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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

फिर अपनी फजीहत कराने का बंदोबस्त कर रहे राहुल गाँधी [दबंग दुनिया और हरिभूमि में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
संसद का पूरा शीतकालीन सत्र नोटबंदी पर अपने फ़िज़ूल के हंगामे की भेंट चढ़ाने वाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने सत्र बीतते-बीतते अब एक नया बवाल खड़ा कर दिया है। गत 14 तारीख को एक प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा कि उनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार से जुड़ी जानकारी है, जिसे वे सार्वजनिक कर देंगे, इसलिए उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा। हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि कौन उन्हें संसद में बोलने से रोक रहा है और कैसे ? क्या संसद में उन्हें हिदायत दी गई है कि बोलना मना है या किसी कानूनी प्रावधान के जरिये उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा ? राहुल गाँधी ने इस विषय में कुछ नहीं बताया। बताते तब न, जब बताने के लिए कुछ होता। सच्चाई तो ये है कि संसद का ये पूरा सत्र अगर बिना किसी ठोस काम-काज और चर्चा-बहस के यूँ ही बर्बाद चला गया तो इसके लिये मुख्य रूप से स्वयं राहुल गाँधी और उनकी पार्टी कांग्रेस जिम्मेदार है। सरकार ने कांग्रेस की हर संभव शर्त मानी ताकि सदन चल सके, लेकिन उसके शर्तों की फेहरिस्त दिन-प्रतिदिन लम्बी ही होती गई, जैसे कि कांग्रेस ठानकर बैठी थी कि सदन चलने नहीं देना है। पहले उसकी मांग थी कि नोटबंदी पर चर्चा हो, सरकार मान गई। फिर उसने मांग उठाई कि पीएम की मौजूदगी में चर्चा हो, पीएम भी आ गये। तब कांग्रेस ने मतदान के नियम से चर्चा कराने और पीएम के बयान की मांग खड़ी कर दी। इन मांगों को मानने के बाद संभव था कि कांग्रेस कुछ और मांग लेकर खड़ी हो जाती। सवाल ये है कि कांग्रेस आखिर किस अधिकार से पूर्ण बहुमत प्राप्त किये सत्ता पक्ष के समक्ष इस तरह की बेतुकी मांगे रख रही है, जबकि उसके पास संख्याबल का ऐसा अकाल है कि संवैधानिक रूप से विपक्ष की भूमिका तक उसे नहीं मिल सकी है। जनता द्वारा इस तरह से खारिज दल पूर्ण बहुमत प्राप्त सत्ता के समक्ष ये अतार्किक और हठी रवैया कैसे अपना रहा है, ये समझ से परे है। 
हरिभूमि

दरअसल कांग्रेस के पास संख्याबल नहीं है, जिस कारण वो लोकतान्त्रिक ढंग से सदन में सरकार को रोक नहीं सकती, इसीलिए हंगामे को अपनाकर कामकाज बाधित करने की रणनीति पर चल रही है। मगर, इसमें सदन के वक़्त और देश के पैसे का जो नुकसान हो रहा है, उसका उत्तरदायित्व क्या कांग्रेस लेगी ? राहुल गाँधी को इसका जवाब देना चाहिये था, मगर वे तो एक नया राग आलापने लगे हैं कि पीएम मोदी के भ्रष्टाचार की जानकारी उजागर कर देंगे। तिसपर ये कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा, ये तो बिलकुल ही ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली बात है।
 
दबंग दुनिया
राहुल गाँधी से एक पीढ़ी ऊपर के कांग्रेसी इतिहास में झाँके तो एक दौर था, जब वीपी सिंह राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स घोटाले के सबूत होने और सत्ता में आने पर उन्हें जेल भिजवाने की ताल ठोंका करते थे। ऐसा जताते थे कि बोफोर्स घोटाले के सबूत उनकी जेब में रखे हैं। इसी बोफोर्स घोटाले का डंका बजाकर उन्होंने सत्ता हासिल कर ली, लेकिन सत्ता मिलते ही बोफोर्स का नाम ऐसे भूले कि फिर कभी उसकी चर्चा तक न किये। कहना गलत नहीं होगा कि आज राहुल गांधी वीपी सिंह का वही दाँव पीएम मोदी के खिलाफ इस्तेमाल करने की सोच रहे हैं। लेकिन, वीपी सिंह और राहुल गांधी में बहुत अंतर है। वीपी सिंह राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री मंत्री रहे थे और अपने बगावती तेवरों के कारण बाहर हुए थे साथ ही उनके द्वारा उठाये गये बोफोर्स मामले में दम भी था। राजीव गांधी आज भी उस मामले में संदिग्ध माने जाते हैं।  इसलिए तब वीपी सिंह का दाँव चल गया था, मगर राहुल गाँधी सिर्फ कपोल-कल्पित बयान दे रहे हैं। अगर उनके पास पीएम के खिलाफ कोई आरोप और उसके पक्ष में साक्ष्य हैं, तो इतने दिन तक सदन में हंगामा करने की बजाय उन्हें सदन के सामने रखे होते। खैर! अब भी देर नहीं हुई है, वे प्रेसवार्ता करके उन साक्ष्यों को सार्वजनिक कर दें। अगर वे यह सब नहीं कर सकते तो पीएम के सम्बन्ध में ऐसे विवादास्पद और हवा-हवाई बयान देना बंद करें बल्कि यह प्रोपोगैंडा फैलाने के लिए माफ़ी मांगें।

दरअसल राहुल गाँधी सिर्फ कांग्रेस की ठप्प पड़ी गाड़ी को जबरन रफ़्तार देने के लिए ये सब नकली कहानियाँ गढ़ रहे हैं। हाल ही में उन्होंने यह भी कहा था कि बोलूँगा तो भूकंप आयेगा, जिसपर उनकी फजीहत अबतक हो रही है। ये कोई पहली बार नहीं है, इससे पहले भी उन्होंने ऐसे ही एक रैली में संघ को ‘महात्मा गाँधी का हत्यारा’ बता दिया था, जिसपर न्यायालय में उनकी बुरी तरह से फज़ीहत हुई। ऐसे ही और भी कई मामले हैं, जिनमें उन्होंने अपनी किरकिरी करवाई है और अब इस ताज़ा पीएम मोदी से सम्बंधित मामले में भी कहीं न कहीं ऐसा ही कुछ बंदोबस्त कर रहे हैं। समय रहते अगर कांग्रेस ने उन्हें नहीं संभाला तो उनका ये बेपरवाह बोलना कांग्रेस के लिए एकबार फिर भूकंप लाने का ही काम करेगा। कांग्रेस की दयनीय दशा को राहुल गांधी का ये बड़बोलापन और दयनीय बनाने वाला साबित होगा।

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

औचित्यहीन हैं समलैंगिक सम्बन्ध [दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दबंग दुनिया 
देश में समलैंगिक संबंधों पर एकबार फिर चर्चा शुरू हो गई है । समलैंगिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था नाज़ फाउंडेशन ने समलैंगिक संबंधों को अपराध बताने वाले सर्वोच्च न्यायालय के २०१३ के फैसले के खिलाफ याचिकाएं दायर की थी, जिनपर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए ५ न्यायाधीशों की एक बेंच के हवाले कर दिया है । दरअसल इस मामले की शुरुआत तो २००१ में हो गई थी, जब नाज़ फाउंडेशन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करते हुए समलैंगिक संबंधों को वैधानिक मान्यता देने की मांग की थी । सितम्बर, २००४ में उच्च न्यायालय ने यह याचिका खारिज कर दी तो मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा जिसने इसे पुनर्विचार के आदेश के साथ उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया । उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से इस सम्बन्ध में राय मांगी तो तत्कालीन सरकार ने स्पष्ट किया कि यह अनैतिक और विकृत मानसिकता का द्योतक है, इससे समाज का नैतिक पतन हो जाएगा ।  लेकिन उच्च न्यायालय इस दलील से सतुष्ट नहीं हुआ और इस प्रकार करते-धरते आज से लगभग सात साल पहले २ जुलाई, सन २००९ को दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में समलैंगिक संबंध को जायज घोषित कर दिया । तत्कालीन दौर में उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि ये संबंध भी सामाजिक स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं, अतः इन्हें आपराधिक नही माना जा सकता । उसवक्त दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले को जहाँ दुनिया के कई देशों में सराहा गया, वहीँ हिंदू, मुस्लिम आदि धार्मिक संगठनों द्वारा इस फैसले का विरोध करते हुए इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दी गई, जिसपर सुनवाई करते हुए सन २०१३ में सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक संबंधों को संवैधानिक रूप से अपराध बताया । हालांकि न्यायालय ने इस संबंध में क़ानून में बदलाव की बात संसद और सरकार के ऊपर छोड़ दी थी । अब अपने  उसी फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को पुनर्विचार के लिए स्वीकार लिया है ।
 पुनर्विचार के बाद न्यायालय का फैसला क्या होगा, ये तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन, समलैंगिक सबंधों के औचित्य और आवश्यकता पर फ़िलहाल हमें एकबार पुनः विचार करने की जरूरत अवश्य है । अगर विचार करें तो आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पारम्परिक रूप से चले आ रहे स्त्री-पुरुष या नर मादा संबंधों के बीच हमारे इस समाज में समलैंगिक संबंधों की क्या आवश्यकता है ? और इनका क्या औचित्य है ?  इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए सर्वप्रथम हमें समझना होगा कि आखिर समलैंगिक संबंध क्या है तथा ये हमारे समाज और संस्कृति के कितने अनुकूल है । समलैंगिक संबंध दो समान लिंग वाले व्यक्तियों के बीच मुख्यतः शारीरिक व कुछ हद तक मानसिक संबंध कायम करने की एक आधुनिक पद्धति है । अर्थात इस संबंध पद्धति के अंतर्गत दो स्त्रियां अथवा दो पुरुष आपस में पति-पत्नी की तरह रह सकते हैं । अब अगर इस संबंध पद्धति को भारत की सामाजिक व कानूनी व्यवस्था के संदर्भ में देखें तो इस तरह के संबंध के लिए न तो भारतीय समाज के तरफ से अनुमति है और न ही क़ानून की तरफ से । जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने पूर्व निर्णय में कहा है, भारत के संविधान में इस तरह के संबंधो को अप्राकृतिक बताते हुए इनके लिए सज़ा तक का प्रावधान किया गया है । भारतीय संविधान की धारा-३७७ के तहत अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने को आपराधिक माना गया है और इसके लिए दस साल से लेकर उम्र कैद तक की सज़ा का भी प्रावधान है । लेकिन, सन २००९ में उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद ये बातें गौण हो गई और कानूनी रूप से समलैंगिक संबंध स्वीकृत हो गए । पर फिर जब सर्वोच्च न्यायालय का २०१३ का निर्णय आया तो ये क़ानून प्रासंगिक हुए और माना गया कि समलैंगिक सम्बन्ध संविधानानुसार अवैध हैं । ये तो बात हुई कानून की । अब अगर एक नज़र समाज पर डालें तो सामाजिक दृष्टिकोण से भी सिर्फ स्त्री-पुरुष के बीच शारीरिक संबंध कायम करने को सही माना जाता है, वो भी तब जब स्त्री-पुरुष वैवाहिक पद्धति से एकदूसरे को स्वीकार चुके हों । हालांकि आज के इस आधुनिक युग में लोगों, खासकर शहरी युवाओं द्वारा शारीरिक संबंध के लिए वैवाहिक अनिवार्यता की इस सामाजिक मान्यता को दरकिनार करके संबंध बनाए जा रहे हैं । पर ऐसा करने वालों की संख्या अभी काफी कम है ।

  अगर विचार करें तो स्त्री-पुरुष के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित होने के दो प्रमुख उद्देश्य होते हैं – प्रजनन एवं शारीरिक और कुछ एक हद तक मानसिक संतुष्टि । इनमे भी प्रजनन का स्थान सबसे पहले आता है । क्योंकि सभी संबंधों की बारी प्रजनन के बाद ही आती है । अगर प्रजनन ही नही होगा तो फिर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं प्राकृतिक संतुलन अर्थविहीन हो जायेगा । बात चाहें समाज की स्थापना की हो या सम्बन्ध की स्थापना की या फिर प्राकृतिक संतुलन की ही क्यों न हो,  सबका स्रोत प्रजनन ही है और समलैंगिक सम्बन्धों में प्रजनन की सम्भावनाओं को प्राकृतिक  रूप से प्राप्त करना असम्भव नज़र आता है । जाहिर है कि प्रजनन की योग्यता  से हीन समलैंगिक संबंध दो समलिंगी लोगों की शारीरिक इच्छाओं को पूर्ण करने का एक विकृत माध्यम भर है । इसके अतिरिक्त  फ़िलहाल इनका कोई औचित्य नही है । यानी कि यह पूरी तरह से स्वार्थपूर्ण सम्बन्ध पद्धति है, जिसे देश-समाज से कोई सरोकार नहीं है । संविधान में समलैंगिक सम्बन्ध को अप्राकृतिक कहने का एक कारण यह भी है कि समाज में प्राकृतिक एवं परम्परागत रूप से जो सम्बन्ध स्थापित होते आ  रहें हैं और जिन सम्बन्धों को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है, उनको  समाज में उत्पन्न यह नया सम्बन्ध खुली चुनौती दे रहा है । तात्पर्य यह कि समलैंगिकता प्राकृतिक एवं सामाजिक संरचना को ही चुनौती दे रही है । समलैंगिक रिश्तों के भावी परिणामो की अनदेखी करते हुए  इसके वर्तमान स्वरूप एवं स्थिति के आधार पर इसे क़ानूनी एवं सामाजिक स्वीकृति प्रदान कर देना शायद हमारे वर्तमान की सबसे बड़ी भूल होगी । बेशक, आज इस समलैंगिक संबंध के समर्थकों की संख्या काफी कम है, पर जिस तरह से इसके समर्थक बढ़ रहे हैं, वो आने वाले समय में हमारी सामाजिक व्यवस्था को व्यापक तौर पर प्रभावित या दुष्प्रभावित करेगा । अगर इसे शह मिले तो संभव है कि दूर भविष्य में ये प्रजनन विहीन सम्बन्ध पद्धति हमारी सामजिक व्यवस्था को ही ठेस पहुंचाने लगे । लिहाजा यही उम्मीद की जा सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में पुनर्विचार करके भी पुनः अपने पूर्व निर्णय पर ही कायम रहेगा । और यदि न्यायालय सबकुछ सरकार पर छोड़ता है तो सरकार से भी यही उम्मीद की जा सकती है कि वो समलैंगिक संबंधों को अवैध बताने वाली धारा-३७७ के में कोई विशेष फेर बदल नहीं करे, बल्कि उस क़ानून में ऐसे प्रावधान करे जिससे कि इस तरह के अप्राकृतिक, अनावश्यक और निराधार संबंध स्थापित करने वालों पर समुचित नियंत्रण स्थापित किया जा सके । 

बुधवार, 20 जनवरी 2016

आर्थिक असमानता पर कब चेतेंगे [अमर उजाला कॉम्पैक्ट और दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
     

अमर उजाला कॉम्पैक्ट 
समाज के निचले तबके के हित की बात करने व उसके लिए एक से बढ़कर योजनाए चलाने का दावा दुनिया भर की सरकारें भले करती रही हों, लेकिन इन सब दावों की पोल खोने वाली हकीकत यह है कि दुनिया के १ प्रतिशत लोगों के पास दुनिया के ९९ प्रतिशत लोगों से अधिक संपत्ति है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था ऑक्सफेम द्वारा आर्थिक असमानता पर हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में यह आंकड़ा रखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के सिर्फ ६२ अमीर लोगों के पास ७६ खरब डॉलर हैं जो कि दुनिया के आधे गरीब लोगों की कुल संपत्ति से अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष २०१० से अबतक सर्वाधिक अमीर लोगों की संपत्ति में ४४ फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है तो वहीँ साढ़े तीन अरब सर्वाधिक गरीब लोगों की संपत्ति में ४१ फीसदी की कमी हुई है। सन २०१० से लेकर २०१५ के बीच दुनिया के आधे सबसे गरीब लोगों यानी साढ़े तीन अरब लोगों की कुल संपत्ति में ४१ फीसदी की गिरावट आई है, जो कि एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। जबकि इसी कालावधि में दुनिया के ६२ सर्वाधिक अमीर लोगों की संपत्ति ५०० अरब डॉलर से बढ़कर १.७६  ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई है यानी करीब २५०% ज़्यादा। अमीरों के अमीर होने की यह प्रक्रिया किस तीव्रता से चल रही है, इसे रिपोर्ट के इस आंकड़े के जरिये और अच्छे समझा जा सकता है कि वर्ष २०११ में दुनिया की आधी दौलत ३८८ अमीर लोगों के पास थी जो वर्ष २०१२ में १७७ लोगों, वर्ष २०१४ में ८० और वर्ष २०१५ आते-आते महज ६२ लोगों के पास सिमट कर रह गई। स्पष्ट होता है कि दुनिया की सरकारों द्वारा गरीबों के कल्याण की तमाम योजनाए चलाए जाने के बावजूद विगत वर्षों में अमीर और अमीर हुए हैं जबकि गरीब और गरीब होते गए हैं। संयोग यह है कि यह रिपोर्ट उस वक़्त आई है जब अभी हाल ही में दुनिया सर्वाधिक अमीर देश दावोस में वर्ल्ड इकनोमिक फोरम की बैठक करने जा रहे हैं जहाँ दुनिया में गरीबी कम करने और विकास को बढ़ाने जैसे पहलुओं पर बात की जानी है। ऑक्सफेम की तरफ से कहा गया है कि इस रिपोर्ट को उस बैठक में भी पेश किया जाएगा और मांग की जाएगी कि आर्थिक असमानता की बेहद तेजी से बढ़ रही इस खाई को पाटने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं।
  वैसे ऑक्सफेम ने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ समस्याएँ ही नहीं गिनाई हैं, बल्कि उनके कारणों पर भी बात की है। रिपोर्ट में सुरसामुख की तरह बढ़ रही इस आर्थिक असमानता के लिए प्रमुख रूप से कर चोरी जैसे कारणों को रेखांकित किया गया है। कहा गया है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ कर चुकाने से बचने के लिए तमाम हथकण्डे अपनाती हैं जो कि सामजिक कामकाज पर बेहद गलत प्रभाव डालता है। रिपोर्ट में २०१ शीर्ष कंपनियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ये कम्पनियां जिन १८८ देशों से सम्बंधित हैं, वहां या तो कर व्यवस्था है ही नहीं और यदि है भी तो काफी छूटों के साथ है। अतः आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए यदि दुनिया के देश वाकई में गंभीर हैं तो उन्हें चाहिए कि अपने यहाँ कर व्यवस्थाओं को दुरुस्त करें जिससे करयुक्त किसी भी संपत्ति पर सही ढंग  से कर वसूला जा सके तथा देश-समाज उससे लाभान्वित हो सके। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि दुनिया के सर्वाधिक अमीर लोगों द्वारा अर्जित अधिकांश संपत्ति कर बचत करने वाली व्यवस्था के जरिये  इकठ्ठा की गई है। अगर इस धन पर उचित ढंग से कर लगे तो दुनिया की सरकारों को प्रतिवर्ष १९० अरब डॉलर की कमाई हो सकती है जिससे दुनिया में स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों में काफी कुछ किया जा सकता है। पर दिक्कत यही है कि व्यवस्था भी धनकुबेरों के पक्ष में ही काम कर रही है, इसीलिए तो दुनिया के तमाम देशों में कर नियम बेहद ढीले हैं या हैं ही नहीं।
दबंग दुनिया 
  

  विचार करें तो ऑक्सफेम की यह रिपोर्ट हमें काफी कुछ सोचने पर विवश करती है। एक तरफ जब दुनिया में मानवाधिकार और जनकल्याण को लेकर तरह-तरह की पहल हो रही हो, उसवक्त दुनिया में गरीबों की यह स्थिति होना दुनिया के गरीबी निवारण के प्रयासों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। एक आंकड़े के मुताबिक़ आज दुनिया के प्रत्येक ९ में से एक व्यक्ति को भूखे सोना पड़ता है, ऐसे में १ प्रतिशत लोगों की तरफ धन का ये ध्रुवीकरण सवाल खड़ा करता है कि क्यों यह धन सबके पास बराबर-बराबर और जरूरत भर का नहीं हो सकता ? इस सवाल का जवाब यह है कि धन को लेकर समय के साथ हमारी अवधारणा बदलती गई है और इसे जरूरत की बजाय महत्वाकांक्षा की वस्तु बना दिया गया है। यही कारण है कि दुनिया के जिन सर्वाधिक अमीर लोगों के पास इतना धन है, वे भी और धन जुटाने के लिए प्रयास या दुष्प्रयास करने से नहीं चूकते। अगर उन अमीर लोगों से पूछा जाय कि जितना धन उनके  पास है, उसका वे किसलिए इस्तेमाल करेंगे तो निस्संदेह वे निरुत्तर हो जाएंगे। दरअसल उनके लिए इस अबाध धनार्जन का अपना जीवन स्तर बेहतर करने से कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि जीवन की सभी सुख-सुविधाएं इससे काफी कम धन में प्राप्त हो जाने वाली होती हैं और ये सुख-सुविधाएं अमीर लोगों के पास बड़े आराम से उपलब्ध होंगी भी। लेकिन बावजूद इसके अगर वे लगातार धन अर्जन करने के लिए प्रयास करते रहते हैं तो यह सिर्फ उनकी धन-लिप्सा और महत्वाकांक्षा है। लेकिन उन अमीर लोगों को अब ये कौन समझाए कि उनकी धन-लिप्सा के चलते दुनिया के अनगिनत गरीब लोग, जिनके अधिकार के आर्थिक संसाधन हथियाकर वे अमीर बने बैठे हैं, कैसा नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हैं।  अब भले ही आर्थिक असमानता की यह त्रासद तस्वीर अमीरों को दिखाई न दे रही हो या देखते हुए भी वे इससे अनजान बन रहे हों, लेकिन हकीकत यही है कि स्थिति दिन ब दिन काफी ख़राब होती जा रही है। यह सही है कि आज गरीब चुप हैं और स्थिति को सहन कर रहे हैं, लेकिन एक समय आएगा कि उनकी सहनशक्ति की सीमा ख़त्म हो जाएगी और तब शायद उनके पास अपने अधिकार के आर्थिक संसाधनों को पाने के लिए सिवाय संघर्ष का रास्ता चुनने के और कोई उपाय नहीं होगा। ऐसे में विश्व की क्या स्थिति होगी, यह कल्पना भी सिहराने वाली है। इस लिहाज से  आर्थिक असमानता की यह समस्या न केवल चिंतित करती है, बल्कि डराती भी है। उचित होगा कि समय रहते इससे दुनिया के अमीर देश व उनके अमीर लोग चेत जाएं और इसके निवारण की दिशा में कदम उठाएं, अन्यथा यह दुनिया के भविष्य के लिए अत्यंत संकटकारी सिद्ध हो सकती है। 

शनिवार, 16 जनवरी 2016

फसल बीमा योजना से कितनी मिलेगी राहत ? [दैनिक जागरण राष्ट्रीय, दबंग दुनिया और पंजाब केसरी में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दैनिक जागरण 
विगत दो वर्षों से लगातार व्यापक स्तर पर सूखा झेलने के कारण आत्महत्या को विवश हो रहे देश के किसानों को राहत देने के उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा नई फसल बीमा योजना का आगाज किया गया है। सरकार का कहना है कि ये योजना पहले से मौजूद फसल बीमा योजनाओं की अन्तर्निहित खामियों को सुधारकर तथा कुछ नए और किसानों को अधिकाधिक जोखिम सुरक्षा देने वाले प्रावधानों को शामिल करके तैयार की गई है। इस सन्दर्भ में इस योजना के कुछ मुख्य प्रावधानों पर गौर करें तो जहाँ पहले की फसल बीमा योजनाओं में प्रीमियम की दर अधिकतम १५ प्रतिशत तक थी, वहीँ इस योजना में वो अधिकतम पांच प्रतिशत कर दी गई है। रबी के अनाज एवं तिलहनी फसलों के लिए १.५  प्रतिशत प्रीमियम जबकि खरीफ के अनाज तथा तिलहनों के लिए दो प्रतिशत प्रीमियम देना होगा। उद्यानिकी और कपास की फसल के लिए दोनों सत्रों में पांच प्रतिशत तक प्रीमियम तय किया गया है। यह व्यवस्था भी की गई है कि नुकसान के संभावित दावे का २५ प्रतिशत तत्काल किसान के खाते में पहुँच जाए। इसके अलावा इस नई फसल बीमा योजना में आपदा की परिभाषा को और विस्तार दिया गया है, जिससे फसल को नुकसान पहुंचाने वाली अधिकाधिक आपदाजन्य स्थितियों में किसानों को सुरक्षा मिल सके। कुल मिलाकर यह योजना देखने में तो काफी बेहतर लगती है और अगर इसका क्रियान्वयन भी ठीक ढंग से होता है तो निस्संदेह यह किसानों की मुश्किलातों को कम करने में सहायक होगी। लेकिन बावजूद इसके एक सवाल यह उठता है कि क्या इस योजना से देश के किसानों की समस्याओं का सम्यक समाधान होगा और उनकी दशा में सुधार आएगा ? विचार करें तो इस सवाल का जवाब नकारात्मक ही प्रतीत होता है क्योंकि देश में किसानों की बिगड़ती दशा के लिए सिर्फ प्राकृतिक या अन्य कुछ आपदाएं ही जिम्मेदार हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता। ये आपदाएं तो किसानों की अनेक समस्याओं के समुच्चय का एक अवयव मात्र हैं।  
पंजाब केसरी 
यह जानने के लिए आज किसी शोध की जरूरत नहीं कि किसान आत्महत्या की त्रासदी काफी हद तक खेती की समस्याओं व हमारे किसानों की दुर्दशा से सम्बद्ध है। अगर भारत के किसानों की समस्याओं पर नज़र डालें तो उनकी एक लम्बी फेहरिस्त सामने आती है। चूंकि, भारत में खेती का उद्देश्य व्यावसायिक नहीं, जीविकोपार्जन का रहा है। इस नाते किसान की स्थिति तो हमेशा से दयनीय ही रहती आई है। तिसपर यहाँ खेती लगभग भाग्य भरोसे ही होती है कि अगर सही समय पर आवश्यकतानुरूप वर्षा हो गई, तब तो ठीक, वर्ना फसल बेकार। आज पेड़-पौधों में कमी के कारण वर्षा का संतुलन बिगड़ रहा है और इसका बड़ा खामियाजा हमारे किसानों को उठाना पड़ रहा है। हाल के कुछ वर्षों में तो कोई ऐसा साल नहीं गया, जिसमे कि देश में कुछ इलाके पूरी तरह से तो कुछ आंशिक तौर पर सूखे की चपेट में न आएं हों। हालांकि उपकरणों की सहायता से सिंचाई करने की तकनीक अब हमारे पास है। लेकिन, एक तो यह सिंचाई काफी महँगी होती है, उसपर इस सिंचाई से फसल को बहुत लाभ मिलने की भी गुंजाइश नहीं होती। क्योंकि एक तरफ आप सिंचाई करिए, दूसरी तरफ धूप सब सुखा देती है। सूखे की समस्या के अलावा कुछ हद तक जानकारी व जागरूकता का अभाव भी हमारे किसानों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। हालांकि किसानों में जानकारी बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा किसान कॉल सेंटर जैसी व्यवस्था की गई है, मगर जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था किसानों को बहुत लाभ दे पाई हो, ऐसा नहीं कह सकते। ये तो किसानों की कुछ प्रमुख समस्याओं की बात हुई, इसके अलावा और भी अनेकों छोटी-बड़ी समस्याओं से संघर्ष करते हुए हमारे किसान खेती करते हैं।  ऐसे किसान जिनकी पूरी आर्थिक निर्भरता केवल खेती पर ही होती है, खेती के लिए बैंक अथवा साहूकार आदि से कर्ज लेते हैं, लेकिन मौसमी मार के चलते अगर फसल ख़राब हुई तो फिर उनके पास कर्ज से बचने के लिए आत्महत्या के सिवाय शायद और कोई रास्ता नहीं रह जाता। इसके अतिरिक्त किसानों के पास खेती योग्य भूमि का अभाव होता जाना भी उनकी मुश्किलें बढ़ाने वाला है। एक आंकड़े की मानें तो आज देश के ९० फीसदी किसानों के पास खेती योग्य भूमि २ हेक्टेयर से भी कम है और इनमे से ५२ फीसदी किसान परिवार भारी कर्ज में डूबे हुए हैं।
दबंग दुनिया 
  इसी सन्दर्भ में उल्लेखनीय होगा कि विगत वर्ष भारतीय ख़ुफ़िया ब्यूरों (आईबी) द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को देश के किसानों की समस्याओं व उनकी दुर्दशा से सम्बंधित एक ख़ुफ़िया रिपोर्ट सौंपते हुए सरकार को  इस विषय में चेताया गया था। आम तौर पर सरकार से देश की सुरक्षा से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील सूचनाएं साझा करने वाली आईबी ने किसानों की समस्याओं जैसे मसले पर सरकार को ख़ुफ़िया रिपोर्ट दी इसीसे समझा जा सकता है कि यह मसाला कितना गंभीर था। रिपोर्ट में कहा गया था कि महाराष्ट्र, केरल, पंजाब आदि राज्यों में तो किसानों की आत्महत्याओं का बाहुल्य है ही, यूपी और गुजरात जैसे राज्यों में भी अब इस तरह के मामले ठीकठाक संख्या में सामने आने लगे हैं। इस  रिपोर्ट में सरकार द्वारा किसान आत्महत्या को रोकने के लिए किए जाने वाले ऋण माफ़ी, बिजली बिल माफ़ी समेत राहत पैकेज आदि उपायों का उल्लेख करते हुए कहा गया था  कि ये उपाय किसानों को फौरी राहत देते हैं न कि उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान करते हैं। परिणामतः किसानों की समस्याएँ बनी रहती हैं जो देर-सबेर उन्हें आत्महत्या को मजबूर करती हैं। आईबी की यह रिपोर्ट आने के बाद से अबतक देश में किसान आत्महत्या के मामलों में भारी इजाफा देखने को मिला है, जिससे स्पष्ट होता है कि इस रिपोर्ट में काफी हद तक सच्चाई थी लेकिन सरकार ने शायद इसे गंम्भीरता से नहीं लिया और किसानों की समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में कुछ ठोस कदम नहीं उठाए।

  अब मौजूदा फसल बीमा योजना पर आएं तो ये भी एक फौरी राहत की ही योजना है। इससे किसानों को उनकी मुश्किलों से कुछ राहत ज़रूर मिल जाया करेगी, लेकिन उनकी दशा में कोई सुधार होगा या देश की कृषि को इससे कोई लाभ होगा, ऐसा कहना कठिन है। बात यह है कि यदि फसल होगी तो ही उसका बीमा होगा, लेकिन यहाँ तो हालात इतने ख़राब हैं कि देश के ज्यादातर किसान ठीक ढंग से फसल उगाने की स्थिति में ही  नहीं हैं, फिर सस्ता ही सही बीमा कैसे कराएंगे ? 

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

नौकरशाहों के निलंबन नियमों में परिवर्तन का अर्थ [दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दबंग दुनिया 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपने वक्तव्यों में सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों को यह कहते रहे हैं कि वे निडर और दबावमुक्त होकर निर्णय लें। अब इस दिशा में उनकी सरकार की तरफ से एक बेहद महत्वपूर्ण कदम भी उठाया गया है। वह कदम ये है कि केंद्र सरकार द्वारा नौकरशाहों के निलंबन सम्बन्धी नियमों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जिनके बाद नौकरशाहों पर से राजनीतिक नियंत्रण या उनके कार्य में राजनीतिक हस्तक्षेप के कम होने की पूरी संभावना है। दरअसल नए नियमों के मुताबिक़ अब केंद्र के अधीन कार्यरत नौकरशाहों समेत अखिल भारतीय सेवा के तहत देश भर में कार्य कर रहे आईएएस, आईपीएस व आईएफओएस अधिकारियों को सम्बंधित राज्य सरकार द्वारा पहले की तरह सीधे-सीधे निलंबित नहीं किया जा सकेगा। अब यदि कोई केन्द्रीय मंत्रालय या राज्य सरकार ऐसे किसी अधिकारी का निलम्बन करती है तो इसकी सूचना अगले ४८ घंटे के अन्दर पीएमओ को देनी होगी तथा १५ दिन के भीतर निलम्बन के कारण आदि की विस्तृत रिपोर्ट भी सौंपनी होगी। साथ ही निलंबन की न्यूनतम अवधि जो पहले तीन महीने थी, को घटाकर अब दो महीने कर दिया गया है जिसे कि अब पहले की तरह छः महीने की बजाय अधिक से अधिक चार महीने तक ही बढ़ाया जा सकता है। इन बदले नियमों पर केन्द्रीय कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘सरकार का उद्देश्य नौकरशाही से भ्रष्टाचार मिटाना है और हम अधिकार अनुकूल वातारण मुहैया कराना चाहते हैं ताकि कोई भी अधिकारी सरकारी नियमों से भयभीत होकर अपना प्रदर्शन नहीं छोड़े। नए नियम ईमानदार अधिकारियों को प्रोत्साहित करेंगे और सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करेंगे।’’ माना जा रहा है कि इन नए नियमों के आने के बाद से नौकरशाह खुलकर और निडर होकर निर्णय कर सकेंगे तथा नेताओं द्वारा अपने हित के लिए उनका मनचाहा इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। बेशक बदले नियमों से तमाम उम्मीदें जगती हैं, लेकिन उम्मीदों के साथ कई सवाल भी उठते हैं. मोटे तौर पर सवाल यह है कि ये बदले नियम कितने कारगर होंगे ? 
  इसी क्रम में यदि पुराने नियमों के तहत नौकरशाहों के निलंबन की स्थिति पर नज़र डालें तो दरअसल पुराने नियमों के तहत राज्य सरकार या केन्द्रीय मंत्रालय मनचाहे ढंग से किसी अधिकारी-कर्मचारी को निलम्बित कर सकते थे, क्योंकि इस सम्बन्ध में उनके ऊपर कोई जवाबदेही नहीं थी। इस स्थिति का विशेष दुरूपयोग राज्य सरकारों द्वारा किया जाता रहा है। नौकरशाहों को निलंबित करने का भय दिखाकर राजनीतिक आकाओं द्वारा उनसे मनचाहे ढंग से अपने काम करवाने, उन्हें इमानदारी से काम करने से रोकने और अपने व्यक्तिगत हित से सम्बंधित निर्णय लेने के लिए दबाव बनाने आदि के तमाम मामले सामने आते रहे हैं। होता ये है कि अगर कोई अधिकारी ईमानदारी से अपने विभाग का काम करने लगे जिससे किसी गैरकानूनी धंधों वालों के काम में बाँधा पहुँचती हो, तो पहले तो उस अधिकारी को रिश्वत के जरिये रोकने की कोशिश की जाती हैं। यदि रिश्वत से अधिकारी नहीं दबा तो फिर अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर उसका निलंबन या तबादला करवा दिया जाता है। ऐसे ही अगर अधिकारी के इमानदार होने के कारण किसी नेता के भ्रष्टाचार आदि के उजागर होने का संकट हो तो भी अधिकारियों को निलंबित या तबादला आदि करने का भय दिखाकर उनके कार्य में हस्तक्षेप किया जाने लगता है। उदाहरण के तौर पर आईएएस अशोक खेमका का नाम उल्लेखनीय होगा जिन्हें उनकी ईमानदार कार्यशैली और भ्रष्टाचार के प्रति असहिष्णु रुख के कारण अपने अबतक के २१ वर्षों के कार्यकाल के दौरान ४० बार तबादले का सामना करना पड़ चुका है। इन बातों से स्पष्ट है कि देश की नौकरशाही के कार्यों में सियासी आकाओं द्वारा बड़े स्तर पर हस्तक्षेप किया जाता है।    
  अब प्रश्न यह उठता है कि क्या नौकरशाहों के निलम्बन सम्बन्धी नए नियम आने के बाद नौकरशाहों को वाकई में कार्य करने में राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति मिलेगी तथा वह निडर होकर निर्णय कर सकेंगे ? इस प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ और ‘ना’ का मिश्रित रूप है। क्योंकि यह सही है कि इन नए नियमों के बाद अधिकारियों के निलंबन के प्रति तो राज्य सरकारें और केंद्र सरकार के मंत्रालय जवाबदेह हो जाएंगे, लेकिन तबादला करने का निरंकुश अधिकार अब भी उनके हाथ में ही रहेगा। और गौर करें तो तबादलों के मामले निलंबन की अपेक्षा अधिक सामने आते हैं और इस हथकण्डे का इस्तेमाल राजनीतिक आकाओं द्वारा ज्यादा किया जाता है। क्योंकि निलंबन की स्थिति में कुछ महीने बाद सम्बंधित  अधिकारी फिर उसी स्थान या पद पर कार्यरत हो जाता है, जबकि तबादला करके अधिकारी को मामले से ही एकदम अलग कर दिया जाता है। अतः समझना कठिन नहीं है कि अधिकारी के कार्य को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक आकाओं द्वारा तबादला निलंबन से अधिक प्रयोग किया जाने वाला हथियार है। अतः कहना गलत नहीं होगा कि नौकरशाहों के निलंबन के सम्बन्ध में राज्य सरकारों आदि की पीएमओ के प्रति जवाबदेही भले सुनिश्चित की गई है, लेकिन इस नियम को तनी और व्यापक करने की जरूरत है। अर्थात कि निलंबन की ही तरह ही तबादले को लेकर भी राज्य सरकारों आदि की पीएमओ के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। ऐसा करके ही हम सही मायने में नौकरशाहों को काम करने के लिए स्वतंत्र और निडर वातावरण दे पाएंगे।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

छोटा राजन की गिरफ्तारी का अर्थ [दबंग दुनिया और नेशनल दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दबंग दुनिया 
विगत दिनों इंडोनेशिया के बाली हवाई अड्डे पर इंटरपोल द्वारा किसी जमाने में दाऊद का दाहिना हाथ कहे जाने वाले अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन को गिरफ्तार कर लिया गया। छोटा राजन की यह गिरफ्तारी भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर की गई। छोटा राजन की गिरफ्तारी के बाद से ही भारतीय मीडिया से लेकर सरकार तक हड़कंप मच गया है। और हड़कंप मचे भी क्यों न! आखिर छोटा राजन अंडरवर्ल्ड में दाऊद के बाद नंबर दो का डॉन रहा है। ये अलग बात है कि फिलवक्त  उसकी हालत काफी गर्दिश में थी और दाऊद गैंग से भागता फिर रहा था, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब वो दाऊद का सबसे करीबी आदमी था। इसी संदर्भ में अगर एक नज़र छोटा राजन के पूरे जीवन-वृत्त पर डालें तो उपलब्ध जानकारियों के अनुसार इसका असली नाम राजेन्द्र सदाशिव निखलजे है। मुंबई में जन्मा राजेन्द्र सदाशिव निखलजे शुरू-शुरू में में छोटी-मोटी चोरियां, तस्करी आदि करता था, फिर इसने राजन नायर यानी बड़ा राजन के लिए काम करना शुरू किया और फिर बड़ा राजन की मौत हुई तो छोटा राजन के नाम से इसने उसके गैंग की कमान संभाल ली। फिर वह दाऊद से जुड़ गया और उसके लिए मुंबई में काम करने लगा। सन १९८८ में वह मुंबई छोड़कर दुबई चला गया। ये वो दौर था जब दाऊद और छोटा राजन में बेहद नजदीकी थी। इस दौरान उसने मुंबई लूट, फिरौती, हत्या आदि की तमाम वारदातों को अंजाम दिलवाया। लेकिन सन १९९३ के मुंबई बम धमाकों के बाद दाऊद और छोटा राजन में मतभेद उभर आए। छोटा राजन ऐसे हमले के खिलाफ था, पर दाऊद ने हमले को अंजाम दिया। परिणामतः दाऊद से अलग होकर उसने अपनी एक अलग गैंग बना ली और खुद को राष्ट्रवादी हिन्दू डॉन के रूप में प्रचारित करने की नाकामयाब कोशिश करने लगा।
नेशनल दुनिया 
उसने दाऊद गैंग के लोगों को मरवाना शुरू कर दिया। साथ ही भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों को भी दाऊद गैंग से जुडी महत्वपूर्ण सूचनाएं भी देने लगा जिससे दाऊद्द को काफी दिक्कते हुईं। छोटा राजन के बढ़ते कद से मुंबई के छोटा शकील जैसे छोटे डॉन असुरक्षित महसूस कर ही रहे थे तो मौके का फायदा उठाते हुए उन्होंने दाऊद को उसके खिलाफ भड़काया। धीरे-धीरे छोटा शकील दाऊद के लिए छोटा राजन की जगह ले लिया और फिर छोटा राजन को मारने के लिए अनेकों बार कोशिशें हुईं। वो दुबई, आस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि तमाम देशों में जान-बचाकर भागता फिरता रहा। करते-धरते आज हालत यह है कि छोटा राजन की गैंग लगभग पूरी तरह से तहस-नहस हो चुकी है और शारीरिक रूप से भी वो बेहद अस्वस्थ है। उसकी किडनियां ख़राब हो चुकी हैं और वो चिकित्सकीय उपकरणों तथा दवाओं के दम पर जिंदा है। इन स्थितियों को देखते हुए उसकी इस अचानक गिरफ्तारी पर यह भी कहा जा रहा है कि उसने खुद ही  अपनी गिरफ्तारी इंडोनेशिया में करवाई है ताकि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी में वो दाऊद गैंग से सुरक्षित रहे तथा उसका समुचित इलाज भी हो सके। क्योंकि जो डॉन पिछले कई दशकों से भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों को चकमा देता रहा था, उसकी इतनी आसानी से गिरफ्तारी तो कहीं से हजम नहीं ही होती। यह भी कहा जा रहा है कि गिरफ्तारी के लिए उसने इंडोनेशिया इसलिए चुना क्योंकि वहां उसपर कोई आपराधिक मामला नहीं है और उसकी नागरिकता भारत की है, ऐसे में इंडोनेशिया हुकूमत द्वारा उसे भारत को सौंपना ही एक रास्ता है। गिरफ्तारी के बाद उसकी  जो  तस्वीर सामने आई है उसमे छोटा राजन मुस्कुरा रहा है, ये तस्वीर  भी इस बात की काफी हद तक पुष्टि ही करती है कि ये गिरफ्तारी कहीं न कहीं सुनियोजित थी। अब जो भी हो, लेकिन इससे तो कोई इंकार नहीं किया जा सकता कि छोटा राजन के भारत आने पर पूछताछ में दाऊद गैंग से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें सामने आएं जिनके जरिये ख़ुफ़िया एजेंसियों को दाऊद तक पहुँचने में भी सहायता मिले। लेकिन यह कहना कि छोटा राजन गिरफ्तार हो गया तो दाऊद भी अब दूर नहीं, अभी काफी जल्दबाजी भरी उक्ति होगी। वैसे, भारत में छोटा राजन पर लूट, फिरौती, हत्या, हत्या के प्रयास आदि के तमाम मामले दर्ज हैं। मशहूर पत्रकार ज्योतिर्मय डे हत्याकांड में भी छोटा राजन की संलिप्तता की बात खुद उसीके द्वारा स्वीकार की गई है। आशा है, अगले सप्ताह-दस दिनों में उसे भारत लाया जाय और फिर इन सब मामलों में उसपर मुकदमा भी चलेगा ही।

  एक तथ्य यह भी है कि छोटा राजन की गिरफ्तारी से कुछ दिन पहले से ही विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह इंडोनेशिया में थे तो माना जा रहा है कि कहीं न कहीं वे इसी मिशन के लिए इंडोनेशिया में गए हों। वैसे अब जिस तरह से छोटा राजन द्वारा खुद ही अपनी गिरफ्तारी की बात सामने आ रही है, उसने मोदी सरकार से इस गिरफ्तारी का श्रेय लेने का मौक़ा लगभग छीन ही लिया है। शायद इसीलिए सरकार द्वारा अबतक इसपर श्रेय लेने की कोई विशेष कोशिश भी नहीं की गई है और संभव है कि बहुत अधिक की जाएगी भी नहीं। 

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

दाल की महंगाई में फंसा केंद्र [अमर उजाला कॉम्पैक्ट, दैनिक दबंग दुनिया, नेशनल दुनिया और जनसत्ता में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

अमर उजाला 
कहावत है कि घर की मुर्गी दाल बराबर; लेकिन इन दिनों दाल की कीमतें जिस तरह से आसमान छू रही हैं, उसने इस कहावत को मजाक बना दिया है। आलम यह है कि अब दाल मुर्गे यानी नॉन वेज से ज्यादा महँगी हो गयी है। मुर्गा जहाँ १५० से १८० रूपये किग्रा के बीच है, वहीँ अभी एक साल पहले तक ८० से सौ रूपये के बीच रहने वाली दालों की कीमत अब १८० से २०० रूपये तक का आंकड़ा पार कर चुकी है। सवाल यह है कि आखिर क्या कारण है कि एक वर्ष के अन्दर ही दाल की कीमतें दुगुने से भी अधिक बढ़ गईं ? अब चूंकि केंद्र की मोदी सरकार को आए भी एक साल से कुछ अधिक समय ही हुआ है, लिहाजा दाल की इस बढ़ी कीमत के लिए विपक्ष से लेकर आमजनों तक सर्वाधिक जिम्मेदार उसीको ठहराया जा रहा है। ये सही है कि दालों की इस बढ़ी महंगाई के लिए सरकार जवाबदेह है, पर यह भी देखना आवश्यक होगा कि इन कीमतों के बढ़ने में क्या सरकार की कोई नीतिगत गलती कारण है या किन  कारणों से यह कीमतें बढ़ी हैं ? विचार करें तो दालों की इस महंगाई के लिए सरकार को कोई विशेष दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि न तो यह कीमतें सरकार की किन्ही नीतिगत खामियों से बढ़ी हैं और न ही फिलवक्त स्थिति ऐसी है कि सरकार इन्हें बहुत अधिक नियंत्रित कर सके। दाल की ये कीमतें बढ़ने के लिए कई कारण हैं। इस सन्दर्भ में एक तथ्य उल्लेखनीय होगा कि भारत दुनिया का सर्वाधिक दाल उत्पादक देश है, जबकि ठीकठाक उत्पादन होने पर भी वो अपनी ज़रुरत की लगभग ९० प्रतिशत दाल ही उत्पादित कर पाता है। अब ऐसे में  दुनिया के इस सर्वाधिक दाल उत्पादक देश को हर वर्ष विदेशों से कुछ न कुछ दाल का आयात करना ही पड़ता है। वर्ष २०१३-२०१४ में देश में दलहन की फसल अच्छी रही थी और १.९२ करोड़ टन दलहन का उत्पादन हुआ था, लेकिन देश की ज़रुरत २ करोड़ टन की थी। लिहाजा इस अच्छे उत्पादन के बावजूद भारत को कनाडा, आस्ट्रेलिया, म्यांमार, अमेरिका आदि देशों से दाल आयात करनी पड़ी। अब इस वर्ष तो दलहन की फसल का बड़ा हिस्सा बेमौसम बरसात के कारण नष्ट व ख़राब हो गया है।
नेशनल दुनिया 
कृषि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार इस वर्ष मौसमी मार के चलते देश भर में लगभग १३ लाख हेक्टेयर दलहन बर्बाद हो गयी। देश के सर्वाधिक दाल उत्पादक राज्य यूपी में अकेले चार लाख हेक्टेयर दलहन की फसल बरसात की भेंट चढ़ी। इन बर्बादियों के कारण देश का दलहन उत्पादन पिछले बार के मुकाबले २० लाख टन कम यानी १
.७२ करोड़ टन रहा। इस १.७२ करोड़ टन में भी काफी अधिक मात्रा में ऐसी दाल है जो मौसमी मार  से नष्ट तो नहीं हुई, पर अपनी गुणवत्ता खो चुकी है। अब ऐसे में अच्छे उत्पादन की स्थिति में भी अपनी ज़रुरत से कम दाल उत्पादित करने वाले देश भारत के लिए तो मुश्किलातें आनी ही हैं। दाल के इस कम उत्पादन से बाजार में मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर आ गया है, जिस कारण स्वाभाविक रूप से दाल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसके अतिरिक्त जमाखोरों द्वारा दाल की इस कमी से और अधिक मुनाफा कमाने के उद्देश्य से की जा रही दाल की जमाखोरी भी दाल की बढ़ती महंगाई के लिए एक हद तक जिम्मेदार है। इनपर अंकुश के लिए लगातार छापे मारे जा रहे हैं जिसमे कि अबतक ३६००० मीट्रिक  टन दालें जब्त की गई  हैं।
 

दबंग दुनिया 
जनसत्ता 
  यह तो बात समस्या की हुई; अब प्रश्न यह उठता है कि सरकार इससे निपटने के लिए क्या कर रही है ? तो ऐसा नहीं है कि सरकार इस स्थिति पर आँख मूंदे बैठी है। सरकार द्वारा दाल की मांग और आपूर्ति के अंतर को पाटने के लिए आयात बढ़ाने से लेकर दालों की कीमतें नियंत्रित करने के लिए प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड बनाने तक तमाम कदम उठाए जा रहे हैं। आयात की बात करें तो कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष २०१३-२०१४ के मुकाबले वर्ष २०१४-२०१५ में दाल आयात में लगभग ९ हजार टन की वृद्धि हुई है। समझना मुश्किल नहीं है कि आयात में यह भारी वृद्धि अधिकांशतः दाल की इन बढ़ रही कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही हुई है। केंद्र सरकार तो आयात बढ़ाकर दालों की कीमतें नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, पर इस दिशा में जाने क्यों देश की तमाम राज्य सरकारों का रुख बेहद अजीब और असहयोगी दिख रहा है। अब एक तरफ तो राज्य सरकारें केंद्र से दाल की कमी का भी रोना रो रही हैं, वहीँ दूसरी तरफ अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने राज्यों की ज़रुरत को देखते हुए ५००० टन की उड़द दाल का अंतर्राष्ट्रीय टेंडर जारी किया था। पर  जब राज्यों से उनकी जरूरत की स्पष्ट मात्रा बताने को कहा गया तो ज्यादातर राज्य उड़द की दाल लेने से मुकर गाए। परिणामस्वरूप केंद्र को बेहद असहज रूप से यह अंतर्राष्ट्रीय टेंडर रद्द करना पड़ा। इतना ही नहीं, चेन्नई व मुंबई के रास्ते आयातित दालों को उठाने से भी ज्यादातर राज्यों ने इंकार कर दिया। स्पष्ट है कि राज्य सरकारें दालों की महंगाई का सारा ठीकरा केंद्र के सर डालकर खुद थोड़ी सी भी जहमत उठाने से बचना चाहती है। राज्यों के इस गैरजिम्मेदाराना और असहयोगी रवैये के कारण के केंद्र की दाल की कीमतें नियंत्रित करने की कोशिशें पूरी तरह से परवान नहीं चढ़ पा रही और दाल लगातार महँगी होती जा रही है। और इन सबमे सबसे ज्यादा किरकिरी केंद्र सरकार की हो रही है, जो कि उसके साथ अन्याय ही है।
  हालांकि केंद्र सरकार को चाहिए कि वो दाल की इन बढ़ी कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश तो करे ही; इस दिशा में कुछ दूरगामी कदम भी उठाए। चूंकि दाल की फसल लम्बी अवधि वाली और बेहद नाज़ुक होती है, इसलिए उसके चौपट होने का खतरा बना रहता है। साथ ही नीलगायें जो कि संरक्षित पशु हैं, भी दाल की खेती के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं। ये झुण्ड में फसल पर आक्रमण कर उसे चौपट कर देती हैं और व्यक्ति बहुत अधिक कुछ कर नहीं पाता। अब इन सब मुश्किलातों के कारण धीरे-धीरे किसान दाल की खेती से मुह मोड़ते जा रहे हैं जिससे उत्पादन स्तर लगातार गिरता जा रहा है। देश के सर्वाधिक दाल उत्पादक राज्य यूपी में २०११ से २०१५ के बीच दाल उत्पादन में ८ लाख मीट्रिक टन तक की कमी आयी है। समझा जा सकता है कि दाल की खेती को लेकर लोगों में किस कदर उदासीनता घर कर रही है। लिहाजा जरूरत है कि सरकार इस दिशा में शोध को बढ़ावा देकर ऐसे बीज तैयार करवाए जो कि अपेक्षाकृत कम नाज़ुक हों और कम अवधि में तैयार हो जाएं। इससे इसकी खेती में जोखिम कम होगा जिससे लोग जुड़ेंगे और उत्पादन बढ़ेगा। ये दूरगामी चीजें हैं जिनपर अगर सरकार बढ़ती है तो भविष्य में दाल की कीमतों में ऐसे उछालों से बचा जा सकता है। 

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

हवा के इस ज़हर से कैसे बचें [दबंग दुनिया और दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दबंग दुनिया 
विगत दिनों एक तरफ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पर्यावरण संरक्षण के लिए मशहूर कैलिफोर्निया के गवर्नर के बीच भारत में वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से निपटने पर चर्चा हो रही थी, तो वहीँ दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली के छः से चौदह महीने तक के तीन दुधमुंहे बच्चे सर्वोच्च न्यायालय में वायु प्रदूषण पर रोकथाम से सम्बंधित याचिका दाखिल कर रहे थे। याचिका में मांग की गई है कि अधिकृत संस्थाओं को दिल्ली में पटाखों आदि के बिक्री के लिए अस्थायी लाइसेंस जारी करने से रोका जाय। यह समझना कोई राकेट साइंस नहीं है कि बच्चों की तरफ से ये याचिकाएं उनके अभिभावकों द्वारा अपने विरोध को देश के बच्चों के विरोध का प्रतीकात्मक रूप देने के उद्देश्य से दायर की गयी हैं। अब सर्वोच्च न्यायालय इसपर क्या सुनवाई करता है, ये तो आगे सामने आएगा। लेकिन इसमें तो कोई दो राय नहीं कि वायु प्रदूषण दिन ब दिन देश के लिए भीषण संकट बनता जा रहा है। केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा राज्य सभा में जारी एक आंकड़े के मुताबिक़ देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण जनित बीमारियों से प्रतिदिन लगभग ८० लोगों की मौत होती है। नासा सैटेलाइट द्वारा इकट्‌ठा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में पीएम-25 जैसे छोटे कण की मात्र बेहद अधिक है। औद्योगिक उत्सर्जन और वाहनों द्वारा निकासित धुंए से हवा में पीएम-25 कणों की बढ़ती मात्रा घनी धुंध का कारण बन रही है। देश की राजधानी की ये स्थिति चौंकाती भले हो, लेकिन यही सच्चाई है। इंकार नहीं कर सकते  कि इसी कारण दिल्ली दुनिया के दस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल है। यह हाल सिर्फ दिल्ली का नहीं है, वरन देश के अन्य महानगरों की भी कमोबेश यही स्थिति है। इन स्थितियों के कारण ही वातावरण में सुधार  के मामले में भारत की स्थिति में काफी गिरावट आई है। अमेरिका के येल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के मुताबिक़ एनवॉयरमेंट परफॉर्मेंस इंडेक्स में  178 देशों में भारत का स्थान 32 अंक गिरकर 155वां हो गया है। वायु प्रदूषण के मामले में भारत की स्थिति ब्रिक्स देशों में सबसे खस्ताहाल है। अध्ययन के मुताबिक प्रदूषण के मामले में भारत की तुलना में पाकिस्तान, नेपाल, चीन और श्रीलंका की स्थिति बेहतर है जिनका इस इंडेक्स में स्थान क्रमशः 148वां, 139वां, 118वां और 69वां है। यह सूची जिन ९ प्रदूषण कारकों के आधार पर तैयार की गई है, उनमे वायु प्रदूषण भी शामिल है।   इस वायु प्रदूषण के कारण देश में प्रतिवर्ष लगभग छः लाख लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। इन आंकड़ों को देखते हुए स्पष्ट है कि भारत में वायु प्रदूषण अत्यंत विकराल रूप ले चुका है। दुर्योग यह है कि देश इसको लेकर बातों में तो चिंता व्यक्त करता है, पर इसके निवारण व रोकथाम के लिए यथार्थ में कुछ करता नहीं दिखता।  बहरहाल, उपर्युक्त आंकड़ों के सम्बन्ध में यह तर्क दिया जा सकता है कि पाकिस्तान, श्रीलंका आदि देशों की जनसख्या,   औद्योगिक प्रगति और वाहनों की मात्रा भारत की अपेक्षा बेहद कम है, इसलिए वहां वायु प्रदूषण का स्तर नीचे है। लेकिन इस तर्क पर सवाल यह उठता है कि स्विट्ज़रलैंड, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि देश क्या औद्योगिक प्रगति नहीं कर रहे या उनके यहाँ वाहन नहीं हैं, फिर भी वो दुनिया के सर्वाधिक वातानुकूलित देशों में कैसे शुमार हैं ? और क्या ऐसी दलीलों के जरिये देश और इसके कर्णधार इसको प्रदूषण मुक्त करने की अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं ? दरअसल वायु प्रदूषण औद्योगिक प्रगति से अधिक इस बात पर निर्भर करता है कि आप प्रगति और प्रकृति के मध्य कितना बेहतर संतुलन रख रहे हैं। अगर प्रगति और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित किया जाय तो न केवल वायु प्रदूषण वरन हर तरह के प्रदूषण से निपटा   जा सकता है। पर इस संतुलन के लिए कानूनी स्तर से लेकर जमीनी स्तर पर तक मुस्तैदी दिखानी पड़ती है, जिस मामले में यह देश काफी पीछे है। प्रदूषण को लेकर हमारे हुक्मरानों की उदासीनता को इसीसे समझा जा सकता है कि देश का कोई भी राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में प्रदूषण नियंत्रण से सम्बंधित कोई वादा नहीं करता। ऐसे किसी वादे से इसलिए परहेज नहीं किया जाता  कि प्रदूषण नियंत्रण कठिन कार्य है, क्योंकि इससे कठिन-कठिन वादे हमारे हुक्मरानों द्वारा कर दिए जाते हैं। लेकिन वे प्रदूषण नियंत्रण जैसे वादे से सिर्फ इसलिए परहेज करते हैं कि उनकी नज़र में ये कोई मुद्दा नहीं होता।
दैनिक जागरण 

  देश में वायु प्रदूषण के लिए दो सर्वाधिक जिम्मेदार कारक हैं। एक डीजल-पेट्रोल चालित मोटर वाहन और दूसरा औद्योगिक इकाइयाँ। इनमे मोटर वाहनों में तो कुछ हद तक इंधन सम्बन्धी ऐसे बदलाव हुए हैं जिससे कि उनसे होने वाले प्रदूषण में कमी आए। सीएनजी वाहन, बैटरी चालित वाहन आदि ऐसे ही कुछेक बदलावों के उदाहरण हैं। लेकिन औद्योगिक इकाइयों पर नियंत्रण के लिए कुछ ठोस नहीं किया जा रहा जबकि उनसे सिर्फ वायु ही नहीं, वरन जल आदि में भी प्रदूषण फ़ैल रहा है। इन औद्योगिक इकाइयों की चिमनियों से निकलने वाले धुंए की भयानकता इसीसे समझी जा सकती है कि देश की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर इलाकों जहाँ औद्योगिक इकाइयों की भरमार है, में तो ये धुंआ स्थायी धुंध का रूप लेता जा रहा है। आलम यह है कि धुंध के मामले में दिल्ली ने बीजिंग को भी पीछे छोड़ दिया है।  इन औद्योगिक इकाइयों पर नियंत्रण के लिए एक सख्त क़ानून की जरूरत है जिसकी फिलहाल कोई संभावना नहीं दिखती। एक और बात कि एक तरफ तो इन औद्योगिक इकाइयों, वाहनों की भरमार से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, वहीँ दूसरी तरफ दिन ब दिन पेड़-पौधों में जिस तरह से कमी आ रही है, उससे स्थिति और विकट होती जा रही है। अब जमीनी हालात ऐसे हैं  और देश औद्योगिक प्रगति के अन्धोत्साह में अब भी उलझा हुआ है। दोष सिर्फ सरकारों का ही तो नहीं है, जाने-अनजाने नागरिक भी इसके लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। लोगों ने अपने जीवन को इतना अधिक विलासितापूर्ण बना लिया है कि जरा-जरा सी चीज के लिए वे उन वैज्ञानिक उपकरणों पर निर्भर हो गाए हैं जिनसे वायु प्रदूषण का संकट और गहराता है। वाहन, बिजली उपकरण, कागज़, सौन्दर्य प्रशाधन आदि तमाम चीजें हैं जिनपर लोगों की  आवश्यकता से अधिक निर्भरता हो गयी है जो कि प्राकृतिक विनाश और प्रदूषण के विकास में महती भूमिका निभा रही है। अतः आज जरूरत यही है कि सरकार और नागरिक दोनों इस सम्बन्ध में चेत जाएं और वायु को जीवन के अनुकूल रखने के लिए न केवल बातों से वरन अपने आचरण से भी गंभीरता का परिचय दें। इस सम्बन्ध में अपने-अपने स्तर पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। क्योंकि सारी प्रगति तभी होगी जब हम जीएंगे और हम जीएंगे तभी, जब धरती पर स्वच्छ और सांस लेने योग्य वायु होगी।    

बुधवार, 26 अगस्त 2015

इन पूर्व सैनिकों की भी सुनिए सरकार [दैनिक जागरण राष्ट्रीय और दैनिंक दबंग दुनिया में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
दैनिक जागरण
विगत दो महीने से दिल्ली के जन्तर-मंतर पर वन रैंक-वन पेंशन की मांग को लेकर धरने पर बैठे हैं और अब तो कुछ पूर्व सैनिक आमरण अनशन पर भी बैठ गए हैं जिस दौरान अनशनरत रिटायर्ड कर्नल पुष्पिंदर सिंह की तबियत भी बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। लेकिन इससे पूर्व सैनिकों का जोश न टूटा। कर्नल सिंह के अस्पताल जाते ही उनकी जगह हवालदार तेज सिंह अनशन पर बैठ गए। हालांकि इन सैनिकों के समर्थन में बहुत अधिक लोग नहीं जुटे हैं, मगर फिर भी यह सैनिक अपनी मांग पर डटे हुए धरनारत हैं। कितनी बड़ी विडम्बना है न कि सेना को लेकर जो देश हद से ज्यादा श्रद्धान्वित और भावुक होने की बात करता है, वहां पूर्व सैनिकों का साथ देने के लिए ठीकठाक अच्छी संख्या में लोग तक नहीं जुट रहे। सवाल यह उठता है कि कहीं हमारा सैन्य प्रेम सिर्फ प्रतीकात्मक या दिखावा भर तो नहीं है ? इन सैनिकों का साथ देने अगर ठीकठाक संख्या में जनता पहुँचती तो संदेह नहीं कि केंद्र की मोदी सरकार पर दबाव बनता और वो इनकी जल्द सुनवाई करती। लेकिन अधिक जन समर्थन न होने के कारण मोदी सरकार भी इन सैनिकों की तरफ से आँख-कान मूंदे बैठी है। जबकि इसी मोदी सरकार ने सत्ता में आने से पूर्व अपने घोषणापत्र में यह वादा किया था कि वो सत्ता में आते ही यथाशीघ्र वन रैन्क-वन पेंशन (ओआरओपी) को लागू करेगी। मोदी सरकार सत्ता में आई और पूर्व सैनिकों ने सरकार को ओआरओपी लागू करने के लिए समय भी दिया, मगर सरकार सिर्फ इसे जल्द से जल्द लागू करने की बातें ही करती रही, लागू नहीं कर सकी। अब पिछले दो महीने से पूर्व सैनिक धरने पर बैठे हैं और त्रासदी देखिए कि सरकार अब भी बस बातें ही कर रही है। कभी प्रधानमंत्री इसके जटिल होने की बात करते हैं तो कभी रक्षा मंत्री यह कहते हैं कि पूर्व सैनिकों के लिए जल्द ही अच्छी खबर आएगी। तमाशा बना दिया गया है सेना के इन पूर्व जवानों का। यहाँ समझ न आने वाली बात ये है कि आखिर ये पूर्व सैनिक ऐसा कौन-सा खजाना मांग रहे हैं कि सरकार को इतनी देरी लग रही है। कितनी बड़ी विडम्बना है न कि जिस देश में तथाकथित देशसेवा-जनसेवा के नाम पर नेताओं को गाड़ी, बंगला और जाने कितनी छूटें मिल जाती हैं, वहां देश की रक्षा-सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाकर सीमा पर खड़े रहने वाले वास्तविक देशसेवक सेना के जवानों को सेवानिवृत होने के बाद एक अदद पेंशन में समानता देने में हुकुमत के लिए दशकों का समय भी कम पड़ जाता है। सवाल यह है कि आखिर इस मामले में ऐसी कौन सी जटिलता है जिससे विगत तीन दशकों से अधिक समय में पार नहीं पाया जा सका ? जाहिर है कि यहाँ समस्या इस मामले की जटिलता नहीं, इसके क्रियान्वयन के लिए हमारे हुक्मरानों में दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव होना है। इसी क्रम में यदि वन रैंक-वन पेंशन मामले को समझने का प्रयत्न करें तो इसका अर्थ यह है कि अलग-अलग समय पर सेवानिवृत हुए एक ही रैंक के जवानों को बराबर पेंशन दी जाय या उनकी पेंशन में अधिक अंतर न रहे। अभी स्थिति यह है कि जो सैन्य अधिकारी या सैनिक जब सेवानिवृत हुए हैं, उन्हें पेंशन के तत्कालीन नियमों के हिसाब से पेंशन मिलती है। अब चूंकि सेना के पेंशन के नियम कई बार बदले हैं। ब्रिटिश शासन के समय फौजियों की पेंशन उनकी तनख्वाह की ८३ प्रतिशत थी जिसे आज़ादी के बाद सन १९५७ में भारत सरकार ने कम कर दिया और इसके मद से सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों जिन्हें तब वेतन का ३३ फीसदी पेंशन मिलती थी, की पेंशन को बढ़ा दिया। सन १९७१ में सेना के पेंशन के नियम यूँ थे कि सैनिक को उसके वेतन का ७५ प्रतिशत जबकि सैन्य अधिकारियों को ५० फीसदी पेंशन मिलती थी जिसे बाद में तीसरे वेतन आयोग ने घटाकर ५० फीसदी कर दिया। इस तरह सन १९७१ में सेवानिवृत हुए फौजियों तथा उसके बाद सेवानिवृत हुए फौजियों की पेंशन में भारी अंतर है। आगे भी जब-तब पेंशन के नियम बदले और ये अंतर भी आता गया। गौर करें तो सन २००५ और २००६ के में सेवानिव्रूत हुए फौजियों की पेंशनों के बीच लगभग १५००० रूपये तक का अंतर। स्थिति यह है कि २००६ के बाद सेवानिवृत कर्नल २००६ से पूर्व सेवानिवृत अपने से उच्च रैंक के मेजर जनरल से अधिक पेंशन पाता है। इन विसंगतियों के मद्देनज़र फौजियों की मांग यह है कि सेना में एक रैंक-एक पेंशन की व्यवस्था कर दी जाय जिसके तहत एक रैंक के अलग-अलग समय पर सेवानिवृत दो फौजियों की पेंशनों में कोई अंतर न हो। वन रैंक-वन पेंशन के लागू होने से तकरीबन २५  लाख भूतपूर्व फौजियों और लगभग १३ लाख वर्तमान फौजियों समेत ६।५ लाख से अधिक शहीदों की विधवाओं को भी लाभ मिलेगा।
दबंग दुनिया 
  सेना के पेंशन का यह मामला तो सन १९७३ से चल रहा है। सन २००८ में इस मुहीम के तहत इण्डियन सर्विसमैन मूवमेंट की स्थापना भी हुई। लेकिन इसने असल तूल सन २००९ में तब पकड़ा जब ३०० से अधिक भूतपूर्व सैनिकों ने इस मसले को लेकर राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया और अपने मेडल भी वापस कर दिए। मगर इस मामले पर तत्कालीन संप्रग सरकार से भी तब कुछ नहीं किया गया। संप्रग सरकार को होश तब आया जब लोकसभा चुनाव २०१४ का समय आया और चुनाव से ठीक पहले अपने अंतरिम बजट में संप्रग ने इस योजना के तहत ५०० करोड़ रूपये का प्रावधान किया। भाजपा ने भी अपने घोषणापत्र में वन रैंक वन पेंशन लागू करने का वादा किया। चुनाव के बाद भाजपानीत मोदी सरकार सत्ता में आई और उसने जुलाई २०१४ में पेश अपने पहले बजट में ही वन रैंक-वन पेंशन के लिए १००० करोड़ रूपये का प्रावधान किए। लेकिन अब मोदी सरकार का साल भर से अधिक समय पूरा हो चुका है और यह योजना अब तक लागू नहीं हुई है। चुनाव से पहले अपनी रेवाड़ी रैली में वन रैंक-वन पेंशन लागू करने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी अब कहते हैं कि उन्होंने इस मामले को जितना सरल समझा था, ये उतना सरल है नहीं। सवाल यह है कि ऐसी क्या जटिलता है जिससे प्रधानमंत्री मोदी की सरकार एक साल से अधिक समय में ख़त्म नहीं कर सकी ? इस योजना को लागू करने में एक अड़चन यह बताई जा रही है कि इस योजना के चलते सरकार पर शुरुआत में लगभग साढ़े ८ हजार करोड़ का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। दूसरी समस्या यह बताई जा रही है कि सेना में ऐसी व्यवस्था लाने पर दूसरे विभाग भी ऐसी मांग कर सकते हैं तो सरकार उनके लिए संसाधन कहाँ से जुटाएगी। इन बातों का एक यही उत्तर यह है कि सैनिक दिन-रात, बारिश-धूप, सर्दी-गर्मी आदि विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों में  अपनी जान हथेली पर लेकर देश के लिए खड़े रहते हैं, उनके कार्य में अन्य किसी विभाग की अपेक्षा मेहनत और जोखिम बहुत अधिक है। इसलिए उनको हर तरह से विशिष्ट व्यवस्था मिलनी चाहिए और इससे किसी विभाग को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। कहने का अर्थ ये है कि यदि इन पूर्व फौजियों की इसी तरह उपेक्षा की जाती रही तो इससे हमारे वर्तमान फौजियों के मनोबल पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा जो कि देश के लिए कतई अच्छा नहीं है।