सोमवार, 25 जनवरी 2016

साढ़े छः दशकों में क्या खोया, क्या पाया [दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण और राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

राष्ट्रीय सहारा 
आज हमे गणतंत्र  हुए साढ़े छः दशक से अधिक का समय बीत चुका  हैं  ऐसे में एक स्वतंत्र गणराज्य के गणतंत्रता  दिवस के अवसर पर यह जरूरी है कि उसके आजाद एवं लोकतांत्रिक इतिहास की उपलब्धियों और विफलताओं का मूल्यांकन किया जायआजादी के बाद दर्जनों पंचवर्षीय योजनाओं के साथ बढ़ते हुए अगर हमने बहुत कुछ पाया है तो कई मोर्चों पर हम बुरी तरह असफल भी रहे  हैइसी संदर्भ में अगर हम आजादी के इन साढ़ें छः दशकों में भारत की सफलताओं-विफलताओं के इतिहास पर एक  नजर डालें तो थोड़े असंतुलन के साथ ये दोनों ही चीजें हमें कहीं ना कहीं देखने को मिलती हैंकुछ प्रमुख सफलताओं से बात शुरू करें तो आजादी के बाद हमारी सबसे बड़ी सफलता यही रही कि हमने अविलम्ब एक मजबूत और आदर्श लोकतंत्र की स्थापना की तथा अपने संविधान को भी बड़ी शीघ्रता से आत्मसात कर लियाइस विषय में कहा जा सकता है कि भारतीय जनमानस अपने संविधान से जितना शीघ्र जुड़ा, उतना गहरा और जल्दी में हुआ जुडाव  बहुत कम देशों में देखने को मिला हैउदाहरण के तौर पर ऐसे देशों की कोई कमी नहीं है जहाँ अकसर एक नया संविधान बनता और जनता द्वारा खारिज होता हैहमारी दूसरी महत्वपूर्ण सफलता है कि आजादी के बाद चार-चार युद्धों तथा तमाम अन्य राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं को झेलने के बावजूद हमने सिर्फ उनसे अपनी मातृभूमि को सुरक्षित रखा, बल्कि कभी तेज तो कभी धीमी गति से ही सही निरंतर प्रगतिशील भी रहेइसके लिए पहला श्रेय जाता है देश की ढाल बनकर सीमा पर खड़े हमारे उन बहादुर जवानों को जिनके भरोसे देश दुश्मनों के हर षडयंत्र से निर्भय होकर प्रगति की ओर उन्मुख रहता हैआजादी के बाद की एक और बड़ी उपलब्धि पर नजर डालें तो विश्व समुदाय में पूर्व की अपेक्षा आज हर क्षेत्र में भारत ने अपनी एक विशेष साख कायम की हैफिर चाहें वो आर्थिक क्षेत्र हो या सामाजिक, कला हो या विज्ञान, खेल-कूद हो या शिक्षा-दीक्षा, इन सब में तथा और भी बहुत सारे क्षेत्रों में अब समूची दुनिया में भारत का झंडा लहराने लगा हैस्थिति ये है कि जिन मुल्कों के भरोसे कभी भारत की अर्थव्यवस्था चलती थी, आज वो मुल्क भारत के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए इच्छुक हैंकुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि आज भारत भले ही विकसित राष्ट्र हो, पर वो  एक सक्षम और समर्थ राष्ट्र अवश्य बन चुका है   
दैनिक जागरण 
  हालाकि उपलब्धियों के फेहरिश्त की गुमान में हम अपनी तमाम खामियों से मुह नहीं मोड़ सकतेउन तमाम प्रमुख बिंदुओं जिनपर आजादी के बाद से ही भारत काफी हद तक विफल रहा है, पर भी विचार करना जरूरी हैवर्तमान में अगर देखा जाय तो भारत भ्रष्टाचार, महंगाई, गरीबी, स्वास्थ्य सहित कई आंतरिक समस्याओं का समाधान खोज पाने में अभी तक नाकाम रहा है  आंकड़ों की माने तो भ्रष्टाचार के मामले में भारत धीरे-धीरे दुनिया के महाभ्रष्ट देशों की सूची में शुमार होने की तरफ बढ़ रहा हैआजादी के बाद से ही भारत में भ्रष्टाचार की समस्या बहुत छोटे रूप में धीरे-धीरे पनपने लगी थी जो कि आज अपने चरम तक पहुँच चुकी हैभारत की विफलता के कई अन्य  बिंदु भी इस भ्रष्टाचार से ही जुड़े हुए हैं  भ्रष्टाचार ही वो  कारण है जिससे कि आज भारतीय राजनीति का नैतिक अवमूल्यन अपने चरम पर पहुँच चुका हैआज भ्रष्टाचार के कीचड़ में लगभग पूरा राजनीतिक महकमा आकंठ डूब चुका हैऐसे नेता गिने-चुने हैं जिनपर भ्रष्टाचार का कोई प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष आरोप होअपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए सियासी  आकाओं द्वारा हर स्तर पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने के कारण आज लोक और तंत्र के बीच अविश्वास की एक गहरी खाई सी बन गई हैलोक और तंत्र के बीच की इस खाई ने यह भय पैदा कर दिया है कि कहीं जनता और सत्ता के बीच संघर्ष की स्थिति जायजनता के बीच से लगातार सत्ता-विरोधी आवाजें उठने लगी हैंइस संदर्भ में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि भ्रष्टाचार का ये रोग सबसे अधिक उन्हीको लगा है जिनके ऊपर इसके निदान का दायित्व है । हालांकि विगत लोकसभा चुनाव में जिस तरह से भारतीय जनमानस ने अपना भरोसा नरेंद्र मोदी पर दिखाया और उनके शासन के लगभग दो वर्षों में कमोबेश वो भरोसा कायम भी रखा है, उससे कहीं न कहीं आशा जगती है कि बेहतर नेतृत्व मिले तो लोक और तंत्र के बीच का अविश्वास मिट सकता है । वैसे  आतंरिक सुरक्षा के मसले पर भी भारत काफी हद तक विफल ही नज़र आता  हैइस स्तर पर भारत की विफलता का सर्वश्रेष्ठ परिचायक भारतीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए सिरदर्द बन चुके नक्सली हैंइससे कत्तई इंकार नही किया जा सकता कि नक्सलियों के उदय के शुरुआती दौर में तत्कालीन सरकारों  द्वारा उनके प्रति उदारवादी रुख अपनाने के कारण ही आज वो इतने ताकतवर हो चुके हैं कि हमारे विशेष पुलिस बलों के लिए भी उन्हें रोकना आसान नही पड़ रहा हैइन सबके बाद जिस बिंदु पर हम सर्वाधिक विफल हुए हैं वो है सांस्कृतिक संरक्षणप्रगतिशीलता के अन्धोत्साह के कारण युवाओं में पाश्चात्य संस्कृति के प्रति बढ़ते झुकाव तथा संप्रेषण के तमाम तकनीकी माध्यमो के द्वारा गलत तत्वों से जुड़ाव के कारण आज भारतीय संस्कृति पतन की ओर अग्रसर हैआलम ये है कि रिश्तों की मर्यादाओं पर मानसिक विकृति हावी हो रही है जोकि निश्चित ही बड़ी चिंता का विषय है । इसका उदाहरण अभी हाल ही में पोर्न बैन पर देश के लोगों द्वारा जताए गए विरोध में देखा जा सकता है । इस विषय में समझ आने वाली बात ये है कि जिस भारतीय संस्कृति की समूचे विश्व में सराहना होती है, उसे अपने ही लोग कैसे और क्यों भूलते जा रहे हैं ?
  बहरहाल, उपर्युक्त सभी सफलताओं-विफलताओं के बावजूद संतोष की बात ये है कि जैसे-तैसे ही सही, हमने अपनी आजादी को सिर्फ सुरक्षित रखा है बल्कि अपने लोकतंत्र को स्थिर रखते हुए विश्व बिरादरी में ससम्मान प्रतिष्ठित भी हुए हैंहाँ, अब जरूरत इस बात की है कि हमारे सियासी हुक्मरान हमारी आजादी गणतंत्र के इतिहास का पुनरावलोकन करते हुए अपने चरित्र को भी उस दौर के नेताओं सा बनाने का प्रयास करेंअगर वो उस दौर के नेताओं का आंशिक चरित्र भी अपने में ला पाते हैं, तो तय मानिए कि देश अब की तुलना में दुगनी-तिगुनी रफ़्तार से प्रगतिशीलता को प्राप्त होगासाथ ही, सही मायने में यही हमारे उन वीर सपूतों, जिनके कारण आज ये आजादी और लोकतंत्र है, के लिए सच्ची श्रद्धांजली भी होगी

बुधवार, 20 जनवरी 2016

आर्थिक असमानता पर कब चेतेंगे [अमर उजाला कॉम्पैक्ट और दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
     

अमर उजाला कॉम्पैक्ट 
समाज के निचले तबके के हित की बात करने व उसके लिए एक से बढ़कर योजनाए चलाने का दावा दुनिया भर की सरकारें भले करती रही हों, लेकिन इन सब दावों की पोल खोने वाली हकीकत यह है कि दुनिया के १ प्रतिशत लोगों के पास दुनिया के ९९ प्रतिशत लोगों से अधिक संपत्ति है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था ऑक्सफेम द्वारा आर्थिक असमानता पर हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में यह आंकड़ा रखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के सिर्फ ६२ अमीर लोगों के पास ७६ खरब डॉलर हैं जो कि दुनिया के आधे गरीब लोगों की कुल संपत्ति से अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष २०१० से अबतक सर्वाधिक अमीर लोगों की संपत्ति में ४४ फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है तो वहीँ साढ़े तीन अरब सर्वाधिक गरीब लोगों की संपत्ति में ४१ फीसदी की कमी हुई है। सन २०१० से लेकर २०१५ के बीच दुनिया के आधे सबसे गरीब लोगों यानी साढ़े तीन अरब लोगों की कुल संपत्ति में ४१ फीसदी की गिरावट आई है, जो कि एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। जबकि इसी कालावधि में दुनिया के ६२ सर्वाधिक अमीर लोगों की संपत्ति ५०० अरब डॉलर से बढ़कर १.७६  ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई है यानी करीब २५०% ज़्यादा। अमीरों के अमीर होने की यह प्रक्रिया किस तीव्रता से चल रही है, इसे रिपोर्ट के इस आंकड़े के जरिये और अच्छे समझा जा सकता है कि वर्ष २०११ में दुनिया की आधी दौलत ३८८ अमीर लोगों के पास थी जो वर्ष २०१२ में १७७ लोगों, वर्ष २०१४ में ८० और वर्ष २०१५ आते-आते महज ६२ लोगों के पास सिमट कर रह गई। स्पष्ट होता है कि दुनिया की सरकारों द्वारा गरीबों के कल्याण की तमाम योजनाए चलाए जाने के बावजूद विगत वर्षों में अमीर और अमीर हुए हैं जबकि गरीब और गरीब होते गए हैं। संयोग यह है कि यह रिपोर्ट उस वक़्त आई है जब अभी हाल ही में दुनिया सर्वाधिक अमीर देश दावोस में वर्ल्ड इकनोमिक फोरम की बैठक करने जा रहे हैं जहाँ दुनिया में गरीबी कम करने और विकास को बढ़ाने जैसे पहलुओं पर बात की जानी है। ऑक्सफेम की तरफ से कहा गया है कि इस रिपोर्ट को उस बैठक में भी पेश किया जाएगा और मांग की जाएगी कि आर्थिक असमानता की बेहद तेजी से बढ़ रही इस खाई को पाटने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं।
  वैसे ऑक्सफेम ने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ समस्याएँ ही नहीं गिनाई हैं, बल्कि उनके कारणों पर भी बात की है। रिपोर्ट में सुरसामुख की तरह बढ़ रही इस आर्थिक असमानता के लिए प्रमुख रूप से कर चोरी जैसे कारणों को रेखांकित किया गया है। कहा गया है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ कर चुकाने से बचने के लिए तमाम हथकण्डे अपनाती हैं जो कि सामजिक कामकाज पर बेहद गलत प्रभाव डालता है। रिपोर्ट में २०१ शीर्ष कंपनियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ये कम्पनियां जिन १८८ देशों से सम्बंधित हैं, वहां या तो कर व्यवस्था है ही नहीं और यदि है भी तो काफी छूटों के साथ है। अतः आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए यदि दुनिया के देश वाकई में गंभीर हैं तो उन्हें चाहिए कि अपने यहाँ कर व्यवस्थाओं को दुरुस्त करें जिससे करयुक्त किसी भी संपत्ति पर सही ढंग  से कर वसूला जा सके तथा देश-समाज उससे लाभान्वित हो सके। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि दुनिया के सर्वाधिक अमीर लोगों द्वारा अर्जित अधिकांश संपत्ति कर बचत करने वाली व्यवस्था के जरिये  इकठ्ठा की गई है। अगर इस धन पर उचित ढंग से कर लगे तो दुनिया की सरकारों को प्रतिवर्ष १९० अरब डॉलर की कमाई हो सकती है जिससे दुनिया में स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों में काफी कुछ किया जा सकता है। पर दिक्कत यही है कि व्यवस्था भी धनकुबेरों के पक्ष में ही काम कर रही है, इसीलिए तो दुनिया के तमाम देशों में कर नियम बेहद ढीले हैं या हैं ही नहीं।
दबंग दुनिया 
  

  विचार करें तो ऑक्सफेम की यह रिपोर्ट हमें काफी कुछ सोचने पर विवश करती है। एक तरफ जब दुनिया में मानवाधिकार और जनकल्याण को लेकर तरह-तरह की पहल हो रही हो, उसवक्त दुनिया में गरीबों की यह स्थिति होना दुनिया के गरीबी निवारण के प्रयासों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। एक आंकड़े के मुताबिक़ आज दुनिया के प्रत्येक ९ में से एक व्यक्ति को भूखे सोना पड़ता है, ऐसे में १ प्रतिशत लोगों की तरफ धन का ये ध्रुवीकरण सवाल खड़ा करता है कि क्यों यह धन सबके पास बराबर-बराबर और जरूरत भर का नहीं हो सकता ? इस सवाल का जवाब यह है कि धन को लेकर समय के साथ हमारी अवधारणा बदलती गई है और इसे जरूरत की बजाय महत्वाकांक्षा की वस्तु बना दिया गया है। यही कारण है कि दुनिया के जिन सर्वाधिक अमीर लोगों के पास इतना धन है, वे भी और धन जुटाने के लिए प्रयास या दुष्प्रयास करने से नहीं चूकते। अगर उन अमीर लोगों से पूछा जाय कि जितना धन उनके  पास है, उसका वे किसलिए इस्तेमाल करेंगे तो निस्संदेह वे निरुत्तर हो जाएंगे। दरअसल उनके लिए इस अबाध धनार्जन का अपना जीवन स्तर बेहतर करने से कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि जीवन की सभी सुख-सुविधाएं इससे काफी कम धन में प्राप्त हो जाने वाली होती हैं और ये सुख-सुविधाएं अमीर लोगों के पास बड़े आराम से उपलब्ध होंगी भी। लेकिन बावजूद इसके अगर वे लगातार धन अर्जन करने के लिए प्रयास करते रहते हैं तो यह सिर्फ उनकी धन-लिप्सा और महत्वाकांक्षा है। लेकिन उन अमीर लोगों को अब ये कौन समझाए कि उनकी धन-लिप्सा के चलते दुनिया के अनगिनत गरीब लोग, जिनके अधिकार के आर्थिक संसाधन हथियाकर वे अमीर बने बैठे हैं, कैसा नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हैं।  अब भले ही आर्थिक असमानता की यह त्रासद तस्वीर अमीरों को दिखाई न दे रही हो या देखते हुए भी वे इससे अनजान बन रहे हों, लेकिन हकीकत यही है कि स्थिति दिन ब दिन काफी ख़राब होती जा रही है। यह सही है कि आज गरीब चुप हैं और स्थिति को सहन कर रहे हैं, लेकिन एक समय आएगा कि उनकी सहनशक्ति की सीमा ख़त्म हो जाएगी और तब शायद उनके पास अपने अधिकार के आर्थिक संसाधनों को पाने के लिए सिवाय संघर्ष का रास्ता चुनने के और कोई उपाय नहीं होगा। ऐसे में विश्व की क्या स्थिति होगी, यह कल्पना भी सिहराने वाली है। इस लिहाज से  आर्थिक असमानता की यह समस्या न केवल चिंतित करती है, बल्कि डराती भी है। उचित होगा कि समय रहते इससे दुनिया के अमीर देश व उनके अमीर लोग चेत जाएं और इसके निवारण की दिशा में कदम उठाएं, अन्यथा यह दुनिया के भविष्य के लिए अत्यंत संकटकारी सिद्ध हो सकती है। 

रविवार, 17 जनवरी 2016

गांधीजी के सपना टूटत, जाता अन्हार में देशवा [भोजपुरी ई-पत्रिका आखर में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 
    आखर 

कबो रहे जे सोन चिरइया,
उहाँ न बा अब सोना चाँदी !
बहत रहे जहँ नदी दूध के,
उहाँ भूखि से  मरे  अबादी !
चोर पहुँचि गइलन सन सत्ता, धरि नेता जईसन भेषवा !
गाँधीजी  के  सपना  टूटत, जाता  अन्हार  में  देसवा !

ढाई सदी रहे  गोरन  के,
फेर जाके  आईल खादी !
लाख पूत आ सेनुर कीमत,
बड़ महंग बा  ई आजादी !
बाकिर  कीमत  आजादी  के, नहीं समझे देस नरेसवा !
गाँधीजी  के  सपना  टूटत, जाता  अन्हार  में  देसवा !

भ्रष्टतंत्र के  दीमक  लागल !
खोखल हो गईल इमान सब !
पईसा  की रँगन में रँगि के,
बा बदल  गईल  इंसान सब !
प्रेम, त्याग, सुख कमे लऊके,  बस लऊके  कलह  कलेशवा !
गाँधीजी  के  सपना  टूटत,  जाता   अन्हार   में   देसवा !

अनगिनत समस्या बादो भी,
बा झिलमिल आस के दीयना !
युवा  खून,  ई  देश   बचाई,
बा  ई  बिस्वास  के  दीयना !
युवा  बनी  जनता  के  सेवक,  न  नेता जईसन बलेशवा !
गाँधीजी  के  सपना  पूजी,  उबरी   अन्हार   से   देसवा !

शनिवार, 16 जनवरी 2016

फसल बीमा योजना से कितनी मिलेगी राहत ? [दैनिक जागरण राष्ट्रीय, दबंग दुनिया और पंजाब केसरी में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दैनिक जागरण 
विगत दो वर्षों से लगातार व्यापक स्तर पर सूखा झेलने के कारण आत्महत्या को विवश हो रहे देश के किसानों को राहत देने के उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा नई फसल बीमा योजना का आगाज किया गया है। सरकार का कहना है कि ये योजना पहले से मौजूद फसल बीमा योजनाओं की अन्तर्निहित खामियों को सुधारकर तथा कुछ नए और किसानों को अधिकाधिक जोखिम सुरक्षा देने वाले प्रावधानों को शामिल करके तैयार की गई है। इस सन्दर्भ में इस योजना के कुछ मुख्य प्रावधानों पर गौर करें तो जहाँ पहले की फसल बीमा योजनाओं में प्रीमियम की दर अधिकतम १५ प्रतिशत तक थी, वहीँ इस योजना में वो अधिकतम पांच प्रतिशत कर दी गई है। रबी के अनाज एवं तिलहनी फसलों के लिए १.५  प्रतिशत प्रीमियम जबकि खरीफ के अनाज तथा तिलहनों के लिए दो प्रतिशत प्रीमियम देना होगा। उद्यानिकी और कपास की फसल के लिए दोनों सत्रों में पांच प्रतिशत तक प्रीमियम तय किया गया है। यह व्यवस्था भी की गई है कि नुकसान के संभावित दावे का २५ प्रतिशत तत्काल किसान के खाते में पहुँच जाए। इसके अलावा इस नई फसल बीमा योजना में आपदा की परिभाषा को और विस्तार दिया गया है, जिससे फसल को नुकसान पहुंचाने वाली अधिकाधिक आपदाजन्य स्थितियों में किसानों को सुरक्षा मिल सके। कुल मिलाकर यह योजना देखने में तो काफी बेहतर लगती है और अगर इसका क्रियान्वयन भी ठीक ढंग से होता है तो निस्संदेह यह किसानों की मुश्किलातों को कम करने में सहायक होगी। लेकिन बावजूद इसके एक सवाल यह उठता है कि क्या इस योजना से देश के किसानों की समस्याओं का सम्यक समाधान होगा और उनकी दशा में सुधार आएगा ? विचार करें तो इस सवाल का जवाब नकारात्मक ही प्रतीत होता है क्योंकि देश में किसानों की बिगड़ती दशा के लिए सिर्फ प्राकृतिक या अन्य कुछ आपदाएं ही जिम्मेदार हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता। ये आपदाएं तो किसानों की अनेक समस्याओं के समुच्चय का एक अवयव मात्र हैं।  
पंजाब केसरी 
यह जानने के लिए आज किसी शोध की जरूरत नहीं कि किसान आत्महत्या की त्रासदी काफी हद तक खेती की समस्याओं व हमारे किसानों की दुर्दशा से सम्बद्ध है। अगर भारत के किसानों की समस्याओं पर नज़र डालें तो उनकी एक लम्बी फेहरिस्त सामने आती है। चूंकि, भारत में खेती का उद्देश्य व्यावसायिक नहीं, जीविकोपार्जन का रहा है। इस नाते किसान की स्थिति तो हमेशा से दयनीय ही रहती आई है। तिसपर यहाँ खेती लगभग भाग्य भरोसे ही होती है कि अगर सही समय पर आवश्यकतानुरूप वर्षा हो गई, तब तो ठीक, वर्ना फसल बेकार। आज पेड़-पौधों में कमी के कारण वर्षा का संतुलन बिगड़ रहा है और इसका बड़ा खामियाजा हमारे किसानों को उठाना पड़ रहा है। हाल के कुछ वर्षों में तो कोई ऐसा साल नहीं गया, जिसमे कि देश में कुछ इलाके पूरी तरह से तो कुछ आंशिक तौर पर सूखे की चपेट में न आएं हों। हालांकि उपकरणों की सहायता से सिंचाई करने की तकनीक अब हमारे पास है। लेकिन, एक तो यह सिंचाई काफी महँगी होती है, उसपर इस सिंचाई से फसल को बहुत लाभ मिलने की भी गुंजाइश नहीं होती। क्योंकि एक तरफ आप सिंचाई करिए, दूसरी तरफ धूप सब सुखा देती है। सूखे की समस्या के अलावा कुछ हद तक जानकारी व जागरूकता का अभाव भी हमारे किसानों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। हालांकि किसानों में जानकारी बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा किसान कॉल सेंटर जैसी व्यवस्था की गई है, मगर जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था किसानों को बहुत लाभ दे पाई हो, ऐसा नहीं कह सकते। ये तो किसानों की कुछ प्रमुख समस्याओं की बात हुई, इसके अलावा और भी अनेकों छोटी-बड़ी समस्याओं से संघर्ष करते हुए हमारे किसान खेती करते हैं।  ऐसे किसान जिनकी पूरी आर्थिक निर्भरता केवल खेती पर ही होती है, खेती के लिए बैंक अथवा साहूकार आदि से कर्ज लेते हैं, लेकिन मौसमी मार के चलते अगर फसल ख़राब हुई तो फिर उनके पास कर्ज से बचने के लिए आत्महत्या के सिवाय शायद और कोई रास्ता नहीं रह जाता। इसके अतिरिक्त किसानों के पास खेती योग्य भूमि का अभाव होता जाना भी उनकी मुश्किलें बढ़ाने वाला है। एक आंकड़े की मानें तो आज देश के ९० फीसदी किसानों के पास खेती योग्य भूमि २ हेक्टेयर से भी कम है और इनमे से ५२ फीसदी किसान परिवार भारी कर्ज में डूबे हुए हैं।
दबंग दुनिया 
  इसी सन्दर्भ में उल्लेखनीय होगा कि विगत वर्ष भारतीय ख़ुफ़िया ब्यूरों (आईबी) द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को देश के किसानों की समस्याओं व उनकी दुर्दशा से सम्बंधित एक ख़ुफ़िया रिपोर्ट सौंपते हुए सरकार को  इस विषय में चेताया गया था। आम तौर पर सरकार से देश की सुरक्षा से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील सूचनाएं साझा करने वाली आईबी ने किसानों की समस्याओं जैसे मसले पर सरकार को ख़ुफ़िया रिपोर्ट दी इसीसे समझा जा सकता है कि यह मसाला कितना गंभीर था। रिपोर्ट में कहा गया था कि महाराष्ट्र, केरल, पंजाब आदि राज्यों में तो किसानों की आत्महत्याओं का बाहुल्य है ही, यूपी और गुजरात जैसे राज्यों में भी अब इस तरह के मामले ठीकठाक संख्या में सामने आने लगे हैं। इस  रिपोर्ट में सरकार द्वारा किसान आत्महत्या को रोकने के लिए किए जाने वाले ऋण माफ़ी, बिजली बिल माफ़ी समेत राहत पैकेज आदि उपायों का उल्लेख करते हुए कहा गया था  कि ये उपाय किसानों को फौरी राहत देते हैं न कि उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान करते हैं। परिणामतः किसानों की समस्याएँ बनी रहती हैं जो देर-सबेर उन्हें आत्महत्या को मजबूर करती हैं। आईबी की यह रिपोर्ट आने के बाद से अबतक देश में किसान आत्महत्या के मामलों में भारी इजाफा देखने को मिला है, जिससे स्पष्ट होता है कि इस रिपोर्ट में काफी हद तक सच्चाई थी लेकिन सरकार ने शायद इसे गंम्भीरता से नहीं लिया और किसानों की समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में कुछ ठोस कदम नहीं उठाए।

  अब मौजूदा फसल बीमा योजना पर आएं तो ये भी एक फौरी राहत की ही योजना है। इससे किसानों को उनकी मुश्किलों से कुछ राहत ज़रूर मिल जाया करेगी, लेकिन उनकी दशा में कोई सुधार होगा या देश की कृषि को इससे कोई लाभ होगा, ऐसा कहना कठिन है। बात यह है कि यदि फसल होगी तो ही उसका बीमा होगा, लेकिन यहाँ तो हालात इतने ख़राब हैं कि देश के ज्यादातर किसान ठीक ढंग से फसल उगाने की स्थिति में ही  नहीं हैं, फिर सस्ता ही सही बीमा कैसे कराएंगे ? 

सोमवार, 11 जनवरी 2016

मालदा की असहिष्णुता पर मौन क्यों [दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण) में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दैनिक जागरण 
विगत दिनों हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी ने पैगम्बर मोहम्मद के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसका मुस्लिमों द्वारा भारी विरोध हुआ और परिणामस्वरूप रासुका के तहत कमलेश तिवारी की गिरफ्तारी भी हो गई। लेकिन मुस्लिम समुदाय का आक्रोश इतने से नहीं थमा, वे कमलेश तिवारी की फांसी देने की बेहद अलोकतांत्रिक और विचित्र मांग करने लगे। हद तो तब हो गई कि जब अभी हाल ही में इस फांसी की मांग को लेकर पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में रैली के रूप में लगभग ढाई लाख की संख्या में मुसलमान सड़कों पर उतर पड़े और हिंसक प्रदर्शन मचा दिए। यह रैली मालदा जिले के कालियाचक पुलिस स्‍टेशन के अंतर्गत आने वाले सूरज इलाके में निकाली गई थी। इस दौरान नेशनल हाइवे से गुजर रही बस के साथ रैली में शामिल लोगों की बहस हुई। बाद में भीड़ ने बस पर हमला कर दिया। यात्री किसी तरह वहां से बचकर निकल गए। इसके कुछ देर बाद मालदा से आ रही बीएसएफ की एक गाड़ी में आग लगा दी गई। -इसके बाद थाने में आग लगाने और फिर कई एक घरों में लूटपाट करने जैसे कई गैरकानूनी काम रैली में शामिल लोगों द्वारा किए गए। इस दौरान पुलिस से भीड़ की मुठभेड़ हुई जिसमे गोलियां आदि चलीं और कई लोग घायल भी हुए। लेकिन प्रदर्शनकारियों की संख्या इतनी अधिक थी कि चंद पुलिस वालों के लिए उसे नियंत्रित करना कहीं से आसान नहीं था। बाद में रैपिड एक्शन फ़ोर्स आई और तब जाकर स्थिति कुछ हद तक नियंत्रित हो सकी। स्थानीय एएसपी ने इस विषय में जो कुछ बताया है उसके अनुसार, भीड़ ने पुलिस की वैन और जीप आदि दो दर्जन गाड़ियों में आग लगा दी तथा तमाम पुलिस वालों को पीटा भी। विचार करें तो  इतनी बड़ी भीड़ बिना किसी योजना के तो सड़क पर उतरी नहीं होगी, यह सब सुनियोजित रूप से ही हुआ होगा। अतः सवाल यह है कि ढाई लाख जैसी बड़ी संख्या में भीड़ सड़क पर उतर गई और प्रशासन को कोई खबर क्यों नहीं हुई ? या कहीं ऐसा तो नहीं कि खबर होते हुए भी प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा इस बात की प्रतीक्षा कर रहा था कि प्रदर्शनकारी मालदा की सड़कों पर हिंसा का तांडव मचा दें ? बहरहाल, अब जाके स्थिति कुछ हद तक नियंत्रण में है और इस हिंसा के आरोप में कुछेक लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है, लेकिन इतनी बड़ी हिंसात्मक वारदात का होना कहीं न कहीं राज्य की क़ानून व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह तो लगाता ही है। लेकिन दुर्भाग्य कि बंगाल की ममता सरकार इस मामले में अपनी गलती मानने की बजाय येन-केन-प्रकारेण इसके बचाव में लगी है। ये देखते हुए इस मामले में ममता सरकार की भूमिका भी संदिग्ध लगती है और यह अंदेशा प्रबल होता है कि मुस्लिमों के इस उग्र हिंसक प्रदर्शन को नज़रंदाज़ करने के पीछे ममता सरकार का मुस्लिम तुष्टिकरण का मंशा ही काम कर रही है। क्योंकि यह तो तय है कि इतना बड़ा प्रदर्शन बिना राज्य सरकार और प्रशासन की मर्जी के कत्तई नहीं हो सकता।  
  बहरहाल, इस मालदा प्रकरण पर पश्चिम बंगाल सरकार के अतिरिक्त देश के वो तमाम बुद्धिजीवी जिन्हें अभी कुछ समय पहले तक देश का माहौल एकदम असहिष्णु लग रहा था, भी सवालों के घेरे में हैं। सवाल यह कि विगत दिनों दादरी काण्ड पर जिन बुद्धिजीवियों ने अपने पुरस्कार लौटाने से लेकर तमाम तरह से अपना विरोध जताते हुए देश में असहिष्णुता के बढ़ने की बात कही थी, उनकी तरफ से  मालदा में हुई इस भारी हिंसा के विरोध में अबतक एक बयान भी क्यों नहीं आया हैं ? इखलाक की हत्या जैसी मालदा की तुलना में काफी छोटी वारदात पर जिन बुद्धिजीवियों को देश का माहौल एकदम असहिष्णु लगने लगा था, मालदा की अत्यंत उग्र और भयानक हिंसा पर उनका मौन रहना तो यही दिखाता है कि असहिष्णुता को लेकर उनके मानदंड पूरी तरह से दोहरे हैं। तिस पर मुस्लिम नेताओं आदि के द्वारा जिस तरह से कमलेश तिवारी का सिर काटने पर इनाम घोषित किए जा रहे हैं, उसपर भी अबतक कुछ समय पहले तक असहिष्णुता से पीड़ित बुद्धिजीवियों में से किसी भी बुद्धिजीवी का न तो कोई बयान आया है और न ही उनकी तरफ से ये सवाल ही उठाया गया है कि ऐसे बयान देने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही ? स्पष्ट होता है कि उन बुद्धिजीवियों विरोध पूरी तरह से पूर्वाग्रह से ग्रस्त और मनोनुकूल अवसर के अधीन है।
  वैसे एक सवाल तो मुस्लिम समुदाय पर भी उठता है कि इस समुदाय के लिए देश का संविधान बड़ा है या अपना इस्लाम ? यह सही है कि हमारा संविधान किसीको भी किसी अन्य धर्म के उपासना प्रतीकों आदि पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का अधिकार नहीं देता, अतः कमलेश तिवारी ने मुहम्मद साहब के विषय में यदि कुछ आपत्तिजनक कहा तो वो गलत है और इसके लिए उनकी गिरफ्तारी भी हुई। लेकिन इसके लिए उन्हें फांसी पर चढ़ाने की मांग करना या उनका सिर काटने पर इनाम जैसी घोषणा करना इस्लाम में जायज हो सकता है, भारतीय संविधान में नहीं। और मुस्लिम समुदाय को यह याद रखना चाहिए कि यह देश संविधान से चलता है, इस्लाम के अमानवीय कायदों से नहीं। अक्सर मुस्लिम समुदाय के नेताओं व व्यक्तियों द्वारा हिन्दू उपासना प्रतीकों पर अभद्र टिप्पणियां करने से लेकर मजाक बनाया आता रहा है, लेकिन हिन्दू न तो कभी उनमे से किसीको फांसी देने की मांग करते हैं और न ही अपनी मांग को मनवाने के लिए इतनी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरकर हिंसा मचाते हैं। एक उदाहरण पर गौर करें तो चित्रकार एमएफ हुसैन ने किसी समय भारतीय देवी-देवताओं के अश्लील चित्र बनाए थे, लेकिन ये हिन्दुओं की सहिष्णुता ही थी कि फांसी की बात तो दूर, उनकी गिरफ्तारी तक नहीं हुई। ये अलग बात है कि बाद में अपनी मर्जी से वे देश छोड़कर चले गए और दुनिया में अफवाह फ़ैल गई कि उन्हें भारत में हिन्दूओं से खतरा है, इसलिए वहां से भाग निकले हैं, जबकि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं था। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि देश का बहुसंख्य हिन्दू समुदाय देश के संविधान को सर्वोपरि मानता है और इसी कारण हर किसीकी अभिव्यक्ति का सहिष्णुता दिखाते हुए आदर करता है। कहना नहीं होगा कि इस मामले में मुस्लिमों को हिन्दुओं से  सीखना चाहिए और आपने आचरण में सहिष्णुता लाते हुए देश के संविधान का आदर करना चाहिए। उन्हें यह भी देखना चाहिए कि दुनिया के अधिकांश मुस्लिम देशों में मुस्लिमों की क्या स्थिति है ? यह देखने पर वे पाएंगे कि मुस्लिम देशों से कहीं अधिक या दुनिया में सबसे अधिक मुस्लिम यदि कहीं सुरक्षित हैं तो वो भारत में हैं। अतः उचित होगा कि वे इस देश और इसके संविधान का आदर करते हुए शांतिपूर्वक रहें।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

नौकरशाहों के निलंबन नियमों में परिवर्तन का अर्थ [दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दबंग दुनिया 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपने वक्तव्यों में सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों को यह कहते रहे हैं कि वे निडर और दबावमुक्त होकर निर्णय लें। अब इस दिशा में उनकी सरकार की तरफ से एक बेहद महत्वपूर्ण कदम भी उठाया गया है। वह कदम ये है कि केंद्र सरकार द्वारा नौकरशाहों के निलंबन सम्बन्धी नियमों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जिनके बाद नौकरशाहों पर से राजनीतिक नियंत्रण या उनके कार्य में राजनीतिक हस्तक्षेप के कम होने की पूरी संभावना है। दरअसल नए नियमों के मुताबिक़ अब केंद्र के अधीन कार्यरत नौकरशाहों समेत अखिल भारतीय सेवा के तहत देश भर में कार्य कर रहे आईएएस, आईपीएस व आईएफओएस अधिकारियों को सम्बंधित राज्य सरकार द्वारा पहले की तरह सीधे-सीधे निलंबित नहीं किया जा सकेगा। अब यदि कोई केन्द्रीय मंत्रालय या राज्य सरकार ऐसे किसी अधिकारी का निलम्बन करती है तो इसकी सूचना अगले ४८ घंटे के अन्दर पीएमओ को देनी होगी तथा १५ दिन के भीतर निलम्बन के कारण आदि की विस्तृत रिपोर्ट भी सौंपनी होगी। साथ ही निलंबन की न्यूनतम अवधि जो पहले तीन महीने थी, को घटाकर अब दो महीने कर दिया गया है जिसे कि अब पहले की तरह छः महीने की बजाय अधिक से अधिक चार महीने तक ही बढ़ाया जा सकता है। इन बदले नियमों पर केन्द्रीय कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘सरकार का उद्देश्य नौकरशाही से भ्रष्टाचार मिटाना है और हम अधिकार अनुकूल वातारण मुहैया कराना चाहते हैं ताकि कोई भी अधिकारी सरकारी नियमों से भयभीत होकर अपना प्रदर्शन नहीं छोड़े। नए नियम ईमानदार अधिकारियों को प्रोत्साहित करेंगे और सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करेंगे।’’ माना जा रहा है कि इन नए नियमों के आने के बाद से नौकरशाह खुलकर और निडर होकर निर्णय कर सकेंगे तथा नेताओं द्वारा अपने हित के लिए उनका मनचाहा इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। बेशक बदले नियमों से तमाम उम्मीदें जगती हैं, लेकिन उम्मीदों के साथ कई सवाल भी उठते हैं. मोटे तौर पर सवाल यह है कि ये बदले नियम कितने कारगर होंगे ? 
  इसी क्रम में यदि पुराने नियमों के तहत नौकरशाहों के निलंबन की स्थिति पर नज़र डालें तो दरअसल पुराने नियमों के तहत राज्य सरकार या केन्द्रीय मंत्रालय मनचाहे ढंग से किसी अधिकारी-कर्मचारी को निलम्बित कर सकते थे, क्योंकि इस सम्बन्ध में उनके ऊपर कोई जवाबदेही नहीं थी। इस स्थिति का विशेष दुरूपयोग राज्य सरकारों द्वारा किया जाता रहा है। नौकरशाहों को निलंबित करने का भय दिखाकर राजनीतिक आकाओं द्वारा उनसे मनचाहे ढंग से अपने काम करवाने, उन्हें इमानदारी से काम करने से रोकने और अपने व्यक्तिगत हित से सम्बंधित निर्णय लेने के लिए दबाव बनाने आदि के तमाम मामले सामने आते रहे हैं। होता ये है कि अगर कोई अधिकारी ईमानदारी से अपने विभाग का काम करने लगे जिससे किसी गैरकानूनी धंधों वालों के काम में बाँधा पहुँचती हो, तो पहले तो उस अधिकारी को रिश्वत के जरिये रोकने की कोशिश की जाती हैं। यदि रिश्वत से अधिकारी नहीं दबा तो फिर अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर उसका निलंबन या तबादला करवा दिया जाता है। ऐसे ही अगर अधिकारी के इमानदार होने के कारण किसी नेता के भ्रष्टाचार आदि के उजागर होने का संकट हो तो भी अधिकारियों को निलंबित या तबादला आदि करने का भय दिखाकर उनके कार्य में हस्तक्षेप किया जाने लगता है। उदाहरण के तौर पर आईएएस अशोक खेमका का नाम उल्लेखनीय होगा जिन्हें उनकी ईमानदार कार्यशैली और भ्रष्टाचार के प्रति असहिष्णु रुख के कारण अपने अबतक के २१ वर्षों के कार्यकाल के दौरान ४० बार तबादले का सामना करना पड़ चुका है। इन बातों से स्पष्ट है कि देश की नौकरशाही के कार्यों में सियासी आकाओं द्वारा बड़े स्तर पर हस्तक्षेप किया जाता है।    
  अब प्रश्न यह उठता है कि क्या नौकरशाहों के निलम्बन सम्बन्धी नए नियम आने के बाद नौकरशाहों को वाकई में कार्य करने में राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति मिलेगी तथा वह निडर होकर निर्णय कर सकेंगे ? इस प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ और ‘ना’ का मिश्रित रूप है। क्योंकि यह सही है कि इन नए नियमों के बाद अधिकारियों के निलंबन के प्रति तो राज्य सरकारें और केंद्र सरकार के मंत्रालय जवाबदेह हो जाएंगे, लेकिन तबादला करने का निरंकुश अधिकार अब भी उनके हाथ में ही रहेगा। और गौर करें तो तबादलों के मामले निलंबन की अपेक्षा अधिक सामने आते हैं और इस हथकण्डे का इस्तेमाल राजनीतिक आकाओं द्वारा ज्यादा किया जाता है। क्योंकि निलंबन की स्थिति में कुछ महीने बाद सम्बंधित  अधिकारी फिर उसी स्थान या पद पर कार्यरत हो जाता है, जबकि तबादला करके अधिकारी को मामले से ही एकदम अलग कर दिया जाता है। अतः समझना कठिन नहीं है कि अधिकारी के कार्य को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक आकाओं द्वारा तबादला निलंबन से अधिक प्रयोग किया जाने वाला हथियार है। अतः कहना गलत नहीं होगा कि नौकरशाहों के निलंबन के सम्बन्ध में राज्य सरकारों आदि की पीएमओ के प्रति जवाबदेही भले सुनिश्चित की गई है, लेकिन इस नियम को तनी और व्यापक करने की जरूरत है। अर्थात कि निलंबन की ही तरह ही तबादले को लेकर भी राज्य सरकारों आदि की पीएमओ के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। ऐसा करके ही हम सही मायने में नौकरशाहों को काम करने के लिए स्वतंत्र और निडर वातावरण दे पाएंगे।

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

पठानकोट आतंकी हमले का निहितार्थ [नेशनल दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

नेशनल दुनिया 
अभी देश नए साल के जश्न में ही डूबा  था कि साल के दूसरे ही दिन कुछ आतंकियों ने सुबह चार बजे पंजाब के पठानकोट स्थित वायुसेना के एयरबेस पर हमला कर देश को हतप्रभ कर दिया। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार आतंकी सेना की ही वर्दी पहनकर आए और फिर ग्रेनेड और बंदूकों आदि से हमला करने लगे। लम्बे समय तक सेना और आतंकियों के बीच चले संघर्ष के बाद आखिर सेना और पंजाब की स्वाट फोर्स की कार्रवाई में छहों आतंकियों को मार गिराया गया। लेकिन इस पूरी कार्रवाई में हमारे सात जवान भी शहीद हो गए।  इस समस्त घटनाक्रम के बाद हमेशा की तरह एकबार फिर निंदा, श्रद्धांजलि और आरोप-प्रत्यारोप के राजनीतिक प्रलाप का दौर शुरू हो गया। राष्ट्रपति ने इन हमलों की निंदा की तो प्रधानमंत्री ने जवानों पर गर्व होने की बात कही तो वहीँ गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस हमले में पाकिस्तान के हाथ होने का बयान दिया गया। वहीँ विपक्ष की तरफ से इस हमले को घुमा-फिराकर सरकार की नाकामी से लेकर प्रधानमंत्री मोदी के हालिया पाकिस्तान दौरे की विफलता के रूप में बताया जाने लगा है। अब जैसे इस देश में ये आतंकी हमला कोई नया नहीं है, वैसे ही उसके बाद होने वाले ये राजनीतिक क्रियाकलाप भी नए नहीं है। अभी कुछ ही महीने पहले पंजाब के ही गुरदासपुर जिले के दीनानगर थाने पर भी आतंकियों ने हमला किया था, तब भी हमारे हुक्मरानों की तरफ से कुछ ऐसी ही प्रतिक्रियाएं देखने-सुनने को मिली थीं।  बहरहाल, इन राजनीतिक गतिविधियों से इतर प्रश्न यह उठता है कि क्या पंजाब सरकार समेत केंद्र सरकार ने भी विगत जुलाई में हुए गुरदासपुर आतंकी हमले से कोई सबक नहीं लिया कि छः महीने के भीतर ही पंजाब में फिर आतंकी हमला हो गया ? चौंकाने वाला तथ्य तो यह भी है कि गुरदासपुर हमला जहां पुलिस थाने पर हुआ था, वहीँ ये ताज़ा पठानकोट हमला हमारी वायुसेना के एयरबेस पर हुआ है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि पंजाब में जब पुलिस और सेना के ठिकाने ही आतंकियों से अछूते नहीं है तो आम लोगों की सुरक्षा के विषय में क्या कहा जा  सकता है ? दरअसल बात यह है कि वाकई में पंजाब सरकार ने गुरदासपुर आतंकी हमले से कोई सबक नहीं सीखा है। गौर करें तो जब गुरदासपुर हमला हुआ था, उस समय भी हमले से कुछ रोज पहले देश के ख़ुफ़िया ब्यूरों द्वारा वैसे किसी हमले की गुप्त सूचना दी गई थी जिसे केंद्र ने राज्य सरकार से साझा भी किया था। बावजूद इसके पंजाब सरकार चेती नहीं जिसके कारण गुरदासपुर हमला हुआ। प्राप्त जानकारी के अनुसार ताज़ा पठानकोट हमले से पहले भी ख़ुफ़िया इनपुट थी, लेकिन इसबार भी राज्य सरकार हमला रोकने में विफल ही रही। राज्य सरकार तो जो है सो है ही, केंद्र सरकार भी शायद गुरदासपुर  से कोई सबक नहीं ली है, अन्यथा वो तो इस हमले के ख़ुफ़िया इनपुट पर राज्य सरकार के लिए विशेष अलर्ट जारी कर  देती तथा उससे सुरक्षा सम्बन्धी सूचनाओं का पूरा आदान-प्रदान होता तो शायद यह हमला टाला जा सकता था।  स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं इस मामले में केंद्र और पंजाब सरकार के बीच बेहतर तालमेल का अभाव रहा है। लेकिन केंद्र की तरफ से तो यह कहा जा रहा है कि ख़ुफ़िया सूचना थी, इसीलिए हमले में अधिक नुकसान नहीं हुआ वरना यह हमला और बड़ा हो सकता था। सवाल यह है  कि कुछ आतंकी दुनिया की तीसरी सर्वश्रेष्ठ वायुसेना के एयरबेस पर पहुंचकर कोहराम मचा देते हैं जिनको रोकने में सात जवानों की मौत हो जाती है और कई घायल हो जाते हैं, यह क्या छोटा हमला है ? तो क्या अभी देश इससे भी बड़ा हमला होने के लिए इंतजार कर रहा है कि जब कोई इससे भी बड़ा हमला होगा, तब केंद्र और राज्य सरकारें बेहतर तालमेल दिखाएंगी ? अब सरकार को यह कौन समझाए कि देश के एक ही राज्य में छः महीने के अन्दर  पुलिस थाने और वायुसेना के ठिकाने पर क्रमशः आतंकी हमले होना न केवल देश की सुरक्षा व्यवस्था के दृष्टिकोण से चिंताजनक है, बल्कि दुनिया में भारत को शर्मिंदा करने वाला भी है।
  अब चूंकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर इस हमले में पाकिस्तानी तत्वों का हाथ होने का संकेत कर चुके हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल इस हमले में पाकिस्तानी संलिप्तता के साक्ष्य भी पाकिस्तान को सौंप चुके हैं। इन बातों को देखते हुए विपक्ष से लेकर सोशल मीडिया पर मौजूद आम लोगों द्वारा मोदी के अनौपचारिक पाक दौरे आदि के जरिये पाकिस्तान से भारत की सम्बन्ध बहाली की कोशिश को कठघरे में खड़ा करते हुए तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्ष जहाँ अपने चरित्र के अनुरूप इसे सरकार की सुरक्षा से लेकर कूटनीतिक विफलता तक कह रहा है, वहीँ आम लोगों की राय है कि मौजूदा मोदी सरकार भी पिछली मनमोहन सरकार की तरह ही पाकिस्तान के प्रति सिर्फ शब्दों में ‘कड़ा रुख’ अख्तियार करने वाली नीति पर ही चल रही है। गौर करें तो भारत-पाक संबंधों के इतिहास जो भारत के उदार प्रयासों और पाकिस्तान के कुटिल आघातों से भरा पड़ा है, को देखते हुए लोगों का यह आक्रोश स्वाभाविक ही है।  लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि हम दोस्त चुन सकते हैं, पड़ोसी नहीं और पाकिस्तान जैसा भी हो, हमारा पडोसी है। अतः उससे सम्बन्ध बेहतर होना आवश्यक है। रही बात वर्तमान स्थिति की तो प्रधानमंत्री मोदी की हालिया अनौपचारिक पाक यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों में जो गर्मजोशी लाई है, वो अभूतपूर्व है। और इस हमले के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने प्रधानमंत्री मोदी से न केवल फोन कर बात की है, बल्कि इसमें पाकिस्तानी संलिप्तता को स्वीकारते हुए कार्रवाई का भरोसा भी दिया है। अतः इस हमले को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि पाकिस्तान के कुछ नापाक तत्वों खासकर उसकी सेना और आईएसआई समेत दुनिया के कुछ देश, जो नहीं चाहते कि भारत-पाक संबंधों में बेहतरी आए, द्वारा मौजूदा सम्बन्ध बहाली की कोशिशों को ख़त्म करने के लिए इस आतंकी हमले के रूप में एक दाव चला गया हो। इतिहास गवाह है कि जब-जब  भारत-पाक संबंधों में बहाली की कोई ठोस कोशिश हुई है, तब-तब या तो पाक सेना या फिर उससे प्रेरित नापाक तत्वों द्वारा भारत में कुछ न कुछ कोहराम मचाके सम्बन्ध बहाली की कवायदों को रोक दिया गया है। अब यह तो सर्वविदित है कि पाकिस्तानी हुकूमत का उसकी सेना पर कोई विशेष नियंत्रण नहीं है, अतः पाकिस्तानी हुकूमत भी सेना के इन कुत्सित प्रपंचों में शामिल होगी इसकी उम्मीद न के बराबर है। इन सब बातों को देखते हुए भारत के लिए यही उचित होगा कि वो अपनी सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से चाक-चौबंद करे जिससे लाख कोशिश करने के बाद भी कोई देश पर हमला न कर सके। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान में मौजूद नापाक तत्वों की शिनाख्त कर न केवल उनकी हकीकत  दुनिया के सामने लाइ जाय, बल्कि पाकिस्तानी हुकूमत के साथ मिलकर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी की जाय। साथ ही, इन गतिविधियों के समान्तर  पाकिस्तानी हुकूमत से बातचीत भी जारी रहनी चाहिए। क्योंकि दोनों देशों के बीच बातचीत का चलते रहना एक बड़ा उपाय है, जिससे पाकिस्तान के नापाक तत्वों के मंसूबों को ध्वस्त करते हुए उनका मुह बंद किया जा सकता है।