रविवार, 20 नवंबर 2016

तम्बाकू के धीमे ज़हर से मुक्ति कब [जनसत्ता में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
ये सर्वस्वीकार्य है कि जिस राष्ट्र के लोग जितना अधिक स्वस्थ और सुदृढ़ रहेंगे, वो राष्ट्र उतनी ही तीव्रता से प्रगति को प्राप्त होगा । लोगों के स्वस्थ  रहने के लिए मुख्य रूप से तीन चीजें आवश्यक होती हैं । पौष्टिक व पर्याप्त आहार, समुचित चिकित्सा व्यवस्था और नुकसानदेह चीजों से दूरी । इनमे से प्रथम दो चीजों की समुचित व्यवस्था करने का दायित्व तो मुख्यतः सरकार का होता है, पर अंतिम बात के लिए सरकार के साथ-साथ देश के नागरिकों को भी सजग और सचेत रहने की जरूरत होती है । नागरिकों के लिए आवश्यक होता है कि वो ऐसे अपशिष्ट  तत्वों के सेवन से बचें जिनका उनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो । ऐसे ही अपशिष्ट  तत्वों में से एक है तम्बाकू । दरअसल, तम्बाकू एक मादक और उत्तेजक पदार्थ है । दुनिया में सर्वाधिक तम्बाकू उत्पादन के मामले में अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर भारत का ही नाम आता है । पर यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने उत्पादन के एक बड़े हिस्से की खपत नशाखोरी के कारण देश में ही हो जाती है और निर्यात के लिए काफी कम तम्बाकू बचता है । कोई गुटके, खैनी आदि के रूप में तम्बाकू चबाता है तो कोई इसे बीड़ी-सिगरेट के रूप में लेता है । हर नशे की ही तरह तम्बाकू का भी व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ता है । यह व्यक्ति के स्वास्थ्य पर धीमे जहर की तरह असर करता है । तम्बाकू देश के लोगों के स्वास्थ्य को किस कदर प्रभावित कर रहा है, इसकी झलक हमें स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारीर एपोर्ट को देखने पर मिल जाती है । स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा डब्ल्यूएचओ, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, हीलिस सेक्षारिया इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ, सेंटर फोर डिजीज कंट्रोल एवं प्रीवेन्शन और अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर देश में तंबाकू चबाने के प्रभाव पर देश की पहली समग्र रिपोर्ट जारी की है ।  रिपोर्ट कहती है कि मुंह और गले के कैंसर को भारत में एक अहम स्वास्थ्य समस्या करार देते हुए हर साल पुरूषों में करीब 85,000 नये मामले और महिलाओं में 34,000 नये मामले सामने आते हैं जिनमें 90 फीसदी मामलों में किसी न किसी रूप में तंबाकू का इस्तेमाल है तथा आधे से अधिक मामले की वजह तंबाकू चबाना है । इसी रिपोर्ट में एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है कि देश में  15 साल और उससे अधिक उम्र की करीब सात करोड़ महिलाएं तंबाकू चबाती हैं और उसकी एक अहम वजह मेहनत वाले काम के दौरान भूख को दबाने की इच्छा है । यह स्थिति हमें सोचने पर विवश करती है ।
 
एक अन्य आंकड़े की माने तो देश में हर साल लगभग दस लाख मौतें तम्बाकूजनित बीमारियों के कारण होती हैं तथा ६.१ प्रतिशत लोग तम्बाकू के सेवन के कारण तमाम तरह की बीमारियों से ग्रस्त अस्वस्थ जीवन जीने को मजबूर होते हैं । पर बावजूद इन सबके अगर भारत में तम्बाकू उत्पादन पूरी तरह से वैध है तो इसके लिए कारण है कि इसके व्यापार से भारत सरकार को राजस्व का भारी लाभ होता है । इस भारी राजस्व लाभ के कारण ही भारत सरकार द्वारा जहाँ एक तरफ तम्बाकू की खेती को वैध घोषित किया गया है, वहीँ दूसरी तरफ तम्बाकू के नशे के उन्मूलन के लिए तमाम कार्यक्रम व क़ानून भी बनाए गए हैं । इसी संबंध में सन २००८ में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान को वर्जित करने सम्बन्धी क़ानून बनाया गया, पर इस क़ानून का कोई बहुत असर हुआ हो, ऐसा नहीं कह सकते । इसके अतिरिक्त विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा २००२ में तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्र की स्थापना भी की गई जिसका उद्देश्य लोगों को तम्बाकू छोड़ने के लिए प्रेरित करना व तम्बाकू छोड़ने के उपाय बताना था । धीरे-धीरे ऐसे और भी कई केन्द्र खोले गए और इन्होने काफी अच्छे ढंग से अपना काम भी किया । अब तो टीवी आदि माध्यमों पर तम्बाकू के विषय में वैधानिक चेतावनी को अनिवार्य कर दिया गया है, जिसका पालन भी हो रहा है तम्बाकू नशा उन्मूलन के लिए सरकार के इन कार्यक्रमों व कानूनों आदि के कारण आज भारत में तम्बाकू का नशा करने वाले लोगों की संख्या में पहले की अपेक्षा काफी कमी आयी है, पर बावजूद इसके अब भी देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा तम्बाकू के नशे की चपेट में है ।
 
जनसत्ता
एक आंकड़े के मुताबिक देश में १५ साल से ऊपर की आयु के लगभग ३५ प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में तम्बाकू का सेवन करते हैं । इनमे से २१ प्रतिशत लोग गुटका आदि के रूप में तम्बाकू चबाते हैं, जबकि बाकी लोग बीड़ी-सिगरेट आदि के द्वारा तम्बाकू का सेवन करते हैं । हालांकि बीड़ी-सिगरेट का सेवन करने वाले लोगों की संख्या में पहले की तुलना में काफी गिरावट आयी है, पर फिर भी आज देश के लगभग २६ प्रतिशत लोग बीड़ी-सिगरेट आदि का नशा  करते हैं जिनमे कि ३ प्रतिशत महिलाऐं भी हैं । शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा तम्बाकू का अधिक सेवन  ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाता है । ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ ५७ प्रतिशत पुरुष तम्बाकू का सेवन करते हैं, वहीँ १९ प्रतिशत महिलाऐं भी तम्बाकू का नशा करती हैं । अगर विचार करें तो शहरी लोगों की अपेक्षा ग्रामीण लोगों के तम्बाकू   का अधिक सेवन करने के लिए मुख्य कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य नशा सामग्रियों की अपेक्षा इसका सहजता से उपलब्ध हो जाना है । अब चूंकि, शहरी क्षेत्रों में तो नशे के लिए लोगों को विभिन्न प्रकार की शराबों समेत कई तरह की ड्रग्स आदि बड़े आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, इसलिए वो तम्बाकू को अधिक तवज्जो नही देते हैं । जबकि ग्रामीण इलाकों में तम्बाकू ही एकमात्र ऐसी सामग्री है जो नशे के लिए आसानी से और सस्ते में मिल सकती है । ग्रामीण इलाकों के बड़े बाजारों से लेकर पंसेरी की दुकान तक हर जगह तम्बाकू मौजूद होती है । तम्बाकू की इस सहज उपलब्धता के कारण ही ग्रामीण लोगों में तम्बाकू का नशा शहरी लोगों की अपेक्षा अधिक पाया जाता है । पर इन सब बातों के ठीक उलट भारत सरकार के तम्बाकू नशा उन्मूलन सम्बन्धी कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा अधिकाधिक रूप से शहरों में चलाए जाते हैं । साफ़ है कि सरकार द्वारा इस समस्या का ठीक ढंग से अध्ययन किए बिना ही समाधान बनाया और लागू किया गया है, जिससे आज स्थिति ये हो गई है कि रोग कहीं और है और निदान कहीं  और हो रहा है । ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि क्या ग्रामीण क्षेत्रों पर सरकार  के इस अनदेखेपन के होते हुए इस देश का पूरी तरह से तम्बाकू के नशे से मुक्त हो पाना संभव है ?
 
एक तरफ तम्बाकू उद्योग से जहाँ देश को राजस्व की भारी आमद होती है, वही इससे बड़ी तादाद में लोगों को रोजगार भी मिला है । सरकार तम्बाकू उद्योग के जरिये राजस्व की कितनी उम्मीद पाले है, इसको इसीसे समझा जा सकता है कि अधिकाधिक बार बजट में तम्बाकू की कीमतों में वृद्धि की जाती है । सरकार को ये पता है कि ये कितना भी महंगा हो जाय, जिन्हें इसकी लत है वो इसका सेवन करेंगे ही । हालांकि इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि बहुत लोग जो इसके कम लती होते हैं, महंगे होने के कारण इसका सेवन छोड़ भी देते हैं । लेकिन, क्या इस तरह से पूरी तरह से क्या तम्बाकू नशा उन्मूलन संभव होगा, यह बड़ा सवाल है । वैसे, तम्बाकू से  मुक्ति के लिए जल्दबाजी और उत्तेजना में इसकी खेती पर प्रतिबन्ध लगाने की बात करना भी किसी लिहाज से उचित नही है । लेकिन सरकार को इस बात का एकबार पुनः अवश्य अध्ययन करना चाहिए कि तम्बाकू की खेती से होने वाले राजस्व लाभ और उसके नशे के रोकथाम पर होने वाले खर्च के बीच कितना अंतर है । इसके बाद जो तथ्य सामने आएं उनके आधार पर ये तय होना चाहिए  कि तम्बाकू की खेती कितनी लाभकारी है और कितनी नुकसानदेह तथा इसपर प्रतिबन्ध लगना चाहिए या नही । इसके अलावा सरकार को चाहिए कि वो अपने  तम्बाकू नशा मुक्ति कार्यक्रमों का गांवों तक विस्तार भी करे जिससे ग्रामीण लोगों को भी तम्बाकू से मुक्त होने में सहायता मिले । अगर सरकार द्वारा इन सब चीजों पर सही ढंग से अमल किया जाए तो इसमे कोई दोराय नही कि आने वाले समय में हम तम्बाकू के नशे से काफी हद तक मुक्त राष्ट्र होंगे ।

सोमवार, 7 नवंबर 2016

वन रैंक वन पेंशन का इतिहास जानें राहुल गाँधी [दैनिक जागरण राष्ट्रीय संक्सरण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
वन रैंक वन पेंशन का मामला एकबार फिर गरमाया हुआ है। दरअसल गत दिनों एक पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल ने कथित तौर पर वन रैंक वन पेंशन की अनियमितताओं के कारण आत्महत्या कर ली। बस इसके बाद से ही इस मामले पर सियासी महकमे में सरगर्मी पैदा हो गई है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल वगैरह तमाम नेता मृतक सैनिक के परिजनों से मिलने के नाम पर संवेदना की सियासत के दाव आजमाने अस्पताल पहुँच गए। लेकिन, पुलिस ने इनमें से किसीको भी अंदर नहीं जाने दिया और गिरफ्तारी आदि करके बाहर ही रखा गया। इसपर दुनिया भर का हो-हल्ला मचाया गया, मगर विपक्षी दलों की सियासी रोटियाँ नहीं सिक सकीं।  
 
वैसे, इस आत्महत्या को लेकर कई तरह के सवाल हैं। अब जैसा कि राम किशन के साथियों की मानें तो वे वन रैंक वन पेंशन की अनियमितताओं पर एक पत्र लेकर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर से मिलने जा रहे थे और इस दौरान  रास्ते में ही पार्क में बैठे-बैठे जहर खाकर आत्महत्या कर लिए। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वे रक्षा मंत्री से मिलने जा रहे थे, तो अचानक रास्ते ऐसा क्या हो गया कि उन्हें आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा ? और उनके साथियों ने ऐसा करने उन्हें रोका क्यों नहीं ? यह भी बात सामने आई है कि उन्होंने आत्महत्या से पहले अपने बेटे को फोन किया था, जिसकी ऑडियो अब सामने आई है. उस ऑडियो में  वे बेटे से अपने ज़हर खाने की बात कह रहे हैं। सवाल यह कि ये कैसा बेटा है जिसने अपने पिता की कॉल रिकॉर्डिंग पर लगाईं और उनके ज़हर खाने की बात जानने पर भी चुपचाप सब सुनता रहा ? निश्चित तौर पर ये सभी सवाल न केवल इस मामले में अनेक संशयों को जन्म देते हैं बल्कि किसी गहरी साजिश की तरफ भी इशारा करते हैं। क्योंकि, यह यकीन करना मुश्किल है कि हमारी बहादुर भारतीय सेना का कोई जवान ख़ुदकुशी जैसा कायरतापूर्ण  निर्णय लेगा। वो भी तब जब वन रैंक वन पेंशन लागू है, बस कुछ छोटी-मोटी दिक्कतें हैं जिन्हें बातचीत के जरिये दूर किया जा सकता है। ऐसे में, जरूरत है कि मामले की जांच हो और सच्चाई सामने आए।  
 
दैनिक जागरण
इसी क्रम में यदि वन रैंक-वन पेंशन मामले को समझने का प्रयत्न करें तो इसका अर्थ यह है कि अलग-अलग समय पर सेवानिवृत हुए एक ही रैंक के जवानों को बराबर पेंशन दी जाय या उनकी पेंशन में अधिक अंतर न रहे। अभी स्थिति यह है कि जो सैन्य अधिकारी या सैनिक जब सेवानिवृत हुए हैं, उन्हें पेंशन के तत्कालीन नियमों के हिसाब से पेंशन मिलती है। अब चूंकि सेना के पेंशन के नियम कई बार बदले हैं। ब्रिटिश शासन के समय फौजियों की पेंशन उनकी तनख्वाह की ८३ प्रतिशत थी जिसे आज़ादी के बाद सन १९५७ में मौजूदा कांग्रेस  सरकार ने कम कर दिया और इसके मद से सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों जिन्हें तब वेतन का ३३ फीसदी पेंशन मिलती थी, की पेंशन को बढ़ा दिया। आगे १९७१ की लड़ाई में हमारे सैनिकों की बहादुरी का इनाम इंदिरा गाँधी ने सन १९७३ में उनकी 'वन रैंक वन पेंशन' ख़त्म करके दिया। सिविल कर्मियों की पेंशन बढ़ाई गई और इसकी भरपाई सेना की पेंशन काटकर की गई। फिर आए इंदिरा-पुत्र राजीव गाँधी जिन्होंने सेना की बेसिक पे में भी कमी कर दी, जिससे सैनिकों की पेंशन और भी कम हो गई। इन्हीं चीजों के बाद हमारे जवानों को आभास हुआ कि ये लोग सिर्फ मुंह के सेना प्रेमी हैं और तभीसे वन रैंक वन पेंशन का मामला उठने लगा। इसे कांग्रेस की सरकारें समिति गठन कर टालती रहीं।
 
सन १९७१ में सेना के पेंशन के नियम यूँ थे कि सैनिक को उसके वेतन का ७५ प्रतिशत जबकि सैन्य अधिकारियों को ५० फीसदी पेंशन मिलती थी जिसे बाद में तीसरे वेतन आयोग ने घटाकर ५० फीसदी कर दिया। इस तरह सन १९७१ में सेवानिवृत हुए फौजियों तथा उसके बाद सेवानिवृत हुए फौजियों की पेंशन में भारी अंतर है। आगे भी जब-तब पेंशन के नियम बदले और ये अंतर भी आता गया। गौर करें तो सन २००५ और २००६ के में सेवानिव्रूत हुए फौजियों की पेंशनों के बीच लगभग १५००० रूपये तक का अंतर आ गया। स्थिति यह है कि २००६ के बाद सेवानिवृत कर्नल २००६ से पूर्व सेवानिवृत अपने से उच्च रैंक के मेजर जनरल से अधिक पेंशन पाता है। इन विसंगतियों के मद्देनज़र फौजियों की मांग थी कि सेना में एक रैंक-एक पेंशन की व्यवस्था कर दी जाय जिसके तहत एक रैंक के अलग-अलग समय पर सेवानिवृत दो फौजियों की पेंशनों में कोई अंतर न हो। मोदी सरकार ने ये लागू भी किया है, लेकिन कुछेक बिन्दुओं पर असहमति थी, जिसपर सरकार ने कदम उठाने का आश्वासन दिया है। दरअसल सरकार ने हर पांच साल में ओआरओपी के तहत पेंशन की समीक्षा का प्रावधान रखा है, जबकि सैनिक चाहते हैं कि ये सालाना स्तर पर हो, जिससे पेंशन में निरंतर रूप से समानता बनी रहे। सरकार ने ओआरओपी के २०१३ को आधार वर्ष मन है, जबकि सैनिकों की मांग है कि आधार वर्ष २०१५ को बनाया जाय, जिससे उन्हें अधिक लाभ मिल सके। अभी तक सिर्फ उसी जवान को पेंशन का लाभ मिलता है, जो पंद्रह साल तक सेवा दिया हो। पूर्व सैनिक चाहते हैं कि पंद्रह वर्ष से कम समय में मेडिकल या किसी अन्य कारण से निकाले जाने वाले जवानों को भी पेंशन का लाभ मिले। बस इसी तरह की कुछेक और मांगें हैं, जो पूर्व सैनिक कर रहे हैं। निस्संदेह सरकार को यथाशीघ्र इन मांगों को पूरा करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए।  लेकिन, आज जो राहुल गांधी अस्पताल के बाहर नौटंकी कर रहे हैं, उन्हें चाहिए कि मोदी सरकार से सवाल पूछने की बजाय पहले अपनी महान मम्मी जी से जाकर पूछें कि माँ, दादी और पापा ने हमारे जवानों के साथ ऐसा क्यों किया था ? और उन्होंने जो किया सो किया, दस साल तो सत्ता में राहुल गांधी और उनकी मम्मी की ही चलती रही, फिर उन्होंने सैनिकों की इस समस्या को क्यों नहीं समझा ? आज राम किशन ग्रेवाल की आत्महत्या पर मौजूदा सरकार पर फिजूल आरोप लगाकर निशान साधने वाले कांग्रेसी अगर एकबार अपनी गिरेबान में झांक लें तो शर्म से चेहरा लटक जाएगा।

बुधवार, 2 नवंबर 2016

जीत के जश्न के साथ हॉकी की समस्याओं को भी देखा जाए [राज एक्सप्रेस में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
गत 30 अक्टूबर को एक तरफ देश दीपावली के उत्सव में डूबा हुआ था, तो दूसरी तरफ देश के राष्ट्रीय खेल हॉकी के खिलाड़ी एशियन चैम्पियंस ट्राफी में अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के साथ टूर्नामेंट का निर्णायक मुकाबला खेलने में लगे थे। देश की नज़रें उधर भी थीं और इतंजार भी था कि कब हॉकी टीम की तरफ से जीत के रूप में दीपावली का उपहार दिया जाता है। भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले ज्यादातर मुकाबलों की तरह ही यह मुकाबला भी बेहद टक्कर का रहा। पहले दोनों टीमों की तरफ से बारी-बारी से दो-दो गोल कर लिए गए थे, इसके बाद मैच एकदम रोमांचक स्थिति में आ गया था। लेकिन फिर भारत की तरफ से आकाशदीप सिंह एवं निकिम तमैया ने गेंद को अपने बीच से बाहर नहीं जाने दिया और आखिर खले के 51वें मिनट में तीसरा और निर्णायक गोल दागकर भारत को पाकिस्तान पर 3-2 की बढ़त दिला दी। यह बढ़त मैच के अंत तक बरक़रार रही और इस तरह भारत दूसरी बार एशियन चैंपियंस ट्राफी का विजेता बना। बता दें कि इससे पहले सन २०११ में भारत ने पाकिस्तान को ही हराकर यह खिताब अपने नाम किया था, लेकिन फिर २०१२ में पाकिस्तान ने ये खिताब भारत से छीन लिया। अबकी फिर ऐसा ही एक मुकाबला था, जिसे जीत भारतीय हॉकी खिलाड़ियों ने दिखा दिया कि चाहें कोई भी क्षेत्र में अब एशिया में तो दबदबा भारत का ही रहेगा। यहाँ यह भी उल्लेखनीय होगा कि इस टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने अपना सफ़र अपराजेय रहते हुए पूरा किया है। भारतीय टीम लीग मैचों में जापान, चीन और पाकिस्तान को मात देते हुए फाइनल तक पहुँची थी। जापान को 1०-2 से तो चीन को 9-० से बुरी तरह से पटकनी देते हुए एशियन चैंपियंस ट्राफी में भारत की जीत का ये सफ़र बेहद शानदार रहा।
 
राज एक्सप्रेस
अब कोई राजनीतिक मंच हो या खेल का मैदान, अगर भारत-पाकिस्तान आमने-सामने हों तो तल्खी और तकरार स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। लेकिन, इस टूर्नामेंट में भारत के खिलाड़ी लाकड़ा ने बड़ा जोखिम लेते हुए भी जिस उदारता और ईमानदारी का परिचय दिया, वो भारत की उस महान परम्परा जिसमें भारत ने हमेशा पाकिस्तान के प्रति उदार, सहिष्णु और स्नेहिल रुख रखा है, का ही एक श्रेष्ठ उदाहरण है। दरअसल हुआ यूँ कि मैच के दौरान भारतीय खिलाड़ी वीरेंद्र लाकड़ा के पैर में गेंद जा लगी, जिसके बाद पाकिस्तान खिलाड़ियों ने रेफरी से पेनल्टी कॉर्नर की मांग कर दी। मगर, रेफरी को इस बात पर संदेह था कि गेंद लाकड़ा के पैर से लगी है, ऐसे में पाकिस्तानी टीम द्वारा अपना फाइनल रेफ़रल लेने का निर्णय लिया गया। अभी वे रेफरल लेते कि तभी खुद लाकड़ा रेफरी के पास गए और जाकर बताए कि उनके पैर से गेंद लगी है, इसलिए पाकिस्तानी टीम के रेफरल का उपयोग न करें। पाकिस्तानी टीम का फाइनल रेफरल बच गया और उसे पेनल्टी कॉर्नर भी मिल गया। हालाकि इसका वे फायदा नहीं उठा सके और भारतीय गोल कीपर ने गोल नहीं होने दिया। मगर ऐसे निर्णायक मैच के अंतिम समय में भारतीय खिलाड़ी लाकड़ा की हार-जीत से बेपरवाह इस ईमानदारी ने सबको स्तब्ध कर दिया। मैच खत्म होने के बाद खुद पाकिस्तानी टीम के कोच ने आकर लाकड़ा को गले लगाकर धन्यवाद किया। इससे पहले एफआईएच चैंपियंस ट्राफी में भारत जब पाकिस्तान से हारा था, तो वहाँ पाकिस्तानी खिलाड़ियों द्वारा बेहद अभद्र इशारे किए गए थे। लेकिन, बावजूद इसके भारतीय खिलाड़ी वीरेंद्र लाकड़ा की इस उत्कृष्ट खेल भावना से भरे व्यवहार ने सभी का दिल जीत लिया।
बहरहाल, हॉकी टीम की इस जीत पर हमें खुश तो होना चाहिए, मगर इस सचाई से भी मुंह नहीं चुराना चाहिए कि अभी हमारी हॉकी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में काफी कमजोर है। एशिया में पाकिस्तान के अलावा कोई टक्कर का प्रतिस्पर्धी न होने के कारण हम जीत जाते हैं, लेकिन जब हमारा मुकाबला वैश्विक टूर्नामेंट्स में ऑस्ट्रेलिया आदि टीमों के साथ होता है, तो हमारी टीम कमजोर पड़ जाती है। कारण यह कि जिस स्तर का ध्यान हम क्रिकेट पर देते हैं, उसकी तुलना में हॉकी पर न के बराबर ही ध्यान दिया जाता है। रूपये-पैसे से लेकर अन्य खेल सम्बन्धी सुविधाओं तक देश में हॉकी की दुर्दशा की बातें अक्सर सामने आती रहती हैं। जरूरत है कि हॉकी की तरफ भी हम वैसा ही ध्यान दें, जैसा कि क्रिकेट की तरफ देते हैं। ऐसा करके ही हम अपनी हॉकी टीम के प्रदर्शन को उस स्तर का बना सकेंगे, जैसा कि हॉकी को राष्ट्रीय खेल मानने वाले एक देश का होना चाहिए।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

भारत-न्यूजीलैंड संबंधों में नई ताज़गी की उम्मीद [राज एक्सप्रेस में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
विगत दिनों न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री जॉन की भारत दौरे पर आए थे। रूस, चीन, अमेरिका आदि तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्षों की तुलना में उनका यह भारत दौरा मीडिया कवरेज के लिहाज से काफी शांत रहा, लेकिन इससे ऐसा नहीं समझना चाहिए कि इसका महत्व कम है। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री के इस दौरे में दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए दो बिंदु सबसे महत्वपूर्ण माने जा रहे थे। पहला तो ये कि भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता के लिए न्यूजीलैंड का समर्थन प्राप्त करने की दिशा में पहल करेगा और दूसरा ये कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में दोनों देशों के बीच आम सहमति बनेगी। जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जॉन की ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया तो स्पष्ट हो गया कि इन बिन्दुओं पर न केवल बातचीत हुई है, बल्कि भारत न्यूजीलैंड को अपने पक्ष में करने में संभवतः सफल भी रहा है। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री जॉन की ने इस संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के शामिल होने को लेकर बातचीत हुई है और एनएसजी में भारत के शामिल होने की महत्ता को वे स्वीकार करते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की सदस्यता को लेकर वर्तमान में एनएसजी में जारी प्रक्रिया में न्यूजीलैंड रचनात्मक रूप से योगदान करना जारी रखेगा तथा एनएसजी सदस्यों के साथ मिलकर इस सम्बन्ध में जल्द से जल्द किसी नतीजे पर पहुंचा जाएगा। इसके अलावा उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही कि न्यूजीलैंड संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य बनने के सम्बन्ध में भी भारत का समर्थन करेगा। इसके अलावा आतंकवाद के मसले पर भी दोनों देशों के बीच सहमति बनी है। इस सम्बन्ध में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद और कट्टरपंथ समेत साइबर हमलों के खतरे के विरुद्ध दोनों देश एक-दुसरे का सहयोग करने पर सहमति बनी है। ये बातें सुनने में तो काफी अच्छी लगती हैं और आशा जगाती हैं, मगर व्यावहारिकता में ये न्यूजीलैंड अपनी इन बातों पर कितना खरा उतरता है, ये तो समय ही बताएगा। 
 
राज एक्सप्रेस
अब जो भी, मगर वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में न्यूजीलैंड का भारत के लिए बेहद महत्व है। अब चूंकि, ऐतिहासिक रूप से न्यूजीलैंड से भारत के सम्बन्ध अगर बहुत विद्वेषपूर्ण नहीं रहे तो बहुत अच्छे भी नहीं रहे हैं। न्यूजीलैंड भारत से कहीं अधिक भारत के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी चीन के निकट है। चीन और न्यूजीलैंड के बीच सम्बन्ध बेहद गर्मजोशी वाले हैं। इसी नाते जब चीन ने भारत की एनएसजी सदस्यता की राह में रोड़ा लगाया था, तो उसके रुख का समर्थन करने वाले नौ देशों में न्यूजीलैंड भी था। न्यूजीलैंड ने भी चीन के इस रुख का समर्थन किया था कि भारत की सदस्यता पर और विचार किया जाना चाहिए। तबसे भारत चीन का साथ देने वाले उन नौ देशों को अपनी तरफ करने को प्रयासरत है।  अब न्यूजीलैंड समेत चीन का समर्थन करने वाले देशों में से जितने अधिक देश भारत के समर्थन में उतरेंगे चीन का विरोध उतना ही कमजोर पड़ेगा और वो बेहद अकेला पड़ जाएगा। ऐसे में, स्पष्ट है कि एनएसजी सदस्यता की दृष्टि से भारत के लिए न्यूजीलैंड का समर्थन बेहद महत्व रखता है।
 
वैसे यहाँ आवश्यकता सिर्फ भारत की ही नहीं है, दुनिया के अधिकांश देशों की ही तरह न्यूजीलैंड के लिए भी व्यापार की दृष्टि में  भारत एक बेहतर बाजार के रूप में दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी इस बात बाखूबी जानते हैं और भारतीय बाजार की इस शक्ति के समुचित प्रयोग के ही जरिये दुनिया के तमाम विरोधी देशों को भी एक साथ साधकर चल भी रहे हैं। गौर करें तो रूस और अमेरिका जैसे दो विकट प्रतिद्वंद्वी देशों से इसवक़्त भारत के सम्बन्ध लगभग समान रूप से मधुर और गतिशील हैं तथा इससे इनमें किसी भी देश को कोई समस्या नहीं है। उदाहरण के तौर पर उल्लेखनीय होगा कि एक तरफ भारत रूस से एयर डिफेन्स सिस्टम का सौदा किया, तो दूसरी तरफ अमेरिका से अत्याधुनिक होव्तिजर तोपों के खरीद पर सहमति कायम की। इस तरह दोनों देशों से भारत के व्यापारिक सम्बन्ध कायम हो गए  और इन व्यापारिक संबंधों के जरिये अन्य सम्बन्ध भी दुरुस्त ही रहने हैं। यही भारतीय बाजार की शक्ति है। अब न्यूजीलैंड को भी भारत अपने इसी बाजार के जरिये चीन की तुलना में खुद के अधिक करीब लाने की कवायदें करने की दिशा में प्रयास करेगा। चीन और न्यूजीलैंड के बीच व्यापारिक सम्बन्ध ही तो उनके संबंधों को मजबूत किए हुए हैं। भारत और न्यूजीलैंड के बीच बिलकुल भी व्यापार नहीं हो, ऐसा नहीं है। लेकिन, वो चीन की अपेक्षा बेहद कम है, जिसे बढ़ाने की दिशा में अब भारत जोर दे रहा है। इसीलिए न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री जॉन की की इस ताज़ा यात्रा में दोनों देशों के बीच व्यापक मुक्त व्यापार समझौते को लेकर भी प्रतिबद्धता जताई गई।
 
वैसे, चीन से न्यूजीलैंड के सिर्फ व्यापारिक सम्बन्ध हैं, जबकि भारत से उसका सांस्कृतिक जुड़ाव भी है। भारत के लगभग बीस हजार से ऊपर छात्र न्यूजीलैंड में पढ़ते हैं। इस तरह भारतीय संस्कृति अपनी मौजूदगी वहाँ जमाए हुए है। अब बस एकबार न्यूजीलैंड को भारतीय बाजार का स्वाद मिल जाय, फिर उसके लिए स्वतः ही भारत का महत्व चीन से कहीं अधिक हो जाएगा।

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

पुस्तक समीक्षा : कुछ सच्ची-कुछ झूठी सी मुसाफ़िर कैफे [दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
‘मसाला चाय’ और ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स अप्लाई’ के बाद ‘मुसाफिर कैफे’ युवा पाठकों के बीच ‘नई वाली हिंदी’ के लेखक के रूप में मशहूर दिव्य प्रकाश दुबे की तीसरी किताब है। पिछली दोनों किताबें कहानी-संग्रह थीं, ये उपन्यास है। जिन्होंने दिव्य की पिछली दोनों किताबें पढ़ी हैं, उन्हें मुसाफिर कैफे पढ़ने पर ये बात स्पष्ट रूप से समझ आएगी कि इसमें दिव्य अपने लेखन के उस सुरक्षित घेरे जिसमें रहते हुए उन्होंने पिछली दोनों किताबें लिखी हैं, से बाहर आने की कोशिश किए हैं। वो सुरक्षित घेरा है – कथ्य और कथानक का। ‘मसाला चाय’ और ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स अप्लाई’ की कहानियों में सामान्य और हमारे दैनिक जीवन से जुड़े किन्तु जानबूझकर नज़रअंदाज किए जाने वाले विषयों को कथानक का आधार बनाया गया हैं। साथ ही, उन विषयों पर बेहद हल्के-फुल्के अंदाज़ में अपनी बात कही गई है। जबकि मुसाफिर कैफे में दिव्य ने हल्के-फुल्के विषयों को छोड़ जीवन, जीवन के महत्व व उद्देश्य जैसे अत्यंत गंभीर और दार्शनिक प्रश्नों को कहानी का आधार बनाया है। कहानी की शुरुआत में जरूर सामान्य जीवन से सम्बद्ध शादी, सेक्स, घर-परिवार इत्यादि बातें आई हैं, लेकिन यह सब बातें कथानक के मूल विषय जो कि जीवन के दार्शनिक विवेचन से सम्बद्ध है, को आगे बढ़ाने में सहायक की भूमिका भर निभाती नज़र आती हैं। हालांकि एक तथ्य यह भी है कि इतने गंभीर विषय के बावजूद भी कहानी की भाषा वही ‘नई वाली हिंदी’ है, जिसके लिए दिव्य प्रकाश दुबे जाने जाते हैं। ऐसे गंभीर विषय पर आधारित कथानक को अपनी जवान और ताज़गी भरी हिंदी में पिरो लेना इस उपन्यास के सम्बन्ध में लेखक की बड़ी सफलता कही जा सकती है। साथ ही इसके लिए भी लेखक की प्रशंसा होनो चाहिए कि उन्होंने सेक्स दृश्यों का वर्णन करते हुए साहित्य और मस्तराम के बीच के बारीक भाषाई अंतर का ख्याल रखा है। पूरी तरह से सेक्स दृश्यों का वर्णन करने पर भी कहीं से ये नहीं लगता कि यहाँ लेखक पोर्नग्राफिकल हो रहे हैं। जिस साहित्यिक तरीके से सेक्स दृश्यों का वर्णन किया गया है, वो उन तमाम रचनाकारों के लिए सीख की तरह है, जो बोल्डनेस के नाम पर कहानी में सेक्स का ऐसे खुल्लमखुल्ला वर्णन कर देते हैं, जैसे कि मस्तराम की कहानी लिख रहे हों।   

मुसाफिर कैफे में दिव्य ने हल्के-फुल्के विषयों को छोड़ जीवन, जीवन के महत्व व उद्देश्य जैसे अत्यंत गंभीर और दार्शनिक प्रश्नों को कहानी का आधार बनाया है। कहानी की शुरुआत में जरूर सामान्य जीवन से सम्बद्ध शादी, सेक्स, घर-परिवार इत्यादि बातें आई हैं, लेकिन यह सब बातें कथानक के मूल विषय जो कि जीवन के दार्शनिक विवेचन से सम्बद्ध है, को आगे बढ़ाने में सहायक की भूमिका भर निभाती नज़र आती हैं। हालांकि एक तथ्य यह भी है कि इतने गंभीर विषय के बावजूद भी कहानी की भाषा वही ‘नई वाली हिंदी’ है, जिसके लिए दिव्य प्रकाश दुबे जाने जाते हैं। ऐसे गंभीर विषय पर आधारित कथानक को अपनी जवान और ताज़गी भरी हिंदी में पिरो लेना इस उपन्यास के सम्बन्ध में लेखक की बड़ी सफलता कही जा सकती है।
अगर एक नज़र मुसाफिर कैफे के कथानक पर डालें तो इसके दो मुख्य पात्र हैं - सुधा और चंदर। चंदर जो अच्छी-भली नौकरी में है और दुनिया के मानकों के हिसाब से सेटल्ड है, मगर वो इस जिंदगी से संतुष्ट नहीं है। दूसरी तरफ सुधा एक फैमिली लॉयर है। कोर्ट में टूटतीं शादियाँ देख शादी से इतना डर चुकी है कि शादी नहीं करना चाहती। ये दोनों मिलते हैं, करीब आते है और एक ही घर में रहने भी लगते हैं। एक-दूसरे की चीजों का ध्यान रखने लगते हैं। हनीमून भी मना लेते हैं। कुल मिलाकर वो सबकुछ करते हैं, जो शादीशुदा लोगों के लिए सामाजिक रूप से निर्धारित है, लेकिन सुधा शादी नहीं करना चाहती और चंदर शादी चाहता है। इसी बिंदु पर दोनों में मतभेद बढ़ जाते हैं और यहीं से कहानी में नाटकीयता का प्रवेश होता है। चंदर बड़े ही नाटकीय ढंग से प्रेग्नेंट सुधा और नौकरी-घर सबकुछ छोड़कर एक अनिश्चित सफ़र पर निकल जाता है। बस इसके बाद से कहानी का लगभग पूरा हिस्सा जीवन के उक्त दार्शनिक प्रश्नों का हल खोजने में बीता है, जिस दौरान हमें कहानी में अनेक अति-नाटकीय मोड़ देखने को मिलते हैं।  
दैनिक जागरण

यह सही है कि दिव्य ने एक गंभीर विषय को नई हिंदी यानी सहज भाषा में प्रस्तुत करने का काफी हद तक सफल प्रयास किया है, लेकिन कहीं-कहीं लम्बे-लम्बे और अनावश्यक ही खींचे गए से संवाद कहानी को उबाऊ भी बना दिए हैं। जहां-तहां कहानी भी खिंची हुई सी प्रतीत होने लगती है। खासकर उपन्यास के उत्तरार्ध में ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे लेखक को भी उपन्यास के पात्र चंदर की ही तरह अपनी मंजिल का कुछ पता नहीं है। एक अजीब-सा भटकाव नज़र आता है। चंदर के इधर-उधर भटकने के क्रम में बहुत से अनावश्यक और कहानी को फिजूल में लम्बा करने वाले हिस्से गढ़े गए हैं। कहीं-कहीं ये भटकाव इतना अधिक हो जाता हैं कि लगता है कि ये उपन्यास नहीं, लेखक की आत्मकथा हो। यह सब चीजें मिल-जुलकर कहानी को उबाऊ बनाती हैं और कथानक अक्सर पाठक को बाँधे रख पाने में नाकाम नज़र आता है। 
मुसाफ़िर कैफ़े आवरण

इन सबके अलावा इस उपन्यास के कथानक में कई एक जगहों पर तार्किकता का भी अभाव नज़र आता है। पहली चीज कि चंदर जो एक पढ़ा-लिखा, सेटल्ड युवा है और एकदम प्रैक्टिकल भी है, उसमें अचानक ये वैराग्य कहाँ से और क्योंकर जगता है कि वो सबकुछ छोड़कर ‘जीवन का रहस्य’ खोजने निकल पड़ने का अव्यावहारिक निर्णय ले लेता है ? दूसरी तरफ सुधा शादी के प्रति अपने एक अतार्किक भय के कारण चंदर को सबकुछ छोड़कर एक अनिश्चित सफ़र पर जाने कैसे देती है ? ये सही है कि शादी को लेकर लोगों के मन में डर होता है, पर सुधा का जो डर प्रस्तुत किया गया है, वो उसके चरित्र से कत्तई मेल नहीं खाता और एक हद तक अति-नाटकीय प्रतीत होता है। इसके बाद, सुधा का चंदर से एबॉर्शन का झूठ बोलना, चंदर का सच जानते हुए भी उस झूठ को मान लेना, फिर अपरिचित पम्मी को होटल खरीदने के लिए पैसे से मदद करना इत्यादि तमाम घटनाएं किसी पुरानी हिंदी फिल्म की तरह ही हैं। अंत भी फ़िल्मी टाइप ही है। इनमें कहीं कोई तार्किकता और व्यावहारिकता नहीं दिखती। कह सकते हैं कि यह कहानी है और कहानी में इतनी छूट चलती है, लेकिन आज के युवाओं जो बेहद प्रैक्टिकल और तार्किकता में विश्वास करने वाले हैं, को ध्यान में रखके अगर आप लिख रहे हों, तब ऐसी छूट नहीं ले सकते। ये उनके साथ अन्याय होगा। ये कोई छायावादी साहित्य का युग थोड़े है कि लेखक अपने कल्पनालोकों का सृजन कर व्यावहारिकताओं से मुंह मोड़ लेंगे।

खैर, कहानी के प्रस्तुतिकरण की शैली काफी नई और प्रयोगपूर्ण है। इस तरह की शैली दिव्य अपनी कुछेक कहानियों में भी प्रयोग कर चुके हैं। ‘क से कहानी’, ‘ब से बेटा शादी कर लो’ आदि छोटे-छोटे और दिलचस्प से उपशीर्षक देकर कहानी को आगे बढ़ाना एक सफल और अच्छा प्रयोग कहा जा सकता है। इसी ढंग से मुसाफिर कैफे की कहानी प्रस्तुत की गई है।

उपर्युक्त सभी बातों का निष्कर्ष यह है कि ‘मुसाफिर कैफे’ का विषय तो बेहद गंभीर और जरूरी है, लेकिन कमजोर कथानक के कारण उसके साथ समुचित न्याय नहीं हो पाया है। सीधे शब्दों में कहें तो ये कहानी कुछ सच्ची लगती है तो कुछ झूठी भी प्रतीत होती है। कहीं अचानक जीवन का कोई महत्वपूर्ण सच हमें चौंका देता है, तो कहीं कुछ ऐसा नकली और झूठ-सा दीखता है जो हमें निराश कर देता है। दरअसल इस विषय को सही ढंग से संप्रेषित करने में सक्षम कथानक को गढ़ने में लेखक को ठीक ढंग से सफलता नहीं मिली है और कथानक उलझता हुआ अचानक ही समाप्त हो गया है। अगर इस उपन्यास के विषय को और बेहतर  कहानी का साथ मिलता तो पूरी संभावना है कि ये आज के महानगरीय जीवन में मशीन की तरह चल रहे आदमी की नज़रंदाज़ की जा रही अंतर्व्यथा की परतें खोलने तथा समाज को जीवन का वास्तविक अर्थ समझाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कृति सिद्ध होती।

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

भुखमरी से कब मिलेगी मुक्ति [दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  •  पीयूष द्विवेदी भारत
मानव जाति की मूल आवश्यकताओं की बात करें तो प्रमुखतः रोटी, कपड़ा और मकान का ही नाम आता है। इनमे भी रोटी अर्थात भोजन सर्वोपरि है। भोजन की अनिवार्यता के बीच आज विश्व के लिए शर्मनाक तस्वीर यह है कि वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी भुखमरी का शिकार है। अगर भुखमरी की इस समस्या को भारत के संदर्भ में देखें तो अभी विगत वर्ष ही संयुक्त राष्ट्र द्वारा भुखमरी पर जारी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक भुखमरी से पीड़ित भारत में हैं। अभी देश में लगभग १९.४ करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं। इसे स्थिति की विडम्बना ही कहेंगे कि श्रीलंका, नेपाल जैसे राष्ट्र जो आर्थिक या अन्य किसी भी दृष्टिकोण से हमारे सामने कहीं नही ठहरते, उनके यहाँ भी हमसे कम मात्रा में भुखमरी की स्थिति है। गत दिनों ग्लोबल हंगर इंडेक्स द्वारा दुनिया भर के देशों में भुखमरी की स्थिति को लेकर अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी की गई है। इस रिपोर्ट में भुखमरी को लेकर भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक नज़र आती है। ११८ देशों की इस सूची भारत का स्थान ९७वां हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 39 प्रतिशत बच्चे अविकसित हैं जबकी आबादी का 15.2 प्रतिशत हिस्सा कुपोषण का शिकार हैं। इस सूचकांक में भारत का स्कोर २८.५ है, जो विकासशील देशों की तुलना में तो काफी अधिक है, क्योंकि सूचकांक में विकासशील देशों का औसत स्कोर २१.3 है।  लेकिन, भारत के दूसरे पड़ोसियों की स्थिति बेहतर है, जो इस इंडेक्स में ऊपर हैं। मिसाल के तौर पर नेपाल ७२वें नंबर है, जबकि म्यांमार ७५वें, श्रीलंका ८४वें और बांग्लादेश ९०वें स्थान पर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) द्वारा जारी भुखमरी पर नियंत्रण करने वाले देशों की सूची में गत वर्ष भी भारत को श्रीलंका व नेपाल से नीचे रखा गया था। अभी ये हालत तब थी, जब भारत ने अपनी स्थिति में काफी सुधार किया था। इस रिपोर्ट को देखते हुए तमाम सवाल उठते हैं, जो भुखमरी को लेकर भारत वर्तमान और पिछली सभी सरकारों की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं।  गत वर्ष की जी एच आई की रिपोर्ट में कहा गया था कि औसत से नीचे वजन के बच्चों (अंडरवेट चाइल्ड) की समस्या से निपटने में प्रगति करने के कारण भारत की स्थिति में ये सुधार आया है, लेकिन अभी भी यहाँ भुखमरी की समस्या गंभीर रूप से है जिससे निपटने के लिए काफी काम करने की जरूरत है। ये स्थिति अब भी बनी हुई है। सवाल है कि गत वर्ष से अबतक इस समस्या से निपटने की दिशा में क्या कदम उठाए गए ?
उल्लेखनीय होगा कि नेपाल और श्रीलंका भारत से सहायता प्राप्त करने वाले देशों की श्रेणी में आते हैं, ऐसे में ये सवाल  गंभीर हो उठता है कि जो श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार हमसे आर्थिक से लेकर तमाम तरह की मोटी मदद पाते हैं, भुखमरी पर रोकथाम  के मामले में हमारी हालत उनसे भी बदतर क्यों हो रही है ? इस सवाल पर ये तर्क दिया जा सकता है कि श्रीलंका व नेपाल जैसे कम आबादी वाले देशों से भारत की तुलना नहीं की जा सकती। यह बात सही है, लेकिन साथ ही इस पहलु पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि  भारत की  आबादी  श्रीलंका, नेपाल से जितनी अधिक है,  भारत के पास क्षमता व संसाधन भी उतने ही अधिक हैं।  अतः यह नहीं कह सकते कि अधिक आबादी के कारण भारत भुखमरी पर नियंत्रण करने के मामले में श्रीलंका आदि से पीछे रह रहा है। इसका असल कारण तो यही है कि हमारे देश में सरकारों द्वारा भुखमरी को लेकर कभी भी उतनी गंभीरता दिखाई ही नहीं गई जितनी कि होनी चाहिए। यहाँ सरकारों द्वारा हमेशा भुखमरी से निपटने के लिए सस्ता अनाज देने सम्बन्धी योजनाओं पर ही विशेष बल दिया गया, कभी भी उस सस्ते अनाज की वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने को लेकर कुछ ठोस नहीं किया गया।
दैनिक जागरण
 
दुनिया में खाद्यान उत्पादन के मामले में भारत दूसरे नंबर पर आता है। फिर भी भारत के कई राज्य के लोग भूख से पीड़ित हैं। जिनकी संख्या अफ्रीकी देश इथियोपिया या सूडान से भी अधिक हैं। भारतीय बच्चों में से 60% कुपोषण के शिकार हैं। यह तब है, जब भारत में खाद्यान्न की कोई कमी नहीं है। देश में खाद्यान्नों के कुल उत्पादन में साल दर साल बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। 1951-52 में देश में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन 5.09 करोड़ टन था। जो 2008-2009 में बढ़कर 23.38 करोड़ टन, 2013 में 25.9 करोड़ टन पहुँच गया। प्रति हेक्टेअर उत्पादकता में भी खासा सुधार हुआ है। 1950-51 में खाद्यान्नों का उत्पादन 522 किग्रा प्रति हेक्टेअर था, जो बढ़कर 2008-2009 के बाद 1,893 किग्रा प्रति हेक्टेअर हो गया। ऐसे में, महत्वपूर्ण सवाल ये उठता है कि हर वर्ष हमारे देश में खाद्यान्न का रिकार्ड उत्पादन होने के बावजूद क्यों देश की लगभग एक चौथाई आबादी को भुखमरी से गुजरना पड़ता है ? यहाँ मामला ये है कि  हमारे यहाँ प्रायः हर वर्ष अनाज का रिकार्ड उत्पादन तो होता है, पर उस अनाज का एक बड़ा हिस्सा लोगों तक पहुंचने की बजाय कुछ सरकारी गोदामों में तो कुछ इधर-उधर अव्यवस्थित ढंग से रखे-रखे सड़ जाता है। संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के मुताबिक देश का लगभग २० फिसद अनाज, भण्डारण क्षमता के अभाव में बेकार हो जाता है। इसके अतिरिक्त जो अनाज गोदामों आदि में सुरक्षित रखा जाता है, उसका भी एक बड़ा हिस्सा  समुचित वितरण प्रणाली के अभाव में जरूरतमंद लोगों तक पहुँचने की बजाय बेकार पड़ा रह जाता है। खाद्य की बर्बादी की ये समस्या सिर्फ भारत में नही बल्कि पूरी दुनिया में है। संयुक्त राष्ट्र के ही  मुताबिक पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष १.३ अरब टन खाद्यान्न खराब होने के कारण फेंक दिया जाता है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक तरफ दुनिया में इतना खाद्यान्न बर्बाद होता है और दूसरी तरफ दुनिया के लगभग ८५ करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं। क्या यह अनाज इन लोगों की भूख मिटाने के काम नहीं आ सकता ? पर व्यवस्था के अभाव में ये नहीं हो रहा। खाद्य वितरण प्रणाली दोषपूर्ण है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सम्बन्ध में ये सर्वविदित वास्तविकता है कि लगभग 51% प्रदत्त खाद्य भ्रष्टाचार के कारण उपलब्ध नहीं हो पाता और जिसे खुले बाजार में ऊँची कीमतों पर बेचा जाता है। सूखा या बाढ़ के अवसर पर खाद्य उत्पादन और सब्सिडी बिल में निहित मूल्य वृद्धि जो कई जरुरतमंद लोगों को सब्सिडी के लिये पात्रता के दायरे से बाहर करता है आदि के सन्दर्भ में कोई स्पष्टता नहीं है। हमें वितरण प्रणाली से लीकेज को कम करने और इसे पारदर्शी बनाने की जरूरत है।
उल्लेखनीय होगा कि पिछली संप्रग-२ सरकार के समय सोनिया गांधी की महत्वाकांक्षा से प्रेरित ‘खाद्य सुरक्षा क़ानून’ बड़े जोर-शोर से लाया गया था। संप्रग नेताओं का  कहना था कि ये क़ानून देश से भुखमरी की समस्या को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम होगा। गौर करें तो इसके तहत कमजोर व गरीब परिवारों को एक निश्चित मात्रा तक प्रतिमाह सस्ता अनाज उपलब्ध कराने की योजना थी। लेकिन इस विधेयक में भी खाद्य वितरण को लेकर कुछ ठोस नियम व प्रावधान नहीं सुनिश्चित किए गए जिससे कि नियम के तहत लोगों तक सही ढंग से सस्ता अनाज पहुँच सके। अर्थात कि मूल समस्या यहाँ भी नज़रन्दाज ही की गई। बहरहाल, संप्रग सरकार चली गई है, अब केंद्र में भाजपानीत राजग सरकार है, लेकिन खाद्य सुरक्षा क़ानून अब भी है।  और मौजूदा सरकार इस कानून को चलाने की इच्छा भी जता चुकी है। ऐसे में सरकार से ये उम्मीद की जानी चाहिए कि वो इस क़ानून के तहत वितरित होने वाले अनाज के लिए ठोस वितरण प्रणाली आदि की व्यवस्था पर ध्यान देगी।  जरूरत यही  है कि एक ऐसी पारदर्शी वितरण प्रणाली का निर्माण किया जाए जिससे कि वितरण से सम्बंधित अधिकारियों व दुकानदारों की निगरानी होती रहे तथा गरीबों तक सही ढंग से अनाज पहुँच सकें। साथ ही, अनाज की रख-रखाव के लिए गोदाम आदि की भी समुचित व्यवस्था की जाए जिससे कि जो हजारों टन अनाज प्रतिवर्ष रख-रखाव की दुर्व्यवस्था के कारण बेकार हो जाता है, उसे बर्बाद होने से बचाया और जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाया जा सके। इसके अतिरिक्त जमाखोरों के लिए कोई सख्त क़ानून लाकर उनपर भी नियंत्रण की  जरूरत है। ये सब करने के बाद ही खाद्य सम्बन्धी कोई भी योजना या क़ानून जनता का हित करने में सफल होंगे, अन्यथा वो क़ानून वैसे ही होंगे जैसे किसी मनोरोगी का ईलाज करने के लिए कोई तांत्रिक रखा जाए।