शनिवार, 20 जून 2020

संकट काल में सिनेमाई नवाचार (दैनिक जागरण में प्रकाशित)

  • पीयूष द्विवेदी भारत

कोरोना महामारी ने जनजीवन के सभी क्षेत्रों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। भारतीय मनोरंजन उद्योग भी इस संकट की गिरफ्त में है। मार्च के अंतिम सप्ताह से ही फिल्मों-धारावाहिकों की बंद पड़ी शूटिंग को अभी हाल ही में चालू करने की अनुमति तो प्राप्त हुई है, लेकिन इस अनुमति के साथ ऐसे अनेक दिशानिर्देश हैं, जिनका पालन करते हुए शूटिंग करना निर्माता-निर्देशकों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। पिछले दिनों यह भी खबर आई थी कि पृथ्वीराज और मैदान जैसी बड़ी फिल्मों के लिए जो भारी-भरकम सेट बने थे, उन्हें भी देखरेख के अधिक खर्च के कारण हटाया जा रहा है। यह एक अलग नुकसान है।
दूसरी तरफ सिनेमाघर भी मार्च अंत से ही बंद हैं। इस कारण जो फ़िल्में बनकर तैयार हो चुकी हैं, उनके प्रसारण पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। ट्रेड विश्लेषकों की मानें तो कोरोना के कारण उपजी इन परिस्थितियों से बॉलीवुड को तकरीबन 1300 करोड़ से 2500 करोड़ तक का नुकसान होने की संभावना है।

यह जानना भी दिलचस्प होगा कि हाल के वर्षों में अप्रैल से जून की तिमाही बॉलीवुड के लिए प्रायः काफी फायदेमंद रही है। बीते साल इन महीनों के दौरान बॉलीवुड में दो दर्जन से अधिक छोटी-बड़ी फिल्मों का प्रसारण हुआ, जिनमें दे दे प्यार दे, भारत और कबीर सिंह ने अच्छी कमाई के साथ सफलता प्राप्त की। इसी तरह 2018 में भी इस तिमाही में बॉलीवुड ने राज़ी, 102 नॉट आउट, वीरे दी वेडिंग, संजू जैसी सफल फिल्मों के जरिये खूब पैसे बनाए थे।
इस तरह 2020 से बॉलीवुड को कुछ अधिक ही उम्मीदें थीं, क्योंकि इस साल की दूसरी तिमाही को कई बड़ी फिल्मों का गवाह बनना था। 24 मार्च को प्रसारण के लिए तैयार सूर्यवंशी सहित अप्रैल-जून की तिमाही में 83, लक्ष्मी बॉम्ब, राधे जैसी बड़ी फ़िल्में आनी थीं, जिनसे बॉक्स ऑफिस पर पैसा बरसना लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन कोरोना से उपजी परिस्थितियों ने फिल्म जगत की इन उम्मीदों पर तुषारापात कर दिया।
समस्या ये भी है कि यदि कुछ समय में देश में सिनेमाघर खुल भी जाएं तो फिलहाल शारीरिक दूरी के नियम के कारण दर्शकों की संख्या आधी रखनी पड़ सकती है। दूसरी चीज कि भारतीय फ़िल्में दुनिया के अन्य देशों में होने वाले प्रसारण से भी काफी कमाई करती हैं। कई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि कोई फिल्म भारत में नहीं चलती लेकिन विदेशों में झंडा गाड़ देती है। आमिर खान की सीक्रेट सुपरस्टार इसका सशक्त उदाहरण है। ऐसे में भारतीय फिल्मों के बेहतर कारोबार के लिए देश के साथ-साथ विदेशी सिनेमाघरों का खुलना भी जरूरी है।
बहरहाल, बंद सिनेमाघरों के कारण फिल्मों के प्रसारण को लेकर व्याप्त अनिश्चितता को देखते हुए कुछ फिल्मकार अब ओटीटी पर अपनी फिल्मे लाकर खेल की एक नयी जमीन तैयार करने में लगे हैं। अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की ‘गुलाबो सिताबो’ ओटीटी पर प्रसारित हो चुकी है, तो वहीं विद्या बालन की ‘शाकुंतला देवी’ और धर्मा प्रोडक्शन की जान्हवी कपूर अभिनीत ‘गुंजन सक्सेना’ भी अलग-अलग ओटीटी माध्यमों पर आने वाली हैं। ये तीनों ही फ़िल्में अप्रैल और मई में सिनेमाघरों में प्रसारित होनी थीं, लेकिन कोरोना के कारण अब इन्हें ओटीटी पर लाया जा रहा है। हिंदी फिल्मों के अलावा 29 मई को तमिल फिल्म 'पोनमगल वंधल' ऑनलाइन प्रसारित हो चुकी है तथा लॉ, पेंगुइन, फ्रेंच बिरयानी आदि अन्य भारतीय भाषाओं की कई और फ़िल्में भी ओटीटी पर आने को तैयार हैं।
इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय सिनेमा ओटीटी प्रसारण के रूप में एक साहसिक नवाचार की तरफ बढ़ चला है, लेकिन इसे लेकर कुछ प्रश्न भी उठ रहे हैं कि इस नवाचार का भविष्य क्या है? क्या ओटीटी माध्यमों पर फ़िल्में आने से सिनेमाघरों को दूरगामी नुकसान हो सकता है? क्या फिल्मों के प्रसारण के स्वरूप पर भी इसका कोई व्यापक व दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है?
इस संदर्भ में गत वर्ष आई काउंटरपॉइंट रिसर्च इंडिया की एक रिपोर्ट उल्लेखनीय होगी जिसके मुताबिक़, भारत के कुल ओटीटी उपभोक्ताओं में से 89 प्रतिशत उपभोक्ता 35 साल से कम के युवा हैं। इनमें से 55 प्रतिशत उपभोक्ता देश के पांच प्रमुख महानगरों में हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि ओटीटी माध्यम अपनी तमाम लोकप्रियता के बावजूद अभी भारत की शहरी युवा आबादी तक सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ऑनलाइन मनोरंजन के लिए लोग अभी भी प्रायः मुफ्त माध्यम यूट्यूब पर ही निर्भर हैं। साथ ही, फिल्मों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भी युवा सिनेमाघर का रुख करने में पीछे नहीं रहते। ऐसे में, कहना गलत नहीं होगा कि ओटीटी से सिनेमाघर को कोई बड़ा नुकसान पहुँचना तो दूर की बात है, फिलहाल दोनों के बीच कोई मुकाबला भी होने की बात भी नहीं कही जा सकती।
सब बातों के बाद एक पक्ष यह भी है कि बड़े परदे पर भीड़ के बीच बैठकर नायक-नायिका की अदाओं पर उछलते और सीटी बजाते हुए फिल्म देखने के अभ्यस्त बहुसंख्यक भारतीय दर्शक ओटीटी माध्यमों के टीवी-लैपटॉप-मोबाइल जैसे छोटे परदों पर फिल्म देखने में शायद ही पूर्ववत रुचि ले पाएं। सो बहुत-से दर्शक तो इस मनोविज्ञान के कारण भी ओटीटी पर खर्च कर तुरंत फिल्म नहीं देखेंगे।
हालांकि कयास लगाए जा रहे कि लक्ष्मी बॉम्ब, भुज द प्राइड ऑफ़ इंडिया जैसी कुछ बड़ी फ़िल्में भी ओटीटी पर आ सकती हैं। यदि ऐसा होता है, तो भी ये केवल बड़ी फिल्मों के लिए विवशता का एक अस्थायी विकल्प ही होगा, फिल्म प्रसारण की व्यवस्था पर इसका कोई दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की उम्मीद नहीं है। समग्रतः छोटी फिल्मों के लिए ओटीटी दीर्घकालिक महत्व का माध्यम सिद्ध हो सकता है, लेकिन बड़ी फिल्मों के लिए फिलहाल इसमें अधिक संभावना देखना और इसे सिनेमाघर के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने लगना जल्दबाजी होगी।

शुक्रवार, 29 मई 2020

ऑनलाइन परीक्षा की कठिनाई (दैनिक जागरण में प्रकाशित)


  • पीयूष द्विवेदी भारत

कोविड-19 वैश्विक महामारी के प्रकोप ने जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। शिक्षा भी इससे अछूती नहीं है। कोविड के दौर में शिक्षा के क्षेत्र में एक तरफ जहां विविध चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं, वहीं उन चुनौतियों से निपटने के लिए विभिन्न प्रयोग भी हो रहे हैं। प्राथमिक व माध्यमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक शिक्षण संस्थानों द्वारा ऑनलाइन पढ़ाई करवाई जा रही है।
शहर तो शहर, गांवों में भी यह ऑनलाइन शिक्षण की यह व्यवस्था कमोबेश देखने-सुनने में आने लगी है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से लेकर संचार व संपर्क के अन्य माध्यमों तक से अध्यापक घर बैठे छात्रों को पढ़ाने में लगे हैं। इन शैक्षिक नवाचारों के बीच ही पिछले दिनों देश के प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा गत 14 मई को एक अधिसूचना जारी की गयी जिसका सार यह था कि कोविड-19 द्वारा पैदा परिस्थितियों के कारण स्नातक और परास्नातक कर रहे अंतिम वर्ष या सेमेस्टर के छात्रों के लिए विश्वविद्यालय ओपन बुक मोड में परीक्षा करवाने जा रहा है। 

इस तरीके से परीक्षा में यह होगा कि छात्रों को तय प्रारूप के अंतर्गत प्रश्न भेजे जाएंगे जिन्हें उनको एक निर्धारित समय के भीतर लिखकर ऑनलाइन भेजना होगा। इस विषय में डीयू के डीन एग्जामिनेशन की तरफ से जारी जानकारी के मुताबिक, प्रत्येक प्रश्न पत्र के लिए दो घंटे का समय निर्धारित किया जाएगा, कुल छह प्रश्न होंगे, जिसमें से विद्यार्थियों को चार प्रश्न हल करने होंगे और एक घंटे के अंदर उसे वापस भेज देना होगा। विश्वविद्यालय प्रशासन की इस घोषणा के बाद से ही डीयू के छात्र संघ तथा दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ एकसाथ इसके विरोध में खड़े हैं। इस घोषणा के बाद ट्विटर पर ‘डीयूअगेंस्टऑनलाइनएग्जाम’ हैश टैग के साथ हजारों की तादाद में विद्यार्थियों ने ट्विट कर इस निर्णय के प्रति अपना विरोध व्यक्त किया है। 
प्रश्न यह है कि आखिर विश्वविद्यालय के इस निर्णय का इतना विरोध क्यों हो रहा है? गौर करें तो इस विरोध के पीछे कारणों की लम्बी फेहरिश्त नजर आती है। दरअसल दिल्ली विश्वविद्यालय जिस प्रकार की परीक्षा लेने की तैयारी कर रहा, उसके लिए छात्रों के पास कम्यूटर-लैपटॉप या स्मार्टफोन के साथ-साथ अच्छे इंटरनेट की उपलब्धता भी जरूरी है। ऐसे में जिन छात्रों के पास ये तकनीकी संसाधन नहीं होंगे, वे कैसे इस परीक्षा में भाग ले पाएंगे? वो कौन-सा तंत्र है जिसने यह सुनिश्चित कर लिया कि छात्रों के पास लैपटॉप-स्मार्टफोन जैसे संसाधन तथा बढ़िया इंटरनेट भी उपलब्ध होगा? क्या डीयू प्रशासन की तरफ से कभी अपने सभी छात्रों को यह संसाधन उपलब्ध कराए गए थे? जवाब है, नहीं. जब ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो अब इस संकटकाल में अचानक विश्वविद्यालय प्रशासन किस आधार पर छात्रों से ऑनलाइन परीक्षा देने की अपेक्षा कर रहा है? इतना ही नहीं, ऑनलाइन परीक्षा का जो प्रारूप विश्वविद्यालय ने तय किया है, उसमें न्याय की भावना भी कम ही दिखती है। क्या यह संभव नहीं कि कोई कम पढ़ा छात्र इस ओपन बुक परीक्षा में किताब की सहायता से बेहतर कर जाए जबकि कोई खूब पढ़ा छात्र तकनीकी संसाधनों के अभाव में परीक्षा दे ही न पाए। जाहिर है, ऑनलाइन परीक्षा का यह प्रारूप फिलहाल किसी भी ढंग से उचित व व्यावहारिक नहीं प्रतीत होता।
वैसे भी, सवाल ये है कि जब देश के कई बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों ने अपनी परीक्षा आदि गतिविधियाँ आगे बढ़ा दी हैं; यहाँ तक कि यूजीसी और संघ लोकसेवा आयोग ने अपनी परीक्षाओं का समय भी आगे कर दिया है, फिर  दिल्ली विश्वविद्यालय को परीक्षाएं कराने की इतनी हड़बड़ी क्यों है? कहीं ऐसा तो नहीं कि केवल अपने सत्र को नियमित और अबाध रखने की मंशा के मोह में डीयू प्रशासन ने तमाम छात्रों के लिए परेशानी पैदा करने वाला यह अविवेकपूर्ण निर्णय ले लिया है।
यह सही है कि हाल के वर्षों में भारत में तकनीकी उपकरणों का प्रयोग बढ़ा है और स्मार्टफोन भी लोगों के हाथ में दिखने लगे हैं, लेकिन बावजूद इसके आंकड़ों की मानें तो 135 करोड़ की आबादी वाले इस देश में स्मार्टफोन चलाने वालो की संख्या मात्र 40 करोड़ है। पूरी संभावना है कि कम्प्यूटर और लैपटॉप जैसे संसाधन जो सामान्यतः स्मार्टफोन से महंगे होते हैं, का उपयोग करने वालों की संख्या इससे कम ही होगी। इसी तरह इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या भी फिलहाल लगभग 55 करोड़ के आसपास है। इन आंकड़ों का सार यही है कि देश की आबादी के अनुपात में उक्त तकनीकी संसाधनों से संपन्न लोग आधे भी नहीं हैं, ऐसी स्थिति में फिलहाल देश में ऑनलाइन परीक्षा जैसी चीज पर बिना पुख्ता तैयारी के सोचा भी नहीं जा सकता।
अगर कोई शिक्षण संस्थान इस दिशा में बढ़ना चाहता है तो पहले उसे इसके लिए छात्रों को तैयार करना होगा तभी उसके द्वारा किया गया ऐसा कोई प्रयास तर्कसंगत सिद्ध होगा अन्यथा इससे केवल छात्रों की मुश्किलें ही बढ़ेंगी। अतः उचित होगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय फिलहाल ऑनलाइन परीक्षा आयोजित कर छात्रों की मुश्किलें न बढ़ाए बल्कि सत्र की तारीख आगे बढ़ाकर चीजें ठीक होने की थोड़ी और प्रतीक्षा करे। इसके अलावा यदि विश्वविद्यालय चाहे तो भविष्य में ऑनलाइन परीक्षा कराने के लिए एक बेहतर व्यवस्था, जिसमें छात्रों का हित सुरक्षित रहे, विकसित करने की दिशा में भी काम कर सकता है।  

शनिवार, 16 मई 2020

संकट में संबल बनी रामायण [दैनिक जागरण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

24 मार्च को देशव्यापी लॉक डाउन की घोषणा होने के बाद 28 मार्च से दूरदर्शन पर नब्बे के दशक के लोकप्रिय धारावाहिक रामायण का पुनर्प्रसारण शुरू हुआ। 18 अप्रैल को इसका अंतिम भाग प्रसारित होने के बाद उत्तर रामायण के रूप में आगे की कथा शुरू हुई जिसका समापन दो मई को हो चुका है। 28 मार्च से 2 मई के बीच की इस कालावधि में मनोरंजन कार्यक्रमों की श्रेणी में रामायण ने दर्शकों की संख्या के सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। दूरदर्शन का दावा है कि न केवल भारत अपितु विश्व का यह सर्वाधिक देखा जाना मनोरंजन कार्यक्रम बन गया है। हालांकि एक दावा यह भी सामने आ रहा कि 1983 के एक अमेरिकी वॉर शो का अंतिम भाग अब भी सबसे ज्यादा देखा जाने वाला कार्यक्रम है। यदि इस दावे में सत्यता है तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बीते लगभग तीन दशक में रामायण विश्व का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला कार्यक्रम बन चुका है।

इस कीर्तिमान से अलग सोशल मीडिया पर भी हर दिन रामायण के प्रसारण के समय व उसके पश्चात् भी उस दिन की कहानी चर्चा में बनी रही। ये तथ्य लोकमानस में रामकथा के प्रति उपस्थित श्रद्धा और विश्वास को ही प्रकट करते हैं। परन्तु इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि देश-दुनिया में इस स्तर पर लोकप्रिय हो रही रामायण के प्रसारण को लेकर देश के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी व्याकुल हो उठे। एक पत्रकार महोदय यह पूछते दिखे कि किन लोगों की मांग पर यह प्रसारण शुरू किया गया है, तो एक वरिष्ठ पत्रकार महोदया लोगों के घर में खाना न होने की बात कहते हुए इसके प्रसारण पर बेमतलब ही सवाल उठाती नजर आईं। एक वकील महोदय ने तो इसकी तुलना अफीम से ही कर डाली।
सवाल है कि आखिर देश के ये बुद्धिजीवी लोग भारतीय संस्कृति का प्राण मानी जाने वाली रामकथा के प्रति इतनी घृणा क्यों रखते हैं? देश में कोई गरीब भूखा न रहे, यह सुनिश्चित करना निःसंदेह सरकार की जिम्मेदारी है और इसके लिए वो नीतिगत स्तर पर लगातार काम कर रही है, परन्तु इसके आधार पर रामायण जैसे कार्यक्रम के प्रसारण को प्रश्नांकित करने का क्या अर्थ है? क्या रामायण का प्रसारण न होने से गरीबों के घर में खाना पहुँच जाता? वस्तुतः प्रतीत होता है कि हमारे ये बुद्धिजीवी ‘विरोध के लिए विरोध’ के अपने एजेंडे पर चलते हुए बौद्धिक दिवालियेपन की उस अवस्था में पहुँच गए हैं जहां उन्हें उचित-अनुचित का भेद तक समझ नहीं आ रहा। यदि ऐसा न होता तो वे आज के इस संकटपूर्ण और अत्यंत कठिन समय में भारतीय समाज के लिए मानसिक संबल का साधन सिद्ध होने वाले रामायण पर इस तरह के अनर्गल प्रश्न नहीं उठाते।
इसी संदर्भ में विचारणीय है कि आखिर वो क्या कारण है कि जो रामायण आज से तक़रीबन तीन दशक पूर्व बनी थी और वर्तमान समय की तुलना में तकनीकी भव्यता की दृष्टि से काफी पीछे है तथा अनेक बार लोगों द्वारा देखी भी जा चुकी है, उसका जब पुनर्प्रसारण होता है तो दर्शकों की संख्या का कीर्तिमान बना देती है और उसके सामने आज के बड़े-बड़े उत्कृष्ट तकनीकी साज-सज्जा वाले कार्यक्रम पीछे छूट जाते है।
देखा जाए तो आज जो संघर्ष हमारे समक्ष उपस्थित है, उसमें तन के साथ-साथ मन की मजबूती होना भी आवश्यक है। मन की मजबूती से मुख्य तात्पर्य धैर्य और सकारात्मकता को लेकर है। यह लड़ाई कितनी लम्बी चलेगी और कैसी-कैसी चुनौतियाँ सामने आएंगीं, इसका अभी किसीको स्पष्ट ज्ञान नहीं है, ऐसे में यही उपाय बचता है कि मन में सकारात्मकता और धैर्य धारण करके संघर्ष जारी रखा जाए। इस पृष्ठभूमि में रामायण इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि ये भारतीय संस्कृति का वो ऐतिहासिक आख्यान है जिसकी कथा हमें जीवन की किसी भी सम-विषम परिस्थिति में बिना घबड़ाए उससे जूझने का सन्देश देती है।  
इस कथा के नायक राम, जो आज भारत और उससे बाहर भी असंख्य जनों के लिए पूज्य हैं, अपने पूरे जीवन में कठिन से कठिनतर संघर्षों से दो-चार होते रहे, परन्तु कभी भी उन्होंने धैर्य और सकारात्मकता का पूरी तरह से त्याग नहीं किया और हताश होकर नहीं बैठे बल्कि अवसाद उत्पन्न करने वाली हर परिस्थिति को अवसर में परिणत कर वे आगे बढ़ते गए और मानव जीवन का एक आदर्श प्रस्तुत किया। केवल राम ही नहीं, रामकथा के अन्य बहुत से पात्र भी इसी सकारात्मकता का सन्देश देते हैं। रामकथा ही नहीं, शिव-कृष्ण जैसे हमारे और भी कई ऐतिहासिक पात्रों का जीवन-चरित्र भी इसी संदेश का प्रसारक है। यही कारण है कि दूरदर्शन पर धार्मिक कार्यक्रमों के साथ-साथ अन्य चैनलों पर कृष्ण, शिव, हनुमान आदि की कथाओं का प्रसारण भी इस संकट के समय लगातार चल रहा है और अच्छी संख्या में लोगों द्वारा देखा भी जा रहा है।   
वस्तुतः भारतीय संस्कृति अपने मूल रूप में ही सकारात्मकता की पोषक रही है और संकटकाल में उसकी सकारात्मक ऊर्जा और प्रखर हो उठती है। यही कारण है कि हिंदी साहित्य के मध्यकाल में विदेशी आक्रांताओं से त्रस्त भारतीय समाज में वो भक्ति आंदोलन फूटता है जो हिंदी साहित्य के स्वर्णयुग का निर्माण कर जाता है।
अपने दैनिक जीवन में ‘सर्वे भवंतु सुखिना, सर्वे संतु निरामया’ के रूप में विश्व कल्याण की कामना का भाव भारतीय संस्कृति की सकारात्मक और मंगलकामी दृष्टि का ही द्योतक है। यही कारण है कि आज के इस कठिन समय में जब लोगों के हताशा और अवसाद में जाने का खतरा लगातार बना हुआ है, ऐसे में भारतीय संस्कृति की रामायण-महाभारत जैसी महान कथाओं का प्रसारण उन्हें संबल दे रहा है। हो न हों, यही वो तत्व हैं जो हमारी संस्कृति को काल की सीमा से परे सनातन बनाते हैं।

रविवार, 26 अप्रैल 2020

पुस्तक समीक्षा : मानवीय जीवटता की महागाथा [दैनिक जागरण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

पुस्तक – मग्नमाटी (उपन्यास)
रचनाकार – प्रतिभा राय
प्रकाशक – राजपाल एंड सन्ज
मूल्य – 625 रुपये
वरिष्ठ लेखिका प्रतिभा राय का उपन्यास मग्नमाटी मूलतः ओड़िया में है, लेकिन इसका हिंदी रूपांतर इसी साल राजपाल प्रकाशन से आया है। यह उपन्यास 1999 में आए ओडिशा के चक्रवाती तूफ़ान पर आधारित है। बेशक तूफ़ान उपन्यास की कथा का केंद्र है, लेकिन कहानी में उसका प्रवेश लगभग आधा हिस्सा बीतने के बाद होता है। उससे पूर्व बड़े विस्तार से तटवर्ती इलाकों में रहने वाले ओडिया समाज की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थतियों सहित उनके समाज में उपस्थित संघर्षों व विसंगतियों का वर्णन करते हुए एक ऐसी भावभूमि रचने का प्रयास किया गया है, जिसके प्रभावस्वरूप तूफ़ान एक आकस्मिक प्राकृतिक आपदा भर नहीं रह जाता बल्कि ‘प्रलय’ और ‘कल्कि’ जैसे विशेषणों से युक्त होकर मानव द्वारा विविध क्षेत्रों में सृष्टि की अवमानना के प्रति सृष्टिकर्ता के संचित क्रोध के प्रकटीकरण का रूप ले लेता है। उपन्यास का यही वो बिंदु है, जो उसके कथ्य को तूफ़ान केन्द्रित होने के बावजूद उससे कहीं अधिक व्यापक बना देता है।  
विषयवस्तु की व्यापकता के बावजूद लेखिका उपन्यास में कही गयी ज्यादातर बातों और विवरणों को कथानक में पिरोकर विविध चरित्रों और प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत करने काफी हद तक सफल रही हैं। केवट उग्रसेन बेहरा द्वारा स्वयं को कैवर्त राजा कालू भूयाँ का वंशज माने जाने का प्रसंग रचते हुए बड़े सुंदर और रोचक ढंग से ओड़िया केवट समाज की उत्पत्ति के ऐतिहासिक पक्ष को सामने लाया गया है। इसी प्रकार कुंडल पंडा के चरित्र के माध्यम से ओडिया समाज में व्याप्त जाति-पांति, छुआछूत और अंधविश्वासों को उजागर हुआ है, तो नरकू राउतराय जैसे पात्र वहां की भ्रष्ट और अवसरवादी राजनीति की कथा कह जाते हैं, तो वहीं कुम्पनी साईं और टहली महांती नैतिक मूल्यों के पतन का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन खल-चरित्रों के बीच गांधी दास, उद्धव मंगवाल, वीर विक्रम, गोलमस्ता मियां, मंत्री मल्लिक जैसे चरित्र भी हैं, जो सभी छल-छद्म और भेदभाव से मुक्त देश की माटी और संस्कृति के प्रति उत्कट अनुराग रखते हैं। वीर विक्रम के बहाने कथा का सूत्र पहले सरहद तक पहुँचता है, जहां कारगिल का युद्ध छिड़ा हुआ है, तो वहीं जब तूफ़ान में गाँव-घर सबकुछ नष्ट हो जाता है, तो यही वीर विक्रम सरहद की लड़ाई से निवृत्त हो अपनी माटी के पुनर्निर्माण की लड़ाई में जुट जाता है। 

स्त्री पात्रों में गिरिमा का चरित्र सर्वाधिक आकर्षित करता है, जिसकी चेतना उसके समाज की लड़कियों के मुकाबले न केवल अधिक परिपक्व और प्रगतिशील है, बल्कि विद्रोहिणी भी है। शिक्षा को केवल एक औपचारिकता मानने वाले समाज से होते हुए भी वो शिक्षा के महत्व को समझती और इसपर बल देती है। इन सब चरित्रों से जुड़ी छोटी-छोटी उपकथाएँ रचकर लेखिका ने उपन्यास के व्यापक कथ्य-क्षेत्र के अलग-अलग पक्षों को बड़ी कुशलता से रोचक रूप देते हुए उभारा और आगे बढ़ाया है। तूफ़ान के शब्द-चित्र उकेरने में भी लेखिका पूरी तरह से कामयाब रही हैं। ऐसा लगता है कि जैसे सब दृश्य एकदम जीवंत रूप से आँखों के आगे चल रहे हैं। 
बेशक उपन्यास में अच्छे-बुरे दोनों तरह के चरित्र हैं, लेकिन कहानी में तूफ़ान के प्रवेश के साथ ये सब भेदभाव मिट जाते हैं। तब पाठक के मन में हर पात्र के प्रति केवल सहानुभूति ही रह जाती है, और यहीं बहुत-से पात्र संकीर्णता से श्रेष्ठता की ओर भी उन्मुख होते हैं। जाति-पांति का भेदभाव और धार्मिक कर्मकांडों को मानते हुए जीने वाले कुंडल पंडा अपने प्राणों का मोह छोड़ अपनी धार्मिक आस्था में बंधे सबकी रक्षा के लिए सागर को बाँधने निकल पड़ते हैं, नर्कू राउतराय का बलात्कारी  लड़का अर्जुन राउतराय तूफ़ान में स्त्री के ही प्राण बचाते हुए जीवन गंवा देता है, बांग्लादेशी घुसपैठिया होने की लानत झेलते हुए जीवन गुजारने वाले भारत मंडल का बेटा उत्कलमणि मंडल अपने बच्चों की चिंता छोड़ अन्यों के प्राण बचाने में जुट जाता है, गोलमस्ता मियाँ इतने हिन्दुओं को मस्जिद में जगह दे देता है कि उसके अपने परिवार के लिए जगह नहीं रह जाती – तूफ़ान में घटित ऐसी तमाम घटनाएं एक ही संदेश देती हैं कि ‘धनी, दरिद्र, जाति-धर्म, जमींदार, प्रजा, नेता, वोटर, महाजन, दाता, ग्रहीता, भाषा और भौगोलिकता में भेद किए बिना मनुष्य में जितने भेद थे, जितनी विषमताएं थीं, प्रलय ने एक बिंदु पर सबको समान कर दिया था’। इस आपदा को लेकर तत्कालीन सरकारों की अकर्मण्यता और व्यवस्था की लूट-खसोट की तो उपन्यास में खबर ली ही गयी है, लेकिन साथ ही तूफ़ान गुजरने के पश्चात् उत्साहशून्य हो सरकारी ‘रिलीफ’ के भरोसे पड़े रहने की बजाय समाज को अपनी भूमि के स्व-निर्माण के लिए उद्यम करने का संदेश भी दिया गया है।       
ऐसे यथार्थपरक और क्षेत्र-विशेष पर केन्द्रित उपन्यासों में परिवेश बहुत महत्वपूर्ण होता है। परिवेश का जितना सटीक चित्रण होता है, उतना ही अधिक कथानक यथार्थ के करीब पहुँचने में सफल रहता है। इस उपन्यास का परिवेश-चित्रण उत्कृष्ट है। शुरू से अंत तक पात्रों की रहन-सहन, खान-पान, बोली-विचार, पोथी-पुराण सहित उनके आसपास के वातावरण तक के माध्यम से लेखिका ने ओडिया समाज का एक ऐसा जीवंत परिवेश खड़ा किया है, जो पाठक को उस दौर और दुनिया से जोड़ने में कामयाब रहता है।
हालांकि उपन्यास की एक बात जो खटकती है, वो है सांप्रदायिक समरसता के प्रति लेखिका के आग्रह का कहीं-कहीं अतिवादी हो जाना। द्रोण मास्टर द्वारा मस्जिद में भागवत बांचे जाने की बात कही जाने पर वीर विक्रम द्वारा साथ में कुरान पढ़ी जाने की बात कहना खटकता है। एक मुस्लिम उपासना स्थल पर हिन्दू ग्रन्थ का पाठ सांप्रदायिक समरसता का संदेश देने के लिए पर्याप्त है, यहाँ भागवत के साथ कुरआन को रखने की कोई आवश्यकता नहीं थी। सब धर्मग्रंथों में समानता की बात कहने-सुनने में जितनी ठीक लगती है, यथार्थ में वैसी नहीं है। अतः एक यथार्थवादी उपन्यास में ऐसे सरलीकरण से बचा जाना चाहिए। 

बहरहाल, यह कह सकते हैं कि ये उपन्यास ओडिया समाज-संस्कृति तथा मानवीय जीवटता की एक महागाथा है, साथ ही यह हमें उपन्यास विधा की सामर्थ्य से भी परिचित करवाता है। 

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

संकटकाल में कुशल नेतृत्व की पहचान [दैनिक जागरण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

कहा जाता है कि किसी भी राष्ट्र के चरित्र और उसके नेतृत्व की वास्तविक पहचान संकटकाल में ही होती है। देखा जाए तो वर्तमान में किसी एक राष्ट्र के लिए नहीं अपितु समूचे विश्व के समक्ष ऐसा ही एक संकटकाल उपस्थित है। कोरोना वायरस जनित वैश्विक महामारी ने विश्व के छोटे-बड़े सभी राष्ट्रों के समक्ष कठिन परीक्षा का एक ऐसा अवसर उपस्थित कर दिया है, जिसमें विश्व के लगभग सभी नागरिकों सहित उनके नेतृत्वकर्ताओं के भी धैर्य, संयम, समझदारी और दूरदर्शिता की कठिन परीक्षा हो रही है। यह कहना अनुचित नहीं लगता कि इस कठिन काल के बीतने के पश्चात् वैश्विक राजनीति के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन आने की संभावना है तथा इस संघर्ष में राष्ट्रों का प्रदर्शन ही आगामी विश्व की राजनीतिक स्थिति का निर्धारण करेगा।
अमेरिका जो विश्व का स्वघोषित दारोगा बना हुआ था, उसकी स्थिति इस महामारी में सबसे अधिक दयनीय और चिंताजनक बनी हुई है। विश्व के कुल कोरोना संक्रमितों में एक तिहाई संक्रमित अकेले अमेरिका के हैं और इस संक्रमण से हुई मौतों में भी एक चौथाई से अधिक मौतें अमेरिका में हुई हैं। ये आंकड़ा प्रतिदिन तेजी से बढ़ भी रहा है और विश्व का ये महाशक्ति राष्ट्र अपने लोगों को मरते देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पा रहा।

ये स्थिति केवल अमेरिका की ही नहीं है, अपितु कभी विश्व को अपने शासन में रखने वाला ब्रिटेन आज अपने प्रधानमंत्री को तक इस महामारी के संक्रमण से नहीं बचा पाया। यह संतोषजनक है कि बोरिस जॉनसन स्वस्थ हो गए हैं, परन्तु मात्र छः करोड़ के लगभग आबादी वाले ब्रिटेन में कोरोना संक्रमितों की संख्या का लाखों में पहुँच जाना भयभीत करने के साथ-साथ चकित भी करता है। स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले विश्व में शीर्ष पर रहने वाले स्पेन और इटली की स्थिति भी हमारे सामने है। रूस और फ़्रांस जैसी महाशक्तियां भी इस महामारी के समक्ष बेबस नजर आ रहीं, तो वहीं चीन विश्व को इस संकट में डालकर अब इसका व्यापारिक लाभ लेने में जुटा हुआ है।
समग्रतः इस पूरे परिदृश्य में हम विश्व के इन कथित महाशक्ति राष्ट्रों के सामर्थ्य और चरित्र दोनों को देख सकते हैं। इस कठिन काल में भी कोई अपना व्यापार बढ़ाने में जुटा है, तो कोई दूसरे पर आरोप लगाने में मशगूल है। वस्तुतः इनमें कोई एक ऐसा राष्ट्र नहीं दिखता जिसका महाशक्तित्व विश्व को वह मार्ग सुझा सके जिसके द्वारा कोरोना के संकट से निपटा जा सकता है। परन्तु, इन सबके बीच यह कार्य भारत ने किया है। भारतीय नेतृत्व से लेकर नागरिकों तक ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद जिस सूझबूझ, समझदारी और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए इस महामारी को अपने यहाँ भयानक रूप में पाँव पसारने से रोका है, वो कहीं न कहीं आज पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक बन चुका है।
गौर करें तो जब विश्व के उक्त महाशक्ति देश कोरोना को हल्के में ले रहे थे तथा नागरिकों के जीवन से अधिक अर्थव्यवस्था की चिंता में थे, भारत ने तभी से देश में इसकी आहट को भांपते हुए आवश्यक कदम उठाने शुरू कर दिए। 22 मार्च को हुआ जनता कर्फ्यू हो या 24 मार्च को पहले इक्कीस दिन और फिर उसके पश्चात् 14 अप्रैल को 3 मई तक के लिए घोषित लॉकडाउन, इन निर्णयों ने स्पष्ट किया कि भारत की सरकार के लिए अपने नागरिकों का जीवन सर्वप्रथम है। लॉकडाउन का निर्णय उचित था, परन्तु इतने विशाल और सघन जनसंख्या वाले देश में इसे लागू करने की अनेक चुनौतियाँ थीं और वो सामने आईं भी। दैनिक आय पर निर्भर मजदूर वर्ग के समक्ष भुखमरी का संकट उपस्थित न हो इसके लिए सरकार ने वित्तीय घोषणाएं की तथा अपनी जान जोखिम में डालकर कोरोना से लड़ रहे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी बीमा का ऐलान किया। ऐसे और भी कई निर्णय लिए गए। साथ ही, लम्बे लॉकडाउन से देशवासियों के मन में भय, हताशा और अवसाद न उत्पन्न हो, इसके लिए स्वयं प्रधानमंत्री ने बीच-बीच में उनसे संवाद करने तथा तरह-तरह से उनमें उत्साह व सकारात्मकता बनाए रखने का प्रयत्न किया है। इन प्रयत्नों का ही परिणाम है कि आज विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला यह देश कोरोना संक्रमितों के मामले में शीर्ष के दस देशों से बाहर है। कहने की आवश्यकता नहीं कि भारत के अभी इस महामारी के खतरनाक प्रभाव से बचे होने में नागरिकों के सहयोग के साथ-साथ हमारे नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति, सूझबूझ और दूरदर्शितापूर्ण कार्यशैली ही कारण है।
भारतीय नेतृत्व की सफलता का प्रमाण हाल ही में सामने आए एक वैश्विक सर्वेक्षण से भी मिल जाता है। अमेरिका की एक डाटा इंटेलिजेंस कंपनी ‘मॉर्निंग कंसल्ट पॉलिटिकल इंटेलिजेंस’ ने हाल ही में कोरोना वायरस की लड़ाई से संबंधित दुनिया भर के आंकड़े जारी किए। इन आंकड़ों में दुनिया के सभी बड़े नेताओं की रेटिंग भी जारी की गई है, जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोरोना से लड़ाई में विश्व के सभी बड़े नेताओं के बीच सबसे ऊपर स्थान दिया गया है। इस रेटिंग को सरकार द्वारा इस कठिन समय में लिए गए फैसलों और काम करने तरीकों तथा लोगों के अपने नेतृत्व पर विश्वास जैसी बातों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इन सब कसौटियों पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अव्वल साबित हुए हैं और 68 अंकों के साथ सूची में शीर्ष पर उपस्थित हैं। स्पष्ट है कि इस संकटकाल में भारतीय नेतृत्व विश्व का ध्यान खींच रहा है और विश्व भारतीय नेतृत्व की निर्णय क्षमता और प्रबंधन कुशलता को एक उदाहरण की तरह ले रहा है।
इतना ही नहीं, विशेष यह भी है कि एक तरफ जहां पड़ोसी चीन इस आपदाकाल का व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अनुचित इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहा, तब भारत ने कोरोना से लड़ाई में केवल अपनी रक्षा ही नहीं की है, अपितु विश्व के अन्य देशों को भी सहयोग दिया है। अमेरिका सहित विश्व के अनेक देशों को भारत ने कोरोना के विरुद्ध प्रयोग हो रही मलेरिया की दवा हाईड्राक्सीक्लोरोक्विन देकर उनका सहयोग किया है। ये सब बातें स्पष्ट करती हैं कि इस संकटकाल में न केवल भारत ने अपने संकटकालीन उत्तम प्रबंधन व नीति नियोजन का परिचय दिया है, वरन उसने विश्व को कुटुंब समझने वाले सनातन दर्शन को भी चरितार्थ करके दिखाया है। आज ये जो कुछ घट रहा है, आने वाले कल की इबारत इसीपर लिखी जाएगी।

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

नयी चुनौतियों से निपटने के लिए नयी रणनीति की जरूरत [दैनिक जागरण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

कोरोना वायरस के रूप में आज विश्व एक ऐसी चुनौती से दो-चार हो रहा है, जिसका उसे अभी पूरी तरह से अंदाजा नहीं है। चीन से उपजी इस महामारी के मरीजों की संख्या के मामले में पहले स्थान पर पहुँच चुके महाशक्ति अमेरिका द्वारा इस स्थिति को अदृश्य शत्रु के खिलाफ लड़ाई बताया जा रहा है। स्वास्थ्य व्यवस्था के मामले में अग्रणी फ़्रांस, इटली और स्पेन जैसे देश भी इस आपदा के आगे घुटने टेक चुके हैं। कुल मिलाकर अब दुनिया की निगाहें भारत पर टिकी हैं, जो अबतक खुद को कोरोना के तीसरे और बेहद खतरनाक चरण में जाने से बचाए हुए है, लेकिन चीन को छोड़ अन्य सभी देशों के मुकाबले अपनी विशाल जनसंख्या के कारण स्थिति बिगड़ने पर होने वाले भारी नुकसान से आशंकित भी है।

देश में गत 25 मार्च से आगामी 14 अप्रैल तक के लिए लॉकडाउन किया जा चुका है और इसे सफल बनाने के लिए सभी स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। देश की अधिकांश आबादी अपने घरों में बैठी हुई है और खुद को तथा देश को इस तीव्र संक्रमण वाली महामारी से बचाने में लगी है। लेकिन इस लॉकडाउन में भी देश के चिकित्सक, पुलिस बल और पत्रकार जिस प्रकार से अपनी जान हथेली पर लेकर लोगों के लिए कार्य कर रहे हैं, उस योगदान के लिए कोई भी शब्द कम है, लेकिन इसके साथ ही यह स्थिति भविष्य के लिए हमारे समक्ष कुछ प्रश्न भी छोड़े जा रही है।
अबतक हम यही मानते आए हैं कि देश की सरहद पर खड़े सेना के जवानों को ही हर हाल में अपनी ड्यूटी निभानी पड़ती है। इस बात का ध्यान सैन्य बलों के प्रशिक्षण में भी रखा जाता है और उन्हें इस बात के लिए शरीर और मन से तैयार किया जाता है कि कैसी भी स्थिति में वो अपने दायित्व का निर्वाह कर सकें। लेकिन मौजूदा स्थिति ने हमें यह सोचने पर विवश कर दिया है कि सेना के साथ-साथ कुछ अन्य क्षेत्र भी हैं, जिनको आपात स्थिति की सेवाओं के लिए तैयार करने पर काम किया जाना चाहिए।
आज जो हालात हैं, वो किसी सैन्य युद्ध से कम नहीं हैं बल्कि इस मायने में उससे बढ़कर ही है कि इसमें एक अदृश्य शत्रु जिसको खत्म करने का उपाय भी हमारे पास नहीं है, से निपटना है। इस युद्ध में कोई सेना नहीं लड़ रही बल्कि यहाँ लड़ाई हमारे स्वास्थ्यकर्मी, पुलिसकर्मी और पत्रकार लड़ रहे हैं। आज ये लोग जिस स्तर पर और जिस जोखिम के साथ अपने कर्तव्य के निर्वाह में में जुटे हैं, वो सेना के जवानों से बिलकुल भी कम नहीं है। लेकिन क्या ऐसी चुनौती के लिए इनको प्रशिक्षित किया गया है? क्या ये शारीरिक-मानसिक रूप से इस तरह की आपदा में काम करने के लिए तैयार हैं? जैसे सेना के पास युद्ध की स्थिति के लिए सदैव गोला-बारूद और जरूरी उपकरण अतिरिक्त रूप से तैयार होते हैं, क्या स्वास्थ्य-पुलिस जैसे क्षेत्रों में ऐसी आपात स्थिति में काम करने के लिए जरूरी संसाधन हैं? दुर्भाग्यवश इन प्रश्नों के उत्तर काफी हद तक नकारात्मक ही हैं।
भारत में चिकित्सकों की कमी की बात किसी से छिपी नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति एक हजार व्यक्तियों पर एक चिकित्सक का होना अच्छी स्थिति होती है। लेकिन फिलहाल भारत इस अनुपात से दूर है। कारण आबादी की विशालता और उसके मुकाबले कम चिकित्सक होना ही है। इसके अलावा जब यह आपदा आई तो स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य चीजों यथा मास्क, चिकत्सकीय गाउन, अस्पतालों में बिस्तर आदि की कमी भी समस्या के रूप में सामने आए। कोरोना की ‘टेस्टिंग किट’ तैयार करने में हमें वक़्त लगा जिस कारण इसकी जांच तेजी से नहीं हो पाई। हालांकि अब इसमें गति आई है।  
पुलिसकर्मियों की बात करें तो वे सड़क पर लॉक डाउन को सफल बनाने और अव्यवस्था न होने देने के लिए खड़े हैं, लेकिन इस स्थिति से निपटते हुए उनकी जान को जो जोखिम है, उसे कम करने के लिए क्या हमारे पास कोई योजना है? इसी प्रकार पत्रकारों को भी अपना काम करना ही है, क्योंकि इस स्थिति में लोगों तक सही सूचनाएं पहुंचाने और उन्हें जागरूक रखने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या उनकी सुरक्षा और हितों को लेकर कोई ठोस आश्वासन है?
कहने की आवश्यकता नहीं कि फिलहाल इन सब सवालों के स्पष्ट और संतुष्टिदायक उत्तर किसी के पास नहीं हैं। उक्त चुनौतियों के लिए सरकार पर दोषारोपण कर देना एक बहुत आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन इसका कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि यह समस्या इतनी आकस्मिक और विकट है कि बड़े-बड़े समर्थ देश खुद को नहीं संभाल पा रहे, फिर भारत जैसे विशाल आबादी वाले एक विकासशील देश के लिए चीजें आसान रहने की अपेक्षा करना बेमानी होगी। निश्चित ही फिलहाल हमारा पूरा ध्यान सभी संभव विकल्पों को आजमाते हुए और जितना हो सके अपने स्वास्थ्यकर्मियों-पुलिसकर्मियों को सुरक्षित रखते हुए इस आपदा से निपटने पर होना चाहिए। लेकिन इस आपदा से निपटने के बाद हमें अपनी तैयारियों को ऐसी नयी चुनौतियों जो भविष्य में और भी आ सकती है, के अनुरूप पुख्ता करने की दिशा में काम करना होगा।
इस आपदा ने हमें इस सत्य से अवगत करा दिया है कि आज केवल सेना को सुसज्जित व मजबूत रखके कोई देश अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त नहीं रह सकता, क्योंकि इस नए समय में लड़ाई के और मोर्चे भी खुल गए हैं, जहां जीत हासिल करने के लिए नयी रणनीति और तैयारी की जरूरत है। आगे दुनिया को मिलकर इन तैयारियों पर काम करना होगा।

मंगलवार, 3 मार्च 2020

ऑस्कर सम्मान और भारतीय सिनेमा [दैनिक जागरण ले राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

गत 31 जनवरी को भारतीय थिएटरों में लगभग सौ स्क्रीन पर दक्षिण कोरियाई फिल्म ‘पैरासाइट’ प्रदर्शित हुई थी। तब इस फिल्म पर भारत में बहुत अधिक कोई चर्चा नहीं हुई। स्क्रीन कम होने के कारण न तो दर्शकों के बीच इसे लेकर कोई रुझान दिखा और न ही फिल्म समीक्षकों का ही इसपर ध्यान गया। लेकिन दस फरवरी को जब यह घोषणा हुई कि इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म और सर्वश्रेष्ठ मौलिक पटकथा का ऑस्कर दिया गया है, तो फिर भारत सहित दुनिया भर में इसे लेकर लोगों की जिज्ञासा बढ़ गयी। बांग जून हो निर्देशित ‘पैरासाइट’ पहली गैर-अंग्रेजी एशियाई फिल्म है, जिसे ऑस्कर प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही संभव है कि ऑस्कर निर्णायकों पर लगने वाले इस आरोप पर कुछ विराम लगे कि यह पुरस्कार देने में गैर-अंग्रेजी फिल्मों के साथ भेदभाव किया जाता है।
पैरासाइट दो परिवारों की कहानी है। एक परिवार अमीर है और दूसरा गरीब। फिर कुछ नाटकीय घटनाक्रमों के साथ गरीब परिवार के सदस्य अपने सम्बन्ध को अप्रकट रखते हुए अमीर परिवार में अलग-अलग भूमिकाओं में नौकरी करने लगते हैं। इस नौकरी के साथ उनका जीवन बेहतर चलने लगता है, लेकिन जीवन-स्तर में आया ये बदलाव उनके व्यवहार और सोच में भी बदलाव लाता है। हम देखते हैं कि वे जरा-सी बेहतर स्थिति में पहुँचते ही अपने जैसे गरीबों के प्रति कटु व्यवहार करने लगते हैं। इसके बाद हम धीमे-धीमे गरीबी-अमीरी के द्वंद्व की आंतरिक जटिलताओं से भी परिचित होते हैं।

झूठ बोलकर नौकरी पाने वाले तरीके पर बॉलीवुड में भी फ़िल्में बनी हैं, लेकिन उनकी सीमा का विस्तार हास्य तक ही रहा है और अंत आदर्शवादी ढंग से हो गया है, जबकि पैरासाइट इस बिंदु पर ही बड़ी फिल्म बन जाती है। इसमें थोपा गया कोई आदर्शवाद नहीं है और न ही बनावटी यथार्थ। इसके गरीब पात्रों के प्रति न तो कभी सहानुभूति होती है, न ही अमीरों के प्रति घृणा पैदा करने की कोशिश ही फिल्म में की गयी है। इसके सभी रंग स्वाभाविक होते हुए भी समग्र कैनवस पर आर्थिक असमानता और पूँजी की समस्या को लेकर एक अनूठा चित्र खींचने में कामयाब रहते हैं। फिल्म की पृष्ठभूमि कोरियाई है, लेकिन गरीबी-अमीरी पर इसका कथ्य समूचे विश्व का निदर्शन करने में कामयाब नजर आता है।
बहरहाल, भारत की तरफ से अबकी ऑस्कर में गली बॉय को भेजा गया था। ज़ोया अख्तर द्वारा निर्देशित यह फिल्म गत वर्ष आई थी। दर्शकों और समीक्षकों दोनों की कसौटी पर यह फिल्म खरी उतरी और कई भारतीय अवार्ड भी इसने जीते हैं। यह फिल्म मुंबई की गरीबी में पले-बढ़े एक लड़के के रैपर बनने के सपने के पूरे होने की कहानी है। इस सफ़र में उसे कैसे संघर्षों से जूझना पड़ता है, फिल्म इसको दिखाती है। लेकिन मूलतः इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नया या अलग नहीं है, जो इसे ऑस्कर में भेजने लायक ख़ास बनाता हो। अगर संघर्ष से सपने पूरे होने की कहानी के कारण यह फिल्म महत्वपूर्ण मानी गयी है, तो इस मायने में आनंद कुमार के जीवन पर आधारित सुपर-30 इससे अधिक बेहतर फिल्म लगती है। मगर ‘गली बॉय’ के प्रति हमारे फिल्म क्षेत्र से जुड़े निर्णायकों में इतनी उदारता क्यों है, यह एक तरह से रहस्य का ही विषय लगता है।
ऑस्कर में भारतीय फिल्मों के प्रवेश की शुरुआत 1957 महबूब खान की मदर इंडिया से होती है जो ऑस्कर की ‘सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म’ की श्रेणी में नामित होने में कामयाब भी रही थी, लेकिन पुरस्कार नहीं प्राप्त कर सकी। इसके तीन दशक बाद 1988 में दूसरा मौका आया जब मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ को ऑस्कर में नामित किया गया लेकिन पुरस्कार इसे भी नहीं मिला। फिर 2001 में आमिर खान की लगान के साथ भी यही हुआ। इसके अलावा, विधु विनोद चोपड़ा की ‘एन एनकाउंटर विद फेसेस’, आश्विन कुमार की ‘लिटिल टेररिस्ट’, रायका जेहताबची की ‘पीरियड एंड ऑफ़ सेंटेंस’ भारत की कुछ डाक्यूमेंट्री लघु फ़िल्में भी ऑस्कर में जा चुकी हैं। इनमें ‘पीरियड एंड ऑफ़ सेंटेंस’ को ऑस्कर मिला भी था। लेकिन भारतीय भाषाओं की फीचर फ़िल्में आज भी ऑस्कर की प्रतीक्षा में हैं। 
गांधी और स्लमडॉग मिलिनेयर ये भारतीय पृष्ठभूमि और कहानी पर आधारित विदेशी निर्देशकों की वो दो फ़िल्में हैं, जिन्होंने ऑस्कर में झंडा गाड़ा था। इन दोनों फिल्मों ने विभिन्न श्रेणियों में आठ-आठ ऑस्कर जीते थे और इनके लिए दो भारतीयों भानु अथैया और ए. आर. रहमान को भी ऑस्कर मिला था। अब सवाल यह उठता है कि ऐसा क्यों है कि भारतीय नायक या भारतीय पृष्ठभूमि की कहानी पर विदेशी निर्देशक ऑस्कर विजेता फ़िल्में बना लेते हैं, जबकि बॉलीवुड नहीं बना पाता। क्या इस सवाल का बॉलीवुड फिल्म निर्माता-निर्देशकों के पास कोई जवाब है कि बॉलीवुड में गांधी पर अबतक कोई अच्छी फिल्म क्यों नहीं बन पाई? क्यों अब भी गांधी पर फिल्म के विषय में सोचते ही रिचर्ड एटनबरो की गांधी का ही ख्याल आता है? कितनी विचित्र बात है कि अपने राष्ट्रपिता पर यह देश एक ढंग की फिल्म तक नहीं बना पाया। ऐसे ही स्लमडॉग मिलिनेयर की कहानी उस मुंबई की गरीबी पर है, जिस मुंबई में पूरा बॉलीवुड बसता है। लेकिन इसपर फिल्म बनाने के लिए डैनी बॉयल को आना पड़ता है। वो फिल्म बनाते हैं और सम्मान भी बटोरते हैं, बॉलीवुड देखता रह जाता है।
देश में एक राय यह मिलती है कि हमें ऑस्कर के प्रमाणपत्र की जरूरत क्या है। बात किसी प्रमाणपत्र की नहीं है, लेकिन फिल्म पुरस्कारों में ऑस्कर की वैश्विक प्रतिष्ठा से इनकार नहीं किया जा सकता। अब अगर हम अपने फिल्म सम्मानों को भी वैश्विक स्तर प्रतिष्ठित करने में कामयाब होते तो जरूर हमें ऑस्कर की परवाह करने की जरूरत नहीं थी। लेकिन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों को छोड़ दें तो हमारा कोई फिल्म पुरस्कार विश्व में तो दूर की बात है, देश में भी विश्वसनीय और सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा जाता। अभी हाल ही में घोषित फिल्मफेयर पुरस्कारों को लेकर मचा बवाल इसीका उदाहरण है। सो कुल मिलाकर बात ये है कि हमारे भारतीय फिल्मकारों को भारतीय समाज में मौजूद नए विषयों को चिन्हित करते हुए न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य दृष्टि के साथ उनपर नए तरीकों से फिल्म बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। ऐसे प्रयास ही भारतीय सिनेमा को वैश्विक प्रतिष्ठा प्रदान करेंगे। अंततः बात यह भी है कि साहसिक प्रयास ही सम्मान का संधान करते हैं। 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

पद्म सम्मानों का लोकतांत्रीकरण [दैनिक जागरण में प्रकाशित

  • पीयूष द्विवेदी भारत

वर्ष 2014 के बाद से बीते तीन-चार वर्षों में पद्म सम्मानों के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व और सकारात्मक परिवर्तन नजर आया है। इस दौरान ऐसे नामों की घोषणा देखने को मिली है, जो बिना किसी संपत्ति या सम्मान की लालसा के लम्बे समय से अपने-अपने क्षेत्र में उत्तम कार्य कर रहे। वर्ष 2017 में जब पद्म सम्मानों के नामों का ऐलान हुआ तो सम्मान पाने वालों में बिपिन गणात्रा, मीनाक्षी अम्मा, बाबा बलबीर सिंह, चिंताकिंदी मल्लेशम जैसे सामान्य पृष्ठभूमि के कई अचर्चित नाम शामिल थे, लेकिन उनका योगदान और समाज सेवा का भाव बड़ा था। इस तरह के नामों के ऐलान के साथ ही सिफारिशों और लॉबियों से मुक्त पद्म सम्मानों की एक नवीन परम्परा का सूत्रपात हुआ, जिसको बेहतर ढंग से आगे बढ़ाने का काम 2018 और 2019 से लेकर इस वर्ष तक सरकार ने किया है
इस बार विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित कुल 141 व्यक्तियों को पद्म सम्मानों के लिए चुना गया है, जिनमें सात प्रमुख हस्तियों को पद्म विभूषण, 16 लोगों को पद्म भूषण और 118 लोगों को पद्मश्री दिया जाएगा। जार्ज फर्नांडीज, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, श्री विश्वेशतीर्थ जी को मरणोपरांत यह सम्मान प्रदान करने की घोषणा हुई है, वहीं मुक्केबाज मैरीकोम, सुप्रसिद्ध लोकगायक पंडित छन्नूलाल मिश्र और मारीशस के पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ को भी पद्म विभूषण देने का ऐलान हुआ है। पद्म भूषण की श्रेणी में भी मुजफ्फर हुसैन बेग, मनोहर पर्रीकर, आनंद महिंदा, पीटी उषा आदि नाम शामिल हैं।
लेकिन पद्म श्री की श्रेणी बीते वर्षों की तरह ही इसबार भी अनूठी है जिसमें सम्मानित व्यक्तियों में ज्यादातर नाम ऐसे हैं, जो लम्बे समय से संघर्षपूर्ण ढंग से अपने-अपने क्षेत्र में बिना किसी लोभ-लालसा के उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोई व्यापक पहचान नहीं है। हालांकि इसे विडंबना ही कहेंगे कि पद्म श्री के लिए जितनी चर्चा करण जौहर, कंगना रानाउत, अदनान सामी, एकता कपूर जैसे पहले से ही प्रसिद्ध लोगों की हो रही, उतनी इन अचर्चित लोगों की नहीं हो रही। जबकि चर्चा के केंद्र में यही लोग होने चाहिए।
आज जब चिकित्सा एक विशुद्ध व्यावसायिक कर्म बन गया है और सरकार को पहल करके मुफ्त चिकित्सा का प्रबंध करना पड़ रहा है, ऐसे वक़्त में उत्तराखंड के डॉ. योगी एरन किसी अजूबे की तरह ही हैं, जो अबतक जले-कटे हजारों मरीजों की निशुल्क प्लास्टिक सर्जरी करके उन्हें एक नया रूप दे चुके हैं। हालांकि अबसे पूर्व डॉ. योगी के विषय में शायद ही उनके निकटस्थ लोगों के सिवा किसीको कुछ पता रहा हो, लेकिन इसबार पद्म श्री के लिए चुने जाने के बाद उनके इस सेवा-कार्य को व्यापक पहचान मिलने की उम्मीद है। इसी तरह पंजाब के जगदीश लाल आहूजा सैकड़ों गरीब मरीजों को हर दिन मुफ्त भोजन व कपड़े आदि मुहैया करवाते हैं। बीते 15 सालों से यह उनका नित्य नियम बना हुआ है और इस कारण स्थानीय स्तर पर उनकी पहचान लंगर बाबा के रूप में स्थापित हो गयी है।
ऐसे ही चाचा शरीफ के नाम से मशहूर मोहम्मद शरीफ  25 सालों से फैजाबाद और उसके निकट के क्षेत्रों में हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। उनके इस कार्य में न तो उनका मज़हब कभी आड़े आया और न ही इस सेवा-कार्य के लिए कोई पहचान न मिलने का विचार ही उन्हें रोक पाया। निष्काम भाव से अपने कर्म में लगे मोहम्मद शरीफ को अबकी पद्म श्री देने की घोषणा हुई है।
तुलसी गावड़ा ने औपचारिक शिक्षा कुछ भी नहीं ली है, लेकिन पेड़-पौधों के विषय में उनकी जानकारी ऐसी है कि उन्हें ‘जंगल का इनसाइक्लोपीडिया’ कहा जाता है। आज जब प्रकृति को बचाने की चुनौती से मानवता दो-चार हो रही है, ऐसे वक़्त में प्रकृति संरक्षण के प्रति उनका समर्पण प्रेरणादायक है। बताते हैं कि वे अभी तक लाखों पौधों को पेड़ बना चुकी हैं, जिस कारण कर्णाटक सरकार ने उन्हें वन विभाग में नौकरी भी दी है। इस वर्ष पद्म श्री के लिए उनका चयन निःसंदेह पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्यरत अनेक गुमनाम लोगों को और बेहतर करने की ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करेगा।

इसके अलावा संतरे बेचकर गरीब बच्चों के लिए स्कूल चलाने वाले हरेकला हजब्बा हों, पश्चिम बंगाल के सुन्दरवन में दो दशक से अधिक समय से सप्ताह में दो दिन गरीबों का मुफ्त इलाज करने वाले डॉ. अरुणोदय मंडल हों, खुद लकवाग्रस्त होते हुए भी दिव्यांग बच्चों के लिए कार्यरत एस रामकृष्णन हों या देश भर में घूमकर किसानों को आर्गेनिक खेती के गुर सिखाने वाले ओडिशा के राधामोहन और साबरमती हों अथवा अच्छी सरकारी नौकरी को ठुकराकर कम पानी में खेती की विधि पर काम करते हुए किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बने सुंडाराम वर्मा हों, ऐसे अनेक लोगों के नामों से इसबार के पद्म श्री सम्मानों की सूची भरी पड़ी है। यह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उस सूची में देखते ही पहचान में आने वाले नाम गिनती के हैं, अधिकांश नामों का परिचय पाने के लिए खोजबीन करनी पड़ती है।  
पद्म सम्मान तो बीते साढ़े छः दशकों से दिए जा रहे हैं, लेकिन इस तरह जनसामान्य के बीच से अचर्चित नायक-नायिकाओं को सम्मानित करने का काम इतने व्यापक रूप से पहले नहीं हुआ। दरअसल राजधानी में बैठी लॉबी के इशारों पर सम्मानों के वितरण का खेल देश में लम्बे समय तक चला है, जिसके लिए सम्मान की प्रमुख कसौटी सत्ता की जी-हुजूरी रही है। लेकिन 2014 के बाद मोदी सरकार ने इन सम्मानों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए नामांकन प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया। जनवरी 2018 में पद्म सम्मानों की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कहा था, ‘नामांकन प्रक्रिया में बदलाव का परिणाम है कि सामान्य लोगों ने सम्मान की श्रेणियों में जगह बनाई है. ऑनलाइन नामांकन इसमें पारदर्शिता लाया है... अब व्यक्ति की पहचान नहीं, उसका कार्य सम्मान के लिए महत्व रखता है.’ सरकार के इन प्रयासों का ही परिणाम है कि आज देश के दूसरी, तीसरी और चौथी वरीयता के ये सर्वोच्च नागरिकता सम्मान, सही अर्थों में अपने लिए सुपात्र नागरिकों तक पहुँच रहे हैं। यह भी कहना अनुचित नहीं होगा कि भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पद्म सम्मान भले साढ़े छः दशकों से प्रदान किए जा रहे हों, लेकिन वास्तविक अर्थों में इनका लोकतांत्रिकरण अब जाकर हुआ है, जिसके लिए वर्तमान सरकार निश्चित ही सराहना की पात्र है

बुधवार, 22 जनवरी 2020

शोध की गुणवत्ता का प्रश्न [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

किसी भी देश की उच्च शिक्षा में शोध का विशेष महत्व होता है। कहीं न कहीं इसीसे अमुक देश की उच्च शिक्षा की स्थिति का पता भी चलता है। लेकिन दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इस मामले में भारत की स्थिति चिंताजनक है। यह चिंता शोध की मात्रा को लेकर नहीं है, क्योंकि भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध की मात्रा में कोई कमी नहीं है बल्कि उसमें तो लगातार वृद्धि ही हो रही है, लेकिन जब प्रश्न शोध की गुणवत्ता और उपयोगिता का आता है तो स्थिति चिंताजनक लगने लगती है। देश में शोध की मात्रा में किस प्रकार वृद्धि हो रही है, इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की इस रिपोर्ट से समझा जा सकता है जिसके अनुसार वर्ष 2014-15 में देश के विश्वविद्यालयों में जहां कुल 25 हजार शोध हुए थे, वहीं 2018-19 में इनकी संख्या बढ़कर 41 हजार तक जा पहुंची है।
शोध की इस मात्रा-वृद्धि के पीछे के कारणों को समझने का प्रयत्न करें तो इसका एक प्रमुख कारण इंटरनेट के प्रसार से बीते कुछ सालों के दौरान हुई देशव्यापी सूचना क्रांति प्रतीत होती है क्योंकि इन दोनों का कालखंड लगभग समानांतर ही है। 2014 के बाद से ही इंटरनेट का प्रसार देश में बढ़ने लगा था और फिर जिओ के आगमन ने तो इसे सर्वसुलभ ही बना दिया। सो प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं इंटरनेट के द्वारा हर प्रकार की सूचनाओं की सुलभता ने छात्रों के मन में शोध की कठिनाइयों का एक सीमा तक सरलीकरण करने का काम किया है, जिस कारण इसके प्रति उनमें रुझान बढ़ा है। यहाँ तक तो कोई समस्या नहीं है, लेकिन यह प्रश्न यथावत है कि क्या मात्रा के अनुरूप शोध की गुणवत्ता और उपयोगिता में भी कोई वृद्धि हुई है? इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक ही है।

इस स्थिति को देखते हुए ही यूजीसी अब ऐसे दिशानिर्देश तैयार करने में जुटा है, जिसके जरिये शोध की गुणवत्ता ही नहीं, उसकी उपयोगिता भी सुनिश्चित की जा सके। इसके जरिये सरकार की कोशिश देश में होने वाले ऐसे तमाम शोधों, जो समाज या उद्योग के हितों की दृष्टि से कोई महत्व नहीं रखते और केवल शैक्षिक दिखावे के लिए हो रहे हैं, पर लगाम लगाने की है। अतः यूजीसी जिन नए दिशानिर्देशों को बना रहा है, उनके तहत किसी भी नए शोध को मंजूरी दिलाने के लिए उसे सामाजिक और औद्योगिक उपयोगिता की कसौटी पर खरा सिद्ध होना होगा। जाहिर है, इस पहल के जरिये सरकार का प्रयास सही और योग्य छात्रों को अवसर देकर शोध की गुणवत्ता व उपयोगिता में सुधार लाना  तो है ही, साथ ही शोध क्षेत्र से सम्बंधित संसाधनों का अनुचित लाभ लेने वाले दिखावे के शोधार्थियों पर अंकुश लगाना भी है। सरकार का मानना है कि किसी भी शोध का मूल उद्देश्य समाज और आम जनजीवन से जुड़ी समस्याओं के समाधान का मार्ग दिखाना होना चाहिए लेकिन देखा जाए तो भारत में होने वाले अधिकांश शोध इस कसौटी पर बिलकुल खरे नहीं उतरते।
आईआईटी आदि संस्थानों के कुछ शोधों को अपवाद मान लें तो ऐसा न के बराबर ही सुनने में आता है कि देश के किसी शैक्षिक संस्थान में समाज व आम आदमी के जीवन की किसी समस्या का समाधान करने वाला कोई शोध हुआ है। देश की पत्र-पत्रिकाओं में भी अक्सर येल, ऑक्सफ़ोर्ड आदि अनेक विदेशी शैक्षिक संस्थानों में हुए विविध शोधों की ख़बरें दिखती रहती हैं, लेकिन क्या यह सवाल कभी आपके मन में उठा है कि किसी भारतीय विश्वविद्यालय के शोध की खबर क्यों नहीं दिखाई देती? कहना न होगा कि ये बातें भारतीय विश्वविद्यालयी शोध की गुणवत्ता की वस्तुस्थिति का परिचय देने के लिए पर्याप्त हैं।
वस्तुतः यह समस्या ऐसी है जिसमें किसी एक व्यक्ति, संस्था या कारण को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। नीति-निर्धारकों की समस्या यह है कि वे छात्रों के प्रति दोष-दृष्टि तो रखते हैं, परन्तु व्यवस्था की विसंगतियों पर नजर नहीं डालते। यह नहीं देखते कि विश्वविद्यालय के जिन शिक्षकों के मार्गदर्शन में छात्र शोध करते हैं, वे कितने योग्य हैं। विश्वविद्यालयी शिक्षकों की अयोग्यता की बातें जब-तब सामने आती रही हैं जो कि विश्वविद्यालयी शिक्षण व शोध से जुड़ी एक बड़ी समस्या है।
दूसरी तरफ छात्रों पर यह आरोप लगता है कि वे शोध के लिए मिलने वाली अनुदान राशि का उपयोग पारिवारिक दायित्वों के निर्वाह तथा रोजगार खोजने के लिए करते हैं और जैसे ही अच्छा रोजगार मिलता है, शोध को अधूरा छोड़ निकल जाते हैं या फिर जैसे-तैसे पूरा कर लेते हैं। चूंकि शोध करते वक्त छात्र की उम्र पारिवारिक दायित्व उठाने वाली हो जाती है, अतः यदि वो प्राप्त अनुदान राशि का कुछ उपयोग इस रूप में करता है तो गलत नहीं है, लेकिन यदि कोई छात्र शोध अधूरा छोड़कर, अपने विषय से अलग किसी अन्य क्षेत्र में कोई रोजगार प्राप्त कर चला जाता है, तो इसे नैतिक रूप से ठीक नहीं कहा जा सकता। ऐसे छात्रों से अनुदान राशि वापस लेने पर विचार किया जा सकता है।
इन सबसे अलग शोध की गुणवत्ता में कमी का एक प्रमुख कारण इसके प्रति शोधार्थियों की अगंभीर मानसिकता है। चूंकि स्नातकोत्तर के बाद पीएचडी रोजगार के लिए आवश्यक है, इसलिए बहुत-से छात्र बेमन से भी शोध में संलग्न होते हैं और शोध ग्रन्थ की गुणवत्ता से इतर इस प्रयत्न में रहते हैं कि किसी भी तरह शोधकार्य पूरा हो और डाक्टरेट की उपाधि मिल जाए। कई बार शिक्षकों की अयोग्यता भी इसमें सहयोगी भूमिका निभाती है। फिर अलग-अलग शोधों और इंटरनेट से लम्बी-लम्बी नकल उतार लेने से लेकर पैसे देकर के थीसिस लिखवाने जैसे कृत्य तक किए जाते हैं। हालांकि शोधकार्य में नकल रोकने के लिए यूजीसी ने कुछ सख्त नियम बनाए हैं और सॉफ्टवेयर भी लाया गया है, लेकिन शोध के प्रति छात्रों में अगम्भीरता और बेपरवाही की मानसिकता तथा शिक्षकों में योग्यता का अभाव जबतक खत्म नहीं होता, इन सब चीजों से बहुत लाभ की उम्मीद बेमानी है।
छात्रों को समझना चाहिए कि शोध केवल एक डिग्री प्राप्ति का उपक्रम भर नहीं होता बल्कि उसके द्वारा देश और समाज को दिशा देने का काम भी किया जाता है। इससे किसी भी देश की उच्च शैक्षिक व्यवस्था के स्तर का परिचय भी मिलता है। अतः यदि शोधकार्य में हाथ डालते हैं, तो उसे पूरे मनोयोग से, अपना एक लक्ष्य बनाकर करें। इस प्रकार से किया गया शोध न केवल व्यक्तिगत रूप से उनके लिए बल्कि देश-समाज के लिए भी हितकारी होगा।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

वैचारिक असहिष्णुता से ग्रस्त वामपंथी बुद्धिजीवी [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]


  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश का जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय एकबार फिर चर्चा में है और चर्चा का कारण इसबार भी नकारात्मक है। पिछले दिनों कुछ नकाबपोश लोगों के विश्वविद्यालय परिसर में घुसकर छात्रों के साथ मारपीट करने की खबर आई और उसके बाद से ही इस मामले में बवाल मचा हुआ है। विडंबना ही है कि देश का ये प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अपनी अकादमिक उपलब्धियों के कारण कम बेमतलब विवादों के कारण अधिक चर्चा में रहता है। 
दिल्ली पुलिस ने प्रेस कांफ्रेंस कर नौ आरोपियों के नाम सार्वजनिक किए हैं। इनमें छात्र संघ अध्यक्ष आईशी घोष का नाम भी शामिल है। पुलिस का कहना था कि अभी उसकी जांच चल रही है, लेकिन अफवाहों को देखते हुए उसे बीच में ही ये जानकारी साझा करनी पड़ी।
वास्तव में, सोशल मीडिया से सड़क पर तक छात्रों के प्रति समर्थन व्यक्त करने में जुटे बुद्धिजीवियों की भी अफवाह फैलाने में बड़ी भूमिका है। उनका रवैया किसी न्यायाधीश की तरह रहा है। ऐसा लगता है कि उन्होंने पीड़ित और पीड़क का निर्णय कर लिया है और उसीके आधार पर अभियान चलाने में लगे हैं।
यह ठीक है कि लोकतंत्र में सबको अपने विचार व्यक्त करने और सरकार के निर्णयों का लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध करने अधिकार है, लेकिन उसका भी एक तरीका होता है। विरोध को तथ्यपरक और भाषाई मर्यादा के दायरे में होना चाहिए। उसपर भी अगर आप बौद्धिक रूप से एक विशिष्ट पहचान रखते हैं तो आपका दायित्व और बढ़ जाता है। लेकिन नरेंद्र मोदी जिस दल और विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसके प्रति इस देश के वामपंथी बुद्धिजीवियों का विरोध घृणा के स्तर तक जा पहुंचा है, जिसका प्रकटीकरण इनकी भाषा से लेकर कुतर्कों तक में देखा जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर उल्लेखनीय होगा कि लेखक, शायर जावेद अख्तर ने जेएनयू छात्र संघ अध्यक्षा आईशी घोष के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर तंज करते हुए बीते दिनों ट्विट किया कि ‘जेएनयूएसयू अध्यक्ष के ख़िलाफ़ एफ़आईआर पूरी तरह से समझ में आती है। उसने अपने सिर से एक राष्ट्रवादी, देश प्रेमी लोहे की छड़ को रोकने की हिम्मत कैसे की।’ सवाल यह है कि जावेद अख्तर इसमें ‘राष्ट्रवादी’ शब्द का प्रयोग किस आधार पर कर रहे हैं? ऐसी क्या अधीरता है जो वे जांच पूरी होने तक का इंतजार करने की बजाय खुद ही दोषी तय करने में लगे हैं। साथ ही, अब जब पुलिस ने आरोपियों के नाम सार्वजनिक कर दिए हैं और उसमें आइशी घोष का नाम भी बतौर आरोपी शामिल है, तो इसपर वे क्या कहेंगे?
ज्यादा दिन नहीं हुए जब इनके पुत्र फरहान अख्तर सीएए के विरोध में उतर पड़े थे, लेकिन जब पूछा गया कि क्यों विरोध कर रहे तो बगले झाँकने लगे और कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाए। ऐसे में यही प्रतीत होता है कि इन लोगों के विरोध के पीछे कोई व्यावहारिक आधार नहीं, केवल और केवल वैचारिक असहिष्णुता है। यह असहिष्णुता फिल्म जगत से जुड़े तमाम और लोगों में भी है और इस कदर है कि वे प्रधानमंत्री के प्रति तू-तड़ाक की भाषा के इस्तेमाल करने पर तक उतर चुके हैं। फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप इसके ताजा उदाहरण हैं।      
इससे पूर्व सीएए के विरोध के दौरान भी हमें बुद्धिजीवी वर्ग का यही असहिष्णु चरित्र दिखाई दिया था। बीते दिनों केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने राष्ट्रीय इतिहास कांग्रेस में अपना वक्तव्य देते हुए सीएए का जिक्र करना शुरू किया तो इसपर मार्क्सवादी इतिहासकार इरफ़ान हबीब एकदम से बौखला गए और राज्यपाल को रोकने के लिए बढ़ने लगे। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का कहना था कि अगर उनके एडीसी ने इन्हें नहीं रोका होता तो ये उनपर हमला कर देते। अब जो व्यक्ति राज्यपाल के प्रति सार्वजनिक रूप से इतनी आक्रामकता दिखा सकता है, उसमें विपरीत विचारों के लिए कितनी असहिष्णुता भरी होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
इन बुद्धिजीवियों की असहिष्णुता का एक और उदाहरण तो पिछले साल तब भी दिखा जब जेएनयू में बतौर  प्रोफेसर एमिरेट्स जुड़ीं रोमिला थापर विश्वविद्यालय प्रशासन के बायोडाटा मांगने पर बिगड़ गयीं। इसे वामपंथियों ने सरकार द्वारा बुद्धिजीवियों को दबाने की कोशिश करार दे दिया। सवाल है कि ये कैसी बुद्धिजीविता है जो मन से दंभ और असहिष्णुता को खत्म नहीं कर सकी।        
इतना ही नहीं, अपने अंधविरोध में इन बुद्धिजीवियों की भाषा का स्तर भी एकदम सतही होता जा रहा है। उदाहरण के तौर पर नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के दौरान ही लेखिका अरुंधती रॉय दिल्ली विश्वविद्यालय के एक विरोध प्रदर्शन में छात्रों के बीच पहुँचीं। वहां उन्होंने लोगों को सलाह देते हुए कहा कि एनपीआर में जब नाम-पता पूछा जाए तो वे रंगा-बिल्ला और सात रेसकोर्स बताएं। उनका इशारा मोदी और अमित शाह की तरफ था। अरुंधती रॉय को बताना चाहिए कि देश की जनता द्वारा बहुमत से निर्वाचित प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रति इस तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करके इन्होने कौन-सी बौद्धिकता का परिचय दिया है?
आश्चर्य है कि इसके बाद भी ये लोग कहते फिरते हैं कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है और सरकार तानाशाही कर रही है। रामचंद्र गुहा, अमर्त्य सेन से लेकर साहित्य जगत के भी अनेक नाम हैं जो 2014 के बाद से सत्ता-विरोध की आड़ में किसी न किसी बहाने से अपने मोदी विरोध के एकसूत्रीय एजेंडे को हवा देने की कोशिश में लगे रहते हैं।
बुद्धिजीवी होने का अर्थ होता है कि आप की बौद्धिक चेतना किसी भी तरह के पूर्वाग्रह और वैचारिक संकीर्णता से मुक्त, बुद्धि और ज्ञान के विस्तृत धरातल पर प्रतिष्ठित हो। बुद्धिजीवियों से अपेक्षा की जाती है कि वे देश को दिशा दिखाएंगे। लेकिन क्या हमारे इन बुद्धिजीवियों से ऐसी कोई अपेक्षा की जा सकती है। एक आयातित विचारधारा के संकीर्ण दायरे में बैठकर इन तथाकथित बुद्धिजीवियों ने दूसरी विचारधारा को निशाने पर लेने को ही अपना शगल बना लिया है। विपरीत विचार के विरोध में ये घृणा के स्तर तक जा पहुँचते हैं, लेकिन जब उसी स्वर में इनका प्रतिवाद होता है तो तानाशाही और अभिव्यक्ति की आजादी का विलाप भी करने लगते हैं। इनकी सारी बौद्धिकता केवल एक विचारधारा का विरोध करने मात्र के लिए समर्पित लगती है, उसके अलावा इन्हें देश में कोई और समस्या व चुनौती नहीं नजर आती। इनकी इस हालत पर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की यह पंक्ति बिलकुल सटीक लगती है कि ‘इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं’।