- पीयूष द्विवेदी भारत
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| दैनिक जागरण |
किसी ने बिलकुल सही कहा है कि सियासत में अवसर का सबसे अधिक महत्व होता है और जो अवसर के अनुसार स्वयं को ढाल ले वही सियासत के मैदान में अधिक समय तक टिक भी सकता है। अगर आपको याद हो तो अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब केन्द्र की पिछली संप्रग-२ सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के हस्तक्षेप के लिए एक संशोधन विधेयक संसद में पेश किया गया था । तत्कालीन दौर में उस संशोधन विधेयक को न्यायपालिका की स्वायत्तता पर चोट बताते हुए मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने उसका भारी विरोध किया था। लेकिन, आज जब वही भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ केन्द्र की सत्ता में आ चुकी है, तब वह उस संशोधन विधेयक को तनिक परिवर्तनों के साथ लाने की कवायद करती नज़र आ रही है । सरकार द्वारा संविधान संशोधन के जरिये जजों की नियुक्ति सम्बन्धी वर्तमान कालेजियम व्यवस्था को खत्म कर उसके स्थान पर जजों की नियुक्ति के लिए एक नई इकाई के गठन के लिए लोकसभा में विधेयक पारित करवाया जा चुका है । संभव है कि संसद के उच्च सदन में भी इस विधेयक को पारित करवाने में सरकार को कोई बहुत समस्या न हो । सरकार का कहना है कि उसने विपक्ष में रहते हुए संप्रग सरकार के जिस संशोधन विधेयक का विरोध किया था, ये उससे अलग विधेयक है । सरकार द्वारा लाए जा रहे इस विधेयक को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश आर एम लोढ़ा का रुख बेहद ही सख्त है । वे इसे न्यायपालिका की स्वायत्तता पर हमला बता रहे हैं । लेकिन, सरकार है कि किसीकी सुनने को तैयार नहीं दिख रही और कोलेजियम व्यवस्था को खत्म करने के लिए जोर-शोर से लगी है । अगर दिमाग पर थोड़ा जोर डालें तो अभी कुछ ही दिन पहले जजों की नियुक्ति के ही मसले पर सरकार और प्रधान न्यायाधीश के बीच काफी तनातनी देखने को मिली थी । पूरा मामला कुछ यों था कि सर्वोच्च न्यायालय की कोलेजियम की तरफ से जजों की नियुक्ति के लिए चार नाम सरकार को भेजे गए थे। अब सरकार की तरफ से उनमे से तीन नामों को तो स्वीकार लिया गया, लेकिन एक नाम को कुछ कमियां बताते हुए पुनर्विचार के आग्रह के साथ वापस कर दिया गया। इस पर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा द्वारा बेहद तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा गया था कि सरकार न्यायपालिका पर नियंत्रण का प्रयास न करे, अगर ऐसा होगा तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। बहरहाल, यहाँ सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि विपक्ष में रहते हुए जब भाजपा ने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया सम्बन्धी उस संसोधन विधेयक का विरोध किया था, तो अब ऐसा क्या हो गया कि कुछ परिवर्तनों के साथ ही सही, उसे लाने की बात कर रही है ? उसका ये रवैया तो कहीं ना कहीं उसकी राजनीतिक अवसरवादिता को ही दर्शाता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्ता में आने से पहले भाजपा संप्रग सरकार पर न्यायपालिका पर नियंत्रण कायम करने का जो आरोप लगा रही थी, अब वो स्वयं न्यायपालिका पर वही नियंत्रण स्थापित करने की कवायद कर रही है ? यह सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि जजों की नियुक्ति संबंधी जो व्यवस्था अभी देश में काम कर रही है, वो न्यायिक स्वायत्तता के लिहाज से अत्यंत उपयुक्त है। अतः उसमे किसी भी तरह के बदलाव, सुधार आदि का कोई औचित्य ही नहीं दिखता। अभी जजों की नियुक्ति की जो व्यवस्था है, उसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति स्वयं उसका ही एक कोलेजियम करता है, जिसमे सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश समेत अन्य जज होते हैं। इसमें कार्यपालिका आदि का कोई विशेष हस्तक्षेप नहीं होता। इस नियुक्ति प्रक्रिया पर कोई सवाल इसलिए भी नहीं उठाया जाना चाहिए कि आज इस देश की संवैधानिक व्यवस्था की तीनों इकाइयों में निरपवाद रूप से सर्वाधिक जन विश्वसनीयता न्यायपालिका के प्रति ही दिखती है। अब अगर जजों की नियुक्ति प्रक्रिया गलत या भ्रष्ट होती, तो उन्हें ये विश्वसनीयता कहाँ से मिलती ? खासकर कि पिछली संप्रग सरकार के दौरान जिस तरह से कार्यपालिका के भ्रष्टाचार तथा गलत निर्णयों आदि को लेकर न्यायपालिका सख्त रही, उसने लोगों में उसके प्रति विश्वास को कई गुना बढ़ाया है। और संभवतः इसी कारण संप्रग सरकार द्वारा जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए संसद में संशोधन विधेयक भी लाया गया था। अब भाजपा-नीत राजग सरकार का उस संशोधन विधेयक को पुनः लाना तो केवल यही दिखाता है कि ये सरकार भी स्वयं को न्यायपालिका से बचाना चाहती है और बस इसीलिए ऐसा कर रही है। हालांकि इस पर भाजपा सरकार की तरफ से बड़े ही गोल-मोल तरीके से कहा जा रहा है कि वे ये कवायदें केंद्रीय न्यायिक आयोग बनाने व न्यायिक सुधारों के अपने वादे को पूरा करने के मकसद से कर रहे हैं। लेकिन, प्रश्न यथावत है कि आप न्यायिक सुधार करिए, पर उसके लिए ये संशोधन विधेयक लाकर न्यायपालिका के कार्यों में कार्यपालिका को घुसाने की क्या आवश्यकता है ? अब इस विधेयक में चाहे सरकार कितना भी बदलाव करके लाए, पर इसका मूल स्वरूप ही ऐसा है कि जैसे-तैसे न्यायपालिका के कार्यों में कार्यपालिका का हस्तक्षेप बढ़ ही जाएगा । इसी क्रम में अगर इसके कुछ मुख्य प्रावधानों पर गौर करें तो जजों की नियुक्ति की इस संवैधानिक इकाई में कुल छः सदस्य होंगे । इनमे देश के प्रधान न्यायाधीश एवं दो अन्य जजों समेत सरकार द्वारा चयनित अन्य तीन सदस्य होंगे । जाहिर है, इस विधेयक के पारित होने के बाद जो कि लगभग तय है, जजों की नियुक्ति सम्बन्धी प्रक्रिया पर काफी हद तक सरकारी या यूँ कहें कि राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो जाएगा । लिहाजा, मूल बात ये है कि कितने भी बदलाव के साथ हो या किसी भी रूप में हो, फ़िलहाल इस संशोधन विधेयक की कोई आवश्यकता ही नहीं है। अगर सरकार वाकई में न्यायिक सुधार के प्रति इतनी प्रतिबद्ध है तो न्यायपालिका में कार्यपालिका को घुसाने की बजाय पहले अदालतों में रिक्त पड़े पदों पर जजों की नियुक्ति करे, जिससे कि लंबित पड़े मामले निपटें और पीड़ितों को न्याय मिल सके। साथ ही, न्याय को सरल, सहज व सस्ता बनाने के लिए भी प्रयास करे, जिससे गरीब व्यक्ति के मन में भी न्यायिक व्यवस्था के प्रति आस्था जग सके और वो भी न्याय के लिए लड़ सके। इन चीजों को करके सरकार न सिर्फ सही मायने में न्यायिक सुधार के अपने वादे को पूरा करेगी, बल्कि जनता के मन में उसके प्रति विश्वास भी मजबूत होगा ।

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