शनिवार, 4 जुलाई 2015

केवल ‘मन की बात’ से नहीं बचेंगी बेटियां [नेशनल दुनिया और देशबंधु में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

नेशनल दुनिया 
उम्मीद की जा रही थी कि प्रधानमंत्री मोदी २८ जून के अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में ललित मोदी प्रकरण पर कुछ कहेंगे, मगर इसमें उन्होंने मुख्य फोकस महिलाओं पर रखा। उन्होंने कहा कि इस रक्षाबंधन को महिलाओं के लिए ख़ास बनाइये, उन्हें सुरक्षा बीमा योजना भेंट कीजिए। साथ ही, अपने सोशल मीडिया प्रेम के लिए प्रसिद्ध प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर ‘सेल्फी विद डॉटर’ डालने की अपील की। प्रधानमंत्री की इन बातों को देखते हुए अनुमान व्यक्त किया जा रहा है कि इस रक्षाबन्धन सरकारी स्तर पर महिलाओं से सम्बंधित विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। अब जो भी हो, पर प्रश्न यह है कि क्या सेल्फी विद डॉटर जैसी प्रतीकात्मक चीजों से देश में महिलाओं की हालत बदल जाएगी या उन्हें सुरक्षा बीमा योजना भेंट करने से उनका उद्धार हो जाएगा ? गौर करें तो आज भी हमारे देश में लड़कियों को जन्म से पहले ही मार देने की मानसिकता काफी हद तक मौजूद है। और यह करने वालों में सिर्फ बौद्धिक स्तर पर पिछड़े व अशिक्षित लोग ही नहीं है, वरन समाज के तथाकथित शिक्षित लोग भी यह दुष्कृत्य को करने से पीछे नहीं हट रहे। अब अगर वे जियेंगी ही नहीं तो फिर कैसी कैसी स्वतंत्रता, कैसे अधिकार और कैसा उच्च जीवन स्तर ? इस समस्या के मद्देनज़र अभी विगत जनवरी महीने में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश की बेटियों के लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘सुकन्या समृद्धि’ जैसी योजनाओं की शुरूआत की गई। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना का उद्देश्य जहाँ देश में भ्रूण हत्या को ख़त्म करना है, तो वहीँ सुकन्या समृद्धि योजना के तहत बेटियों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित है। इन योजनाओं की शुरुआत हरियाणा से की गई, क्योंकि वहां बेटियों पर सर्वाधिक अन्याय-अत्याचार होता है। पर इन योजनाओं के करीब छः महीने बीतने के बाद स्वास्थ्य विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले छः महीनों में हरियाणा के २२ गांवों में एक भी बेटी का जन्म नहीं हुआ है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि कन्या भ्रूण हत्या हमारे समाज में कितनी गहरी पैठी हुई है। स्पष्ट है कि बेटियों को लेकर सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं, जबकि जमीनी हकीकत ये है कि उन्हें पैदा तक नहीं होने दिया जा रहा।
देशबंधु 
  बहरहाल, इसी क्रम में कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए बने कानूनों पर एक नज़र डालें तो कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या पर अंकुश लगाने के लिए सन १९९४ में 'गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम'  नामक क़ानून बनाया गया, जिसके तहत प्रसव पूर्व लिंग परिक्षण को अपराध की श्रेणी में रखते हुए सजा का प्रावधान भी किया गया। इस क़ानून के तहत लिंग परिक्षण व गर्भपात आदि में सहयोग करने को भी अपराध की श्रेणी में रखा  गया है तथा ऐसा करने पर ३ से ५ साल तक कारावास व अधिकतम १ लाख रुपये जुर्माने की सजा का भी प्रावधान किया गया है। लेकिन इस क़ानून के लागूं होने के तकरीबन २० वर्ष बाद आज कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या पर कोई विशेष अंकुश लग पाया हो, ऐसा नहीं कह सकते। आंकड़ों पर गौर करें तो २०११ की जनगणना के अनुसार देश में छः साल तक की आबादी में १००० लड़कों पर महज ९१४ लड़कियां ही पाई गईं। ये आंकड़े सिर्फ छः साल तक के बच्चों के हैं। बच्चों में ये लैंगिक असमानता कहीं ना कहीं दिखाती है कि देश में कन्या भ्रूण हत्या किस तरह से चल रही है। कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या आदि के ही संबंध में अभी पिछले वर्ष के आखिर में ही  माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी देश के सभी राज्यों की सरकारों से यह पूछा गया था कि कन्या भ्रूण परिक्षण रोकने की दिशा में अबतक की सरकारों द्वारा क्या और किस दिशा में प्रयास किए गए हैं जिसपर सभी सरकारें तुरंत कुछ भी जवाब नहीं दे पाई थीं। यह देखते हुए एक सवाल ये भी प्रासंगिक हो जाता  है कि राज्य सरकारों के पास इस संबंध में कोई ठोस आंकड़े व जानकारियां होंगी भी या नहीं ?  अब जो भी हो,  पर इतना तो एकदम स्पष्ट है कि कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या की रोकथाम को लेकर देश में सरकारी स्तर पर अबतक सिवाय  एक क़ानून बनाने के कोई खास प्रयास नहीं हुआ है। फिर चाहें बात केन्द्र सरकारों की करें या राज्य सरकारों की, इस संबंध में सबके आँख-कान लगभग बंद ही रहे हैं। केन्द्र सरकार ने तो इस इस संबंध में १९९४ में  एक क़ानून बनाकर ही अपने दायित्वों की इतिश्री समझ ली। उसे इस बात की आवश्यकता कभी महसूस नहीं हुई कि एक निश्चित अवधी के उपरांत इस बात की समीक्षा  भी होनी चाहिए थी कि वो क़ानून कितने प्रभावी ढंग से कार्य कर रहा है व उसमे सुधार की कोई गुंजाइश तो नहीं है। रही बात राज्य सरकारों की तो उन्हें भी ऐसे मसलों पर ध्यान देने के लिए फुरसत कहाँ है। निष्कर्ष ये है कि कन्या भ्रूण परिक्षण के मसले पर केन्द्र से लेकर राज्य तक सभी सरकारों का रुख अपेक्षाकृत काफी उदासीन रहा है और इस मसले को लेकर कभी कोई विशेष गंभीरता कहीं नहीं दिखी है।

     अगर विचार करें तो कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या की इस विसंगति के मूल में हमारी तमाम सामाजिक रूढियां व परम्पराएं ही हैं। आज के इस आधुनिक व प्रगतिशील दौर में लड़कियां लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, बल्कि कई मायनों में लड़कों से आगे भी हैं। इसमे भी संदेह नहीं कि लड़कियों के इस उत्थान से समाज में उनके प्रति व्याप्त सोच में में काफी बदलाव भी आया है। लेकिन बावजूद इन सबके आज भी हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा उनके प्रति अपनी सोच  को पूरी तरह से बदल नहीं पाया है। यह सही है कि इसमें अधिकांश ग्रामीण व अशिक्षित लोग ही हैं, लेकिन शहरी व शिक्षित लोग भी इससे एकदम अछूते नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो कम से कम दहेज जैसी रूढ़ीवादी प्रथा की चपेट में तो भारतीय समाज के शिक्षित-अशिक्षित दोनों तबके बराबर ही हैं। कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या के लिए दहेज की ये रूढ़िवादी प्रथा एक बहुत बड़ा  कारण है। इसी प्रकार और भी तमाम ऐसी सामाजिक प्रथाएँ, कायदे और बंदिशे हैं जो कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराई को उपजाने में खाद-पानी का काम कर रही हैं। इन बातों को देखने पर इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि कन्या भ्रूण हत्या आपराधिक प्रवृत्ति से अधिक कुछ सामाजिक कुप्रथाओं के शह से उत्पन्न हुई एक बुराई है। अतः यह भी स्पष्ट है कि इसका समाधान भी सिर्फ क़ानून के जरिए नहीं किया जा सकता। इस बुराई के समूल खात्मे के लिए आवश्यक है कि इसको लेकर सामाजिक स्तर पर जागरूकता लाने का प्रयास किया जाए। केन्द्र व राज्य सरकारों को चाहिए कि वो इस संबंध में शहर से गाँव तक सब जगह जागरूकता कार्यक्रम चलाएँ जिनके जरिए लोगों को यह समझाने का प्रयास किया जाए कि दुनिया में आने से पहले ही एक जान को नष्ट करके वो न सिर्फ अपराध कर रहे हैं, बल्कि देश के भविष्य को भी संकट में डाल रहे हैं। उन्हें लड़का-लड़की में कोई अंतर नहीं जैसी बातों से भी अवगत कराना चाहिए। इन सबके अलावा दहेज आदि सामाजिक कुप्रथाओं को समाप्त करने की दिशा में भी कानूनी स्तर से लेकर जागरूकता लाने के स्तर तक ठोस प्रयास करने की आवश्यकता है। यह सब किया जाय तो निश्चित ही देश की बेटियों को न सिर्फ बचाया जा सकता है, बल्कि एक सम्मानित व स्वतंत्र जीवन भी दिया जा सकता है। अतः यदि प्रधानमंत्री वाकई में महिलाओं की स्थिति को लेकर गंभीर हैं तो इन बातों पर गौर करें और इनके  क्रियान्वयन की दिशा में ठोस कदम उठाएं। केवल ‘मन की बात’ करने से महिलाओं की स्थिति नहीं बदलने वाली। 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

‘डिजिटल इण्डिया’ के लिए कितने तैयार हैं हम [दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत

दैनिक जागरण
देश के जन-जन को सूचना प्रोद्योगिकी से जोड़ने और अमीर-गरीब के बीच कायम तकनीक के फासले को ख़त्म करने के उद्देश्य से विगत २ जुलाई को देश के शीर्ष उद्योगपतियों समेत हजारों लोगों की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपनी महत्वाकांक्षी योजना डिजिटल इण्डिया का आगाज किया गया। इसके आगाज़ के बाद से एक सप्ताह तक पूरे देश में डिजिटल इण्डिया सप्ताह मनाया जाएगा, जिसके तहत देश भर  इससे सम्बंधित कार्यक्रम आयोजित होंगे। इस योजना के तहत फ़िलहाल लगभग दर्जन भर आईटी सम्बन्धी सेवाओं की शुरुआत की गई है जिनको देश भर में पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इनमे चार मोबाइल गवर्नेंस से सम्बन्धी सेवाएं भी शामिल हैं, जिनमे प्रमुखतः मोबाइल के जरिये ही अपनी पहचान को सत्यापित कराना भी शामिल है। इस योजना में निवेश के लिए देश के उद्योगपतियों की तरफ से अपनी तिजोरियां खोल दी गईं है और कुल मिलाकर इस योजना में ४.५ लाख करोड़ के निवेश की घोषणा हो चुकी है। इन बातों को देखते हुए दो चीजें तो एकदम स्पष्ट होती हैं - पहली, सरकार की यह योजना काफी अच्छी और भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेष तौर पर लाभकारी है एवं दूसरी कि उद्योगपतियों द्वारा निवेश के ऐलान के बाद फ़िलहाल इसके लिए पैसे की भी कोई दिक्कत नहीं है। अब प्रश्न यह है कि इतनी सहूलियतों के बावजूद डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम कठिन क्यों लग रहा है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि योजना और पैसे से किसी काम को शुरू तो किया जा सकता है, पर वो होगा तभी जब उसे किया जाएगा। और जब काम को किया जाता है तो उसकी राह में छोटी-बड़ी अनेक व्यावाहारिक कठिनाइयाँ सामने आती हैं। इन्फॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट इंडेक्स के अनुसार  इंटरनेट कनेक्टिविटी,  साक्षरता और बैंडविड्थ जैसे मामलों में १६६  देशों की  लिस्ट में भारत का स्थान १२९वां है। इस मामले में भारत मालदीव, मंगोलिया, केन्या, कजाख्स्तान आदि देशों जिनकी आर्थिक स्थिति भारत की तुलना में कत्तई अच्छी नहीं है, से भी पीछे है। आज के वक्त में देश की करीब १५% आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही है, जबकि चीन में ४४% आबादी इंटरनेट का उपयोग करती है। इस रिपोर्ट के बाद अगर हम देखें तो डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम को सरकार गांव-गांव तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित की है। इसके तहत देश के लगभग ढाई लाख गांवों को इंटरनेट से जोड़ने की योजना है, जबकि फिलवक्त भारतीय गांवों की स्थिति यह है कि निरपवाद रूप से वे इंटरनेट से नाम मात्र के लिए ही जुड़े हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल के जरिये आज की पीढ़ी के अधिकांश लड़के कौतूहलवश कुछ सोशल साइट्स का भ्रमण अवश्य कर ले रहे हैं, मगर उसे उनके इंटरनेट ज्ञान के रूप में देखते हुए यह समझ लेना  कि वे ई-गवर्नेंस से जुड़ेंगे, बेहद जल्दबाजी और भ्रमपूर्ण निर्णय होगा। उपर्युक्त रिपोर्ट में ही स्पष्ट है कि देश की इंटरनेट साक्षरता बेहद ख़राब है। इसके अलावा समुचित नेटवर्क व्यवस्था के अभाव में देश के अधिकाधिक ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट स्पीड भी बेहद स्लो हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्पीड की हालत यह है कि पचास-सौ केबी का एक पेज खुलने में ही कई मिनटों का  समय लग जाता है। स्पष्ट है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट ज्ञान और स्पीड दोनों का अभाव है, जिसको दूर किए बिना देश के गांवों को  ई-गवर्नेंस से जोड़ने की सोचना दिवास्वप्न देखने जैसा है। वैसे इंटरनेट स्पीड के मामले में तो पूरा देश ही अभी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है, इसका प्रमाण क्लाउड कम्यूटिंग फर्म एकमाई टेक्नोलॉजी की एक ताज़ा रिपोर्ट है, जिसके मुताबिक भारत में  मिलने वाली इंटरनेट की औसत स्पीड भी इसे दुनिया की सबसे धीमी स्पीड में शुमार  करती है। रिपोर्ट के मुताबिक नेट स्पीड के मामले में भारत की स्थिति इतनी बदतर है कि वह छोटे-छोटे गुमनाम देशों से पिछड़ा हुआ है। रिपोर्ट के ही अनुसार, अगर पूरी दुनिया के इंटरनेट की औसत स्पीड निकाली जाए तो वह १०.६ एमबीपीएस होती है। यह भी  भारत की पिछली तिमाही की इंटरनेट स्पीड से २७  प्रतिशत तेज है। मोटे तौर पर कहें तो अभी भारत में ४जी भी ठीक से नहीं आ सका और दुनिया के बहुतायत देश ५जी और १०जी तक पहुँच चुके हैं। तिसपर विडम्बना तो यह है कि यहाँ इस स्लो स्पीड इंटरनेट के लिए भी लोगों को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। अतः चुनौती यह भी है कि स्वीकार्य मूल्य में हाई स्पीड इंटरनेट उपलब्ध कराया जाय।
  उपर्युक्त तथ्यों को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि सरकार का डिजिटल इण्डिया का सपना तभी साकार हो सकता है, जब कि उपर्युक्त समस्याओं से पार पाया जाय। दिक्कत यह है कि इन समस्याओं को एक दिन में या किसी जादुई छड़ी को घुमाकर नहीं ख़त्म किया जा सकता है। अगर इनको ख़त्म करने के लिए ठीक ढंग से प्रयास हों तो इनसे धीरे-धीरे अवश्य निजात मिल सकेगी। जैसे कि देश में इंटरनेट साक्षरता को बढ़ाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में इस सम्बन्ध छोटे-छोटे अस्थायी केंद्र व कार्यशालाओं का आयोजन सरकार को करवाना चाहिए जिसके जरिये ग्रामीण लोगों, खासकर युवाओं को यह समझाया जा सके कि इंटरनेट का अर्थ सिर्फ सोशल साइट्स व गाने वगैरह की डाउनलोडिंग ही नहीं है, वरन इसके  जरिये वे अपने तमाम काम जिनको करने में काफी समय और श्रम लगता है, घर बैठे चुटकियों में कर सकते हैं। साथ ही, सस्ते और हाई स्पीड इंटरनेट को गांवों में पहुंचाने के लिए भी वैज्ञानिक स्तर पर प्रयास किए जाने की जरूरत है। इस दिशा में इसरो द्वारा किया जा रहा ‘गगन’ नामक उपग्रह का निर्माण कार्य उल्लेखनीय है, जिसके अगले वर्ष प्रक्षेपित होने की सम्भावना है। इस उपग्रह का सफल प्रक्षेपण और स्थापन होने की स्थिति में देश में इंटरनेट स्पीड में सुधार की संभावना व्यक्त की जा रही है। अंततः कुल मिलाकर इतना कहेंगे कि मोदी सरकार का डिजिटल इण्डिया मिशन है तो बहुत ही अच्छा, मगर यदि सरकार इसको वाकई में उतने ही अच्छे से जमीन पर भी उतारना चाहती है तो उसे उपर्युक्त बातों या चुनौतियों को ध्यान में रखकर चलना होगा। क्योंकि इन चुनौतियों से पार पाए बिना ‘इण्डिया’ सिर्फ कागजों में ही ‘डिजिटल’ हो सकती है, वास्तव में नहीं।  

मंगलवार, 2 जून 2015

गर्मी के कहर से मरते लोग [अमर उजाला कॉम्पैक्ट, नेशनल दुनिया और कल्पतरु एक्प्रेस में प्रकाशित]



  •  पीयूष द्विवेदी भारत

कल्पतरु एक्सप्रेस
देश फिलहाल गर्म हवाओं यानी लू से त्रस्त है। इससे न केवल लोगों का दैनिक जीवन हलकान है, वरन यह भीषण रूप से जानलेवा भी साबित हो रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो अबतक लू के कारण देश के विभिन्न राज्यों में कुल मिलाकर लगभग २००० लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इसका सर्वाधिक असर देश के दक्षिण में है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे देश के दक्षिण भारतीय राज्यों में लू ने सबसे ज्यादा आतंक मचाया है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि अबतक लू से होने वाली २००० मौतों में से लगभग १४०० मौतें सिर्फ आंध्र और तेलंगाना में हुई हैं। तिसपर मौसम विशेषज्ञों का यह कहना कि इन दक्षिण भारतीय राज्यों में अभी तापमान का पारा ५० डिग्री तक जा सकता है, और भयभीत करता है। वैसे, दक्षिणी राज्यों के अलावा लू का प्रकोप उत्तर भारत में भी है। उत्तर भारत के राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड आदि तमाम राज्यों में लगभग ३० से ३५ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से लू चल रही है। उसपर ये सब थमने के फिलहाल कोई संकेत नहीं हैं। जिस तरह से लू का कहर मचा हुआ है, उसे देखते हुए कहा जा रहा है कि लू के लिहाज से यह वर्ष अबतक सबसे घातक वर्ष सिद्ध हो सकता है। घातक इसलिए कि सन २०१० में भी लू का पारा कुछ ऐसा ही या कि अबसे थोड़ा अधिक ही रहा था, लेकिन तब इससे मौतें इतनी अधिक नहीं हुई थीं। लेकिन इस दफे चूंकि फ़रवरी-मार्च महीने में तो मौसम अपेक्षाकृत ठण्डा था, मगर उसमे अचानक परिवर्तन हुआ और ये लू बहनी शुरू हो गई। और लोगों का शरीर अचानक हुए इस मौसमी बदलाव के हिसाब से ढल नहीं पाया, बस यही कारण है कि अबकी लू के कारण इतनी अधिक मौतें हो रही हैं।
नेशनल दुनिया
अमर उजाला कॉम्पैक्ट
मौसम विशेषज्ञों के शब्दों में लू को समझें तो ‘जब किसी खास दिन पिछले तीन दशक की तुलना में औसत तापमान पांच डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है तो बहने वाली गर्म हवाएं लू कहलाती हैं।” यूँ तो लू हर जगह के लोगों के लिए हानिकारक ही है, लेकिन गांवों की अपेक्षा शहरों में इसका अधिक प्रभाव होता है। इसका प्रमुख कारण शहरों में पेड़-पौधों का अभाव होना और ईंट-पत्थर के मकानों का बढ़ता जाना है। बढ़ते तापमान में ये मकान तपकर गर्म हो जाते हैं, जिससे शहरों के तापमान में तीन-चार फीसदी की बढ़ोत्तरी हो जाती है। जबकि गांवों मे पर्याप्त पेड़-पौधे होने के कारण ऐसी स्थिति नहीं होती। स्पष्ट है कि पेड़-पौधों का अभाव होना इस लू का एक प्रमुख कारण है। इस बात को और अच्छे से समझने के लिए अगर जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी एक रिपोर्ट  पर गौर करें तो भारत के दस सर्वाधिक गर्म वर्षों में से ८ पिछले दशक यानी २००१ से २०१० के बीच के रहे हैं। यह दशक देश का सर्वाधिक गर्म दशक रहा। सीएसई के अनुसार पिछले १०० वर्षों में वैश्विक तापमान में औसतन ०.८ डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हुई है। इन तथ्यों के आधार पर ही इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस तरह से वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, दुनिया को भविष्य में तेज और लम्बी अवधि की लू के तैयार रहना चाहिए। इन सभी बातों  को देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि  एक तरफ जलवायु परिवर्तन पर दुनिया के विकासशील और विकसित देश अड़ियल रुख अपनाए हुए हैं और दूसरी तरफ यह जलवायु परिवर्तन समाधान न होने के कारण दुनिया में जीने की संभावनाओं को ही लगातार कम करता जा रहा है। उचित होता कि दुनिया के ये देश इसपर जल्द कोई आम सहमति बनाकर समाधान की दिशा में काम करते। क्योंकि किसी भी प्रगति का महत्व तभी है जब धरती जीने लायक रहे। धरती पर जीवन की अनुकूलताओं को नष्ट करने की शर्त पर प्रगति चाहने वाला दुनिया में कौन है ? यक़ीनन कोई नहीं! लू बेशक एक प्राकृतिक आपदा या समस्या है, मगर यह भी उतना ही सच है कि इस समस्या को जन्म मनुष्य की गलतियों और प्रकृति के साथ की गई अनावश्यक छेड़-छाड़ ने दिया है। अतः अब भी समय है कि मनुष्य अपनी गलतियों को सुधार ले, अन्यथा आने वाला समय उसके लिए बहुत अच्छा नहीं रहने वाला।
  बहरहाल, इतना तो साफ़ है कि हम लू को रोक नहीं सकते, मगर इससे बच जरूर सकते हैं। जरूरत है तो बस इससे बचाव के उपायों के विषय में समुचित जागरूकता व ज्ञान की। लू का खतरा कमजोर व्यक्तियों को अधिक होता है। पसीना होने से शरीर का पानी निकल जाता है, जिससे कई दफे व्यक्ति चलते-चलते ही रास्ते में बेहोश होकर गिर भी जाता है। यह मुख्यतः ह्रदय, किडनी पर आघात करता है। मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए तो हृदयाघात का खतरा भी हो जाता है। साथ ही लू के कारण प्रदूषण भी बढ़ता है और  सांस सम्बन्धी बीमारियाँ भी पैदा होती हैं। लू से बचने के लिए आदर्श स्थिति  तो यह है कि घर से कम से कम निकला जाय, लेकिन आज की दौड़ती-भागती ज़िन्दगी में यह कहीं से संभव नहीं है। अतः इससे बचने कुछ हलके-फुल्के उपाय किए जा सकते हैं जैसे पानी और पानी वाले फलों का अधिकाधिक सेवन, कम और सादा खाना, धूप से बचने के लिए छाता-टोपी वगैरह का उपयोग, आदि और भी अनेकों छोटे-छोटे उपाय हैं जिनसे लू से बचा जा सकता है। यह दायित्व सरकार का है कि वो टीवी, अखबार आदि संचार माध्यमों के जरिये देश में लू के कुप्रभावों औउ इससे बचने के उपायों से सम्बंधित जागरूकता अभियान चलाए। यह सरकार के वश में है और उसे  कम से कम इस दिशा में प्रयास करने ही चाहिए।