मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

इतिहास के पुनर्लेखन का प्रश्न (दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

गत 17 सितम्बर को केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में ‘गुप्तवंशक वीर : स्कंदगुप्त विक्रमादित्य का ऐतिहासिक पुन:स्मरण एवं भारत राष्ट्र का राजनीतिक भविष्य' विषय पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि इतिहास में गड़बड़ियों के लिए अंग्रेजों व वामपंथियों को दोष देने से कुछ नहीं होगा बल्कि वर्तमान में भारतीय दृष्टि से इतिहास का पुनर्लेखन किए जाने की जरूरत है। उन्होंने मौर्य वंश, गुप्त वंश से लेकर शिवाजी तक का उदाहरण देते हुए कहा कि इन महापुरुषों के विषय में आज ढूँढने पर कोई संदर्भ ग्रन्थ नहीं मिलता तो यह हमारी कमी है।

अमित शाह के इस वक्तव्य में भारतीय इतिहास का एक व्यापक परिप्रेक्ष्य मौजूद है। दरअसल आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू पर पश्चिम का गहरा प्रभाव था। समाजवाद को वे देश की समस्याओं का सबसे बेहतर समाधान मानते थे। पश्चिम का यह प्रभाव उनकी इतिहास-दृष्टि पर भी रहा। पश्चिमी विद्वानों द्वारा स्थापित आर्य आक्रमण सिद्धांत, जो इतिहास का एक विवादास्पद विषय रहा है, में उनकी आस्था थी। ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ पुस्तक में संकलित एक पत्र में उन्होंने लिखा है, ‘..हिंदुस्तान के रहने वाले द्रविड़ कहलाते थे। ये वही लोग हैं, जिनकी संतान आजकल दक्षिण हिंदुस्तान में मद्रास के आसपास रहती है। उनपर आर्यों ने उत्तर से आकर हमला किया, उस जमाने में मध्य एशिया में बेशुमार आर्य रहते होंगे... आर्य एक मजबूत लड़ने वाली जाति थी, उसने द्रविड़ों को भगा दिया।’


प्रथम प्रधानमंत्री की इस पश्चिम-प्रभावित दृष्टि का प्रभाव देश के इतिहास लेखन पर भी पड़ा और इतिहासकारों ने पूर्वग्रहयुक्त अभारतीय दृष्टि के साथ भारतीय इतिहास का लेखन किया, जिसमें विदेशी आक्रान्ताओं के पराक्रम व शासन का वर्णन तो खूब हुआ, परन्तु देश के अनेक महापुरुष उचित स्थान नहीं पा सके।  ये इतिहास कुछ यूँ रहा, जिसमें साम्राज्य-विस्तार की लालसा में खून की नदियाँ बहाने वाले  मुग़ल शासक अकबर को महान बना दिया गया, लेकिन उसके खिलाफ जंगल-जंगल भटककर संघर्ष करने वाले महाराणा प्रताप की कोई विशेष चर्चा नहीं की गयी।
रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह, मंगल पाण्डेय, तात्या टोपे जैसे 1857 के स्वाधीनता संग्राम के अनेक नाम हैं, जिन्हें इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। शाह ने ठीक ही कहा कि अगर सावरकर न होते तो 1857 के स्वाधीनता संग्राम को हम प्रथम स्वतंत्रता संग्राम नहीं, विद्रोह ही मान रहे होते। कुल मिलाकर अमित शाह ने अपने वक्तव्य में इतिहास में गड़बड़ी की समस्या को तो रेखांकित किया ही, लेकिन उससे कहीं अधिक जोर भारतीय दृष्टि से इतिहास का पुनर्लेखन कर इस समस्या को दूर करने पर दिया।            

शाह इतिहास के जिस भारतीय दृष्टि से युक्त पुनर्लेखन की बात कर रहे, संस्थागत रूप से वर्तमान में उसके लिए कोई संभावनापूर्ण स्थिति नहीं दिखती। भारतीय अनुसन्धान इतिहास परिषद की वेबसाइट खंगालने पर किसी भी नए ऐतिहासिक शोध या स्थापना से सम्बंधित किसी किताब की जानकारी नहीं मिलती। ऐसी किसी किताब की कोई चर्चा भी कहीं नहीं सुनाई देती।  
इससे इतर स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य कर रहे नए लेखकों को देखें तो आज  हिंदी का ज्यादातर नया लेखन कथा-कविता पर केन्द्रित हो रहा है, शोध-इतिहास की तरफ नए लेखक जाना ही नहीं चाहते। जो भी नया लेखक आ रहा, वो कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह या उपन्यास के साथ आ रहा है। कथा-कविता की पुस्तकों की भीड़ में ऐसी पुस्तकें बहुत कम दिखती हैं जो इतिहास में उपेक्षित रहे किसी विषय पर प्रकाश डालती हों या किसी ऐतिहासिक स्थापना को निरस्त कर नयी स्थापना करती हों।  

हालांकि ऐसा नहीं है कि रचनात्मक साहित्य लिखते हुए ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं लिखे जा सकते। आचार्य शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर दिनकर तक हिंदी साहित्य में कई ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने रचनात्मक साहित्य के साथ इतिहास पर भी जमकर कलम चलाई और उनका लिखा आज हमारी थाती है। परन्तु, ये कर्म असीम धैर्य, श्रम और समर्पण के साथ-साथ साहस भी मांगता है, जिसका आज के ‘फास्ट फ़ूड लेखन’ की संस्कृति में जी रही नए लेखकों की पीढ़ी में ख़ासा अभाव है। इतिहास ग्रन्थ तो छोड़िये, अच्छे ऐतिहासिक उपन्यास भी अब नहीं लिखे जा रहे, बल्कि उनका स्थान ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की कल्पित कथाओं ने ले लिया है। विश्वविद्यालयों के इतिहास विभाग में भी शोध के स्तर पर कुछ बेहतर होता नजर नहीं आता। कुल मिलाकर इस बात से अधिकांश लोग सहमत मिलेंगे कि भारतीय इतिहास में सबकुछ ठीक नहीं है, किन्तु कोई इसे ठीक करने की जहमत नहीं उठाना चाहता।  

एक प्रश्न यह भी उठता है कि नए सिरे से इतिहास-लेखन की दिशा क्या होनी चाहिए और उसमें किन बिन्दुओं पर काम किया जाना चाहिए। इसके लिए कुछ-कुछ दिशा तो गृहमंत्री ने अपने भाषण में ही दे दी कि इतिहास के उपेक्षित महापुरुषों और साम्राज्यों पर संदर्भ ग्रन्थ तैयार किए जाएं। इसके अलावा अबतक जो इतिहास लेखन हुआ है, उसका अधिकांश हिस्सा ईसा के बाद का है जबकि भारतीय सभ्यता की जड़ें बहुत गहरी, बहुत पुरातन हैं। दिक्कत यही है कि हमने भारतीयता युक्त इतिहास दृष्टि से कभी उनको देखने का प्रयत्न ही नहीं किया। यह अभारतीय दृष्टि ही है, जिसने रामायण और महाभारत जैसे हमारी सभ्यता-संस्कृति के महान ऐतिहासिक ग्रंथों को मिथक के रूप में निरुपित किया है, जबकि भारत सहित दुनिया भर में प्राप्त अनेक प्रमाण यह इंगित कर चुके हैं कि यह ग्रन्थ इतिहास हैं। 

राखीगढ़ी में प्राप्त बसावट के अवशेष हों या सिनौली में प्राप्त रथ, मुकुट हों या इंडोनेशिया के समुद्र में मौजूद भगवान् विष्णु का पांच हजार साल पुराना मंदिर हो अथवा काफी पहले जर्मनी में प्राप्त हुई नरसिंह भगवान की कई हजार साल पुरानी प्रतिमा हो, इस तरह के तमाम साक्ष्य हमारी विस्तृत, पुरातन और समृद्ध सभ्यता की कथा कहते हैं। ऐसे ही रामायण और महाभारत  से जुड़े विश्व भर में प्राप्त सभी साक्ष्यों को संकलित कर इन महाकाव्यों का मिथक से ऐतिहासिक निरूपण करने वाले इतिहास ग्रंथों के लेखन की दिशा में कार्य किया जा सकता है। निस्संदेह यह कार्य आसान नहीं है, और इसके लिए जैसा कि अमित शाह ने कहा हमें हमारी ‘मेहनत करने की दिशा को केन्द्रित’ करने की जरूरत है।

गृहमंत्री के इस वक्तव्य के पश्चात् यह उम्मीद कर सकते हैं कि देश के बौद्धिक वर्ग में इसका असर होगा और वे इतिहास की बात आने पर अंग्रेजों और वामपंथियों को कोसने की बजाय नया इतिहास लिखने में ऊर्जा खर्च करना शुरू करेंगे।

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

बिग बॉस की लोकप्रियता के निहितार्थ (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

3 नवम्बर, 2006 को बिग बॉस की शुरुआत सोनी टीवी पर हुई थी। ये इसका पहला सीजन था, जिसमें संचालक (होस्ट) की भूमिका बॉलीवुड अभिनेता अरशद वारसी ने निभाई थी। घर के भीतर पंद्रह लोगों के साथ लगभग तीन महीने चले इस कार्यक्रम ने ऐसी लोकप्रियता पाई कि इसके एक बाद एक सीजन आने शुरू हो गए। कार्यक्रम की बढ़ती लोकप्रियता के कारण अरशद वारसी बीती बात हो गए और सिनेमा जगत के बड़े नामों ने शो के संचालन (होस्टिंग) में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। शिल्पा शेट्टी, संजय दत्त, सलमान खान और यहाँ तक कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी खुद को इससे दूर नहीं रख सके। अमिताभ बच्चन इसके तीसरे सीजन में संचालक की भूमिका में नजर आए। हालांकि ये शो उन्हें अपने लिए उपयुक्त नहीं लगा या कुछ और कारण रहा कि अगले सीजन में वे इससे अलग हो गए और फिर सञ्चालन का दारोमदार सलमान खान को मिल गया। पांचवे सीजन में सलमान के साथ संजय दत्त भी इससे जुड़े लेकिन ये प्रयोग इसी एक सीजन तक चला और छठे सीजन से सलमान ही इसका सञ्चालन कर रहे हैं।
सलमान खान के सञ्चालन में इसकी टीआरपी अधिक बेहतर रहने के कारण सलमान ने सबसे ज्यादा इसके नौ सीजन (अकेले) होस्ट किए हैं। अभी इसका तेरहवां सीजन टीवी पर प्रसारित हो रहा है, जिसके संचालक सलमान ही हैं। हालांकि इसबार अभिनेत्री अमीषा पटेल भी ‘घर की मालकिन’ के रूप में कार्यक्रम से जुड़ी हैं।  
बिग बॉस में क्या होता है – ये बताने की जरूरत नहीं है। सब जानते हैं कि विविध क्षेत्रों, ज्यादातर टीवी-सिनेमा से सम्बंधित, के प्रसिद्ध लोगों को एक निश्चित समयसीमा के लिए एक घर में बंद कर उनके व्यवहार को कैमरों के जरिये देखा जाता है, जिसका व्यवहार सबसे बेहतर रहता है और कुछ अभद्रता आदि नहीं करता, वो विजेता बनता है। उसे एक बड़ी धनराशि प्राप्त होती है।
मगर, यहाँ जानने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि इस शो की टीआरपी का असल कारण है - इसमें घुसे सेलेब्रिटियों के आपसी झगड़ों, विवादों, सनसनीखेज खुलासों और तरह-तरह की अन्तरंग चीजों का अश्लील प्रदर्शन और फिर उसपर बेमतलब का हल्ला व गाली-गलौज। इन चीजों के मद्देनज़र इस कार्यक्रम में प्रायः तमाम विवादित पृष्ठभूमि या विवादित रवैये वाले लोगों को ही लिया जाता है। बीते एक सीजन में इसमें विवादित स्वामी ओम को लिया गया था, जिसने बिग बॉस के घर में जाकर जो चाल-चलन और व्यवहार दिखाया, वो निर्लज्जता और अभद्रता की सारी सीमाएं तोड़ने वाला था। अनूप जलोटा और जसलीन का प्रकरण भी इसी बिग बॉस में घटित हुआ जिसे लेकर जलोटा साहब सोशल मीडिया पर खूब ट्रोल हुए और उनके चरित्र पर खूब आक्षेप लगे लेकिन कार्यक्रम खत्म होने के बाद ऐसी भी खबरें आईं कि ये सबकुछ केवल एक नाटक था। 
वर्तमान में चल रहा कार्यक्रम का यह तेरहवां सीजन भी चिर-परिचित अंदाज में अपनी शुरुआत के साथ ही विवादों में आ गया है। अश्लीलता के साथ-साथ धार्मिक भावनाओं को उकसाने की बात कहते हुए कार्यक्रम पर सवाल उठाए जा रहे। पिछले दिनों ट्विटर पर ‘जेहाद फैलाता बिग बॉस’ ट्रेंड करता रहा। जाहिर है, विवाद पैदा कर टीआरपी पाने की अपनी रणनीति में यह कार्यक्रम एकबार फिर कामयाब होता नजर आ रहा है।    
विचित्र बात यह है कि टीवी मीडिया की भी इस कार्यक्रम भारी दिलचस्पी होती है। प्रिंट तो नहीं, मगर टीवी और डिजिटल मीडिया में बिग बॉस शुरू होने के बाद बिग बॉस के घर में हुई घटनाओं को ऐसे दिखाया जाता है जैसे कोई बड़ी महत्वपूर्ण खबर हो। डिजिटल मीडिया में कार्यक्रम में हुई प्रत्येक गतिविधि का लिखित विवरण तक उपलब्ध कराया जाता है। ये स्थिति पत्रकारिता के इन आधुनिक धड़ों की नैतिकता पर प्रश्नचिन्ह ही खड़े करती है।
बिग बॉस की लोकप्रियता को लेकर भी कई सवाल उठते हैं। सोचिये जरा कि थक-हारकर कुछ पल टीवी के सामने बैठ दिमाग हल्का करने के लिए कुछ अच्छा देखने की बजाय बिग बॉस के घर में दूसरों के झगड़े देखने में लोगों का दिलचस्पी लेना किस प्रवृत्ति का सूचक है? दरअसल ये दिखाता है कि हम में दूसरों के जीवन में झाँकने और दूसरों के यहाँ होने वाले कलह-क्लेश का आनंद लेने की बुरी लत इतनी बढ़ चुकी है कि अब बाकायदा इसका खाते-पीते टीवी पर आनंद लेने लगे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे मनोरंजन का स्वाद दिन-प्रतिदिन फूहड़ से फूहड़तम होता जा रहा है। दुर्भाग्यवश ये स्थिति शहरी और शिक्षित कहे जाने वाले तबके में अधिक है।
मगर इन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ये कार्यक्रम टीवी पर आता है, जिसे बच्चे भी देखते हैं, ऐसे में उनकी मानसिकता पर इसका क्या प्रभाव पड़ता होगा? क्या सीखेंगे वे सेलेब्रिटियों के झगड़ों, कामुक क्रियाकलापों और गाली-गलौज से? कितनी विचित्र बात है न कि एक तरफ अभिभावक बच्चों को गाली-गलौज और झगड़ों आदि से बचने की नसीहतें देते हैं और दूसरी तरफ खुद टीवी पर यही सब मजा ले-लेकर देखते हैं, तो उनके प्रति बच्चों में क्या राय बनेगी?
बिग बॉस तो एक उदाहरण है, ऐसे और भी तमाम शो हैं जो अलग-अलग चैनलों पर प्रसारित होते हैं जिनमें कुछ के नाम पर कुछ और दिखाकर टीआरपी बटोरी जाती है, मगर उन शोज का परिवारों और बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता होगा इसपर कभी विचार नहीं किया जाता। क्राइम पेट्रोल, सावधान इण्डिया, होशियार जैसे शो की रूपरेखा अलग है, मगर अपराध के प्रति जागरूकता फैलाने के नाम पर वे भी सामाजिक विकृति पैदा करने का ही काम कर रहे हैं।
इन आपराधिक कार्यक्रमों में रहस्य, रोमांच और सेक्स को मिला एक ऐसा कॉकटेल तैयार करके घरों में पहुँचाया जा रहा जिससे अपराध के प्रति जागरूकता आए न आए, मगर लोगों को अपराध करने के दस तरीके जरूर आ जाएंगे। अच्छा तो ये है कि लोग इस तरह कार्यक्रमों को देखने से परहेज करें। जब वे नहीं देखेंगे तो इनके निर्माता टीआरपी के अभाव में स्वतः इनपर विराम लगाएंगे। मगर इन कार्यक्रमों की सफलता इसका प्रमाण है कि ये लोगों को भा रहे हैं और लोग इसे देखना बंद करे देंगे, इसकी उम्मीद कम ही है। ऐसे में उपाय यही है कि सरकार ही बिग बॉस जैसे कार्यक्रमों में दिखाई जा रही सामग्री का गंभीरतापूर्वक संज्ञान ले और टीवी पर इनके प्रसारण को लेकर या तो कुछ कड़े नियम निर्धारित करे अथवा इनपर पूर्ण रोक लगाए।

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

साठ साल का दूरदर्शन (दैनिक जागरण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

15 सितम्बर, 1959 को शुरू हुए दूरदर्शन ने बीते 15 सितम्बर को अपने साठ साल पूरे कर लिए। दूरदर्शन की ये छः दशकीय यात्रा भारत में टेलीविजन की यात्रा भी है। 1959 में एक प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया ये चैनल अपने प्रारंभिक तेरह वर्षों में केवल दिल्ली तक सीमित रहा। हालांकि 1965 में आल इंडिया रेडियो के अंतर्गत दिल्ली में इसके दैनिक प्रसारण की व्यवस्था हो गयी थी, मगर देश के अन्य हिस्सों तक इसकी पहुँच की शुरुआत 1972 में हुई। 1972 में मुंबई और अमृतसर में इसका प्रसारण शुरू हुआ और 1975 तक ये देश के सात अन्य शहरों में भी दिखाया जाने लगा। इसी क्रम में 1976 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत इसका एक अलग विभाग बना दिया गया और फिर 1982 से राष्ट्रीय स्तर पर इसका प्रसारण होने लगा। इसके बाद तो अपने एक से बढ़कर एक लोकप्रिय और उम्दा कार्यक्रमों के माध्यम से दूरदर्शन ने देश लोगों के दिलों में जो जगह बनाई, वो एक इतिहास ही है।

दूरदर्शन के साठ साल पूरे होने पर सोशल मीडिया पर जिस तरह लोगों ने उसके पुराने कार्यक्रमों को याद करते हुए उनसे सम्बंधित अपने अनुभव साझा किए, वो इस बात का प्रमाण है कि आज लोगों ने दूरदर्शन देखना भले कम कर दिया हो, लेकिन उसका पुराना दौर आज भी उनके दिलों में पूरी तरह से जिंदा है। न केवल जिन्दा है बल्कि बहुत से लोग लोग यह भी मानते हैं कि आज के कार्यक्रमों में उन्नत तकनीकी और साज-सज्जा भले आ गयी हो, लेकिन सामग्री की गुणवत्ता और मनोरंजकता के मामले में दूरदर्शन पर प्रसारित पुराने कार्यक्रमों वाली बात इनमें नहीं है।
इसी संदर्भ में दूरदर्शन के बीते दौर पर नजर डालें तो आजकल जितनी भी विधाओं के कार्यक्रम अलग-अलग चैनलों पर प्रसारित होते हैं, उनमें से अधिकांश विधाओं के कार्यक्रमों की शुरुआत दूरदर्शन ने की थी। फिर चाहें वो धार्मिक धारावाहिक हों या रहस्य-रोमांच-भय-एक्शन और हास्य के धारावाहिक अथवा पारिवारिक संबंधों, मूल्यों व प्रेम से सम्बंधित धारावाहिक हों या फिर गीत-संगीत से सम्बंधित रियलिटी शो हों, इन सब विधाओं के अत्यंत श्रेष्ठ कार्यक्रम दूरदर्शन पर बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों और इक्कीसवीं सदी के कुछ प्रारंभिक वर्षों में प्रसारित हुए थे।
रामायण, महाभारत और कृष्णा दूरदर्शन के इन तीन धार्मिक धारावाहिकों की लोकप्रियता और इनसे लोगों के आत्मीय जुड़ाव का अनुमान इतने से ही लगा सकते हैं कि राम-सीता के रूप में अरुण गोविल और दीपिका तो कृष्ण के रूप में नीतीश भारद्वाज और सर्वदमन बनर्जी लोगों के मन में आजतक बसे हुए हैं। तब घर-घर में टीवी भी नहीं होती थी, लेकिन लोग दूर-दूर तक टीवी वाले घरों में ये धारावाहिक देखने पहुँच जाते थे। बाद में अन्य चैनल आने के बाद उनपर भी रामायण, महाभारत और कृष्ण लीला के अनेक धारावाहिक आए, लेकिन जो असर दूरदर्शन के इन धारावाहिकों का था, वैसा असर कोई नहीं छोड़ पाया।
इसी तरह फौजी, बुनियाद, हम लोग, चंद्रकांता, आलिफ लैला, चाणक्य, वागले की दुनिया, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, श्रीमान श्रीमती, ये जो है जिंदगी, सुराग, व्योमकेश बख्शी, आपबीती, शक्तिमान, जासूस विजय जैसे विविध विधाओं के अनेक कार्यक्रम हैं, जिन्होंने बच्चों से लेकर बड़े-बूढों तक को दूरदर्शन का दीवाना बना दिया था। शक्तिमान के रूप में भारत को उसका पहला सुपरहीरो देने का श्रेय भी दूरदर्शन को ही जाता है। फिल्मों में कुछ ख़ास न कर पाने वाले मुकेश खन्ना को सुपरहीरो शक्तिमान ने जो लोकप्रियता दी, वो किसी फ़िल्मी नायक की लोकप्रियता से कम नहीं थी। दूरदर्शन के इन कार्यक्रमों के कामयाब होने के पीछे प्रमुख कारण था कि इनमें से तमाम धारावाहिकों की पटकथा और संवाद उस दौर के बड़े लेखकों ने लिखे थे। जैसे कि दूरदर्शन के लिए बुनियाद, हम लोग, मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसे धारावाहिक मशहूर लेखक मनोहर श्याम जोशी ने लिखे थे, तो वहीं महाभारत की पटकथा और संवाद राही मासूम रज़ा की कलम से निकलकर लोकप्रिय हो गए। इसके अलावा इन धारावाहिकों की लोकप्रियता का एक कारण इनकी एकदम यथार्थपरक प्रस्तुति भी थी, जिससे लोगों का इनसे सहज जुड़ाव हो जाता था।
बहरहाल, अब सवाल ये उठता है कि जिस दूरदर्शन का इतना बड़ा और पक्का दर्शकवर्ग था, उसकी लोकप्रियता समय के साथ सिकुड़ती क्यों गयी? गौर करें तो 1992 में स्टार और जी के चैनल आए, लेकिन उसके बाद भी लम्बे समय तक दूरदर्शन का प्रभाव बना रहा। मगर इक्कीसवीं सदी में चैनलों की बढ़ती भीड़ और उनपर कार्यक्रमों-फिल्मों की भरमार शहरी लोगों को दूरदर्शन से दूर करती गयी। गांवों में फिर भी कुछ समय तक दूरदर्शन की लोकप्रियता रही, लेकिन डीटीएच के आगमन के बाद गांवों में भी दूरदर्शन के दर्शक कम होते गए। इसका एक कारण यह भी रहा कि समय के साथ दूरदर्शन पर पुराने कार्यक्रम बंद हो गए और उनकी जगह उस स्तर के नए कार्यक्रम आए नहीं। ऐसे में लोगों के लिए दूरदर्शन के प्रति कोई विशेष आकर्षण बचा नहीं और वो लोगों के लिए किसी ‘एंटिक पीस’ की तरह हो गया, जिसका महत्व तो बहुत है, मगर उपयोग कुछ नहीं।
साठ साल पूरे होने पर दूरदर्शन की तरफ से ट्विटर पर एक कविता का वीडियो पोस्ट किया गया, जिसका शीर्षक है – मैं नए भारत का चेहरा हूँ। मशहूर ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव द्वारा लिखी गयी इस कविता के बोल बहुत अच्छे हैं और अमिताभ बच्चन ने इसे गाया भी बहुत उम्दा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई दूरदर्शन की हालत ऐसी है कि उसे नए भारत का चेहरा कहा जाए? शायद नहीं। दूरदर्शन नए भारत का चेहरा बने, ये बहुत अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उसके कार्यक्रमों में नए भारत का अक्स दिखाई दे, मगर दुर्भाग्यवश ऐसा है नहीं। दूरदर्शन की वेबसाइट पर उपलब्ध उसके कार्यक्रमों की सूची देखने पर ज्ञात होता है कि उसके पास नए कार्यक्रम काफी कम हैं और ज्यादातर वक़्त उसपर पुराने ‘डेली शॉप’ कार्यक्रमों का ही पुनः प्रसारण किया जा रहा है। सवाल है कि क्या इन पुराने कार्यक्रमों के भरोसे दूरदर्शन नए भारत का चेहरा बन सकता है?
वर्तमान समय में चैनलों और कार्यक्रमों की भरमार है, जिसने प्रतिस्पर्धा का वातावरण पैदा कर दिया है। दूरदर्शन इस प्रतिस्पर्धा में पिछड़ नहीं रहा, बल्कि भाग लेने से बच रहा है जो कि ठीक नहीं है। दूरदर्शन के पुराने कार्यक्रमों की गुणवत्ता उसकी पहचान है और लोगों का उससे एक भावनात्मक जुड़ाव भी है, ऐसे में अगर वर्तमान समय के अनुरूप किन्तु अपनी मौलिकता और पुरानी गुणवत्ता के साथ कार्यक्रम लाए जाएं और उनका सही प्रचार-प्रसार किया जाए तो दूरदर्शन इस कठिन प्रतिस्पर्धात्मक समय में भी अपना एक दर्शकवर्ग तैयार कर सकता है।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

बॉलीवुड सितारों का अंग्रेजी प्रेम (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इसी हिंदी सिनेमा के सितारों का व्यक्तिगत व सार्वजनिक जीवन में हिंदी के प्रति जो रवैया दिखाई देता है, वो चकित करने के साथ-साथ उनपर कई सवाल भी खड़े करता है। सवाल ये कि हिंदी में फ़िल्में बनाकर अकूत पैसा और लोकप्रियता प्राप्त करने वाले बॉलीवुड के ये सितारे परदे से बाहर आते ही हिंदी से परहेज क्यों करने लगते हैं? क्या हिंदी इनके लिए केवल कैमरे के सामने रटकर बोली जाने वाली एक भाषा है, जिसमें बड़े-बड़े संवाद बोलकर वे लाखों-करोड़ों दर्शकों की तालियाँ और वाहवाही हासिल कर अपनी ‘स्टारडम’ बना लेते हैं? क्या इससे अधिक हिंदी का उनके लिए कोई महत्व नहीं है? इन सवालों का जवाब बॉलीवुड के सितारों को देना चाहिए, लेकिन इसका कोई तर्कसंगत जवाब उनके पास होगा, इसकी संभावना बहुत कम है।

ऐसा लगता है कि बॉलीवुड के लोगों, फिर चाहें वो निर्माता-निर्देशक हों या अभिनेता-अभिनेत्री, के लिए हिंदी एक व्यावसायिक मजबूरी से अधिक कुछ और नहीं है। व्यावसायिक मजबूरी के ही कारण परदे पर वे हिंदी को समर्पित होते हैं और उससे बाहर आते ही अंग्रेजीदां हो जाते हैं। परदे से बाहर की उनकी ज्यादातर गतिविधियों की भाषा अंग्रेजी होती है। एकबार फिल्म बन गयी, उसके बाद फिल्म के प्रचार आदि सभी कार्य अंग्रेजी में होते हैं। फिल्म के ट्रेलर को प्रसारित करने पर होने वाली प्रेसवार्ता हो या फिल्म के प्रचार से सम्बंधित विविध साक्षात्कार हों, इन सबकी अधिकांश बातचीत अंग्रेजी में होती है। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर नए-पुराने सभी बॉलीवुड कलाकारों के साथ यही स्थिति है।
हालांकि बॉलीवुड के पुरस्कार समारोहों में जरूर हिंदी को जगह मिलती है, लेकिन उसके मूल में भी कोई हिंदी प्रेम नहीं बल्कि विशुद्ध व्यावसायिकता ही होती है। चूंकि उन पुरस्कार कार्यक्रमों का प्रसारण जिन टीवी चैनलों पर होता है, उनका बहुत बड़ा दर्शकवर्ग हिंदीभाषी होता है, अतः उस दर्शकवर्ग के मद्देनजर वे कार्यक्रम हिंदी में होते हैं। हालांकि ऐसे कार्यक्रमों में जो हिंदी बोली जाती है, उसमें भी आधे से अधिक अंग्रेजी ही होती है।  
इसके अलावा बॉलीवुड कलाकारों के सोशल मीडिया पर अगर नजर डाली जाए तो वहां भी अंग्रेजी का ही वर्चस्व दिखता है। अमिताभ बच्चन, आशुतोष राणा जैसे कुछेक लोग जरूर यहाँ भी एक अपवाद की तरह हैं, जो अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। लेकिन अंग्रेजीप्रेमी सितारों की भीड़ में ऐसे लोगों की संख्या गिनती की ही है।
साथ ही, यह भी देखा जा सकता है कि बॉलीवुड के लोगों की आत्मकथा हो, जीवनी हो या किसी और विधा पर कोई किताब हो, अधिकांश का मूल लेखन अंग्रेजी में ही होता। बेशक बाद में उसका हिंदी अनुवाद भी ला दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर करण जौहर की आत्मकथा ‘एन अनसूटेबल बॉय’ अंग्रेजी में है, जिसका हिंदी अनुवाद बाद में ‘एक अनोखा लड़का’ के नाम से आया। दिलीप कुमार की आत्मकथा ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ 2014 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई, जिसका हिंदी अनुवाद 2017 में ‘वजूद और पहचान’ के नाम से आया। ऋषि कपूर की आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ भी पहले अंग्रेजी में आई और उसके लगभग साल भर बाद इसी नाम से हिंदी में उसका प्रकाशन हुआ। आत्मकथाओं के अलावा अन्य प्रकार के लेखन में भी बॉलीवुड की पसंद अंग्रेजी ही है। अभिनेत्री से लेखिका बनीं ट्विंकल खन्ना अबतक तीन किताबें ‘मिस फनीबोन्स’, ‘द लीजेंड ऑफ़ लक्ष्मी प्रसाद’, ‘पायजामाज आर फोर्गिविंग’ लिख चुकी हैं और तीनों ही अंग्रेजी में हैं। अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता नंदा ने हाल ही में अपने पहले उपन्यास ‘पैराडाइस टावर्स’ के साथ लेखन के क्षेत्र में प्रवेश किया जो कि अंग्रेजी में ही है। श्वेता बॉलीवुड में सक्रिय नहीं हैं, लेकिन उनके पिता का हिंदी प्रेम देखते हुए ये उम्मीद कोई ज्यादा नहीं थी कि वे अपने लेखन की शुरुआत हिंदी में करतीं। हालांकि यहाँ भी कुछेक अपवाद हैं जैसे कि आशुतोष राणा जो न केवल सोशल मीडिया पर जमकर हिंदी में लिखते हैं बल्कि अपनी किताब ‘मौन मुस्कान की मार’ (व्यंग्य-संग्रह) भी उन्होंने हिंदी में ही लिखी है। मगर कुल मिलाकर इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि बॉलीवुड में अंग्रेजी का कैसा वर्चस्व है।
बॉलीवुड सितारों के अंग्रेजी प्रेम के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि ऐसा वे अपनी पहुँच को भारत के अहिन्दीभाषी क्षेत्रों सहित वैश्विक स्तर तक विस्तार देने के लिए करते हैं। सवाल ये है कि अगर उन्हें अपनी वैश्विक पहुँच की इतनी ही चिंता है तो फिर फ़िल्में भी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं बनाते? कितना विचित्र है कि फ़िल्में हिंदी में बनाएंगे और उससे देश की बहुसंख्यक हिंदीभाषी जनता के जरिये पैसा और वाहवाही भी बटोरेंगे, लेकिन जब बात हिंदी को अपनाने की आएगी तो अंग्रेजी के जरिये अपनी वैश्विक पहुँच बनाने चल देंगे। निस्संदेह अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा है और उसकी पहुँच बहुत अधिक है, लेकिन हमारे कलाकारों को समझना चाहिए कि अंग्रेजी चाहें कितनी भी बड़ी भाषा हो, लेकिन उनके लिए हिंदी का महत्त्व सबसे ऊपर है। वे आज जो कुछ भी हैं, उनको जो भी नाम-पैसा मिला है, उसकी बुनियाद में अंग्रेजी नहीं, हिंदी और हिन्दीभाषी लोग हैं। ऐसे में बोलने-लिखने से जितना अधिक संभव हो, उनके व्यवहार की भाषा हिंदी ही होनी चाहिए। यहाँ यह सफाई भी नहीं चल सकती कि हमें हिंदी ठीक से आती नहीं, इसलिए अंग्रेजी में सबकुछ करना पड़ता है। अगर हिंदी अच्छे-से नहीं आती तो उसे आवश्यक मानकर, सिर्फ फ़िल्मी जरूरतों के लिए नहीं बल्कि एक भाषा के रूप में गंभीरता से सीखने की जरूरत है।
किसी भी भाषा का विस्तार और विकास उसके बोलने-लिखने वालों के जरिये ही होता है। अंग्रेजी की जिस वैश्विक पहुँच पर आज बॉलीवुड सितारे मुग्ध हैं, उसके बनने में अंग्रेजीभाषी लोगों का अंग्रेजी के प्रति समर्पित रुख एक बड़ा कारण है। हिंदी में बाबू देवकीनंदन खत्री का उदाहरण समीचीन है, जिन्होंने हिंदी में लिखा और ऐसा लिखा कि उसे पढ़ने के लिए हजारों-लाखों लोग हिंदी सीखने पर मजबूर हो गए। बॉलीवुड के हिंदी कलाकारों की प्रशंसक श्रृंखला भारत ही नहीं, दुनिया भर में फैली हुई है, ऐसे में यदि वे हिंदी में ही अपना समस्त भाषा-व्यवहार करेंगे तो देश-विदेश के बहुत से अहिंदीभाषी लोग हिंदी सीखने-समझने को प्रेरित हो सकते हैं। उनका यह रुख हिंदी को वैश्विक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मगर यह तभी होगा जब वे हिंदी को दीन-हीन और साधारण लोगों की भाषा समझने की अपनी मानसिकता से बाहर आकर उसे देश की भाषा समझते हुए एक गर्व की अनुभूति के साथ अपनाएंगे और अधिकाधिक रूप से उसका व्यवहार करेंगे।

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

सेक्रेड गेम्स : कला की आड़ में एजेंडा (दैनिक जागरण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

बीते पंद्रह अगस्त को फिल्म निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप की चर्चित वेब सीरिज ‘सेक्रेड गेम्स’ का दूसरा सीजन नेटफ्लिक्स पर प्रसारित हुआ। इसका पहला भाग पिछले साल जून में आया था, जिसे समीक्षकों की सराहना और दर्शकों का रुझान तो मिला था, लेकिन साथ ही इसकी विषयवस्तु और सामग्री को लेकर कई सवाल भी उठे थे। गाली-गलौज भरे संवाद, वीभत्सता की सीमा तक हिंसा एवं एकदम नग्न सेक्स दृश्यों के कारण तो ये वेब सीरिज सवालों के घेरे में आई ही थी, कहानी में मौजूद धर्म और राजनीति से सम्बंधित मनमानी व्याख्याओं व टिप्पणियों ने भी इसके पीछे की नीयत को संदिग्ध बनाने का काम किया था। अब जब इसका दूसरा सीजन आया है, तो ये भी पूर्ववत ढंग से सवालों के घेरे में ही नजर आता है। 
सेक्रेड गेम्स के इस सीजन की कहानी हिन्दू आतंकवाद की वायवीय धारणा पर आधारित है, जिसका केंद्र गुरुजी (पंकज त्रिपाठी) का चरित्र है। गुरुजी पहले भाग में भी थे, लेकिन उन्हें कम संवाद और दृश्य मिले थे। मगर, इस सीजन में सब प्रमुख चरित्रों का सूत्र गुरुजी के ही हाथ में दिखाया गया है। गुरुजी का एक बड़ा-सा आश्रम है, जिसकी आड़ में ड्रग्स का कारोबार चलता है और वहां जाने वाले भक्तों को नशे से सम्मोहित कर लिया जाता है। उनके साथ अप्राकृतिक यौन क्रियाएं की जाती और करवाई जाती हैं। गुरुजी धरती पर पुनः ‘सत्ययुग’ लाना चाहते हैं और इसके लिए उनका तरीका यह है कि वर्तमान जगत को नष्ट कर दिया जाए। उनका मानना है कि अभी दुनिया के अलग-अलग भागों में जो संघर्ष चल रहा है, उसे और बढ़ाया जाए जिससे दुनिया के ख़त्म होने की प्रक्रिया तेजी से बढ़े। गुरुजी की इस योजना की एक प्रमुख कड़ी मुंबई में परमाणु विस्फोट करना है, जिससे भारत-पाकिस्तान सहित बाकी दुनिया में भी संघर्ष पैदा हो और विनाश की प्रक्रिया तीव्र हो जाए। यहाँ तक कि भारत विरोधी आतंकियों से भी गुरुजी के शिष्य अपने मिशन को पूरा करने के लिए मिल जाते हैं।
जाहिर है, गुरुजी के चरित्र के माध्यम से यह वेब सीरिज हिन्दू आतंकवाद की निराधार धारणा को स्थापित करने के प्रयास में दिखती है। मगर दिक्कत यह है कि जब आप सत्य से परे केवल अपने दुराग्रहों से उपजी किसी धारणा को स्थापित करने का प्रयास करते हैं, तो उसमें अतार्किकता और कृत्रिमता आ जाती है। यहाँ भी यही हुआ है। गुरुजी को पूरी साज़िश का सूत्रधार बनाए रखने के चक्कर में कहानी कई स्थानों पर एकदम अतार्किक हो गयी है। गुरुजी की हत्या के बाद गायतोंडे के कान में जादुई ढंग से जब-तब उनकी आवाज गूंजते रहना और उसीके प्रभाव में उसका बिना पूरी साज़िश का खुलासा किए  आत्महत्या कर लेना इस अतार्किकता का ही उदाहरण है। जिस तरह से आश्रम में नशे के द्वारा सम्मोहित कर लोगों को सत्ययुग लाने के मिशन के लिए तैयार किया जाता है, वो भी विचित्र ही लगता है। असल में गुरूजी के चरित्र को सर्वशक्तिमान दिखाने के अन्धोत्साह में कहानी कई तकनीकी खामियों का शिकार हुई है।  
धार्मिक प्रतीकों को लेकर भी सेक्रेड गेम्स-2 में कई आपत्तिजनक बातें दिखती हैं।  ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ इस मंत्र का गुरुजी जाप करते हैं। ये यजुर्वेद से निकला एक महामंत्र है, जिसका अर्थ है कि मैं ही ब्रह्म हूँ। ऐसे महामंत्र का जाप गुरुजी अपनी अप्राकृतिक यौन क्रियाओं के दौरान भी करते हैं, जो कि भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली बात ही है। इसी तरह ‘भगवान’ शब्द को लेकर अनेक आपत्तिजनक संवाद इस वेब सीरिज में मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर गायतोंडे एक जगह अपने पिता के प्रति कहता है, ‘वो खुद को भगवान की …. का बाल समझता था’। ये संवाद इतना अनुचित और आपत्तिजनक है कि यहाँ पूरा लिखा तक नहीं जा सकता। सेक्रेड गेम्स-2 में भगवान के विषय में ऐसे अनेक अनुचित संवाद आए हैं। इसी तरह सरताज सिंह का गुस्से में अपना कड़ा निकालकर फेक देना भी अनुचित लगता है, जिसे लेकर भाजपा नेता तेजिंदर बग्गा की तरफ से केस भी कर दिया गया है। उल्लेखनीय बात ये है कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली ये सब बातें वेब सीरिज की मूल कहानी से कोई ताल्लुक नहीं रखतीं और न ही उसमें कोई अतिरिक्त प्रभाव उत्पन्न करती हैं। अगर ये बातें इस वेब सीरिज में न होतीं तो भी इसकी कहानी को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता यानी कि इनसे बचा जा सकता था। लेकिन इसके बावजूद इन चीजों को वेब सीरिज में रखा जाना निर्माता-निर्देशकों की नीयत पर प्रश्नचिन्ह ही लगाता है। यह ठीक है कि देश में सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन उसके साथ नैतिकता की एक मर्यादा भी होती है। यह अपेक्षा भी होती है कि आप अपनी इस स्वतंत्रता का उपयोग किसीकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं करेंगे। मगर, दुर्भाग्यवश सेक्रेड गेम्स के दोनों ही सीजनों में कमोबेश यह किया गया है। 
बात इतने पर ही खत्म नहीं होती, बल्कि इस वेब सीरिज में यह स्थापित करने की भी कोशिश की गयी है कि देश में मुसलमान बड़ी बुरी दशा में हैं। इंस्पेक्टर माज़िद को मुसलमान होने के कारण घर न मिलने, कामकाज के दौरान अक्सर उसपर शक किए जाने जैसे प्रसंग हों या साद नामक मुस्लिम लड़के को सरेआम मार दिया जाना हो या यह संवाद कि ‘मुसलमान को उठाने के लिए वजह की जरूरत होती है क्या?’ हो, इन सब चीजों के माध्यम से यही धारणा गढ़ने की कोशिश हुई है कि भारत में मुस्लिम समुदाय बड़ी बुरी स्थिति में है। इस वेब सीरिज के निर्देशक अनुराग कश्यप अभी हाल ही में मुस्लिमों की मोब लिंचिंग को लेकर पीएम को पत्र लिखने वाले उनचास लोगों में शामिल रहे थे, ऐसा लगता है कि उन्होंने जिन पूर्वाग्रहों के आधार पर वो पत्र-अभियान चलाया था, इस वेब सीरिज में उन्हीं पूर्वाग्रहों को परोस दिए हैं। 

कितना विचित्र है न कि आज दुनिया में छाती ठोंक के जिस मजहब के नाम पर आतंकवाद चल रहा है, उसके विषय में खुलकर अनुराग कश्यप कुछ नहीं कहते, लेकिन जो हिन्दू आतंकवाद कहीं किसी रूप में अबतक सिद्ध नहीं हुआ है, उसकी एक कपोल-कल्पित कहानी बना डालते हैं। इसी तरह मोब लिंचिंग जैसी विशुद्ध आपराधिक समस्या का साम्प्रदायिकरण कर डालते हैं। यह सब चीजें समाज में गलत सन्देश देने वाली हैं। इनसे बचा जाना चाहिए था।

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

विधाओं की मृत्यु का बेसुरा राग (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

हिंदी के एक कवि हैं मंगलेश डबराल। वर्ष 2015 में पुरस्कार वापसी प्रकरण के दौरान पुरस्कार वापस करने को लेकर चर्चा में आए थे, लेकिन इसके बाद एक लम्बे समय से उनकी कोई चर्चा नहीं थी। उन्होंने कुछ नया रचा हो, उसपर कोई विमर्श हुआ हो, ऐसी किसी तरह की कोई बात उनके विषय में सुनने में नहीं आई। लेकिन अभी पिछले दिनों अचानक एक फेसबुक पोस्ट लिखकर वे नकारात्मक रूप से ही सही, चर्चा में आ गए। उन्होंने लिखा, ‘हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास बहुत लिखे जा रहे हैं, लेकिन सच यह है कि इन सबकी मृत्यु हो चुकी है हालांकि ऐसी घोषणा नहीं हुई है और शायद होगी भी नहीं क्योंकि उन्हें खूब लिखा जा रहा है।लेकिन हिंदी में अब सिर्फ 'जय श्रीराम' और 'बन्दे मातरम्' और 'मुसलमान का एक ही स्थान, पाकिस्तान या कब्रिस्तान' जैसी चीज़ें जीवित हैं। इस भाषा में लिखने की मुझे बहुत ग्लानि है। काश, मैं इस भाषा में न जन्मा होता!’ डबराल की पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर इसको लेकर लेखकों, साहित्य में रुचि लेने वाले सामान्य लोगों के बीच चर्चाओं-बहसों का दौर शुरू हो गया। ज्यादातर मुद्दों की तरह इसपर भी दो खेमे बन गए। एक खेमा डबराल के विरोध में तो दूसरा उनके बचाव में जुट गया। विरोधियों को ज्यादा आपत्ति उनकी ग्लानि वाली बात पर थी। लोग सवाल उठा रहे थे कि जिस भाषा ने इन कविवर को इतना मान-सम्मान दिया, आज उसमें लिखने को लेकर ये ग्लानि व्यक्त करने जैसी कृतघ्नता कैसे कर सकते हैं। वहीं बचाव करने वाले पोस्ट को अभिधा की बजाय व्यंजना में समझने की बात कहते हुए डबराल के पक्ष में दलीलें देने लगे। हालांकि हिंदी के विषय में पूर्वाग्रहजनित मनमाफिक धारणाएँ प्रस्तुत करते हुए उसमें लिखने के प्रति ग्लानि व्यक्त करने में कौन-सी व्यंजनात्मकता छुपी है, ये बहुत विचार करने पर भी समझ में नहीं आता। बहरहाल, विवाद बढ़ता देख कविवर ने अपनी पोस्ट संपादित करते हुए उसमें से चुपचाप ग्लानि वाली बात हटा दी है। लेकिन क्या इस पोस्ट का केवल इतना ही हिस्सा आपत्तिजनक है, जो इसे हटाकर डबराल सवालों से बच जाना चाहते हैं। वास्तव में, ये पूरी पोस्ट ही भ्रामक, तथ्यहीन और कुंठाओं की उपज है।
कहानी, कविता, उपन्यास जैसी विधाओं की मृत्यु की घोषणा एवं अनर्गल ढंग से हिंदी को सांप्रदायिक करार देने की कोशिश इस पोस्ट की सबसे ज्यादा आपत्तिजनक बात है। मंगलेश डबराल को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर उन्होंने किस आधार पर हिंदी के साम्प्रदायिकरण का दावा किया है? यह भी कि उक्त तीन प्रमुख विधाओं को मृत बताने के पीछे उनके पास क्या तर्क, क्या तथ्य हैं? क्या आज इन विधाओं में जो साहित्य लिखा जा रहा है, उसको उन्होंने सम्यक प्रकार से पढ़ा है?
ये आवश्यक नहीं कि जिसे वे बेहतर साहित्य मानते हों, वो ही बेहतर हो और जो उनकी दृष्टि में उत्तम न हो, उसे अस्वीकार दिया जाए। साहित्य किसी एक व्यक्ति की थाती नहीं, पूरे समाज की एक परम्परा होता है। विधाओं की मृत्यु की घोषणा करने से पूर्व यह बात मंगलेश डबराल को सोचनी चाहिए थी। वे आज के लेखन पर तर्कों के साथ सवाल खड़े कर सकते थे, मगर उसे मृत घोषित कर देना कदापि उचित नहीं है।
किसी विधा के जीवित होने का प्रमाण क्या है? यही न कि उसमें कितना साहित्य रचा जा रहा है और उसे कितनी स्वीकृति मिल रही है। सो हिंदी उपन्यास और कहानी आज भी बड़ी मात्रा में रचे जा रहे हैं व समकालीन समस्याओं, चुनौतियों व जीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त करने के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित हैं। विषयवस्तु से लेकर भाषा-शैली तक इन विधाओं ने पूर्व की तुलना में बहुत विकास किया है। आज वरिष्ठ लेखक नरेंद्र कोहली की कलम से ‘वरुणपुत्री’ जैसा पुरातनता, आधुनिकता, पुराण और विज्ञान के साथ-साथ फैंटेसी को भी समाहित किया उपन्यास निकल रहा है। वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुद्गल किन्नरों पर केन्द्रित ‘पोस्ट बॉक्स नम्बर- 203 नाला सोपारा’ की रचना की हैं। रत्नेश्वर जैसे लेखक भी हैं, जिन्होंने ग्लोबल वार्मिंग जैसी विश्वव्यापी समस्या पर शोध के साथ ‘रेखना मेरी जान’ लिखा है और आगे पानी पर एक शोधपूर्ण उपन्यास लाने में जुटे हैं। ये सब हाल के वर्षों में आए कुछ उपन्यासों के नाम हैं, ऐसी और भी अनेक कृतियाँ इस दौरान आई हैं, इन उदाहरणों का आशय बस इतना है कि वर्तमान समय में हिंदी उपन्यास का फलक लगातार विस्तार को प्राप्त हो रहा है। नए लेखक भी लिख और बिक दोनों रहे हैं तथा अपने साहित्यिक काल के निर्माण में जुटे हैं। हिंदी कहानी भी अलग-अलग प्रयोगों के साथ अपनी भूमिका का संतोषजनक निर्वहन कर रही है। हालांकि इन विधाओं के साथ कुछेक चुनौतियाँ व समस्याएँ भी हैं, मगर इनके अस्तित्व पर कोई संकट हो, ऐसा बिलकुल नहीं है।
अब बात हिंदी कविता की करें तो यह ठीक है कि आज उसकी दशा कहानी व उपन्यास जैसी विधाओं की अपेक्षा बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती। हिंदी में कविताएँ रची तो आज भी खूब जा रही हैं, लेकिन उनमें कविता के वो तत्व नहीं दिखाई देते जिनके जरिये वो जनसामान्य से सहज ही जुड़ाव स्थापित कर लेती थी। आज मुख्यधारा की हिंदी कविता केवल बौद्धिक चारदीवारी के भीतर विमर्श की वस्तु बनकर रह गयी है।
वास्तव में एक विधा के रूप में हिंदी कविता के विनाश की शुरुआत वामपंथी विचारधारा से प्रभावित प्रगतिवादी युग से ही हो गयी थी। प्रगतिवादी युग में हिंदी कविता को छायावाद के कल्पना-लोक से हकीकत की जमीन पर लाकर सामाजिक यथार्थ से जोड़ने के नाम पर वामपंथी रचनाकारों द्वारा जिस तरह से इसकी शिल्पगत कसौटियों को एक-एक कर भंग करने की कु-परम्परा का सूत्रपात किया गया, उसीने हिंदी कविता की वर्तमान दुर्दशा की पृष्ठभूमि का निर्माण किया। हिंदी कविता की इस दुर्दशा में आज उसके हाल पर व्यथित हो रहे मंगलेश डबराल और उनके साथी कवियों का दोष भी कम नहीं है। इन्होने जो काव्य-रचना की है, वो केवल इन लोगों के आपसी विचार-विमर्श तक सीमित है, जनसामान्य के लिए उसमें कोई आकर्षण नहीं है। इस दुर्दशा के बावजूद हिंदी कविता अभी मरी नहीं है, वो जीवित है और मंचीय कवियों के कंठ में सांस ले रही है और उम्मीद है कि देर-सबेर यहीं से वो अपने अस्तित्व का नया अध्याय लिखेगी। अतः मंगलेश डबराल यदि हिंदी साहित्य की समृद्ध की दिशा में कुछ नहीं कर पा रहे तो कम से कम उन्हें विधाओं की मृत्यु का बेसुरा राग गाना तो बंद ही कर देना चाहिए।