- पीयूष द्विवेदी भारत
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| डीएनए |
अभी अधिक समय नहीं हुआ जब विपक्ष में रहते हुए भाजपा द्वारा पाकिस्तान को लेकर संप्रग सरकार की रक्षात्मक नीति की आलोचना करते हुए सख्त रुख अपनाने की सलाह दी जाती थी. लेकिन, आज जब वही भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ केन्द्र की सत्ता में आ चुकी है, तो मूलतः वो भी कहीं ना कहीं पाकिस्तान के प्रति उन्हीं रक्षात्मक नीतियों पर चल रही है जिनपर पिछली संप्रग सरकार चली थी. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव के दौरान ही अपनी रैलियों में ये स्पष्ट कर दिए थे कि उनकी नीति आँख दिखाने वाली नहीं, आँख मिलाने वाली होगी. लेकिन यहाँ तो पाकिस्तान जैसा देश लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर हमें लगातार चुनौती देने में लगा है और हमारे प्रधानमंत्री जी संप्रग सरकार की ही तरह केवल जुबानी जोर दिखाने में लगे हैं. यह सही है कि भारत हमेशा से उदारवादी और शांतिप्रिय राष्ट्र रहा हैं, लेकिन अब क्या शांति की कीमत भारत को अपनी अखंडता और संप्रभुता से समझौता करके चुकानी होगी ? दरअसल, आज भारत की सबसे बड़ी समस्या यही हो चुकी है कि वो शांति के लिए किसी भी समझौते को तैयार खड़ा है. भारत की इस अतिवादी शांति-नीति का दुनिया में काफी गलत संदेश गया है और काफी हद तक इसे भारत की कमजोरी भी माना जा चुका है. इसी नीति का परिणाम है कि पाकिस्तान जैसा देश जो कि हर तरह से हमारे सामने काफी कमजोर है, सदैव हम पर हावी रहता है. वो आए दिन सीमा पर गोलीबारी करके संघर्ष विराम संधि का उल्लंघन करता रहता है और दुनिया की सर्वश्रेष्ठ पाँच सेनाओं में से एक का स्वामी भारत सिवाय निंदा और विरोध जताने के जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पाता. पिछली संप्रग सरकार के दौरान पाकिस्तान की इन गतिविधियों को लेकर हद से ज्यादा लापरवाही बरती गई, जिस कारण पाक के नापाक इरादे और मजबूत हुए. यहाँ तक कि पाकिस्तानी जवान हमारी सीमा में घुसकर हमारे जवानों के सिर तक काट के ले गए और संप्रग सरकार सिर्फ जुबानी विरोध ही जताती रही. मोदी सरकार से उम्मीद थी कि वो कहीं पाकिस्तान के प्रति आक्रामक नीति के तहत कार्य करें. लेकिन, मौजूदा हालातों को देखते हुए ये उम्मीद अब बेमानी प्रतीत होने लगी है. मोदी सरकार के सत्ता सम्हालने के बाद से अबतक पाकिस्तान पचास से अधिक बार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर चुका है, लेकिन इस सरकार की तरफ से भी ठीक उसी तरह से केवल जुबानी आक्रोश दिखाया जा रहा है, जैसे बीती संप्रग सरकार के नेताओं द्वारा दिखाया जाता था. हालांकि अभी कुछेक दिन पूर्व प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपनी एलओसी यात्रा के दौरान पाकिस्तान को कड़ा संदेश देते हुए ये जरूर कहा गया था कि पाकिस्तान में सीधी जंग की ताकत नहीं है, इसीलिए वो छिपकर वार करता है. लेकिन, क्या पाकिस्तान के प्रति सख्त होने के लिए इतना पर्याप्त है ? या इस वक्तव्य से पाकिस्तानी सेना की नापाक गतिविधियों पर कोई विराम लगेगा ? तिसपर भारत के सचिव स्तरीय वार्ता का पाकिस्तानी उच्चायुक्त द्वारा कश्मीरी अलगाववादियों से नई दिल्ली मुलाकात कर बुरी तरह से मखौल ही उड़ाया गया. हालांकि गनीमत रही कि इसके बाद सरकार द्वारा सचिव स्तरीय वार्ता को निरस्त कर दिया गया. लेकिन, सवाल ये है कि क्या पाकिस्तान जैसे पीठ में खंजर घोंपने वाले देश से शांति वार्ता की कोई उम्मीद की जा सकती है ? और क्या अब भी वो वार्ता के लायक है ? इतिहास गवाह है कि भारत ने हमेशा से पाकिस्तान से सौहार्द और मैत्रीपूर्ण संबंध के लिए प्रयास किया है, तो वहीँ पाकिस्तान द्वारा हमेशा से हर स्तर पर भारत को केवल धोखा ही दिया जाता रहा है. अगर हमारे हुक्मरान भूलें न हों तो सन १९९९ में भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यही नवाज शरीफ थे, जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा लाहौर बस यात्रा के रूप में पाकिस्तान से मधुर संबंध बनाने का एक और प्रयास किया गया था. और इस शांति प्रयास के बदले में पाकिस्तान की तरफ से हमें कारगिल जैसा एक भयानक युद्ध मिला. और अब तो हालत ये हो गई है कि भारत के तमाम शांति प्रयासों को पाकिस्तान भारत की कमजोरी समझने लगा है, जिस कारण वो लगातार अपनी मनमानियां करता रहता है. बावजूद इसके जाने क्या कारण है कि भारत पाकिस्तान से मधुर संबंध बनाने के लिए अब भी लगा हुआ है. सही मायने में आज समय की मांग ये है कि भारत अब पाकिस्तान से मधुर संबंध बनाने के अपने प्रयासों पर पूरी तरह से विराम लगाए और पाकिस्तान की हर एक कारिस्तानी का मुंहतोड़ जवाब दें. क्योंकि, पाकिस्तान से संबंध बनाने का प्रयास न सिर्फ कूटनीतिक स्तर पर भारत को हानि पहुंचाएगा जरूरत ये है कि सीमा से लेकर विश्व समुदाय की बैठकों में तक हर जगह भारत पाकिस्तान को पूरी तरह से दबा के रखे. विश्व स्तर पर पाकिस्तान को कसने के लिए भारत पाक प्रेरित आतंकवाद और आतंकियों को पाकिस्तान की शह आदि को मुद्दा बना सकता है. इन मुद्दों के जरिए पाकिस्तान को पूरी तरह से दबा के रखा जा सकता है. और भारत जैसे देश के लिए यह कोई बहुत बड़ा काम नहीं है. भारत पाकिस्तान पर नियंत्रण करने में पूरी तरह से सक्षम है, बशर्ते कि हमारे नेता अपनी अतिवादी शांति-नीति की बजाय राष्ट्र की संप्रभुता को तरजीह देना शुरू करें.
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