गुरुवार, 14 अगस्त 2014

खतरे में राष्ट्रीय पशु का अस्तित्व [राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

राष्ट्रीय सहारा 
प्रगतिशीलता के अन्धोत्साह में मानव द्वारा किए जा रहे अंधाधुंध प्राकृतिक दोहन का  नुकसान मानव को तो उठाना पड़ ही रहा है, बेजुबान और निर्दोष जानवरों को भी उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है. मानव के अनियंत्रित प्राकृतिक दोहन के कारण दिन ब दिन पेड़-पौधे, नदी, पहाड़ आदि खत्म होते जा रहे हैं, जिस कारण इनमे पनाह लेने वाले पशु-पक्षियों के अस्तित्व पर संकट बढ़ता जा रहा है. मानव द्वारा मचाए गए इस प्राकृतिक विनाश के चलते  आज पशु-पक्षियों की कितनी प्रजातियों का अस्तित्व तो लगभग समाप्त भी हो गया है. वहीँ  कितनी प्रजातियां ऐसी हैं, जो दिन ब दिन समाप्ती की ओर बढ़ रही हैं. भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों में राष्ट्रीय पशु के रूप में शुमार बाघ भी समाप्ती की ओर बढ़ रही प्रजातियों में से ही एक है. धरती पर अपने लिए अनुकूल जीवन संभावनाओं के लगातार खत्म होने के कारण बाघ प्रजाति का भी अस्तित्व धीरे-धीरे अंत की ओर बढ़ता जा रहा है. एक आंकड़े के अनुसार २०वी सदी की शुरुआत तक  धरती पर बाघों की संख्या तकरीबन एक लाख थी, जबकि  सदी की समाप्ती के समय ५ से ७ हजार बाघ होने का अनुमान व्यक्त किया गया था. लेकिन, मौजूदा आंकड़ों  के अनुसार वर्तमान में बाघों की संख्या महज ३२०० रह गई है. बाघ की कुल नौ प्रजातियों में से तीन प्रजातियां तो पूरी तरह से खत्म भी हो चुकी हैं. शेष छः प्रजातियों में से भी कई प्रजातियों की मौजूदगी के विषय में अभी संदेह की ही स्थिति बनी हुई है. मूलतः बाघ दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया समेत रूस के कुछ पूर्वी क्षेत्रों में पाए जाते हैं. भारत के अलावा एशिया के चीन, नेपाल, बांग्लादेश, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, आदि और भी कई देशों में कमोबेश बाघ की मौजूदगी हैं. इनमे सर्वाधिक १४११ (अनुमानित) बाघ भारत में ही हैं. लेकिन, भारत समेत बाघ पाए जाने इन सभी देशों में से कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहाँ बाघ  अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष न कर रहे हों. अब चूंकि, बाघ को उसकी शक्ति, स्फूर्ति और आकर्षक देह के कारण भारत के राष्ट्रीय पशु का गौरव प्राप्त है, अतः यहाँ उसकी कम होती संख्या के प्रति आए दिन चिंता जताई जाती रहती है और उसके  संरक्षण के लिए हमेशा से काफी प्रयास भी होते रहे हैं. भारत सरकार द्वारा बाघों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम प्रयास किए गए हैं. इनमे राष्ट्रीय स्तर पर संचालित  बाघ परियोजना प्रमुख है, इसका आरम्भ सन १९७३ में किया गया. इसके तहत तत्कालीन समय में कई बाघ अभयारण्य बनाए गए और समय दर समय इनमे बढ़ोत्तरी भी की जाती रही. आज देश में ३५  से ऊपर बाघ अभयारण्य हैं. बाघ अभयारण्यों में बाघों को लेकर किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधि पर अंकुश लगाने के लिए सरकार द्वारा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संशोधन करके उसे और भी कड़ा किया गया. अब अगर इस बाघ परियोजना के परिणामों को समझने का प्रयास करें तो इससे देश में बाघों की कम होती संख्या पूरी तरह से रुकी तो नहीं, पर उसपर कुछ विराम जरूर लगा है. क्योंकि, इस परियोजना के आने से ठीक पहले तक देश में १८७२ बाघ थे जिनकी संख्या में इस परियोजना के लागू होने के बाद से अबतक यानी तकरीबन चार दशक के समय में लगभग  ४५० बाघों की कमी आई है. कहना गलत नहीं होगा कि  इन ४५० में से भी तमाम बाघ अपनी स्वाभाविक मृत्यु से ही मरे होंगे. इन सब बातों को देखते हुए स्पष्ट है कि सरकार के बाघ संरक्षण के प्रयासों के कारण भारत में बाघों की कम होती संख्या की रफ़्तार कुछ हद तक थमी जरूर है, लेकिन उनकी संख्या में बढ़ोत्तरी अब भी दूर की ही कौड़ी नज़र आती है. 
    वैसे, बाघों के कम होने का मुख्य कारण तो धरती पर उनके अनुकूल जीवन संभावनाओं  का खत्म होते जाना ही है, लेकिन इसके अलावा और भी कुछ बातें हैं जो बाघों के अस्तित्व पर संकट बनी हुई हैं. इनमे बाघों का शिकार और उनके अंगों की अवैध तस्करी प्रमुख है. प्राचीनकाल में तो राजाओं द्वारा शौकिया तौर पर बाघ का शिकार किया जाता था, लेकिन इस आधुनिक समय में बाघ के शिकार का मकसद पूरी तरह से बदल चुका है. दरअसल, बाघों के शरीर की हड्डियां, खून व चमड़ी आदि  तमाम रोगों से लेकर कामोत्तेजना पैदा करने वाली  दवाएं तक बनाने में काम आते है. इस नाते विश्व बाजार में इनकी कीमत बहुत अधिक है. एक आंकड़े के अनुसार सिर्फ एशिया के चीन जैसे देशों में बाघ के लिंग की कीमत जहाँ ८०००० डॉलर है तो वहीँ  बाघ के खाल की कीमत १०००० से लेकर १००००० डॉलर प्रति किग्रा तक है.   इनके अलावा बाघ के ह्रदय आदि अंगों की कीमत भी हजारों-लाखों में है. ऐसे में बाघ के अंगों का अवैध कारोबार  करके पैसा कमाने के लिए आपराधिक लोगों द्वारा अब उसका शिकार किया जाता है. हालांकि भारत सरकार द्वारा बाघ के शिकार को प्रतिबंधित किया गया है और इस प्रतिबन्ध की वजह से बाघ के शिकार में पूर्व की अपेक्षा भारी कमी भी आई है. लेकिन अब भी जब-तब पुलिस द्वारा बाघ के अंग, खाल आदि को जहाँ-तहां से जब्त किया जाता है, जिससे स्पष्ट होता है कि तस्करों द्वारा बाघ का शिकार और उसके अंगों का अवैध कारोबार  चोरी-छिपे अब भी चल रहा है. 
    उपर्युक्त सभी तथ्यों को देखने पर निष्कर्ष ये निकलता है कि बाघों के संरक्षण के लिए भारत सरकार द्वारा तमाम कार्य किए गए हैं. लेकिन, सरकार के सभी प्रयासों के बावजूद हम सिर्फ बाघों की कम होती संख्या की रफ़्तार को कुछ थाम पाए हैं, न कि उनकी संख्या में वृद्धि करने में हमें कोई सफलता मिली है.  लिहाजा, आज जरूरत है कि सरकार केवल बाघ संरक्षण पर ध्यान देने की बजाय बाघ संवर्द्धन को भी अपनी प्राथमिकता में शामिल करे. बाघ संवर्द्धन के लिए अनिवार्य है कि अभी देश में मौजूद नर-मादा बाघों के संयोग से अधिकाधिक शावक उत्पन्न हों. अब चूंकि, बाघ एक बार में २ से तीन शावक तक पैदा करते  हैं. इससे स्पष्ट है कि उनकी प्रजनन क्षमता अत्यंत उच्च है. अतः सरकार को बाघों की इस उच्च प्रजनन क्षमता का उपयोग उनके तीव्र संवर्द्धन के लिए करना चाहिए. इसके लिए सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर ठोस योजना तैयार कर उसके आधार पर कार्य करने की जरूरत है. सर्वप्रथम सरकार को देश के ऐसे सभी नर और मादा बाघों की एक सूची तैयार करवानी चाहिए जो कि प्रजनन के लिए उपयुक्त हों.  इसके बाद व्यवस्थित ढंग से उनके बीच संयोग उत्पन्न करवाया जाए.   ऐसा करने से  बाघ प्रजाति संवर्द्धित तो होगी ही, बाघों की एक नई, स्वस्थ व मजबूत पीढ़ी भी हमारे सामने होगी. न सिर्फ भारत बल्कि विश्व स्तर पर इस दिशा में काम होना चाहिए. क्योंकि, सही मायने यही एक ऐसा उपाय है जिसके जरिये बाघ प्रजाति को स्थायी तौर पर संरक्षित किया जा सकता है, अन्यथा ये कहना गलत नहीं होगा कि वो दिन दूर नहीं जब बाघों की दहाड़ भी इतिहास की बात हो जाएगी.

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