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रविवार, 3 मई 2015

कौशल विकास हो तो अगला वक़्त हमारा है [प्रजातंत्र लाइव में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
प्रजातंत्र लाइव
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने वक्तव्यों में जिस बात की सर्वाधिक चर्चा की जाती रही है, वो यह है कि भारत का सर्वाधिक युवा आबादी संपन्न देश होना उसकी सबसे बड़ी ताकत है। मोदी की इस बात को वैश्विक मान्यता तब मिली जब संयुक्त राष्ट्र ने अभी पिछले ही साल नवम्बर में ‘१.८ अरब लोगों की ताकत’ नाम से वैश्विक आबादी पर जारी अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। कुल आबादी के मामले में तो चीन भारत से आगे है, लेकिन जब बात सर्वाधिक युवा आबादी की आती है तो भारत चीन को पछाड़ते हुए नंबर एक पर पहुँच जाता है। एक अन्य आंकड़े के मुताबिक़ देश  की ६५ प्रतिशत आबादी ३५ साल से कम उम्र की है और इसमें भी ५० प्रतिशत आबादी की उम्र २५ साल से भी नीचे है। इस आंकड़े के आधार पर गणितीय विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि वर्ष २०२० में हर भारतीय की औसत उम्र २९ साल होगी और तब भी भारत दुनिया का सर्वाधिक युवा राष्ट्र होगा, जबकि तब चीनियों की औसत उम्र ३७ और जापानियों की ४८ साल होगी। अब २०२० में जब एक तरफ भारत-चीन-जापान में आबादी के ये समीकरण बन रहे होंगे, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लगभग ६ करोड़ कुशल कामगारों की कमी आएगी। कामगारों की इस कमी का सर्वाधिक प्रभाव अमेरिका, रूस, चीन और जापान में होगा, क्योंकि इन देशों की अधिकाधिक युवा आबादी तबतक बुढ़ापे की तारफ अग्रसर हो गई होगी और बाकी आबादी अपने शुरूआती दौर में होगी। अब ऐसे वक़्त में कुशल कामगारों के लिए इन देशों की निगाह सिर्फ और सिर्फ भारत की तरफ होगी। ऐसे में अगर भारत चाहे तो इन देशों को कुशल कामगार देकर इस स्थिति का बेहद निर्णायक लाभ पा सकता है। कहना गलत नहीं होगा कि २०२० में होने वाली इस संभावित स्थिति का अगर भारत सही ढंग से लाभ लिया तो संशय नहीं कि ३० के दशक में वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र बिंदु भारत ही होगा। लेकिन इन सब चीजों के लिए आवश्यक है कि तब देश के पास दुनिया के कामगारों की कमी को पूरा करने के लिए कुशल कामगार तैयार हों। अब यह तो स्पष्ट है कि २०२० में भी भारत के पास विश्व की सर्वाधिक युवा आबादी होगी, लेकिन उस सर्वाधिक युवा आबादी का समुचित लाभ देश को तभी मिलेगा जब वो आबादी कौशलयुक्त होगी। इसी सन्दर्भ में अगर मौजूदा समय में देश के युवाओं द्वारा कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अर्जित की जा रही दक्षता के एक आंकड़े पर निगाह डालें तो तस्वीर बहुत संतोषप्रद नहीं दिखती है। विज्ञान, इंजीनियरिंग व सूचना प्रोद्योगिकी आदि क्षेत्रों की बाते करें तो आज देश में प्रत्येक वर्ष इन सभी क्षेत्रों में स्नातक की  डीग्री हासिल करने वाले कुल युवाओं की संख्या २५ लाख है और  इन २५ लाख में से महज ६.५ लाख छात्र इन विषयों में परास्नातक की डिग्री हासिल करते हैं। अब ३५-४० करोड़ की युवा आबादी वाले इस देश में  प्रतिवर्ष विज्ञान, आईटी आदि क्षेत्रों में दक्षता हासिल  करने वालों की संख्या का महज  २५ लाख होना, कोई बहुत उत्साहजनक तो नहीं ही कहा जा सकता। तिस पर यह २५ लाख तो डिग्री हासिल करने वालों की संख्या है, अगर इनमे भी पूर्णतः योग्यता का आकलन किया जाय तो यह संख्या और भी कम हो जाएगी। यह एक कटु सत्य है कि आज देश में इंजीनियरिंग आदि की पढ़ाई करके निकलने वालों में से तमाम युवाओं को उनसे सम्बंधित क्षेत्र में रोजगार नहीं मिल पाता क्योंकि प्रतिस्पर्धा के इस समय में वो उस क्षेत्र की कसौटियों पर पूरी तरह से खरे नहीं उतर पाते। हाँ, यह भी सही है कि सम्बंधित क्षेत्र की कसौटियों पर पूरी तरह से खरा न उतर पाने के लिए वे युवा और उनके शिक्षण संस्थान बराबर के जिम्मेदार होते हैं।
बहरहाल, इसी क्रम में अगर देश की आबादी को कौशलयुक्त बनाने के लिए सरकारी प्रयासों पर गौर करें तो देश की लगभग साल भर पुरानी मोदी सरकार इस दिशा में काफी गंभीर दिख रही है। इस विषय में मोदी सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने इस क्षेत्र के लिए कौशल विकास व उद्यमशीलता नामक एक नया मंत्रालय ही गठित कर दिया है। इसके अतिरिक्त मोदी सरकार द्वारा देश में कौशल विकास को एक उचित दिशा व गति देने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण व दूरगामी कदम उठाया गया है, वो है – मेक इन इण्डिया। इस कदम के द्वारा सरकार ने एक तीर से दो निशाने लगाने की कोशिश की है, पहला कि देश को दुनिया के लिए ‘निर्माण का केंद्र’ (इन्फ्रास्ट्रक्चर हब) बनाया जाय और दूसरा कि दुनिया के अन्य देशों में मौजूद तमाम तकनिकी जानकारियां, निर्माण-कौशल उन देशों की कंपनियों के साथ ही देश में आए और देश के लोग उन चीजों को सीखें तथा उन कार्यों में कुशलता प्राप्त करें। हालांकि मेक इन इण्डिया एक दूरगामी प्रभाव का कार्यक्रम है, अतः इससे देश के युवाओं को कितना और कैसा लाभ मिलता है, इसका पता तो कुछ वर्षों बाद ही चलेगा। वैसे मेक इन इण्डिया के अलावा  सरकार कौशल विकास के लिए २००९ की राष्ट्रीय कौशल विकास नीति में कुछ परिवर्तन करके उसे नए सिरे से शुरू करने का भी मन बना चुकी है। संभव है कि अगले कुछेक महीनों में नई कौशल विकास नीति आ भी जाय। गौर करें तो संप्रग शासन के समय आई २००९ की राष्ट्रीय कौशल विकास नीति के तहत अगले १३ वर्षों यानी २०२२ तक ५० करोड़ उच्चस्तरीय कुशल व्यक्तियों को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया था और इसके लिए १० हजार करोड़ का बजट भी निर्धारित हुआ था। इसके तहत राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद् (एनएसडीसी) को यह दायित्व दिया गया कि वो गुणवत्तापूर्ण संस्थाओं के सृजन के जरिये तकरीबन १५ करोड़ लोगों को कुशल कामगार बनाए। बाकी लोगों के कौशल विकास का काम सरकार के १८ मंत्रालयों के जरिये होना था। लेकिन दुर्भाग्य कि नीति बनाने के बाद संप्रग सरकार ने अपने दायित्व की इतिश्री समझ ली और इसके क्रियान्वयन की कभी कोई समीक्षा करने की उसने जरूरत नहीं समझी । अब जब मोदी सरकार इस नीति में कुछेक परिवर्तन कर नई कौशल विकास नीति लाने जा रही है तो भी सवाल यही है कि क्या नीति बदलने से देश के युवाओं का कौशल विकास हो जाएगा ? बात यह है कि नीति कोई भी हो वो कारगर तभी होगी जब उसके क्रियान्वयन के प्रति सजग व गंभीर रहा जाएगा । अतः उचित होगा कि सरकार नीति बदलने के साथ-साथ उसके क्रियान्वयन की निगरानी के लिए भी कोई ठोस व्यवस्था बनाए। अगर यह किया जाता है तो ही कौशल विकास की कोई भी नीति या व्यवस्था देश के कौशल विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह कौशल विकास बेहद आवश्यक है, क्योंकि अगले पांच सालों में भारत के पास विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने का संभावित सुनहरा अवसर आने वाला है और उस अवसर का भरपूर लाभ देश को तभी मिलेगा जब हमारे युवा कुशल कामगार होंगे।  

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

पाक-चीन दोस्ती से सतर्क रहे भारत [दैनिक जागरण राष्ट्रीय और प्रजातंत्र लाइव में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दैनिक जागरण 
एक कहावत है कि शत्रु का शत्रु सबसे अच्छा मित्र होता है। चीन यह बात बहुत अच्छे से जानता है। इसी नाते वह भारत से शत्रुता मानने वाले भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान को साधने की लगातार ही कोशिश करता रहा है, जिसमे कि उसे अपेक्षित कामयाबी भी मिली है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के वर्तमान पाकिस्तान दौरे को भी भारत के लिए कहीं न कहीं इसी उक्ति के आलोक में देखा जाना चाहिए। सबसे पहली चीज यह कि शी जिनपिंग का यह पाकिस्तान दौरा भारतीय प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के आगामी चीन दौरे से ठीक पहले हुआ है। इसमें भी कहीं न कहीं एक कूटनीतिक सन्देश छिपा हुआ है। शी जिनपिंग के इस दौरे पर चीन और पाकिस्तान के बीच कुल ५१ समझौते हुए हैं। चीनी राष्ट्रपति के इस दौरे के दौरान भारत की तमाम आपत्तियों के बावजूद गुलाम कश्मीर से होकर गुजरने वाले ४६ अरब डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर की चीन-पाक द्वारा शुरुआत कर दी गई है। खबर तो यहां तक है कि चीन ग्वादर बंदरगाह में काम भी शुरू भी कर चुका है इस परियोजना के तहत चीन के जिनजियांग प्रान्त को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से रेल, सड़क आदि परिवहन माध्यमों के जरिये जोड़ा जाएगा। इसके तहत चीन गुलाम कश्मीर में सड़क, रेल नेटवर्क, ऊर्जा प्लांट आदि ढांचागत निर्माण का काम करेगा। गौरतलब है कि यह आर्थिक गलियारा ३००० किमी लम्बा है, जिससे सटे अक्साई चिन इलाके को लेकर भारत और चीन में काफी पुराना विवाद भी है। इसके अतिरिक्त चीन द्वारा पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था में २८ अरब डॉलर निवेश के लिए अन्य कुछ समझौते भी किए गए हैं साथ ही पाकिस्तान को १२ अरब डॉलर का कर्ज देने की घोषणा भी चीनी राष्ट्रपति द्वारा की गई है। कहा गया है कि इस कर्ज के जरिये पाकिस्तान अपने ऊर्जा क्षेत्र, सामरिक क्षेत्र आदि को समृद्ध करने की दिशा में काम करेगा। गौरतलब है कि यह किसी भी चीनी राष्ट्रपति का नौ साल बाद हुआ पाकिस्तानी दौरा है। इस दौरे के समय चीनी राष्ट्रपति द्वारा कहा गया कि वह पहली बार पाकिस्तान जा रहे हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि वे अपने भाई के घर जा रहे हैं। बदले में उनके पाकिस्तान पहुँचने पर पाकिस्तान द्वारा भी पलक-पाँवड़े बिछाकर उनका स्वागत किया गया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति समेत पाक  सेना प्रमुख आदि सभी लोग उनके स्वागत में उपस्थित रहे। साथ ही, उन्हें पाकिस्तान के सबसे उच्च सम्मान  निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित भी किया गया। यह तो सही है कि पाकिस्तान चीन की भारतीय विदेशनीति  व कूटनीति के केंद्र में हमेशा से रहा है, लेकिन अब सवाल यह है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि चीन पाकिस्तान पर इतना मेहरबान हो रहा है ? ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि चीन पाकिस्तान पर अपनी उक्त मेहरबानियाँ यूँ ही दिखा रहा है, इसके पीछे उसके अपने कई स्वार्थ हैं। अपनी ही गलतियों से पैदा हुई विपन्नता के कारण प्रगति से वंचित हो रहे पाकिस्तान को प्रगति का लालच देकर चीन उसकी जमीन का इस्तेमाल अपने व्यापारिक, सामरिक हितों के लिए करने के उद्देश्य के तहत काम कर रहा है। यह सब मेहरबानी इसी मंशा की उपज है।
प्रजातंत्र लाइव
दरअसल विगत वर्ष भारत में नई सरकार के गठन के बाद से ही  भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारतीय विदेश नीति को जिस तरह से साधा गया है, उसने कहीं न कहीं भीतर ही भीतर चीन को परेशानी में डाल दिया है। फिर चाहें वो एशिया हो या योरोप..मोदी भारतीय विदेश नीति को सब जगह साधने में पूर्णतः सफल रहे हैं। एशिया के नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव, जापान  आदि देश हों, विश्व की द्वितीय महाशक्ति रूस हो या फिर यूरोप के फ़्रांस, जर्मनी हों अथवा स्वयं वैश्विक महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका हो, इन सबके दौरों के जरिये प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले १०-११ महीनों के दौरान भारतीय विदेशनीति को एक नई ऊँचाई दी है। साथ ही इनमें से अधिकांश देशों के राष्ट्राध्यक्षों का भारत में आगमन भी हुआ है, जिसने न केवल एशिया में वरन पूरी दुनिया में भारत की साख में भारी इजाफा किया है। भारत की इस  बढ़ती वैश्विक साख ने चीन को परेशान किया हुआ था कि तभी भारत के दबाव में आकर श्रीलंका ने चीन को अपने यहाँ बंदरगाह बनाने की इजाजत देने से इंकार कर दिया। वहीँ दूसरी तरफ भारतीय प्राधानमंत्री नरेंद्र मोदी मॉरीशस और सेशेल्स में एक-एक द्वीप निर्माण की अनुमति प्राप्त कर लिए। इन बातों ने चीन को और परेशान कर के रख दिया। कहीं न कहीं भारत की इन्हीं सब कूटनीतिक सफलताओं से भीतर ही भीतर बौखलाए चीन की बौखलाहट शी जिनपिंग के इस पाकिस्तानी दौरे और पाकिस्तान पर हुई भारी मेहरबानी के रूप में सामने आई है। दरअसल, पाकिस्तान के जिस ग्वादर बंदरगाह को चीन द्वारा अपने जिनजियांग प्रान्त से जोड़ने की परियोजना पर काम किया जा  रहा है, उससे चीन को अरब की खाड़ी व होर्मुज की खाड़ी में सीधा प्रवेश मिल गया है। अब चूंकि, यह रास्ते भारत के पश्चिम एशिया से तेल आयात करने वाले मार्ग के बेहद निकट हैं, इसलिए इस सम्बन्ध भारत की चिंता बढ़ जाती है। ग्वादर बंदरगाह पर काबिज होने से चीन को कई लाभ हैं, जिनमे कि पश्चिम एशिया से तेल का आयात उसके लिए बेहद आसान और सस्ता हो जाएगा तथा सामरिक दृष्टि से भी वह भारत पर दबाव बना सकेगा। एक बात यह भी कि इसे भारत द्वारा मॉरीशस और सेशेल्स में द्वीप निर्माण की अनुमति प्राप्त करने का चीन की तरफ से जवाब भी माना जा सकता है।

  भारत की बात करें तो ग्वादर-जिनजियांग मार्ग की परियोजना को लेकर भारत की अत्यधिक सुरक्षा चिंताएं हैं। चूंकि, वर्तमान में चीन भले ही यह कहे कि यह ग्वादर-जिनजियांग मार्ग सिर्फ व्यापारिक उद्देश्यों से प्रेरित है, लेकिन इस  आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि निकट अथवा दूर भविष्य में यह चीनी और पाकिस्तानी नौसेनाओं के एक संयुक्त अड्डे के रूप में परिणत हो जाय और चीन इसे भारत के विरुद्ध अपने सामरिक हितों के लिए प्रयोग करें। वैसे भी भारत के प्रति चीन के धोखे का जो इतिहास रहा है, वह भारत को इस परियोजना के प्रति सशंकित होने को बाध्य करता है। कुल मिलाकर स्पष्ट है कि भारत को चीन और पाकिस्तान की इस बढ़ती नजदीकी के प्रति पूरी तरह से सचेत रहना चाहिए तथा इस चीन-पाक आर्थिक कॉरीडोर परियोजना के मसले पर अपनी चिंता को चीन के साथ-साथ वैश्विक मंचों पर भी उठाना चाहिए। 

बुधवार, 21 जनवरी 2015

कैसे मिलेगी कुपोषण से मुक्ति [प्रजातंत्र लाइव और दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

प्रजातंत्र लाइव 
आज के बच्चे ही कल  युवा होंगे और राष्ट्र के प्रगति संरक्षण का दायित्व उनके  कन्धों पर होगा, ऐसे में आवश्यक है कि वे शारीरिक-मानसिक स्तर पर स्वस्थ मजबूत हों बच्चों को शारीरिक-मानसिक स्तर पर स्वस्थ मजबूत रखने के लिए बुनियादी जरूरत ये है कि गर्भस्थ अवस्था से लेकर तक़रीबन तीन-चार वर्ष तक उनके पोषण चिकित्सा का समुचित ध्यान रखा जाए इस समय अगर उनके खान-पान आदि के प्रति जरा सी भी लापरवाही हुई तो वे कुपोषण की चपेट में चले जाते हैं ।  गौर करें तो कुपोषण की समस्या आज इतना विकराल रूप ले चुकी है कि विश्व बैंक द्वारा इसकी तुलना ब्लैक डेथ नामक उस महामारी से की गई है जिसने १८ वी सदी में योरोप की एक बड़ी जनसंख्या को नष्ट कर दिया था   अगर एक नज़र भारत पर डालें तो बच्चों के स्वास्थ्य पोषण के मामले में यहाँ स्थिति बेहद खराब नज़र आती है हालत ये है कि आज दुनिया के तकरीबन ४० फीसद कुपोषित अकेले भारत में हैं इनमे से लगभग  आधे बच्चों का वजन उनकी उम्र के अनुपात में बेहद कम है, तो कितने ही बच्चे एनीमिया से पीड़ित होने के कारण खून की कमी से ग्रस्त हैं संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल पाँच साल से कम उम्र के लगभग २१ लाख बच्चे समुचित पोषण स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलने के कारण काल के गाल में चले जाते हैं इसी क्रम में यह भी उल्लेखनीय होगा कि एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की तीसरी सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था होने के बावजूद स्वास्थ्य और पोषण के मामले में भारत की हालत नेपाल, श्रीलंका जैसे देशों से भी बदतर है गौरतलब है कि ये सभी देश भारत से आर्थिक, संसाधनिक आदि तमाम तरह की सहायता प्राप्त करने वाले देशों में शामिल हैं ऐसे में अगर भारत में बच्चों की स्वास्थ्यजन्य स्थिति  इन देशों से भी बदतर है तो ये भारत के लिए बेहद शर्मनाक बात कही जाएगी कहना गलत नहीं होगा कि आज जहाँ एक तरफ भारत विश्व पटल पर अपनी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के दम पर अपनी पहचान कायम करके गर्वित हो रहा है, वहीँ दूसरी तरफ उसकी भावी पहचान यानी उसके बच्चों का एक बड़ा हिस्सा कुपोषण के साये में जीने को विवश है हालांकि ऐसा कत्तई नहीं है कि भारत में बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए कोई सरकारी नीति कार्यक्रम नहीं है गौर करें तो भारत सरकार द्वारा जच्चा-बच्चा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जननी-शिशु सुरक्षा, आशा आदि कई योजनाएं कार्यक्रम बनाए गए हैं पर इसे व्यवस्था का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सरकार की अन्य योजनाओं की ही तरह ये योजनाएं कार्यक्रम भी अधिकाधिक रूप से सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक ही सिमट के रह गए हैं यथार्थ के धरातल पर इन योजनाओं का कोई ठोस क्रियान्वयन होता नहीं दिखता इन कार्यक्रमों के कागज़ तक सिमटे रहने के लिए प्रमुख कारण केन्द्र राज्य सरकारों के बीच सही तालमेल का होना है और इस तालमेल की कमी का खामियाजा देश के नन्हे मासूमों को अपनी जान तक गँवा के भुगतना पड़ रहा है  
दैनिक जागरण 
  बच्चों में कुपोषण दो तरह से आता है एक जन्म के साथ और एक जन्म के कुछ समय बाद इन दोनों ही स्थितियों में कुपोषण के लिए जच्चा-बच्चा को समुचित पोषण दिया जाना ही मुख्य कारण होता है शिशु अवस्था में कुपोषण से ग्रस्त होने की स्थिति में बच्चा बड़े होने पर भी सुपोषित बच्चों की अपेक्षा शारीरिक-मानसिक स्तर पर बेहद हीन रह जाता है उदाहरणार्थ, उम्रानुसार कद छोटा होना, शरीर पतला या सूजा हो जाना; याद्दाश्त बेहद कमजोर हो जाना और कोई भी काम करते हुए बहुत ही जल्दी थक जाना आदि कुपोषण के तमाम लक्षण हैं इनके अलावा कुपोषण युक्त बच्चे पर घेंघा, एनीमिया, मैरेमस आदि बीमारियों  का खतरा भी हमेशा बना रहता है उसपर कुपोषण की सबसे बड़ी दिक्कत तो ये है कि जो बच्चा जन्म से पाँच वर्ष के भीतर इसकी चपेट में गया, उसके लिए आगे इससे मुक्त होना बेहद मुश्किल हो जाता है । स्पष्ट है कि एकबार कुपोषण से ग्रस्त होने की स्थिति में व्यक्ति का जीवन बेहद कठिन हो जाता है और उससे उबरना भी उसके लिए बेहद मुश्किल होता है ।
   संदेह नहीं कि कुपोषण के लिए पोषण युक्त आहार की कमी सबसे प्रमुख कारक होती है, लेकिन इसके अलावा और भी कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें कुपोषण के लिए जिम्मेदार कहा जा सकता है इनमे समाज के एक बड़े हिस्से में व्याप्त -जागरूकता और साफ़-सफाई का अभाव प्रमुख है ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकाधिक लोग पोषण आदि के मामले में बेहद -जागरुक होते हैं, ऐसे में वे इस बात को नहीं समझ पाते कि पोषण के लिए क्या और कितना खाना चाहिए उनकी नज़र में पोषण का सिर्फ एक अर्थ होता है कि जो भी मिले, खूब अधिक खाओ वे समझते हैं कि खूब अधिक खाने से व्यक्ति तंदुरुस्त रहता है और प्रायः यही चीज वे अपने बच्चों पर भी लागू करते हैं परिणामतः वे स्वयं तो कुपोषित और अस्वस्थ होते ही हैं, अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी कुपोषण पारम्परिक धरोहर के रूप में दे देते हैं इसके अलावा साफ़-सफाई की कमी भी कुपोषण के लिए एक अहम कारण है एक आंकड़े के मुताबिक देश में तकरीबन पच्चीस हजार ऐसी बस्तियां हैं जहाँ साफ़-सफाई का स्तर औसत से भी नीचे है हालत ये है कि इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के घरों के आसपास कहीं कचरे का ढेर लगा होता है तो कहीं बगल से ही नाली बह रही होती है ऐसे में, लाख बचाने पर भी खेलते-कूदते बच्चे इन्ही गंदगियों से रूबरू होते हैं जिससे कि प्रदूषण के कारण उनमे तमाम तरह की बीमारियाँ पैदा होती हैं इन बीमारियों का उनकी अवस्थानुसार बेहद नाजुक पाचन शक्ति पर बेहद  प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिससे उनका खाना ठीक से पचना बंद हो जाता है इस प्रकार धीरे-धीरे वे कुपोषण की गिरफ्त में जाते हैं जाहिर है कि समुचित पोषण के अलावा -जागरूकता आदि तमाम ऐसे कारण जिनसे कुपोषण को बल मिलता है अंततः, इन बातों को देखते हुए कह सकते हैं कि कुपोषण  से मुक्ति के लिए जितनी आवश्यकता समुचित पोषण, चिकित्सा स्वच्छता की है, उतनी या उससे कुछ अधिक ही आवश्यकता स्वास्थ्य के प्रति जन-जागरूकता की भी है और जागरूकता के लिए जितना दायित्व सरकार का है, उतना ही समाज के अन्य जागरुक जानकार लोगों का भी है क्योंकि, जब तक समाज में पूरी तरह से स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता नहीं जाती, कुपोषण के अभिशाप से मुक्ति संभव नहीं है