शनिवार, 6 जनवरी 2018

सही मुद्दा पकड़ें रजनीकांत [अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
दक्षिण भारतीय सिनेमा के मेगास्टार रजनीकांत के राजनीति में आने की अटकलें लम्बे समय से लगाईं जा रही थीं, अब आखिर उन्होंने इसका आधिकारिक ऐलान भी कर दिया है। अपनी पार्टी बनाकर वे दक्षिण के राजनीतिक अखाड़े में ताल ठोंकेगे। रजनीकांत के राजनीति में आगमन की अनेक व्याख्यायें और विश्लेषण हो रहे। एक पक्ष यह मानता है कि रजनीकांत दक्षिण में कांग्रेस-भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को जगह नहीं बनाने देंगे, तो एक अन्य पक्ष यह भी है कि आज के समय में सिनेमा की लोकप्रियता राजनीति में बहुत असर नहीं दिखा पाएगी।

वैसे गौर करें तो दक्षिण की राजनीति में फ़िल्मी सितारों के लिए बड़ी अनुकूल रही है। दक्षिण में अभिनेता-अभिनेत्री ही नहीं, पटकथा लेखकों तक ने राजनीति में आकर धमाल मचाया है।

गौर करें तो दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार मरुथुर गोपालन रामचंद्रन जिनकी प्रसिद्धि एमजीआर नाम से है, जवानी के दिनों में कांग्रेस से जुड़े रहे। फिर पिता के देहावसान के बाद पैसे की तंगी में अभिनय में हाथ आजमाना शुरू किया और फिर सैकड़ों दक्षिण भारतीय फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया। बतौर मुख्य अभिनेता उनकी पहली फिल्म ‘राजकुमारी’ जिसने उन्हें रातो-रात स्टार बना दिया, को लिखने वाले वर्तमान में दक्षिण की राजनीति का एक बड़ा नाम एम. करूणानिधि थे। करूणानिधि तब फिल्मों में लेखन का काम करते थे। आज उनकी पार्टी डीएमके तमिलनाडु की राजनीति की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है।

बहरहाल, अभिनेता और फिल्म निर्माता दोनों ही रूपों में एमजीआर सफल रहे। इसके बाद वे डीएमके में भी गए, मगर कुछ समय बाद जब उनके राजनीतिक गुरू अन्नादुराई का निधन हो गया तो फिर उनके लिए पार्टी में टिकना मुश्किल होने लगा। आखिर करूणानिधि से मनमुटाव के चलते डीएमके से निकलकर उन्होंने अपनी पार्टी एआईडीएमके बनाई। दक्षिण की राजनीति में भी उनका मुकाबला कोई नहीं कर सका। वे देश के ऐसे पहले फिल्म अभिनेता थे, जो किसी राज्य के मुख्यमंत्री बने।

एमजीआर के समय की मशहूर फिल्म अभिनेत्री जयललिता के प्रति एमजीआर के सॉफ्ट कार्नर की कहानियां दक्षिण में ही नहीं, देश भर में खूब चर्चित हैं। जयललिता को राजनीति में लाने वाले एमजीआर ही थे। 1987 में उनके निधन के पश्चात् पार्टी बंट गई। एक खेमा एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के साथ था, तो दूसरा उनकी राजनीतिक शिष्या जयललिता को नेता मान रहा था। आखिर जयललिता ने खुद को एमजीआर का राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया, जिसे आगे जनता का समर्थन भी मिलता गया। अम्मा नाम से मशहूर जयललिता छः बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं और वर्ष २०१६ में मुख्यमंत्री रहते हुए ही उनकी मृत्यु हुई।

एमजीआर के राजनीतिक गुरू कहे जाने वाले अन्नादुराई जो तमिलनाडु के पहले मुख्यमंत्री थे, भी फिल्म लेखन से जुड़े थे। इनकी मृत्यु के पश्चात् ही एमजीआर को डीएमके से बाहर होकर अपनी पार्टी बनानी पड़ी थी। अन्ना और एनटीआर के नाम से प्रसिद्ध रामाराव जिन्होंने तेलुगु देशम पार्टी की स्थापना की थी, आंध्र प्रदेश की राजनीति में हाथ आजमाने से पहले अभिनय और निर्देशन के क्षेत्र से ही जुड़े रहे थे।

उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि दक्षिण में फ़िल्मी कलाकारों के लिए राजनीति में जाकर अपना वजूद स्थापित करना कोई बहुत मुश्किल नहीं रहा है। ऐसे में रजनीकांत जैसे मेगास्टार के लिए अगर राजनीति को आसान बताया जा रहा तो कुछ गलत नहीं है। लेकिन, इस बात को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि आज के समय में लोगों का वोट के प्रति दृष्टिकोण बदल गया है। अब लोग लोकप्रियता की बजाय मुद्दों पर फोकस करके वोट करने लगे हैं। इसलिए चुनाव लड़ने पर रजनीकांत को समर्थन तो मिलेगा लेकिन अकेले के दम पर वे अब दक्षिण में कहीं सत्ता प्राप्त कर लेंगे, ये कहना जल्दबाजी होगी। उन्हें सही मुद्दों को पकड़ना होगा। यूँ तो दक्षिण भारतीय लोगों से जुड़े अनेक मुद्दे हैं, जिनको रजनीकांत उठा सकते हैं. लेकिन एक ऐसा मुद्दा है, जिसे आगा उन्होंने ठीक ढंग से पकड़ लिया तो वे बेहद मजबूत स्थिति में आ जाएंगे. वो मुद्दा है परिवारवादी राजनीति. परिवारवादी राजनीति के मुद्दे पर रजनीकांत दक्षिण की दो बड़ी पार्टियों डीएमके और एआईडीएमके को बड़ी आसानी से घेर सकते हैं। आंध्र की एन. टी. रामाराव द्वारा स्थापित तेलुगु देशम पार्टी भी परिवारवाद से अछूती नहीं है, तो ये भी रजनी के निशाने पर ही रहेगी। साथ ही, परिवारवाद के मुद्दे को लेते ही राष्ट्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस भी उनके निशाने पर आ जाएगी।

इसके बाद लड़ाई में रजनीकांत के सामने सिर्फ भाजपा ही रह जाएगी। मुकाबला जरा दिलचस्प होगा, मगर रजनीकांत की विराट सिनेमाई लोकप्रियता और दक्षिण में भाजपा की कमजोर राजनीतिक जमीन को देखते हुए कह सकते हैं कि इस लड़ाई में रजनी का पलड़ा कहीं अधिक मजबूत रहेगा। ऐसे में, कहना न होगा कि अगर परिवारवाद के इस मुद्दे को रजनीकांत ठीक ढंग से उठा सके तो ही उन्हें अपनी सिनेमाई लोकप्रियता का पूरा लाभ राजनीतिक क्षेत्र में भी मिलेगा और उनके लिए विजय की संभावनाएं प्रबल हो सकेंगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें