बुधवार, 16 सितंबर 2020

सांस्कृतिक प्रतीकों का संरक्षण

  • पीयूष द्विवेदी भारत

गत वर्ष पांच अगस्त को मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 का उन्मूलन कर आजादी के बाद से ही विवादों में रहे इस प्रदेश का शेष भारत के साथ सही अर्थों में एकीकरण करने का ऐतिहासिक कार्य किया था। आज इस ऐतिहासिक कदम को एक साल से अधिक का समय बीत चुका है और इन एक सालों में सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश के रूप में संचालित जम्मू-कश्मीर को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए अनेक कदम उठाए हैं। आज केंद्र की सभी कल्याणकारी योजनाएं और क़ानून वहाँ लागू हो चुके हैं, राज्य की डोमिसाइल नीति में भी परिवर्तन हुआ है और विकास की अनेक परियोजनाएं भी राज्य में तेजी से गतिशील हो गयी हैं। बदलावों की इसी कड़ी में पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ‘जम्मू कश्मीर अधिकारिक भाषा बिल 2020’ को पारित करते हुए जम्मू-कश्मीर के लिए नयी भाषा नीति की घोषणा कर दी गयी। ज्ञात हो कि अबतक प्रदेश में उर्दू और अंग्रेजी, इन दो भाषाओं को ही आधिकारिक दर्जा मिला हुआ था, परन्तु, इस नयी भाषा नीति के तहत उर्दू-अंग्रेजी के अतिरिक्त और तीन भाषाओं हिंदी, कश्मीरी व डोगरी को भी प्रदेश में आधिकारिक भाषा का दर्जा प्रदान किया गया है। अभी चल रहे संसद के मानसून सत्र में इससे सम्बंधित विधेयक सदन में पेश होने की उम्मीद है, जिसके पारित होते ही जम्मू-कश्मीर में यह नयी भाषा नीति अस्तित्व में आ जाएगी। इसके साथ ही प्रदेश में उर्दू का भाषाई एकाधिकार भी समाप्त हो जाएगा।2011 की जनगणना के मुताबिक़, जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी भाषाभाषियों की संख्या पैतालीस लाख है। पचास लाख लोग डोगरी भाषा के भी हैं। शेष बड़ा तबका हिंदी और उर्दू में अपना भाषा-व्यवहार करता है। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि अनुच्छेद-370 की विभाजनकारी व्यवस्था से ग्रस्त रहे इस प्रदेश में औपनिवेशिक शासन से मिली अंग्रेजी और स्थानीय बहुसंख्यक मुस्लिम समाज की उर्दू के अतिरिक्त अन्य किसी भाषा को उसका यथोचित स्थान व सम्मान नहीं दिया गया। आज बात-बात में कश्मीरियत की दुहाई देने वाले प्रदेश के राजनीतिक धड़ो ने और तो छोड़िये कम से कम कश्मीरी भाषा की भी सुध लेने की जरूरत कभी नहीं समझी। सवाल है कि वो कौन-सी कश्मीरियत थी, जिसमें कश्मीरी भाषा को ही आधिकारिक स्थान नहीं दिया गया? वह कौन-सी कश्मीरियत थी, जिसमें कश्मीरी बोलने वालों पर उर्दू और अंग्रेजी को थोप दिया गया था? जाहिर है, यह सवाल कश्मीरियत के नाम पर दशकों तक अपनी सियासत चमकाने वालों के पाखण्ड को ही सामने लाते हैं।

दैनिक जागरण
डोगरी की बात करें तो ये राज्य के जम्मू संभाग में बोली जाती है। इसे संयोग ही कहेंगे कि 2003 में इस भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने का काम अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने ही किया था और आज इसे जम्मू-कश्मीर की आधिकारिक भाषा बनाए जाने का काम भी भाजपा की ही सरकार में संपन्न हुआ है। डोगरी सांस्कृतिक रूप से एक समृद्ध भाषा है। ‘डोगरा अक्खर’ नामक इसकी अपनी लिपि भी रही है, लेकिन समय के साथ इसे देवनागरी लिपि में ही लिखा जाने लगा और अब यही प्रचलन में है। देवनागरी लिपि में डोगरी भाषा का काफी साहित्य उपलब्ध है। परन्तु, ऐसी समृद्ध और मजबूत भाषा को जम्मू-कश्मीर इतने समय तक हाशिये पर रखा गया तो इसके पीछे प्रदेश के राजनीतिक कर्णधार बने रहे दलों की संकीर्ण राजनीति ही कारण है। बहरहाल, यह संतोषजनक है कि अब डोगरी भाषा को भी प्रदेश में इसकी उचित प्रतिष्ठा प्राप्त होने जा रही है।

कश्मीरी और डोगरी के अतिरिक्त हिंदी को भी जम्मू-कश्मीर में आधिकारिक भाषा बनाया गया है। भारतीय संविधान द्वारा हिंदी को देश की राजभाषा के रूप स्वीकारा गया है। परन्तु, अनुच्छेद-370 के रूप में प्रदत्त विशेषाधिकारों से संचालित जम्मू-कश्मीर में तो अबतक उसका अपना ही संविधान चलता आया था, अतः भारतीय संविधान के इस भाषा-विधान का भी यहाँ कोई अस्तित्व नहीं था। अब जब यह प्रदेश अनुच्छेद-370 से मुक्त होकर सही अर्थों में भारत से एकीकृत होने लगा है, तो हिंदी का वहाँ की आधिकारिक भाषा बनना आवश्यक था।

दरअसल हिंदी वो भाषा है, जो भारतीय समाज के विविधतापूर्ण सांस्कृतिक चरित्र का समुचित प्रतिनिधित्व करती है। इस देश की अधिकांश भाषाओं की तरह संस्कृत से जन्मी हिंदी ने भारतीय संस्कृति के समन्वयकारी स्वरुप का अनुकरण करते हुए अपने भीतर देशी-विदेशी अनेक भाषाओं-बोलियों के शब्दों का समावेश किया है। जम्मू-कश्मीर में भी उर्दू, कश्मीर, डोगरी जैसी भाषाओं के बीच हिंदी इस प्रदेश के समस्त सांस्कृतिक वैविध्य को स्वयं में समेटकर देश के अन्य राज्यों से उसका एकीकरण करने में सहायक सिद्ध होगी। साथ ही, अनुच्छेद-370 की समाप्ति के बाद जम्मू-कश्मीर और शेष भारत के बीच जो समानता की एक भावना प्रस्फुटित हुई है, उसको भी हिंदी के आधिकारिक दर्जे से निश्चित रूप से बल मिलेगा।          

कोई भी भाषा हो, उसका अपना एक विशेष सांस्कृतिक आग्रह होता है। ऐसे में, जब सरकार किसी भाषा को आधिकारिक दर्जा देती है, तो उसके भाषा-भाषियों के समक्ष यही तथ्य स्पष्ट होता है कि सरकार उनके सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा करने के लिए प्रयास कर रही है। जम्मू-कश्मीर की नयी भाषा नीति के संदर्भ में भी यही सत्य है। इससे न केवल जम्मू-कश्मीर के लोगों का केंद्र सरकार पर विश्वास बढ़ेगा बल्कि सरकार के लिए प्रदेश के जनमानस तक अपनी योजनाओं व नीतियों को लेकर जाने में भी सहूलियत हो जाएगी। समग्रतः गत वर्ष अनुच्छेद-370 से मुक्ति के साथ ही प्रदेश में समानता, विश्वास और विकास से युक्त परिवर्तन की जिस पटकथा का आरम्भ हुआ था, उसे यह नयी भाषा नीति निश्चित रूप से बल प्रदान करने का काम करेगी।

शनिवार, 12 सितंबर 2020

प्रशासनिक अमले में सुधार की पहल

  • पीयूष द्विवेदी भारत

पिछले दिनों मोदी सरकार की कैबिनेट द्वारा ‘मिशन कर्मयोगी- राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता विकास कार्यक्रम’ को मंजूरी दी गयीI सरकार का यह कदम देश की प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार लाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा हैI इस कार्यक्रम का उद्देश्य ‘भारतीय सिविल सेवकों को और भी अधिक रचनात्मक, सृजनात्मक, विचारशील, नवाचारी, प्रोफेशनल, प्रगतिशील, ऊर्जावान, सक्षम, पारदर्शी और प्रोद्योगिकी-समर्थ बनाते हुए भविष्य के लिए तैयार’ करना हैI इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए इस कार्यक्रम में कई प्रकार की व्यवस्था की गयी हैI केंद्र सरकार के करीब 46 लाख कर्मचारियों पर 2020 से 2025 के बीच पांच सालों में इस योजना के जरिये लगभग 510 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगेI 

वास्तव में किसी भी देश के विकास में उसकी प्रशासनिक तंत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैI देश की सरकार जनहित की कितनी भी अच्छी योजना बना दे, लेकिन यदि प्रशासन में उसे अमलीजामा पहनाने की इच्छाशक्ति, कौशल और प्रतिबद्धता नहीं है, तो वो योजना केवल कागजों पर रह जाती है और उसके लिए आवंटित धनराशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैI दुर्भाग्यवश भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की स्थिति निरपवाद रूप से ऐसी ही रही हैI   

यहाँ आजादी के बाद अंग्रेजों द्वारा स्थापित आईसीएस को बदलकर इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (आईएएस) तो कर दिया गया, लेकिन उसकी कार्य-पद्धति में बहुत परिवर्तन नहीं आ सकाI देश की आम जनता और सरकार के बीच पुल के रूप में ब्यूरोक्रेसी की कल्पना की गयी, लेकिन विडंबना ही है कि भारतीय ब्यूरोक्रेसी सरकार के लिए पुल बनना तो दूर, खुद ही जनता से नहीं जुड़ सकी और आम लोगों के लिए असहज बनी रहीI आज किसी भी सरकारी दफ्तर में किसी काम के लिए जाने से पहले सामान्य लोगों का झिझकना इस असहजता को ही दिखाता हैI आज यदि लोग अपने काम के लिए सरकारी दफ्तर में जाकर प्रक्रिया को अपनाने की बजाय कुछ ले-देकर काम बनाने की जुगत करने लगते हैं, तो उसके पीछे मुख्य कारण सरकारी दफ्तरों की हीलाहवाली और सम्बंधित अफसरों का सुस्त व असहयोगी रवैया ही हैI हालांकि मोदी सरकार के आने के बाद ई-गवर्नेंस के तहत तमाम सरकारी कामों के ऑनलाइन हो जाने से लोगों के लिए बड़ी सहूलियत हुई हैI लेकिन इससे प्रशासनिक महकमे में सुधार की जरूरत समाप्त नहीं होतीI इसी सुधार के उद्देश्य से लाया गया ‘मिशन कर्मयोगी’ कार्यक्रम निःसंदेह उम्मीद जगाता हैI  

इस कार्यक्रम में सबसे ऊपर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में प्रधानमंत्री मानव संसाधन परिषद् काम करेगी, जिसमें चुने हुए केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और मानव संसाधन के क्षेत्र में काम करने वाले लोग शामिल होंगेI इसके अलावा क्षमता विकास आयोग का गठन किया जाएगा जो प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली परिषद् का सहयोग करेगा तथा अफसरों के क्षमता विकास से सम्बंधित अन्य व्यवस्थाओं व गतिविधियों का भी निरीक्षण करेगा तथा सरकार को जरूरी सुझाव देगाI कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समन्वय इकाई भी गठित की जाएगी जिसमें चुनिंदा सचिव और कैडर को नियंत्रित करने वाले अधिकारी शामिल होंगेI इसके साथ ही, i-GOT नामक एक डिजिटल प्लेटफार्म भी स्थापित किया जाएगा जो देश के दो करोड़ से अधिक कार्मिकों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक संरचना उपलब्ध कराएगाI

इस प्लेटफार्म पर देश की ब्यूरोक्रेसी लिए लिए विश्वस्तरीय ई-लर्निंग सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी जिसकी सहायता से वे अपनी क्षमता बढ़ा सकेंगेI प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में संचालित उक्त परिषद् इन सभी गतिविधियों की निगरानी करेगी जिससे यह कार्यक्रम भी केवल कागजी खानापूर्ति भर बनकर न रह जाएI सरकार को उम्मीद है कि इस कदम के माध्यम से देश की ब्यूरोक्रेसी की क्षमताओं में वृद्धि होगी और उसके प्रदर्शन में सुधार देखने को मिलेगाI इस कार्यक्रम के मुख्य मार्गदर्शक सिद्धांतों में सबसे ऊपर कहा गया है कि ये ब्यूरोक्रेसी को ‘रूल बेस्ड’ से ‘रोल बेस्ड’ व्यवस्था की ओर ले जाएगाI सरल भाषा में इसका अर्थ यह है कि नियमों की जकड़न में उलझने की बजाय कार्य की आवश्यकता को देखते हुए भूमिका के निर्वहन पर यह कार्यक्रम बल देगाI यह बहुत बड़ी बात है और यदि यह बात भारतीय प्रशासन के कार्य-व्यवहार में साकार हो सके तो निश्चित रूप से उसकी तस्वीर बदल सकती हैI   

समग्रतः मोदी सरकार का मिशन कर्मयोगी प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक सूझबूझ से भरी, रचनात्मक और दूरदर्शितापूर्ण पहल हैI परन्तु, महत्वपूर्ण ये है कि जमीन पर भी यह इसी रूप में लागू हो और सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा इसको पूरी निष्ठा से अपनाया जाएI असल में समस्या यहीं आनी है, क्योंकि हमारे देश के प्रशासनिक महकमे की मानसिकता में ही सुस्ती और भ्रष्टता भरी हुई हैI जबतक वे इस मानसिकता से बाहर नहीं आते, ब्यूरोक्रेसी में बदलाव आना आसान नहीं हैI

हालांकि इस मिशन कर्मयोगी की बागडोर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मानव संसाधन परिषद के पास होने के कारण उम्मीद जगती है, क्योंकि इसके माध्यम से अफसरों के पूरे प्रशिक्षण की निगरानी व नियंत्रण स्वयं प्रधानमंत्री करेंगेI अतः इसमें किसी प्रकार की टालमटोल की प्रवृत्ति का चलना मुश्किल होगाI

वैसे भी मोदी सरकार का रिकॉर्ड देखें तो उसके कार्यकाल में जो भी योजनाएं आई हैं, उनका क्रियान्वयन संतोषजनक रूप से संपन्न हुआ है, अतः उम्मीद कर सकते हैं कि यह कार्यक्रम भी अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में कामयाब रहेगा और देश के लिए एक अधिक बेहतर एवं कार्यकुशल प्रशासनिक व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण निभाएगाI

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

परस्पर सद्भावना ही है विकास की कुंजी

  • पीयूष द्विवेदी भारत

आज देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती है, जिसे प्रति वर्ष सद्भावना दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में इस तरह कई पूर्व प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों व अन्य सम्मानित व्यक्तियों के जन्मदिन पर कोई न कोई दिवस निर्धारित किए गए हैं। सद्भावना दिवस की बात करें तो यह कहना होगा कि सद्भावना कोई ऐसा विषय नहीं है कि इसे किसी एक दिन में सीमित कर दिया जाए। सद्भावना तो किसी भी सभ्य समाज के लिए ऑक्सीजन की तरह होती है, जिसके बिना कोई समाज लम्बे समय तक जिन्दा नहीं रह सकता। ये ऐसी चीज है, जिसकी जरूरत हमें हर दिन और हर घड़ी है।

इस संदर्भ में भारत की बात करें तो यह ठीक है कि यहाँ आज भी बड़ी संख्या में लोग अपनी तमाम विविधताओं के बावजूद परस्पर सद्भावना, भाईचारे और प्रेम के साथ रहते हैं, लेकिन कुछ ख़बरें ऐसी भी आती रहती हैं जो देश के शांति-सद्भाव को लेकर चिंता पैदा करती हैं। गौर करें तो लगभग रोज ही अखबार के पन्नों और टीवी न्यूज़ की हेडलाइनों में हम देश में जहां-तहां होने वाली हिंसा और लड़ाई-झगड़े की कमोबेश ख़बरें देखते रहते हैं। कितने बार तो ऐसी खबरें भी दिखती हैं, जिनमें बेहद छोटी और सामान्य-सी बात पर लोग आपस में भिड़कर एकदूसरे को नुकसान पहुंचा लिए होते हैं। ताजा उदाहरण के तौर पर अभी बेंगलुरु में हमने देखा कि कैसे एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर हिंसा और अराजकता का तांडव मचा दिया गया। छोटी-छोटी बातों पर समाज में भड़कने वाली हिंसा की ऐसी घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं, बस इनके किरदार बदल जाते हैं। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया पर आए दिन अलग-अलग मुद्दों पर होने वाली बहसों व टिप्पणियों में प्रधानमंत्री से लेकर अन्य तमाम प्रतिष्ठित व्यक्तियों के प्रति लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को देखकर भी समाज की स्थिति का कुछ कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। और तो और, पारिवारिक स्तर पर भी हाल ये है कि अभी सप्ताह भर पूर्व आई एक खबर के मुताबिक़, बाराबंकी जिले में छोटे भाई ने साले के साथ मिलकर जरा-सी कहासुनी में बड़े भाई की हत्या कर दी। ऐसी ख़बरें भी अब आए दिन देखने-सुनने को मिलने लगी हैं। इन सब बातों का तात्पर्य यही है कि देश में चाहें समग्र समाज की बात हो या उसकी एक इकाई परिवार की, हर स्तर पर लोगों में परस्पर द्वेष, दुर्भावना और घृणा की मात्रा बढ़ रही है, जिसके परिणामस्वरूप वे एकदूसरे को मरने-मारने तक पर उतर जा रहे हैं। इस स्थिति का समाधान एक ही है कि समाज में अधिक से अधिक सद्भावना का प्रसार हो और यह तभी होगा जब प्रत्येक व्यक्ति, एक नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी को न सिर्फ समझेगा बल्कि उसका ईमानदारी से निर्वहन भी करेगा।

दैनिक जागरण आईनेक्स्ट

किसी भी देश और समाज के विकास की एक प्रमुख शर्त यह होती है कि वहाँ शांति हो और शांति के लिए सबसे जरूरी चीज समाज के लोगों में परस्पर सद्भाव का होना है। जिस समाज के लोगों में सद्भाव और प्रेम का अभाव होगा, वो कभी सही अर्थों में विकास नहीं कर सकता। उदाहरण के तौर पर हम पाकिस्तान, सीरिया जैसे देशों को देख सकते हैं, जहां न तो शांति है और न ही विकास। फिजूल की हिंसा में ये देश बर्बाद हो रहे हैं।   

अफ्रीका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने सद्भावना के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है, ‘जब लोग सद्भावना के साथ मिल जाते हैं और अपने मतभेदों को सबकी भलाई, शांति और समस्याओं के उचित समाधान के लिए ख़त्म कर देते हैं, तो उन समस्याओं का समाधान भी मिल जाता है जो दुसाध्य लग रही होती हैं।’ यह एकदम सच्ची और व्यावहारिक बात है। यदि लोग अपने मतभेदों से ऊपर समाज की भलाई को रखने लगें तो कोई मतभेद सद्भावना और विकास का मार्ग नहीं रोक सकता। एक सभ्य समाज से अपेक्षा भी यही होती है कि उसमें लोग मिल-बैठकर बातचीत से किसी भी समस्या के समाधान का रास्ता निकालें। यह बात भारतीय विदेश व रक्षा नीति का भी अंग बनी हुई है, जिस कारण सरकार अक्सर सीमा विवाद आदि मसलों को बातचीत से सुलझाने पर जोर देती रहती है। वस्तुतः भारत का प्रयास यही रहता है कि अपने आत्मसम्मान की रक्षा के साथ, हम दुनिया के देशों से अपने संबंधों को भी सद्भावपूर्ण रख सकें और किसी प्रकार के मतभेद के कारण उनमें खटास न पैदा हो। आजादी के बाद से देश की विदेश व रक्षा नीति का मूलभूत स्वरूप यही रहा है और आज भी, थोड़े-बहुत बदलाव के साथ कायम है। 

कुल मिलाकर बात यही है कि चाहें वो विश्व समाज हो या किसी देश का समाज अथवा कोई एक परिवार ही क्यों न हो, ये सब तभी विकास कर सकते हैं, जब इनके सदस्यों के बीच आपस में सद्भावपूर्ण सम्बन्ध हों। इस अर्थ में कह सकते हैं कि सद्भावना ही विकास की कुंजी है। 

शनिवार, 22 अगस्त 2020

विवाह की सही उम्र का सवाल

  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश के 74 वे स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमाम राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विषयों के बीच लड़कियों के विवाह की नयी न्यूनतम उम्र तय करने की सरकार की मंशा को भी प्रकट किया। उन्होंने कहा कि लड़कियों की शादी की उपयुक्त उम्र क्या होनी चाहिए, इस बारे में सरकार विचार कर रही है और इस सिलसिले में समिति भी गठित की गई है, उसकी रिपोर्ट आते ही बेटियों की शादी की उम्र के बारे में उचित फैसले लिए जाएंगे। लाल किले से मोदी अक्सर इस तरह के छोटे किन्तु महात्वपूर्ण मुद्दे उठाते रहे हैं। अपने पहले भाषण में उन्होंने खुले में शौच और इससे महिलाओं को होने वाली समस्याओं का जिक्र किया था जिसके पश्चात् धीमे-धीमे इस स्थिति में सुधार आया और आज देश खुले में शौच की समस्या से लगभग मुक्त हो चुका है। अब इस बार जब उन्होंने लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र जो अभी 18 साल है, में बदलाव का संकेत दिया है, तो इसके मायने तलाशे जाने लगे हैं।

गौर करें तो अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस आदि विश्व के अधिकांश देशों में विवाह की न्यूनतम उम्र सीमा 18 साल ही है, लेकिन हमें भारतीय परिस्थितियों के मद्देनजर ही चीजों को देखना और उसके अनुरूप निर्णय लेना होगा। अब प्रश्न यह है कि आखिर किन परिस्थितियों के मद्देनजर लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र में सरकार परिवर्तन लाना चाहती है?

दैनिक जागरण

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में अभी केवल संकेत मात्र ही दिया है और इसपर बहुत कुछ खुलकर नहीं कहा, लेकिन विचार करें तो वर्तमान समय में यह कई कारणों से जरूरी लगता है कि लड़कियों के विवाह की उम्र को बढ़ाया जाए। एक कारण तो ये है कि वैवाहिक जीवन में प्रजनन सम्बन्धी दायित्व का अतिरिक्त भार लड़की पर होता है, जिसके लिए उसे शारीरिक रूप से पूरी तरह विकसित होना चाहिए। 18 वर्ष की अवस्था तक संभवतः यह विकास भारत में ठीक प्रकार से नहीं हो पा रहा है, जिसका अनुमान मातृ मृत्युदर के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। एक प्रमुख समाचार वेबसाइट पर नीति आयोग के हवाले से मौजूद 2014 से 2016 तक के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में प्रति लाख जन्म देने वाली माताओं में से 130 माताओं की मौत हो जाती है। यह आंकड़ा केवल एक अनुमान भर के लिए है, जमीन पर यह संख्या और अधिक हो सकती है।  इसके अतिरिक्त एक स्थिति यह भी दिखाई देती है कि प्रजनन के पश्चात् बहुत-सी लड़कियों को अनेक प्रकार की शारीरिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ जाता है। इन समस्याओं का एक प्रमुख कारण कम उम्र में विवाह होना ही होता है। यह एक प्रमुख कारण प्रतीत होता है, जिसके मद्देनजर सरकार लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र सीमा को बढ़ाने की दिशा में विचार कर रही है।    

लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र सीमा को बढ़ाने की जरूरत इसलिए भी महसूस होती है कि अब वो समय धीरे-धीरे अतीत की बात होने की ओर बढ़ रहा जब लड़कियों का जीवन प्रायः गृह-केन्द्रित हुआ करता था और इससे इतर उनके लिए संभावनाओं के द्वार एक हद तक बंद होते थे। आज लड़कियां सार्वजनिक जीवन के सभी कामकाजी क्षेत्रों में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, शोध-अनुसंधान, प्रशासनिक ढाँचे से लेकर देश की राजनीति और सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों तक में आज लड़कियों-महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है और इनमें से प्रत्येक क्षेत्र में उन्होंने स्वयं को सिद्ध भी किया है। ऐसी स्थिति में 18 की उम्र, जो लड़का-लड़की किसी के भी शिक्षा और कैरियर के लिए निर्णायक समय मानी जाती है, में लड़की के विवाहयोग्य होने को वैधानिक स्वीकृति मिल जाना उसपर विवाह के लिए परिवार व सगे-सम्बन्धियों के दबाव का रास्ता ही खोलता है। इस दबाव में तमाम लड़कियां शादी कर भी लेती हैं और अपेक्षित प्रगति से वंचित रह जाती हैं।

एक आंकड़े के मुताबिक़, बीते पाँच सालों में भारत में 3 करोड़ 76 लड़कियों की शादी हुई, जिनमें से 1 करोड़ 37 लाख लड़कियों की उम्र 18-19 साल थी। वहीं 75 लाख लड़कियों की शादी के वक्त उम्र 20-21 के आसपास रही थी। विशेष बात ये कि इनमें कमोबेश ग्रामीण और शहरी दोनों तरह की लड़कियां शामिल हैं। इन आंकड़ों से जमीनी स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। दरअसल तमाम प्रगति के बावजूद भी भारतीय समाज ‘लड़की पराया धन’ वाली मानसिकता से अभी पूरी तरह से मुक्त नहीं हो पाया है और इस कारण अक्सर माता-पिता न्यूनतम उम्र पार करते ही जल्दी से जल्दी लड़की की शादी कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाना चाहते हैं। यही कारण है कि उक्त आंकड़े में 18 की उम्र पार करते ही लड़कियों की शादी की बहुलता दिखाई देती है। यह जल्दबादी लड़कियों के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित करती है। ऐसे में सरकार का उनके विवाह की न्यूनतम उम्र में परिवर्तन लाए जाने के विषय में सोचना एकदम ठीक है।

माना जा रहा है कि सरकार इस न्यूनतम उम्र सीमा को 18 से बढ़ाकर 21 कर सकती है। 21 की उम्र तय होने का पहला लाभ तो ये है कि ये विवाह के वक्त स्त्री-पुरुष समानता को उम्र के धरातल पर भी सिद्ध करेगी। अभी पुरुष के लिए न्यूनतम वैवाहिक उम्र 21 साल ही है, लड़कियों की भी यही उम्र होने की स्थिति में विवाह के वक्त लड़का-लड़की की उम्र में अधिक अंतर होने की सम्भावना नहीं रहेगी।

जाहिर है, विवाह की न्यूनतम उम्र सीमा के पुनर्निर्धारण का सरकार विचार बहुत अच्छा है और इसे ठोस जमीनी अध्ययन के साथ यदि लागू किया जाता है, तो यह देश की लड़कियों के जीवन में बहुआयामी सकारात्मक परिवर्तन का वाहक बन सकता है। 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

भारतीय भाषाओं को मजबूती देने की पहल

  • पीयूष द्विवेदी भारत

गत 29 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में बहुप्रतीक्षित नयी शिक्षा नीति को मंजूरी दे दी गयी। इसके साथ ही लगभग साढ़े तीन दशक बाद देश की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की जमीन तैयार हो गयी है। नयी शिक्षा नीति को लेकर मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल से ही कवायदें चल रही थीं, लेकिन कई बार शिक्षा मंत्रालय में परिवर्तन के कारण मामला अटकता रहा था। आखिरकार अब यह काम अपने अंजाम को पहुँच गया है और देश को नयी शिक्षा नीति मिल गयी है।

यूँ तो इस शिक्षा नीति में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक कई आमूलचूल बदलाव किए गए हैं, जिनका भारतीय भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ना निश्चित है। लेकिन इसका एक प्रावधान कि कम से कम कक्षा पांच तक की पढ़ाई मातृभाषा या किसी भी भारतीय भाषा में करवाई जाएगी, की विशेष रूप से चर्चा हो रही है। इस नियम के जरिये सरकार का उद्देश्य शिक्षा को अंग्रेजी के प्रभाव से मुक्त करना तथा बच्चों को भारतीय भाषाओं से जोड़ना है। इसके अलावा संस्कृत को भी हर स्थान पर एक विकल्प के रूप में रखा जाएगा ताकि छात्र चाहें तो उसका भी अध्ययन कर सकेंगे।

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जाहिर है, इस व्यवस्था से भारतीय भाषाओं को मजबूती मिलेगी और देश के शिक्षा जगत में अंग्रेजी का दबदबा कम होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नयी शिक्षा नीति से सम्बंधित अपने एक ट्विट में इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए लिखा है, ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत पहल के तहत इसमें संस्कृत समेत भारतीय भाषाओं को बढ़ावा दिया जाएगा।’ लेकिन भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने वाली इस व्यवस्था को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। कहा जा रहा कि शिक्षा जगत के लिए ये भाषा नीति व्यावहारिक व उचित नहीं है, क्योंकि इस तरह बच्चों की अंग्रेजी कमजोर रह जाएगी जिसका नुकसान उन्हें भविष्य में रोजगार के क्षेत्रों में उठाना पड़ेगा। लेकिन ऐसा कहने वाले लोग भूल रहे हैं कि इस नियम में कहीं भी अंग्रेजी की पढ़ाई बंद करवाने की बात नहीं है, बल्कि भारतीय भाषाओं को मजबूती देने की भावना है। एक विषय के रूप में बच्चे पांचवीं तक भी अंग्रेजी पढ़ेंगे और पांचवीं के बाद यदि वे चाहें तो अंग्रेजी माध्यम से भी पढ़ सकते हैं। अतः इससे बच्चों के अंग्रेजी ज्ञान में कमजोरी की कोई संभावना नहीं है। इससे बस इतना होगा कि बच्चों का पहला और घनिष्ठ परिचय अपने देश की भाषा से होगा और शुरूआती तौर पर अंग्रेजी के अनावश्यक प्रभाव में आने से बच जाएंगे। एक भाषा के रूप में इस शिक्षा नीति का अंग्रेजी से कोई विरोध नहीं है, इसकी मंशा केवल भारतीय भाषाओं को मजबूत करने की है। 

अंग्रेजी माध्यम के समर्थन में दूसरा तर्क यह दिया जा रहा कि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान के विषयों से संबंधित उत्तम पाठ्यसामग्री का अभाव है। दरअसल आजादी के बाद भी यही तर्क देकर सरकारी व न्यायालयी कामकाज में अंग्रेजी को रहने दिया गया था। तब कहा यह गया कि जब हिंदी में इन क्षेत्रों से सम्बंधित सामग्री तैयार हो जाएगी तो अंग्रेजी को हटा दिया जाएगा, लेकिन ये चीज अबतक नहीं हो सकी है। अंग्रेजी इन क्षेत्रों से हटी तो नहीं, बल्कि और मजबूती से स्थापित हो गयी और आज ऐसी स्थिति में है कि अब उसे हटाना लगभग असंभव ही प्रतीत होने लगा है।

वैसे हिंदी भाषा में ज्ञान-विज्ञान की बेहतर पाठ्यसामग्री न होने की बात उच्च शिक्षा के संदर्भ में सही है, परन्तु प्राथमिक शिक्षा के संदर्भ में इसे एकदम से ठीक नहीं कहा जा सकता। हिंदी माध्यम विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों की पाठ्यसामग्री देखने पर पता चलता है कि काफी सहज व सरल हिंदी में विज्ञान, भूगोल, गणित आदि की विषय पुस्तकें मौजूद हैं। आज के इस तकनीक संपन्न समय में अन्य भारतीय भाषाओं में भी इस तरह की पाठ्यसामग्री तैयार करना कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है।

इसके बावजूद यदि एकबार के लिए मान लें कि हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान की अपेक्षित सामग्री नहीं है, तो उसके कारण क्या भारत को अपनी भाषाओं को यूँ ही छोड़ देना चाहिए? जो कमी है, उसे दूर करने की बजाय यथास्थिति के आगे हाथ जोड़ लेने की आजादी के बाद से चली आ रही विसंगति को क्या हमने अपनी नियति मान लिया है? अगर आजादी के बाद से ही भारतीय भाषाओं को शिक्षा क्षेत्र में मजबूती देने का यत्न किया गया होता तो आज यह समस्या होती ही नहीं, परन्तु तब नहीं हुआ तो क्या अब भी नहीं होना चाहिए। सरकार ने अब ऐसी मंशा दिखाई है, जो कि सराहनीय है। अतः इस निर्णय के विरोध का कोई मतलब नहीं है।

हाँ, सरकार को यह सुनिश्चित करने का प्रयास जरूर करना चाहिए कि भाषा संबंधी ये नियम केवल सरकारी विद्यालयों तक सीमित न रह जाए, बल्कि निजी विद्यालय भी इसे अपने यहाँ लागू करें। ऐसा होने पर ही हमारे शिक्षा तंत्र को इसका पूरा लाभ मिल पाएगा अन्यथा भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने वाला यह नियम अमीर-गरीब के बीच भाषा की एक खाई निर्मित करने का कारक सिद्ध होने लगेगा।

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

ओटीटी माध्यमों की अराजकता का संकट


  • पीयूष द्विवेदी भारत

कोरोना काल में आपदा को अवसर बनाने की बातों के बीच ओटीटी माध्यमों के लिए यह आपदा बड़ा अवसर सिद्ध हो रही है। सिनेमाघर बंद होने के कारण मनोरंजन के लिए इंटरनेट पर सक्रिय एक बड़े तबके का रुझान इन माध्यमों की तरफ हुआ है। दर्शकों के इस रुझान का पूरा लाभ लेने के लिए ओटीटी माध्यम लगातार नयी-नयी सामग्री लाने में लगे हैं। हॉटस्टार, अमेज़न प्राइम, नेटफ्लिक्स, जीफाइव, वूट, सोनी लिव आदि अनेक ओटीटी माध्यमों पर एक तरह से वेब सीरीजों और फिल्मों की बाढ़-सी आई हुई है। लेकिन सामग्री की इस अधिकता के बीच यदि उसकी गुणवत्ता पर गौर कर किया जाए तो स्पष्ट होता है कि इन ओटीटी सामग्रियों में स्वस्थ मनोरंजन की तुलना में सामाजिक-मानसिक विकृतियों का महिमामंडन और वैचारिक एजेंडों का निर्वहन अधिक है। एक वाक्य में इसे यूँ कह सकते हैं कि ओटीटी पर प्रसारित अधिकांश वेब सीरीजें पूरी तरह से भारतीयता की भावना के विरुद्ध और देश के जमीनी यथार्थ से कटी हुई हैं।
भारतीय वेब सीरीजों पर एक समग्र दृष्टि डालें तो प्रतीत होता है कि भारतीय वेब सीरीज निर्माता 2018 में आई वेब सीरीज सेक्रेड गेम्स के प्रभाव से अबतक बाहर नहीं आ पाए हैं। यही कारण है कि आपको अधिकांश भारतीय वेब सीरीजें अपराध-कथाओं पर आधारित मिलेंगीं क्योंकि ऐसी कथाओं में गाली-गलौज, हिंसा और सेक्स दृश्यों को रचने की भरपूर संभावनाएं होती हैं। साथ ही, सनातन प्रतीकों का अपमान भी ऐसी अपराध-कथाओं का हिस्सा बन चुका है। हाल में आई ‘पाताल लोक’ वेब सीरीज इसका ताजा उदाहरण है, जो ध्यान से देखने पर सेक्रेड गेम्स की लकीर को ही बढ़ाती नजर आती है।  कोरोना काल में ही प्रसारित हुई ‘रसभरी’ नामक वेब सीरीज में भी हिन्दू प्रतीकों के मखौल के साथ-साथ स्कूली छात्रों के आपसी संबंधों तथा अपनी शिक्षिका के साथ उनके संबंधों को जैसे दिखाया गया है, वो बेहद आपत्तिजनक लगता है। शिक्षिका का जो चरित्र-चित्रण इसमें हुआ है, वो देश भर की शिक्षिकाओं का अपमान करने वाला तो है ही, नारी विरोधी भी है। तिसपर एक बाल कलाकार से जैसा नृत्य इसमें कराया गया है, वो शर्मनाक और आपत्तिजनक है। हो सकता है कि ऐसी विसंगतियां समाज में यदा-कदा घटित होती हों, लेकिन एक सभ्य समाज में इनके प्रति विरोध की भावना होनी चाहिए, न कि ऐसी वेब सीरीज बनाकर इनका महिमामंडन किया जाना चाहिए। जब-तब स्त्री-अस्मिता की पैरोकार बनने वाली स्वरा भास्कर ने ऐसी वेब सीरीज में काम करके स्त्री के सम्मान को कौन-सी ऊंचाई दी है, यह उन्हें बताना चाहिए। ऐसे ही गिनवाने को फोर मोर शॉट्स प्लीज़, असुर, रक्तांचल, लाल बाजार, माफिया जैसी हाल में आई तमाम वेब सीरीजें हैं, जिनमें अश्लीलता, हिंसा, गाली-गलौज आदि अस्वास्थ्यकर तत्वों की मौजूदगी देखी जा सकती है।      
तिसपर इन वेब सीरीजों के निर्माता-निर्देशकों का तर्क होता है कि वे यथार्थ दिखा रहे हैं। एकबार के लिए यदि इसे यथार्थ मान लें तो भी यह तथ्य रेखांकनीय है कि सिनेमा कलात्मक माध्यम है, जिसकी सफलता इसमें है कि क्रूर से क्रूर यथार्थ को भी ऐसे कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाए कि दृश्य अपनी पूरी संवेदना के साथ प्रस्तुत भी हो जाए और देखने वाले को कुछ असहज या आपत्तिजनक भी न लगे। पुरानी फिल्मों में फिल्माए जाने वाले अंतरंग रुमानी दृश्य या बलात्कार के दृश्य इसका उदाहरण हैं, जिनमें संबंधित व्यक्तियों की एक झलक देने के बाद कैमरा बंद दरवाजे, बुझती लालटेन, बहती नदी, चलते पंखे, खुली खिड़की या किसी अन्य वस्तु की तरफ घूम जाता था और संगीत के माध्यम से पार्श्व में हो रही क्रिया का आभास दर्शक को दिया जाता था। हत्या आदि के दृश्यों का भी फिल्मांकन ऐसे किया जाता था कि वो देखने में वीभत्स न लगे। वास्तव में इसे ही कला कहते हैं। फिर आज के इस तकनीक संपन्न समय में ऐसे दृश्यों को फिल्माने के लिए ऐसे कुछ नए सांकेतिक तरीके क्यों नहीं इजाद किए और अपनाए जा सकते? बेशक किए जा सकते हैं, मगर नियमन के अंकुश से मुक्त जो वेब सीरीज निर्माता अभिव्यक्ति की अराजकता को ही कला मान चुके हैं, उनसे ऐसी उम्मीद करना बेमानी है।
दरअसल भारत में वेब सीरीजों को लेकर अभी रचनात्मक ढंग से बहुत अधिक कुछ काम हुआ ही नहीं है। इसलिए यहाँ वेब सीरीज की सामग्री में बहुत विविधता नहीं मिलती है। ऐसे में, आवश्यकता है कि वेब सीरीज निर्माता अपराध-कथाओं या भूत-प्रेत की कथाओं के आसान तरीकों की लकीर का फ़कीर बनने की बजाय देश के विज्ञान, इतिहास, धर्म, दर्शन, साहित्य आदि क्षेत्रों से जुड़े विषयों पर पूर्वग्रहों से मुक्त रहते हुए पूरे शोध एवं प्रामाणिकता के साथ वेब सीरीजें लाने की दिशा में काम करें। किसी वैज्ञानिक विषय को कहानी की शक्ल में ढालकर मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है, इतिहास के अनकहे किस्सों को बताया जा सकता है और साहित्य की विभूतियों पर भी वेब सीरीज लाई जा सकती है। संभावनाएं बहुत हैं, बस करने की इच्छा और नीयत चाहिए। इस तरह की चीजें आने से न केवल देश में ओटीटी माध्यमों की सामग्री की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि उनमें विविधता भी आएगी तथा उनके दर्शक-वर्ग का भी विस्तार होगा। साथ ही, ओटीटी माध्यमों की सामग्री पर इतने सवाल भी नहीं उठेंगे जिससे उनके विनियमन, जिसका संकेत सरकार दे रही है, के दायरे में आने का खतरा भी कम होगा।
ओटीटी के खिलाड़ी यदि इन बातों को देखते हुए अपनी वेब सीरीजों में यथोचित सुधार लाते हैं तो ठीक, अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब यह माध्यम भी संस्थागत निगरानी में आ जाएंगे और तब इसके धुरंधरों के पास ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन’ का रोना रोने के सिवाय और कुछ नहीं बचेगा।

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

हिंदी भाषी राज्य में हिंदी की दुर्दशा (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश में हिंदी को लेकर चलने वाली समकालीन चर्चाओं में मोटे तौर पर दो पक्ष दिखाई देते हैं। एक, जो यह मानता है कि देश में हिंदी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, क्योंकि उसे देश के अहिंदीभाषी राज्यों में पहुंचाने के लिए कुछ भी ठोस नहीं किया जा रहा। दूसरा पक्ष मानता है कि देश में हिंदी की हालत बेहतर हो रही है और अब वो दुनिया में भी अपनी धमक बढ़ाने लगी है। परन्तु, इस भाषाई विमर्श की परिधि से बाहर हिंदी की जो जमीनी स्थिति है, वो उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्य की बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में गत वर्ष भी सामने आई थी और अबकी भी आई है। बीते वर्ष राज्य की दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में लगभग दस लाख बच्चे हिंदी में अनुत्तीर्ण हो गए थे, तो माना गया कि इस वर्ष यह हो गया होगा, आगे स्थिति सुधर जाएगी। परन्तु, इसबार अभी जब परीक्षा परिणाम आए तो यह आंकड़ा जरा-सी कमी के साथ आठ लाख के करीब सामने आया। आंकड़ों में कमी को लेकर कुछ लोग यह कह सकते हैं कि स्थिति में सुधार तो आया है, परन्तु प्रश्न ये है कि देश के सबसे बड़े हिंदी भाषी राज्य में हिंदी को लेकर यह स्थिति पैदा ही क्यों हुई?  
अतः हिंदी पर होने वाली चर्चाओं में बात अहिंदीभाषी राज्यों में हिंदी के प्रसार या हिंदी की वैश्विक धमक से पहले इस बिंदु पर होनी चाहिए कि एक हिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी की शैक्षिक स्थिति ऐसी क्यों हो गयी है? हिंदी का कायाकल्प करने वाले युगांतकारी लेखक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, कथा-सम्राट प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, हरिवंश राय बच्चन जैसे हिंदी साहित्य के अनेक महान हस्ताक्षरों की जन्मभूमि यूपी में इस तरह लाखों की तादाद में छात्रों का हिंदी की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाना, निश्चित रूप से अपनी भाषा के प्रति हमारी निष्ठा और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

दरअसल हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी विषय को लेकर अभिभावकों और अध्यापकों से होते हुए छात्रों तक में यह मानसिकता गहरे पैठी हुई है कि ये आसान विषय है और इसके अध्ययन में बहुत अधिक समय व श्रम खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। इस मानसिकता के कारण न तो अध्यापक ढंग से हिंदी पढ़ाने में ध्यान देते हैं और न अभिभावक ही बच्चों को इसपर ध्यान देने के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि कोई बच्चा यदि हिंदी में अधिक रुचि ले रहा हो तो उसे अभिभावकों से हिंदी की बजाय गणित आदि विषयों के जरूरी होने और उनपर जोर लगाने की नसीहत मिल जाती है।
हिंदी विषय पर ध्यान न देने के कारण छात्र इसके अध्ययन को लेकर कोई रणनीति नहीं बना पाते। हिंदी में साहित्यिक पाठ के अलावा व्याकरण का भी एक भाग होता है, लेकिन परीक्षा के समय जल्दबाजी में छात्र अक्सर साहित्यिक पाठों के तो प्रश्नोत्तर रटकर काम चला लेते हैं, मगर व्याकरण वाले हिस्से को यथोचित समय देकर समझ नहीं पाते। हिंदी व्याकरण को लेकर छात्रों के अज्ञान और अगम्भीरता का आलम यह है कि बहुतायत छात्रों को ‘नाउन-प्रोनाउन’ तो पता होता है, मगर ‘संज्ञा-सर्वनाम’ पूछने पर बगले झाँकने लगते हैं। यही छात्र जब आगे विश्वविद्यालयी अध्ययन में पहुँचते हैं, तो वहां भी यह भाषाई अज्ञान उनके साथ बना रहता है। ‘की’ और ‘कि’ का भेद न होना, अनुस्वार के उपयोग में नासमझी, अल्पविराम और पूर्णविराम के दोष सहित वाक्य-विन्यास की समस्याएँ तक ऐसे छात्रों की लेखनी में प्रायः दृष्टिगत होती हैं। इस पूरी समस्या के मूल में हिंदी भाषा के प्रति छात्र के घर से विद्यालय तक व्याप्त अगंभीरता ही कारण है और इस अगंभीरता के पीछे अंग्रेजी माध्यम शिक्षा का बड़ा हाथ है, जिसमें सिवाय हिंदी किताब के बाकी पूरी पाठ्यसामग्री अंग्रेजी में होती है। इस स्थिति में हिंदी का हाशिये की भाषा बनकर रह जाना स्वाभाविक है।
यहाँ महात्मा गांधी का उल्लेख समीचीन होगा। गांधीजी कितने उदार थे, यह कहने की जरूरत नहीं, परंतु भाषा के मामले में वे अंग्रेजी के प्रति किसी प्रकार की उदारता के पक्ष में नहीं थे। हिन्द स्वराज में उन्होंने लिखा, ‘करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली, वह सचमुच गुलामी की नींव थी।…अंग्रेजी शिक्षण स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है।‘ इस गुलामी से मुक्ति के लिए गांधी का मत था कि भारतीय भाषाओं को चमकाना चाहिए और हिंदी तो सबको आनी चाहिए। गांधीजी यह बात उस दौर में कह रहे थे, जब देश में विदेशी शासन था, परन्तु स्वशासन स्थापित होने के बाद भी हमने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि आज अच्छी पढ़ाई का मतलब अंग्रेजी माना जा चुका है। देश में अंग्रेजी का प्रभाव ऐसा हो गया है कि कोई साधारण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी अंग्रेजी में चार बातें बोलकर लोगों के बीच अपना एक अलग औरा बना लेता है जबकि हिंदी बोलने वाले ज्ञानी व्यक्ति को भी वैसा महत्व नहीं मिलता। यह एक विदेशी भाषा की मानसिक गुलामी के अतिरिक्त और क्या है?
सवाल उठता है कि एक हिंदी भाषी देश में हिंदी में ही हर विषय की शिक्षा क्यों नहीं प्राप्त की जा सकती? तर्क दिया जाता है कि विज्ञान और अभियांत्रिकी जैसे विषयों के अध्ययन के लिए अधिकांश सामग्री अंग्रेजी में ही उपलब्ध है, इसलिए अंग्रेजी आवश्यक है। ऐसे में, सवाल उठता है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी उस सामग्री का हिंदी रूपांतरण क्यों नहीं किया जा सका? जाहिर है, इस दिशा में काम करने की इच्छाशक्ति ही हमारी सरकारों में नहीं है। ऊपर से शुरू हुई ये समस्या ही नीचे तक पहुंचकर यह स्थिति उत्पन्न कर रही है कि एक हिंदी भाषी राज्य में ही लाखों की संख्या में छात्र हिंदी में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं।

शनिवार, 20 जून 2020

संकट काल में सिनेमाई नवाचार (दैनिक जागरण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

कोरोना महामारी ने जनजीवन के सभी क्षेत्रों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। भारतीय मनोरंजन उद्योग भी इस संकट की गिरफ्त में है। मार्च के अंतिम सप्ताह से ही फिल्मों-धारावाहिकों की बंद पड़ी शूटिंग को अभी हाल ही में चालू करने की अनुमति तो प्राप्त हुई है, लेकिन इस अनुमति के साथ ऐसे अनेक दिशानिर्देश हैं, जिनका पालन करते हुए शूटिंग करना निर्माता-निर्देशकों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। पिछले दिनों यह भी खबर आई थी कि पृथ्वीराज और मैदान जैसी बड़ी फिल्मों के लिए जो भारी-भरकम सेट बने थे, उन्हें भी देखरेख के अधिक खर्च के कारण हटाया जा रहा है। यह एक अलग नुकसान है।
दूसरी तरफ सिनेमाघर भी मार्च अंत से ही बंद हैं। इस कारण जो फ़िल्में बनकर तैयार हो चुकी हैं, उनके प्रसारण पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। ट्रेड विश्लेषकों की मानें तो कोरोना के कारण उपजी इन परिस्थितियों से बॉलीवुड को तकरीबन 1300 करोड़ से 2500 करोड़ तक का नुकसान होने की संभावना है।

यह जानना भी दिलचस्प होगा कि हाल के वर्षों में अप्रैल से जून की तिमाही बॉलीवुड के लिए प्रायः काफी फायदेमंद रही है। बीते साल इन महीनों के दौरान बॉलीवुड में दो दर्जन से अधिक छोटी-बड़ी फिल्मों का प्रसारण हुआ, जिनमें दे दे प्यार दे, भारत और कबीर सिंह ने अच्छी कमाई के साथ सफलता प्राप्त की। इसी तरह 2018 में भी इस तिमाही में बॉलीवुड ने राज़ी, 102 नॉट आउट, वीरे दी वेडिंग, संजू जैसी सफल फिल्मों के जरिये खूब पैसे बनाए थे।
इस तरह 2020 से बॉलीवुड को कुछ अधिक ही उम्मीदें थीं, क्योंकि इस साल की दूसरी तिमाही को कई बड़ी फिल्मों का गवाह बनना था। 24 मार्च को प्रसारण के लिए तैयार सूर्यवंशी सहित अप्रैल-जून की तिमाही में 83, लक्ष्मी बॉम्ब, राधे जैसी बड़ी फ़िल्में आनी थीं, जिनसे बॉक्स ऑफिस पर पैसा बरसना लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन कोरोना से उपजी परिस्थितियों ने फिल्म जगत की इन उम्मीदों पर तुषारापात कर दिया।
समस्या ये भी है कि यदि कुछ समय में देश में सिनेमाघर खुल भी जाएं तो फिलहाल शारीरिक दूरी के नियम के कारण दर्शकों की संख्या आधी रखनी पड़ सकती है। दूसरी चीज कि भारतीय फ़िल्में दुनिया के अन्य देशों में होने वाले प्रसारण से भी काफी कमाई करती हैं। कई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि कोई फिल्म भारत में नहीं चलती लेकिन विदेशों में झंडा गाड़ देती है। आमिर खान की सीक्रेट सुपरस्टार इसका सशक्त उदाहरण है। ऐसे में भारतीय फिल्मों के बेहतर कारोबार के लिए देश के साथ-साथ विदेशी सिनेमाघरों का खुलना भी जरूरी है।
बहरहाल, बंद सिनेमाघरों के कारण फिल्मों के प्रसारण को लेकर व्याप्त अनिश्चितता को देखते हुए कुछ फिल्मकार अब ओटीटी पर अपनी फिल्मे लाकर खेल की एक नयी जमीन तैयार करने में लगे हैं। अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की ‘गुलाबो सिताबो’ ओटीटी पर प्रसारित हो चुकी है, तो वहीं विद्या बालन की ‘शाकुंतला देवी’ और धर्मा प्रोडक्शन की जान्हवी कपूर अभिनीत ‘गुंजन सक्सेना’ भी अलग-अलग ओटीटी माध्यमों पर आने वाली हैं। ये तीनों ही फ़िल्में अप्रैल और मई में सिनेमाघरों में प्रसारित होनी थीं, लेकिन कोरोना के कारण अब इन्हें ओटीटी पर लाया जा रहा है। हिंदी फिल्मों के अलावा 29 मई को तमिल फिल्म 'पोनमगल वंधल' ऑनलाइन प्रसारित हो चुकी है तथा लॉ, पेंगुइन, फ्रेंच बिरयानी आदि अन्य भारतीय भाषाओं की कई और फ़िल्में भी ओटीटी पर आने को तैयार हैं।
इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय सिनेमा ओटीटी प्रसारण के रूप में एक साहसिक नवाचार की तरफ बढ़ चला है, लेकिन इसे लेकर कुछ प्रश्न भी उठ रहे हैं कि इस नवाचार का भविष्य क्या है? क्या ओटीटी माध्यमों पर फ़िल्में आने से सिनेमाघरों को दूरगामी नुकसान हो सकता है? क्या फिल्मों के प्रसारण के स्वरूप पर भी इसका कोई व्यापक व दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है?
इस संदर्भ में गत वर्ष आई काउंटरपॉइंट रिसर्च इंडिया की एक रिपोर्ट उल्लेखनीय होगी जिसके मुताबिक़, भारत के कुल ओटीटी उपभोक्ताओं में से 89 प्रतिशत उपभोक्ता 35 साल से कम के युवा हैं। इनमें से 55 प्रतिशत उपभोक्ता देश के पांच प्रमुख महानगरों में हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि ओटीटी माध्यम अपनी तमाम लोकप्रियता के बावजूद अभी भारत की शहरी युवा आबादी तक सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ऑनलाइन मनोरंजन के लिए लोग अभी भी प्रायः मुफ्त माध्यम यूट्यूब पर ही निर्भर हैं। साथ ही, फिल्मों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भी युवा सिनेमाघर का रुख करने में पीछे नहीं रहते। ऐसे में, कहना गलत नहीं होगा कि ओटीटी से सिनेमाघर को कोई बड़ा नुकसान पहुँचना तो दूर की बात है, फिलहाल दोनों के बीच कोई मुकाबला भी होने की बात भी नहीं कही जा सकती।
सब बातों के बाद एक पक्ष यह भी है कि बड़े परदे पर भीड़ के बीच बैठकर नायक-नायिका की अदाओं पर उछलते और सीटी बजाते हुए फिल्म देखने के अभ्यस्त बहुसंख्यक भारतीय दर्शक ओटीटी माध्यमों के टीवी-लैपटॉप-मोबाइल जैसे छोटे परदों पर फिल्म देखने में शायद ही पूर्ववत रुचि ले पाएं। सो बहुत-से दर्शक तो इस मनोविज्ञान के कारण भी ओटीटी पर खर्च कर तुरंत फिल्म नहीं देखेंगे।
हालांकि कयास लगाए जा रहे कि लक्ष्मी बॉम्ब, भुज द प्राइड ऑफ़ इंडिया जैसी कुछ बड़ी फ़िल्में भी ओटीटी पर आ सकती हैं। यदि ऐसा होता है, तो भी ये केवल बड़ी फिल्मों के लिए विवशता का एक अस्थायी विकल्प ही होगा, फिल्म प्रसारण की व्यवस्था पर इसका कोई दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की उम्मीद नहीं है। समग्रतः छोटी फिल्मों के लिए ओटीटी दीर्घकालिक महत्व का माध्यम सिद्ध हो सकता है, लेकिन बड़ी फिल्मों के लिए फिलहाल इसमें अधिक संभावना देखना और इसे सिनेमाघर के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने लगना जल्दबाजी होगी।

शुक्रवार, 29 मई 2020

ऑनलाइन परीक्षा की कठिनाई (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

कोविड-19 वैश्विक महामारी के प्रकोप ने जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। शिक्षा भी इससे अछूती नहीं है। कोविड के दौर में शिक्षा के क्षेत्र में एक तरफ जहां विविध चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं, वहीं उन चुनौतियों से निपटने के लिए विभिन्न प्रयोग भी हो रहे हैं। प्राथमिक व माध्यमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक शिक्षण संस्थानों द्वारा ऑनलाइन पढ़ाई करवाई जा रही है।
शहर तो शहर, गांवों में भी यह ऑनलाइन शिक्षण की यह व्यवस्था कमोबेश देखने-सुनने में आने लगी है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से लेकर संचार व संपर्क के अन्य माध्यमों तक से अध्यापक घर बैठे छात्रों को पढ़ाने में लगे हैं। इन शैक्षिक नवाचारों के बीच ही पिछले दिनों देश के प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा गत 14 मई को एक अधिसूचना जारी की गयी जिसका सार यह था कि कोविड-19 द्वारा पैदा परिस्थितियों के कारण स्नातक और परास्नातक कर रहे अंतिम वर्ष या सेमेस्टर के छात्रों के लिए विश्वविद्यालय ओपन बुक मोड में परीक्षा करवाने जा रहा है। 

इस तरीके से परीक्षा में यह होगा कि छात्रों को तय प्रारूप के अंतर्गत प्रश्न भेजे जाएंगे जिन्हें उनको एक निर्धारित समय के भीतर लिखकर ऑनलाइन भेजना होगा। इस विषय में डीयू के डीन एग्जामिनेशन की तरफ से जारी जानकारी के मुताबिक, प्रत्येक प्रश्न पत्र के लिए दो घंटे का समय निर्धारित किया जाएगा, कुल छह प्रश्न होंगे, जिसमें से विद्यार्थियों को चार प्रश्न हल करने होंगे और एक घंटे के अंदर उसे वापस भेज देना होगा। विश्वविद्यालय प्रशासन की इस घोषणा के बाद से ही डीयू के छात्र संघ तथा दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ एकसाथ इसके विरोध में खड़े हैं। इस घोषणा के बाद ट्विटर पर ‘डीयूअगेंस्टऑनलाइनएग्जाम’ हैश टैग के साथ हजारों की तादाद में विद्यार्थियों ने ट्विट कर इस निर्णय के प्रति अपना विरोध व्यक्त किया है। 
प्रश्न यह है कि आखिर विश्वविद्यालय के इस निर्णय का इतना विरोध क्यों हो रहा है? गौर करें तो इस विरोध के पीछे कारणों की लम्बी फेहरिश्त नजर आती है। दरअसल दिल्ली विश्वविद्यालय जिस प्रकार की परीक्षा लेने की तैयारी कर रहा, उसके लिए छात्रों के पास कम्यूटर-लैपटॉप या स्मार्टफोन के साथ-साथ अच्छे इंटरनेट की उपलब्धता भी जरूरी है। ऐसे में जिन छात्रों के पास ये तकनीकी संसाधन नहीं होंगे, वे कैसे इस परीक्षा में भाग ले पाएंगे? वो कौन-सा तंत्र है जिसने यह सुनिश्चित कर लिया कि छात्रों के पास लैपटॉप-स्मार्टफोन जैसे संसाधन तथा बढ़िया इंटरनेट भी उपलब्ध होगा? क्या डीयू प्रशासन की तरफ से कभी अपने सभी छात्रों को यह संसाधन उपलब्ध कराए गए थे? जवाब है, नहीं. जब ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो अब इस संकटकाल में अचानक विश्वविद्यालय प्रशासन किस आधार पर छात्रों से ऑनलाइन परीक्षा देने की अपेक्षा कर रहा है? इतना ही नहीं, ऑनलाइन परीक्षा का जो प्रारूप विश्वविद्यालय ने तय किया है, उसमें न्याय की भावना भी कम ही दिखती है। क्या यह संभव नहीं कि कोई कम पढ़ा छात्र इस ओपन बुक परीक्षा में किताब की सहायता से बेहतर कर जाए जबकि कोई खूब पढ़ा छात्र तकनीकी संसाधनों के अभाव में परीक्षा दे ही न पाए। जाहिर है, ऑनलाइन परीक्षा का यह प्रारूप फिलहाल किसी भी ढंग से उचित व व्यावहारिक नहीं प्रतीत होता।
वैसे भी, सवाल ये है कि जब देश के कई बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों ने अपनी परीक्षा आदि गतिविधियाँ आगे बढ़ा दी हैं; यहाँ तक कि यूजीसी और संघ लोकसेवा आयोग ने अपनी परीक्षाओं का समय भी आगे कर दिया है, फिर  दिल्ली विश्वविद्यालय को परीक्षाएं कराने की इतनी हड़बड़ी क्यों है? कहीं ऐसा तो नहीं कि केवल अपने सत्र को नियमित और अबाध रखने की मंशा के मोह में डीयू प्रशासन ने तमाम छात्रों के लिए परेशानी पैदा करने वाला यह अविवेकपूर्ण निर्णय ले लिया है।
यह सही है कि हाल के वर्षों में भारत में तकनीकी उपकरणों का प्रयोग बढ़ा है और स्मार्टफोन भी लोगों के हाथ में दिखने लगे हैं, लेकिन बावजूद इसके आंकड़ों की मानें तो 135 करोड़ की आबादी वाले इस देश में स्मार्टफोन चलाने वालो की संख्या मात्र 40 करोड़ है। पूरी संभावना है कि कम्प्यूटर और लैपटॉप जैसे संसाधन जो सामान्यतः स्मार्टफोन से महंगे होते हैं, का उपयोग करने वालों की संख्या इससे कम ही होगी। इसी तरह इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या भी फिलहाल लगभग 55 करोड़ के आसपास है। इन आंकड़ों का सार यही है कि देश की आबादी के अनुपात में उक्त तकनीकी संसाधनों से संपन्न लोग आधे भी नहीं हैं, ऐसी स्थिति में फिलहाल देश में ऑनलाइन परीक्षा जैसी चीज पर बिना पुख्ता तैयारी के सोचा भी नहीं जा सकता।
अगर कोई शिक्षण संस्थान इस दिशा में बढ़ना चाहता है तो पहले उसे इसके लिए छात्रों को तैयार करना होगा तभी उसके द्वारा किया गया ऐसा कोई प्रयास तर्कसंगत सिद्ध होगा अन्यथा इससे केवल छात्रों की मुश्किलें ही बढ़ेंगी। अतः उचित होगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय फिलहाल ऑनलाइन परीक्षा आयोजित कर छात्रों की मुश्किलें न बढ़ाए बल्कि सत्र की तारीख आगे बढ़ाकर चीजें ठीक होने की थोड़ी और प्रतीक्षा करे। इसके अलावा यदि विश्वविद्यालय चाहे तो भविष्य में ऑनलाइन परीक्षा कराने के लिए एक बेहतर व्यवस्था, जिसमें छात्रों का हित सुरक्षित रहे, विकसित करने की दिशा में भी काम कर सकता है।  

शनिवार, 16 मई 2020

संकट में संबल बनी रामायण [दैनिक जागरण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

24 मार्च को देशव्यापी लॉक डाउन की घोषणा होने के बाद 28 मार्च से दूरदर्शन पर नब्बे के दशक के लोकप्रिय धारावाहिक रामायण का पुनर्प्रसारण शुरू हुआ। 18 अप्रैल को इसका अंतिम भाग प्रसारित होने के बाद उत्तर रामायण के रूप में आगे की कथा शुरू हुई जिसका समापन दो मई को हो चुका है। 28 मार्च से 2 मई के बीच की इस कालावधि में मनोरंजन कार्यक्रमों की श्रेणी में रामायण ने दर्शकों की संख्या के सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। दूरदर्शन का दावा है कि न केवल भारत अपितु विश्व का यह सर्वाधिक देखा जाना मनोरंजन कार्यक्रम बन गया है। हालांकि एक दावा यह भी सामने आ रहा कि 1983 के एक अमेरिकी वॉर शो का अंतिम भाग अब भी सबसे ज्यादा देखा जाने वाला कार्यक्रम है। यदि इस दावे में सत्यता है तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बीते लगभग तीन दशक में रामायण विश्व का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला कार्यक्रम बन चुका है।

इस कीर्तिमान से अलग सोशल मीडिया पर भी हर दिन रामायण के प्रसारण के समय व उसके पश्चात् भी उस दिन की कहानी चर्चा में बनी रही। ये तथ्य लोकमानस में रामकथा के प्रति उपस्थित श्रद्धा और विश्वास को ही प्रकट करते हैं। परन्तु इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि देश-दुनिया में इस स्तर पर लोकप्रिय हो रही रामायण के प्रसारण को लेकर देश के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी व्याकुल हो उठे। एक पत्रकार महोदय यह पूछते दिखे कि किन लोगों की मांग पर यह प्रसारण शुरू किया गया है, तो एक वरिष्ठ पत्रकार महोदया लोगों के घर में खाना न होने की बात कहते हुए इसके प्रसारण पर बेमतलब ही सवाल उठाती नजर आईं। एक वकील महोदय ने तो इसकी तुलना अफीम से ही कर डाली।
सवाल है कि आखिर देश के ये बुद्धिजीवी लोग भारतीय संस्कृति का प्राण मानी जाने वाली रामकथा के प्रति इतनी घृणा क्यों रखते हैं? देश में कोई गरीब भूखा न रहे, यह सुनिश्चित करना निःसंदेह सरकार की जिम्मेदारी है और इसके लिए वो नीतिगत स्तर पर लगातार काम कर रही है, परन्तु इसके आधार पर रामायण जैसे कार्यक्रम के प्रसारण को प्रश्नांकित करने का क्या अर्थ है? क्या रामायण का प्रसारण न होने से गरीबों के घर में खाना पहुँच जाता? वस्तुतः प्रतीत होता है कि हमारे ये बुद्धिजीवी ‘विरोध के लिए विरोध’ के अपने एजेंडे पर चलते हुए बौद्धिक दिवालियेपन की उस अवस्था में पहुँच गए हैं जहां उन्हें उचित-अनुचित का भेद तक समझ नहीं आ रहा। यदि ऐसा न होता तो वे आज के इस संकटपूर्ण और अत्यंत कठिन समय में भारतीय समाज के लिए मानसिक संबल का साधन सिद्ध होने वाले रामायण पर इस तरह के अनर्गल प्रश्न नहीं उठाते।
इसी संदर्भ में विचारणीय है कि आखिर वो क्या कारण है कि जो रामायण आज से तक़रीबन तीन दशक पूर्व बनी थी और वर्तमान समय की तुलना में तकनीकी भव्यता की दृष्टि से काफी पीछे है तथा अनेक बार लोगों द्वारा देखी भी जा चुकी है, उसका जब पुनर्प्रसारण होता है तो दर्शकों की संख्या का कीर्तिमान बना देती है और उसके सामने आज के बड़े-बड़े उत्कृष्ट तकनीकी साज-सज्जा वाले कार्यक्रम पीछे छूट जाते है।
देखा जाए तो आज जो संघर्ष हमारे समक्ष उपस्थित है, उसमें तन के साथ-साथ मन की मजबूती होना भी आवश्यक है। मन की मजबूती से मुख्य तात्पर्य धैर्य और सकारात्मकता को लेकर है। यह लड़ाई कितनी लम्बी चलेगी और कैसी-कैसी चुनौतियाँ सामने आएंगीं, इसका अभी किसीको स्पष्ट ज्ञान नहीं है, ऐसे में यही उपाय बचता है कि मन में सकारात्मकता और धैर्य धारण करके संघर्ष जारी रखा जाए। इस पृष्ठभूमि में रामायण इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि ये भारतीय संस्कृति का वो ऐतिहासिक आख्यान है जिसकी कथा हमें जीवन की किसी भी सम-विषम परिस्थिति में बिना घबड़ाए उससे जूझने का सन्देश देती है।  
इस कथा के नायक राम, जो आज भारत और उससे बाहर भी असंख्य जनों के लिए पूज्य हैं, अपने पूरे जीवन में कठिन से कठिनतर संघर्षों से दो-चार होते रहे, परन्तु कभी भी उन्होंने धैर्य और सकारात्मकता का पूरी तरह से त्याग नहीं किया और हताश होकर नहीं बैठे बल्कि अवसाद उत्पन्न करने वाली हर परिस्थिति को अवसर में परिणत कर वे आगे बढ़ते गए और मानव जीवन का एक आदर्श प्रस्तुत किया। केवल राम ही नहीं, रामकथा के अन्य बहुत से पात्र भी इसी सकारात्मकता का सन्देश देते हैं। रामकथा ही नहीं, शिव-कृष्ण जैसे हमारे और भी कई ऐतिहासिक पात्रों का जीवन-चरित्र भी इसी संदेश का प्रसारक है। यही कारण है कि दूरदर्शन पर धार्मिक कार्यक्रमों के साथ-साथ अन्य चैनलों पर कृष्ण, शिव, हनुमान आदि की कथाओं का प्रसारण भी इस संकट के समय लगातार चल रहा है और अच्छी संख्या में लोगों द्वारा देखा भी जा रहा है।   
वस्तुतः भारतीय संस्कृति अपने मूल रूप में ही सकारात्मकता की पोषक रही है और संकटकाल में उसकी सकारात्मक ऊर्जा और प्रखर हो उठती है। यही कारण है कि हिंदी साहित्य के मध्यकाल में विदेशी आक्रांताओं से त्रस्त भारतीय समाज में वो भक्ति आंदोलन फूटता है जो हिंदी साहित्य के स्वर्णयुग का निर्माण कर जाता है।
अपने दैनिक जीवन में ‘सर्वे भवंतु सुखिना, सर्वे संतु निरामया’ के रूप में विश्व कल्याण की कामना का भाव भारतीय संस्कृति की सकारात्मक और मंगलकामी दृष्टि का ही द्योतक है। यही कारण है कि आज के इस कठिन समय में जब लोगों के हताशा और अवसाद में जाने का खतरा लगातार बना हुआ है, ऐसे में भारतीय संस्कृति की रामायण-महाभारत जैसी महान कथाओं का प्रसारण उन्हें संबल दे रहा है। हो न हों, यही वो तत्व हैं जो हमारी संस्कृति को काल की सीमा से परे सनातन बनाते हैं।