- पीयूष द्विवेदी भारत
जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की पाकिस्तान परस्ती की बातें तो आम-ख़ास
चर्चाओं में अक्सर होती रहती हैं और देश की बहुसंख्य आबादी ऐसा मानती भी है, मगर
अभी हाल ही में एक मीडिया चैनल द्वारा अपने स्टिंग के जरिये इन अलगाववादी नेताओं
के पाकिस्तान से संबंधों की जो तस्वीर प्रस्तुत की गयी है, वो चौंकाती कम डराती
ज्यादा है। इंडिया टुडे द्वारा किए गए इस स्टिंग में हुर्रियत कांफ्रेंस के एक अलगाववादी
नेता को यह कहते हुए देखा और सुना जा सकता है कि उन्हें कश्मीर में अशांति फैलाने
के लिए पाकिस्तान से हवाला के जरिये पैसे भेजे जाते हैं। यह अलगाववादी नेता यह भी
स्वीकारता नज़र आ रहा है कि वे पत्थरबाजी से लेकर आगजनी तक तमाम तरीकों के द्वारा
कश्मीर में अशांति फैलाते हैं। सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि कश्मीर में कोई
अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा नहीं होने के कारण इन अलगाववादियों के लिए पाकिस्तान से
पैसा पहले दिल्ली आता है, फिर वहाँ से कश्मीर में पहुँचता है। ये स्टिंग उजागर
करता है कि इस देश का खा-पीकर यहाँ बसे हुए ये अलगाववादी इस देश को ही नुकसान
पहुँचाने के लिए किस हद तक बदनीयती के साथ लगे हुए हैं। हालांकि देश की बहुसंख्य
आबादी के लिए अलगाववादियों की इस बदनीयती में शायद ही कुछ नया हो, मगर उनके
कश्मीरी समर्थक भी अगर उनके असली चेहरे को पहचान लें तभी कुछ बात बनेगी।
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| राज एक्सप्रेस |
बहरहाल, यहाँ कुछ सवाल सरकार और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसियों पर भी उठते हैं,
जिनके जवाब उन्हें देने चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह कि पाकिस्तान से चलकर देश की
राजधानी दिल्ली से होते हुए कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए अलगाववादियों के पास पैसा
पहुँच जाता है और देश की खुफिया एजेंसियों के कानों पर जू तक नहीं रेंगती। कैसा
तंत्र है ? और कैसी खुफिया तैयारी है हमारी ? ये कहना मुश्किल है कि यह ख़ुफ़िया
एजेंसियों की कमजोरी है या लापरवाही, मगर जो भी है, देश की सुरक्षा के सम्बन्ध में
चिंतित करने वाली बात है। ख़ुफ़िया एजेंसियों को इस सम्बन्ध में सतर्क और सचेत होने
की आवश्यकता है। सरकार की बात करें तो अभी कुछ ही दिन पहले केन्द्रीय गृहमंत्री
राजनाथ सिंह ने संसद में यह बयान दिया था कि कश्मीरी पत्थरबाजों को पाकिस्तान से
सहायता मिल रही है। स्पष्ट है कि उन्हें ऐसे किसी नेटवर्क की जानकारी रही होगी।
फिर केवल बयान देकर ही उन्होंने अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली क्या ? अगर
नहीं, तो इस नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए किसी प्रकार की कार्यवाही क्यों नहीं
नज़र आई ? अगर कार्यवाही हुई होती तो क्या आज कश्मीर में पत्थरबाजी की समस्या बढ़ी
होती ? क्या आज अलगाववादी नेता स्टिंग में पाकिस्तान से दिल्ली वाया कश्मीर जैसे
किसी नेटवर्क का खुलासा करता ? क्या कश्मीर के हालात इतने अशान्तिपूर्ण होते ?
शायद नहीं। मगर, इस नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए जिस स्तर की गंभीरता से
कार्यवाही की जानी चाहिए थी, शायद नहीं की गयी।
जम्मू-कश्मीर के उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह से जब इस स्टिंग के सम्बन्ध
में बात की गयी तो उन्होंने कहा कि इसमें कुछ नया नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान
आज़ादी के बाद से ही देश में अशांति फैलाने के लिए इस तरह की गतिविधियाँ अपनाता रहा
है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले भी इस तरह के मामलों में दोषियों पर कार्यवाही हुई
है और अब भी होगी। यहाँ सवाल देश की अबतक की सभी सरकारों पर उठता है कि जब यह
जब-तब सामने आए मामलों के द्वारा स्पष्ट हो चुका है कि कश्मीर के अलगाववादी गुट
पाकिस्तान के समर्थक और भारत विरोधी हैं, तो अबतक हम उन्हें क्यों ढोते आ रहे हैं
? उनके संगठनों पर प्रतिबन्ध लगाकर उनपर कठोरतापूर्वक कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं
की गयी ? उन्हें एक राजनीतिक दल और नेताओं की तरह क्यों माना जाता है ?
कितनी बड़ी विडम्बना है कि हम पाकिस्तान से अपेक्षा करते हैं कि वह अपने देश
में जमात-उद-दावा, अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों को प्रतिबंधित करे, वहीं दूसरी तरफ
हम अपने देश में इन अलगाववादी संगठनों जो देशविरोधी कृत्यों में किसी आतंकी संगठन
से कत्तई कम नहीं हैं, को पालने में लगे हैं। अलगाववादियों को प्रश्रय देने के लिए
निस्संदेह देश में सर्वाधिक समय तक केंद्र की सत्ता में रहने वाली कांग्रेस
सरकारों की कश्मीर के सम्बन्ध में तुष्टिकरण की राजनीति से प्रेरित नीतियाँ ही काफी
हद तक जिम्मेदार रही हैं। कश्मीर समस्या को पैदा करने में देश के प्रथम
प्रधानमंत्री पं नेहरू का जितना योगदान है, उनकी परवर्ती कांग्रेस सरकारों का उतना
ही योगदान इस समस्या को जटिल से जटिलतम बनाने में है।
बहरहाल, पिछली सरकारों ने जो किया सो किया, वर्तमान सरकार को तो इन
अलगाववादी संगठनों के फन को स्थायी रूप से कुचलने के लिए कदम उठाने में नहीं
हिचकना चाहिए। ये अलगाववादी संगठन आतंकी संगठनों से अधिक खतरनाक हैं क्योंकि ये
देश के छिपे हुए दुश्मन हैं। ये बात इंडिया टुडे के हालिया स्टिंग में सामने आयी
है और पहले भी इनकी गतिविधियों के ज़रिये सामने आती ही रही है। अतः केंद्र की
मौजूदा मोदी सरकार से अपेक्षित है कि वो नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मामलों
में जैसी दृढ इच्छाशक्ति का परिचय दे चुकी है, वैसी ही इच्छाशक्ति का एकबार फिर
परिचय देते हुए इन अलगाववादी संगठनों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाए तथा इनपर यथासंभव
कठोर कार्यवाही करे। साथ ही, ज़रूरत देश के ख़ुफ़िया तंत्र को और सजग करने की भी है,
जिससे कि देश में पाकिस्तानी पैसे, हथियारों आदि का जो नेटवर्क चलने की बात सामने
आती रहती है, उसका पता लगाकर उस नेटवर्क को समूल ध्वस्त किया जा सके। ये कदम न
केवल कश्मीर के हालात सुधारने के मद्देनज़र आवश्यक हैं, बल्कि देश के समक्ष देश की
सरकारों की कश्मीर नीति को लेकर जो एक भ्रमपूर्ण स्थिति बनी रही है, उसका निराकरण
करने की दृष्टि से भी इनकी अत्यंत आवश्यकता है।


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