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शनिवार, 7 नवंबर 2015

काले धन के पेंच [दैनिक जागरण राष्ट्रीय, नेशनल दुनिया और सामना में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

दैनिक जागरण 
विगत दिनों योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण की एक प्रेस कांफ्रेंस में ऑनलाइन वार्ता के जरिये स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा स्थित एचएसबीसी बैंक के व्हिसल ब्लोवर हर्व फाल्सियानी द्वारा दावा किया गया कि भारत से अब भी बड़ी मात्रा में काला धन विदेश भेजा जा रहा  है जबकि पहले से जमा काले धन को लेकर भी सरकार अभी बहुत संजीदा नहीं दिख रही। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास इस सम्बन्ध में तमाम सूचनाएं हैं जिन्हें वे भारत सरकार से साझा कर सकते हैं बशर्ते कि सरकार उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराए। ज्ञात हो कि हर्व फाल्सियानी पर जिनेवा के  एचएसबीसी बैंक में काला धन जमा करने वालों की सूची सार्वजनिक करने का आरोप है। इसी कारण वे भारत सरकार से सुरक्षा मुहैया कराने की मांग कर रहे थे। अब एक तरफ फाल्सियानी यह सब कह रहे थे तो वहीँ दूसरी तरफ केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा ‘नेटवर्किंग द नेटवर्क’ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए काले धन पर उठाए क़दमों की बात की जा रही थी। जेटली ने कहा कि काले धन पर की जा रही कार्रवाई से वे संतुष्ट हैं और इसका असर अगले कुछेक वर्षों में देश के सामने आएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दुनिया एक दूसरे से सूचनाएं साझा करने के जरिये अब ऐसी व्यवस्था की ओर अग्रसर है जिसमे कि आप एक देश से दूसरे देश में अवैध धन को गुप्त तरीके से छुपाकर बच नहीं सकते। गौरतलब है कि विगत वर्ष ऑस्ट्रेलिया में जी-२० देशों की बैठक में सभी देशों ने २०१७-१८ से सूचनाओं के स्वतः आदान-प्रदान के लिए  सहमति जताई थी। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसी बैठक में काले धन का मुद्दा भी उठाया गया था। इसके बाद अब ९० देश व स्वायत्त क्षेत्र सूचनाओं के आदान-प्रदान करने को तैयार हो गए हैं। स्पष्ट है कि इसी अंतर्राष्ट्रीय समझौते के आलोक में केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा काले धन से सम्बंधित उक्त बातें कही गईं।
नेशनल दुनिया 
  इसी क्रम में अगर ये समझने का प्रयास करें कि आखिर काला धन है क्या तो उल्लेखनीय होगा कि वो धन जो किसी लूट, डकैती, रिश्वतखोरी, अवैध तश्करी आदि गैरकानूनी तरीकों से अर्जित किया गया हो, काला धन कहलाता है। अब चूंकि आय की स्रोत बी बताए जा सकने के व टैक्स भरने से बचने के कारण सबंधित व्यक्तियों द्वारा काले धन की जानकारी आयकर विभाग को नहीं दी जाती हैं। ऐसे में, इस धन को आयकर विभाग की नज़रों से बचाने  का सबसे सुरक्षित स्थान विदेशी बैंक होते हैं। सो, अधिकाधिक काले धन के स्वामी अपना धन विदेशी बैंकों में जमा करवा देते हैं। अब विदेशी बैंकों में भारत का कुल कितना धन जमा है, इसपर जितने लोग हैं उतनी ही बाते हैं। लेकिन सही मायने में देश आज भी इस बात से अनभिज्ञ है कि देश का कितना पैसा विदेशी बैंकों में काले धन के रूप में जमा है ?
  बहरहाल, अब सवाल यह उठता है कि अगर सरकार काले धन पर  वाकई में इतनी गंभीर है तो फिर फाल्सियानी की इस बात में कितनी सच्चाई है कि देश से अब भी काला धन विदेशों में भेजा जा रहा है ? इस सवाल पर विचार करें तो फाल्सियानी की बातों में सच्चाई की पूरी संभावना दिखती है। क्योंकि अभी सरकार राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काले धन की रोकथाम के लिए व्यवस्था निर्मित करने की दिशा में काम कर रही है, न कि व्यवस्था निर्मित होकर काम करना शुरू कर चुकी है। लिहाजा अभी अगर फाल्सियानी यह कहते हैं कि देश से भारी मात्रा में काला धन विदेशों में जा रहा है तो इससे इंकार करने की कोई बड़ी वजह नहीं दिखती। अब काले धन की रोकथाम की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं को तो भारत सरकार अकेले लागू नहीं कर सकती, इसके लिए अन्य देशों से भी सहमति बनानी होती है जिसमे कि समय लगना स्वाभाविक है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर काले धन की निगरानी के लिए व्यवस्था बनाना भारत सरकार के हाथ में है। संतोषजनक यह है कि सरकार इस दिशा में काले धन पर क़ानून बनाने से लेकर आयकर विभाग की निगरानी प्रणाली को और दुरुस्त करने जैसी प्रयास कर भी रही है, लेकिन अब जरूरत ये है कि ये प्रयास सिर्फ कागजों तक न रह जाएं वरन यथाशीघ्र उनके समुचित क्रियान्वयन की तरफ भी बढ़ा जाय।
 सामना 

  गौरतलब है कि सत्ता में आने के बाद से अबतक अगर भाजपा किसी मुद्दे पर सर्वाधिक रूप से विपक्ष के निशाने पर रही है तो वो मुद्दा काला धन ही है। चूंकि कहीं न कहीं  भाजपा ने आम चुनावों के दौरान काले धन के मुद्दे का एक हद तक राजनीतिक इस्तेमाल किया, पर इसमें बहुत चकित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि, भारतीय राजनीति में ये अक्सर होता रहा है कि चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा कहा कुछ जाता है और सत्ता में आने के बाद किया कुछ जाता है। यह भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का एक अकाट्य कु-तथ्य है। इसे गलत कह सकते हैं, पर चाहकर भी इससे मुँह नहीं मोड़ा सकते। और इसी व्यवस्था की उपज होने व इसीमे पालित-पोषित होने के कारण कोई भी दल इससे अछूता नहीं है, भाजपा भी नहीं। हालांकि इस बात के बावजूद काले धन के मसले पर अगर गौर करें  तो मौजूदा भाजपानीत राजग सरकार की कार्यशैली पिछली संप्रग सरकार से अधिक विश्वसनीय और स्पष्ट सोच वाली नज़र आती है। इसी सन्दर्भ में अगर एक संक्षिप्त दृष्टि डालें कि भाजपा द्वारा सत्ता में आने के बाद से काले धन पर क्या किया गया है तो स्पष्ट होता है कि  उसने काले धन के मसले पर चुनाव के दौरान जो वादे किए थे, उनको पूरा करने की दिशा में कई कदम भी उठाए हैं। मसलन, मोदी सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा काले धन पर विशेष जांच दल (एस आई टी) गठित करने के निर्देश पर मुहर लगाकर उसका गठन कर दिया गया था। जबकि कांग्रेसनीत संप्रग-२ सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम दौर तक सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश को मानने से बचती रही। भाजपा सरकार के ही कार्यकाल के दौरान सभी नहीं तो कुछ ही सही, विदेशी खाताधारकों के नाम भी सार्वजनिक किए गए। इसके अतिरिक्त काले धन पर ‘कालाधन (अघोषित विदेशी आय और आस्ति) कर अधिरोपण कानून-२०१५’   बनाने का काम भी इसी सरकार द्वारा किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कर संधियाँ जिनके अमल में आने के बाद अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक आवागमन में काफी हद तक पारदर्शिता आने की संभावना है, पर भी विचार-विमर्श शुरू हुआ। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि काले धन पर सरकार ने कदम तो उठाए हैं, लेकिन अभी इस दिशा में और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। 

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

कैसे मिलेगी आतंकी हमलों से मुक्ति [दैनिक सामना और नेशनल दुनिया में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत
दैनिक सामना
अभी देश इस बात पर बहस करने में ही मशगुल था कि १९९३ मुंबई धमाकों के दोषी आतंकी याकूब मेमन को फांसी दी जाय या नहीं कि पाकिस्तानी सीमा से सटे पंजाब के गुरदासपुर में आतंकियों ने एक  जोरदार हमले को अंजाम दे दिया। विगत  २७ तारीख की सुबह पांच बजे तीन आतंकी आर्मी की वर्दी में  गुरदासपुर बस टर्मिनल पहुंचे जहाँ से वे जम्मू से कटरा जा रही एक बस में चढ़ गए। यहाँ आतंकियों की फायरिंग में एक व्यक्ति के मरने की बात कही जा रही है। बस अड्डे के बाद आतंकी दीनानगर थाने पर धावा बोल दिए। यहाँ से इस हमले में पुलिसिया और फिर राष्ट्रीय सुरक्षा बल (एनएसजी) के जवानों द्वारा कार्रवाई शुरू की गई जिसमे कि पंजाब पुलिस के एक एसपी शहीद हो गए। बहरहाल लगभग १४ घंटे की मुठभेड़ के बाद एनएसजी, पंजाब पुलिस आदि के जवानों ने इस हमले से पार लिया और सभी तीन आतंकियों को मार गिराया गया। हालांकि इस हमले में पुलिस के चार जवानों समेत कुल ११ निर्दोष लोगों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। बताया जा रहा है कि देश के ख़ुफ़िया ब्यूरो (आईबी) ने पंजाब को एकदिन पहले ही ऐसे किसी आतंकी हमले के विषय में चेताया था। आईबी ने यहाँ तक जानकारी दी थी कि कुछ आतंकी सीमा पार से देश में आ गए हैं और वे थानों, स्कूलों और बसों को अपना निशाना बना सकते हैं। सवाल यह है कि आईबी की इस जानकारी के बावजूद पंजाब सरकार और पुलिस-प्रशासन द्वारा पूरी चौकसी क्यों नहीं बरती गई ? अगर पंजाब सरकार ने पंजाब में सुरक्षा व्यवस्था को थोड़ा और सख्त कर दिया होता तो संभव है कि यह हमला रोक लिया जाता या इससे होने वाली क्षति को कम किया जा सकता। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल बेशक इस हमले की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर डालने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन उनका ये आचरण सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों से भागने और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति को बढ़ावा देने जैसा है। इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार दोषी होती यदि उसने कोई प्राप्त ख़ुफ़िया सूचना राज्य सरकार से साझा न की होती, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ है। आईबी जो केंद्र सरकार के अधीन है, ने इस हमले से सम्बंधित ख़ुफ़िया जानकारी पंजाब पुलिस को दी थी, मगर फिर भी यदि राज्य में हमला हुआ तो ये राज्य सरकार की ही विफलता है। बादल साहब बड़ी आसानी से यह भी कह गए कि आतंकियों को यदि सीमा पर ही रोक दिया जाता तो ये हमला न होता। अब उन्हें कौन समझाए कि सीमा पर घुसपैठ रोकना कितना कठिन व जटिल काम है। तिसपर जब घुसपैठ करने में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान आतंकियों की मदद कर रहा हो, तो ये काम और कठिन हो जाता है। फिर भी हमारे सीमा सुरक्षा बल के जवान दिन-रात मुस्तैदी से घुसपैठ को रोकने की कोशिश में लगे रहते हैं और आतंकी घुसपैठ के अनेक प्रयासों  को नाकाम भी करते हैं। अब बार-बार के प्रयासों में से किसी बार आतंकी घुसपैठ में सफल भी हो जाते हैं तो इसके लिए सीमा सुरक्षा बल के जवानों को दोषी नहीं कहा जा सकता। आखिरश वे भी इंसान ही हैं। लिहाजा उचित तो ये होता कि पंजाब के मुख्यमंत्री महोदय इस आतंकी हमले के लिए केंद्र सरकार और जवानों आदि को दोषी ठहराने की बजाय अपनी जिम्मेदारियों और गलतियों को स्वीकारते तथा उनको दूर करने की कोशिश करते जिससे भविष्य में फिर ऐसा कोई आतंकी हमला न होता।


नेशनल दुनिया
  हालांकि अभी तक किसी भी आतंकी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, मगर अंदेशा जताया जा रहा है कि ये पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा के आतंकी थे। इन आतंकियों के विषय में सबसे अधिक अगर किसी बात ने चौंकाया है तो वो ये कि इनके पास से बरामद हथियार में से कई हथियार चीन के बने हुए हैं। यह कहीं न कहीं इसी बात को दिखाता है कि चीन भी अब भारत विरोधी गतिविधियों में पाकिस्तानी आतंकियों को भारी सहयोग देने लगा है। यह बात कही तो काफी पहले से जा रही है, मगर आतंकियों के पास से बरामद मेड इन चाइना हथियारों को देखते हुए इसको एक ठोस आधार भी मिलता है। हालांकि एक तर्क यह भी हो सकता है कि सिर्फ चीन में बने हथियारों के कारण चीन को इस हमले से जोड़ना जल्दबाजी होगी, लेकिन चीन की भारत विरोधी नीतियों के इतिहास को देखने के बाद चीन के इस हमले में संलिप्त न होने का भी तो कोई कारण नहीं दिखता। तिसपर हाल के दिनों में चीन और पाक की नज़दीकियाँ भी काफी अधिक बढ़ी हैं। सो, उपर्युक्त सभी बातों के बाद यदि सीधे शब्दों में इस पूरे मामले को समझें तो ये कुछ यूँ है कि चीन के हथियारों से लैस पाकिस्तान के तीन आतंकी घुसपैठ कर भारत में आकर लगभग दर्जन भर निर्दोष लोगों की जान लेते हैं और भारत बेबस-सा सिर्फ उन आतंकियों को मारकर अपनी सुरक्षा चिंताओं में ही उलझा रह जाता है। साथ ही देश के कुछ बयानवीर नेता बड़ी-बड़ी और करारे जवाब जैसी कुछ बातें करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। और फिर सबकुछ पहले जैसा हो जाता है। हुकूमत किसीकी भी हो, आतंकी हमलों के बाद प्रक्रिया यही घटित होती है। यह प्रक्रिया देश के लिए हर आतंकी हमले के बराबर घातक है।
   दरअसल आतंकवाद से लेकर विरोधी राष्ट्रों तक देश की नीति सदैव से रक्षात्मक ही रही है। प्रथम प्रहार न करने की इस रक्षात्मक नीति ने देश का बहुत नुकसान किया है और हमारी छवि काफी हद  तक एक कमजोर राष्ट्र की बना दी है। जरूरत यह है कि भारत अपनी इस नीति में परिवर्तन लाए और अपनी इस कोरी रक्षात्मकता  की नीति को त्याग आक्रामक रुख अपनाएं। देश इस बात के लिए इंतजार करना बंद करे कि कोई आतंकी हमला होगा तो आतंकियों को रोका जाएगा, नीति यह हो कि आतंकी किसी हमले के विषय में सोचें उससे पहले ही आधिकारिक या अनाधिकारिक जिस तरह की भी कार्रवाई से संभव हो, उन्हें ख़त्म कर दिया जाए। यह कठिन है, पर कई राष्ट्रों ने किया है। इजरायल इसका अच्छा उदाहरण है। एक जरूरत आतंकियों के कानूनी अधिकारों में बदलाव करने की भी है। संविधान संशोधन के जरिये आतंकियों के लिए अलग से कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया बननी चाहिए जिसके तहत आतंकियों के पास सजा माफ़ी की अपील करने, मनमाफिक वकील रखने जैसे अधिकार न रह जाएं। एक विशेष अदालत हो जो कि आतंकियों को जो सजा दे दे, वो अंतिम हो। चूंकि उक्त कानूनी अधिकार मानवीय आधार पर दिए जाते हैं, लेकिन आतंकियों के कृत्य कतई मानवों वाले नहीं हैं अतः उन्हें ये अधिकार देने का कोई औचित्य नहीं है। अगर भारत की हुकूमतें इन चीजों को लागू करें तो आतंकियों में इतनी हिम्मत नहीं रह जाएगी कि वे हमारी तरफ आँख उठाकर देख सकें।