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गुरुवार, 25 जुलाई 2019

पुस्तक समीक्षा - नक्सलवाद की परतों को उधेड़ता उपन्यास [वर्धा विश्वविद्यालय की पत्रिका 'पुस्तक वार्ता' में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

राजीव रंजन प्रसाद का उपन्यास ‘लाल अंधेरा’ पिछले पांच दशकों से देश की छाती पर किसी नासूर की तरह बनी हुई नक्सलवाद की समस्या के आगाज, विकास, प्रभाव, नेटवर्क आदि विविध पहलुओं की एक दिलचस्प प्रस्तुति है। इस उपन्यास में न केवल देश भर में व्याप्त सशस्त्र नक्सलवाद की परतों को उघाड़ा गया है, बल्कि परोक्ष ढंग से इसका समर्थन करने वाले शहरी नक्सलवाद की भी जमकर कलई खोली गयी है। कथानक की बुनावट कुछ ऐसे हुई है कि एक रौ में बहते हुए पाठक धीरे-धीरे नक्सलवाद के जंगल से नगर तक व्याप्त पूरे चक्रव्यूह को परत दर परत अपने सामने बेपर्दा पाता है। उपन्यास की कहानी कई टुकड़ों और अनेक पात्रों के बीच बिखरी हुई है। इसके अधिकांश पात्र, नक्सलवाद की समस्या के अलग-अलग पक्षों एवं किसी न किसी समाज या वर्ग विशेष के प्रतिनिधि पात्र हैं।

कहानी का सूदू नामक पात्र आजाद भारत में रजवाड़ों की व्यवस्था की समाप्ति के पश्चात् बस्तर के आदिम समाज की अवस्था का एक चित्र खींचता है। बस्तर के अंतिम शासक प्रवीरचंद भंजदेव के सियासी चक्रव्यूह का शिकार होकर मारे जाने के पश्चात् खुद को उनकी प्रजा मानने वाले आदिमों की लोकतान्त्रिक भारत में क्या दशा हुई, अपना घरबार छोड़ यत्र-तत्र भागकर उन्हें किस तरह संघर्षपूर्ण जीवन बिताना पड़ा, सूदू का चरित्र आदिम समाज की इस ऐतिहासिक त्रासदी को उकेरकर रख देता है। यह अंश देखिये जब सूदू अपनी व्यथा-कथा बताते हुए कहता है, ‘राजमहल छूटा तो घर भी छूट गया। कितने दिन जंगल-जंगल भटका। किसी गाँव में सो गया, कुछ मिला तो खा लिया। फिर मैं दंतेवाड़ा आ गया। उधरिच्च पता चला कि बैलाडीला में लोहा निकालने के लिए पहाड़ को खोद रहे हैं... वहाँ और भी मजदूर थे। हम सबको ट्रक में भरकर किरन्दूल ले गए। वहीं पर लेबर कैम्प में सिर रखने को जगह मिल गया। पत्थर तोड़ने लगे तो खाने के लिए मिलने लग गया...’ समझना आसान है कि आजाद भारत की सियासत के चक्रव्यूह में भोले-भाले आदिमों को किस कदर पिसना पड़ा। मगर इस मुसीबत को अपनी मेहनत से धता बताकर वे जस-तस जीवन को एक लय देने में लगे रहे। लेकिन जब उन्हें लगा कि स्थिति कुछ ठीक हो रही है और उन्होंने जरा सपने देखने शुरू ही किए थे कि उनके बीच तथाकथित क्रांतिदूतों यानी नक्सलियों का आगमन हो गया। इसी तथ्य को उजागर करते हुए सूदू कहता है, ‘मैं बुधरी को बहुत प्यार किया। बहुत अच्छे से रखा। उसके दिल का सब किया। तबतक सबकुछ ठीक चलता रहा, जबतक दादा लोग हम लोग के गाँव में नहीं घुसे थे।’ यहाँ ‘दादा लोग’ का तात्पर्य नक्सलियों से ही है। सरकार की उपेक्षा के कारण पहले से ही त्रस्त आदिमों के जीवन में नक्सली अत्याचार और शोषण का कैसा अमानवीय रूप लेकर आए, उपन्यास में इसका बाखूबी चित्रण किया गया है। सूदू के बेटे-बेटी, सोमारू और सोमली, की नक्सलवाद के कारण जो स्थिति होती है, वो भी विचित्र ही है। सोमारू जहां सुरक्षा बालों के विशेष दस्ते में चला जाता है, तो वहीं सोमली नक्सली लड़ाका बन जाती है। इन पात्रों के जरिये लेखक ने नक्सलवाद के बीच पिस रहे आदिम जीवन की विचित्र विडम्बनाओं को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है।
प्रो. नीलिमा, जूही, डॉ रत्नेश, पत्रकार शिवेश, छात्र साकेत ये वो पात्र हैं, जो एक ख़ास विचारधारा से प्रभावित बौद्धिक वर्ग द्वारा बुने जाने वाले शहरी नक्सलवाद के चक्रव्यूह से रूबरू करवाते हैं। जूही का चेहरा एक समाजसेवक का है, जो जगदलपुर से एनजीओ चलाती है। लेकिन जब पुलिस द्वारा नक्सलियों को मुठभेड़ में ढेर किया जाता है, तो मुठभेड़ को फर्जी बताकर पुलिस के खिलाफ माहौल बनाने लगती है। माहौल बनता है, तो दिल्ली से एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा प्रो. नीलिमा के नेतृत्व में एक तथ्यान्वेषी दल (फैक्ट फाइंडिंग टीम) मामले की जांच के लिए बस्तर भेजा जाता है। नीलिमा तथ्यों की जांच करने आती है, लेकिन बस्तर में पहुँचने पर वो आदिमों को नक्सलियों के समर्थन का पाठ पढ़ाने लगती है। उसकी बात का विरोध करता है सोयम और नक्सलियों के हाथों मारा जाता है। नीलिमा पर इल्जाम आता है, लेकिन फिर किस तरह शहरी नक्सलवादी गिरोह उसे बचाने के लिए मीडिया को  हथियार बनाकर काम करता है, उसकी एक बानगी उपन्यास के इस अंश में मिल जाती है जब जूही नीलिमा से कहती है, ‘तुम्हारे पति संपादक हैं न... नीलिमा!! हम बस्तर से चीख रहे हैं, कम चर्चा में आते हैं, तुम दिल्ली में खांसती भी हो तो वायरल फ़ैल जाता है। जो बात मैं कल पीसी में बोलने जा रही हूँ, वही दिल्ली के अखबारों में हेडलाइन्स होनी चाहिए। प्ले विक्टिम कार्ड डिअर...’

जेएनयू में नया-नया पढ़ने पहुंची अपराजिता तब चौंक जाती है जब उसके सामने सीनियर छात्र साकेत द्वारा ‘महिषासुर शहादत दिवस’ की परिकल्पना प्रस्तुत की जाती है। वो सोचती है, ‘कोई नवरात्रि ऐसी नहीं जिसमें वो व्रत न रखती हो। जेएनयू में एडमिशन के बाद भी इसबार वो पूरे नौ दिन उपवास में रही थी। उसे लगता था कि जिस प्रगतिशील माहौल में वो रह रही है, उसमें भी आस्था की अपनी जगह विद्यमान है। लेकिन क्या अब उसे महिषासुर को भी जिंदाबाद करना पड़ेगा?’ फिर भी इस विषय पर वो उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जब तर्कों के साथ ऐसे दिवस का प्रतिवाद करती है, तो किसी तार्किक जवाब की बजाय यह सुनने को मिलता है, ‘तुम संघियों की तरह बात कर रही हो। यह मनुवादियों की भाषा है।’ उसके सिगरेट न पीने को स्त्री-स्वतंत्रता के प्रश्न से जोड़ने वाला साकेत जब उसके देह के भूगोल को टटोलने की कोशिश करने लगता है, तो उसे समझते देर नहीं लगती कि ख़ास विचारधारा से प्रेरित इन कथित प्रगतिशीलों की नजर में स्त्री-मुक्ति का चिंतन देह के दायरे तक ही सिमटा हुआ है। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि अपराजिता के साथ साकेत का व्यवहार हो या जंगल में रुक्मती के साथ की जाने वाली आदिरेड्डी की बर्बरता हो, इससे एक बात एकदम साफ़ हो जाती है कि बन्दूक के दम पर सबके बीच समानता लाने की बात करने वाले नक्सली हों या शहरों में बैठे उन्हिकी तरह समानता के पैरोकार उनके हिमायती बौद्धिक, स्त्रियों को लेकर दोनों की दृष्टि एक ही समान है। दोनों की नजर स्त्री के शरीर के पार नहीं देख पाती। बहरहाल, अपराजिता और साकेत, इन दो पात्रों के जरिये लेखक ने यह विषय बड़े स्पष्ट ढंग से रखा है कि कैसे जब एक ख़ास विचारधारा का गढ़ माने जाने वाले जेएनयू में कोई नया छात्र पहुँचता है, तो उसका ब्रेनवाश करने की कोशिश चलने लगती है। अपराजिता जैसे अपनी जड़ों से जुड़े छात्र इस खेल को समझकर खुद को बचा लेते हैं, बाकी जाने-अनजाने इसका हिस्सा बन जाते हैं।
शिवेश एक पत्रकार है जो मीडिया में जमे इस गिरोह का प्रतिनिधित्व करता पात्र है। उसे जब पैसे के गड़बड़झाले के कारण नौकरी से निकाला जाता है, तो वो इसे अपनी आवाज को दबाने की कोशिश के रूप में प्रचारित करने में लग जाता है। खबर बन जाती है कि ‘बस्तर में पत्रकारों का काम करना असंभव’। ऐसे ही और भी अनेक पात्र हैं जो हमारे सामने नक्सलवाद के विविधवर्णी रूपों और उससे पीड़ित होने वालों की कहानी रखते जाते हैं।
चूंकि इस उपन्यास का जो विषय है, ऐसे विषयों की बड़ी चुनौती यह होती है कि इसमें लेखक को अनेक विचाधाराओं के घमासान से जूझते हुए अपनी लेखनी की निरपेक्षता को कायम रखना पड़ता है। यह चुनौती राजीव के समक्ष भी रही होगी। लेकिन प्रशंसनीय है कि उन्होंने खुद को किसी विचारधारा के अंध-समर्थन या अंध-विरोध में उलझने से बचाते और पूर्वाग्रहों से बचते हुए प्रस्तुत विषय के साथ यथासंभव न्याय किया है।  उपन्यास का ये अंश उल्लेखनीय होगा, ‘लाल हो, नीला हो या कि भगवा या कोई और रंग वैचारिक राजनीति सभी करते हैं। ... लेकिन कोई भी लेफ्ट जितना आर्गनाइज्ड नहीं है। वे इंस्टिट्यूशंस पर गहरी पकड़ रखते हैं... बाकी सभी पक्ष खुद को अपने राजनीतिक साझीदार से काटकर दिखाने का प्रयास नहीं करते, लेकिन यहाँ तो वाम राजनीति भी करना है और निरपेक्षता का लेबल भी चाहिए।’ इस अंश में हम देख सकते हैं कि लेखक ने साफ़ तौर पर स्वीकारा है कि विचारधारा की राजनीति सब पक्ष करते हैं, लेकिन वे इस तथ्य को झुठला भी नहीं सकते कि आजादी के बाद ज्यादा समय तक संस्थाओं पर काबिज रहने के कारण वाम विचारधारा की इनपर बेहतर पकड़ कायम हो चुकी है। लेकिन इस अंश में राजीव की यथासंभव लेखकीय निरपेक्षता प्रकट हुई है, जिसे उन्होंने पूरे उपन्यास में बनाए और बचाए रखा है। वे कभी किसी विचारधारा के पक्ष में खड़े नहीं दिखते बल्कि एक लेखक के रूप में जो सही है, उसके साथ खड़े रहते हैं।   
उपर्युक्त बातों से जाहिर है कि इस उपन्यास का विषय पात्रों और घटनाओं के लिहाज से न केवल व्यापक बल्कि जटिल भी है। बावजूद इसके इसे राजीव की किस्सागोई का कमाल ही कहेंगे कि ये उपन्यास पढ़ते हुए कमोबेश किसी ‘थ्रिलर’ का सा मजा आता है। इसकी जटिलता और गंभीरता के कारण बहुत अधिक ऊब की स्थिति नहीं बनती। हालांकि कहीं-कहीं ऐसा लगता है जैसे लेखक भूल गए हों कि वे उपन्यास लिख रहे हैं और किसी शोध-ग्रन्थ की तरह तथ्यों-घटनाओं का सपाट वर्णन कर डाले हों।
उदाहरण के तौर पर सूदू के साक्षात्कार में जब प्रवीरचंद की चर्चा आती है, उसके बाद सूदू और साक्षात्कारकर्ता गायब हो जाते हैं, और लेखक खुद प्रवीरचंद का पूरा इतिहास किसी इतिहास ग्रन्थ की तरह खुद बताने लगते हैं। ऐसे ही इसी साक्षात्कार में जब सूदू नक्सलियों की चर्चा करता है, तो सचिन की सोच के बहाने जिस तरह से लेखक द्वारा नक्सलवाद के विस्तृत इतिहास को बताया जाने लगता है, वो प्रभावी नहीं लगता। ये चीजें कहानी का हिस्सा नहीं, वरन उसपर थोपी गयी सी लगती हैं। ऐसा नहीं कह रहे कि उपन्यास में तथ्यों को रखने का ये तरीका चलता नहीं है। किसी वृहद् उपन्यास में इस तरह की प्रस्तुति एक हद तक चल सकती है, लेकिन 120 पन्ने के लघु उपन्यास में इस तरह का वर्णन होना, उसकी प्रभावोत्पादकता को कम ही करता है। लेखक ये बातें यदि कहानी में पिरोकर या पात्रों के मुंह से सामने लाते तो उपन्यास और अधिक प्रभावी बन सकता था।
भाषा की बात करें तो बस्तरिया पात्रों के संवाद की भाषा में वहाँ की क्षेत्रीयता का पुट डालने की कोशिश की गयी है, जो प्रभावी प्रतीत होता है। आज जब बहुत-से नए लेखकों द्वारा हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों का न केवल धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा बल्कि उसे सही साबित करने के लिए तरह-तरह की दलीलें भी गढ़ी जा रही हैं, ऐसे में राजीव जैसे लेखकों का यथासंभव अंग्रेजीमुक्त हिंदी लिखना और प्रभावी ढंग से लिखना संतोष पैदा करता है।
कुल मिलाकर यह उपन्यास बन्दूक लेकर खड़े प्रत्यक्ष नक्सलियों की क्रूरता के साथ-साथ अलग-अलग बौद्धिकता के आवरण में छिपे अप्रत्यक्ष नक्सलियों के पूरे नेटवर्क को भी सामने लाता है। जो पाठक इस नक्सलवाद पर गंभीर किताबों से परहेज करते हैं, उन पाठकों को रोचक ढंग से इस विषय की व्यापक समझ प्रदान करने के लिहाज से यह उपन्यास एक महत्वपूर्ण कृति है।

शनिवार, 10 मार्च 2018

बस्तर को देखने की नयी दृष्टि [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत

बस्तर पर अपनी रचनाधर्मिता के लिए सुविख्यात लेखक राजीव रंजन प्रसाद की नवीन पुस्तक ‘दंतक्षेत्र’ यूँ तो बस्तर के एक जिले दंतेवाड़ा पर केन्द्रित है, परन्तु इस एक जिले के बहाने लेखक ने लगभग पूरे बस्तर के अतीत से लेकर वर्तमान तक की परिस्थितियों और परिवर्तनों का वर्णन किया है। इस क्रम में लेखक ने परतंत्रता के दौर से लेकर स्वतंत्रता के पश्चात् तक बस्तर के विकास से वंचित रहने के लिए जिम्मेदार कारकों तथा अलग-अलग शोषकों द्वारा किए गए विनाश का तथ्यात्मक और प्रामाणिक वर्णन करने का प्रयास किया है। बस्तर का आदिवासी, स्वतंत्रता से पूर्व ब्रिटिश शासकों के शोषण का शिकार हुआ तो स्वराज्य प्राप्त होने के कुछ ही समय पश्चात् वहाँ उगे नक्सलवाद के आतंक से ग्रस्त होकर रहना उसकी नियति बन गया। अतीत में कैसे ब्रिटिश शासकों ने आदिवासियों का शोषण और उत्पीड़न किया और अब नक्सली भी कैसे सशस्त्र आन्दोलन के नाम पर उसी कुकृत्य को अंजाम दे रहे हैं, इसपर यह पुस्तक बड़े विस्तार और तथ्यपरक ढंग से बात करती है।

यह पुस्तक चार भागों में विभक्त है। हरे कैनवास पर लाल रंग, अतीत के काले-सफ़ेद पन्ने, जीवन जो बहती धारा है और नक्सल मुखौटा हटाकर जो  देखा – इन चार भागों में इस पुस्तक की सामग्री का विभाजन किया गया है। पहला भाग मुख्यतः दंतेवाड़ा के सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक आदि विविध पक्षों पर बात करता है। दंतेवाड़ा की  प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि को रेखांकित कर, उसके बावजूद वहाँ विकास की परियोजनाओं के आकार न ले पाने पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया गया है कि स्वतंत्रता के पश्चात् सरकारी तौर पर जब भी इस क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कोई प्रयास हुआ, बस्तर को विकास से वंचित रखने वाले कारकों ने बहुविध कैसे उसके मार्ग में अवरोध खड़े कर दिए। इस सम्बन्ध में बस्तर की १९८१ में आरम्भ हुई बोधघाट परियोजना को पर्यावरण आन्दोलनकारियों के दबाव में बीच में अस्वीकृत कर देने के सरकारी फैसले पर लेखक ने प्रश्न उठाया है, “भारत की ऐसी कितनी परियोजनाएं हैं, जिनका निर्माण आधे-अधूरे रोक दिया गया है ? क्या ऐसा बस्तर या ऐसी ही जगहों की नियति है, अन्यथा तो उत्तराखंड में टिहरी जैसे बाँध भी सरकार ने आन्दोलनों की श्रृंखलाओं के बाद भी पूरे कर लिए ?” इस प्रकार के अनेक उदाहरणों और तथ्यों के माध्यम से लेखक द्वारा इस बात को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि प्राकृतिक समृद्धि के बावजूद यदि बस्तर क्षेत्र विकास और आर्थिक समृद्धि से वंचित है, तो इसके लिए कुछ हद तक उस क्षेत्र के प्रति सरकारों की उपेक्षात्मक दृष्टि जिम्मेदार है और काफी हद तक नक्सलियों के भय व हर स्तर पर मौजूद उनके सहयोगियों का भी इसमें हाथ रहा है। 
 
दैनिक जागरण
पुस्तक का दूसरा भाग ‘अतीत के काले-सफ़ेद पन्ने’ प्राचीन बस्तर के इतिहास और ऐतिहासिक कलाकृतियों आदि पर केन्द्रित है। इसमें प्राचीन कलाकृतियों को नुकसान पहुँचने को लेकर लेखक द्वारा चिंता जताई गयी है। तीसरे भाग ‘जीवन जो बहती धारा है’ में राजीव ने मुख्यतः बस्तर के लोकजीवन और उसके तत्वों पर चर्चा की है। इस क्रम में विभिन्न जनजातियों की जीवन-शैली और संस्कृति पर प्रकाश डालने का कार्य हुआ है, जिसमें माड़िया, मुरिया, हलबा, दोरला आदि जनजातियों के रहन-सहन, खान-पान पर बड़े ही रोचक ढंग से बात की गयी है। इस सम्बन्ध में मुरिया जनजाति के वर्णन का यह अंश उल्लेखनीय होगा, “मुरिया जनजाति हँसमुख, समाजपरक, सहकारिता और सहजीवन में विश्वास करने वाली होती है। मुरिया समाज में विवाह की पहली शर्त होती है कि लड़का और लड़की एक गोत्र के न हों, यहाँ तक कि गोत्र के बंधु गोत्र में भी विवाह नहीं किया जाता है...” इसी प्रकार अन्य सभी जनजातियों और लोक-संस्कृति के विभिन्न तत्वों के विषय में वर्णन किया गया है।

पुस्तक का आखिरी भाग ‘नक्सल मुखौटा हटाकर जो देखा’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस भाग में हम बस्तर में नक्सलवाद के उद्भव, विकास और वर्तमान स्थिति का क्रमिक व तथ्यात्मक वर्णन देखते हैं। अन्य राज्यों का नक्सलवाद कैसे बस्तर के लिए नासूर बन गया, इस प्रश्न की भी पड़ताल लेखक ने की है। पुस्तक के यह अंश देखें, “बस्तर में नक्सलवाद वस्तुतः आंध्र-महाराष्ट्र-ओडिशा की समस्याओं को ढँकने का उपनिवेश है। ...बस्तर में नक्सलवाद सामाजिक-आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि उसके कारण यहाँ का जनजातीय समाज जो भुगत रहा है, वह उस श्रेणी में आता है।”

हालाँकि इस पुस्तक में कुछ समस्याएँ भी हैं, जो कभी-कभी इसे अरुचिकर बना देती हैं। पहली चीज कि इसमें तथ्यों और विश्लेषण की मात्रा में भारी असंतुलन है। तथ्यों की मात्रा, विश्लेषण की अपेक्षा कहीं अधिक है। हर बात को तथ्यों के जरिये कहने की लेखक की मंशा गलत नहीं है, परन्तु अगर तथ्य को विश्लेषण का समुचित संबल न मिले तो वो उबाऊ और समझ से बाहर भी हो जाता है। बस्तर जैसे क्षेत्र, जिससे देश के लोग अधिक परिचित नहीं हैं, के विषय में लिखते समय तो इस बात का ख़ास ख्याल रखा जाना चाहिए था। लेखक यहाँ चूक कर गए हैं। दूसरी समस्या प्रस्तुति से जुड़ी  है। लगभग साढ़े चार सौ पृष्ठों वाली इतनी वृहद् पुस्तक का बड़े-बड़े चार भागों में विभाजन इसके पाठ को मुश्किल बनाता है। अच्छा रहता कि इसे विषयवार अध्यायों में विभाजित करके लिखा गया होता, जो कि संभव भी है। हालांकि इन सब चीजों के बावजूद कहना न होगा कि बस्तर, जिसको गैर-जमीनी विश्लेषणों द्वारा देश भर में नक्सलवाद के लिए कुख्यात किया जा चुका है, के सामाजिक-सांस्कृतिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक पक्षों को सामने लाने सहित वहाँ मौजूद नक्सलवाद की समस्या के मूल कारणों की पड़ताल करने वाली यह पुस्तक न केवल बस्तर के प्रति स्थापित नकारात्मक मिथकों को तोड़ती है, बल्कि उसे समझने की एक नयी दृष्टि भी प्रदान करती है।

शनिवार, 6 मई 2017

बस्तर के प्रति आकर्षण जगाती पुस्तक [दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण) में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
राजीव रंजन प्रसाद की पुस्तक ‘बस्तर : पर्यटन और संभावनाएं’ बस्तर के प्रति आकर्षण के नये द्वार खोलती है। इसमें लेखक ने अपने यात्रा-वृत्तांतों, संस्मरणों और कुछेक निबंधों का संकलन किया है, परन्तु सबका मूल स्वर बस्तर की बनावट और बसावट में निहित सौन्दर्य  एवं आकर्षण को पाठक के समक्ष प्रस्तुत करना है। इस पुस्तक में बस्तर के पर्यटन स्थलों से लेकर वहाँ सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं एवं लोकजीवन तक को अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें बस्तर की नदियों, झरनों, अभयारण्यों, गुफाओं समेत बस्तर वासियों की परम्पराओं व रीति-रिवाजों आदि बातों पर पूरे विस्तार और गहराई से प्रकाश डाला गया है। चूंकि, लेखक मूलतः बस्तर के निवासी हैं साथ ही उन्होंने इन जगहों पर जाकर चीजों को देख और समझकर लिखा है, इसलिए इन बातों के वर्णन में कहीं कृत्रिमता के दर्शन नहीं होते। पूरा वर्णन एकदम जीवंत प्रतीत होता है।

पुस्तक का आरम्भ लेखक बस्तर के परिचय के साथ करते हैं, जिसमें ‘बस्तर’ के नामकरण के कारणों पर विचार किया गया है। पौराणिक कथाओं के दण्डकारण्य से होते हुए राजतंत्रीय इतिहास के कान्तार, महाकान्तार के ब्रिटिश शासन में बस्तर के रूप में प्रसिद्ध होने के सम्बन्ध में लेखक अनेक जनश्रुतियों का उल्लेख करते हैं। इसके पश्चात् बस्तर की नदियों का वर्णन शुरू होता है, जिसमें महानदी, गोदावरी, इन्द्रावती, शबरी और तालपियर जैसी नदियों के ऐतिहासिक महत्व, भौगोलिक संरचना तथा उनसे प्रभावित होने वाले जन-जीवन की चर्चा करते हुए लेखक आगे बढ़ते हैं। झरनों के वर्णन में लेखक का भाषा-कौशल एकदम उभरकर सामने आया है। बस्तर के विश्वप्रसिद्ध झरने चित्रकोट का चित्रण करते हुए राजीव लिखते हैं, ‘मैदान से बहकर आती इन्द्रावती नदी अचानक जहाँ निर्झर हो जाती है, वहीं एक मनोरम इन्द्रधनुष दृश्य की मोहकता को इस तरह बढ़ाता है कि देखने वाला बस मंत्रमुग्ध होकर रह जाए। पत्थर जितने कठोर होते हैं, उतने ही मोम भी; ये बात चित्रकोट में आके समझी जा सकती है।’ इस प्रोक्ति में हम देख सकते हैं कि भाषा न केवल प्राकृतिक सुषमा को वर्णित करने वाली काव्यात्मकता से परिपूर्ण है, बल्कि इसमें पाठक के समक्ष दृश्य को साकार कर देने की सामर्थ्य भी निहित है। चित्रकोट के अलावा बस्तर के दक्षिण, उत्तर और पश्चिम में स्थित अन्य झरनों का विशद वर्णन देखने को मिलता है।

दैनिक जागरण
बस्तर की प्राकृतिक गुफाओं का वर्णन तो पाठक को एक अलग रहस्यलोक में ले जाने वाला है। धरती के सैकड़ों फीट अंदर तक जाती गुफाएं व्यक्ति को पाताललोक-सा अनुभव कराने के लिए पर्याप्त हैं। पुस्तक में संकलित कोटुमसर की गुफा के अपने यात्रा-वृत्तान्त में राजीव ने जिस भाषा-शैली में उसकी रहस्यात्मकता और रोमांच को उकेरा है, वो पाठक को भी एक सीमा तक गुफा की यात्रा का अनुभव करा देती है। राम और कृष्ण की कथाओं से सम्बंधित शकलनारायण गुफा का भी अत्यंत मनोरम और रोचक वर्णन किया गया है। इसके अलावा कैलाश, तुलार, अरण्यक आदि और भी अनेक गुफाओं के छोटे-बड़े यात्रा-वर्णन लेखक ने किए हैं। इस पूरे वर्णन में लेखक की प्रस्तुति तो रोचक रही ही है, इन प्राकृतिक गुफाओं के स्वनिर्मित होने की प्रक्रिया का सरल वैज्ञानिक विश्लेषण करने में भी लेखक को सफलता मिली है। इसके अलावा अभयारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों आदि का भी वर्णन किया गया है।
 
बस्तरवासी आदिम समाज की जीवन-शैली पर चर्चा करते हुए लेखक ने उनके रहन-सहन, खान-पान, पहनाव-पोशाक का विश्लेष्णात्मक वर्णन किया है। यह वर्णन निबंधात्मक शैली में किया गया है, किन्तु इसे भी यथासंभव सजीव रखने का प्रयत्न दृष्टिगत होता है। बस्तर के आदिम समाज की लोक-कलाओं पर भी प्रकाश डालने का प्रयास लेखक ने किया है। गुदना, बांस कला, काष्ठ कला, भित्तिचित्र इत्यादि बस्तरिया आदिम समाज की अनेक लोक-कलाओं का विशद वर्णन किया गया है। इनमें लेखक ने न केवल इन कलाओं के विषय में बताया है, बल्कि आदिवासी समाज में इनका किस-किस प्रकार से महत्व है इस पर भी प्रकाश डाला है। आदिवासी समाज में गुदना कला के महत्व और आवश्यकता पर विचार करते हुए राजीव लिखते हैं, ‘गुदना को कला इसलिए कह रहा हूँ, चूंकि आदिवासी जीवन की अपनी मौलिकता और कल्पनाशीलता इसमें झांकती है। बस्तर में तीस से अधिक जनजातियाँ अवस्थित हैं; गुदना हर किसीकी परम्परा का हिस्सा है और उनकी एकता का साथी भी; साथ ही साथ उन्हें एकदूसरे से भिन्न पहचान प्रदान करने में भी यही गोदने सहायक होते हैं।’ इस प्रकार के वर्णनों में प्रायः वर्णनात्मक और यथास्थान विश्लेषणात्मक शैली अपनायी गयी है, जो कि इस प्रस्तुत अंश में देखी भी जा सकती है।

भाषा की बात करें तो वो अधिकांशतः सीधी-सरल हिंदी रही है, किन्तु यथास्थान आवश्यकतानुसार उसमें काव्यात्मकता का गुण भी परिलक्षित होता है। यथा; जब किसी स्थान-विशेष की प्राक्रतिक सुषमा का वर्णन हो, तो लेखक की भाषा में गंभीरता से इतर एक मनोरम काव्यात्मकता उभर आती है। शब्दों में प्रायः हिंदी के ही तत्सम और तद्भव शब्दों का आधिक्य है; हालांकि उर्दू, फ़ारसी के शब्दों से भी कोई परहेज नहीं है। अंग्रेजी के केवल उन्हीं शब्दों का प्रयोग हुआ है, जिनके पर्यायवाची हिंदी में नहीं हैं। कुल मिलाकर भाषा इस सीमा तक सरल है कि एक सामान्य रूप से अध्ययनशील व्यक्ति भी इसे बड़ी सहजता से समझ सकता है।
 
दरअसल बस्तर को लेकर देश के आम जनमानस के भीतर नक्सलियों के गढ़ जैसा एक भाव लम्बे समय से रहा है और अब भी काफी हद तक बना हुआ है। लोगों की अवधारणा रही है कि बस्तर में नक्सलवाद और जंगल-झाड़ के अलावा कुछ और नहीं है। ये पुस्तक इस प्रकार की सभी मिथकीय अवधारणाओं को न केवल ध्वस्त करती है, बल्कि बस्तर में छुपी पर्यटन की संभावनाओं और आकर्षण को भी उद्घाटित करती है। सबसे अच्छी बात ये है कि इस पुस्तक में शोध और अध्ययन से अधिक बस्तरिया लेखक का अनुभव बोला है, जिस कारण यह एक सच्ची और महत्वपूर्ण कृति बन गयी है।