिस्तान सरकार को एफ-१६ ब्लॉक ५२ विमान, उपकरण, प्रशिक्षण और साजो सामान से जुड़ी संभावित विदेशी सैन्य बिक्री करने को मंजूरी दे रहा है। हालांकि  अभी यह प्रस्ताव कांग्रेस के पास जाएगा और वहां से मंजूरी के बाद ही आगे बढ़ सकेगा। कांग्रेस की आपत्ति की स्थिति में प्रक्रियाएं बेहद जटिल हो जाएंगी और मामला लम्बा खींचने की स्थिति में आ जाएगा।  अतः कह सकते हैं कि प्रक्रियाओं के दृष्टिकोण से पाकिस्तान को अभी यह विमान बेचने का रास्ता ओबामा प्रशासन के लिए साफ़ नहीं हुआ है लेकिन, यहाँ सवाल विमानों के बिकने से अधिक अमेरिका की नीयत का है। सवाल यह कि अमेरिका के सामने जब अनेक माध्यमों से यह बात आती रही है और अमेरिका खुद कई दफे इस बात को स्वीकार भी चुका है कि पाकिस्तान आतंकवाद के नाम पर मिल रही अमेरिकी मदद का इस्तेमाल आतंकियों के संरक्षण और संवर्द्धन तथा भारत विरोधी अभियानों में करता है,  इसके बावजूद वह पाकिस्तान को एफ-१६ जैसा अत्याधुनिक विमान देने का फैसला कैसे कर सकता है ? सामरिक विशेषज्ञों का मत है कि आम तौर पर एफ-१६ को आतंकवाद से लड़ाई के लिए प्रयोग भी नहीं किया जाता है, इसका प्रयोग विशेष रूप से दो देशों के बीच होने वाले युद्धों में ही होता है। फिर इस विमान का पाकिस्तान की आतंक विरोधी लड़ाई में क्या काम जो ओबामा प्रशासन अपने सांसदों के विरोध को नज़रन्दाज करके भी यह विमान पाकिस्तान को देने पर अड़ा हुआ है ? ये प्रश्न कहीं न कहीं आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में अमेरिकी निष्ठा पर गहरे सवाल खड़े करते हैं और अमेरिका पर लगने वाले इस पुराने आरोप को बल देते हैं कि अमेरिका की आतंकवाद से लड़ाई सिर्फ एक नूरा-कुश्ती ही है, जिसके तहत पहले वो आतंकी पैदा करता है, उनका पोषण करता है और फिर जब वे उसे ही चुनौती देने लगते हैं तो उन्हें मिटा देता है। 
दैनिक जागरण 
      एक तथ्य यह भी गौर करने लायक है कि अभी भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब फ़्रांसिसी राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलांद भारत आए थे तो भारत और फ़्रांस के बीच   राफेल जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान जो फ़्रांसिसी सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं, की खरीद के समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते के तहत फ़्रांस से भारत को १२६ राफेल विमान मिलने हैं जो कुछ प्रक्रियाओं के बाद मिल जाएंगे। यूँ तो अभी भी भारतीय वायुसेना के समक्ष पाकिस्तानी वायुसेना कहीं नहीं ठहरती, तिसपर राफेल के भारतीय वायुसेना में शामिल होने के बाद तो भारतीय वायुसेना की ताकत और बढ़ जाएगी। अब चूंकि, भारत ने ऐसे अत्याधुनिक विमानों की खरीद के लिए रूस और अमेरिका को छोड़ फ़्रांस को चुना तो पूरी संभावना है कि अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को एफ-१६ बेचने के निर्णय के जरिये कहीं न कहीं भारत के राफेल सौदे का जवाब देने की भी एक कोशिश की गई है। तभी तो ओबामा प्रशासन अपने सांसदों के विरोध तक को नज़रंदाज़ कर रहा है, अन्यथा पाकिस्तान को मदद देना ऐसा कोई विषय नहीं है जिसको टाला या परिवर्तित न किया जा सके। लेकिन ऐसा किया जा रहा है तो इसके पीछे कहीं न कहीं अमेरिका द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से भारत को यह सन्देश देने या ब्लैकमेल करने की कोशिश है कि अगर तुम हमारी साझीदारी नहीं चुनोगे तो हम पाकिस्तान को साझीदार बना लेंगे। दरअसल शुरूआती समय में भारत का केवल एक रक्षा सहयोगी था - रूस। मनमोहन सरकार के कार्यकाल में इस स्थिति में परिवर्तन आया और रूस के साथ अमेरिका भी भारत की प्राथमिकता में आ गया। हालांकि इस अवधि में अमेरिका से भारत ने अधिकांशतः सिर्फ कागज़ी समझौते ही किए, जमीन पर उसे अमेरिका से कोई विशेष लाभ नहीं मिला।  लेकिन वर्ष २०१४ में मोदी सरकार के आने के बाद जब देश का नेतृत्व बदला तो धीरे-धीरे नीति में भी परिवर्तन आया। अब भारत रक्षा सहयोग के मामले में रूस और अमेरिका तक केन्द्रित रहने की बजाय बहुविकल्पीय नीति पर चलने लगा है। अब उसने फ़्रांस, इजरायल, आदि देशों की तरफ भी अपना ध्यान केन्द्रित किया है। निष्कर्ष यह कि वर्तमान में भारत कई राष्ट्रों से रक्षा सहयोग लेने लगा है जिससे भारत के बाजार से अमेरिका का वर्चस्व कम हुआ है। अब भारत जैसे बड़े बाजार में अपने अधिकार कम होने की यह बात अमेरिका को निश्चित ही खटक रही होगी, जिस खटक को भारत-फ़्रांस के हालिया राफेल समझौते ने और बढ़ा दिया। संभवतः इसीका परिणाम है  कि वो तमाम विरोधों के बावजूद पाकिस्तान को एफ-१६ बेचने पर उतारू है। लेकिन, अपनी इस हठधर्मिता के अन्धोत्साह में अमेरिका संभवतः यह नहीं समझ पा रहा कि उसकी ये गतिविधियाँ और कुछ करें न करें, पर दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ का माहौल ज़रूर पैदा करेंगी। अगर उसे लगता है कि पाकिस्तान को एफ-१६ देकर वो उसे भारत के बराबर शक्तिशाली बना देगा या भारत को इससे अपनी तरफ झुका लेगा तो वो बड़े मुगालते में है। उसे समझना होगा कि अब भारत पहले की तरह दूसरों पर निर्भर रहने वाली स्थिति से बाहर आकर एक सशक्त और समर्थ राष्ट्र बन चुका है और वो अब अगर किसीको दबाएगा नहीं तो किसीसे दबेगा भी नहीं। रही बात पाकिस्तान की तो वो भारत के समक्ष सामजिक, आर्थिक और राजनीतिक  से लेकर सैन्य व्यवस्था तक किसी भी स्तर पर कहीं नहीं ठहरता। इसलिए पाकिस्तान को ताकत देकर अमेरिका सिर्फ और सिर्फ दक्षिण एशिया का माहौल और अपनी छवि ही ख़राब करेगा। इससे सीधे-सीधे भारत को कोई समस्या नहीं होने वाली है।

       वैसे, मौजूदा स्थिति के मद्देनज़र भारत को चाहिए कि वो अबसे पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के सम्बन्ध में अमेरिका से शिकायत करने की नीति को ख़त्म करे। निश्चित ही मोदी सरकार के आने के बाद से पाकिस्तान के सम्बन्ध में भारत की अमेरिका परस्ती में कमी  आई है, लेकिन उचित होगा कि इसे पूरी तरह से ख़त्म किया जाय। भारत, पाकिस्तान और उसके आतंकवाद दोनों से निपटने में खुद ही सक्षम है, इसलिए उसकी शिकायतें अमेरिका से करना बंद करे और अपने स्तर पर जो कर सकता है, कार्रवाई करे। भारत की अमेरिका सम्बन्धी नीति यह हो कि अमेरिका को पाक तथा रक्षा सहयोग के सम्बन्ध में किसी भी विषय में आवश्यकता से अधिक  महत्व न दिया जाय। भारत के पास आज रक्षा सहयोगियों की कोई कमी नहीं है, इसलिए इस सम्बन्ध में अमेरिका को कोई विशेष तवज्जो न दे। भारत इस नीति पर चले तो अमेरिका खुद अपनी सारी अकड़ भूल भारत की तरफ आएगा क्योंकि, भारत का बाजार उसकी ज़रुरत है और इसे वो छोड़ नहीं सकता। 

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

बुलेट ट्रेन से पहले वर्तमान रेल व्यवस्था सुधारें [पंजाब केसरी और राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

पंजाब केसरी 
आज से दो वर्ष पहले भारतीय रेल मंत्रालय और जापानी इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जे आई सी ए) द्वारा भारत में मुंबई-अहमदाबाद रूट पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बुलेट ट्रेन चलाने के सम्बन्ध में विभिन्न पहलुओं का  अध्ययन शुरू किया गया था जिसकी रिपोर्ट इस वर्ष जुलाई में भारत सरकार को सौंपी गई। रिपोर्ट में बुलेट ट्रेन में आने वाली लागत से लेकर अन्य तमाम चीजों का जिक्र करते हुए कहा गया था कि इस रूट पर जापान की शिकान्सेन (बुलेट ट्रेन ट्रैक) की तर्ज पर हाईस्पीड ट्रेन चलाई जा सकती है। इसके बाद ही अब जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत आए तो भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके द्वारा हाईस्पीड रेल (एचएसआर)  समझौते पर हस्ताक्षर कर इसके सम्बन्ध में विभिन्न ऐलान किए गए। सबसे महत्वपूर्ण ऐलान यह रहा कि जापान द्वारा भारत को बुलेट ट्रेन के लिए अपने कर्ज नियमों में ढील बरतते हुए ०.१ प्रतिशत की बेहद सस्ती दर पर ५० साल जैसी लम्बी अवधि के लिए लगभग ९८००० करोड़ रूपये का क़र्ज़ दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त इस परियोजना में लगने वाले उपकरण और तकनीक तथा इसके संचालन के लिए भारतीय कर्मियों को प्रशिक्षण आदि भी जापानी अभियंताओं द्वारा ही दिया जाएगा। इस परियोजना के पूरा होने के लिए करीब सात साल का समय निर्धारित किया गया है यानी २०२३ तक देश की पहली बुलेट ट्रेन के तैयार हो जाने का अनुमान है, जबकि २०२४ से इसका व्यावसायिक संचालन भी शुरू किया जा सकेगा। स्पष्ट है कि ये सब अभी बेहद दूर की बातें हैं, लिहाजा इनपर अधिक कुछ कहना जल्दबाजी होगी।  हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर आम लोगों में भी अलग-अलग राय है। कोई इसे समय की मांग बता रहा है तो किसीके हिसाब से यह सब अभी गैरजरूरी है। अब जो भी हो, पर एक प्रश्न तो खैर उठता ही है कि वर्तमान समय में जब भारतीय रेल अनेक चुनौतियों, खासकर वित्तीय चुनौतियों से गुजर रही है, बुलेट ट्रेन जैसी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए इतना भारी कर्ज लेना कहाँ तक उचित है ? यह सही है कि बुलेट ट्रेन के लिए प्राप्त कर्ज भारतीय रेल के वित्त से अलग होगा, लेकिन यदि बुलेट ट्रेन की बजाय इस तरह का निवेश भारत की वर्तमान रेल व्यवस्था जो फिलवक्त देश की बहुसंख्य आबादी की जीवन रेखा जैसी है, का जीर्णोद्धार करने में किया जाता तो क्या ज्यादा बेहतर नहीं रहता ? बुलेट ट्रेन चलाना कत्तई गलत नहीं, लेकिन जब देश की सामान्य रेल व्यवस्था अनेक चुनातियों और समस्याओं से घिरी हो तब ऐसे भारी-भरकम और महंगे प्रोजेक्ट पर लगना कहाँ की बुद्धिमानी है ? दूसरे शब्दों में कहें तो मजबूत घर हो तो सजावट भी ठीक लगती है, ये नहीं कि मकान तो जर्जर हो पर रंग-रोगन खूब कर दीजिए। परिणाम यह होगा कि आंधी का एक झोका ही सब तहस-नहस कर देगा। फिर आप न इधर के रह जाएंगे न उधर के। तात्पर्य यह है कि आज बुलेट ट्रेन से पहले देश की मौजूदा रेल व्यवस्था को वित्तीय से लेकर संचालन तक तमाम चुनातियों से बाहर लाने के लिए उसमे अधिकाधिक निवेश बढ़ाने और ध्यान देने की जरूरत है।
राष्ट्रीय सहारा 
  इसी सन्दर्भ में अगर देश की मौजूदा रेल व्यवस्था की समस्याओं को समझने का प्रयत्न करें तो उल्लेखनीय होगा कि मौजूदा केन्द्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने अपने २०१५-१६ के रेल बजट भाषण के दौरान खुद रेलवे को तमाम समस्याओं से घिरा बताते हुए इसके लिए प्रमुख कारण लम्बे समय से हो रही निवेश की कमी को बताया था। समस्याओं में सबसे प्रमुख है, अक्सर होते रहने वाली रेल दुर्घटनाएं  जिसके लिए अनेक कारण जिम्मेदार  हैं। एक आंकड़ें के अनुसार फिलहाल रेलवे का लगभग ८० फीसदी यातायात महज ४० फीसदी रेल नेटवर्क के भरोसे चल रहा है जिससे भीड़-भगदड़ और असुरक्षा जैसी समस्याओं से रेलवे को दो-चार होना पड़ता है। यह क्षमता से अधिक का बोझ बड़ा कारण है रेल दुर्घटनाओं के लिए। इसके अतिरिक्त अधिकांश रेल पटरियों की हालत भी जर्जर हो चुकी है जो कि अक्सर दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं। इन रेल पटरियों के जीर्णोद्धार तथा रेल दुर्घटनाओं को रोकने के लिए अत्याधुनिक सिग्नल व्यवस्था आदि को लागू करने के लिए रेल मंत्री द्वारा बजट में तकरीबन १ लाख २७ हजार करोड़ रूपये के निवेश का प्रस्ताव किया गया था जिसके लिए रेलवे की निर्भरता अपने संसाधनों तथा निजी क्षेत्र पर है। रेल दुर्घटनाओं के अतिरिक्त साफ़-सफाई, गाड़ियों और स्टेशनों की संख्या बढ़ाने आदि के लिए भी धन की आवश्यकता है। बजट के आंकड़ों के अनुसार रेलवे की स्थिति तो घाटे में चल रही है और निजी क्षेत्र से रेलवे को कभी तय लक्ष्यों के अनुरूप सहयोग नहीं मिला है, लिहाजा उसकी तरफ से भी कोई विशेष उम्मीद नहीं की जा सकती। ये समस्याएं पैदा हुई हैं क्योंकि काफी लम्बे समय से रेल किराए में कोई वृद्धि नहीं की गई थी और सुविधाएं दी जाती रहीं थी। आंकड़े के मुताबिक़ २००१-०२ में रेलवे जब  यात्री गाड़ियों की संख्या ८८९७ थी तब उनपर होने वाला घाटा ४९५५ करोड़ था और आज जब गाड़ियां बढ़कर १२ हजार से ऊपर हो गई हैं तो उन पर रेलवे का घाटा भी २५ हजार करोड़ के आसपास पहुँच गया है। स्पष्ट है कि लम्बे समय से चले वित्तीय कुप्रबंधन ने रेलवे जैसे लाभकारी क्षेत्र का वित्तीय ढांचा तबाह करके रख दिया है। अब एकाध वर्षों से किरायों में वृद्धि आदि करके स्थिति नियंत्रित करने की कोशिश तो की जा रही है, लेकिन इन सब कवायदों का लाभ धीरे-धीरे ही मिलेगा। ऐसे में वर्तमान रेल व्यवस्था में जान फूंकने और उपर्युक्त समस्याओं से पार पाने के लिए रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने अगले पांच साल की अपनी कार्ययोजना में ८ लाख ५६ हजार करोड़ के निवेश की जो योजना संसद में पेश की थी, उसके क्रियान्वयन के लिए रेलवे को धन के बाह्य स्रोतों पर ही काफी हद तक निर्भर रहना होगा जिनमे निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश प्रमुख हैं। स्पष्ट होता है कि रेलवे के लिए ये समय अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। अब जब देश की रेल व्यवस्था की यह हालत है तो क्या सरकार  को बुलेट ट्रेन की बजाय रेलवे की इन व्यवस्थाओं को सुधारने में विदेशी निवेश को प्राथमिकता देने की आवश्यकता नहीं है ? कितनी बड़ी विडंबना है कि अभी जो देश सामान्य रफ़्तार की ट्रेनों की दुर्घटनाओं को रोकने में सक्षम नहीं हैं, उसे बुलेट ट्रेन के सपने दिखाए जाने लगे हैं। बेशक प्रधानमंत्री की बुलेट  ट्रेन की महत्वाकांक्षा बुरी नहीं है, लेकिन अभी यह असामयिक है। उचित होगा कि पहले मौजूदा रेल व्यवस्था दुरुस्त कर ली जाय, फिर बुलेट ट्रेन और ऐसी अन्य सभी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की दिशा में बढ़ा जाय तभी देश प्रगतिपथ पर संतुलित रूप से आगे बढ़ सकेगा।

बुधवार, 25 नवंबर 2015

पंचायती राज के प्रति असजग ग्रामीण [पंजाब केसरी, जनसत्ता, नेशनल दुनिया और अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

पंजाब केसरी 
कई राज्यों में पंचायत चुनाव चल रहे हैं। कुछ राज्यों में हो चुके हैं तो कुछ में अभी जारी हैं। पंचायत चुनाव के इस मौसम में अगर देश के गांवों में जाकर वहां के हाल को समझने की कोशिश की जाय तो हर चौंक-चौराहे इन चुनावों की ही चर्चा है। सीट के सामान्य या आरक्षित रहने के विषय में कौतूहल है तथा प्रत्येक स्थिति के लिए न केवल संभावित प्रत्याशियों वरन ग्रामीण मतदाताओं के पास भी अपनी एक योजना है कि किसके पाले में रहना है और किसे जीताना है। लेकिन विडम्बना ये है कि ये योजनाबद्धता स्थानीय मुद्दों या ग्रामीण समस्याओं के आधार पर कत्तई नहीं है, इसका आधार जाति और लोगों के अपने-अपने व्यक्तिगत हित हैं। हर किसी का गणित है कि किस प्रत्याशी को जिताने पर उसे क्या और कितना लाभ मिल सकता है। अगर किसी पंचायत में एक ही जाति के दो-तीन लोग चुनाव में उतर गए तो वहां व्यक्तिगत हितों के आधार पर मतदाताओं के कई खेमे बन जाते हैं जैसे फलां प्रत्याशी से फलां व्यक्ति के सम्बन्ध अच्छे हैं तो परिवार समेत उसका वोट उसी प्रत्याशी  को जाएगा। अब वो कैसा है, किस छवि का है और उसका क्या एजेंडा है ? ये सब बातें गौण हैं। इसके अतिरिक्त धनबल इन चुनावों में भी सर्वोपरि है। पहले सामान्य तरीके से प्रचार करके प्रत्याशी मतदाता को अपने पक्ष में करने की कोशिश करता था, पर अब पंचायत चुनावों को भी लोकसभा और विधानसभाओं की चुनाव शैली की हवा लग गई है। पंचायत चुनावों पर काफी पैसा बहाया जाने लगा है। पहले ऐसा नहीं था। आमतौर पर लोग उसी प्रत्याशी को विजयी बनाते थे जो गाँव के लिए कुछ कर सकने लायक होता था, लेकिन अब स्थिति एकदम बदल चुकी है। धनबल का आलम यह है कि जो व्यक्ति अरसे से गाँव में रहा तक न हो और जिसे गाँव की समस्याओं-पीड़ाओं का कोई अता-पता भी नहीं हो, वो भी यदि पैसा खर्च करे तो बड़े आराम से चुनाव से चार दिन पहले गाँव में आकर भी एक सशक्त प्रत्याशी बन सकता है। कुल मिलाकर कहने का अर्थ यह है कि पंचायत चुनाव भी समस्याओं से इतर जातिगत समीकरणों और धनबल के चक्रव्यूह में उलझा हुआ है। एक समस्या प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व की भी है। मसलन, महिला प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से जहां प्रधान की सीट महिला आरक्षित हैं, वहां महिला उम्मीदवारी महज प्रतीकात्मकता बन कर रह गई है। पत्नी के नाम से पर्चा दाखिला हुआ लेकिन चुनाव से लेकर जीतने के बाद काम-काज तक सब पति को ही देखना है। और दुखद तो ये है कि इस स्थिति को ग्रामीण लोग बड़े ही सहज भाव से स्वीकार भी किए हुए हैं। ऐसे मामलों में अक्सर वही लोग अपनी पत्नियों को उम्मीदवार बनाकर चुनाव जिताने में सफल होते हैं, जिनका गाँव में दबदबा है और जो खुद पैसे खर्च करने की क्षमता रखते हैं। अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि अपनी पत्नियों को चुनाव जीता कर ये लोग खुद पंचायतों के कामकाज संचालित करते हैं। विचार करें तो इसका मुख्य कारण यही है कि आज आज़ादी के साढ़े छः दशक से ऊपर का समय बीत जाने के बाद भी ग्रामीण समाज में पंचायती राज के प्रति जागरूकता का सम्पूर्ण विकास नहीं हो पाया है। ग्रामीण लोग आज भी इसकी आवश्यकता और महत्व दोनों से अनभिज्ञ हैं।
जनसत्ता 
  इसी संदर्भ में अगर पंचायती राज व्यवस्था के इतिहास पर दृष्टि डालते हुए इसे समझने का प्रयास करें तो भारत में प्राचीन काल से ही पंचायती राज व्यवस्था अस्तित्व में रही है। भले से विभिन्न कालों में इसके नाम अलग रहे हों। पंचायती राज व्यवस्था को कमोबेश मुग़ल काल तथा ब्रिटिश काल में भी जारी रखा गया। ब्रिटिश शासकों ने स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं की स्थिति पर जाँच करने तथा उसके सम्बन्ध में सिफ़ारिश करने के लिए 1882 तथा 1907 में शाही आयोग का गठन किया। इस आयोग ने स्वायत्त संस्थाओं के विकास पर बल दिया, जिसके कारण 1920 में संयुक्त प्रान्त, असम, बंगाल, बिहार, मद्रास और पंजाब में पंचायतों की स्थापना के लिए क़ानून बनाये गये। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संवैधानिक रूप से यह व्यवस्था महात्मा गांधी की इच्छा के कारण लागू हुई। उनका मानना था, “आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए। सच्चे प्रजातंत्र में नीचे से नीचे और ऊंचे से ऊंचे आदमी को समान अवसर मिलने चाहिए। इसलिए सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए दस-बीस आदमी नहीं चला सकते, वह तो नीचे से हरेक गांव के लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए।“ गांधी की इसी अवधारणा को फलीभूत करने के उद्देश्य से आजादी के पश्चात् संविधान में पंचायती राज की व्यवस्था करते हुए अनुच्छेद-४० में राज्यों को यह निर्देश दिया गया कि वे अपने यहाँ पंचायती राज का गठन करें। गांधीजी की इच्छा की पूर्ति के  नैतिक दबाव के कारण तत्कालीन सरकार द्वारा पंचायती राज की दिशा में गंभीरता दिखाते  हुए सन २ अक्तूबर, १९५२ को सामुदायिक विकास कार्यक्रम आरम्भ किया गया जिसके तहत सरकारी कर्मियों के साथ सामान्य लोगों को भी गाँव की प्रगति में भागीदार बनाने की व्यवस्था की गई। लेकिन इस व्यवस्था में लोग सिर्फ अपनी बात कह सकते थे, उसके लागू होने या करवाने के सम्बन्ध में उनके पास कोई विशेष अधिकार नहीं था, लिहाजा यह व्यवस्था शीघ्र ही असफल सिद्ध हो गई। कुछ यही हश्र १९५३ में आरम्भ राष्ट्रीय प्रसार सेवा का भी हुआ। इन नीतियों के विफल होने के पश्चात् पंचायती राज व्यवस्था को सशक्त करने के लिए सुझाव देने हेतु सन १९५७ में बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया। समिति ने ग्राम समूहों के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के तहत निर्वाचित पंचायतों, खण्ड स्तर पर निर्वाचित तथा नामित सदस्यों वाली पंचायत समितियों तथा ज़िला स्तर पर ज़िला परिषद् गठित करने का सुझाव दिया। इसके बाद अशोक मेहता समिति, डॉ राव समिति, डॉ एल एम् सिंधवी समिति, थूंगन समिति आदि समितियों का आवश्यकता महसूस होने पर समय दर समय क्रमशः गठन किया गया और इनके द्वारा दिए गए सुझावों पर कमोबेश अमल भी हुआ। आगे इस सम्बन्ध में संविधान में संशोधन भी किए गए जिनमे कि १९९३ में लागू हुआ ७३ वां संविधान संशोधन बेहद महत्वपूर्ण रहा। इसके तहत त्रिस्तरीय पंचायती राज की व्यवस्था की गई। त्रिस्तरीय पंचायती राज जिसमे सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत, मध्यवर्ती स्थिति में खंड स्तरीय क्षेत्र पंचायत और सबसे ऊपर जिला पंचायत के गठन का प्रावधान किया गया। हालांकि जिन राज्यों की आबादी २० लाख से कम है, वहां ये मॉडल द्विस्तरीय हो जाता है।
नेशनल दुनिया 
इसके अतिरिक्त संविधान की ग्यारहवी अनुसूची में पंचायतों के लिए अधिकार और कार्य क्षेत्र भी सुनिश्चित किए गए हैं। इन कार्य क्षेत्रों में कृषि विस्तार, पेय जल, सड़क-पुलिया व संचार के अन्य माध्यमों का विकास, शिक्षा, तकनिकी शिक्षा, समाज कल्याण, गरीबी निवारण कार्यक्रमों का निर्माण व संचालन, लोक वितरण प्रणाली, नवीन  ऊर्जा स्रोतों का विकास, सांस्कृतिक क्रिया-कलापों का निर्वाह आदि कुछ प्रमुख कार्य क्षेत्र हैं। कुल मिलाकर ऐसे २९ कार्य क्षेत्र हैं जिन्हें पंचायतों के लिए चिन्हित किया गया है। इन कार्यक्षेत्रों के अनुसार ही पंचायतों को अधिकार भी प्राप्त हैं। सरकार की तरफ से  आर्थिक मद भी प्राप्त होता है। लेकिन समस्या वही है, ग्रामीण लोगों में जागरूकता का अभाव।  परिणामतः सरकार की तरफ से आया धन पंचायत के लिए चिन्हित कार्यों में लगने की बजाय ग्राम प्रधान और उसके निकटवर्ती लोगों के बीच बंदरबाट करके समाप्त कर दिया जाता है। मनरेगा जैसी योजनाओं का भ्रष्टाचार इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। अशिक्षित लोग यह सब उतना नहीं समझ पाते लेकिन तमाम लोग समझते भी हैं, मगर आवाज कोई नहीं उठाता। इन्हीं दिक्कतों के मद्देनज़र भारत सरकार द्वारा पंचायतों के डिजिटलकरण की बात की जा रही है और कुछेक कदम भी उठाए गए हैं, लेकिन यह अभी बहुत दूर की कौड़ी है।
अमर उजाला 

  डिजिटलीकरण जब होगा तब होगा, फिलहाल आवश्यकता ये है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जागरूक करने की तरफ ध्यान दिया जाय। जागरूकता आने पर लोग पंचायत के कार्यों को समझेंगे तथा प्रधान पर उनके लिए दबाव बना सकेंगे और उसके आनाकानी करने पर ऊपर तक अपील भी कर सकेंगे। मत की ताकत समझ जाने पर वे जाति और व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर मतदान करने की तरफ भी अग्रसर होंगे। इसके अतिरिक्त पंचायती चुनाव प्रणाली में सुधार की भी दरकार है। खासकर चुनाव खर्च की एक सीमा तय की जाय और उसका कड़ाई से अनुपालन करवाया जाय। इससे सही उम्मीदवार के चयन की संभावना बढ़ेगी। साथ ही जातीय समीकरणों से पंचायत चुनाव जीतने की रणनीति को भेदने के उपाय भी ज़रूरी है। इन चोजों पर अगर ध्यान दिया जाय तो ही हम निकट या दूर भविष्य में सत्ता को विकेंद्रीकृत करके आमजन तक पहुंचा सकते हैं जो कि गांधी का अधूरा सपना है।