गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

बिग बॉस की लोकप्रियता के निहितार्थ (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

3 नवम्बर, 2006 को बिग बॉस की शुरुआत सोनी टीवी पर हुई थी। ये इसका पहला सीजन था, जिसमें संचालक (होस्ट) की भूमिका बॉलीवुड अभिनेता अरशद वारसी ने निभाई थी। घर के भीतर पंद्रह लोगों के साथ लगभग तीन महीने चले इस कार्यक्रम ने ऐसी लोकप्रियता पाई कि इसके एक बाद एक सीजन आने शुरू हो गए। कार्यक्रम की बढ़ती लोकप्रियता के कारण अरशद वारसी बीती बात हो गए और सिनेमा जगत के बड़े नामों ने शो के संचालन (होस्टिंग) में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। शिल्पा शेट्टी, संजय दत्त, सलमान खान और यहाँ तक कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी खुद को इससे दूर नहीं रख सके। अमिताभ बच्चन इसके तीसरे सीजन में संचालक की भूमिका में नजर आए। हालांकि ये शो उन्हें अपने लिए उपयुक्त नहीं लगा या कुछ और कारण रहा कि अगले सीजन में वे इससे अलग हो गए और फिर सञ्चालन का दारोमदार सलमान खान को मिल गया। पांचवे सीजन में सलमान के साथ संजय दत्त भी इससे जुड़े लेकिन ये प्रयोग इसी एक सीजन तक चला और छठे सीजन से सलमान ही इसका सञ्चालन कर रहे हैं।
सलमान खान के सञ्चालन में इसकी टीआरपी अधिक बेहतर रहने के कारण सलमान ने सबसे ज्यादा इसके नौ सीजन (अकेले) होस्ट किए हैं। अभी इसका तेरहवां सीजन टीवी पर प्रसारित हो रहा है, जिसके संचालक सलमान ही हैं। हालांकि इसबार अभिनेत्री अमीषा पटेल भी घर की मालकिनके रूप में कार्यक्रम से जुड़ी हैं।  
बिग बॉस में क्या होता है ये बताने की जरूरत नहीं है। सब जानते हैं कि विविध क्षेत्रों, ज्यादातर टीवी-सिनेमा से सम्बंधित, के प्रसिद्ध लोगों को एक निश्चित समयसीमा के लिए एक घर में बंद कर उनके व्यवहार को कैमरों के जरिये देखा जाता है, जिसका व्यवहार सबसे बेहतर रहता है और कुछ अभद्रता आदि नहीं करता, वो विजेता बनता है। उसे एक बड़ी धनराशि प्राप्त होती है।
मगर, यहाँ जानने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि इस शो की टीआरपी का असल कारण है - इसमें घुसे सेलेब्रिटियों के आपसी झगड़ों, विवादों, सनसनीखेज खुलासों और तरह-तरह की अन्तरंग चीजों का अश्लील प्रदर्शन और फिर उसपर बेमतलब का हल्ला व गाली-गलौज। इन चीजों के मद्देनज़र इस कार्यक्रम में प्रायः तमाम विवादित पृष्ठभूमि या विवादित रवैये वाले लोगों को ही लिया जाता है। बीते एक सीजन में इसमें विवादित स्वामी ओम को लिया गया था, जिसने बिग बॉस के घर में जाकर जो चाल-चलन और व्यवहार दिखाया, वो निर्लज्जता और अभद्रता की सारी सीमाएं तोड़ने वाला था। अनूप जलोटा और जसलीन का प्रकरण भी इसी बिग बॉस में घटित हुआ जिसे लेकर जलोटा साहब सोशल मीडिया पर खूब ट्रोल हुए और उनके चरित्र पर खूब आक्षेप लगे लेकिन कार्यक्रम खत्म होने के बाद ऐसी भी खबरें आईं कि ये सबकुछ केवल एक नाटक था। 
वर्तमान में चल रहा कार्यक्रम का यह तेरहवां सीजन भी चिर-परिचित अंदाज में अपनी शुरुआत के साथ ही विवादों में आ गया है। अश्लीलता के साथ-साथ धार्मिक भावनाओं को उकसाने की बात कहते हुए कार्यक्रम पर सवाल उठाए जा रहे। पिछले दिनों ट्विटर पर जेहाद फैलाता बिग बॉसट्रेंड करता रहा। जाहिर है, विवाद पैदा कर टीआरपी पाने की अपनी रणनीति में यह कार्यक्रम एकबार फिर कामयाब होता नजर आ रहा है।    
विचित्र बात यह है कि टीवी मीडिया की भी इस कार्यक्रम भारी दिलचस्पी होती है। प्रिंट तो नहीं, मगर टीवी और डिजिटल मीडिया में बिग बॉस शुरू होने के बाद बिग बॉस के घर में हुई घटनाओं को ऐसे दिखाया जाता है जैसे कोई बड़ी महत्वपूर्ण खबर हो। डिजिटल मीडिया में कार्यक्रम में हुई प्रत्येक गतिविधि का लिखित विवरण तक उपलब्ध कराया जाता है। ये स्थिति पत्रकारिता के इन आधुनिक धड़ों की नैतिकता पर प्रश्नचिन्ह ही खड़े करती है।
बिग बॉस की लोकप्रियता को लेकर भी कई सवाल उठते हैं। सोचिये जरा कि थक-हारकर कुछ पल टीवी के सामने बैठ दिमाग हल्का करने के लिए कुछ अच्छा देखने की बजाय बिग बॉस के घर में दूसरों के झगड़े देखने में लोगों का दिलचस्पी लेना किस प्रवृत्ति का सूचक है? दरअसल ये दिखाता है कि हम में दूसरों के जीवन में झाँकने और दूसरों के यहाँ होने वाले कलह-क्लेश का आनंद लेने की बुरी लत इतनी बढ़ चुकी है कि अब बाकायदा इसका खाते-पीते टीवी पर आनंद लेने लगे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे मनोरंजन का स्वाद दिन-प्रतिदिन फूहड़ से फूहड़तम होता जा रहा है। दुर्भाग्यवश ये स्थिति शहरी और शिक्षित कहे जाने वाले तबके में अधिक है।
मगर इन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ये कार्यक्रम टीवी पर आता है, जिसे बच्चे भी देखते हैं, ऐसे में उनकी मानसिकता पर इसका क्या प्रभाव पड़ता होगा? क्या सीखेंगे वे सेलेब्रिटियों के झगड़ों, कामुक क्रियाकलापों और गाली-गलौज से? कितनी विचित्र बात है न कि एक तरफ अभिभावक बच्चों को गाली-गलौज और झगड़ों आदि से बचने की नसीहतें देते हैं और दूसरी तरफ खुद टीवी पर यही सब मजा ले-लेकर देखते हैं, तो उनके प्रति बच्चों में क्या राय बनेगी?
बिग बॉस तो एक उदाहरण है, ऐसे और भी तमाम शो हैं जो अलग-अलग चैनलों पर प्रसारित होते हैं जिनमें कुछ के नाम पर कुछ और दिखाकर टीआरपी बटोरी जाती है, मगर उन शोज का परिवारों और बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता होगा इसपर कभी विचार नहीं किया जाता। क्राइम पेट्रोल, सावधान इण्डिया, होशियार जैसे शो की रूपरेखा अलग है, मगर अपराध के प्रति जागरूकता फैलाने के नाम पर वे भी सामाजिक विकृति पैदा करने का ही काम कर रहे हैं।
इन आपराधिक कार्यक्रमों में रहस्य, रोमांच और सेक्स को मिला एक ऐसा कॉकटेल तैयार करके घरों में पहुँचाया जा रहा जिससे अपराध के प्रति जागरूकता आए न आए, मगर लोगों को अपराध करने के दस तरीके जरूर आ जाएंगे। अच्छा तो ये है कि लोग इस तरह कार्यक्रमों को देखने से परहेज करें। जब वे नहीं देखेंगे तो इनके निर्माता टीआरपी के अभाव में स्वतः इनपर विराम लगाएंगे। मगर इन कार्यक्रमों की सफलता इसका प्रमाण है कि ये लोगों को भा रहे हैं और लोग इसे देखना बंद करे देंगे, इसकी उम्मीद कम ही है। ऐसे में उपाय यही है कि सरकार ही बिग बॉस जैसे कार्यक्रमों में दिखाई जा रही सामग्री का गंभीरतापूर्वक संज्ञान ले और टीवी पर इनके प्रसारण को लेकर या तो कुछ कड़े नियम निर्धारित करे अथवा इनपर पूर्ण रोक लगाए।

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

साठ साल का दूरदर्शन (दैनिक जागरण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

15 सितम्बर, 1959 को शुरू हुए दूरदर्शन ने बीते 15 सितम्बर को अपने साठ साल पूरे कर लिए। दूरदर्शन की ये छः दशकीय यात्रा भारत में टेलीविजन की यात्रा भी है। 1959 में एक प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया ये चैनल अपने प्रारंभिक तेरह वर्षों में केवल दिल्ली तक सीमित रहा। हालांकि 1965 में आल इंडिया रेडियो के अंतर्गत दिल्ली में इसके दैनिक प्रसारण की व्यवस्था हो गयी थी, मगर देश के अन्य हिस्सों तक इसकी पहुँच की शुरुआत 1972 में हुई। 1972 में मुंबई और अमृतसर में इसका प्रसारण शुरू हुआ और 1975 तक ये देश के सात अन्य शहरों में भी दिखाया जाने लगा। इसी क्रम में 1976 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत इसका एक अलग विभाग बना दिया गया और फिर 1982 से राष्ट्रीय स्तर पर इसका प्रसारण होने लगा। इसके बाद तो अपने एक से बढ़कर एक लोकप्रिय और उम्दा कार्यक्रमों के माध्यम से दूरदर्शन ने देश लोगों के दिलों में जो जगह बनाई, वो एक इतिहास ही है।

दूरदर्शन के साठ साल पूरे होने पर सोशल मीडिया पर जिस तरह लोगों ने उसके पुराने कार्यक्रमों को याद करते हुए उनसे सम्बंधित अपने अनुभव साझा किए, वो इस बात का प्रमाण है कि आज लोगों ने दूरदर्शन देखना भले कम कर दिया हो, लेकिन उसका पुराना दौर आज भी उनके दिलों में पूरी तरह से जिंदा है। न केवल जिन्दा है बल्कि बहुत से लोग लोग यह भी मानते हैं कि आज के कार्यक्रमों में उन्नत तकनीकी और साज-सज्जा भले आ गयी हो, लेकिन सामग्री की गुणवत्ता और मनोरंजकता के मामले में दूरदर्शन पर प्रसारित पुराने कार्यक्रमों वाली बात इनमें नहीं है।
इसी संदर्भ में दूरदर्शन के बीते दौर पर नजर डालें तो आजकल जितनी भी विधाओं के कार्यक्रम अलग-अलग चैनलों पर प्रसारित होते हैं, उनमें से अधिकांश विधाओं के कार्यक्रमों की शुरुआत दूरदर्शन ने की थी। फिर चाहें वो धार्मिक धारावाहिक हों या रहस्य-रोमांच-भय-एक्शन और हास्य के धारावाहिक अथवा पारिवारिक संबंधों, मूल्यों व प्रेम से सम्बंधित धारावाहिक हों या फिर गीत-संगीत से सम्बंधित रियलिटी शो हों, इन सब विधाओं के अत्यंत श्रेष्ठ कार्यक्रम दूरदर्शन पर बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों और इक्कीसवीं सदी के कुछ प्रारंभिक वर्षों में प्रसारित हुए थे।
रामायण, महाभारत और कृष्णा दूरदर्शन के इन तीन धार्मिक धारावाहिकों की लोकप्रियता और इनसे लोगों के आत्मीय जुड़ाव का अनुमान इतने से ही लगा सकते हैं कि राम-सीता के रूप में अरुण गोविल और दीपिका तो कृष्ण के रूप में नीतीश भारद्वाज और सर्वदमन बनर्जी लोगों के मन में आजतक बसे हुए हैं। तब घर-घर में टीवी भी नहीं होती थी, लेकिन लोग दूर-दूर तक टीवी वाले घरों में ये धारावाहिक देखने पहुँच जाते थे। बाद में अन्य चैनल आने के बाद उनपर भी रामायण, महाभारत और कृष्ण लीला के अनेक धारावाहिक आए, लेकिन जो असर दूरदर्शन के इन धारावाहिकों का था, वैसा असर कोई नहीं छोड़ पाया।
इसी तरह फौजी, बुनियाद, हम लोग, चंद्रकांता, आलिफ लैला, चाणक्य, वागले की दुनिया, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, श्रीमान श्रीमती, ये जो है जिंदगी, सुराग, व्योमकेश बख्शी, आपबीती, शक्तिमान, जासूस विजय जैसे विविध विधाओं के अनेक कार्यक्रम हैं, जिन्होंने बच्चों से लेकर बड़े-बूढों तक को दूरदर्शन का दीवाना बना दिया था। शक्तिमान के रूप में भारत को उसका पहला सुपरहीरो देने का श्रेय भी दूरदर्शन को ही जाता है। फिल्मों में कुछ ख़ास न कर पाने वाले मुकेश खन्ना को सुपरहीरो शक्तिमान ने जो लोकप्रियता दी, वो किसी फ़िल्मी नायक की लोकप्रियता से कम नहीं थी। दूरदर्शन के इन कार्यक्रमों के कामयाब होने के पीछे प्रमुख कारण था कि इनमें से तमाम धारावाहिकों की पटकथा और संवाद उस दौर के बड़े लेखकों ने लिखे थे। जैसे कि दूरदर्शन के लिए बुनियाद, हम लोग, मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसे धारावाहिक मशहूर लेखक मनोहर श्याम जोशी ने लिखे थे, तो वहीं महाभारत की पटकथा और संवाद राही मासूम रज़ा की कलम से निकलकर लोकप्रिय हो गए। इसके अलावा इन धारावाहिकों की लोकप्रियता का एक कारण इनकी एकदम यथार्थपरक प्रस्तुति भी थी, जिससे लोगों का इनसे सहज जुड़ाव हो जाता था।
बहरहाल, अब सवाल ये उठता है कि जिस दूरदर्शन का इतना बड़ा और पक्का दर्शकवर्ग था, उसकी लोकप्रियता समय के साथ सिकुड़ती क्यों गयी? गौर करें तो 1992 में स्टार और जी के चैनल आए, लेकिन उसके बाद भी लम्बे समय तक दूरदर्शन का प्रभाव बना रहा। मगर इक्कीसवीं सदी में चैनलों की बढ़ती भीड़ और उनपर कार्यक्रमों-फिल्मों की भरमार शहरी लोगों को दूरदर्शन से दूर करती गयी। गांवों में फिर भी कुछ समय तक दूरदर्शन की लोकप्रियता रही, लेकिन डीटीएच के आगमन के बाद गांवों में भी दूरदर्शन के दर्शक कम होते गए। इसका एक कारण यह भी रहा कि समय के साथ दूरदर्शन पर पुराने कार्यक्रम बंद हो गए और उनकी जगह उस स्तर के नए कार्यक्रम आए नहीं। ऐसे में लोगों के लिए दूरदर्शन के प्रति कोई विशेष आकर्षण बचा नहीं और वो लोगों के लिए किसी एंटिक पीसकी तरह हो गया, जिसका महत्व तो बहुत है, मगर उपयोग कुछ नहीं।
साठ साल पूरे होने पर दूरदर्शन की तरफ से ट्विटर पर एक कविता का वीडियो पोस्ट किया गया, जिसका शीर्षक है मैं नए भारत का चेहरा हूँ। मशहूर ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव द्वारा लिखी गयी इस कविता के बोल बहुत अच्छे हैं और अमिताभ बच्चन ने इसे गाया भी बहुत उम्दा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई दूरदर्शन की हालत ऐसी है कि उसे नए भारत का चेहरा कहा जाए? शायद नहीं। दूरदर्शन नए भारत का चेहरा बने, ये बहुत अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उसके कार्यक्रमों में नए भारत का अक्स दिखाई दे, मगर दुर्भाग्यवश ऐसा है नहीं। दूरदर्शन की वेबसाइट पर उपलब्ध उसके कार्यक्रमों की सूची देखने पर ज्ञात होता है कि उसके पास नए कार्यक्रम काफी कम हैं और ज्यादातर वक़्त उसपर पुराने डेली शॉपकार्यक्रमों का ही पुनः प्रसारण किया जा रहा है। सवाल है कि क्या इन पुराने कार्यक्रमों के भरोसे दूरदर्शन नए भारत का चेहरा बन सकता है?
वर्तमान समय में चैनलों और कार्यक्रमों की भरमार है, जिसने प्रतिस्पर्धा का वातावरण पैदा कर दिया है। दूरदर्शन इस प्रतिस्पर्धा में पिछड़ नहीं रहा, बल्कि भाग लेने से बच रहा है जो कि ठीक नहीं है। दूरदर्शन के पुराने कार्यक्रमों की गुणवत्ता उसकी पहचान है और लोगों का उससे एक भावनात्मक जुड़ाव भी है, ऐसे में अगर वर्तमान समय के अनुरूप किन्तु अपनी मौलिकता और पुरानी गुणवत्ता के साथ कार्यक्रम लाए जाएं और उनका सही प्रचार-प्रसार किया जाए तो दूरदर्शन इस कठिन प्रतिस्पर्धात्मक समय में भी अपना एक दर्शकवर्ग तैयार कर सकता है।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

बॉलीवुड सितारों का अंग्रेजी प्रेम (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इसी हिंदी सिनेमा के सितारों का व्यक्तिगत व सार्वजनिक जीवन में हिंदी के प्रति जो रवैया दिखाई देता है, वो चकित करने के साथ-साथ उनपर कई सवाल भी खड़े करता है। सवाल ये कि हिंदी में फ़िल्में बनाकर अकूत पैसा और लोकप्रियता प्राप्त करने वाले बॉलीवुड के ये सितारे परदे से बाहर आते ही हिंदी से परहेज क्यों करने लगते हैं? क्या हिंदी इनके लिए केवल कैमरे के सामने रटकर बोली जाने वाली एक भाषा है, जिसमें बड़े-बड़े संवाद बोलकर वे लाखों-करोड़ों दर्शकों की तालियाँ और वाहवाही हासिल कर अपनी स्टारडमबना लेते हैं? क्या इससे अधिक हिंदी का उनके लिए कोई महत्व नहीं है? इन सवालों का जवाब बॉलीवुड के सितारों को देना चाहिए, लेकिन इसका कोई तर्कसंगत जवाब उनके पास होगा, इसकी संभावना बहुत कम है।

ऐसा लगता है कि बॉलीवुड के लोगों, फिर चाहें वो निर्माता-निर्देशक हों या अभिनेता-अभिनेत्री, के लिए हिंदी एक व्यावसायिक मजबूरी से अधिक कुछ और नहीं है। व्यावसायिक मजबूरी के ही कारण परदे पर वे हिंदी को समर्पित होते हैं और उससे बाहर आते ही अंग्रेजीदां हो जाते हैं। परदे से बाहर की उनकी ज्यादातर गतिविधियों की भाषा अंग्रेजी होती है। एकबार फिल्म बन गयी, उसके बाद फिल्म के प्रचार आदि सभी कार्य अंग्रेजी में होते हैं। फिल्म के ट्रेलर को प्रसारित करने पर होने वाली प्रेसवार्ता हो या फिल्म के प्रचार से सम्बंधित विविध साक्षात्कार हों, इन सबकी अधिकांश बातचीत अंग्रेजी में होती है। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर नए-पुराने सभी बॉलीवुड कलाकारों के साथ यही स्थिति है।
हालांकि बॉलीवुड के पुरस्कार समारोहों में जरूर हिंदी को जगह मिलती है, लेकिन उसके मूल में भी कोई हिंदी प्रेम नहीं बल्कि विशुद्ध व्यावसायिकता ही होती है। चूंकि उन पुरस्कार कार्यक्रमों का प्रसारण जिन टीवी चैनलों पर होता है, उनका बहुत बड़ा दर्शकवर्ग हिंदीभाषी होता है, अतः उस दर्शकवर्ग के मद्देनजर वे कार्यक्रम हिंदी में होते हैं। हालांकि ऐसे कार्यक्रमों में जो हिंदी बोली जाती है, उसमें भी आधे से अधिक अंग्रेजी ही होती है।  
इसके अलावा बॉलीवुड कलाकारों के सोशल मीडिया पर अगर नजर डाली जाए तो वहां भी अंग्रेजी का ही वर्चस्व दिखता है। अमिताभ बच्चन, आशुतोष राणा जैसे कुछेक लोग जरूर यहाँ भी एक अपवाद की तरह हैं, जो अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। लेकिन अंग्रेजीप्रेमी सितारों की भीड़ में ऐसे लोगों की संख्या गिनती की ही है।
साथ ही, यह भी देखा जा सकता है कि बॉलीवुड के लोगों की आत्मकथा हो, जीवनी हो या किसी और विधा पर कोई किताब हो, अधिकांश का मूल लेखन अंग्रेजी में ही होता। बेशक बाद में उसका हिंदी अनुवाद भी ला दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर करण जौहर की आत्मकथा एन अनसूटेबल बॉयअंग्रेजी में है, जिसका हिंदी अनुवाद बाद में एक अनोखा लड़काके नाम से आया। दिलीप कुमार की आत्मकथा द सब्सटेंस एंड द शैडो2014 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई, जिसका हिंदी अनुवाद 2017 में वजूद और पहचानके नाम से आया। ऋषि कपूर की आत्मकथा खुल्लम खुल्लाभी पहले अंग्रेजी में आई और उसके लगभग साल भर बाद इसी नाम से हिंदी में उसका प्रकाशन हुआ। आत्मकथाओं के अलावा अन्य प्रकार के लेखन में भी बॉलीवुड की पसंद अंग्रेजी ही है। अभिनेत्री से लेखिका बनीं ट्विंकल खन्ना अबतक तीन किताबें मिस फनीबोन्स’, ‘द लीजेंड ऑफ़ लक्ष्मी प्रसाद’, ‘पायजामाज आर फोर्गिविंगलिख चुकी हैं और तीनों ही अंग्रेजी में हैं। अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता नंदा ने हाल ही में अपने पहले उपन्यास पैराडाइस टावर्सके साथ लेखन के क्षेत्र में प्रवेश किया जो कि अंग्रेजी में ही है। श्वेता बॉलीवुड में सक्रिय नहीं हैं, लेकिन उनके पिता का हिंदी प्रेम देखते हुए ये उम्मीद कोई ज्यादा नहीं थी कि वे अपने लेखन की शुरुआत हिंदी में करतीं। हालांकि यहाँ भी कुछेक अपवाद हैं जैसे कि आशुतोष राणा जो न केवल सोशल मीडिया पर जमकर हिंदी में लिखते हैं बल्कि अपनी किताब मौन मुस्कान की मार’ (व्यंग्य-संग्रह) भी उन्होंने हिंदी में ही लिखी है। मगर कुल मिलाकर इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि बॉलीवुड में अंग्रेजी का कैसा वर्चस्व है।
बॉलीवुड सितारों के अंग्रेजी प्रेम के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि ऐसा वे अपनी पहुँच को भारत के अहिन्दीभाषी क्षेत्रों सहित वैश्विक स्तर तक विस्तार देने के लिए करते हैं। सवाल ये है कि अगर उन्हें अपनी वैश्विक पहुँच की इतनी ही चिंता है तो फिर फ़िल्में भी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं बनाते? कितना विचित्र है कि फ़िल्में हिंदी में बनाएंगे और उससे देश की बहुसंख्यक हिंदीभाषी जनता के जरिये पैसा और वाहवाही भी बटोरेंगे, लेकिन जब बात हिंदी को अपनाने की आएगी तो अंग्रेजी के जरिये अपनी वैश्विक पहुँच बनाने चल देंगे। निस्संदेह अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा है और उसकी पहुँच बहुत अधिक है, लेकिन हमारे कलाकारों को समझना चाहिए कि अंग्रेजी चाहें कितनी भी बड़ी भाषा हो, लेकिन उनके लिए हिंदी का महत्त्व सबसे ऊपर है। वे आज जो कुछ भी हैं, उनको जो भी नाम-पैसा मिला है, उसकी बुनियाद में अंग्रेजी नहीं, हिंदी और हिन्दीभाषी लोग हैं। ऐसे में बोलने-लिखने से जितना अधिक संभव हो, उनके व्यवहार की भाषा हिंदी ही होनी चाहिए। यहाँ यह सफाई भी नहीं चल सकती कि हमें हिंदी ठीक से आती नहीं, इसलिए अंग्रेजी में सबकुछ करना पड़ता है। अगर हिंदी अच्छे-से नहीं आती तो उसे आवश्यक मानकर, सिर्फ फ़िल्मी जरूरतों के लिए नहीं बल्कि एक भाषा के रूप में गंभीरता से सीखने की जरूरत है।
किसी भी भाषा का विस्तार और विकास उसके बोलने-लिखने वालों के जरिये ही होता है। अंग्रेजी की जिस वैश्विक पहुँच पर आज बॉलीवुड सितारे मुग्ध हैं, उसके बनने में अंग्रेजीभाषी लोगों का अंग्रेजी के प्रति समर्पित रुख एक बड़ा कारण है। हिंदी में बाबू देवकीनंदन खत्री का उदाहरण समीचीन है, जिन्होंने हिंदी में लिखा और ऐसा लिखा कि उसे पढ़ने के लिए हजारों-लाखों लोग हिंदी सीखने पर मजबूर हो गए। बॉलीवुड के हिंदी कलाकारों की प्रशंसक श्रृंखला भारत ही नहीं, दुनिया भर में फैली हुई है, ऐसे में यदि वे हिंदी में ही अपना समस्त भाषा-व्यवहार करेंगे तो देश-विदेश के बहुत से अहिंदीभाषी लोग हिंदी सीखने-समझने को प्रेरित हो सकते हैं। उनका यह रुख हिंदी को वैश्विक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मगर यह तभी होगा जब वे हिंदी को दीन-हीन और साधारण लोगों की भाषा समझने की अपनी मानसिकता से बाहर आकर उसे देश की भाषा समझते हुए एक गर्व की अनुभूति के साथ अपनाएंगे और अधिकाधिक रूप से उसका व्यवहार करेंगे।

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

सेक्रेड गेम्स : कला की आड़ में एजेंडा (दैनिक जागरण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

बीते पंद्रह अगस्त को फिल्म निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप की चर्चित वेब सीरिज ‘सेक्रेड गेम्स’ का दूसरा सीजन नेटफ्लिक्स पर प्रसारित हुआ। इसका पहला भाग पिछले साल जून में आया था, जिसे समीक्षकों की सराहना और दर्शकों का रुझान तो मिला था, लेकिन साथ ही इसकी विषयवस्तु और सामग्री को लेकर कई सवाल भी उठे थे। गाली-गलौज भरे संवाद, वीभत्सता की सीमा तक हिंसा एवं एकदम नग्न सेक्स दृश्यों के कारण तो ये वेब सीरिज सवालों के घेरे में आई ही थी, कहानी में मौजूद धर्म और राजनीति से सम्बंधित मनमानी व्याख्याओं व टिप्पणियों ने भी इसके पीछे की नीयत को संदिग्ध बनाने का काम किया था। अब जब इसका दूसरा सीजन आया है, तो ये भी पूर्ववत ढंग से सवालों के घेरे में ही नजर आता है। 
सेक्रेड गेम्स के इस सीजन की कहानी हिन्दू आतंकवाद की वायवीय धारणा पर आधारित है, जिसका केंद्र गुरुजी (पंकज त्रिपाठी) का चरित्र है। गुरुजी पहले भाग में भी थे, लेकिन उन्हें कम संवाद और दृश्य मिले थे। मगर, इस सीजन में सब प्रमुख चरित्रों का सूत्र गुरुजी के ही हाथ में दिखाया गया है। गुरुजी का एक बड़ा-सा आश्रम है, जिसकी आड़ में ड्रग्स का कारोबार चलता है और वहां जाने वाले भक्तों को नशे से सम्मोहित कर लिया जाता है। उनके साथ अप्राकृतिक यौन क्रियाएं की जाती और करवाई जाती हैं। गुरुजी धरती पर पुनः ‘सत्ययुग’ लाना चाहते हैं और इसके लिए उनका तरीका यह है कि वर्तमान जगत को नष्ट कर दिया जाए। उनका मानना है कि अभी दुनिया के अलग-अलग भागों में जो संघर्ष चल रहा है, उसे और बढ़ाया जाए जिससे दुनिया के ख़त्म होने की प्रक्रिया तेजी से बढ़े। गुरुजी की इस योजना की एक प्रमुख कड़ी मुंबई में परमाणु विस्फोट करना है, जिससे भारत-पाकिस्तान सहित बाकी दुनिया में भी संघर्ष पैदा हो और विनाश की प्रक्रिया तीव्र हो जाए। यहाँ तक कि भारत विरोधी आतंकियों से भी गुरुजी के शिष्य अपने मिशन को पूरा करने के लिए मिल जाते हैं।
जाहिर है, गुरुजी के चरित्र के माध्यम से यह वेब सीरिज हिन्दू आतंकवाद की निराधार धारणा को स्थापित करने के प्रयास में दिखती है। मगर दिक्कत यह है कि जब आप सत्य से परे केवल अपने दुराग्रहों से उपजी किसी धारणा को स्थापित करने का प्रयास करते हैं, तो उसमें अतार्किकता और कृत्रिमता आ जाती है। यहाँ भी यही हुआ है। गुरुजी को पूरी साज़िश का सूत्रधार बनाए रखने के चक्कर में कहानी कई स्थानों पर एकदम अतार्किक हो गयी है। गुरुजी की हत्या के बाद गायतोंडे के कान में जादुई ढंग से जब-तब उनकी आवाज गूंजते रहना और उसीके प्रभाव में उसका बिना पूरी साज़िश का खुलासा किए  आत्महत्या कर लेना इस अतार्किकता का ही उदाहरण है। जिस तरह से आश्रम में नशे के द्वारा सम्मोहित कर लोगों को सत्ययुग लाने के मिशन के लिए तैयार किया जाता है, वो भी विचित्र ही लगता है। असल में गुरूजी के चरित्र को सर्वशक्तिमान दिखाने के अन्धोत्साह में कहानी कई तकनीकी खामियों का शिकार हुई है।  
धार्मिक प्रतीकों को लेकर भी सेक्रेड गेम्स-2 में कई आपत्तिजनक बातें दिखती हैं।  ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ इस मंत्र का गुरुजी जाप करते हैं। ये यजुर्वेद से निकला एक महामंत्र है, जिसका अर्थ है कि मैं ही ब्रह्म हूँ। ऐसे महामंत्र का जाप गुरुजी अपनी अप्राकृतिक यौन क्रियाओं के दौरान भी करते हैं, जो कि भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली बात ही है। इसी तरह ‘भगवान’ शब्द को लेकर अनेक आपत्तिजनक संवाद इस वेब सीरिज में मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर गायतोंडे एक जगह अपने पिता के प्रति कहता है, ‘वो खुद को भगवान की …. का बाल समझता था’। ये संवाद इतना अनुचित और आपत्तिजनक है कि यहाँ पूरा लिखा तक नहीं जा सकता। सेक्रेड गेम्स-2 में भगवान के विषय में ऐसे अनेक अनुचित संवाद आए हैं। इसी तरह सरताज सिंह का गुस्से में अपना कड़ा निकालकर फेक देना भी अनुचित लगता है, जिसे लेकर भाजपा नेता तेजिंदर बग्गा की तरफ से केस भी कर दिया गया है। उल्लेखनीय बात ये है कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली ये सब बातें वेब सीरिज की मूल कहानी से कोई ताल्लुक नहीं रखतीं और न ही उसमें कोई अतिरिक्त प्रभाव उत्पन्न करती हैं। अगर ये बातें इस वेब सीरिज में न होतीं तो भी इसकी कहानी को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता यानी कि इनसे बचा जा सकता था। लेकिन इसके बावजूद इन चीजों को वेब सीरिज में रखा जाना निर्माता-निर्देशकों की नीयत पर प्रश्नचिन्ह ही लगाता है। यह ठीक है कि देश में सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन उसके साथ नैतिकता की एक मर्यादा भी होती है। यह अपेक्षा भी होती है कि आप अपनी इस स्वतंत्रता का उपयोग किसीकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं करेंगे। मगर, दुर्भाग्यवश सेक्रेड गेम्स के दोनों ही सीजनों में कमोबेश यह किया गया है। 
बात इतने पर ही खत्म नहीं होती, बल्कि इस वेब सीरिज में यह स्थापित करने की भी कोशिश की गयी है कि देश में मुसलमान बड़ी बुरी दशा में हैं। इंस्पेक्टर माज़िद को मुसलमान होने के कारण घर न मिलने, कामकाज के दौरान अक्सर उसपर शक किए जाने जैसे प्रसंग हों या साद नामक मुस्लिम लड़के को सरेआम मार दिया जाना हो या यह संवाद कि ‘मुसलमान को उठाने के लिए वजह की जरूरत होती है क्या?’ हो, इन सब चीजों के माध्यम से यही धारणा गढ़ने की कोशिश हुई है कि भारत में मुस्लिम समुदाय बड़ी बुरी स्थिति में है। इस वेब सीरिज के निर्देशक अनुराग कश्यप अभी हाल ही में मुस्लिमों की मोब लिंचिंग को लेकर पीएम को पत्र लिखने वाले उनचास लोगों में शामिल रहे थे, ऐसा लगता है कि उन्होंने जिन पूर्वाग्रहों के आधार पर वो पत्र-अभियान चलाया था, इस वेब सीरिज में उन्हीं पूर्वाग्रहों को परोस दिए हैं। 

कितना विचित्र है न कि आज दुनिया में छाती ठोंक के जिस मजहब के नाम पर आतंकवाद चल रहा है, उसके विषय में खुलकर अनुराग कश्यप कुछ नहीं कहते, लेकिन जो हिन्दू आतंकवाद कहीं किसी रूप में अबतक सिद्ध नहीं हुआ है, उसकी एक कपोल-कल्पित कहानी बना डालते हैं। इसी तरह मोब लिंचिंग जैसी विशुद्ध आपराधिक समस्या का साम्प्रदायिकरण कर डालते हैं। यह सब चीजें समाज में गलत सन्देश देने वाली हैं। इनसे बचा जाना चाहिए था।

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

विधाओं की मृत्यु का बेसुरा राग (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

हिंदी के एक कवि हैं मंगलेश डबराल। वर्ष 2015 में पुरस्कार वापसी प्रकरण के दौरान पुरस्कार वापस करने को लेकर चर्चा में आए थे, लेकिन इसके बाद एक लम्बे समय से उनकी कोई चर्चा नहीं थी। उन्होंने कुछ नया रचा हो, उसपर कोई विमर्श हुआ हो, ऐसी किसी तरह की कोई बात उनके विषय में सुनने में नहीं आई। लेकिन अभी पिछले दिनों अचानक एक फेसबुक पोस्ट लिखकर वे नकारात्मक रूप से ही सही, चर्चा में आ गए। उन्होंने लिखा, ‘हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास बहुत लिखे जा रहे हैं, लेकिन सच यह है कि इन सबकी मृत्यु हो चुकी है हालांकि ऐसी घोषणा नहीं हुई है और शायद होगी भी नहीं क्योंकि उन्हें खूब लिखा जा रहा है।लेकिन हिंदी में अब सिर्फ 'जय श्रीराम' और 'बन्दे मातरम्' और 'मुसलमान का एक ही स्थान, पाकिस्तान या कब्रिस्तान' जैसी चीज़ें जीवित हैं। इस भाषा में लिखने की मुझे बहुत ग्लानि है। काश, मैं इस भाषा में न जन्मा होता!डबराल की पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर इसको लेकर लेखकों, साहित्य में रुचि लेने वाले सामान्य लोगों के बीच चर्चाओं-बहसों का दौर शुरू हो गया। ज्यादातर मुद्दों की तरह इसपर भी दो खेमे बन गए। एक खेमा डबराल के विरोध में तो दूसरा उनके बचाव में जुट गया। विरोधियों को ज्यादा आपत्ति उनकी ग्लानि वाली बात पर थी। लोग सवाल उठा रहे थे कि जिस भाषा ने इन कविवर को इतना मान-सम्मान दिया, आज उसमें लिखने को लेकर ये ग्लानि व्यक्त करने जैसी कृतघ्नता कैसे कर सकते हैं। वहीं बचाव करने वाले पोस्ट को अभिधा की बजाय व्यंजना में समझने की बात कहते हुए डबराल के पक्ष में दलीलें देने लगे। हालांकि हिंदी के विषय में पूर्वाग्रहजनित मनमाफिक धारणाएँ प्रस्तुत करते हुए उसमें लिखने के प्रति ग्लानि व्यक्त करने में कौन-सी व्यंजनात्मकता छुपी है, ये बहुत विचार करने पर भी समझ में नहीं आता। बहरहाल, विवाद बढ़ता देख कविवर ने अपनी पोस्ट संपादित करते हुए उसमें से चुपचाप ग्लानि वाली बात हटा दी है। लेकिन क्या इस पोस्ट का केवल इतना ही हिस्सा आपत्तिजनक है, जो इसे हटाकर डबराल सवालों से बच जाना चाहते हैं। वास्तव में, ये पूरी पोस्ट ही भ्रामक, तथ्यहीन और कुंठाओं की उपज है।
कहानी, कविता, उपन्यास जैसी विधाओं की मृत्यु की घोषणा एवं अनर्गल ढंग से हिंदी को सांप्रदायिक करार देने की कोशिश इस पोस्ट की सबसे ज्यादा आपत्तिजनक बात है। मंगलेश डबराल को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर उन्होंने किस आधार पर हिंदी के साम्प्रदायिकरण का दावा किया है? यह भी कि उक्त तीन प्रमुख विधाओं को मृत बताने के पीछे उनके पास क्या तर्क, क्या तथ्य हैं? क्या आज इन विधाओं में जो साहित्य लिखा जा रहा है, उसको उन्होंने सम्यक प्रकार से पढ़ा है?
ये आवश्यक नहीं कि जिसे वे बेहतर साहित्य मानते हों, वो ही बेहतर हो और जो उनकी दृष्टि में उत्तम न हो, उसे अस्वीकार दिया जाए। साहित्य किसी एक व्यक्ति की थाती नहीं, पूरे समाज की एक परम्परा होता है। विधाओं की मृत्यु की घोषणा करने से पूर्व यह बात मंगलेश डबराल को सोचनी चाहिए थी। वे आज के लेखन पर तर्कों के साथ सवाल खड़े कर सकते थे, मगर उसे मृत घोषित कर देना कदापि उचित नहीं है।
किसी विधा के जीवित होने का प्रमाण क्या है? यही न कि उसमें कितना साहित्य रचा जा रहा है और उसे कितनी स्वीकृति मिल रही है। सो हिंदी उपन्यास और कहानी आज भी बड़ी मात्रा में रचे जा रहे हैं व समकालीन समस्याओं, चुनौतियों व जीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त करने के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित हैं। विषयवस्तु से लेकर भाषा-शैली तक इन विधाओं ने पूर्व की तुलना में बहुत विकास किया है। आज वरिष्ठ लेखक नरेंद्र कोहली की कलम से वरुणपुत्रीजैसा पुरातनता, आधुनिकता, पुराण और विज्ञान के साथ-साथ फैंटेसी को भी समाहित किया उपन्यास निकल रहा है। वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुद्गल किन्नरों पर केन्द्रित पोस्ट बॉक्स नम्बर- 203 नाला सोपाराकी रचना की हैं। रत्नेश्वर जैसे लेखक भी हैं, जिन्होंने ग्लोबल वार्मिंग जैसी विश्वव्यापी समस्या पर शोध के साथ रेखना मेरी जानलिखा है और आगे पानी पर एक शोधपूर्ण उपन्यास लाने में जुटे हैं। ये सब हाल के वर्षों में आए कुछ उपन्यासों के नाम हैं, ऐसी और भी अनेक कृतियाँ इस दौरान आई हैं, इन उदाहरणों का आशय बस इतना है कि वर्तमान समय में हिंदी उपन्यास का फलक लगातार विस्तार को प्राप्त हो रहा है। नए लेखक भी लिख और बिक दोनों रहे हैं तथा अपने साहित्यिक काल के निर्माण में जुटे हैं। हिंदी कहानी भी अलग-अलग प्रयोगों के साथ अपनी भूमिका का संतोषजनक निर्वहन कर रही है। हालांकि इन विधाओं के साथ कुछेक चुनौतियाँ व समस्याएँ भी हैं, मगर इनके अस्तित्व पर कोई संकट हो, ऐसा बिलकुल नहीं है।
अब बात हिंदी कविता की करें तो यह ठीक है कि आज उसकी दशा कहानी व उपन्यास जैसी विधाओं की अपेक्षा बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती। हिंदी में कविताएँ रची तो आज भी खूब जा रही हैं, लेकिन उनमें कविता के वो तत्व नहीं दिखाई देते जिनके जरिये वो जनसामान्य से सहज ही जुड़ाव स्थापित कर लेती थी। आज मुख्यधारा की हिंदी कविता केवल बौद्धिक चारदीवारी के भीतर विमर्श की वस्तु बनकर रह गयी है।
वास्तव में एक विधा के रूप में हिंदी कविता के विनाश की शुरुआत वामपंथी विचारधारा से प्रभावित प्रगतिवादी युग से ही हो गयी थी। प्रगतिवादी युग में हिंदी कविता को छायावाद के कल्पना-लोक से हकीकत की जमीन पर लाकर सामाजिक यथार्थ से जोड़ने के नाम पर वामपंथी रचनाकारों द्वारा जिस तरह से इसकी शिल्पगत कसौटियों को एक-एक कर भंग करने की कु-परम्परा का सूत्रपात किया गया, उसीने हिंदी कविता की वर्तमान दुर्दशा की पृष्ठभूमि का निर्माण किया। हिंदी कविता की इस दुर्दशा में आज उसके हाल पर व्यथित हो रहे मंगलेश डबराल और उनके साथी कवियों का दोष भी कम नहीं है। इन्होने जो काव्य-रचना की है, वो केवल इन लोगों के आपसी विचार-विमर्श तक सीमित है, जनसामान्य के लिए उसमें कोई आकर्षण नहीं है। इस दुर्दशा के बावजूद हिंदी कविता अभी मरी नहीं है, वो जीवित है और मंचीय कवियों के कंठ में सांस ले रही है और उम्मीद है कि देर-सबेर यहीं से वो अपने अस्तित्व का नया अध्याय लिखेगी। अतः मंगलेश डबराल यदि हिंदी साहित्य की समृद्ध की दिशा में कुछ नहीं कर पा रहे तो कम से कम उन्हें विधाओं की मृत्यु का बेसुरा राग गाना तो बंद ही कर देना चाहिए।

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

पुस्तक समीक्षा - नक्सलवाद की परतों को उधेड़ता उपन्यास [वर्धा विश्वविद्यालय की पत्रिका 'पुस्तक वार्ता' में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

राजीव रंजन प्रसाद का उपन्यास ‘लाल अंधेरा’ पिछले पांच दशकों से देश की छाती पर किसी नासूर की तरह बनी हुई नक्सलवाद की समस्या के आगाज, विकास, प्रभाव, नेटवर्क आदि विविध पहलुओं की एक दिलचस्प प्रस्तुति है। इस उपन्यास में न केवल देश भर में व्याप्त सशस्त्र नक्सलवाद की परतों को उघाड़ा गया है, बल्कि परोक्ष ढंग से इसका समर्थन करने वाले शहरी नक्सलवाद की भी जमकर कलई खोली गयी है। कथानक की बुनावट कुछ ऐसे हुई है कि एक रौ में बहते हुए पाठक धीरे-धीरे नक्सलवाद के जंगल से नगर तक व्याप्त पूरे चक्रव्यूह को परत दर परत अपने सामने बेपर्दा पाता है। उपन्यास की कहानी कई टुकड़ों और अनेक पात्रों के बीच बिखरी हुई है। इसके अधिकांश पात्र, नक्सलवाद की समस्या के अलग-अलग पक्षों एवं किसी न किसी समाज या वर्ग विशेष के प्रतिनिधि पात्र हैं।

कहानी का सूदू नामक पात्र आजाद भारत में रजवाड़ों की व्यवस्था की समाप्ति के पश्चात् बस्तर के आदिम समाज की अवस्था का एक चित्र खींचता है। बस्तर के अंतिम शासक प्रवीरचंद भंजदेव के सियासी चक्रव्यूह का शिकार होकर मारे जाने के पश्चात् खुद को उनकी प्रजा मानने वाले आदिमों की लोकतान्त्रिक भारत में क्या दशा हुई, अपना घरबार छोड़ यत्र-तत्र भागकर उन्हें किस तरह संघर्षपूर्ण जीवन बिताना पड़ा, सूदू का चरित्र आदिम समाज की इस ऐतिहासिक त्रासदी को उकेरकर रख देता है। यह अंश देखिये जब सूदू अपनी व्यथा-कथा बताते हुए कहता है, ‘राजमहल छूटा तो घर भी छूट गया। कितने दिन जंगल-जंगल भटका। किसी गाँव में सो गया, कुछ मिला तो खा लिया। फिर मैं दंतेवाड़ा आ गया। उधरिच्च पता चला कि बैलाडीला में लोहा निकालने के लिए पहाड़ को खोद रहे हैं... वहाँ और भी मजदूर थे। हम सबको ट्रक में भरकर किरन्दूल ले गए। वहीं पर लेबर कैम्प में सिर रखने को जगह मिल गया। पत्थर तोड़ने लगे तो खाने के लिए मिलने लग गया...’ समझना आसान है कि आजाद भारत की सियासत के चक्रव्यूह में भोले-भाले आदिमों को किस कदर पिसना पड़ा। मगर इस मुसीबत को अपनी मेहनत से धता बताकर वे जस-तस जीवन को एक लय देने में लगे रहे। लेकिन जब उन्हें लगा कि स्थिति कुछ ठीक हो रही है और उन्होंने जरा सपने देखने शुरू ही किए थे कि उनके बीच तथाकथित क्रांतिदूतों यानी नक्सलियों का आगमन हो गया। इसी तथ्य को उजागर करते हुए सूदू कहता है, ‘मैं बुधरी को बहुत प्यार किया। बहुत अच्छे से रखा। उसके दिल का सब किया। तबतक सबकुछ ठीक चलता रहा, जबतक दादा लोग हम लोग के गाँव में नहीं घुसे थे।’ यहाँ ‘दादा लोग’ का तात्पर्य नक्सलियों से ही है। सरकार की उपेक्षा के कारण पहले से ही त्रस्त आदिमों के जीवन में नक्सली अत्याचार और शोषण का कैसा अमानवीय रूप लेकर आए, उपन्यास में इसका बाखूबी चित्रण किया गया है। सूदू के बेटे-बेटी, सोमारू और सोमली, की नक्सलवाद के कारण जो स्थिति होती है, वो भी विचित्र ही है। सोमारू जहां सुरक्षा बालों के विशेष दस्ते में चला जाता है, तो वहीं सोमली नक्सली लड़ाका बन जाती है। इन पात्रों के जरिये लेखक ने नक्सलवाद के बीच पिस रहे आदिम जीवन की विचित्र विडम्बनाओं को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है।
प्रो. नीलिमा, जूही, डॉ रत्नेश, पत्रकार शिवेश, छात्र साकेत ये वो पात्र हैं, जो एक ख़ास विचारधारा से प्रभावित बौद्धिक वर्ग द्वारा बुने जाने वाले शहरी नक्सलवाद के चक्रव्यूह से रूबरू करवाते हैं। जूही का चेहरा एक समाजसेवक का है, जो जगदलपुर से एनजीओ चलाती है। लेकिन जब पुलिस द्वारा नक्सलियों को मुठभेड़ में ढेर किया जाता है, तो मुठभेड़ को फर्जी बताकर पुलिस के खिलाफ माहौल बनाने लगती है। माहौल बनता है, तो दिल्ली से एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा प्रो. नीलिमा के नेतृत्व में एक तथ्यान्वेषी दल (फैक्ट फाइंडिंग टीम) मामले की जांच के लिए बस्तर भेजा जाता है। नीलिमा तथ्यों की जांच करने आती है, लेकिन बस्तर में पहुँचने पर वो आदिमों को नक्सलियों के समर्थन का पाठ पढ़ाने लगती है। उसकी बात का विरोध करता है सोयम और नक्सलियों के हाथों मारा जाता है। नीलिमा पर इल्जाम आता है, लेकिन फिर किस तरह शहरी नक्सलवादी गिरोह उसे बचाने के लिए मीडिया को  हथियार बनाकर काम करता है, उसकी एक बानगी उपन्यास के इस अंश में मिल जाती है जब जूही नीलिमा से कहती है, ‘तुम्हारे पति संपादक हैं न... नीलिमा!! हम बस्तर से चीख रहे हैं, कम चर्चा में आते हैं, तुम दिल्ली में खांसती भी हो तो वायरल फ़ैल जाता है। जो बात मैं कल पीसी में बोलने जा रही हूँ, वही दिल्ली के अखबारों में हेडलाइन्स होनी चाहिए। प्ले विक्टिम कार्ड डिअर...’

जेएनयू में नया-नया पढ़ने पहुंची अपराजिता तब चौंक जाती है जब उसके सामने सीनियर छात्र साकेत द्वारा ‘महिषासुर शहादत दिवस’ की परिकल्पना प्रस्तुत की जाती है। वो सोचती है, ‘कोई नवरात्रि ऐसी नहीं जिसमें वो व्रत न रखती हो। जेएनयू में एडमिशन के बाद भी इसबार वो पूरे नौ दिन उपवास में रही थी। उसे लगता था कि जिस प्रगतिशील माहौल में वो रह रही है, उसमें भी आस्था की अपनी जगह विद्यमान है। लेकिन क्या अब उसे महिषासुर को भी जिंदाबाद करना पड़ेगा?’ फिर भी इस विषय पर वो उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जब तर्कों के साथ ऐसे दिवस का प्रतिवाद करती है, तो किसी तार्किक जवाब की बजाय यह सुनने को मिलता है, ‘तुम संघियों की तरह बात कर रही हो। यह मनुवादियों की भाषा है।’ उसके सिगरेट न पीने को स्त्री-स्वतंत्रता के प्रश्न से जोड़ने वाला साकेत जब उसके देह के भूगोल को टटोलने की कोशिश करने लगता है, तो उसे समझते देर नहीं लगती कि ख़ास विचारधारा से प्रेरित इन कथित प्रगतिशीलों की नजर में स्त्री-मुक्ति का चिंतन देह के दायरे तक ही सिमटा हुआ है। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि अपराजिता के साथ साकेत का व्यवहार हो या जंगल में रुक्मती के साथ की जाने वाली आदिरेड्डी की बर्बरता हो, इससे एक बात एकदम साफ़ हो जाती है कि बन्दूक के दम पर सबके बीच समानता लाने की बात करने वाले नक्सली हों या शहरों में बैठे उन्हिकी तरह समानता के पैरोकार उनके हिमायती बौद्धिक, स्त्रियों को लेकर दोनों की दृष्टि एक ही समान है। दोनों की नजर स्त्री के शरीर के पार नहीं देख पाती। बहरहाल, अपराजिता और साकेत, इन दो पात्रों के जरिये लेखक ने यह विषय बड़े स्पष्ट ढंग से रखा है कि कैसे जब एक ख़ास विचारधारा का गढ़ माने जाने वाले जेएनयू में कोई नया छात्र पहुँचता है, तो उसका ब्रेनवाश करने की कोशिश चलने लगती है। अपराजिता जैसे अपनी जड़ों से जुड़े छात्र इस खेल को समझकर खुद को बचा लेते हैं, बाकी जाने-अनजाने इसका हिस्सा बन जाते हैं।
शिवेश एक पत्रकार है जो मीडिया में जमे इस गिरोह का प्रतिनिधित्व करता पात्र है। उसे जब पैसे के गड़बड़झाले के कारण नौकरी से निकाला जाता है, तो वो इसे अपनी आवाज को दबाने की कोशिश के रूप में प्रचारित करने में लग जाता है। खबर बन जाती है कि ‘बस्तर में पत्रकारों का काम करना असंभव’। ऐसे ही और भी अनेक पात्र हैं जो हमारे सामने नक्सलवाद के विविधवर्णी रूपों और उससे पीड़ित होने वालों की कहानी रखते जाते हैं।
चूंकि इस उपन्यास का जो विषय है, ऐसे विषयों की बड़ी चुनौती यह होती है कि इसमें लेखक को अनेक विचाधाराओं के घमासान से जूझते हुए अपनी लेखनी की निरपेक्षता को कायम रखना पड़ता है। यह चुनौती राजीव के समक्ष भी रही होगी। लेकिन प्रशंसनीय है कि उन्होंने खुद को किसी विचारधारा के अंध-समर्थन या अंध-विरोध में उलझने से बचाते और पूर्वाग्रहों से बचते हुए प्रस्तुत विषय के साथ यथासंभव न्याय किया है।  उपन्यास का ये अंश उल्लेखनीय होगा, ‘लाल हो, नीला हो या कि भगवा या कोई और रंग वैचारिक राजनीति सभी करते हैं। ... लेकिन कोई भी लेफ्ट जितना आर्गनाइज्ड नहीं है। वे इंस्टिट्यूशंस पर गहरी पकड़ रखते हैं... बाकी सभी पक्ष खुद को अपने राजनीतिक साझीदार से काटकर दिखाने का प्रयास नहीं करते, लेकिन यहाँ तो वाम राजनीति भी करना है और निरपेक्षता का लेबल भी चाहिए।’ इस अंश में हम देख सकते हैं कि लेखक ने साफ़ तौर पर स्वीकारा है कि विचारधारा की राजनीति सब पक्ष करते हैं, लेकिन वे इस तथ्य को झुठला भी नहीं सकते कि आजादी के बाद ज्यादा समय तक संस्थाओं पर काबिज रहने के कारण वाम विचारधारा की इनपर बेहतर पकड़ कायम हो चुकी है। लेकिन इस अंश में राजीव की यथासंभव लेखकीय निरपेक्षता प्रकट हुई है, जिसे उन्होंने पूरे उपन्यास में बनाए और बचाए रखा है। वे कभी किसी विचारधारा के पक्ष में खड़े नहीं दिखते बल्कि एक लेखक के रूप में जो सही है, उसके साथ खड़े रहते हैं।   
उपर्युक्त बातों से जाहिर है कि इस उपन्यास का विषय पात्रों और घटनाओं के लिहाज से न केवल व्यापक बल्कि जटिल भी है। बावजूद इसके इसे राजीव की किस्सागोई का कमाल ही कहेंगे कि ये उपन्यास पढ़ते हुए कमोबेश किसी ‘थ्रिलर’ का सा मजा आता है। इसकी जटिलता और गंभीरता के कारण बहुत अधिक ऊब की स्थिति नहीं बनती। हालांकि कहीं-कहीं ऐसा लगता है जैसे लेखक भूल गए हों कि वे उपन्यास लिख रहे हैं और किसी शोध-ग्रन्थ की तरह तथ्यों-घटनाओं का सपाट वर्णन कर डाले हों।
उदाहरण के तौर पर सूदू के साक्षात्कार में जब प्रवीरचंद की चर्चा आती है, उसके बाद सूदू और साक्षात्कारकर्ता गायब हो जाते हैं, और लेखक खुद प्रवीरचंद का पूरा इतिहास किसी इतिहास ग्रन्थ की तरह खुद बताने लगते हैं। ऐसे ही इसी साक्षात्कार में जब सूदू नक्सलियों की चर्चा करता है, तो सचिन की सोच के बहाने जिस तरह से लेखक द्वारा नक्सलवाद के विस्तृत इतिहास को बताया जाने लगता है, वो प्रभावी नहीं लगता। ये चीजें कहानी का हिस्सा नहीं, वरन उसपर थोपी गयी सी लगती हैं। ऐसा नहीं कह रहे कि उपन्यास में तथ्यों को रखने का ये तरीका चलता नहीं है। किसी वृहद् उपन्यास में इस तरह की प्रस्तुति एक हद तक चल सकती है, लेकिन 120 पन्ने के लघु उपन्यास में इस तरह का वर्णन होना, उसकी प्रभावोत्पादकता को कम ही करता है। लेखक ये बातें यदि कहानी में पिरोकर या पात्रों के मुंह से सामने लाते तो उपन्यास और अधिक प्रभावी बन सकता था।
भाषा की बात करें तो बस्तरिया पात्रों के संवाद की भाषा में वहाँ की क्षेत्रीयता का पुट डालने की कोशिश की गयी है, जो प्रभावी प्रतीत होता है। आज जब बहुत-से नए लेखकों द्वारा हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों का न केवल धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा बल्कि उसे सही साबित करने के लिए तरह-तरह की दलीलें भी गढ़ी जा रही हैं, ऐसे में राजीव जैसे लेखकों का यथासंभव अंग्रेजीमुक्त हिंदी लिखना और प्रभावी ढंग से लिखना संतोष पैदा करता है।
कुल मिलाकर यह उपन्यास बन्दूक लेकर खड़े प्रत्यक्ष नक्सलियों की क्रूरता के साथ-साथ अलग-अलग बौद्धिकता के आवरण में छिपे अप्रत्यक्ष नक्सलियों के पूरे नेटवर्क को भी सामने लाता है। जो पाठक इस नक्सलवाद पर गंभीर किताबों से परहेज करते हैं, उन पाठकों को रोचक ढंग से इस विषय की व्यापक समझ प्रदान करने के लिहाज से यह उपन्यास एक महत्वपूर्ण कृति है।

बुधवार, 24 जुलाई 2019

हिंदी का अर्थहीन विरोध (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

पिछले दिनों एमडीएमके महासचिव और राज्यसभा सांसद वाइको ने हिंदी को एक जड़हीन भाषा बताते हुए दावा किया कि संसद में बहस का स्तर गिरने का मुख्य कारण हिंदी को थोपा जाना है। इसी क्रम में वाइको ने यह अनोखा ज्ञान भी दे डाला कि हिंदी में कोई साहित्य नहीं है। साथ ही, उन्होंने संसद में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आदि के हिंदी में अपनी बात रखने पर भी आपत्ति जताई। यूँ तो दक्षिण भारतीय नेताओं का हिंदी विरोध कोई अनोखी बात नहीं है, लेकिन यहाँ हिंदी विरोध में वाइको ने जो तर्क दिए हैं, वे न केवल अमान्य और निराधार हैं, बल्कि हास्यास्पद भी हैं। इन तर्कों को देखते हुए यही कह सकते हैं कि या तो वाइको वाकई में हिंदी भाषा और साहित्य की समृद्ध परम्परा के प्रति अज्ञानता का शिकार हैं अथवा अपने अंधविरोध में जानबूझकर इसे अनदेखा कर रहे हैं।
सबसे पहले बात वाइको के हिंदी में कोई साहित्य न होने के दावे की करें तो उल्लेखनीय होगा कि प्रख्यात आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित अधिकांश विद्वानों ने हिंदी साहित्य का जो कालक्रम प्रस्तुत किया है, उसके अनुसार थोड़े-बहुत अंतर के साथ हिंदी भाषा और साहित्य की आयु लगभग हजार वर्ष हो चुकी है, जिसमें आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल के क्रम में इसकी विकासयात्रा चली है। यहाँ स्थानीय भाषाओं के कट्टर समर्थकों का तर्क होता है कि इस हजार वर्ष में केवल आधुनिक काल का साहित्य ही वर्तमान हिंदी भाषा यानी खड़ी बोली का साहित्य है, शेष साहित्य स्थानीय भाषाओं यथा ब्रज, अवधी आदि का है। लेकिन ऐसा तर्क देने वाले वही लोग हैं जिन्हें हिंदी भाषा के वास्तविक स्वरूप की पहचान नहीं है।
भारत जिस प्रकार विविधताओं में एकता वाला देश है, इसकी भाषा के रूप में हिंदी भी वैसी ही है। इस देश की अधिकांश भाषाओं की तरह संस्कृत से जन्मी हिंदी ने भारतीय संस्कृति के समन्वयकारी स्वरुप का अनुकरण करते हुए अपने भीतर देशी-विदेशी अनेक भाषाओं-बोलियों के शब्दों का समावेश किया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी भाषा और साहित्य के स्वरूप व परम्परा को रेखांकित करते हुए लिखा है, ‘हमारे व्यावहारिक और भावात्मक जीवन से जिस भाषा का सम्बन्ध सदा से चला आ रहा है, वह पहले चाहें जो कुछ कही जाती रही हो, अब हिंदी कही जाती है। यह वही भाषा है जिसकी धारा कभी संस्कृत के रूप में बहती थी, फिर प्राकृत और अपभ्रंस के रूप में और इधर हजार वर्ष से इस वर्तमान रूप में जिसे हिंदी कहते हैं, लगातार बहती चली आ रही है। यह वही भाषा है जिसमें सारे उत्तरीय भारत के बीच चन्द्र और जगनिक ने वीरता की उमंग उठाई; कबीर, सूर और तुलसी ने भक्ति की धारा बहाई; बिहारी, देव और पद्माकर ने श्रृंगार रस की वर्षा की, भारतेंदु, प्रतापनारायण मिश्र ने आधुनिक युग का आभास दिया और आज आप व्यापक दृष्टि फैलाकर सम्पूर्ण मानव जगत के मेल में लानेवाली भावनाएं भर रहे हैं।
हिंदी के प्रभाव में स्थानीय बोलियों-भाषाओं का ह्रास हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। अपने-अपने क्षेत्र विशेष में उनका स्वतंत्र अस्तित्व यथावत कायम है। हिंदी के जरिये बस इन सबका राष्ट्रीयकरण हुआ है; इन्हें एक राष्ट्रीय पहचान मिली है। आज जो संघर्ष हिंदी अंग्रेजी से कर रही है, हिंदी के न होने की स्थिति में वो संघर्ष इन क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों को करना पड़ता और इस स्थिति में जैसे अतीत में बिखराव के कारण अंग्रेजों के समक्ष हमारे देशी राजा नष्ट हो गए थे, ठीक उसी तरह अंग्रेजी के सामने ये भाषाएँ-बोलियाँ भी नष्ट हो गयी होतीं। अतः हिंदी की छत्रछाया में ये भाषाएँ-बोलियाँ अंग्रेजी के प्रकोप से सुरक्षित हैं, ये बात इनके समर्थकों को समझनी चाहिए। 
हिंदी साहित्य की रचनात्मक समृद्धि पर नजर डालें तो हजार वर्षों की इसकी परम्परा में से आदि, मध्य, आधुनिक किसी एक कालखंड को भी यदि उठा लिया जाए तो हिंदी साहित्य की समृद्धि का आभास कराने लायक पर्याप्त रचनाएं मिल जाएंगी। फिर चाहें वो आदिकाल का विख्यात रासो साहित्य हो या भक्तिकाल में बाबा तुलसी द्वारा रचित भारतीय समाज के लिए पूज्य हो चुका श्रीरामचरितमानसहो, कृष्ण की बाल-लीलाओं को जनमन तक पहुंचाने वाला सूरसागर हो, सामाजिक विसंगतियों और रूढ़ियों पर चोट करता कबीर-साहित्य हो, श्रृंगार और अध्यात्म का महाकाव्य पद्मावतहो या रीतिकाल में गागर में सागर भरती बिहारी की सतसई हो अथवा आधुनिक काल में भारतेंदु से लेकर मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद, प्रसाद, पन्त, निराला, महादेवी, दिनकर आदि अनेक रचनाकारों की एक से बढ़कर एक रचनाएँ हों, ये सब हिंदी के समृद्ध साहित्यकोश का ही प्रमाणन करती हैं। वाइको को इनमें से किसी एक काल के साहित्य का भी जरा-सा अध्ययन कर लेना चाहिए, इसके बाद हिंदी की साहित्यिक समृद्धि को लेकर उनका भ्रम अवश्य दूर हो जाएगा।     
जहां तक बात संसद में बहस का स्तर गिरने की है, तो इसमें जरूर सच्चाई है। इसमें कोई दोराय नहीं कि अब हमारी संसद में सारगर्भित बहस और विचार-विमर्श कम, बेमतलब की हंगामेबाजी एवं आरोप-प्रत्यारोप ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। लेकिन इसके लिए हिंदी को दोष देना पूरी तरह से अनर्गल बात है। संसद में हिंदी में बात रखने वाले अनेक राजनेता रहे हैं, जिनके वक्तव्य आज भी संसदीय भाषणों के इतिहास में अग्रणी स्थान रखते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं। अटल जी के भाषण भारतीय संसदीय परम्परा के इतिहास में  सर्वाधिक लोकप्रिय भाषण माने जा सकते हैं। इनके अलावा वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज जैसे नेता संसद में प्रायः हिंदी में ही अपनी बात रखते रहे हैं और इनके भाषण तथ्य-तर्क-प्रस्तुति हर मामले में उत्कृष्ट भी होते हैं। संसद में यदि बहस का स्तर गिरा है तो इसके पीछे अन्य कारण हैं जैस कि अब हमारे ज्यादातर माननीय अध्ययन की संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। पहले के नेता पढ़ने-लिखने में जिस तरह की रुचि लेते थे, अब के नेताओं में वो गुण कम हुआ है। अब बिना अध्ययन और चिंतन-मनन के किसी भी भाषा में बात रखी जाए, वो प्रभावी नहीं हो सकती। अतः ये भाषा की नहीं, ज्ञान की समस्या है। अतः वाइको को यदि वाकई में संसद में बहस का स्तर गिरने की चिंता है तो वे इसमें अपनी हिंदी विरोध की राजनीति घुसाने की बजाय सांसदों में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रयास करें। कुछ नहीं तो कम से कम हिंदी साहित्य का अध्ययन कर अपनी ज्ञानवृद्धि तो कर ही लें।

शुक्रवार, 21 जून 2019

लोकतंत्र का मखौल बनातीं ममता [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

पश्चिम बंगाल इस समय लगातार चर्चा में बना हुआ है, मगर दुर्भाग्यवश चर्चा के कारण नकारात्मक हैं। बीते दिनों डॉक्टरों पर हमले के बाद राज्य सरकार के अड़ियल रवैये के कारण उनकी हड़ताल का जो प्रकरण घटित हुआ, उसका असर पूरे देश में दिखाई दिया। शुरुआत में डॉक्टरों के प्रति अनावश्यक सख्ती दिखाने के बाद आखिर ममता सरकार को उनके आगे झुकना पड़ा और उनकी मांगे माननी पड़ीं, लेकिन यही काम यदि पहले कर लिया गया होता तो ये मामला शायद इतना न बिगड़ता।
दूसरी तरफ केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने एडवाइजरी जारी करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार पर राज्य में हिंसा रोकने व क़ानून का शासन सुनिश्चित करने में विफल रहने का आरोप लगाया है। साथ ही, केंद्र ने ममता सरकार से राजनीतिक हिंसा और उसके दोषियों पर हुई कार्रवाई का विवरण देने को भी कहा है। गृहमंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक़ बीते वर्षों के दौरान राज्य में राजनीतिक हिंसा की घटनाओं में लगातार इजाफा हुआ है। वर्ष 2016 में जहां बंगाल में 509 राजनीतिक हिंसा की घटनाएं हुई थीं, वहीं 2018 में ये आंकड़ा 1035 तक जा पहुंचा जबकि इस वर्ष अभी इन छः महीनों में ही 773 हिंसा की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इन आंकड़ों से इतर हाल के कुछ वर्षों में बंगाल की राजनीति का अवलोकन करने पर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य में क़ानून-व्यवस्था की क्या स्थिति है। अभी बीते लोकसभा चुनाव और उससे पूर्व पंचायत चुनाव में ही बंगाल में जो हिंसात्मक घटनाएं हुईं, वो राज्य की क़ानून-व्यवस्था की कलई खोलने के लिए काफी हैं। टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या और उनपर हमले के जो मामले सामने आए हैं, वे ममता सरकार के अपराध व अपराधियों के आगे बेबस हो चुकी क़ानून-व्यवस्था की ही कहानी कहते हैं। इसके अलावा मालदा, धूलागढ़, रानीगंज, आसनसोल आदि राज्य के अनेक क्षेत्रों में सांप्रदायिक टकराव की घटनाएं भी यही बताती हैं कि ममता बनर्जी के राज में अराजकता और अशांति बंगाल की नियति बन गए हैं।
अब जब केंद्र में नयी सरकार का गठन हुआ है और गृहमंत्रालय राजनाथ सिंह से हटकर अमित शाह के पास आ गया है, ऐसे में बंगाल की उक्त स्थिति को देखते हुए गृहमंत्रालय की तरफ से क़ानून-व्यवस्था को लेकर जानकारी माँगना उचित ही है। परन्तु, ममता बनर्जी इस विषय को भी राजनीति से जोड़ते हुए केंद्र पर आरोप लगाने में लगी हैं। उन्हें गृहमंत्रालय के जवाब मांगने में भी राजनीति नजर आ रही है। एकबार के लिए मान लेते हैं कि इसमें राजनीति हैं, लेकिन इससे यह तथ्य तो बदल नहीं जाता कि ममता सरकार राज्य में क़ानून का शासन स्थापित करने में विफल रही है।

केंद्र से टकराव की राजनीति
दिल्ली में केंद्र से जो टकराव की राजनीति केजरीवाल करते रहे हैं, बंगाल में ममता उससे भी दो कदम आगे निकल चुकी हैं। देखा जाए तो वास्तव में उनका विरोध केंद्र की सरकार से नहीं, भाजपा से है। इसी कारण वर्ष 2014 में जब केंद्र में भाजपा की सरकार आई, उसके बाद से ही केंद्र से उनके सम्बन्ध बिगड़ने शुरू हो गए। कोई भी विषय हो, वे आँख बंद करके केंद्र सरकार के विरोध में उतरी रहती हैं। अभी हाल ही में जिस तरह कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से शारदा चिटफंड मामले में पूछताछ करने गयी सीबीआई के साथ ममता सरकार ने बर्ताव किया, वो केंद्र के साथ उनके टकराव का सबसे ताजा और सशक्त उदाहरण है। हालांकि इसी मामले में जब न्यायालय ने राजीव कुमार को पूछताछ के लिए सीबीआई के समक्ष उपस्थित होने का फैसला सुनाया, तो इससे ममता सरकार को सबक लेना चाहिए था। मगर, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।
केन्द्रीय योजनाओं की उपेक्षा
केंद्र से ममता बनर्जी की चिढ़ का आलम ये है कि उन्होंने बंगाल में तमाम केन्द्रीय योजनाओं को भी लागू नहीं किया है। केंद्र सरकार की गरीबों को पांच लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा देने वाली आयुष्मान योजना वहाँ लागू नहीं की गयी है। इस योजना के तहत 60 प्रतिशत खर्च केंद्र को और 40 प्रतिशत राज्य सरकार को वहन करने का प्रावधान है, बस इसी बात को बहाना बनाकर ममता बनर्जी ने अपने हिस्से का खर्च वहन करने से इनकार करते हुए इस योजना से बाहर रहने का ऐलान कर दिया। स्वास्थ्य, राज्य सूची का मामला है, सो इसमें राज्य सरकार की सहमति के बिना केंद्र बहुत कुछ कर नहीं सकता। यहाँ तो खर्च वहन न करने का बहाना था, मगर ममता का ऐसा ही गतिरोधी  रुख ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना’ को लेकर भी है जिसका पूरा खर्च केंद्र वहन कर रहा है। किसान सम्मान निधि योजना में राज्यों की भूमिका बस इतनी है कि उन्हें अपने यहाँ से इस राशि की पात्रता रखने वाले किसानों की सूची भेजनी है। लेकिन ममता सरकार ने सूची ही अटका ली है। केंद्र द्वारा बार-बार कहे जाने के बावजूद अबतक पश्चिम बंगाल की सूची नहीं भेजी गयी है, जिस कारण वहाँ के किसान इस योजना के लाभ से वंचित हो रहे हैं। ममता की ही राह पर दिल्ली में उनके चहेते केजरीवाल भी हैं, इस कारण दिल्ली के किसानों को भी योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा।
गौरतलब है कि संविधान में केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर तमाम प्रावधान करते हुए यही अपेक्षा की गयी है कि ये दोनों परस्पर समन्वय और समझ के साथ राष्ट्र की प्रगति के लिए कार्य करेंगे, मगर अभी केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच जो सम्बन्ध दिख रहे हैं, वो इस संवैधानिक अपेक्षा के बिलकुल ही विपरीत हैं। 
केंद्र-राज्य संबंधों पर संवैधानिक पक्ष
ब्रिटिश हुकुमत के समय भारतीय शासन व्यवस्था का स्वरूप केंद्रीकृत और एकात्मक था। भारत को गुलाम बनाए रखने के लिए यही शासन प्रभावी था। परन्तु, आजादी के बाद जब हमारा संविधान बना तो उसमें भारत को ‘राज्यों के संघ’ के रूप में प्रतिसूचित किया गया। केंद्र-राज्य संबंधों के तीन प्रकारों का जिक्र संविधान में मिलता है – विधायी सम्बन्ध, प्रशासनिक सम्बन्ध और वित्तीय सम्बन्ध। इसी प्रकार केंद्र-राज्य के बीच कार्य-विभाजन को लेकर तीन सूचियों संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची की व्यवस्था भी सविधान में की गयी है।
संघ सूची में वर्णित विषयों पर क़ानून बनाने व निर्णय लेने का अधिकार संसद व केंद्र सरकार को है, राज्य सूची के विषयों में समान अधिकार विधानसभा व राज्य सरकार को है, वहीं समवर्ती सूची में वर्णित विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों को क़ानून बनाने का अधिकार है। लेकिन यदि कभी समवर्ती सूची के किसी विषय को लेकर केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव उत्पन्न होता है, तो ऐसे में केंद्र के क़ानून के ही मान्य होने की व्यवस्था है। इन सूचियों में शामिल विषयों पर नजर डालें तो संघ सूची में ऐसे विषय शामिल किए गए हैं, जो सीधे तौर पर राष्ट्रीय हित को प्रभावित करने वाले हैं और जिनको लेकर पूरे देश में एकरूपता होनी अनिवार्य है जैसे कि रेल, रक्षा आदि। राज्य सूची में शामिल विषय ऐसे हैं जो हित और व्यवहार के स्तर पर विविधता की छूट देते हैं जैसे कि स्वास्थ्य, कृषि, परिवहन आदि। समवर्ती सूची में ऐसे विषयों को शामिल किया गया है, जिन्हें लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता अपेक्षित अवश्य है, परन्तु अनिवार्य नहीं जैसे कि शिक्षा, जनसंख्या नियंत्रण, बिजली वितरण आदि। इस प्रकार स्पष्ट है कि संविधान में केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों के समन्वय करने का प्रयास तो किया गया है, परन्तु विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से केंद्र को राज्यों पर संप्रभुता भी प्रदान की गयी है। किसी आपात स्थिति के समय राज्यों के पूरी तरह से केंद्र के अधीनस्थ हो जाने की व्यवस्था इसीका उदाहरण है।
केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों को लेकर संविधान के अनुच्छेद-257 में कहा गया है कि हर राज्य की अपनी कार्यपालिका की शक्ति का प्रयोग इस प्रकार करे कि वो संघ की कार्यपालिका-शक्ति के मार्ग में बाधक न बने। वर्तमान में ममता बनर्जी जिस तरह से केंद्र की योजनाओं में राज्य-स्तर पर अवरोध पैदा कर रही हैं, वो संविधान विरोधी कृत्य है।
वित्तीय संबंधों की बात करें तो प्रत्येक पांच वर्ष पर वित्त आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है जिसका काम केंद्र-राज्य के बीच कर-प्राप्तियों के वितरण की जांच करना और सहायता-अनुदान सम्बन्धी नियमों का निर्धारण करना है। अबतक देश में पंद्रह वित्त आयोग गठित किए जा चुके हैं।
ममता की अलोकतांत्रिकता
संविधान चाहें जो भी कहता हो, ममता बनर्जी को शायद उससे कोई सरोकार नहीं है। ऐसा लगता है जैसे वे बंगाल में एक अलग ही शासन का ढर्रा जमाने में जुटी हुई हैं। हाल के उनके कुछ निर्णयों व वक्तव्यों पर नजर डालें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि वे नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री ही नहीं मानती। देश के मतदाताओं द्वारा बहुमत से चुने गए प्रधानमंत्री के प्रति एक राज्य की मुख्यमंत्री का इस तरह की बात कहना क्या देश की जनता और लोकतान्त्रिक व्यवस्था का अपमान नहीं है? अब उन्होंने एक और फरमान सुनाया है कि बंगाल में रहना है तो बांग्ला ही बोलनी होगी। बांग्ला बोलने में कोई बुराई नहीं है, मगर उसे इस तरह सबपर थोपना भारतीय संस्कृति की विविधता पर कुठारघात करने के साथ-साथ संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन भी है।  इसी तरह पिछले दिनों राज्य में जय श्रीराम का नारा लगाए जाने पर गिरफ्तारी करवाकर भी ममता बनर्जी ने बंगाल में अपने अलोकतांत्रिक शासन का ही एक नमूना पेश किया।
निष्कर्ष
दरअसल बंगाल में भाजपा के बढ़ते जनाधार और राजनीतिक सफलताओं को देखते हुए कहीं न कहीं ममता बनर्जी को यह लगने लगा है कि राज्य में उनकी राजनीतिक जमीन खिसक रही है। इसी कारण उन्होंने अपनी राजनीति को भाजपा विरोध की तरफ एकोन्मुख कर रखा है। किसी भी बात पर वो भाजपा और उसके नेतृत्व वाली सरकार का विरोध करने का मौका नहीं छोड़ रहीं। केंद्र की योजनाओं को राज्य में लागू कर वे भाजपा को किसी प्रकार का श्रेय नहीं देना चाहतीं। परन्तु, अपनी इस राजनीति के उत्साह में ममता बनर्जी भूल गयी हैं कि वे सिर्फ टीएमसी की नेता नहीं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री भी हैं और इस नाते उनका संवैधानिक दायित्व बनता है कि केंद्र के साथ मिलकर राज्य की जनता के कल्याण और विकास के लिए काम करें। संघीय ढाँचे में केंद्र और राज्य दोनों को परस्पर समझ व सहयोग की भावना के साथ काम करना होता है, संविधान में इसीका प्रतिपादन किया गया है, परन्तु ममता बनर्जी अपने राजनीतिक हितों के लिए संघीय ढाँचे को भी नुकसान पहुंचाने में लगी हैं।
वे ताकत के दम पर अपनी सत्ता को स्थायी करना चाहती हैं, मगर उन्हें समझना चाहिए कि ये लोकतंत्र है, जहां ताकत से नहीं, जनमत से निर्णय होते हैं और जनमत को अपने पक्ष में करने का केवल एक ही उपाय है कि संकीर्ण राजनीतिक हितों व स्वार्थों को छोड़ सकारात्मक सोच के साथ देश की प्रगति के लिए कार्य किया जाए। अन्यथा लोकसभा चुनाव में जिस जनता ने उनकी सीटें कम की है, वो विधानसभा में उनका सूपड़ा भी साफ़ कर सकती है।