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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

नारीशक्ति का सही अर्थ [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

गत दिनों संपन्न हुए जयपुर साहित्य महोत्सव में ‘ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश’ द्वारा ‘नारीशक्ति’ को वर्ष 2018 का हिंदी शब्द (वर्ड ऑफ़ द इयर) चुनने की घोषणा की गयी। खबरों के अनुसार, गत वर्ष नवम्बर में ऑक्सफ़ोर्ड की तरफ से ‘वर्ड ऑफ़ द इयर’ को लेकर लोगों की राय मंगाई गयी थी, जिसमें प्राप्त अनेक शब्दों में से चिंतन-मनन के पश्चात् ‘नारीशक्ति’ शब्द को ‘2018 के शब्दकोश’ में शामिल करने का निर्णय लिया गया। ऑक्सफ़ोर्ड की तरफ से ये घोषणा करते हुए कहा गया कि 'साल का हिंदी शब्द नारीशक्ति, एक शब्द या भाव है, जिसने काफी ध्यान खींचा है। यह पिछले साल की प्रकृति, मिजाज और विचारमग्नता को जाहिर करता है।‘ जाहिर है, इस शब्द को चुनने का आधार पिछले पूरे वर्ष में अलग-अलग कारणों से इसका प्रासंगिक बने रहना है। बता दें कि वर्ष 2017 में ऑक्सफ़ोर्ड द्वारा भारत में ‘वर्ड ऑफ़ द ईयर’ चुनने की शुरुआत की गयी थी और ‘आधार’ को उस वर्ष का शब्द चुना गया था।

गौर करें तो ‘नारीशक्ति’ को साल 2018 का शब्द चुने जाने के पीछे कई कारण नजर आते हैं। गत वर्ष नारी सशक्तिकरण की दिशा में देश ने कुछ महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए हैं जिस कारण पूरे वर्ष यह शब्द प्रासंगिक बना रहा। केंद्र सरकार द्वारा तीन तलाक की अमानवीय कुप्रथा का अंत करने के लिए ‘तीन तलाक विधेयक’ संसद में पेश  किया गया जो लोकसभा में पारित भी हो गया है। इस क़ानून के तहत तीन तलाक को अवैध करार देते हुए सम्बंधित पुरुष को तीन साल की सजा का प्रावधान किया गया है। निस्संदेह इस कदम से मुस्लिम महिलाओं जो तीन तलाक की मर्दवादी इस्लामिक व्यवस्था से त्रस्त थीं, के लिए उम्मीद की किरण पैदा हुई है। मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण से ही सम्बंधित एक और निर्णय भी पिछले साल लिया गया कि वे अब हज यात्रा में बिना किसी मेहरम (पुरुष अभिभावक) के अकेले भी जा सकती हैं। दरअसल पहले मुस्लिम महिलाओं को बिना किसी पुरुष अभिभावक के हज पर जाने की अनुमति नहीं थी। ये पूरी तरह से उनपर मर्दों का नियंत्रण स्थापित करने वाली एक मर्दवादी व्यवस्था थी, जिसे वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने ख़त्म कर दिया। इसके बाद 2018 में लगभग 1300 महिलाओं ने अकेले हज यात्रा की थी। इस वर्ष भी लगभग 2300 महिलाओं के अकेले यात्रा का आवेदन सरकार को मिल चुका है।

वर्ष 2018 में ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केरल के प्राचीन सबरीमाला मंदिर में दस से पचास साल तक की महिलाओं को भी प्रवेश की अनुमति देने का फैसला सुनाया गया। हालांकि स्थानीय श्रद्धालुओं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं, द्वारा इस निर्णय का विरोध जताते हुए अनुमति प्रदान महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश की गयी। साथ ही, इस अनुमति के औचित्य पर तब सवाल भी उठे जब एक महिला इस्तेमाल सेनेटरी पैड लेकर मंदिर में पहुँचने की बात सामने आई। गौरतलब बात यह भी रही कि तीन जजों की जिस पीठ ने सबरीमाला में दस से पचास साल तक की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति प्रदान की, उसमें शामिल महिला जज इस निर्णय से सहमत नहीं थीं। जाहिर है, इन विरोधाभासों के कारण नारी सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण माने जाने वाला यह निर्णय न केवल तार्किकता के धरातल पर कमजोर पड़ा, बल्कि एक सकारात्मक बदलाव की बजाय नकारात्मक धारणाओं का प्रसार करने वाला भी साबित हुआ है।  

बहरहाल, इन धार्मिक जकड़नों से महिलाओं की आजादी के अलावा वर्ष 2018 उनके शौर्य और साहस को समुचित स्थान व सम्मान मिलने के लिए भी यादगार रहा। गत वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह घोषणा की कि अब सेना में शामिल महिलाओं को भी सशस्त्र लड़ाके की भूमिका में जाने का मौका मिलेगा। अबतक महिलाएं सेना में सक्रिय तो थीं, लेकिन युद्ध के अवसरों से उन्हें दूर रखा जाता था। मगर, इस निर्णय के बाद यदि महिलाएं चाहेंगी तो सीमा पर भी जा सकेंगी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह सही अर्थों में नारीशक्ति के सम्मान का निर्णय है। गत वर्ष की एक उल्लेखनीय बात यह भी रही कि भारत सरकार की ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना जो कुछ जिलों तक सीमित थी, को पूरे देश में लागू किया गया।   

इन सबके अलावा वर्ष 2018 में कुछ बेहद नकारात्मक कारणों से भी नारीशक्ति की चर्चा रही। ऊपर वर्णित सबरीमाला मामले को छोड़ भी दें तो सोशल मीडिया पर चले मीटू नामक एक अतार्किक अभियान ने नारीशक्ति को सवालों के घेरे में खड़ा करने का ही काम किया। इस अभियान के तहत जिस तरह से महिलाओं ने वर्षों पुराने मामलों का जिक्र करते हुए अप्रमाणिक ढंग से अलग-अलग पुरुषों पर छेड़छाड़ और यौन शोषण का आरोप लगाया, उसने उन्हें क्षणिक नकारात्मक चर्चा तो दिलाई लेकिन उसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। इस अभियान के तहत अप्रामाणिक आरोप लगाने वाली महिलाओं ने कहीं न कहीं ‘भेड़िया आया’ वाली कहानी को ही चरितार्थ किया है। संभव है कि ऐसे आरोपों में कुछ सच्चाई भी हो, लेकिन अगर वे महिलाएं शोषण के समय चुप रही थीं, तो वर्षों बाद बिना प्रमाण के उन मामलों को उजागर करने का कोई औचित्य नहीं था। हालांकि इस अभियान को भी नारीशक्ति के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करने के लिए तथाकथित नारीवादियों द्वारा जोर लगाया गया, लेकिन इससे सिवाय विवादों के ऐसा कोई परिणाम या सन्देश नहीं निकला जिसके आधार पर इससे सकारात्मक बदलाव की उम्मीद की जा सके। देश की नारी को ऐसे आधारहीन संघर्षों में अपनी शक्ति को व्यर्थ करने से बचने की आवश्यकता है।

‘नारीशक्ति’ शब्द पर गौर करें तो ये संस्कृत भाषा के ‘नारी’ और ‘शक्ति’ दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें प्रयुक्त ‘शक्ति’ शब्द का साधारण अर्थ ‘ताकत’ है, परन्तु हमारे सनातन ग्रंथों में इस शब्द का प्रयोग ‘देवी’ के लिए किया गया है। वो देवी जो समस्त देवों की ‘शक्ति’ हैं और जिनका अवतरण लोककल्याण के लिए होता है। मीटू जैसे अभियानों में उलझने वाली नारियों को यह बात समझने की जरूरत है। उन्हें अपनी शक्ति का उपयोग व्यर्थ विवादों की बजाय अपने और सबके हित से संबंधित रचनात्मक कार्यों में करने की आवश्यकता है। मोटे तौर पर कहें तो आज की नारी को यदि ‘नारीशक्ति’ बनना है तो उसका आदर्श तनुश्री दत्ता जैसी नहीं, कल्पना चावला और मैरीकॉम जैसी नारियां होनी चाहिए। नारीशक्ति का वास्तविक भाव यही है।

बुधवार, 28 जनवरी 2015

कहानी : मेनी मेनी थैंक्स, सर! [द्विमासिक पत्रिका परिकथा में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत


“हेलो!”
“नमस्ते सर! मै सीमा ।”
“ओहो! कहो..मेरी ‘आफत की गुड़िया’ कैसी हो ?”
“फाइन सर......आप.......? आज शाम आपको मेरे घर आना है ।”
“तुम्हारे घर..........पर क्यों ?”
 “गवाही के लिए ।”
“गवाही के लिए.. क्या अनाप-शनाप बकती रहती हो...”
परिकथा आवरण चित्र
“कुछ अनाप-शनाप नही है, सर! शाम में आईये, सब पता चल जाएगा । वैसे, आपको बता दू, ये ‘इनविटेशन’ मुझसे ज्यादा पापा की तरफ से है ।” ये कहके मेरा जवाब सुने बगैर उधर से फोन काट दिया गया और इधर मै फोन कान से लगाए, मन में तमाम अज्ञात-आशंकाएं लिए, खड़ा रहा । मेरी इन अज्ञात-आशंकाओं के लिए कारण-तत्व ये था कि फोन पर सीमा थी । सीमा, यूँ तो मेरे कोचिंग सेंटर में पढ़ने वाले तमाम छात्र-छात्राओं में से एक है, मगर उसके विचार-व्यवहार इतने विलक्षण और विरोधी हैं कि उसका नाम आते ही मुझे किसी न किसी आफत का अंदेशा होने लगता है । मेरे लिए सीमा माने आफत और इसीलिए मैंने उसका नाम भी रखा है – आफत की गुड़िया । यहाँ ‘आफत की पुड़िया’ की बजाय ‘आफत की गुड़िया’ प्रयुक्त करने के लिए कारण है, उसकी गुड़िया जैसी खूबसूरती । जी हाँ, वो बहुत खूबसूरत है । पर, ये खूबसूरती किसी अप्सरा की नही, मासूम बच्चे की है । उसकी शक्ल-सूरत देखकर निश्चित ही कोई भी उसे एक सामान्य आचार-विचार वाली सीधी-सादी लड़की ही  समझेगा । मैं भी समझता था, पर मेरी इस समझ को एक वाकये ने पूरी तरह से बदल के रख दिया । हुआ यूँ कि उस रोज मेरे कोचिंग सेंटर में बिजली खराब थी । चूंकि, गर्मी का मौसम था, इसलिए पसीने से हमारी (मेरी और मेरे विद्यार्थियों की) हालत खराब हो रही थी । गर्मी से परेशान मैंने अपना कुर्ता उतार दिया और सिर्फ गंजी पर हो गया । गर्मी से तो फुल बाजू के कुर्ते वाले विद्यार्थी भी परेशान थे, मुझे गंजी पर देख उन्हें मौका मिला और उन्होंने भी अपनी परेशानी बतानी शुरू कर दी । मुझे उनकी बात जायज लगी और मैंने लड़कों की ओर देखते हुए कहा कि जिनको गर्मी से परेशानी हो, वो अपनी कमीज उतार लें । अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, मेरी ये अनुमति सिर्फ लड़कों के लिए थी । लड़कों ने अपनी कमीजें उतार दी और पढ़ाई में लग गए । फुल बाजू की कमीज कई लड़कियों ने भी पहनी थी, पर वो शांत रहीं । कुछ मिनट ही बीते थे कि तभी अचानक कुछ सुगबुगाहट हुई । मैंने ब्लैकबोर्ड की तरफ से नज़र घुमाकर देखा, तो जो दिखा, वो बड़ा ही अप्रत्याशित था । एक लड़की बड़े ही सहज भाव से अपनी कमीज उतार  कर बैठी, पढाई में लगी थी । चूंकि, स्त्रियों के अंतर्वस्त्र, पुरुषों की अपेक्षा कुछ अधिक छोटे होते हैं, इसलिए उसके कमर से ऊपर का अधिकाधिक हिस्सा पूरी तरह से नग्न दिख रहा था । उसकी इस स्थिति पर कुछ लड़के शर्म से चेहरा किताब में गडाए हुए थे, तो कुछ तिरछी नज़रों से उसकी तरफ देखते हुए मुस्कुरा रहे थे । लड़कियों के चेहरे पर भी हवाइयां उड़ रही थीं । पर उसे तो जैसे इन सबकी कोई परवाह ही न हो, बड़ी ही सहजता से अपनी पढाई में मस्त थी । वो थी सीमा । आखिर मुझसे नही रहा गया और मै चिल्लाया, ‘‘क्या बेहूदगी है ये ?’’ मेरे ऐसे चिल्लाने पर उसने अपनी नजरें ऊपर उठाई और मुझे प्रश्नसूचक निगाहों से देखने लगी । मै फिर बोला, “हा, तुम्ही को कह रहा हूँ । शर्म-हया बेचकर आयी हो क्या ? कमीज क्यों उतारी अपनी ?”
“गर्मी मुझे भी लगती...”
“और लड़कियां नही हैं यहाँ...? उनको नही लगती गर्मी ?” उसकी बात काटके बोल पड़ा था मै ।
“किसीके अंदर बर्फ जम रही हो, तो मुझे नही पता...पर मुझे तो बहुत गर्मी लग रही है और सर आपने भी...और लड़कों ने भी तो शर्ट उतार....”
“बेशर्मी की हद है...” जोर से चिल्लाया मै, “लड़कों ने उतारा तो इसका क्या मतलब...कि तुम भी...आउट...आउट ऑफ हियर ।”
वो बड़ी सहजता से बाहर चली गई । कोचिंग खत्म होने के बाद मै उसके बारे में थोड़ी देर तक सोचता रहा । मन ही मन इरादा किया कि उसे अपने कोचिंग सेंटर से निकाल दूं, पर फिर ख्याल आया कि क्यों न इस संबंध में एकबार उसके माता-पिता से बात की जाए । उसी शाम मै उसके पिता से मिला । मुझे पूरी उम्मीद थी कि इस घटना के बारे में जानकार वो आश्चर्य और गुस्से से भर जाएंगे । पर मुझे झटका तब लगा, जब मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर आश्चर्य की बजाय दुख और निराशा के भाव आए । अवरुद्ध कंठ से कहा उन्होंने, “आपके यहाँ तो पढ़ती है, सर! एक न एक दिन तो जानना ही था आपको । थक गया हूँ इस लड़की से...आजिज आ गया है मन! जी करता है कि...”
“...मतलब क्या है आपका ? साफ़-साफ़ बताइए ।” मै उनकी बात काटके बोल पड़ा ।
“साफ़-साफ़ क्या कहूँ, सर! पर नही कहूंगा तो भी क्या फायदा..जब अपना ही सिक्का...कभी-कभी तो सोचता हूँ कि जाने किस घड़ी में उसका नाम सीमा रखा था, किसी सीमा में रहना तो जैसे उसने जाना ही नही । लाख समझा लूं, पर कोई मतलब नही...करेगी वो अपने ही मन की । मन का खाना-पीना-आना-जाना-पहनना-रहना और भी सबकुछ....यहाँ तक भी ठीक है । आजकल लड़कियां प्रगतिशील हैं, पर इसका ये तो अर्थ नही कि उनकी सीमाएं समाप्त हो गईं । कुछ तो सीमा होती हैं एक लड़की की ।”
ये सब सुनकर दुविधात्मक स्थिति हो गई थी मेरी । सूझ नही रहा था क्या कहूँ ? कहने तो यही आया था कि लड़की को सुधारों, वरना अपने कोचिंग सेंटर से निकाल दूंगा । पर अब एक पिता की विवशता और व्यथा देख ऐसा कुछ भी कहना कठिन हो रहा था । अपनी अवमानना के कारण उपजे क्रोध ने जो कटु शब्द पैदा किए थे, उनको एक पिता की व्यथा-धार ने मिटा दिया । कुछ पल सोचने के बाद आखिर बड़ी विनम्रता से मै बोला, “मुझे तो अंदाज़ा ही नही था कि शक्ल से मासूम और कोमल सी दिखने वाली  लड़की ऐसी उद्दण्ड भी हो सकती है..। वैसे, आपने कभी जानने की कोशिश नही की कि क्या चाहती है वो ? ऐसी क्यों हो गई है ?”
“नही...पता, सर..” ये कहते वक्त वो काफी असहज लग रहे थे ।
“पर इस हालत में तो उसे पढ़ा पाना मुश्किल होगा, अनुशासन भी कोई चीज होती है ।”
“आपसे पहले इसी बात पर दो-तीन जगहों से निकाली जा चुकी है...आप भी निकाल सकते हैं । पर इतना कर सकें तो बड़ी कृपा हो कि अगले महीने होने वाले टेस्ट तक उसे पढ़ा दीजिए..फिर आपकी मर्जी ?” ये कहते हुए उनके मन की व्यथा आँखों में उतर आई ।
“चलिए देखते हैं, क्या हो सकता है ।” ये कहके मै तुरंत वहाँ से चल दिया । अब मै उस व्यक्ति की पीड़ा का और सामना नही कर सकता था । काफी सोचने के बाद, मैंने निर्णय लिया कि सीमा से एकबार खुद बात करके उसे समझाने की कोशिश करूंगा । अगर समझ गई तो ठीक, वरना तो उसे निकालना ही पड़ेगा । अगली सुबह, कोचिंग क्लास खत्म होने के बाद मै सीमा से अकेले में मिला । उससे किसी माफ़ी की उम्मीद मुझे थी भी नही और उसने मांगी भी नही । बाते शुरू करते हुए मै बोला, “कल तुमने जो किया उसके बाद मेरे लिए तुम्हे पढ़ा पाना मुश्किल होगा, पर फिर भी तुम्हारे पिता के कहने पर एक मौका तुम्हे देना चाहता हूँ । मुझे भरोसा दो कि जो कल हुआ, फिर नही होगा ।”
“कल क्या हुआ, सर ? मुझे गर्मी लग रही थी इसलिए मैंने शर्ट उतार दी । अब अगर इससे आपको दिक्कत हो तो आप मुझे यहाँ से निकाल ही दीजिए । क्योंकि मै ऐसे नही रह सकती जिससे जीने में ही मुश्किल होने लगे ।” बड़ा ही सहज स्वर था उसका । उसकी ये बात सुनकर क्रोध तो बहुत आया मुझे, पर बमुश्किल खुद पर जब्त करके मैंने कहा, “एक तरफ तुम्हारे पिता तुम्हारे जीवन को लेकर परेशान हैं और तुम हो कि कोई परवाह ही नही । आखिर क्या चाहती हो तुम ? क्यों इस तरह से अपनी जिन्दगी बेकार कर रही हो ?”
“ये मेरी जिन्दगी है । मै चाहे जो करूँ ।”
अब मेरे सब्र का बाँध टूट चुका था । मै पूरे आवेश में बोला, “तुमसे बात करने का कोई लाभ नही...जाओ, तुरंत निकलो यहाँ से...तरस आती है तुम्हारे पिता पर...दुख होता है उस बुजुर्ग के लिए जिसकी तुम्हारे जैसी बेटी है...निकलो, तुरंत..।”
कहानी
“जा ही रही हूँ, सर । आपको तरस आ रही है, दुख हो रहा है न उनके लिए...मुझे भी किसी पर बहुत तरस आता है..दुख भी होता है और बस इसीलिए मै आज ऐसी बन चुकी हूँ...।” इतना कहके वो चली गई । उसकी ये आखिरी बात मुझे कुछ समझ न आयी । एक अबूझ पहेली बन गई मेरे लिए, जिसका अर्थ समझना एक शिक्षक के तो नही पर एक लेखक के ह्रदय को शांत करने के लिए आवश्यक था । जाने क्यों उसकी  ये बात मुझे बारबार अपनी तरफ खींच रही थी । कुछ देर सोचने के बाद आखिर मैंने उसे फोन किया और शाम के समय एक रेस्टोरेंट में मिलने को बुलाया । शाम में हम मिले ।
“अभी क्यों बुलाया, सर ?” उसने तपाक से पूछा ।
“सुबह तुम्हारी एक बात अधूरी रह गई थी, उसे ही पूरा करने के लिए । वो क्या कह रही थी तुम, कि तुम्हे भी तरस आती है..तभी तुम ऐसी बन चुकी हो..वगैर वगैर । मुझे कुछ समझ नही आया...मतलब क्या था तुम्हारा ?”
“अब छोड़िये भी सर..क्या सुबह की बात को लेकर परेशान हो रहे हैं । आप अपना काम देखिए, मुझे भी दूसरा कोचिंग सेंटर देखना है, चलती हूँ ।” ये कहके वो उठी, तभी मै बोल पड़ा, “देखो सीमा, तुम्हारे टेस्ट में बहुत कम समय बाकी है । इतनी जल्दी कोई कोचिंग सेंटर मिलना मुश्किल है, सब जगह आगे की पढाई हो रही होगी । मुझे बताओ कि आखिर क्या कहना चाहती थी तुम सुबह ? ये भी बताओ कि आखिर क्यों तुम ऐसी हो ? सब जानने के बाद हो सकता है तुम्हे निकालने का अपना निर्णय बदल दूं...बताओ सीमा ?”
मेरी ये बात सुनकर खिल-खिलाकर हँसी थी वो । बोली, “क्या सर, अब आप ही रिश्वत देंगे तो स्टुडेंट्स क्या सीखेंगे । कोचिंग सेंटर से नही निकालने का लालच देकर अपना काम निकालना चाहते हैं । रहने दीजिए, इसकी कोई जरूरत नही । आप यूँ ही सुनिए, हर घर में औरत है और वो अपने हिस्से के पुरुष को चुपचाप सुन रही है, सह रही है – मेरे घर में भी मेरी माँ है । बचपन से उसे देखती आयी हूँ कभी पापा तो कभी भईया को सहते हुए और रोते हुए...उसीपर तरस आता है मुझे...मै अपनी माँ जैसी नही होना चाहती, इसीलिए ऐसी हूँ ।” इतना कहके वो उठी और बिना रुके तुरंत चल दी । मै स्तब्ध-सा दो पल तक बैठा शून्य को निहारता रहा । मुझे मेरा उत्तर मिल चुका था, इसलिए उसे रोका नही । सभी बातें परत दर परत खुल गई थीं और अब उस उद्दण्ड लड़की के लिए मेरी सोच भी काफी हद तक बदल चुकी थी । अबतक जो सहानुभूति उसके पिता के लिए थी, अब वो सीमा की हो गई थी । मैंने तय कर लिया कि सीमा मेरे ही कोचिंग सेंटर में पढ़ेगी । मैंने उसे इस विषय में सूचित कर दिया और वो ससहज अगले दिन से कोचिंग सेंटर आने लगी.....। आज इस वाकये को हुए कई महीने बीत चुके हैं और अबतक सीमा मुझसे काफी हद तक घुलमिल गई है । उसकी तरफ से तो ये घुलना-मिलना सामान्य ही है, पर शायद मेरे लिए नहीं । मै कुछ अलग ही अनुभव करने लगा हूं उसके लिए । कुछ बहुत विशेष । मै जल्दी ही, सही अवसर देखकर, उसके लिए मेरे मन में उठने वाले अनुभव उसे बता दूँगा...जल्दी ही!
  बहरहाल, अभी स्थिति ये थी कि अचानक आए उसके इस फोन ने कि शाम में मै उसके घर आऊं, मुझे परेशान कर दिया था । मुझे समझ नही आ रहा था कि उस खुराफाती लड़की के दिमाग में क्या है और किसलिए मुझे बुला रही है ? खैर! अब इन सब बातों का उत्तर तो उसके घर जाकर ही मिलता, अतः  मैंने तय किया कि आज शाम उसके घर जरूर जाऊंगा ।


                                         
  शाम का समय । मै सीमा के घर पहुंचा । पहुँचने के बाद मुझे झटका तब लगा जब मैंने वहाँ सीमा के परिवार वालों के साथ अपने कोचिंग सेंटर में पढ़ने वाले अतुल को देखा । फिर मैंने सोचा कि सीमा ने कुछ काम से बुलाया होगा । खैर! सामान्य शिष्टाचार के बाद हम चाय-नास्ते पर बैठे । थोड़ी-बहुत इधर-उधर की बातें हुईं । पर इन सबसे इतर मेरे ह्रदय में तो यही बात थी कि ये खुराफाती लड़की क्या करना चाहती है ? आख़िरकार मैं पूछ बैठा, “और मेरी ‘आफत की गुड़िया...कौन सी गवाही के लिए बुलाई हो मुझे ?” शायद सब इसीका इंतज़ार कर रहे थे कि मै बात शुरू करूँ । अगले ही पल माहौल में गंभीरता आ गई और उसके पिता बोले, “चलिए न, बाहर टहलते हुए बात करते हैं ?” मै कुछ समझ नही पाया, पर स्वीकृति दे दिया । हम दोनों बाहर आ गए । वो बोले, “उस लड़के को देखा आपने..पहचानते तो होंगे ही..?”
“वो अतुल....क्यों क्या बात है ?”
“सीमा उससे शादी करना चाहती है । मुझे तो वो सही नही लग रहा, पर आप के यहाँ पढ़ता है । सों, सोचा कि आपसे कुछ पता करूँ । कैसा लड़का है ?”
“पर शादी की ऐसी क्या जल्दी है..” एक धक्का सा लगा मुझे, “अभी उमर ही कितनी है..२०-२१ के आसपास की होगी । अभी तो पढ़ाई का समय...”
“आप जानते हैं कि मै उसे रोक नही सकता । पता नही क्या कर लेगी ।” वो मेरी बात काटके बोल पड़े,  “इसीलिए सोचता हूँ कि अगर लड़का सही होगा तो शादी कर देंगे ?”
“नही..लड़का भी सही नही है ।” पूरे विश्वास से बोला मै, “नशा करना, लड़की छेड़ना..यही सब इसके  शौक है । कई दफे तो मैंने खुद इसे सिगरेट के साथ पकड़ा है, पर इसके माता-पिता की  वजह से इसे निकाला नही । जरूर ये सीमा को भी फंसा रहा है ।”
“......” उसके पिता कुछ नही बोले । एक ख़ामोशी छाई रही, पर उस ख़ामोशी में उनकी विवशता झलकती थी । आखिर वो घर की तरफ मुड़ गए । पीछे-पीछे मै भी चल दिया । अंदर पहुंचते ही वो सीमा से मुखातिब हुए, “तो तुम्हे यही मिला...पता है, सर क्या कह रहे थे.........।” इसके बाद उन्होंने अतुल के विषय में मेरे द्वारा बताई गईं तमाम बातें वहाँ कह दी ।
“सर ने सही कहा, मगर अब ये बदल चुका है । गलतियाँ किससे नहीं होती, पर...” सीमा कह ही रही थी कि अतुल बीच में ही बोल पड़ा, “अंकल! मुझसे गलतियाँ हुईं, पर अब मै वैसा नहीं हूँ..” 
“चुप! एकदम चुप!” सीमा के पिता ने अतुल को सिर्फ इतना ही कहा फिर सीमा से मुखातिब हुए, “अबतक तुमने सबकुछ अपने मन का किया है...पर यहाँ नही..मै इस आवारा लड़के से तुम्हे शादी नही करने दे सकता । बात खतम ।” फिर अतुल की तरफ देख के बोले, “तू अभी तक यहीं है ?” उनका ये कहना था कि अतुल वहाँ से निकल लिया ।
“अपने मन का अबतक किया है, अब भी करूंगी...” ये कहके पूरे गुस्से के साथ कुछ बुदबुदाते हुए सीमा भी कमरे में चली गई । आखिर मै भी चला आया । मुझे उम्मीद थी कि अतुल की शिकायत के कारण वो मुझसे नाराज होगी । चूंकि, कुछ व्यक्तिगत कारणों से मैंने अतुल की शिकायत जरा बढ़ा-चढ़ाकर ही कर दी थी । पर आश्चर्य तब हुआ जब अगले दिन वो एकदम पहले की तरह मुझसे मिली । रात के वाकये के विषय में कोई अधिक बात नही । मुझे अजीब तो लगा, पर अच्छा भी । मुझे लगा कि वो सम्हल रही है । मैंने तय किया कि अभी तो नहीं, पर जल्दी ही उचित अवसर देख उसे अपने मन की बात से अवगत करा दूँगा ।
कहानी
कुछ दिन बीते...। अचानक
! एकदिन वो पढ़ने नही आई । मैंने सोचा कि किसी वजह से नही आई होगी । पर उसी दिन शाम में उसके पिता का फोन आया, “सर, सीमा आपके घर गई है क्या ?”
“मेरे घर...आज तो वो कोचिंग में ही नही आई...बात क्या है ?” मै आश्चर्य में था ।
“आज सुबह कॉलेज गई तबसे लौटी ही नही । मुझे लगा कहीं आपके यहाँ गई हो..अच्छा चलिए मै देखता हूँ ।” ये कहके उन्होंने फोन रख दिया । पर अब मेरा मन बेचैन था । तमाम अज्ञात आशंकाएं मन में उपज रही थी । इसी उधेड़बुन में अचानक मेरे दिमाग में एक बात आई और मैंने अपने एक छात्र के पास फोन किया । ये लड़का अतुल के साथ ही पढ़ने आता था । उससे पूछा, “क्या आज अतुल आया था ?”
“नही, सर! वो तो कई दिन से नही आ रहा ।” इसके बाद मैंने अतुल के घर फोन किया । पता चला कि वो भी अबतक कॉलेज से घर नही लौटा है । मेरा मन एक अज्ञात आशंका के वशीभूत होने लगा । मैंने ये बात सीमा के घरवालों को बता दी । पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज करा दी गई । दो-चार दिन बीते, पर अतुल और सीमा किसीका कुछ पता नही चला । एक सुबह जब कोचिंग सेंटर पहुंचा तो देखा कि वहाँ सीमा मेरी प्रतीक्षा कर रही थी । मेरे कुछ कहने से पहले ही वो बोल पड़ी, “मैंने कहा था न कि अपने मन की करूंगी । कोर्ट में अतुल से शादी कर ली, सर!  पहले लिव इन रिलेशन की सोचे..मगर उसमे खतरा लगा कि कहीं अलग न कर दिए जाएं..पर अब नहीं! अब इस शादी को कोई खारिज नहीं कर  सकता ।” कुछ पल तक अवाक् सा देखता रह गया मै उसे । अंदर ही अंदर एक टीस सी महसूस हो रही थी । लग रहा था कि जैसे कोई बड़ी चीज खो गई हो; अपना कुछ बहुत विशेष गँवा बैठा हूँ । दिल तो कर रहा था कि जोर से चिल्लाऊं और अपनी उस आफत की गुड़िया से पूछूं कि उसने ये क्यों किया ? मुझे एकबार बताई तो होती फिर मै उसे वो बताता जो उसके लिए मेरे ह्रदय में था और जिसे बताने की उत्कट इच्छा को मै सही अवसर की प्रतीक्षा में रोके हुए था । पर अब इन बातों का कोई विशेष अर्थ नहीं था । रेत हाथ से फिसल गई थी । अतः तत्कालीन स्थिति को समझते हुए मैंने खुद को संभाला और बोला, “तुमने अतुल से शादी की ? क्या तुम नही जानती कि वो कैसा है ?”
“वो जैसा भी हो, मुझे अच्छा लगता है! क्या इतना काफी नहीं है ? हरकोई अपनी जिन्दगी जीता है, मै भी इसे अपनी शर्तों पर जीना चाहती हूँ । बाकी इन फैसलों का क्या नतीजा होगा, इसका मुझे कोई अंदाज़ा नही है । मै बस अपनी जिंदगी, अपनी मर्जी से जी रही हूँ ।”
“चलो जो हुआ सों ठीक...ये बताओ, घर गई थी ?”
“हाँ, अतुल और मै दोनों गए थे । मेरे भी और अतुल के भी, दोनों जगहों से निकाल दिया गया । कहने को तो सब शहरी, पढ़े-लिखे ही बनते हैं, पर असलियत में कोई जाति का रोना रो रहा है तो कोई मान-मर्यादा का...हमारी इच्छाओं की कोई कीमत नही है ? धत्त!... पर कोई नही, सर । कुछ न कुछ जुगाड़ कर ही लेंगे । फ़िलहाल यही कहने आई थी कि अभी आपकी कोचिंग में नही आ पाऊंगी । फीस देना मुश्किल है । देखते हैं क्या होता है ।”
“फीस की कोई बात नही..जब हो तब देना..तुम यहाँ आ सकती हो ।” मै आतुर सा होकर बोला ।
“थैंक्स, सर! पर ये रहने दीजिए, क्योंकि ठीक नही कि मै यहाँ रहूंगी या कहीं और ? सों, आ पाना भी मुश्किल होगा । हाँ, अगर कभी दिख जाएं तो आप मेरे घरवालों को बता दीजिएगा कि वो .मुझे कितना भी गलत माने, मुझे कोई पछतावा नही है । मैं अपने तरह से अपनी जिन्दगी जीने की कोशिश कर रही हूं । ये सही है या गलत, आगे क्या होगा, कुछ पता नहीं; पर मेरा यही तरीका है । हरकोई अपने तरह से जीता है, सफल भी होता और असफल भी! जिन लड़कियों की शादी घरवाले करते हैं, क्या उनकी जिंदगी ख़राब नहीं होती ? फिर जब एक डिसीजन मैंने लिया है तो इतना हंगामा क्यों ? अच्छा! अभी चलती हूं सर!”
“पर कहाँ जाओगे तुम लोग ? पैसे हैं ? ये कुछ पैसे ले लो, मदद मिलेगी ।” मैंने उसे रोकते हुए उसकी  तरफ कुछ पैसे बढ़ाए ।
“वेरी वेरी थैंक्स, सर! पर ये नही ले सकती । अब जब लड़ाई ठानी है तो जैसे भी हो मुकाबला भी कर लेंगे । अच्छा अब चलती हूँ । अगेन एंड अगेन थैंक्स सर!” इतना कहके वो बिना रुके चली गई और मै मूर्तिवत खड़ा  अपलक नेत्रों से उसे जाते हुए देखता रहा । कुछ ही क्षण में वो मेरी आँखों से ओझल हो गई और इसीके साथ मेरे जीवन का एक अतिसंक्षिप्त और अतिगुप्त अध्याय विस्तार पाने से पूर्व ही समाप्त हो गया ।

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

शालिनी माथुर के लेख पर प्रतिक्रिया : कुछ बताता, कुछ छुपाता लेख [अप्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

तहलका जनवरी, २०१४ अंक में “मर्दों के खेला में औरत का नाच” शीर्षक से छपे शालिनी माथुर के एक लेख पर बतौर पाठक प्रतिक्रियास्वरूप ये लेख लिखा हूँ ! शालिनी माथुर के लेख में  उल्लेख किए गए कथा-अंशों का सम्यक प्रकार से अध्ययन करने के बाद जो निष्कर्ष निकले हैं, ये लेख उन्ही निष्कर्षों पर आधारित है !
   
तहलका के जनवरी अंक में शालिनी माथुर ने ‘मर्दों के खेला में औरत का नाच’ शीर्षक से एक अत्यंत गंभीर लेख लिखा है जो कि समकालीन स्त्री-लेखन पर कई सवाल खड़े कर रहा है ! फेसबुक के मुखपृष्ठ पर भटकते हुए किसीके द्वारा साझा की गई इस लेख की लिंक दिखी ! क्लिक करके जब पढ़ना शुरू किया तो ऐसा डूबा कि एकबार का लगा खत्म करके ही उठा ! लेख तो खत्म हो गया, पर प्रथम द्रष्टया मन में अनेक सवाल छोड़ गया कि क्या वर्तमान स्त्री-लेखन का यही स्वरूप रह गया है ? क्या प्रेमचंद, महादेवी वर्मा जैसे महान स्त्री-साहित्यकारों की परम्परा को हम यही दिशा दे रहे हैं ? और सबस बड़ा सवाल कि इस तरह के लेखन का उद्देश्य क्या है, इसके द्वारा किस तरह की स्त्री-मुक्ति की अपेक्षा की जा रही है या की जा सकती है ? इन सभी सवालों को लेकर मन-मष्तिष्क में आंदोलन जारी था ! आखिर मन के इस आंदोलन को नियंत्रित करने व इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश में मैंने सबसे पहले उन सभी कहानियों/उपन्यासों का अध्ययन करने की सोची जिनके कथा-अंशों का इस लेख में उदाहरणार्थ उल्लेख किया गया है ! अपनी इस कोशिश के दौरान मुझे काफी हद तक सफलता मिली ! हालांकि ये भी सच है कि अनुपलब्धता के कारण मै सभी उद्धृत रचनाएँ नही पढ़ पाया, पर जितना भी पढ़ा उसने काफी चीजें साफ़ कर दी ! उन रचनाओं के अध्ययन के बाद जो तथ्य सामने आएं उन्हीके आधार पर हम शालिनी माथुर के लेख को समझने का प्रयास करेंगे !
    बात की शुरुआत हम वामपंथी लेखिका रमणिका गुप्ता के स्त्री-लेखन से करेंगे ! शालिनी माथुर ने इनके निजी जीवन से जुड़ी कुछ बातों को भी अपनी बात की प्रमाणिकता के लिए आधार बनाया है जिसको कि कत्तई उचित नही कहा जा सकता ! लिहाजा हम यहाँ व्यक्तिगत नही, सिर्फ लेखन की बात करेंगे ! रमणिका गुप्ता के लेखन पर पोर्नोग्राफी का आरोप लगाते हुए उनकी कहानी ‘ओह ये नीली आँखें’ का उल्लेख करते हुए शालिनी माथुर लिखती हैं कि इस कहानी में “एक स्त्री अपने पति व बच्चे के साथ ट्रेन में यात्रा कर रही है, साथ वाली बर्थ पर एक नीली आंखों वाला यात्री लेटा है और ऊपर की बर्थ पर पति और बच्चा. स्त्री सहयात्री के साथ ट्रेन में सहवास करती है क्योंकि उसे  नीली आंखें पसंद हैं और उसे भी सौंदर्यपान करने का पूरा हक है.” इस वर्णन में ‘सहवास करती है’ पद के प्रयोग से तो यही समझ आता है कि कहानी में पोर्न का भरपूर चित्रण होगा जबकि वास्तव में ऐसा कुछ नही है ! इस कहानी में ट्रेन में यात्रा कर रही स्त्री, अपने सहयात्री की नीली आँखों के प्रति आकर्षित अवश्य है, पर उसके मन में इस बात के लिए अंतरद्वंद है कि वो उसके साथ सहवास करे या नही ! सहवास के लिए मानसिक स्वीकृति के  निष्कर्ष के साथ ये अंतर्द्वंद्व समाप्त होता है और कहानी भी ! अब इन सब में शालिनी माथुर को कहाँ पोर्नोग्राफी या घटियापन नज़र आया, ये समझ से परे है ! हालांकि इस कहानी की ये बात थोड़ी असंगत अवश्य लगती है कि सन ५७ के समय की किसी औरत में एक अपरिचित सहयात्री के साथ सहवास जैसे अत्याधुनिक विचार कैसे पनप सकते हैं ? और वो भी क्या ट्रेन में ?

   रमणिका गुप्ता के बाद अब हम आते हैं जयश्री रॉय के स्त्री-लेखन पर ! जयश्री रॉय का उपन्यास ‘औरत जो एक नदी है’ के विषय में शालिनी माथुर का मत है कि यह “पूरा उपन्यास शयनकक्ष, शराब, फेनी, बियर, बकार्डी, बिस्तर और उस पर केंद्रित लंबे उबाऊ संवादों से भरा है.” ये उपन्यास पढ़ने पर इस मत से असहमत होने का कोई कारण भी नही दिखता ! इस उपन्यास का मुख्य पात्र एक पुरुष है जो कि पत्नी के साथ एकदूजे की गैरजानकारी में दो-दो प्रेमिकाओं को भी रखे है और सबके साथ हमबिस्तरी करता है या कि हमबिस्तरी ही उसके संबंधों का मूल है ! अब ऐसे भावहीन, कामातुर पुरुष को मूख्य भूमिका में रखकर ये उपन्यास लिखने के पीछे जयश्री रॉय का क्या स्त्री-सरोकार था, ये समझ से बाहर है ! आखिर में, इस उपन्यास के विषय में शालिनी माथुर का ये कहना बिलकुल सही है कि इसमे “स्त्रियां अन्नपूर्णा नहीं, थाली में रखे हुए व्यंजन हैं, स्वयं को परोसती.”
   शालिनी माथुर ने अपने लेख में जयश्री रॉय की कुछेक कहानियों का भी जिक्र किया है ! अब हम उनपर आते हैं ! जयश्री राय की एक कहानी ‘देह के पार’ पर शालिनी माथुर ने लिखा है कि इस कहानी में “प्रौढ़ स्त्री नव्या अपनी बेटी को स्कूल छोड़ कर आने के बाद अपने से 10 वर्ष छोटे बेरोजगार युवक को खरीद लाती है.” बिना कहानी पढ़े ये वाक्य देखने पर तो यही लगता है कि जैसे नव्या एक चरित्रहीन, कामातुर और किसी संपन्न परिवार की बिगड़ैल औरत है ! पर जब हम इस कहानी को पढ़ते हैं तो कुछ और ही तस्वीर सामने आती है ! दरअसल, नव्या एक संपन्न परिवार से है, पर एकदिन जब उसे अपने पति का किसी और के साथ संबंध होने की बात पता चलती है तो वो टूट जाती है ! इसी टूटन में वो अपने एक मित्र अभिनव का सहारा लेती है जो कि फ़िलहाल बेरोजगार है, और उनदोनों में काफी नजदीकियां बढ़ जाती हैं ! निश्चित ही, अभिनव अय्याश सेठों की कामातुर सेठानियों को अपना शरीर बेचता है और यहाँ नव्या के पर्स से पैसे भी निकाल लेता है और वो उसे रोक भी नही पाती है, पर इसका ये अर्थ लगाना कि नव्या उसे अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए खरीदती है, कत्तई सही नही होगा ! यहाँ नव्या की मनोस्थिति को लेकर थोड़ा उदारवादी होकर सोचने की जरूरत तो है कि जिस औरत का पति किसी और के साथ हो, वो शायद इस तरह की गतिविधियों का शिकार हो सकती है, लेकिन सवाल ये भी है कि ऐसी स्थिति में नव्या अपने पति से अलग होकर नए सिरे से जीवन शुरू करने की बजाय अभिनव जैसे नशेड़ी और अस्थिर व्यक्ति में क्यों उलझी है ? इन बातों के अलावा भी इस कहानी में कुछ ऐसी बातें हैं जो कि बिलकुल गैरजरूरी, असंगत और अव्यवहारिक लगती हैं ! जैसे, “देहगंध नव्या के नाशपुटों को छू रही थी- शराब, कोलोन और सिगरेट की मिली-जुली गंध” इस देहगंध और शराब-सिगरेट की गंध का कहानी में अनगिनत बार जिक्र हुआ है जिसका न तो कोई अर्थ है और न ही औचित्य ! साथ ही, नव्या और अभिनव जिस भाषा में बातें करते हैं वो भी पूरी तरह से देश-काल और पात्रों के विपरीत है ! लगभग यही बात सूचित करते हुए शालिनी माथुर भी लिखती हैं कि क्या नव्या और अभिनव जैसे आज के पात्र “परस्पर जयशंकर प्रसाद की कामायनी या स्कन्दगुप्त वाली भाषा में बात करते होंगे ?” आखिर में इस कहानी के विषय में यही कहेंगे कि इसमे पॉर्न जैसी कोई बात तो नही है, पर इस कहानी के लिखे जाने का कोई  जायज मतलब भी समझ नही आता है ! ऐसी कहानियों से न तो स्त्री-उत्थान को ही कोई बल मिलने वाला है और न ही हमारे साहित्य को ऐसी निरुद्देश्य कहानियों की कोई आवश्यकता ही है !
  जयश्री रॉय की ही एक अन्य कहानी ‘छुट्टी का दिन’ की बात करें तो इस कहानी में भी उनके उपन्यास ‘औरत जो एक नदी है’ के तरह ही स्त्री को एक ‘देह’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है ! कहने को तो इस कहानी में लेखिका ने एक व्यक्ति के छुट्टी वाले दिन की दिनचर्या का वर्णन करने की कोशिश की है, पर इस कहानी में छुट्टी की जिस दिनचर्या का वर्णन है, उसे देखते हुए सवाल ये उठता है कि क्या छः दिन काम करने वाला एक पुरुष अपनी एकलौती छुट्टी ऐसे ही बिताता है- छिपकर पड़ोसी की बीवी को नहाते हुए देखकर और अपनी नौकरानी के नितंब निहारकर ? इस तरह से छुट्टी बिताने वाले पुरुष कहाँ होते हैं, ये भी समझ से बाहर है ! अगर हम ये मानें कि इन वर्णनों के जरिए लेखिका समाज में औरत के प्रति व्याप्त पुरुष-मानसिकता को दिखाना चाहती हैं तो भी सवाल ये है कि पुरुष-मानसिकता को दिखाने के लिए औरत को ही अनावरण कर देना कहाँ तक उचित है ? जुगुप्सा और कौतूहल जगाने के मामले में इन्ही लेखिका की एक और कहानी ‘समन्दर, बारिश और एक रात’ तो सब सीमाएं तोड़ देती है – पूरी कहानी सिर्फ और सिर्फ शराब, ड्रग्स, हवस जैसी चीजों से भरी पड़ी है और अंत करते-करते लेखिका द्वारा सामूहिक बलात्कार का भी विशद वर्णन कर दिया गया है ! समझना आसान है कि इन कहानियों में ऐसी चीजों के जरिए लेखिका का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि पाठकों में अधिकाधिक जुगुप्सा जगाई जाए और अनावश्यक कौतूहल पैदा करके कहानी को चर्चित किया जा सके जिसमे कि उन्हें अपेक्षित सफलता भी मिली है !
  अब हम नज़र डालते हैं गीताश्री की कहानियों पर ! शालिनी माथुर के लेख में गीताश्री की तीन कहानियों का जिक्र हुआ है – गोरिल्ला प्यार, ताप और इन्द्रधनुष के उस पार – हम एक-एक करके इन कहानियों और इनपर शालिनी माथुर की राय को समझने का प्रयास करेंगे ! ‘गोरिल्ला प्यार’ कहानी से शुरू करें तो ये एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अपने साथी के साथ बिना विवाह, यहाँ तक की सहजीवन संबंध से भी मुक्त होकर रह रही है ! एक रात उसका वो साथी उससे बेकार में नाराज़ होकर उसे अतृप्त छोड़कर चला जाता है तो वो फेसबुक के माध्यम से एक लड़के को बुलाती है और उसके साथ रात गुजारती है ! पर इस पूरे प्रकरण के दौरान न तो ऐसा कोई विशेष संवाद है और न ही ऐसा कोई दृश्य-चित्रण जिस आधार पर इस कहानी को पॉर्न कहा जा सके ! इस पूरी कहानी में काम-क्रीड़ा को दर्शाने के लिए सिर्फ एक वाक्य लिखा गया है, ‘देह देर तक एक दूसरे को मथती रही’ – शालिनी माथुर ने अपने लेख में बस इसी एक वाक्य को डालकर इसके आगे ‘आदि इत्यादि’ ऐसे लगाया है जैसे कि कहानी में इस तरह का लंबा-चौड़ा वर्णन हो ! गीताश्री की एक कहानी ‘ताप’ के विषय में शालिनी माथुर लिखती हैं कि इसमे ‘एक युवा पुत्री की मां अपने बूढ़े पति की शारीरिक भूख से त्रस्त है. वह अपनी व्यथा पुत्री को बताती है. एक आधुनिक युवा पुत्री पिता को समझाने, किसी सलाहकार के पास भेजने या उनके आगे कोई अन्य विकल्प रखने के बजाय खुद उनके लिये एक युवा वेश्या खरीद लाती है.’ ये कहानी पढ़ने के बाद हमें शालिनी माथुर की इस बात से असहमत होने का कोई विशेष कारण भी नही प्रतीत होता ! खैर ! शालिनी माथुर की बात से अलग इस कहानी की सबसे बड़ी खामी इसकी संवाद-शैली है ! पहली बात की कोई माँ किसी बेटी के सामने अपनी ऐसी व्यथा नही बताएगी और अगर बताएगी तो भी क्या इस लहजे में ? – ‘मैं तुम्हारे पापा को शारीरिक सुख नहीं दे सकती। मेरी देह में ना वो आग बची है ना मन में वो चाह..तुम्हारे पापा को आग चाहिए.’ अब सभ्य परिवारों की माँ-बेटी के बीच इस लहजे में बातचीत भारत के किस कोने में होती है, ये शायद लेखिका ही बता सकें ? ये कहानी वहाँ तक सही दिशा में है जब लड़की अपने पर बचपन में हुए यौन हमले को याद करती है ! अगर लेखिका चाहतीं तो यहाँ से कहानी को एक सही दिशा में ले जा सकती थीं ! पर जाने किस मोह के कारण वो कहानी को ऐसा बनाईं कि इसके लेखन का उद्देश्य ही निरर्थक हो गया है ! जैसे इस कहानी में माँ-बेटी के बीच ‘देह की आग’ जैसे संवाद चौकाते हैं, ठीक वैसे ही गीताश्री की ही एक अन्य कहानी ‘इन्द्रधनुष के उस पार’ की न्यूड पार्टी भी चौकाती है ! अब ‘न्यूड पार्टी’ जैसी चीज हमारे समाज में भी कहीं होती है क्या ? अब चूंकि, लेखिका एक पत्रकार भी हैं इसलिए यह भी हो सकता है कि ये न्यूड पार्टी उनकी खोजी पत्रकारिता की खोज हो और इसके बारे में सार्वजनिक स्तर पर कभी कुछ सामने न आया हो ! पर ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर ये न्यूड पार्टी लेखिका की खोजी पत्रकारिता का एक हिस्सा है तो इसे अभिव्यक्त करने के लिए संस्मरण, रिपोर्ताज जैसी और भी कई विधाएँ साहित्य में मौजूद हैं ! कहानी के जरिए ऐसी अभिव्यक्ति तो असंगत और निराधार ही लगेगी, अब भले से वो सही हो ! हालांकि अगर इस कहानी से ‘न्यूड पार्टी’ को हटा दें तो इसे एक अच्छी कहानी की श्रेणी में रखा जा सकता है !    
     इसी क्रम में हम मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास चाक पर भी एक संक्षिप्त दृष्टि डालेंगे ! इस उपन्यास के विषय में अधिक कुछ नहीं कहते हुए सिर्फ इतना बता दें कि इसमे जयश्री रॉय के उपन्यास “औरत एक नदी है” से एक कदम आगे बढ़ते हुए बड़े ही प्रत्यक्ष ढंग से स्त्री-शरीर को भोग के रूप में और पुरुष को भोग लगाने वाले के रूप में प्रस्तुत किया गया है ! यथा, इस उपन्यास के विषय में शालिनी माथुर उल्लेख करती हैं कि इसकी नायिका सारंग, जो रंजीत की  पत्नी है, श्रीधर से कहती है, “श्रीधर, अगर तुम्हारी आंखें इस देह को देख कर आनंद पाती हैं तो जी भर कर देखो मुझे. मेरी सुंदरता सार्थक हुई. भोग करने से तुम्हारे प्राण तृप्त हों तो आओ रात बाकी है अभी.” यही नायिका एक अन्य स्थान पर फिर कहती है, “मेरे पास था ही क्या – हरी-भरी देह.” लगभग ये पूरा उपन्यास कुछ ऐसे ही उत्तेजक और वाहियात संवादों से भरा पड़ा है जिनमे कि स्त्री को भावना और सोच-विचार से हीन सिर्फ और सिर्फ एक देहरुपी भोग के रूप में प्रस्तुत किया गया है और पुरुष को भोग लगाने वाला ! अब ये बात तो लेखिका ही बताएंगी कि इस उपन्यास के जरिए उनका उद्देश्य स्त्री-सशक्तिकरण है या सस्ती लोकप्रियता पाना जो कि उन्हें मिली भी ?
   इन सभी वरिष्ठ लेखिकाओं के बीच एक नाम युवा ज्योति कुमारी का भी है जो कि अभी हाल ही में पंचतत्वविलीन राजेन्द्र यादव के साथ एक विवाद के कारण काफी चर्चा में रही हैं ! इन्ही ज्योति कुमारी की एक चर्चित कहानी ‘शरीफ लड़की’ जिसके लिए प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने ‘इसे अनदेखा करना मुमकिन नही’ जैसे शीर्षक से लेख लिखा, का उल्लेख करते हुए शालिनी माथुर ने अपने लेख में लिखा है कि इस “कहानी में पाठकों को चौंकाने के लिए लड़की के 14 वर्ष की हो जाने का विस्तृत विवरण है. जुगुप्सा जगाने में कोई कसर न रह जाए इसलिए उसके तत्काल बाद लड़की के प्रेम प्रसंग का वर्णन है- लड़की वीर्य से लिथड़ी है…ऊपर से नीचे तक…आगे से पीछे तक…अंदर से बाहर तक उसका रोम रोम लिथड़ा है.” पर जब हम इस कहानी को पढ़ते हैं तो तस्वीर शालिनी माथुर के बताए से थोड़ी भिन्न अवश्य लगती है ! सीधे शब्दों में ‘शरीफ लड़की’ एक लड़की के बचपन से लेकर युवा होने तक के बदलावों के वर्णन की कहानी है जिसके तहत कहानी के अंत में लेखिका द्वारा समाज की इस रूढ़िवादी मानसिकता कि गैरवैवाहिक शारीरिक संबंध से व्यक्ति का चरित्र दूषित होता है, को चुनौती देने का प्रयास किया गया है ! इस कहानी की मुख्य पात्र लड़की के रूप में लेखिका का मत है कि शारीरिक संबंधों से व्यक्ति के चरित्र पर कोई प्रभाव नही पड़ता – वो पूर्ववत ही रहता है ! कहने में ये बातें बहुत सीधी हैं, पर ज्योति कुमारी इसके लिए बधाई की पात्र हैं कि उन्होंने इस सीधी-सी बात को बड़े ही अलग अंदाज में प्रस्तुत किया ! इस कहानी के कथ्य और शिल्प में निश्चित ही काफी नयापन  है ! हालांकि इन चीजों के अलावा इस कहानी में एकाध चीजें ऐसी भी हैं जो काफी बेतुकी प्रतीत होती हैं ! जैसे कि एक  ऐसी लड़की, जो पिता के भय से एक लड़के से फोन पर बतियाने में भी डरती है, में ये बदलाव कैसे आ जाता है कि परिवार की गैरमौजूदगी में वो उसी लड़के के साथ हमबिस्तरी करती है ? अगर हम ये मानें कि इन बातों के जरिए लेखिका नए सामाजिक मूल्य गढ़ने का प्रयास कर रही है तो सवाल ये उठता है कि परिवार की गैरमौजूदगी में (यानि अपराध-बोध से ग्रस्त होकर) शारीरिक संबंध बनाने से कौन से नए मूल्यों का स्थापन होगा ? इसके अलावा ‘वीर्य से लिथड़ी’ जैसे संवाद भी अनावश्यक ही लगते हैं ! पर इसका ये कत्तई अर्थ नही कि ये एक पॉर्न-साहित्य है ! ये बात दावे से कही जा सकती है कि ‘शरीफ लड़की’ कथ्य से लेकर शिल्प तक हर स्तर पर एक जानदार कहानी है !
   उपर्युक्त सभी बातों को देखते हुए स्पष्ट है कि शालिनी माथुर ने अपने लेख अगर काफी बातें सही लिखी हैं तो कुछ बातें गलत भी ! शालिनी माथुर के लेख में  उद्धृत कुछ कहानियों में अगर वाकई में अश्लीलता है तो कुछ में नही भी है ! जैसा कि ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि शालिनी माथुर ने कई कहानियों में से कोई निश्चित वाक्यांश निकालकर बिना उनके संदर्भ का उल्लेख किए, उन्हें अपने तरह से प्रस्तुत किया है ! पर तमाम कहानियां ऐसी भी हैं जिनके विषय में शालिनी माथुर का कहना बिलकुल सही भी है ! कुल मिलाकर निष्कर्ष ये है कि शालिनी माथुर ने अपने लेख में अगर कुछ बताया है तो कुछ छिपाया भी है ! इसके अलावा शालिनी माथुर ने अपने इस आलोचनात्मक लेख में जिस तरह से लेखक/लेखिकाओं पर निजी हमले किए हैं, वो निंदनीय तो है ही, उसके लिए साहित्य में भी कोई स्थान नही है ! कहना गलत नही होगा कि इन निजी आरोपों के कारण शालिनी माथुर का ये लेख आलोचना की बजाय भर्त्सना बन गया है ! इन सबके बाद एक सवाल जो ऊपर वर्णित सभी अच्छी-बुरी कहानियों की लेखिकाओं से भी अवश्य पूछा जाना चाहिए कि क्या आज स्त्री की सबसे बड़ी समस्या उसकी ‘देह’ ही है जो उसकी देह को ही केन्द्र में रखकर आज का अधिकाधिक स्त्री-लेखन हो रहा है - क्या ‘देह’ से इतर स्त्री के जीवन में और कोई समस्या नही है...?