रविवार, 7 जनवरी 2018

पुस्तक समीक्षा : सादी कहानी की ताजा प्रस्तुति [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
हर व्यक्ति के लिए उसके छात्र-जीवन का दौर न केवल महत्वपूर्ण बल्कि यादगार भी होता है। जीवन के इसी दौर की कहानियों को लेकर वर्तमान समय में काफी लिखा जाने लगा है। सुरभि सिंघल का उपन्यास ‘फीवर 1040इसी प्रकार के कथानकों की श्रृंखला को आगे बढ़ाता है। लेखिका ने कहानी की नायिका पाशना, जो प्रथम पुरुष सर्वनाम (मैं) से भी संबोधित होती है, के घर-परिवार से दूर महाविद्यालय में पहुँचने के बाद उसके साथ घटित घटनाओं का रोचक वर्णन किया है। महाविद्यालय में मिले नए दोस्तों और हॉस्टल की रूममेट्स वगैरह के साथ नायिका द्वारा महाविद्यालय में की गयी शैतानियों और अनुभवों की अभिव्यक्ति है ये उपन्यास। अच्छी बात यह है कि इस समस्त वर्णन को वास्तविकता के यथासंभव निकट और फ़िल्मी प्रभाव से मुक्त रखने में लेखिका लगभग कामयाब रही हैं। कहानी के पात्र शैतानी कारनामे करने के बाद फ़िल्मी चरित्रों की तरह न तो सजा से ही बचते हैं और न ही अति-नाटकीय ढंग की सजा ही पाते हैं। यहाँ जो भी होता है, व्यावहारिक और असली लगता है। इस सम्बन्ध में यह कथांश उल्लेखनीय होगा, जब पाशना अपनी प्रोफेसर के व्यवहार का बदला लेने के लिए गालियों भरी चिट्ठी उनकी मेज पर रखने जाती है, तो पकड़ी जाती है और सजा के रूप में एक महीने के लिए महाविद्यालय से बाहर होना पड़ता है। इस घटना के बाद उसमें कुछ बदलाव भी आता है। कुल मिलाकर इस कहानी की प्रमुख विशेषता ही यह है कि इसका अधिकांश घटनाक्रम नाटकीयता की मात्रा से मुक्त और सादगीपूर्ण रहा है।  


यह कहानी सादगीपूर्ण तो है, मगर इसकी सादगी को भाषा ने ताजगी से भर दिया है। भाषा में वाक्यों का उल्टा-पुल्टा स्वरूप आकर्षित करता है। वाक्य व्याकरण द्वारा निर्धारित स्वरूप से अलग हैं साथ ही उनमें नए-नए से मुहावरों और प्रतीकों का इस्तेमाल भी भाषा को ताजगी प्रदान करता है। हालांकि, भाषा में ताजगी के नाम पर हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का ठुसमठूस प्रयोग बहुत खटकता है। परन्तु, यह सिर्फ इस पुस्तक तक केन्द्रित समस्या नहीं है, आज के ज्यादातर नए और युवा लेखकों की किताबों में यह समस्या उभरकर सामने आ रही है। समस्या यह है कि ‘नयी वाली हिंदी’ के नाम पर इस तरह की भाषा को स्थापित करने का प्रयास भी किया जा रहा। इससे बचने की जरूरत है। इस समस्या को छोड़ दें तो प्रस्तुत उपन्यास की भाषा निश्चित ही प्रभावित करती है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ये एक सादगीपूर्ण कहानी की ताजगी भरी प्रस्तुति है।

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