कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

विधाओं की मृत्यु का बेसुरा राग (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

हिंदी के एक कवि हैं मंगलेश डबराल। वर्ष 2015 में पुरस्कार वापसी प्रकरण के दौरान पुरस्कार वापस करने को लेकर चर्चा में आए थे, लेकिन इसके बाद एक लम्बे समय से उनकी कोई चर्चा नहीं थी। उन्होंने कुछ नया रचा हो, उसपर कोई विमर्श हुआ हो, ऐसी किसी तरह की कोई बात उनके विषय में सुनने में नहीं आई। लेकिन अभी पिछले दिनों अचानक एक फेसबुक पोस्ट लिखकर वे नकारात्मक रूप से ही सही, चर्चा में आ गए। उन्होंने लिखा, ‘हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास बहुत लिखे जा रहे हैं, लेकिन सच यह है कि इन सबकी मृत्यु हो चुकी है हालांकि ऐसी घोषणा नहीं हुई है और शायद होगी भी नहीं क्योंकि उन्हें खूब लिखा जा रहा है।लेकिन हिंदी में अब सिर्फ 'जय श्रीराम' और 'बन्दे मातरम्' और 'मुसलमान का एक ही स्थान, पाकिस्तान या कब्रिस्तान' जैसी चीज़ें जीवित हैं। इस भाषा में लिखने की मुझे बहुत ग्लानि है। काश, मैं इस भाषा में न जन्मा होता!डबराल की पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर इसको लेकर लेखकों, साहित्य में रुचि लेने वाले सामान्य लोगों के बीच चर्चाओं-बहसों का दौर शुरू हो गया। ज्यादातर मुद्दों की तरह इसपर भी दो खेमे बन गए। एक खेमा डबराल के विरोध में तो दूसरा उनके बचाव में जुट गया। विरोधियों को ज्यादा आपत्ति उनकी ग्लानि वाली बात पर थी। लोग सवाल उठा रहे थे कि जिस भाषा ने इन कविवर को इतना मान-सम्मान दिया, आज उसमें लिखने को लेकर ये ग्लानि व्यक्त करने जैसी कृतघ्नता कैसे कर सकते हैं। वहीं बचाव करने वाले पोस्ट को अभिधा की बजाय व्यंजना में समझने की बात कहते हुए डबराल के पक्ष में दलीलें देने लगे। हालांकि हिंदी के विषय में पूर्वाग्रहजनित मनमाफिक धारणाएँ प्रस्तुत करते हुए उसमें लिखने के प्रति ग्लानि व्यक्त करने में कौन-सी व्यंजनात्मकता छुपी है, ये बहुत विचार करने पर भी समझ में नहीं आता। बहरहाल, विवाद बढ़ता देख कविवर ने अपनी पोस्ट संपादित करते हुए उसमें से चुपचाप ग्लानि वाली बात हटा दी है। लेकिन क्या इस पोस्ट का केवल इतना ही हिस्सा आपत्तिजनक है, जो इसे हटाकर डबराल सवालों से बच जाना चाहते हैं। वास्तव में, ये पूरी पोस्ट ही भ्रामक, तथ्यहीन और कुंठाओं की उपज है।
कहानी, कविता, उपन्यास जैसी विधाओं की मृत्यु की घोषणा एवं अनर्गल ढंग से हिंदी को सांप्रदायिक करार देने की कोशिश इस पोस्ट की सबसे ज्यादा आपत्तिजनक बात है। मंगलेश डबराल को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर उन्होंने किस आधार पर हिंदी के साम्प्रदायिकरण का दावा किया है? यह भी कि उक्त तीन प्रमुख विधाओं को मृत बताने के पीछे उनके पास क्या तर्क, क्या तथ्य हैं? क्या आज इन विधाओं में जो साहित्य लिखा जा रहा है, उसको उन्होंने सम्यक प्रकार से पढ़ा है?
ये आवश्यक नहीं कि जिसे वे बेहतर साहित्य मानते हों, वो ही बेहतर हो और जो उनकी दृष्टि में उत्तम न हो, उसे अस्वीकार दिया जाए। साहित्य किसी एक व्यक्ति की थाती नहीं, पूरे समाज की एक परम्परा होता है। विधाओं की मृत्यु की घोषणा करने से पूर्व यह बात मंगलेश डबराल को सोचनी चाहिए थी। वे आज के लेखन पर तर्कों के साथ सवाल खड़े कर सकते थे, मगर उसे मृत घोषित कर देना कदापि उचित नहीं है।
किसी विधा के जीवित होने का प्रमाण क्या है? यही न कि उसमें कितना साहित्य रचा जा रहा है और उसे कितनी स्वीकृति मिल रही है। सो हिंदी उपन्यास और कहानी आज भी बड़ी मात्रा में रचे जा रहे हैं व समकालीन समस्याओं, चुनौतियों व जीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त करने के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित हैं। विषयवस्तु से लेकर भाषा-शैली तक इन विधाओं ने पूर्व की तुलना में बहुत विकास किया है। आज वरिष्ठ लेखक नरेंद्र कोहली की कलम से वरुणपुत्रीजैसा पुरातनता, आधुनिकता, पुराण और विज्ञान के साथ-साथ फैंटेसी को भी समाहित किया उपन्यास निकल रहा है। वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुद्गल किन्नरों पर केन्द्रित पोस्ट बॉक्स नम्बर- 203 नाला सोपाराकी रचना की हैं। रत्नेश्वर जैसे लेखक भी हैं, जिन्होंने ग्लोबल वार्मिंग जैसी विश्वव्यापी समस्या पर शोध के साथ रेखना मेरी जानलिखा है और आगे पानी पर एक शोधपूर्ण उपन्यास लाने में जुटे हैं। ये सब हाल के वर्षों में आए कुछ उपन्यासों के नाम हैं, ऐसी और भी अनेक कृतियाँ इस दौरान आई हैं, इन उदाहरणों का आशय बस इतना है कि वर्तमान समय में हिंदी उपन्यास का फलक लगातार विस्तार को प्राप्त हो रहा है। नए लेखक भी लिख और बिक दोनों रहे हैं तथा अपने साहित्यिक काल के निर्माण में जुटे हैं। हिंदी कहानी भी अलग-अलग प्रयोगों के साथ अपनी भूमिका का संतोषजनक निर्वहन कर रही है। हालांकि इन विधाओं के साथ कुछेक चुनौतियाँ व समस्याएँ भी हैं, मगर इनके अस्तित्व पर कोई संकट हो, ऐसा बिलकुल नहीं है।
अब बात हिंदी कविता की करें तो यह ठीक है कि आज उसकी दशा कहानी व उपन्यास जैसी विधाओं की अपेक्षा बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती। हिंदी में कविताएँ रची तो आज भी खूब जा रही हैं, लेकिन उनमें कविता के वो तत्व नहीं दिखाई देते जिनके जरिये वो जनसामान्य से सहज ही जुड़ाव स्थापित कर लेती थी। आज मुख्यधारा की हिंदी कविता केवल बौद्धिक चारदीवारी के भीतर विमर्श की वस्तु बनकर रह गयी है।
वास्तव में एक विधा के रूप में हिंदी कविता के विनाश की शुरुआत वामपंथी विचारधारा से प्रभावित प्रगतिवादी युग से ही हो गयी थी। प्रगतिवादी युग में हिंदी कविता को छायावाद के कल्पना-लोक से हकीकत की जमीन पर लाकर सामाजिक यथार्थ से जोड़ने के नाम पर वामपंथी रचनाकारों द्वारा जिस तरह से इसकी शिल्पगत कसौटियों को एक-एक कर भंग करने की कु-परम्परा का सूत्रपात किया गया, उसीने हिंदी कविता की वर्तमान दुर्दशा की पृष्ठभूमि का निर्माण किया। हिंदी कविता की इस दुर्दशा में आज उसके हाल पर व्यथित हो रहे मंगलेश डबराल और उनके साथी कवियों का दोष भी कम नहीं है। इन्होने जो काव्य-रचना की है, वो केवल इन लोगों के आपसी विचार-विमर्श तक सीमित है, जनसामान्य के लिए उसमें कोई आकर्षण नहीं है। इस दुर्दशा के बावजूद हिंदी कविता अभी मरी नहीं है, वो जीवित है और मंचीय कवियों के कंठ में सांस ले रही है और उम्मीद है कि देर-सबेर यहीं से वो अपने अस्तित्व का नया अध्याय लिखेगी। अतः मंगलेश डबराल यदि हिंदी साहित्य की समृद्ध की दिशा में कुछ नहीं कर पा रहे तो कम से कम उन्हें विधाओं की मृत्यु का बेसुरा राग गाना तो बंद ही कर देना चाहिए।

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

पुस्तक समीक्षा : स्त्री-हृदय की अंतर्कथाओं को उद्घाटित करती कविताएँ [दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
स्त्री के अनेक रूप होते हैं, जिनमें से एक रूप ‘गृहिणी’ का भी है। ऊपर-ऊपर से तो इसे सिर्फ एक गृहिणी की भूमिका के रूप में समझा जाता है, किन्तु इस एक भूमिका में स्त्री कितनी भूमिकाओं को जीती है और प्रत्येक भूमिकानुसार स्वयं में कितने रूपों को रचती है, इसकी शुद्ध साहित्यिक झाँकी यदि आपको एक धारा-प्रवाह में देखनी है, तो डॉ मोनिका शर्मा का कविता संग्रहदेहरी के अक्षांश परनिस्संदेह आपके लिए पठनीय है। ‘देहरी के अक्षांश पर’ की कविताएँ घर की धुरी पर अनगिनत भूमिकाओं में धरती जैसे धैर्य के साथ अनवरत घूमती स्त्री के भीतर उपजी अनेक अंतर्कथाओं को बड़े ही प्रवाहपूर्ण और साहित्यिक ढंग से अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं। यह कविताएँ ऐसी स्त्री के मनोभावों को स्वर देती हैं, जो गृहिणी है और उसके मन में अपने गृहिणित्व के प्रति न तो कोई हीनताबोध है, न ही इसे वो कमतर मानती है। लेकिन, उसका क्षोभ यह है कि उसके इस महती और गंभीर दायित्व को समाज, विशेषतः पुरुष-समाज, महत्वहीन समझता है। वो इसपर पुरुष समाज को इंगित करते हुए कहती है – ...काश कि कभी तुमने मेरे हृदय के पन्ने पलटकर देखे होते/जो अकथित है उससे अनभिज्ञ न रहते/फिर हर दिन ये न कहते/ कुछ आता भी है तुम्हे। 
दैनिक जागरण

अपने कार्य-क्षेत्र के प्रति समाज में व्याप्त ये हीनताबोध उसे अंदर ही अंदर सालता है। उसे कष्ट है कि किचन के अर्थशास्त्र, सगे-सम्बन्धियों के साथ बरते जाने वाले व्यवहार का समाजशास्त्र, घर आने वाले मेहमानों का मनोवज्ञान, समाज, परिवार द्वारा जाने-अनजाने दिए जाने वाले हर आघात को सहते हुए मुस्कराने का अभिनय-ज्ञान और बच्चों को एक लोरी में सुला देने के अनूठे संगीत-ज्ञान आदि अनेक विषयों को समाहित करने वाली गृहस्थी की स्वामिनी के दायित्व को क्यों हीन दृष्टि से देखा जाता है। इन सब दायित्वों को निर्वाह करने वाली वो व्यावहारिक रूप से गृहस्वामिनी ही है, किन्तु पुरुष समाज उसके कार्यों के प्रति तो निम्न दृष्टि रखता ही है, उसे भी इन कार्यों हेतु एक ‘अनुबंधित परिचारिका-सी’ ही समझ लेता है। रिश्तों के तानों-बानों को सहेजते हुए, संबंधों में आए उतार-चढ़ावों को समतल करते हुए फिरकनी-सी इधर-उधर घूमती रहती है, जिसके प्रतिफल में पुरुष की तरफ से उठा ये प्रश्न उसे निरुत्तर कर देता है कि – करती क्या हो दिन भर घर में। उसका मूल्यांकन करते समय ‘..हर बार असफल ही घोषित की जाती है स्त्री’ और फिर ‘अस्तित्वगत प्रतिभा से परितृप्त/हर जवाबदेही के लिए चाक-चौबंद/उसके परिश्रमी व्यक्तित्व को कार्यभार तो मिलता है/आभार नहीं’। अपने दायित्वों के निष्ठावान निर्वहन के रिपोर्ट कार्ड के रूप में उसे बिना किसी कृतज्ञता के कुछ हिदायतें और नये दायित्व प्राप्त हो जाते हैं। ऐसी उपेक्षित स्थिति में उसके अंतस से यही पुकार उठती है कि – सारे घर की धुरी वह/फिर भी/अधूरी वह।

यह समझना कठिन नहीं है कि ‘देहरी के अक्षांश पर’ की कविताओं के द्वारा कवयित्री वर्तमान की बहुतायत प्रगतिशील स्त्रीवादियों जो स्त्री के गृहिणी रूप को कमतर समझते और व्याख्यायित करते हैं, के विपरीत गृहिणी को एक अलग ही गरिमामय प्रतिष्ठा प्रदान करने का सार्थक और सफल प्रयत्न करती हैं। साथ ही, वे गृहिणी के उस गरिमामय रूप को सार्वजनिक स्वीकृति दिलाने के लिए भी अपना पक्ष मुखर ढंग से रखती हैं। निस्संदेह स्त्री-विषयक इस तरह के कथ्य पर बात तो होती है, किन्तु इसपर आधारित काव्य-रचनाएँ काफी कम हुई हैं। ऐसे में, कह सकते हैं कि यह कविताएँ भाव के स्तर पर काफी हद तक ताज़गी लिए हुए हैं

भाषा की बात करें तो वो शुद्ध साहित्यिक हिंदी है, जिसमें हिंदी की अपनी शब्द-संपदा में से ही विशेषतः तत्सम शब्दावली के प्रयोग का भरसक प्रयास किया गया है। हालांकि अन्य भाषाओँ के शब्दों के प्रति कोई वर्जना नहीं दिखती, मगर रचनाओं की मुख्य भाषा तत्सम हिंदी ही है। बड़ी-बड़ी बातों को अपनी छोटी-छोटी पंक्तियों में पिरो देना मोनिका की भाषा की विशेषता कही जा सकती है। हालांकि इस शुद्ध साहित्यिक हिदी के कारण कथ्य का सम्प्रेषण कहीं-कहीं तनिक दुरूह अवश्य हो गया है, जिसे इस पुस्तक का एक कमज़ोर पक्ष कहा जा सकता है। लेकिन, सम्पूर्ण रूप में यह पुस्तक भाषा से लेकर कथ्य तक अपने मंतव्य को अभिव्यक्त करने में पूरी तरह से सफल सिद्ध हुई है।

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

मेरा भोलापन लौटा दो..



















  • पीयूष द्विवेदी भारत 
ये ज्ञान-विज्ञान भी ले लो
ये मान-सम्मान भी ले लो
इस जहाँ का झूठा-मूठा
मेरा अभिमान भी ले लो
जहाँ जलन, क्रोध से मुक्त रहूँ, मुझे वो बचपन लौटा दो
मेरा भोलापन लौटा दो, मेरा भोलापन लौटा दो

मेरा ये रूप भी ले लो
शोहरत अनूप भी ले लो
इस उम्र की एक और देन
ये ह्रदय कुरूप भी ले लो
जहाँ दुश्मन-दोस्त बराबर हों, वो अपनापन लौटा दो
मेरा भोलापन लौटा दो, मेरा भोलापन लौटा दो

ये झूठ-फरेब भी ले लो
हर बात उरेब भी ले लो
किसी दूसरे का हक़ लेकर
भरी ये जेब भी ले लो
जहाँ झूठ-फरेब का नाम न हो, वो सच्चापन लौटा दो
मेरा भोलापन लौटा दो, मेरा भोलापन लौटा दो

ये हास-कुहास भी ले लो
ये जीवन ख़ास भी ले लो
इस बदन की अपराध भरी
हर इक सांस भी ले लो
जहाँ अपराध नहीं, गलती करते, वो लड़कपन लौटा दो
मेरा भोलापन लौटा दो, मेरा भोलापन लौटा दो