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मंगलवार, 26 सितंबर 2017

तीसरे विश्व युद्ध की आहट [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
आतंकवाद के उन्मूलन के लिए संयुक्त प्रयास पर सहमति बना रहे विश्व के समक्ष इस समय उत्तर कोरिया एक महासंकट के रूप में उपस्थित हो चुका है। संयुक्त राष्ट्र संघ समेत विश्व के लगभग सभी महाशक्ति देशों के प्रतिबंधों और चेतावनियों को अनदेखा करते हुए तानाशाह किम जोंग के नेतृत्व में यह पिद्दी-सा देश विश्व के लिए भारी सिर दर्द बनता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को धता बताते हुए एक के बाद एक घातक प्रक्षेपास्त्रों का परीक्षण करने से लेकर अमेरिका जैसे देश को खुलेआम चुनौती देने तक उत्तर कोरिया का रवैया पूरी तरह से उकसावे वाला रहा है। अभी हाल ही में उसने जापान के होकैडो शहर के ऊपर से मिसाइल ही दाग दी थी, जिसके बाद जापान ने अपने इस शहर समेत अपनी राजधानी क्षेत्र में मिसाइल रक्षा प्रणाली की तैनाती कर ली है। 

उत्तर कोरिया का क्या करना है, इसका कोई ठोस उत्तर फिलहाल विश्व के किसी भी महाशक्ति देश के पास नहीं है। अबतक उत्तर कोरिया की इन अराजक गतिविधियों के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र और विश्व के महाशक्ति देशों की तरफ से सिवाय जुबानी जमाखर्च के धरातल पर कोई कार्यवाही नहीं की जा सकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कह तो बहुत कुछ रहे हैं, मगर मालूम उन्हें भी होगा कि किम जोंग का खात्मा इतना आसान नहीं है। कहा यह भी जा रहा कि अमेरिका ने लादेन को जैसे पाकिस्तान में घुसकर मार गिराया था, वैसे ही किम को भी मार सकता है। लेकिन, हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन दोनों ही मामलों में भारी अंतर है। लादेन एक आतंकी था, जिसके पास सिवाय कुछ लड़ाकों और पाकिस्तानी हुकूमत के अप्रत्यक्ष सहयोग के कुछ नहीं था। जबकि किम जोंग एक देश का सनकी राष्ट्राध्यक्ष है, जिसके साथ न केवल लादेन से कहीं अधिक सुरक्षा तंत्र होगा बल्कि उसके नियंत्रण में परमाणु हथियारों का जखीरा भी है। ऐसे में, क्या उसको लादेन की तरह मार गिराने की कल्पना की जा सकती है ? यकीनन नहीं! यह बात अमेरिका भी बाखूबी समझता है, तभी तो अबतक उसने कोई भी कार्यवाही करने से परहेज किया है। स्पष्ट है कि किम जोंग के तानाशाही नेतृत्व में उत्तर कोरिया विश्व के लिए एक घातक यक्ष-प्रश्न बन गया है। घातक यक्ष-प्रश्न इसलिए क्योंकि अगर जल्द से जल्द इसका उचित उत्तर नहीं खोजा गया तो पूरी संभावना है कि ये दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की तरफ ले जाएगा।

तीसरे विश्व युद्ध की संभावना क्यों ?
तीसरे विश्व युद्ध की बात करने के पीछे ठोस कारण हैं, जिन्हें समझने के लिए आवश्यक होगा कि हम पिछले दोनों विश्व युद्धों के इतिहास और उनकी पृष्ठभूमि का एक संक्षिप्त अवलोकन करें। विश्व युद्धों के इतिहास पर दृष्टि डालें तो दोनों ही विश्व युद्धों की परिस्थितियाँ तो पहले से ही ज्वालामुखी की तरह निर्मित हो रही थीं, जिनका किसी छोटी सी तत्कालीन घटना को कारण बनाकर दोनों विश्व युद्ध के रूप में महाविस्फोट हुआ। आस्ट्रिया के राजकुमार और उनकी पत्नी की सेराजोवा में हुई हत्या प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण बनी। इस विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि के अध्ययन पर स्पष्ट होता है कि तत्कालीन दौर में योरोपीय देशों के बीच उपनिवेशों की स्थापना की होड़ के कारण परस्पर ईर्ष्या और द्वेष का भाव बुरी तरह से भर चुका था। हितों के टकराव जैसी स्थिति जन्म ले चुकी थी। गुप्त संधियाँ आकार लेने लगी थीं। परिणाम विश्व युद्ध के रूप में सामने आया।  


1918 में प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् विश्व बिरादरी ने एक तरफ जहां आगे से विश्व युद्ध जैसी परिस्थितियों को रोकने के लिए राष्ट्र संघ (लीग ऑफ़ नेशंस) की स्थापना की, वहीं दूसरी तरफ ‘वर्साय की संधि’ के तहत जर्मनी पर लगाए गए अनुचित और अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों के माध्यम से अनजाने में ही द्वितीय विश्व युद्ध की भूमिका का निर्माण भी कर दिया। फलस्वरूप 1935 में जर्मनी जब हिटलर के नेतृत्व में ताकतवर होकर उभरा तो उसने वर्साय की संधि और प्रतिबंधों का उल्लंघन आरम्भ कर दिया। 1939 में जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया और बस यहीं से द्वितीय विश्व युद्ध का आरम्भ हो गया। ये विश्व युद्ध भयानक रूप से संहारक रहा। इसका अंत होते-होते अमेरिका ने जापान पर परमाणु हमले तक कर दिए। राष्ट्र संघ जिसकी स्थापना विश्व युद्ध जैसी परिस्थितियों को रोकने के लिए की गयी थी, अप्रासंगिक होकर रहा गया।

इन दोनों विश्व युद्धों में जो एक बात समान है, वो ये कि इनके लिए वैश्विक वातावरण तो पहले से बना हुआ था, मगर इनकी शुरुआत किसी एक छोटे-से तात्कालिक कारण से हुई। फिर चाहें वो प्रथम विश्व युद्ध के समय आस्ट्रिया के राजकुमार की हत्या हो या द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी का पोलैंड पर आक्रमण करना हो।

आज भी वैश्विक वातावरण में तनाव साफ़ है, ऐसे में उत्तर कोरिया का रवैया इस नाते डराता है कि उसकी या उसके साथ की गयी किसी अन्य की कोई सी भी हरकत तीसरे विश्व युद्ध का कारण बन सकती है। यह बात सर्वस्वीकृत है कि उत्तर कोरिया को चीन का अंदरूनी समर्थन और सहयोग है, जिसके दम पर वो हथियारों आदि के मामले में बेहद सशक्त हो चुका है। साथ ही, चीन का जापान और अमेरिका से मुखर विरोध है। ऐसे में, उत्तर कोरिया पर हाथ डालने की स्थिति में उसके साथ-साथ चीन भी दिक्कतें खड़ी कर सकता है। पाकिस्तान का समर्थन भी चीन के ही साथ होगा। अमेरिका और योरोपीय देश एक साथ आ सकते हैं। इसके बाद तीसरे विश्व युद्ध के लिए और आवश्यकता ही किस चीज की रह जाएगी। संयुक्त राष्ट्र संघ आज उत्तर कोरिया के संदर्भ में निष्प्रभावी ही सिद्ध हो रहा है।

इन संभावित परिस्थितियों को देखते हुए तीसरे विश्व युद्ध की आहट न महसूस करने का कोई कारण नहीं दिखता। एक मार्ग यह है कि उत्तर कोरिया पर हाथ न डाला जाए, लेकिन किम जोंग का सनकीपना और आक्रामकता देखते हुए ऐसा करने का भी कोई लाभ नहीं है। क्योंकि, उत्तर कोरिया खुद ही किसी न किसी से उलझकर विश्व युद्ध की परिस्थितियों को आमंत्रित कर देगा। ये विश्व युद्ध हुआ तो पिछले दोनों विश्व युद्धों से कहीं अधिक विनाशकारी और भयावह होगा। द्वितीय विश्व युद्ध में दो परमाणु बम गिरे थे, जिनके चिन्ह जापान के हिरोशिमा और नागाशाकी में अबतक मौजूद हैं। अब तो हर छोटे-बड़े देश के पास परमाणु क्षमता है, सो विश्व युद्ध में क्या विभीषिका मच सकती है, इसकी कल्पना ही डराने वाली है। अगर तीसरे विश्व युद्ध की इस आशंका पर विराम लगाना है तो उत्तर कोरिया का समाधान शीघ्रातिशीघ्र विश्व के महाशक्ति राष्ट्रों को संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर खोजना पड़ेगा।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

तीसरे विश्व युद्ध की आहट [दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण और दबंग दुनिया में प्रकाशित]


  • पीयूष द्विवेदी भारत 
दैनिक जागरण 
विगत दिनों तुर्की द्वारा एक रूसी विमान को कथित तौर पर अपने हवाई क्षेत्र में घुसने के कारण मार गिराया गया जिस पर रूस की तरफ से भारी नाराजगी व्यक्त करते हुए तुर्की को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी गई। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन का यह बयान आया कि तुर्की की यह हरकत पीठ छूरा घोंपने जैसी यानी धोखेबाजी भरी है। लेकिन रूस के इतने कठोर रुख के बावजूद तुर्की की तरफ से कोई माफ़ी या खेद नहीं व्यक्त किया गया वरन तुर्की ने इस घटना के लिए रूसी विमान को ही दोषी ठहराया। तुर्की के प्रधानमंत्री ने कहा है कि जो हमारी सीमा में घुसपैठ करेगा उसे मारने का हमें पूरा हा है। तुर्की और मास्कों के बीच सैन्य टकराव का खतरा बढ़ता जा रहा है। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार, रूस के राष्ट्रपति व्लदिमीर पुतिन ने सीरिया में रूसी वायु ठिकानों पर अत्याधुनिक वायु रक्षा मिसाइल प्रणालियों को तैनात करने के आदेश दे दिए हैं।

प्रश्न यह है कि आखिर तुर्की जैसा रूस की तुलना में अपेक्षाकृत बेहद कमजोर देश आखिर इतनी हिम्मत कहाँ से पा गया कि उसने पहले रूसी विमान को मार गिराया और फिर माफ़ी मांगने की बजाय बेहद स्वाभिमानी रुख भी अख्तियार किए हुए है। इस प्रश्न पर विचार करें तो समझ आता है कि   तुर्की के इस दुस्साहसी आचरण का स्रोत कहीं न कहीं नाटो है, अन्यथा तुर्की अकेले के दम पर रूस के विरुद्ध इतनी हिम्मत कत्तई नहीं दिखा सकता  था। ज्ञात हो कि तुर्की नाटो (नार्थ अटलांटिक ट्रिटी आर्गेनाइजेशन) का एक सदस्य देश है। नाटो के विषय में उल्लेखनीय होगा कि नाटो मुख्यतः योरोप और उत्तरी अमेरिका के अट्ठाईस देशों का एक सैन्य गठबंधन है और इसकी बड़ी विशेषता यह है कि नाटो के किसी भी सदस्य देश के खिलाफ अगर कोई जंग छेड़ता है तो वो नाटो के विरुद्ध जंग मानी जाती है। अब तुर्की नाटो का एक सदस्य देश है जबकि रूस नहीं; अतः अगर रूस तुर्की के विरुद्ध खड़ा होता है तो उसके समक्ष अकेले तुर्की नहीं बल्कि नाटो की सेना होगी। इस बात का संकेत इससे भी मिलता है कि रूस द्वारा तुर्की को चेतावनी देने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तुर्की के बचाव में उतरते हुए कहा कि तुर्की को अपनी सीमा की सुरक्षा का अधिकार है और रूस उसके मामलों में हस्तक्षेप से बचकर आतंक के विरुद्ध संघर्ष में अपना ध्यान केन्द्रित करे।
दबंग दुनिया 
स्पष्ट है कि तुर्की के साथ पूरी नाटो सेना है और अमेरिका जो रूस का धुर विरोधी है, तो उसके साथ पूरी तरह से खुलकर है। हालांकि रूस का पाला भी कमजोर रहने वाला नहीं है। पूरी आशा है कि नाटो से बाहर के जापान, जर्मनी, चीन आदि शक्तिशाली देश  रूस के पाले में रह सकते हैं। इस तरह स्पष्ट है कि अगर रूस और तुर्की का टकराव थमता नहीं है तो आगे चलकर उपर्युक्त प्रकार से दुनिया के दो विरोधी खेमों में बंटने का संकट पैदा हो सकता है। इस स्थिति को देखते हुए तीसरे विश्व युद्ध की दुराशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। यहाँ विश्व युद्ध की संभावना व्यक्त करने का मुख्य कारण यह है कि प्रथम विश्व युद्ध हुआ, उसके  भड़कने के लिए किसी बड़े कारण की आवश्यकता नहीं पड़ी थी। प्रथम विश्वयुद्ध के समय दुनिया के देशों में एकदूसरे के लिए तरह-तरह से आक्रोश, इर्ष्या और अपने विस्तार का भाव भरा था जो कि किसी न किसी छोटी-सी तात्कालिक घटना के कारण भड़का  और फिर विश्वयुद्ध की शक्ल ले लिया। इसके लिए तत्कालीन कारण आस्ट्रिया के राजकुमार और उनकी पत्नी की हत्या रही जिसके बाद आस्ट्रिया ने सर्बिया के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया। तत्पश्चात दुनिया के अन्य देश भी इन दो देशों की तरफ से खेमे में बंट गए और दो देशों के बीच की एक समस्या विश्व युद्ध की त्रासदी ले आई। हालांकि एक तथ्य यह भी है कि आज के समय में दुनिया में संयुक्त राष्ट्र के रूप में एक नियंत्रण संस्था है जिससे विश्वयुद्ध जैसी स्थिति का पैदा होना अब काफी कठिन है। कुल मिलाकर अच्छा होगा कि रूस और तुर्की इस सम्बन्ध में मिल-बठकर बातचीत के जरिये इस मसाले को सुलझाएं। तुर्की को इस सम्बन्ध में पहल करनी चाहिए और दुनिया के अमेरिका जैसे देशों को अपने रूस विरोध के स्वार्थ को त्याग कर इस सम्बन्ध में तुर्की को और भड़काने की बजाय रूस से शांतिपूर्ण ढंग से मामला सुलझाने के लिए प्रयास करना चाहिए। क्योंकि इस मामले का अधिक आगे बढ़ना आतंक के विरुद्ध वैश्विक युद्ध को तो कमजोर करेगा ही, वैश्विक शांति के लिए संकटकारी भी  होगा।