गुरुवार, 25 जुलाई 2019

पुस्तक समीक्षा - नक्सलवाद की परतों को उधेड़ता उपन्यास [वर्धा विश्वविद्यालय की पत्रिका 'पुस्तक वार्ता' में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

राजीव रंजन प्रसाद का उपन्यास ‘लाल अंधेरा’ पिछले पांच दशकों से देश की छाती पर किसी नासूर की तरह बनी हुई नक्सलवाद की समस्या के आगाज, विकास, प्रभाव, नेटवर्क आदि विविध पहलुओं की एक दिलचस्प प्रस्तुति है। इस उपन्यास में न केवल देश भर में व्याप्त सशस्त्र नक्सलवाद की परतों को उघाड़ा गया है, बल्कि परोक्ष ढंग से इसका समर्थन करने वाले शहरी नक्सलवाद की भी जमकर कलई खोली गयी है। कथानक की बुनावट कुछ ऐसे हुई है कि एक रौ में बहते हुए पाठक धीरे-धीरे नक्सलवाद के जंगल से नगर तक व्याप्त पूरे चक्रव्यूह को परत दर परत अपने सामने बेपर्दा पाता है। उपन्यास की कहानी कई टुकड़ों और अनेक पात्रों के बीच बिखरी हुई है। इसके अधिकांश पात्र, नक्सलवाद की समस्या के अलग-अलग पक्षों एवं किसी न किसी समाज या वर्ग विशेष के प्रतिनिधि पात्र हैं।

कहानी का सूदू नामक पात्र आजाद भारत में रजवाड़ों की व्यवस्था की समाप्ति के पश्चात् बस्तर के आदिम समाज की अवस्था का एक चित्र खींचता है। बस्तर के अंतिम शासक प्रवीरचंद भंजदेव के सियासी चक्रव्यूह का शिकार होकर मारे जाने के पश्चात् खुद को उनकी प्रजा मानने वाले आदिमों की लोकतान्त्रिक भारत में क्या दशा हुई, अपना घरबार छोड़ यत्र-तत्र भागकर उन्हें किस तरह संघर्षपूर्ण जीवन बिताना पड़ा, सूदू का चरित्र आदिम समाज की इस ऐतिहासिक त्रासदी को उकेरकर रख देता है। यह अंश देखिये जब सूदू अपनी व्यथा-कथा बताते हुए कहता है, ‘राजमहल छूटा तो घर भी छूट गया। कितने दिन जंगल-जंगल भटका। किसी गाँव में सो गया, कुछ मिला तो खा लिया। फिर मैं दंतेवाड़ा आ गया। उधरिच्च पता चला कि बैलाडीला में लोहा निकालने के लिए पहाड़ को खोद रहे हैं... वहाँ और भी मजदूर थे। हम सबको ट्रक में भरकर किरन्दूल ले गए। वहीं पर लेबर कैम्प में सिर रखने को जगह मिल गया। पत्थर तोड़ने लगे तो खाने के लिए मिलने लग गया...’ समझना आसान है कि आजाद भारत की सियासत के चक्रव्यूह में भोले-भाले आदिमों को किस कदर पिसना पड़ा। मगर इस मुसीबत को अपनी मेहनत से धता बताकर वे जस-तस जीवन को एक लय देने में लगे रहे। लेकिन जब उन्हें लगा कि स्थिति कुछ ठीक हो रही है और उन्होंने जरा सपने देखने शुरू ही किए थे कि उनके बीच तथाकथित क्रांतिदूतों यानी नक्सलियों का आगमन हो गया। इसी तथ्य को उजागर करते हुए सूदू कहता है, ‘मैं बुधरी को बहुत प्यार किया। बहुत अच्छे से रखा। उसके दिल का सब किया। तबतक सबकुछ ठीक चलता रहा, जबतक दादा लोग हम लोग के गाँव में नहीं घुसे थे।’ यहाँ ‘दादा लोग’ का तात्पर्य नक्सलियों से ही है। सरकार की उपेक्षा के कारण पहले से ही त्रस्त आदिमों के जीवन में नक्सली अत्याचार और शोषण का कैसा अमानवीय रूप लेकर आए, उपन्यास में इसका बाखूबी चित्रण किया गया है। सूदू के बेटे-बेटी, सोमारू और सोमली, की नक्सलवाद के कारण जो स्थिति होती है, वो भी विचित्र ही है। सोमारू जहां सुरक्षा बालों के विशेष दस्ते में चला जाता है, तो वहीं सोमली नक्सली लड़ाका बन जाती है। इन पात्रों के जरिये लेखक ने नक्सलवाद के बीच पिस रहे आदिम जीवन की विचित्र विडम्बनाओं को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है।
प्रो. नीलिमा, जूही, डॉ रत्नेश, पत्रकार शिवेश, छात्र साकेत ये वो पात्र हैं, जो एक ख़ास विचारधारा से प्रभावित बौद्धिक वर्ग द्वारा बुने जाने वाले शहरी नक्सलवाद के चक्रव्यूह से रूबरू करवाते हैं। जूही का चेहरा एक समाजसेवक का है, जो जगदलपुर से एनजीओ चलाती है। लेकिन जब पुलिस द्वारा नक्सलियों को मुठभेड़ में ढेर किया जाता है, तो मुठभेड़ को फर्जी बताकर पुलिस के खिलाफ माहौल बनाने लगती है। माहौल बनता है, तो दिल्ली से एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा प्रो. नीलिमा के नेतृत्व में एक तथ्यान्वेषी दल (फैक्ट फाइंडिंग टीम) मामले की जांच के लिए बस्तर भेजा जाता है। नीलिमा तथ्यों की जांच करने आती है, लेकिन बस्तर में पहुँचने पर वो आदिमों को नक्सलियों के समर्थन का पाठ पढ़ाने लगती है। उसकी बात का विरोध करता है सोयम और नक्सलियों के हाथों मारा जाता है। नीलिमा पर इल्जाम आता है, लेकिन फिर किस तरह शहरी नक्सलवादी गिरोह उसे बचाने के लिए मीडिया को  हथियार बनाकर काम करता है, उसकी एक बानगी उपन्यास के इस अंश में मिल जाती है जब जूही नीलिमा से कहती है, ‘तुम्हारे पति संपादक हैं न... नीलिमा!! हम बस्तर से चीख रहे हैं, कम चर्चा में आते हैं, तुम दिल्ली में खांसती भी हो तो वायरल फ़ैल जाता है। जो बात मैं कल पीसी में बोलने जा रही हूँ, वही दिल्ली के अखबारों में हेडलाइन्स होनी चाहिए। प्ले विक्टिम कार्ड डिअर...’

जेएनयू में नया-नया पढ़ने पहुंची अपराजिता तब चौंक जाती है जब उसके सामने सीनियर छात्र साकेत द्वारा ‘महिषासुर शहादत दिवस’ की परिकल्पना प्रस्तुत की जाती है। वो सोचती है, ‘कोई नवरात्रि ऐसी नहीं जिसमें वो व्रत न रखती हो। जेएनयू में एडमिशन के बाद भी इसबार वो पूरे नौ दिन उपवास में रही थी। उसे लगता था कि जिस प्रगतिशील माहौल में वो रह रही है, उसमें भी आस्था की अपनी जगह विद्यमान है। लेकिन क्या अब उसे महिषासुर को भी जिंदाबाद करना पड़ेगा?’ फिर भी इस विषय पर वो उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जब तर्कों के साथ ऐसे दिवस का प्रतिवाद करती है, तो किसी तार्किक जवाब की बजाय यह सुनने को मिलता है, ‘तुम संघियों की तरह बात कर रही हो। यह मनुवादियों की भाषा है।’ उसके सिगरेट न पीने को स्त्री-स्वतंत्रता के प्रश्न से जोड़ने वाला साकेत जब उसके देह के भूगोल को टटोलने की कोशिश करने लगता है, तो उसे समझते देर नहीं लगती कि ख़ास विचारधारा से प्रेरित इन कथित प्रगतिशीलों की नजर में स्त्री-मुक्ति का चिंतन देह के दायरे तक ही सिमटा हुआ है। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि अपराजिता के साथ साकेत का व्यवहार हो या जंगल में रुक्मती के साथ की जाने वाली आदिरेड्डी की बर्बरता हो, इससे एक बात एकदम साफ़ हो जाती है कि बन्दूक के दम पर सबके बीच समानता लाने की बात करने वाले नक्सली हों या शहरों में बैठे उन्हिकी तरह समानता के पैरोकार उनके हिमायती बौद्धिक, स्त्रियों को लेकर दोनों की दृष्टि एक ही समान है। दोनों की नजर स्त्री के शरीर के पार नहीं देख पाती। बहरहाल, अपराजिता और साकेत, इन दो पात्रों के जरिये लेखक ने यह विषय बड़े स्पष्ट ढंग से रखा है कि कैसे जब एक ख़ास विचारधारा का गढ़ माने जाने वाले जेएनयू में कोई नया छात्र पहुँचता है, तो उसका ब्रेनवाश करने की कोशिश चलने लगती है। अपराजिता जैसे अपनी जड़ों से जुड़े छात्र इस खेल को समझकर खुद को बचा लेते हैं, बाकी जाने-अनजाने इसका हिस्सा बन जाते हैं।
शिवेश एक पत्रकार है जो मीडिया में जमे इस गिरोह का प्रतिनिधित्व करता पात्र है। उसे जब पैसे के गड़बड़झाले के कारण नौकरी से निकाला जाता है, तो वो इसे अपनी आवाज को दबाने की कोशिश के रूप में प्रचारित करने में लग जाता है। खबर बन जाती है कि ‘बस्तर में पत्रकारों का काम करना असंभव’। ऐसे ही और भी अनेक पात्र हैं जो हमारे सामने नक्सलवाद के विविधवर्णी रूपों और उससे पीड़ित होने वालों की कहानी रखते जाते हैं।
चूंकि इस उपन्यास का जो विषय है, ऐसे विषयों की बड़ी चुनौती यह होती है कि इसमें लेखक को अनेक विचाधाराओं के घमासान से जूझते हुए अपनी लेखनी की निरपेक्षता को कायम रखना पड़ता है। यह चुनौती राजीव के समक्ष भी रही होगी। लेकिन प्रशंसनीय है कि उन्होंने खुद को किसी विचारधारा के अंध-समर्थन या अंध-विरोध में उलझने से बचाते और पूर्वाग्रहों से बचते हुए प्रस्तुत विषय के साथ यथासंभव न्याय किया है।  उपन्यास का ये अंश उल्लेखनीय होगा, ‘लाल हो, नीला हो या कि भगवा या कोई और रंग वैचारिक राजनीति सभी करते हैं। ... लेकिन कोई भी लेफ्ट जितना आर्गनाइज्ड नहीं है। वे इंस्टिट्यूशंस पर गहरी पकड़ रखते हैं... बाकी सभी पक्ष खुद को अपने राजनीतिक साझीदार से काटकर दिखाने का प्रयास नहीं करते, लेकिन यहाँ तो वाम राजनीति भी करना है और निरपेक्षता का लेबल भी चाहिए।’ इस अंश में हम देख सकते हैं कि लेखक ने साफ़ तौर पर स्वीकारा है कि विचारधारा की राजनीति सब पक्ष करते हैं, लेकिन वे इस तथ्य को झुठला भी नहीं सकते कि आजादी के बाद ज्यादा समय तक संस्थाओं पर काबिज रहने के कारण वाम विचारधारा की इनपर बेहतर पकड़ कायम हो चुकी है। लेकिन इस अंश में राजीव की यथासंभव लेखकीय निरपेक्षता प्रकट हुई है, जिसे उन्होंने पूरे उपन्यास में बनाए और बचाए रखा है। वे कभी किसी विचारधारा के पक्ष में खड़े नहीं दिखते बल्कि एक लेखक के रूप में जो सही है, उसके साथ खड़े रहते हैं।   
उपर्युक्त बातों से जाहिर है कि इस उपन्यास का विषय पात्रों और घटनाओं के लिहाज से न केवल व्यापक बल्कि जटिल भी है। बावजूद इसके इसे राजीव की किस्सागोई का कमाल ही कहेंगे कि ये उपन्यास पढ़ते हुए कमोबेश किसी ‘थ्रिलर’ का सा मजा आता है। इसकी जटिलता और गंभीरता के कारण बहुत अधिक ऊब की स्थिति नहीं बनती। हालांकि कहीं-कहीं ऐसा लगता है जैसे लेखक भूल गए हों कि वे उपन्यास लिख रहे हैं और किसी शोध-ग्रन्थ की तरह तथ्यों-घटनाओं का सपाट वर्णन कर डाले हों।
उदाहरण के तौर पर सूदू के साक्षात्कार में जब प्रवीरचंद की चर्चा आती है, उसके बाद सूदू और साक्षात्कारकर्ता गायब हो जाते हैं, और लेखक खुद प्रवीरचंद का पूरा इतिहास किसी इतिहास ग्रन्थ की तरह खुद बताने लगते हैं। ऐसे ही इसी साक्षात्कार में जब सूदू नक्सलियों की चर्चा करता है, तो सचिन की सोच के बहाने जिस तरह से लेखक द्वारा नक्सलवाद के विस्तृत इतिहास को बताया जाने लगता है, वो प्रभावी नहीं लगता। ये चीजें कहानी का हिस्सा नहीं, वरन उसपर थोपी गयी सी लगती हैं। ऐसा नहीं कह रहे कि उपन्यास में तथ्यों को रखने का ये तरीका चलता नहीं है। किसी वृहद् उपन्यास में इस तरह की प्रस्तुति एक हद तक चल सकती है, लेकिन 120 पन्ने के लघु उपन्यास में इस तरह का वर्णन होना, उसकी प्रभावोत्पादकता को कम ही करता है। लेखक ये बातें यदि कहानी में पिरोकर या पात्रों के मुंह से सामने लाते तो उपन्यास और अधिक प्रभावी बन सकता था।
भाषा की बात करें तो बस्तरिया पात्रों के संवाद की भाषा में वहाँ की क्षेत्रीयता का पुट डालने की कोशिश की गयी है, जो प्रभावी प्रतीत होता है। आज जब बहुत-से नए लेखकों द्वारा हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों का न केवल धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा बल्कि उसे सही साबित करने के लिए तरह-तरह की दलीलें भी गढ़ी जा रही हैं, ऐसे में राजीव जैसे लेखकों का यथासंभव अंग्रेजीमुक्त हिंदी लिखना और प्रभावी ढंग से लिखना संतोष पैदा करता है।
कुल मिलाकर यह उपन्यास बन्दूक लेकर खड़े प्रत्यक्ष नक्सलियों की क्रूरता के साथ-साथ अलग-अलग बौद्धिकता के आवरण में छिपे अप्रत्यक्ष नक्सलियों के पूरे नेटवर्क को भी सामने लाता है। जो पाठक इस नक्सलवाद पर गंभीर किताबों से परहेज करते हैं, उन पाठकों को रोचक ढंग से इस विषय की व्यापक समझ प्रदान करने के लिहाज से यह उपन्यास एक महत्वपूर्ण कृति है।

बुधवार, 24 जुलाई 2019

हिंदी का अर्थहीन विरोध (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

पिछले दिनों एमडीएमके महासचिव और राज्यसभा सांसद वाइको ने हिंदी को एक जड़हीन भाषा बताते हुए दावा किया कि संसद में बहस का स्तर गिरने का मुख्य कारण हिंदी को थोपा जाना है। इसी क्रम में वाइको ने यह अनोखा ज्ञान भी दे डाला कि हिंदी में कोई साहित्य नहीं है। साथ ही, उन्होंने संसद में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आदि के हिंदी में अपनी बात रखने पर भी आपत्ति जताई। यूँ तो दक्षिण भारतीय नेताओं का हिंदी विरोध कोई अनोखी बात नहीं है, लेकिन यहाँ हिंदी विरोध में वाइको ने जो तर्क दिए हैं, वे न केवल अमान्य और निराधार हैं, बल्कि हास्यास्पद भी हैं। इन तर्कों को देखते हुए यही कह सकते हैं कि या तो वाइको वाकई में हिंदी भाषा और साहित्य की समृद्ध परम्परा के प्रति अज्ञानता का शिकार हैं अथवा अपने अंधविरोध में जानबूझकर इसे अनदेखा कर रहे हैं।
सबसे पहले बात वाइको के हिंदी में कोई साहित्य न होने के दावे की करें तो उल्लेखनीय होगा कि प्रख्यात आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित अधिकांश विद्वानों ने हिंदी साहित्य का जो कालक्रम प्रस्तुत किया है, उसके अनुसार थोड़े-बहुत अंतर के साथ हिंदी भाषा और साहित्य की आयु लगभग हजार वर्ष हो चुकी है, जिसमें आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल के क्रम में इसकी विकासयात्रा चली है। यहाँ स्थानीय भाषाओं के कट्टर समर्थकों का तर्क होता है कि इस हजार वर्ष में केवल आधुनिक काल का साहित्य ही वर्तमान हिंदी भाषा यानी खड़ी बोली का साहित्य है, शेष साहित्य स्थानीय भाषाओं यथा ब्रज, अवधी आदि का है। लेकिन ऐसा तर्क देने वाले वही लोग हैं जिन्हें हिंदी भाषा के वास्तविक स्वरूप की पहचान नहीं है।
भारत जिस प्रकार विविधताओं में एकता वाला देश है, इसकी भाषा के रूप में हिंदी भी वैसी ही है। इस देश की अधिकांश भाषाओं की तरह संस्कृत से जन्मी हिंदी ने भारतीय संस्कृति के समन्वयकारी स्वरुप का अनुकरण करते हुए अपने भीतर देशी-विदेशी अनेक भाषाओं-बोलियों के शब्दों का समावेश किया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी भाषा और साहित्य के स्वरूप व परम्परा को रेखांकित करते हुए लिखा है, ‘हमारे व्यावहारिक और भावात्मक जीवन से जिस भाषा का सम्बन्ध सदा से चला आ रहा है, वह पहले चाहें जो कुछ कही जाती रही हो, अब हिंदी कही जाती है। यह वही भाषा है जिसकी धारा कभी संस्कृत के रूप में बहती थी, फिर प्राकृत और अपभ्रंस के रूप में और इधर हजार वर्ष से इस वर्तमान रूप में जिसे हिंदी कहते हैं, लगातार बहती चली आ रही है। यह वही भाषा है जिसमें सारे उत्तरीय भारत के बीच चन्द्र और जगनिक ने वीरता की उमंग उठाई; कबीर, सूर और तुलसी ने भक्ति की धारा बहाई; बिहारी, देव और पद्माकर ने श्रृंगार रस की वर्षा की, भारतेंदु, प्रतापनारायण मिश्र ने आधुनिक युग का आभास दिया और आज आप व्यापक दृष्टि फैलाकर सम्पूर्ण मानव जगत के मेल में लानेवाली भावनाएं भर रहे हैं।’
हिंदी के प्रभाव में स्थानीय बोलियों-भाषाओं का ह्रास हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। अपने-अपने क्षेत्र विशेष में उनका स्वतंत्र अस्तित्व यथावत कायम है। हिंदी के जरिये बस इन सबका राष्ट्रीयकरण हुआ है; इन्हें एक राष्ट्रीय पहचान मिली है। आज जो संघर्ष हिंदी अंग्रेजी से कर रही है, हिंदी के न होने की स्थिति में वो संघर्ष इन क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों को करना पड़ता और इस स्थिति में जैसे अतीत में बिखराव के कारण अंग्रेजों के समक्ष हमारे देशी राजा नष्ट हो गए थे, ठीक उसी तरह अंग्रेजी के सामने ये भाषाएँ-बोलियाँ भी नष्ट हो गयी होतीं। अतः हिंदी की छत्रछाया में ये भाषाएँ-बोलियाँ अंग्रेजी के प्रकोप से सुरक्षित हैं, ये बात इनके समर्थकों को समझनी चाहिए। 
हिंदी साहित्य की रचनात्मक समृद्धि पर नजर डालें तो हजार वर्षों की इसकी परम्परा में से आदि, मध्य, आधुनिक किसी एक कालखंड को भी यदि उठा लिया जाए तो हिंदी साहित्य की समृद्धि का आभास कराने लायक पर्याप्त रचनाएं मिल जाएंगी। फिर चाहें वो आदिकाल का विख्यात रासो साहित्य हो या भक्तिकाल में बाबा तुलसी द्वारा रचित भारतीय समाज के लिए पूज्य हो चुका ‘श्रीरामचरितमानस’ हो, कृष्ण की बाल-लीलाओं को जनमन तक पहुंचाने वाला सूरसागर हो, सामाजिक विसंगतियों और रूढ़ियों पर चोट करता कबीर-साहित्य हो, श्रृंगार और अध्यात्म का महाकाव्य ‘पद्मावत’ हो या रीतिकाल में गागर में सागर भरती बिहारी की सतसई हो अथवा आधुनिक काल में भारतेंदु से लेकर मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद, प्रसाद, पन्त, निराला, महादेवी, दिनकर आदि अनेक रचनाकारों की एक से बढ़कर एक रचनाएँ हों, ये सब हिंदी के समृद्ध साहित्यकोश का ही प्रमाणन करती हैं। वाइको को इनमें से किसी एक काल के साहित्य का भी जरा-सा अध्ययन कर लेना चाहिए, इसके बाद हिंदी की साहित्यिक समृद्धि को लेकर उनका भ्रम अवश्य दूर हो जाएगा।     
जहां तक बात संसद में बहस का स्तर गिरने की है, तो इसमें जरूर सच्चाई है। इसमें कोई दोराय नहीं कि अब हमारी संसद में सारगर्भित बहस और विचार-विमर्श कम, बेमतलब की हंगामेबाजी एवं आरोप-प्रत्यारोप ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। लेकिन इसके लिए हिंदी को दोष देना पूरी तरह से अनर्गल बात है। संसद में हिंदी में बात रखने वाले अनेक राजनेता रहे हैं, जिनके वक्तव्य आज भी संसदीय भाषणों के इतिहास में अग्रणी स्थान रखते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं। अटल जी के भाषण भारतीय संसदीय परम्परा के इतिहास में  सर्वाधिक लोकप्रिय भाषण माने जा सकते हैं। इनके अलावा वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज जैसे नेता संसद में प्रायः हिंदी में ही अपनी बात रखते रहे हैं और इनके भाषण तथ्य-तर्क-प्रस्तुति हर मामले में उत्कृष्ट भी होते हैं। संसद में यदि बहस का स्तर गिरा है तो इसके पीछे अन्य कारण हैं जैस कि अब हमारे ज्यादातर माननीय अध्ययन की संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। पहले के नेता पढ़ने-लिखने में जिस तरह की रुचि लेते थे, अब के नेताओं में वो गुण कम हुआ है। अब बिना अध्ययन और चिंतन-मनन के किसी भी भाषा में बात रखी जाए, वो प्रभावी नहीं हो सकती। अतः ये भाषा की नहीं, ज्ञान की समस्या है। अतः वाइको को यदि वाकई में संसद में बहस का स्तर गिरने की चिंता है तो वे इसमें अपनी हिंदी विरोध की राजनीति घुसाने की बजाय सांसदों में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रयास करें। कुछ नहीं तो कम से कम हिंदी साहित्य का अध्ययन कर अपनी ज्ञानवृद्धि तो कर ही लें।

शुक्रवार, 21 जून 2019

लोकतंत्र का मखौल बनातीं ममता [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

पश्चिम बंगाल इस समय लगातार चर्चा में बना हुआ है, मगर दुर्भाग्यवश चर्चा के कारण नकारात्मक हैं। बीते दिनों डॉक्टरों पर हमले के बाद राज्य सरकार के अड़ियल रवैये के कारण उनकी हड़ताल का जो प्रकरण घटित हुआ, उसका असर पूरे देश में दिखाई दिया। शुरुआत में डॉक्टरों के प्रति अनावश्यक सख्ती दिखाने के बाद आखिर ममता सरकार को उनके आगे झुकना पड़ा और उनकी मांगे माननी पड़ीं, लेकिन यही काम यदि पहले कर लिया गया होता तो ये मामला शायद इतना न बिगड़ता।
दूसरी तरफ केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने एडवाइजरी जारी करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार पर राज्य में हिंसा रोकने व क़ानून का शासन सुनिश्चित करने में विफल रहने का आरोप लगाया है। साथ ही, केंद्र ने ममता सरकार से राजनीतिक हिंसा और उसके दोषियों पर हुई कार्रवाई का विवरण देने को भी कहा है। गृहमंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक़ बीते वर्षों के दौरान राज्य में राजनीतिक हिंसा की घटनाओं में लगातार इजाफा हुआ है। वर्ष 2016 में जहां बंगाल में 509 राजनीतिक हिंसा की घटनाएं हुई थीं, वहीं 2018 में ये आंकड़ा 1035 तक जा पहुंचा जबकि इस वर्ष अभी इन छः महीनों में ही 773 हिंसा की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इन आंकड़ों से इतर हाल के कुछ वर्षों में बंगाल की राजनीति का अवलोकन करने पर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य में क़ानून-व्यवस्था की क्या स्थिति है। अभी बीते लोकसभा चुनाव और उससे पूर्व पंचायत चुनाव में ही बंगाल में जो हिंसात्मक घटनाएं हुईं, वो राज्य की क़ानून-व्यवस्था की कलई खोलने के लिए काफी हैं। टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या और उनपर हमले के जो मामले सामने आए हैं, वे ममता सरकार के अपराध व अपराधियों के आगे बेबस हो चुकी क़ानून-व्यवस्था की ही कहानी कहते हैं। इसके अलावा मालदा, धूलागढ़, रानीगंज, आसनसोल आदि राज्य के अनेक क्षेत्रों में सांप्रदायिक टकराव की घटनाएं भी यही बताती हैं कि ममता बनर्जी के राज में अराजकता और अशांति बंगाल की नियति बन गए हैं।
अब जब केंद्र में नयी सरकार का गठन हुआ है और गृहमंत्रालय राजनाथ सिंह से हटकर अमित शाह के पास आ गया है, ऐसे में बंगाल की उक्त स्थिति को देखते हुए गृहमंत्रालय की तरफ से क़ानून-व्यवस्था को लेकर जानकारी माँगना उचित ही है। परन्तु, ममता बनर्जी इस विषय को भी राजनीति से जोड़ते हुए केंद्र पर आरोप लगाने में लगी हैं। उन्हें गृहमंत्रालय के जवाब मांगने में भी राजनीति नजर आ रही है। एकबार के लिए मान लेते हैं कि इसमें राजनीति हैं, लेकिन इससे यह तथ्य तो बदल नहीं जाता कि ममता सरकार राज्य में क़ानून का शासन स्थापित करने में विफल रही है।

केंद्र से टकराव की राजनीति
दिल्ली में केंद्र से जो टकराव की राजनीति केजरीवाल करते रहे हैं, बंगाल में ममता उससे भी दो कदम आगे निकल चुकी हैं। देखा जाए तो वास्तव में उनका विरोध केंद्र की सरकार से नहीं, भाजपा से है। इसी कारण वर्ष 2014 में जब केंद्र में भाजपा की सरकार आई, उसके बाद से ही केंद्र से उनके सम्बन्ध बिगड़ने शुरू हो गए। कोई भी विषय हो, वे आँख बंद करके केंद्र सरकार के विरोध में उतरी रहती हैं। अभी हाल ही में जिस तरह कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से शारदा चिटफंड मामले में पूछताछ करने गयी सीबीआई के साथ ममता सरकार ने बर्ताव किया, वो केंद्र के साथ उनके टकराव का सबसे ताजा और सशक्त उदाहरण है। हालांकि इसी मामले में जब न्यायालय ने राजीव कुमार को पूछताछ के लिए सीबीआई के समक्ष उपस्थित होने का फैसला सुनाया, तो इससे ममता सरकार को सबक लेना चाहिए था। मगर, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।
केन्द्रीय योजनाओं की उपेक्षा
केंद्र से ममता बनर्जी की चिढ़ का आलम ये है कि उन्होंने बंगाल में तमाम केन्द्रीय योजनाओं को भी लागू नहीं किया है। केंद्र सरकार की गरीबों को पांच लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा देने वाली आयुष्मान योजना वहाँ लागू नहीं की गयी है। इस योजना के तहत 60 प्रतिशत खर्च केंद्र को और 40 प्रतिशत राज्य सरकार को वहन करने का प्रावधान है, बस इसी बात को बहाना बनाकर ममता बनर्जी ने अपने हिस्से का खर्च वहन करने से इनकार करते हुए इस योजना से बाहर रहने का ऐलान कर दिया। स्वास्थ्य, राज्य सूची का मामला है, सो इसमें राज्य सरकार की सहमति के बिना केंद्र बहुत कुछ कर नहीं सकता। यहाँ तो खर्च वहन न करने का बहाना था, मगर ममता का ऐसा ही गतिरोधी  रुख ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना’ को लेकर भी है जिसका पूरा खर्च केंद्र वहन कर रहा है। किसान सम्मान निधि योजना में राज्यों की भूमिका बस इतनी है कि उन्हें अपने यहाँ से इस राशि की पात्रता रखने वाले किसानों की सूची भेजनी है। लेकिन ममता सरकार ने सूची ही अटका ली है। केंद्र द्वारा बार-बार कहे जाने के बावजूद अबतक पश्चिम बंगाल की सूची नहीं भेजी गयी है, जिस कारण वहाँ के किसान इस योजना के लाभ से वंचित हो रहे हैं। ममता की ही राह पर दिल्ली में उनके चहेते केजरीवाल भी हैं, इस कारण दिल्ली के किसानों को भी योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा।
गौरतलब है कि संविधान में केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर तमाम प्रावधान करते हुए यही अपेक्षा की गयी है कि ये दोनों परस्पर समन्वय और समझ के साथ राष्ट्र की प्रगति के लिए कार्य करेंगे, मगर अभी केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच जो सम्बन्ध दिख रहे हैं, वो इस संवैधानिक अपेक्षा के बिलकुल ही विपरीत हैं। 
केंद्र-राज्य संबंधों पर संवैधानिक पक्ष
ब्रिटिश हुकुमत के समय भारतीय शासन व्यवस्था का स्वरूप केंद्रीकृत और एकात्मक था। भारत को गुलाम बनाए रखने के लिए यही शासन प्रभावी था। परन्तु, आजादी के बाद जब हमारा संविधान बना तो उसमें भारत को ‘राज्यों के संघ’ के रूप में प्रतिसूचित किया गया। केंद्र-राज्य संबंधों के तीन प्रकारों का जिक्र संविधान में मिलता है – विधायी सम्बन्ध, प्रशासनिक सम्बन्ध और वित्तीय सम्बन्ध। इसी प्रकार केंद्र-राज्य के बीच कार्य-विभाजन को लेकर तीन सूचियों संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची की व्यवस्था भी सविधान में की गयी है।
संघ सूची में वर्णित विषयों पर क़ानून बनाने व निर्णय लेने का अधिकार संसद व केंद्र सरकार को है, राज्य सूची के विषयों में समान अधिकार विधानसभा व राज्य सरकार को है, वहीं समवर्ती सूची में वर्णित विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों को क़ानून बनाने का अधिकार है। लेकिन यदि कभी समवर्ती सूची के किसी विषय को लेकर केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव उत्पन्न होता है, तो ऐसे में केंद्र के क़ानून के ही मान्य होने की व्यवस्था है। इन सूचियों में शामिल विषयों पर नजर डालें तो संघ सूची में ऐसे विषय शामिल किए गए हैं, जो सीधे तौर पर राष्ट्रीय हित को प्रभावित करने वाले हैं और जिनको लेकर पूरे देश में एकरूपता होनी अनिवार्य है जैसे कि रेल, रक्षा आदि। राज्य सूची में शामिल विषय ऐसे हैं जो हित और व्यवहार के स्तर पर विविधता की छूट देते हैं जैसे कि स्वास्थ्य, कृषि, परिवहन आदि। समवर्ती सूची में ऐसे विषयों को शामिल किया गया है, जिन्हें लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता अपेक्षित अवश्य है, परन्तु अनिवार्य नहीं जैसे कि शिक्षा, जनसंख्या नियंत्रण, बिजली वितरण आदि। इस प्रकार स्पष्ट है कि संविधान में केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों के समन्वय करने का प्रयास तो किया गया है, परन्तु विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से केंद्र को राज्यों पर संप्रभुता भी प्रदान की गयी है। किसी आपात स्थिति के समय राज्यों के पूरी तरह से केंद्र के अधीनस्थ हो जाने की व्यवस्था इसीका उदाहरण है।
केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों को लेकर संविधान के अनुच्छेद-257 में कहा गया है कि हर राज्य की अपनी कार्यपालिका की शक्ति का प्रयोग इस प्रकार करे कि वो संघ की कार्यपालिका-शक्ति के मार्ग में बाधक न बने। वर्तमान में ममता बनर्जी जिस तरह से केंद्र की योजनाओं में राज्य-स्तर पर अवरोध पैदा कर रही हैं, वो संविधान विरोधी कृत्य है।
वित्तीय संबंधों की बात करें तो प्रत्येक पांच वर्ष पर वित्त आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है जिसका काम केंद्र-राज्य के बीच कर-प्राप्तियों के वितरण की जांच करना और सहायता-अनुदान सम्बन्धी नियमों का निर्धारण करना है। अबतक देश में पंद्रह वित्त आयोग गठित किए जा चुके हैं।
ममता की अलोकतांत्रिकता
संविधान चाहें जो भी कहता हो, ममता बनर्जी को शायद उससे कोई सरोकार नहीं है। ऐसा लगता है जैसे वे बंगाल में एक अलग ही शासन का ढर्रा जमाने में जुटी हुई हैं। हाल के उनके कुछ निर्णयों व वक्तव्यों पर नजर डालें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि वे नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री ही नहीं मानती। देश के मतदाताओं द्वारा बहुमत से चुने गए प्रधानमंत्री के प्रति एक राज्य की मुख्यमंत्री का इस तरह की बात कहना क्या देश की जनता और लोकतान्त्रिक व्यवस्था का अपमान नहीं है? अब उन्होंने एक और फरमान सुनाया है कि बंगाल में रहना है तो बांग्ला ही बोलनी होगी। बांग्ला बोलने में कोई बुराई नहीं है, मगर उसे इस तरह सबपर थोपना भारतीय संस्कृति की विविधता पर कुठारघात करने के साथ-साथ संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन भी है।  इसी तरह पिछले दिनों राज्य में जय श्रीराम का नारा लगाए जाने पर गिरफ्तारी करवाकर भी ममता बनर्जी ने बंगाल में अपने अलोकतांत्रिक शासन का ही एक नमूना पेश किया।
निष्कर्ष
दरअसल बंगाल में भाजपा के बढ़ते जनाधार और राजनीतिक सफलताओं को देखते हुए कहीं न कहीं ममता बनर्जी को यह लगने लगा है कि राज्य में उनकी राजनीतिक जमीन खिसक रही है। इसी कारण उन्होंने अपनी राजनीति को भाजपा विरोध की तरफ एकोन्मुख कर रखा है। किसी भी बात पर वो भाजपा और उसके नेतृत्व वाली सरकार का विरोध करने का मौका नहीं छोड़ रहीं। केंद्र की योजनाओं को राज्य में लागू कर वे भाजपा को किसी प्रकार का श्रेय नहीं देना चाहतीं। परन्तु, अपनी इस राजनीति के उत्साह में ममता बनर्जी भूल गयी हैं कि वे सिर्फ टीएमसी की नेता नहीं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री भी हैं और इस नाते उनका संवैधानिक दायित्व बनता है कि केंद्र के साथ मिलकर राज्य की जनता के कल्याण और विकास के लिए काम करें। संघीय ढाँचे में केंद्र और राज्य दोनों को परस्पर समझ व सहयोग की भावना के साथ काम करना होता है, संविधान में इसीका प्रतिपादन किया गया है, परन्तु ममता बनर्जी अपने राजनीतिक हितों के लिए संघीय ढाँचे को भी नुकसान पहुंचाने में लगी हैं।
वे ताकत के दम पर अपनी सत्ता को स्थायी करना चाहती हैं, मगर उन्हें समझना चाहिए कि ये लोकतंत्र है, जहां ताकत से नहीं, जनमत से निर्णय होते हैं और जनमत को अपने पक्ष में करने का केवल एक ही उपाय है कि संकीर्ण राजनीतिक हितों व स्वार्थों को छोड़ सकारात्मक सोच के साथ देश की प्रगति के लिए कार्य किया जाए। अन्यथा लोकसभा चुनाव में जिस जनता ने उनकी सीटें कम की है, वो विधानसभा में उनका सूपड़ा भी साफ़ कर सकती है।    

मंगलवार, 11 जून 2019

संकीर्ण राजनीति की शिकार हिंदी [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस नयी शिक्षा नीति का लम्बे समय से देश को इन्तजार था, जब उसका प्रारूप सामने आया तो स्वस्थ व सार्थक चिंतन-मनन की बजाय विवाद का विषय बनकर रह गया। समग्र शिक्षा नीति पर चर्चा हाशिये पर चली गयी और सारा ध्यान उसमें उल्लिखित त्रिभाषा नीति पर केन्द्रित हो गया। इसमें हिंदी को वरीयता देने को लेकर तमिलनाडू के राजनीतिक गलियारों से विरोध की आवाज सुनाई देने लगी। त्रिभाषा नीति के विरोध में उतरे दलों व नेताओं ने इतनी-सी बात समझने तक की जहमत नहीं उठाई कि ये प्रारूप केवल विचारार्थ रखा गया है, यह कोई अंतिम निर्णय नहीं है। इसे सबकी राय लेकर ही लागू किया जाएगा। अब खबर आ रही है कि विरोध के मद्देनजर सरकार ने इस शिक्षा नीति में उल्लिखित हिंदी की अनिवार्यता वाले प्रावधान को खत्म कर दिया है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि आखिर त्रिभाषा नीति में हिंदी की मौजूदगी को लेकर विरोध की आवाजें उठ क्यों रही हैं? हिंदी अगर भारत में नहीं, तो और कहाँ पढ़ी-लिखी और बोली-समझी जाएगी? बहरहाल, इस विरोध को समझने के लिए त्रिभाषा नीति के स्वरूप और इतिहास पर दृष्टि डालना समीचीन होगा।
क्या है त्रिभाषा नीति?
त्रिभाषा नीति कोई आज का विषय नहीं है, बल्कि इसकी चर्चा आजादी के बाद विश्वविद्यालयी शिक्षा सम्बन्धी सुझावों के लिए गठित राधाकृष्णन आयोग की रिपोर्ट से ही शुरू हो गयी थी, जिसमें तीन भाषाओं में पढ़ाई की व्यवस्था का परामर्श दिया गया था। आयोग का कहना था कि माध्यमिक स्तर पर प्रादेशिक भाषा, संघीय भाषा और अंग्रेजी भाषा की शिक्षा दी जाए। इसके बाद 1955 में डॉ लक्षमणस्वामी मुदालियर के नेतृत्व में माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन किया गया, जिसने प्रदेश की मातृभाषा के साथ हिंदी के अध्ययन का द्विभाषा सूत्र देते हुए अंग्रेजी व संस्कृत को वैकल्पिक बनाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया। फिर 1964 में यूजीसी के प्रमुख दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन हुआ जिसने 1966 में पेश अपनी रिपोर्ट में त्रिभाषा नीति का सुझाव दिया।

यहाँ एक बात उल्लेखनीय होगी कि मुदालियर आयोग को छोड़कर ज्यादातर शिक्षा व भाषा आयोगों ने भाषा-समस्या के समाधान हेतु प्रस्तावित त्रिभाषा नीति में अंग्रेजी को अधिक महत्व देते हुए हिंदी का पक्ष कमजोर ही किया। कोठारी आयोग का प्रस्ताव भी ऐसा ही था, जिसमें कक्षा 8 से 10 तक छात्रों के लिए तीन भाषाओं (स्थानीय मातृभाषा, हिंदी और अंग्रेजी) के अध्ययन की बात कही गयी थी, वहीं विश्वविद्यालयी स्तर पर अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम रखने का प्रस्ताव किया गया था। इसी कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गयी, जिसमें त्रिभाषा फार्मूला शामिल था। उस समय तमिलनाडू के मुख्यमंत्री थे अन्नादुरई जिन्होंने इस त्रिभाषा नीति को राज्य में हिंदी थोपने की कोशिश करार देते हुए इसका कड़ा विरोध किया और राज्य के विद्यालयों से हिंदी को हटा दिया गया। इसके बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कुछेक बार परिवर्तन हुए, लेकिन तमिलनाडू में अंग्रेजी और तमिल की द्विभाषा नीति ही शिक्षा का माध्यम बनी रही।
दक्षिण का हिंदी विरोध
दक्षिण में हिंदी विरोध की शुरुआत आजादी से पहले ही हो गयी थी। 1937 में हुए प्रांतीय चुनावों में मद्रास प्रेसिडेंसी में कांग्रेस को बहुमत मिला था और शासन की बागडोर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के हाथ आई, जिन्होंने जल्द-ही राज्य में हिंदी की शिक्षा को बढ़ावा देने को लेकर अपने इरादे जाहिर कर दिए। एक प्रमुख मीडिया संस्थान के वेबपोर्टल पर प्रकाशित खबर के मुताबिक़, अप्रैल 1938 में मद्रास प्रेसिडेंसी के 125 सैकेंडरी स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य भाषा के तौर पर लागू कर दिया गया। तमिलों में इस निर्णय के प्रति कड़ी प्रतिक्रिया दिखी और जल्द-ही ये विरोध एक जनांदोलन का रूप ले लिया। पेरियार और अन्नादुरई ने इस आन्दोलन को अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने का उपकरण बना लिया। यह आन्दोलन लगभग दो वर्ष तक चला। 1939 में राजाजी की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया और फिर अंग्रेज हुकूमत ने सरकार के फैसले को वापस लेते हुए हिंदी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। तब ये आन्दोलन थम जरूर गया, मगर यहाँ से राज्य में हिंदी विरोधी राजनीति का जो बीजारोपण हुआ, वो आगे फलता-फूलता ही गया।
आजादी के तत्काल बाद भी हिंदी विरोध की राजनीति की आंच में राज्य को जलना पड़ा, तो वहीं 1963 में राजभाषा विधेयक के पारित होने के बाद भी हिंसक रुख लेकर यह आन्दोलन शुरू हो गया। सत्तर के दशक का प्रथमार्ध इस लिहाज से बेहद उथल-पुथल भरा रहा। 1967 में आखिर इस हिंदी विरोधी आन्दोलन पर चढ़कर डीएमके तमिलनाडु की सत्ता हासिल करने में कामयाब हो गयी। इसीके साथ हिंदी विरोध दक्षिण, खासकर तमिलनाडू की राजनीति का एक आवश्यक उपकरण बन गया जो कि आज भी यथावत कायम है। आज भी वहाँ के नेताओं को हिंदी विरोध में अपने लिए राजनीतिक संभावनाएं दिखाई देती हैं, जिस कारण वे तथ्य और यथार्थ से परे आँख बंद करके हिंदी सम्बन्धी किसी भी बात का विरोध करने लगते हैं। यही कारण है कि अभी त्रिभाषा नीति की चर्चा आते ही हिंदी थोपने की बात कहते हुए राज्य से विरोधी आवाजें उठने लगीं।

कितना जायज है हिंदी विरोध?
दक्षिण भारत के हिंदी विरोध का मूल स्वर यह है कि हिंदी कथित हिंदीपट्टी वाले राज्यों की भाषा है, जिसे उनपर थोपा जा रहा है। इसमें द्रविड़ और आर्य वाली ऐतिहासिक अवधारणा भी एक हद तक काम करती है, जिसके अनुसार बाहर से आए आर्यों ने देश के मूल निवासी द्रविड़ों को दक्षिण में खदेड़ दिया और स्वयं उत्तर में बस गए। हालांकि जिस तरह से ये आर्य आगमन सिद्धांत ऐतिहासिक तथ्यों के धरातल पर भ्रामक सिद्ध होता है, उसी तरह दक्षिण का हिंदी विरोध भी तथ्यात्मक रूप से फिजूल ही लगता है। इस विषय में पटना निफ्ट में प्राध्यापक रत्नेश्वर सिंह कहते हैं, ‘आज हिंदीपट्टी कहे जाने वाले जो राज्य हैं, वास्तव में हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं है। लेकिन आजादी के बाद देश की एकता के लिए उन्होंने उदारता दिखाते हुए हिंदी को अपनी मातृभाषा से ऊपर रखा। दक्षिण के राज्य वैसी उदारता नहीं दिखा पाए। इसका कारण वो क्षेत्रवादी राजनीति है, जिसने ऐसी हवा बना दी कि हिंदी कुछ खास प्रदेशों की भाषा है और उनपर थोपी जा रही। वास्तव में न तो कथित हिन्दीपट्टी राज्यों पर हिंदी थोपी गयी थी, न किसी और पर थोपी जा सकती है। कोई भी भाषा किसीपर जबरन थोपकर प्रभाव में लाई ही नहीं जा सकती। दूसरी चीज कि हिंदी को जिन राज्यों ने आत्मसात किया, उनकी मातृभाषा खत्म नहीं हो गयी है। वो भी हिंदी के साथ-साथ फल-फूल रही है। अतः तमिलनाडू आदि गैर-हिन्दीभाषी राज्यों के लोगों को भी राजनीति का शिकार होने से बचते हुए देश की एकता के लिए हिंदी को स्वीकारना चाहिए।‘ जाहिर है कि हिंदी को कुछ प्रदेशों की मातृभाषा मानकर उसका विरोध करना तमिलों की सबसे बड़ी भूल है। देखा जाए तो हिंदी का स्वरूप भारतीय संस्कृति के ही समान महासमन्वयकारी है। संस्कृत से जन्मी इस भाषा में कुछ खड़ी, कुछ राजस्थानी, कुछ अवधी, कुछ ब्रज, कुछ भोजपुरी सहित और भी अनेक भारतीय भाषाओं एवं कुछ अंग्रेजी, कुछ उर्दू, कुछ फारसी जैसी विदेशी भाषाओं के शब्दों का महासंगम है। ऐसे में, राष्ट्रीयता की भावना के साथ यदि विचार किया जाए तो किसीके लिए भी हिंदी के विरोध का कोई कारण नजर नहीं आता। परन्तु, दक्षिण के राजनेताओं ने अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए वहाँ के लोगों में राष्ट्रीयता की बजाय क्षेत्रीयता की भावना का पोषण किया है। राजनीति ने तमिलों के विवेक को इस कदर ग्रस लिया है कि उन्हें विदेशी भाषा अंग्रेजी से अपनी मातृभाषा को कोई खतरा नहीं लगता, लेकिन अपने देश की भाषा हिंदी से लगता है। 
हिंदीभाषी राज्य भी जिम्मेदार
उक्त बातों से यह तो स्पष्ट हो गया है कि गैर-हिंदीभाषी राज्यों के हिंदी विरोध का मुख्य कारण वहाँ की राजनीति है। परन्तु, इस राजनीति के लिए वहाँ के राजनेताओं को अवसर देने के लिए एक हद तक हिंदीभाषी राज्यों के लोगों का दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्रति उदासीन रवैया भी जिम्मेदार है। तमिलनाडू को छोड़ दें तो आंध्र प्रदेश, केरला, कर्णाटक आदि दक्षिणी राज्यों में कुछ हद तक हिंदी की मौजूदगी मिलती है, वहाँ के स्थानीय लोग हिंदी बोलते दिख जाते हैं, जिससे जाहिर होता है कि इन राज्यों में कम ही सही मगर लोग हिंदी सीख रहे हैं। लेकिन इसके उलट हिंदीभाषी राज्यों में तमिल-तेलुगू जैसी भाषाओं को सीखने-सिखाने के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाई देता। इस विषय में डीयू के रामानुजन महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक डॉ आलोक रंजन पाण्डेय कहते हैं, ‘दिल्ली में कुछ विद्यालय हैं जहां तमिल-तेलुगु आदि दक्षिण भारतीय भाषाएँ पढ़ाई जाती हैं, मगर उनकी संख्या कम है। यह सही है कि हिंदीभाषी प्रदेशों के लोग दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने में बहुत रुचि नहीं लेते जो कि उन्हें लेनी चाहिए। हमारा विरोध तमिल या तेलुगु से न कभी था, न है। लेकिन हिंदी के बजाय अंग्रेज़ी का हम सदैव विरोध करते रहे हैं।‘ हालांकि एक पक्ष यह भी है कि हिंदी किसी राज्य-विशेष की भाषा नहीं है जो उसको अपनाने के बदले कोई अमुक राज्य से अपनी क्षेत्रीय भाषा को सीखने की उम्मीद करे, लेकिन फिर भी हिन्दीभाषी राज्यों को दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने के प्रति गंभीर होना चाहिए। ऐसा करने से जो अविश्वास की खाई उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीति ने पैदा की है, उसे पाटना कुछ आसान होगा।

त्रिभाषा नीति पर प्राध्यापकों की राय
वर्तमान भाषाई विवाद को सुलझाने का सबसे सटीक समाधान त्रिभाषा फ़ार्मूला है। जब यह बना था तो इसमें सभी राज्यों की सहमति थी एवं संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्व सम्मति से इसे पारित किया गया था। आज इसका विरोध जायज़ नहीं लगता। यह विरोध कुछ नेता केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रहे हैं। विश्व के जिस देश ने विकास किया अपनी भाषा में किया, पिछड़ेपन का कारण विदेशी भाषा रही है। यदि अभी भी मोदी की बहुमत वाली सरकार भाषा के मसले पर नेहरु की तरह ढुलमुल रहेगी तो दोनो में क्या अंतर रहेगा?
- प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय
अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय

सरकार कई बार हिंदीतर क्षेत्रों को नाराज़ नहीं करना चाहती है, क्योंकि हम लोकतंत्र में रह रहे हैं और  यहाँ वोटबैंक की राजनीति है। त्रिभाषा सूत्र सबसे उपयुक्त समाधान है-इसमें अंग्रेज़ी, क्षेत्रीय भाषाएँ और हिंदी सभी सुरक्षित हैं। हम शुरू से अपनी क्षेत्रीय भाषाओं का समर्थन करते हैं, हमारा अंग्रेज़ी से भी विरोध नहीं है, लेकिन हिंदी की क़ीमत पर अंग्रेज़ी का विकास हो, यह ठीक नहीं है।
- प्रो. पूरनचंद टंडन
प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय

निष्कर्ष
कुल मिलाकर बात यही निकलती है कि दक्षिण की हिंदी विरोधी राजनीति को रोकने के लिए केंद्र को दृढ़ता एवं हिंदीभाषी लोगों को दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि दिखानी होगी। अभी विरोधों के कारण जिस तरह से केंद्र ने शिक्षा नीति के प्रस्ताव में संशोधन कर दिया, यह रुख सही नहीं है। इससे समस्या खत्म नहीं होगी। केंद्र को दृढ़तापूर्वक दक्षिण खासकर तमिलनाडू में हिंदी को स्थापित करने के लिए बिना किसी प्रकार के दबाव में आए कदम उठाने चाहिए। दक्षिण भारतीय लोगों को एकबार यह समझ में आ गया कि हिंदी से उनकी मातृभाषा को कोई खतरा नहीं है, तो वे इसे स्वीकारने में कभी पीछे नहीं हटेंगे। मगर उन्हें ये तबतक समझ नहीं आएगा जबतक हिंदी वहाँ पहुंचेंगी नहीं। एकबार तमिलनाडू में हिंदी का पढ़ना-लिखना शुरू हो गया तो फिर कोई राजनीतिक दल या नेता हिंदी विरोध को हवा नहीं दे पाएंगे।

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

घोषणापत्र के नियमन की दरकार [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

इतिहास में घोषणापत्र शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थों में मिलता है जैसे कि धार्मिंक घोषणापत्र, साहित्यिक घोषणापत्र आदि। मगर वर्तमान में यह शब्द राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव से पूर्व जारी किए जाने वाले अपने वादों व नीतियों के दस्तावेज के लिए ही प्रचलन में है। कुछ विद्वानों द्वारा आधुनिक भारत का पहला घोषणापत्र 1907 में प्रकाशित महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ को कहा जाता है, जिसमें स्वतंत्र भारत के स्वरूप, नीतियों आदि की बात की गयी है।
घोषणापत्र कोई संवैधानिक दस्तावेज नहीं होता, इस कारण उसके वादों को पूरा करने को लेकर हमारे राजनीतिक दल किसी भी प्रकार के कानूनी दबाव से मुक्त होते हैं। हालांकि उनपर पांच साल बाद पुनः निर्वाचित होने के साथ-साथ नैतिकता की कसौटी पर खरा दिखने का दबाव अवश्य होता है। मगर इन दोनों दबावों का हमारे राजनीतिक दलों और नेताओं पर कम ही असर देखने को मिलता है, बल्कि वे जिस-तिस प्रकार से इनसे मुक्त होने का मार्ग निकालने की जुगत में लगे रहते हैं।
इन दिनों लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक दल अपना-अपना घोषणापत्र जारी करने और उनमें बड़े-बड़े वादों का अम्बार लगाने में लगे हैं। गौरतलब है कि बीते दो अप्रैल को जहां कांग्रेस पार्टी ने अपना घोषणापत्र ‘हम निभाएंगे’ शीर्षक के साथ जारी किया था, तो वहीं आठ अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी ने भी अपना संकल्प पत्र जनता के सामने रख दिया। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में गरीबी मिटाओ का नारा देते हुए गरीबों को प्रतिमाह 6 हजार की दर से सालाना 72 हजार रुपये देने वाली ‘न्याय’ योजना की घोषणा की है। राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा इसे कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक बताया जा रहा, लेकिन ये सवाल बना हुआ है कि इस योजना के क्रियान्वयन में लगने वाले सालाना 3.6 लाख करोड़ की रकम का बंदोबस्त कांग्रेस कैसे करेगी? सवाल यह भी है कि गरीबी मिटाने की कांग्रेस की कैसी नीतियां हैं कि इंदिरा गांधी के समय से वो गरीबी मिटाने का नारा देती आ रही है, लेकिन गरीबी अबतक मिटी नहीं?
इसके अलावा अभी हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस को सत्ता हासिल हुई। यहाँ उसने सब किसानों से कर्जमाफी का वादा किया था, लेकिन जब सरकार आई तो कर्जमाफी के साथ न केवल अनेक शर्तें जोड़ दी गयीं बल्कि जल्दबाजी में क्रियान्वयन की ठीक व्यवस्था भी नहीं बनाई गयी। परिणामतः किसी किसान का दो सौ तो किसीका चार सौ रुपया माफ़ हुआ।

भाजपा की बात करें तो बीबीसी की एक पड़ताल के अनुसार, गत चुनाव में भाजपा ने जो भी वादे किए थे, उनमें से बहुत से पूरे हो चुके हैं तो बहुतों के पूरा होने की दिशा में  कार्य प्रगति पर है। मोटे तौर पर भाजपा अपने लगभग अस्सी फीसद वादे पूरे कर चुकी है। लेकिन यहाँ भाजपा के कुछ ऐसे वादों का जिक्र करना जरूरी होगा जो उसके घोषणापत्र में दशकों से जगह बनाए हुए हैं और दो बार पूर्णकालिक सत्ता मिलने के बाद भी पूरे नहीं हो सके हैं। इनमें राम मंदिर निर्माण, जम्मू-कश्मीर से धारा-370 का खात्मा, समान नागरिक संहिता लागू करना जैसे वादे प्रमुख हैं। ये वादे इस बार भी भाजपा के घोषणापत्र में बने हुए हैं, ऐसे में उसे बताना चाहिए कि वो कबतक इन वादों को दुहराती रहेगी? पूर्ण बहुमत होने के बावजूद पिछले पांच सालों में सरकार इन वादों को पूरा करने की दिशा में कोई पहल करती क्यों नहीं दिखाई दी? यहाँ राज्यसभा में बहुमत न होने का तर्क दिया जा सकता है, लेकिन सरकार इन विषयों से सम्बंधित विधेयक तो ला ही सकती थी, पारित होना न होना बाद की बात थी।
ये देश के दो प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का हाल है। क्षेत्रीय दलों की स्थिति भी इनसे अलग नहीं है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली की आम आदमी पार्टी को देख सकते हैं जिसने घोषणापत्र के वादों से मुकरने के मामले में कीर्तिमान ही स्थापित कर दिया है। कुल मिलाकर बात यह है कि अलग-अलग तरह के वादों के नाम पर जनता को लुभाने का कार्य कमोबेश हर दल कर रहा है। जिस घोषणापत्र के जरिये आम आदमी को अपने कर्णधार राजनीतिक दलों की रीति-नीति की जानकारी प्राप्त कर उनके समर्थन या विरोध के प्रति अपना मन बनाना चाहिए, वो घोषणापत्र अपनी गंभीरता और महत्ता को खोकर आम आदमी को भरमाने का एक उपकरण मात्र बनता जा रहा है। वर्ष 2017 में देश के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जे. एस. खैहर ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि ‘चुनावी वादों के लगातार अधूरे रहने की वजह से राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र (मेनिफेस्टो) महज कागज का टुकड़ा बनकर रह गये हैं। राजनीतिक दलों को हर हाल में अपने चुनावी घोषणा-पत्रों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।’ यह कथन चुनाव दर चुनाव और अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है।  
समय आ गया है कि घोषणापत्र के नियमन को लेकर गंभीर कदम उठाए जाएं। वास्तव में ये भी चुनाव सुधार की ही एक महत्वपूर्ण कड़ी है। आज जरूरत है एक ऐसे तन्त्र की जो राजनीतिक दलों के घोषणापत्र का प्रमाणन और निगरानी कर सके। इसके लिए सबसे पहले घोषणापत्र के स्वरूप को राजनीतिक दस्तावेज तक सीमित न रखते हुए उसे एक संवैधानिक दस्तावेज का दर्जा दिया जाए। घोषणापत्र की एक मानक रूपरेखा तय की जाए जिसके अनुसार राजनीतिक दलों को अपने घोषणापत्र में वादों की जानकारी देनी हो। हर वादे की जानकारी स्पष्ट और विस्तृत रूप से देना जरूरी हो।
इसके अलावा चुनाव आयोग के अंतर्गत एक ऐसी इकाई स्थापित की जाए जो राजनीतिक दलों के साथ उनके घोषणापत्र के वादों की व्यावहारिकता को लेकर चर्चा करे, निर्धारित नियमों के अनुसार उनका मूल्यांकन करे और संतुष्ट होने पर उनका प्रमाणन कर उन्हें जारी करने की अनुमति दे। बिना इस प्रमाणन-प्रक्रिया से गुजरे राजनीतिक दल घोषणापत्र जारी न कर पाएं।
राजनीतिक दलों को घोषणापत्र में वादों के साथ उनको पूरा करने की स्पष्ट समयसीमा भी बताना अनिवार्य किया जाना चाहिए और वो समयसीमा उनके एक कार्यकाल से अधिक की नहीं हो। घोषणापत्र के वादों से अलग मौखिक रूप से नेताओं द्वारा कोई अन्य वादा करने को अनुशासनहीनता मानते हुए दंडनीय बनाया जाए। साथ ही, यदि कोई राजनीतिक दल अपने द्वारा घोषित समयसीमा में अपने घोषणापत्र के न्यूनतम नब्बे फीसद वादे पूरे नहीं कर पाता है, तो अगले चुनाव में उसके घोषणापत्र जारी करने या मौखिक रूप से भी कोई नया वादा करने को प्रतिबंधित कर दिया जाए। इन नियमों का अनुपालन न करने की स्थिति में सम्बंधित राजनीतिक दल के चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगाए जाने पर भी विचार किया जा सकता है।
उक्त प्रावधान कुछ कठोर अवश्य प्रतीत होते हैं, परन्तु राजनीतिक घोषणापत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज की गंभीरता और महत्ता को सुरक्षित रखने तथा राजनीतिक दलों द्वारा लोकलुभावन वादों के जरिये जनता को ठगने की दुष्प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए इन प्रावधानों को अपनाने की दिशा में चुनाव आयोग व सरकार को विचार अवश्य करना चाहिए।

बुधवार, 10 अप्रैल 2019

जड़ों में छिपा है ख़ुशी का मंत्र [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क (यूएनएसडीएसएन) द्वारा वर्ष 2019 की विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट जारी की गयी। संयुक्त राष्ट्र के 156 सदस्य देशों में प्रसन्नता का स्तर बताने वाली इस रिपोर्ट की शुरुआत 2012 में हुई थी।
जुलाई, 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर सदस्य देशों को अपने नागरिकों की प्रसन्नता के स्तर को मापने तथा इसके परिणामों का उपयोग लोक नीतियों के निर्माण में करने हेतु निर्देशित किया गया था। इसी प्रस्ताव के अनुपालन में अप्रैल, 2012 में भूटान के तत्कालीन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में ‘प्रसन्नता एवं अच्छे रहन-सहन’ विषय पर संयुक्त राष्ट्र उच्चस्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में पहली बार विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट जारी की गयी थी और तबसे हर साल मार्च महीने में इसे जारी किया जाता रहा है।
क्या कहती है 2019 की रिपोर्ट?
इस साल की विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट भी बीते वर्षों की ही तरह भारत के लिए निराशाजनक रही है। गत वर्ष इस रिपोर्ट में भारत का स्थान 133वां था, जो कि इस साल और गिरकर 140वें पायदान पर पहुँच गया है। हमारे सभी पड़ोसी देश इसबार भी हमसे बेहतर स्थिति में बने हुए हैं। पाकिस्तान इस सूची में 67वें, चीन 93वें, भूटान 95वें, नेपाल 100वें, बांग्लादेश 125वें तथा श्रीलंका 130वें स्थान पर है। जाहिर है, भारत यहाँ अपने पड़ोसी देशों से काफी पीछे है। इस रिपोर्ट में भारत की स्थिति साल दर साल बिगड़ती ही गयी है। जब 2012 में पहली बार यह रिपोर्ट आई थी, तो भारत का स्थान 112वां था जो कि गिरते-गिरते अब 140 पर पहुँच गया है।
प्रसन्नता के मामले में शीर्ष दस देशों में पहली विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट  से लेकर अब तक फ़िनलैंड, नॉर्वे, डेनमार्क, स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रिया, आइसलैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देश बने हुए हैं। इनकी रैंकिंग में सिर्फ थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव भर होता है, लेकिन शीर्ष दस प्रसन्न देशों में यही शुमार रहते हैं। वहीं दुनिया के प्रमुख विकसित देशों की बात करें तो इनमें जर्मनी 17वें, ब्रिटेन 15वें, अमेरिका 19वें, फ्रांस 24वें स्थान पर हैं। इस रिपोर्ट का आधार कुछ ख़ास मानक हैं, जिनकी बेहतरी के आधार पर ये सम्बंधित देशों में प्रसन्नता का स्तर तय करती है।

क्या हैं मानक?
प्रति व्यक्ति आय, सामाजिक स्वतंत्रता, उदारता, सामाजिक अवलम्बन, भ्रष्टाचार की कमी, स्वस्थ जीवन की संभावना इन छः प्रमुख मानकों के आधार पर विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट तैयार की जाती है। जो देश इन छः बिन्दुओं पर जितनी बेहतर स्थिति में होते हैं, वहाँ प्रसन्नता की स्थिति उतनी ही बेहतर मानी जाती है।
सवालों के घेरे में रिपोर्ट
उक्त तथ्यों को देखते हुए विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट और उसके मानकों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। पहली बात कि ये रिपोर्ट एक से मानकों के आधार पर हर देश में प्रसन्नता को माप रही है, जबकि वास्तव में स्थिति ऐसी नहीं है। अलग-अलग देशों के लिए प्रसन्नता का स्वरूप और उसकी वजहें अलग-अलग हो सकती हैं। भारत की बात करें तो एक चुटकुला है कि यहाँ लोग बिजली आने पर भी खुश हो जाते हैं। मतलब यह कि भारत जैसे देश में लोग प्रसन्नता के लिए बहुत बड़ी-बड़ी वजहों का इंतज़ार नहीं करते बल्कि बहुत छोटी-छोटी और साधारण सी बातों पर भी प्रसन्न हो लेते हैं। अतः यहाँ के लिए संयुक्त राष्ट्र उक्त प्रसन्नता सम्बन्धी मानक कितने सही हैं, इसपर संस्था को विचार-विमर्श की जरूरत है।
दूसरी चीज कि यदि एकबार के लिए इन मानकों को सार्वदेशिक रूप से सही मान भी लें तो इनके आधार पर भी भारत पाकिस्तान से कहीं अधिक बेहतर स्थिति में नजर आता है। पाकिस्तान की आबादी भारत की आबादी के लगभग पांचवे हिस्से से भी कम है, इस कारण पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय भारत से कुछ अधिक अवश्य है, लेकिन क्रय क्षमता के मामले में भारत पाकिस्तान से कहीं बेहतर स्थिति में है। 2017 की विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के लोगों की क्रय क्षमता 7060 पीपीपी डॉलर है, वहीं पाकिस्तान की 5830 पीपीपी डॉलर। इसके बाद अधिक आबादी के कारण प्रति व्यक्ति आय में पाकिस्तान के मामूली रूप से आगे होने का क्या मतलब रह जाता है। भ्रष्टाचार की बात करें तो 2018 की ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक भारत जहां भ्रष्टाचार पर रोकथाम करने वाले देशों में 78वें स्थान पर है, तो वहीं पाकिस्तान 117वें स्थान के साथ भारत से बहुत पीछे है। यानी कि भ्रष्टाचार की कमी के मामले में भी हम पाकिस्तान से कहीं बेहतर स्थिति में हैं। रही सामाजिक स्वतंत्रता और उदारता जैसी बातें तो दुनिया जानती है कि इस मामले में पाकिस्तान की क्या हालत है। जिस मुल्क का निर्माण ही कट्टरता की बुनियाद पर हुआ है, वहाँ उदारता के विषय में सोचना ही बेमानी है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों और महिलाओं की दुर्दशा भी किसी से छिपी नहीं है। अतः इन मामलों में भी भारत में पाकिस्तान से बहुत अधिक बेहतर वातावरण है। बावजूद इसके आखिर किस आधार पर विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट में पाकिस्तान शुरू से ही भारत से बेहतर स्थिति में बना हुआ है, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। संयुक्त राष्ट्र को अपनी इस रिपोर्ट के मानकों का एकबार पुनः अवलोकन करते हुए उन्हें और अधिक सुसंगत और तार्किक बनाने का प्रयास करना चाहिए।
भारत में प्रसन्नता की वास्तविक स्थिति
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर तो सवाल उठते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भारत में हर तरफ प्रसन्नता ही प्रसन्नता है। अगर जमीनी स्तर पर देखें तो स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं यहाँ प्रसन्नता के स्तर में कमी आ रही है। धीरे-धीरे यह देश यत्र-तत्र और येन-केन-प्रकारेण प्रसन्न होने का अपना स्वभाव खोता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में कम से कम 6.5 प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जो अवसाद सम्बन्धी बीमारियों से ग्रस्त हैं। शहरी क्षेत्र में ये समस्या इस समस्या का विशेष प्रभाव है, जहां प्रत्येक सौ में 3 लोग अवसाद में जी रहे हैं। दिक्कत ये भी है कि देश में लोग अवसाद में होते हैं, मगर या तो उसे समझते नहीं अथवा समझते हुए भी अनदेखा करते हैं और उपचार नहीं कराते। बहरहाल, देश में अवसाद का यह बढ़ता ग्राफ प्रसन्नता के कम होने की ही गवाही दे रहा है।

क्यों घट रही प्रसन्नता?
सवाल उठता है कि वो क्या कारण हैं जो लोगों में इस कदर अवसाद और अप्रसन्नता जैसी विसंगतियां पैदा कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए पटना निफ्ट में प्राध्यापक और मोटिवेशनल स्पीकर रत्नेश्वर सिंह कहते हैं, ‘प्रसन्नता के मामले में भारत के पिछड़ने के कई कारण हैं, जिनमें पहला कारण तो जनसंख्या है जिससे अन्य देशों की अपेक्षा हमारे लिए चुनौतियाँ अधिक हैं। दूसरा कारण है शिक्षा की कमी। अशिक्षित लोग जहां रोजी-रोटी के संघर्ष में परेशान हैं, तो वहीं जो शिक्षित व रोजगारयुक्त हैं उनमें और अधिक पाने की अपेक्षा संघर्ष पैदा किए हुए है। इन सबके बावजूद जो सबसे बड़ी वजह है, वो ये कि भारतीय लोग मानसिक स्तर पहले की अपेक्षा पिछड़ गए हैं। भारतीय दर्शन में अभाव में भी खुश रहने के जो तरीके बताए गए थे, यूरोपीय प्रभाव में हम उनसे दूर होते जा रहे हैं। अतः अगर हमें अपनी प्रसन्नता का स्तर बेहतर करना है तो उसके लिए रोजगार आदि की उपलब्धता के लिए काम करने के साथ-साथ भारतीय प्राचीन दर्शन, जिसमें योग आदि की व्यवस्था है, की तरफ भी मुड़ना पड़ेगा।’ इसमें कोई दोराय नहीं कि जनसंख्या हमारे लिए एक बड़ी समस्या है, लेकिन इससे भी बड़ी दिक्कत यह है कि आधुनिकता के अन्धोत्साह में हम अपने भारतीय दर्शन के मूल्यों से कटते जा रहे हैं।
क्या कहता है भारतीय दर्शन?
भारतीय दर्शन में सुख के लिए मुख्यतः दो मार्गों का प्रतिपादन किया गया है – संतोष और समता। ‘संतोषम परम सुखम’ यह श्लोकांश अत्यंत प्रसिद्ध है। ऐसे ही और भी कई श्लोक भारतीय प्राचीन ग्रंथों में मिल जाते हैं, जिनमें संतोष को सुख यानी प्रसन्नता के रूप में स्थापित किया गया है। देखा जाए तो वर्तमान समय में हम इस संतोष के मार्ग को छोड़ अधिक से और अधिक पाने की यूरोपीय मान्यता के बहाव में बहे जा रहे। अपने पास जो है, उसे पर्याप्त मानकर संतुष्ट रहने की बजाय दूसरे से अपनी तुलना करने और फिर उससे अधिक अर्जित करने की चाह ने घर से लेकर कार्यस्थल तक लोगों में ऐसी अंधी होड़ पैदा कर दी है, जिसने उनका सुख-चैन छीन लिया है। ये कहें तो गलत नहीं होगा कि बहुधा लोग आज अपने दुःख से अधिक दूसरे के सुख से दुखी रहने लगे हैं। ऐसे में, वे मानसिक तौर पर शांत और सुखी रहें, इसकी उम्मीद करना ही बेमतलब है।  
दूसरा मार्ग है समता का जिसका प्रतिपादन गीता से लेकर वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस तक में मिलता है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – ‘सुख दुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ’ इस श्लोकांश में सुख-दुःख, जीत-हार, लाभ-हानि सभी परिस्थितियों में एक समान भाव रखने की बात कही गयी है। विडंबना है कि गीता को घर में रखकर पूजने वाला भारतीय समाज उसके इस सन्देश को अप्रासंगिक व अव्यवहारिक मानकर भूल चुका है, जिसके परिणामस्वरूप अवसाद और निराशा के चंगुल में फंसकर प्रसन्नता से दूर होता जा रहा।
उक्त बातों के आलोक में ये कहना ठीक होगा कि भारतीय समाज भविष्य में जनसंख्या, रोजगार जैसी समस्याओं को यदि सुलझा भी लेता है, तब भी अपनी वैचारिक जड़ो अर्थात भारतीय दर्शन की तरफ लौटे बिना वो मानसिक प्रसन्नता को प्राप्त नहीं कर सकता। 

बुधवार, 27 मार्च 2019

बढ़ते तापमान के प्रति असजग विश्व [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

पिछले दिनों ब्राजील के राष्ट्रपति जैर बोलसोनारो ने संयुक्त राष्ट्र के पच्चीसवें जलवायु सम्मेलन (COP 25) की मेजबानी से इनकार करते हुए कहा कि पर्यावरण सुरक्षा के मामले में उनका देश किसी भी तरह से दुनिया का कर्जदार नहीं है। इस सम्मेलन की मेजबानी न करने के पीछे उन्होंने यह भी तर्क दिए कि इसके लक्ष्य असंभव और अप्राप्य हैं। अब इस सम्मेलन की मेजबानी चिली करेगा।
दुनिया की अनेक पर्यावरण संस्थाएं और एजेंसियां इस बात की तस्दीक कर चुकी हैं कि दुनिया का तापमान तेजी से बढ़ रहा है और यदि समय रहते इसके प्रति सचेत होकर रोकथाम के लिए कदम नहीं उठाए गए तो ये ऐसे भीषण संकट का रूप ले सकता है, जिसका समाधान संभव नहीं होगा।
लेकिन विडंबना ही है कि इस कठिन स्थिति के बावजूद विश्व बिरादरी में इससे निपटने को लेकर जितनी चाहिए उतनी इच्छाशक्ति नहीं दिख रही। विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु परिवर्तन के कारकों के लिए एकदूसरे पर दोषारोपण और खुद जिम्मेदारी से मुक्त रहने की स्थिति और चिंताजनक है।   
गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर रूप से प्रयासों की शुरुआत 1992 में रियो डी जेनेरियो शहर में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के ‘पृथ्वी शिखर सम्मेलन’ नामक एक आयोजन से होती है। इस आयोजन में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन’ (यूएनएफसीसी) करने पर सहमति बनी। 1994 में इसे एक संधि का रूप देकर लागू कर दिया गया और अबतक इसपर 194 देश हस्ताक्षर कर चुके हैं। प्रत्येक वर्ष इसके सम्मेलन का आयोजन अलग-अलग देशों में किया जाता है। इस संधि में देशों ने, वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सघनता को स्थिर करने पर सहमति दी थी जिससे मानवीय गतिविधियों से जलवायु प्रणाली में हानिकारिक हस्तक्षेप न होने दिया जाए। आज इस संधि पर लगभग दो सौ देशों के हस्ताक्षर हो चुके हैं। अबतक 24 सीओपी सम्मेलन हो चुके हैं और इस वर्ष पच्चीसवां सीओपी ब्राजील में होना था, लेकिन उसके इनकार के बाद अब इसकी मेजबानी चिली ने ले ली है।  
वर्ष 2015 में पैरिस में सीओपी का इक्कीसवां सम्मेलन हुआ जिसमें इसमें शामिल देशों के बीच एक जलवायु समझौते पर सहमति बनी और फिर नवम्बर 2016 में यह समझौता लागू भी हो गया। इस समझौते पर तब तत्काल 177 देशों ने हस्ताक्षर कर दिए थे। समझौते का लक्ष्य कार्बन उत्सर्जन में कटौती के जरिये वैश्विक तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस के अंदर सीमित रखना है। यह समझौता लागू होने का समय 2020 तय किया गया है, लेकिन यदि इससे पहले इसके सभी सदस्य देशों में इसके लक्ष्यों पर सहमति बन जाती है तो ये पहले भी लागू हो सकता है। लेकिन वर्तमान में जो हालात हैं, उन्हें देखते हुए लगता नहीं कि इसका लागू होना आसान होगा।  

इस समझौते की सबसे बुनियादी बात है कि देश अपना कार्बन उत्सर्जन कम करें। इस एक बिंदु को लेकरं विकासशील और विकसित देशों में खींचतान मची है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा देते हुए तथा वैश्विक तापमान के लिए भारत-चीन को जिम्मेदार बताते हुए इस समझौते से अलग होने की घोषणा कर चुके हैं। अमेरिका बीस टन कार्बन उत्सर्जन के साथ इस मामले में दुनिया में पहले नम्बर पर है। ऐसे में उसका इस समझौते से अलग होने की घोषणा इस समझौते को तो कमजोर करने वाली है ही, साथ ही अन्य देशों के रुख पर भी असर डाल सकती है।
ब्राजील जैसा तीव्र विकास दर वाला देश भी इसकी मेजबानी से हाथ खींचकर इसके प्रति अपनी उदासीनता व्यक्त कर चुका है। चीन और भारत कार्बन उत्सर्जन के मामले दूसरे और तीसरे नम्बर पर हैं। भारत ने अपनी तरफ से सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने की एक योजना प्रस्तुत करते हुए समझौते को मंजूरी दे दी है।
पेरिस समझौते का सबसे कमजोर पक्ष यह है कि इसको मानने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है तथा ऐसी कोई व्यवस्था भी अभी उपलब्ध नहीं है जिससे यह जाना जा सके कि समझौते में शामिल देश निर्धारित मात्रा में ही कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं। ऐसे में यह समझौता अगर किसी तरह से आम सहमति कायम करके 2020 तक लागू हो भी जाता है तो भी शायद ही कोई असर छोड़ पाएगा। बड़ी संभावना है कि ये भी परमाणु निशस्त्रीकरण पर बनी सहमतियों की तरह दुनिया के विकासशील और विकसित देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का एक जरिया भर बनकर रह जाए।
इस विश्व बिरादरी की उठापटक से इतर वैश्विक तापमान की भयावहता का आलम यह है कि अंतरशासकीय पैनल दुनिया भर में किये गये जलवायु संबंधी 6000 से अधिक अध्ययनों का विश्लेषण के बाद इस नतीजे पर पहुंचा है कि इस समय वैश्विक तापमान की जो स्थिति है, उस पर यदि तेज़ी से लगाम नहीं लगायी गयी, तो 21वीं सदी का अंत आने से पहले ही औसत वैश्विक तापमान तीन से चार डिग्री तक बढ़ जायेगा। इसके बहुत ही भयंकर परिणाम हो सकते हैं। अभी वैश्विक तापमान में पिछली 20वीं सदी के दौरान औसतन केवल एक डिग्री के लगभग ही वृद्धि हुई है। पर, इस एक डिग्री की वृद्धि से ही बढ़ती गर्मी, प्रतिकूल वर्षा, तूफ़ान आदि के रूप में जलवायु परिवर्तन की जो विनाश लीला हम अब तक देख चुके हैं और जब-तब देखते रहते हैं, वह इसकी कल्पना करने के लिए पर्याप्त होना चाहिये कि वैश्विक तापमान यदि उक्त अनुमान के अनुसार तीन से चार डिग्री बढ़ गया तो धरती को क्या दिन देखने पड़ सकते हैं। जाहिर है कि वैश्विक तापमान की स्थिति खतरनाक से बहुत खतरनाक अवस्था की ओर बढ़ रही है, लेकिन चिंताजनक है कि विश्व बिरादरी आपसी सिरफुटौव्वल में उलझी हुई है। निश्चित तौर पर बढ़ते वैश्विक तापमान को कम करने की पहली जिम्मेदारी विकसित देशों की ही है, लेकिन विकासशील देशों को भी एकदम छूट नहीं मिल सकती। विकसित देशों ने कार्ब उत्सर्जन करके विकास किया इस आधार पर विकासशील देशों का भी कार्ब उत्सर्जन को अपना अधिकार बताना उचित नहीं है। समयोचित उपाय यह है कि वैज्ञानिक शोध-अनुसंधान के जरिये ऐसा मार्ग विकसित करने की दिशा में प्रयास किया जाए जिससे बिना कार्बन उत्सर्जन के ही विकास किया जा सके। जब धरती ही नहीं रहेगी किसी भी विकास और प्रगति का कोई मतलब नहीं है, इसलिए आपसी मतभेदों और व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर विश्व की प्राथमिकता धरती के ताप को कम करना होना चाहिए।