शनिवार, 6 मई 2017

हिंदी को मजबूती देने की बहस [अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
देश में हिंदी को लेकर जिस-तिस रूप में बहस अक्सर चलती ही रहती है, लेकिन अभी हाल ही में हिंदी के प्रयोग के सम्बन्ध में गठित एक संसदीय समिति की रिपोर्ट को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा मंज़ूरी दिए जाने के बाद यह बहस एकबार पुनः प्रासंगिक हो उठी है। इस रिपोर्ट की सिफारिशों के मुताबिक राष्ट्रपति और सरकार के मंत्रियों समेत सभी प्रतिष्ठित पदों पर आसीन व्यक्तियों जिन्हें हिंदी आती हो, के लिए अपने वक्तव्य हिंदी में देना जरूरी हो जाएगा। साथ ही, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) तथा अन्य केन्द्रीय विद्यालयों में दसवीं तक की शिक्षा में हिंदी को अनिवार्य कर देने की सिफारिश भी समिति द्वारा की गयी है। इसी प्रकार की और भी कई एक सिफारिशें संसदीय समिति द्वारा की गयी है, जिन्हें राष्ट्रपति ने मंज़ूरी दे दी है। हालांकि अभी सिर्फ इन सिफारिशों को राष्ट्रपति की तरफ से मंज़ूरी मिली है, अभी ये लागू नहीं हुई हैं; मगर अभी से ही इनपर देश के गैर-हिन्दीभाषी राज्यों के दलों की भृकुटियाँ तन गयी हैं। इस रिपोर्ट के स्वीकृत होने के बाद द्रमुक नेता एम के स्टालिन ने झट केंद्र सरकार पर यह आरोप लगा दिया कि वो गैर-हिन्दीभाषी राज्यों पर हिंदी को थोप रही है, जिसे राजभाषा विभाग के प्रभार मंत्री किरण रिजीजू ने खारिज कर दिया।

बहरहाल, ये लड़ाई तो बेहद पुरानी रही है कि जब भी देश में हिंदी के हित में कोई राष्ट्रव्यापी पहल की बात आती है, उसपर दक्षिणी राज्यों का रुख बिना सोचे-विचारे तल्ख़ हो जाता है। गैर-हिन्दीभाषी राज्यों का हिंदी के प्रति यह विद्वेष समझ से परे है कि एक तरफ तो वे अपने यहाँ एक विदेशी भाषा अंग्रेजी को अपनाए हुए बैठे हैं, दूसरी तरफ हिंदी के नाम से भी उन्हें चिढ़ मच जाती है। यदि उन्हें अपनी क्षेत्रीय भाषाओं से ही सिर्फ लगाव होता और इसी कारण हिंदी का विरोध कर रहे होते तो उन्हें विदेशी भाषा अंग्रेजी को भी नहीं अपनाना चाहिए था। लेकिन, ऐसा नहीं है। देखा जा सकता है कि उन्हें अंग्रेजी से कोई दिक्कत नहीं है; मगर इस देश जिसके वे अंग हैं, की संविधान स्वीकृत राजभाषा हिंदी से उन्हें समस्या हो जाती है। प्रश्न यह है कि यदि इन गैर-हिन्दीभाषी प्रदेशों के लोग अपनी क्षेत्रीय भाषाओँ के साथ अंग्रेजी को अपना सकते हैं, तो हिंदी को अपनाने में उन्हें दिक्कत क्या है ? कहना होगा कि हिंदी को लेकर देश के इन प्रदेशों का विरोध तार्किक कम पूर्वाग्रह प्रेरित अधिक है। सीधे शब्दों में कहें तो ये अनुचित हठधर्मिता है, जिसने आज से पाच दशक पहले हिंसक आन्दोलन का रूप ले लिया था। दरअसल सरकार ने तब उस हिंदी विरोधी आन्दोलन के आगे झुककर बड़ी भूल की थी, जिसके फलस्वरूप आज इन हिंदी विरोधी राज्यों का मन इतना बढ़ गया है कि हिंदी को लेकर एक छोटी सी राष्ट्रव्यापी पहल भी ये राज्य स्वीकार नहीं कर पाते।
 
अमर उजाला कॉम्पैक्ट
यहाँ उल्लेखनीय होगा कि हिंदी की महत्ता की बात करने का कत्तई यह अर्थ नहीं कि अन्य भारतीय भाषाओं को कमतर समझा जा रहा। निस्संदेह कोई भी भारतीय भाषा हिंदी से कम नहीं है। सबका बराबर स्थान है। लेकिन, राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोए रखने और संस्कृतियों का संवहन करने की सामर्थ्य यदि किसी भाषा में है, तो वो हिंदी में ही है। हिंदी ही वो भाषा है, जो अंग्रेज़ी का मुकाबला कर देश के अंग्रेजीकरण को रोक सकती है। कोई अन्य भारतीय भाषा अंग्रेजी का मुकाबला शायद ही कर पाए। उदाहरणस्वरूप हिंदी का विरोध करने वाले दक्षिणी राज्यों का उल्लेख करें तो उन्होंने हिंदी को नहीं स्वीकारा, फलस्वरूप आज वहाँ उनकी अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी का पूर्ण वर्चस्व है, बल्कि अंग्रेजी अधिक ही है।

इसी क्रम में विचार करें तो आज हिंदी के लिए जितनी भी चुनौतियाँ रही हैं, इनके लिए कहीं कहीं हमारे नीति नियंताओं की ऐतिहासिक भूलें जिम्मेदार हैं। आज हिंदी के लिए सबसे बड़ा संकट अंग्रेजी बन चुकी है। हर मोर्चे पर हिंदी को अपने अस्तित्व के लिए अंग्रेजी से संघर्ष और समझौता करना पड़ रहा है। रोजगार के क्षेत्र में तो अंग्रेजी का लगभग एकछत्र वर्चस्व हो ही चुका है, अब धीरे-धीरे वो आम बोलचाल में हिंदी का जो संप्रभु अस्तित्व था, उसे भी चुनौती देने लगी है। इसीका परिणाम है कि आज हिंग्लिश के रूप में एक भाषा चलन में गयी है। इस स्थिति के लिए सबसे ज्यादा दोषी आज़ादी के बाद अंग्रेजी को हिंदी के बराबर रूप में स्वीकारते जाने की हमारी अनावश्यक उदारता है। तब हमने अंग्रेजी को राजकाज की भाषा के रूप में सिर्फ दशक भर के लिए रखा था कि धीरे-धीरे हिंदी के चलन में जाने के बाद इसे हटा दिया जाएगा, लेकिन ये कभी नहीं हो सका।

आज इस देश में अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा भर नहीं रह गयी है, उच्चताबोध का साधन प्रतीक बन गयी है। लोगों में अंग्रेजी को लेकर यह अवधारणा गहराई तक पैठ चुकी है कि अंग्रेजी जानना विशिष्टता का चिन्ह है। यहाँ तक कि व्यक्ति के विविध विषयों के ज्ञान से अधिक महत्व उसके अंग्रेजी ज्ञान का है। ज्यादातर लोग इस मानसिकता से ग्रस्त हो चुके हैं कि अंग्रेजी आना विद्वान होने का लक्षण है। ऐसे में, उन्हें यह बात समझाना मुश्किल है कि ब्रिटेन का एक अनपढ़ व्यक्ति भी अंग्रेजी में ही बात करता है। यानी कि अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा है, ज्ञान का आधार नहीं।

इस स्थिति के मद्देनज़र आज ज़रूरत हिंदी को बढ़ावा देने की तो है ही, देश में व्याप रही इस अंग्रेज़ीदां मानसिकता को समाप्त करने की भी है। इसके लिए सबसे बेहतर रास्ता होगा कि देश में अंग्रेजी माध्यम शिक्षा को पूर्णतः समाप्त कर दिया जाए। देश में शिक्षा का माध्यम हिंदी समेत भारतीय भाषाएँ हों। अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा के रूप पढ़ाई जाने तक सीमित रहे, इससे अधिक कुछ नहीं। वास्तव में तो यह कार्य आज़ादी के तुरंत बाद ही कर लेना चाहिए था। गांधी भी यही चाहते थे। उनका कथन था, राष्ट्र के बालक अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं, तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूं। ऐसे में कहना होगा कि यदि गांधी आज़ादी के बाद कुछ समय तक जीवित रहते तो संभवतः ऐसा हो भी जाता। मगर, तब नहीं हुआ तो सही, अब इस तरह का कदम उठाने में सरकार को पीछे नहीं हटना चाहिए। ये अवश्य है कि इससे अस्थायी तौर पर थोड़ी असुविधा हो सकती है; उच्च शिक्षा में विज्ञान आदि विषयों की अध्ययन सामग्री का हिंदी में अधिक होना समस्या उत्पन्न करेगा; मगर अपने देश की भाषा के उत्थान लिए और औपनिवेशिक भाषा के चंगुल से छूटने के लिए हमें इन समस्याओं से लड़ना होगा। हम थोड़ी सी असुविधा के भय से हिंदी को इस तरह अंग्रेजी के समक्ष हाशिये पर जाते हुए नहीं छोड़ सकते। वैसे भी ये समस्याएँ कोई बहुत बड़ी नहीं है, हिंदी में अनुपलब्ध पठन सामग्री का अनुवाद कराकर धीरे-धीरे इस प्रकार की समस्याओं को समाप्त किया जा सकता है। हिंदी के उत्थान और अंग्रेज़ीदां मानसिकता के उन्मूलन के लिए सरकार को इस तरह के कदम उठाने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी, अन्यथा देश में व्याप रही अंग्रेज़ीदां मानसिकता हिंदी को धीरे-धीरे निगल जाएगी।

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