मंगलवार, 14 जुलाई 2015

तुष्टिकरण के कुचक्र में प्रदेश [अमर उजाला कॉम्पैक्ट में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत 
कॉम्पैक्ट

यह तो अनुभव सिद्ध बात रही है कि सपा सरकार जब भी यूपी में सत्ता में आई है तो यूपी में अपराध बढ़े हैं। लेकिन बावजूद इसके साल २०१२ में जब यूपी में चुनाव हुए तो मायावती की अहंकारी, विलासी, भ्रष्ट और तानाशाह जैसी छवि से त्रस्त प्रदेश की जनता ने भाजपा-कांग्रेस से इतर सपा को पूर्ण बहुमत देकर सिर्फ इसलिए विजयी बनाया कि उसके सामने अखिलेश यादव के रूप में एक युवा चेहरा था। प्रदेश की जनता को लगा कि यह युवा मुख्यमंत्री सपा शासन के पूर्व तौर-तरीकों से अलग, एक नए ढंग, नए जोश और नई ऊर्जा के साथ शासन को चलाएगा। लोगों को यह भी लगा कि अखिलेश यादव सपा शासन के पूर्व लक्षणों यथा जातीय तुष्टिकरण, पार्टी कार्यकर्ताओं को अनावश्यक संरक्षण आदि को नहीं अपनाएंगे और प्रदेश को एक बेहतर शासन-प्रशासन मिलेगा। लेकिन अखिलेश यादव के शासन की बागडोर संभालते ही उनके द्वारा जिस तरह से तमाम दागी नेताओं को अपनी कैबिनेट में जगह दी गई, उसने यूपी की जनता के भरोसे को पहला झटका दिया। सरकार  का पहला साल बीतते-बीतते सरकार के एक दागी मंत्री राजा भईया के विधानसभा क्षेत्र में एक डिप्टी एसपी जियाउल हक़ की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई जिसका इल्जाम राजा भैय्या पर लगा। भारी किरकिरी के बाद अखिलेश यादव पीड़ित परिवार से मिले और मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। हालांकि बाद में जांच में राजा भैय्या को क्लीनचिट मिल गई। लेकिन इस पूरे प्रकरण में जिस तरह से यूपी सरकार अपने आरोपी मंत्री के साथ खड़ी रही, वो सूबे की जनता को हतप्रभ करने के लिए काफी था। फिर  वर्ष २०१३ में हुए मुज़फ्फरनगर दंगे जिसमे सैकड़ों लोग मरे, कितने घायल हुए और लगभग ५० हजार से ऊपर लोग बेघर हो गए, ने यूपी सरकार पर से प्रदेश की जनता का भरोसा पूरी तरह से उठा दिया। हद तो तब हो गई जब एक तरफ ये बेघर दंगा पीड़ित बदहाल राहत शिविरों में ठण्ड से ठिठुरते हुए रात काटने को मजबूर थे, तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री समेत यूपी की  समाजवादी सरकार सैफई महोत्सव के नाम पर सरकारी पैसे की बर्बादी करने और नाच-गान देखने में मशगुल थी। इस प्रकरण में इस संवेदनहीनता के लिए यूपी सरकार की भारी किरकिरी हुई। इन सब घटनाक्रमों के बाद काफी हद तक स्पष्ट हो गया कि सपा के इस शासन में सिर्फ चेहरा बदला है, सूरत नहीं।
आज सपा शासन को लगभग तीन साल हो गए हैं। ऐसे में यदि यूपी के शासन-प्रशासन पर एक निगाह डालें तो स्थिति अत्यंत विकट नज़र आती है। हालत यह है कि प्रदेश में क़ानून व्यवस्था जैसी कोई चीज दूर-दूर तक नहीं दिखती। अपराध और अपराधियों का ही बोलबाला नज़र आता है। इन बातों को यदि आंकड़ों के जरिये समझने का प्रयास करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार सन २०१२ में सपा सरकार के सत्ता में आने के बाद विगत वर्षों के मुकाबले आपराधिक घटनाओं में प्रतिवर्ष केवल वृद्धि हुई है। वर्ष २०१२ में यूपी में हत्या जैसे जघन्य अपराध के ४९६६ मामले सामने आए तो वहीँ २०१३ में इनकी संख्या बढ़कर ५०५७ हो गई। २०१४ में सभी तरह के अपराध मिलाकर लगभग ३४ हजार आपराधिक घटनाएं हुईं। इस वर्ष की बात करें तो शुरुआत के सिर्फ तीन महीनों में ही यूपी में १३०० हत्या के मामले दर्ज किए जा चुके हैं। अभी ये सिर्फ वे मामले हैं जिनकी प्राथमिकी थानों में दर्ज हुई है। अभी जाने कितने मामले ऐसे होंगे जिनमे प्राथमिकी ही दर्ज नहीं हुई। इन आंकड़ों के बाद यह कहने की कोई आवश्यकता नहीं कि यूपी में क़ानून का नहीं अपराधियों का राज रह गया है। अब एक तरफ प्रदेश में क़ानून व्यवस्था की हालत  ऐसी है और दूसरी तरफ प्रदेश सरकार पुलिस प्रशासन में जातीय तुष्टिकरण का तिकड़म भिड़ाने में लगी है। प्रदेश सरकार के इस तुष्टिकरण की चर्चा तो रहती ही थी, लेकिन इस सम्बन्ध बड़ी हलचल तब सामने आई जब  अभी हाल ही में यूपी के बाराबंकी में एक महिला को थाने में थानेदार द्वारा बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया। ये थानेदार साहब यादव जाति के थे। इस मामले में जब प्रदेश सरकार की बहुत किरकिरी होने लगी तो थानेदार को उनके पद से हटाते हुए उनपर हत्या का मुकदमा तो दर्ज हुआ, लेकिन उनकी जगह भगवती प्रसाद यादव यानी फिर एक यादव थानेदार की ही नियुक्ति कर दी गई। इस मामले पर प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल बसपा की प्रमुख मायावती द्वारा सपा सरकार पर आरोप लगाया गया कि वे यादव तुष्टिकरण करने में लगे हैं, इसी कारण बाराबंकी मामले में थानेदार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। यादव तुष्टिकरण के इस आरोप के सम्बन्ध में एक समाचार चैनल की पड़ताल पर गौर करें तो फिलवक्त यूपी के कुल ७५ जिलों के १५२६ थानों में से ६०० थानों पर यादव थानेदार नियुक्त हैं। तिसपर इनमे से कितने  थानेदार तो इतने सिर चढ़े हैं कि अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक की भी नहीं सुनते। कितनों के तो मुलायम और अखिलेश यादव से सम्बन्ध होने की बात सामने आई है। यह भी आरोप लग रहा है कि इन यादव थानेदारों की नियुक्ति के लिए अखिलेश सरकार नियुक्ति के नियमों में ढील दे रही है। इसके अतिरिक्त इसे महज संयोग कहें या तुष्टिकरण का एक और नज़ारा कि प्रदेश पुलिस के वर्तमान महानिदेशक जगमोहन यादव भी यादव जाति के हैं। इन तथ्यों के बाद इस बात से इंकार करने की कोई वजह नहीं है कि राज्य में जातीय तुष्टिकरण हो रहा है। फिलवक्त तस्वीर यही है कि प्रदेश में अपराध अपने उफान पर हैं, जबकि पुलिस व्यवस्था तुष्टिकरण की भेंट चढ़ती जा रही है।
  उत्तर प्रदेश में यह जातीय तुष्टिकरण कत्तई नया नहीं है। आज विपक्ष में बैठकर मायावती भले अखिलेश सरकार पर यादव तुष्टिकरण का आरोप लगा रही हैं, लेकिन यदि अपने गिरेबां में झांकें तो उन्हें मालूम चलेगा कि जब वे शासन में होती हैं तब भी ये तुष्टिकरण तो होता ही है। फर्क इतना होता है कि तब ‘यादव’ की जगह ‘दलित’ लग जाता है। शासन किसीका भी रहे, तुष्टिकरण के कारण सर्वाधिक पिसना प्रदेश की जनता को पड़ता है और फ़िलहाल भी यही हो रहा है। अब प्रश्न यह है कि क्या देश की सर्वाधिक आबादी तथा सर्वाधिक लोकसभा और विधानसभा सीटों वाले सूबे की नियति यही है कि वो तुष्टिकरण के कुचक्र में पिसता रहे ? बहरहाल, उचित होगा कि अखिलेश यादव अब संभल जाएं क्योंकि प्रदेश की जनता ने अपने गुस्से का एक परिचय तो लोकसभा चुनाव में दे ही दिया है, लेकिन फिर भी यदि यही हाल रहा तो संदेह नहीं कि दो वर्ष बाद होने वाले  विधानसभा चुनाव में अखिलेश सरकार का भी वही हश्र होगा जो पिछले विधानसभा चुनाव में मायावती सरकार का हुआ था। 

शनिवार, 4 जुलाई 2015

केवल ‘मन की बात’ से नहीं बचेंगी बेटियां [नेशनल दुनिया और देशबंधु में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत 

नेशनल दुनिया 
उम्मीद की जा रही थी कि प्रधानमंत्री मोदी २८ जून के अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में ललित मोदी प्रकरण पर कुछ कहेंगे, मगर इसमें उन्होंने मुख्य फोकस महिलाओं पर रखा। उन्होंने कहा कि इस रक्षाबंधन को महिलाओं के लिए ख़ास बनाइये, उन्हें सुरक्षा बीमा योजना भेंट कीजिए। साथ ही, अपने सोशल मीडिया प्रेम के लिए प्रसिद्ध प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर ‘सेल्फी विद डॉटर’ डालने की अपील की। प्रधानमंत्री की इन बातों को देखते हुए अनुमान व्यक्त किया जा रहा है कि इस रक्षाबन्धन सरकारी स्तर पर महिलाओं से सम्बंधित विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। अब जो भी हो, पर प्रश्न यह है कि क्या सेल्फी विद डॉटर जैसी प्रतीकात्मक चीजों से देश में महिलाओं की हालत बदल जाएगी या उन्हें सुरक्षा बीमा योजना भेंट करने से उनका उद्धार हो जाएगा ? गौर करें तो आज भी हमारे देश में लड़कियों को जन्म से पहले ही मार देने की मानसिकता काफी हद तक मौजूद है। और यह करने वालों में सिर्फ बौद्धिक स्तर पर पिछड़े व अशिक्षित लोग ही नहीं है, वरन समाज के तथाकथित शिक्षित लोग भी यह दुष्कृत्य को करने से पीछे नहीं हट रहे। अब अगर वे जियेंगी ही नहीं तो फिर कैसी कैसी स्वतंत्रता, कैसे अधिकार और कैसा उच्च जीवन स्तर ? इस समस्या के मद्देनज़र अभी विगत जनवरी महीने में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश की बेटियों के लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘सुकन्या समृद्धि’ जैसी योजनाओं की शुरूआत की गई। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना का उद्देश्य जहाँ देश में भ्रूण हत्या को ख़त्म करना है, तो वहीँ सुकन्या समृद्धि योजना के तहत बेटियों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित है। इन योजनाओं की शुरुआत हरियाणा से की गई, क्योंकि वहां बेटियों पर सर्वाधिक अन्याय-अत्याचार होता है। पर इन योजनाओं के करीब छः महीने बीतने के बाद स्वास्थ्य विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले छः महीनों में हरियाणा के २२ गांवों में एक भी बेटी का जन्म नहीं हुआ है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि कन्या भ्रूण हत्या हमारे समाज में कितनी गहरी पैठी हुई है। स्पष्ट है कि बेटियों को लेकर सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं, जबकि जमीनी हकीकत ये है कि उन्हें पैदा तक नहीं होने दिया जा रहा।
देशबंधु 
  बहरहाल, इसी क्रम में कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए बने कानूनों पर एक नज़र डालें तो कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या पर अंकुश लगाने के लिए सन १९९४ में 'गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम'  नामक क़ानून बनाया गया, जिसके तहत प्रसव पूर्व लिंग परिक्षण को अपराध की श्रेणी में रखते हुए सजा का प्रावधान भी किया गया। इस क़ानून के तहत लिंग परिक्षण व गर्भपात आदि में सहयोग करने को भी अपराध की श्रेणी में रखा  गया है तथा ऐसा करने पर ३ से ५ साल तक कारावास व अधिकतम १ लाख रुपये जुर्माने की सजा का भी प्रावधान किया गया है। लेकिन इस क़ानून के लागूं होने के तकरीबन २० वर्ष बाद आज कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या पर कोई विशेष अंकुश लग पाया हो, ऐसा नहीं कह सकते। आंकड़ों पर गौर करें तो २०११ की जनगणना के अनुसार देश में छः साल तक की आबादी में १००० लड़कों पर महज ९१४ लड़कियां ही पाई गईं। ये आंकड़े सिर्फ छः साल तक के बच्चों के हैं। बच्चों में ये लैंगिक असमानता कहीं ना कहीं दिखाती है कि देश में कन्या भ्रूण हत्या किस तरह से चल रही है। कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या आदि के ही संबंध में अभी पिछले वर्ष के आखिर में ही  माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी देश के सभी राज्यों की सरकारों से यह पूछा गया था कि कन्या भ्रूण परिक्षण रोकने की दिशा में अबतक की सरकारों द्वारा क्या और किस दिशा में प्रयास किए गए हैं जिसपर सभी सरकारें तुरंत कुछ भी जवाब नहीं दे पाई थीं। यह देखते हुए एक सवाल ये भी प्रासंगिक हो जाता  है कि राज्य सरकारों के पास इस संबंध में कोई ठोस आंकड़े व जानकारियां होंगी भी या नहीं ?  अब जो भी हो,  पर इतना तो एकदम स्पष्ट है कि कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या की रोकथाम को लेकर देश में सरकारी स्तर पर अबतक सिवाय  एक क़ानून बनाने के कोई खास प्रयास नहीं हुआ है। फिर चाहें बात केन्द्र सरकारों की करें या राज्य सरकारों की, इस संबंध में सबके आँख-कान लगभग बंद ही रहे हैं। केन्द्र सरकार ने तो इस इस संबंध में १९९४ में  एक क़ानून बनाकर ही अपने दायित्वों की इतिश्री समझ ली। उसे इस बात की आवश्यकता कभी महसूस नहीं हुई कि एक निश्चित अवधी के उपरांत इस बात की समीक्षा  भी होनी चाहिए थी कि वो क़ानून कितने प्रभावी ढंग से कार्य कर रहा है व उसमे सुधार की कोई गुंजाइश तो नहीं है। रही बात राज्य सरकारों की तो उन्हें भी ऐसे मसलों पर ध्यान देने के लिए फुरसत कहाँ है। निष्कर्ष ये है कि कन्या भ्रूण परिक्षण के मसले पर केन्द्र से लेकर राज्य तक सभी सरकारों का रुख अपेक्षाकृत काफी उदासीन रहा है और इस मसले को लेकर कभी कोई विशेष गंभीरता कहीं नहीं दिखी है।

     अगर विचार करें तो कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या की इस विसंगति के मूल में हमारी तमाम सामाजिक रूढियां व परम्पराएं ही हैं। आज के इस आधुनिक व प्रगतिशील दौर में लड़कियां लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, बल्कि कई मायनों में लड़कों से आगे भी हैं। इसमे भी संदेह नहीं कि लड़कियों के इस उत्थान से समाज में उनके प्रति व्याप्त सोच में में काफी बदलाव भी आया है। लेकिन बावजूद इन सबके आज भी हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा उनके प्रति अपनी सोच  को पूरी तरह से बदल नहीं पाया है। यह सही है कि इसमें अधिकांश ग्रामीण व अशिक्षित लोग ही हैं, लेकिन शहरी व शिक्षित लोग भी इससे एकदम अछूते नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो कम से कम दहेज जैसी रूढ़ीवादी प्रथा की चपेट में तो भारतीय समाज के शिक्षित-अशिक्षित दोनों तबके बराबर ही हैं। कन्या भ्रूण परिक्षण व हत्या के लिए दहेज की ये रूढ़िवादी प्रथा एक बहुत बड़ा  कारण है। इसी प्रकार और भी तमाम ऐसी सामाजिक प्रथाएँ, कायदे और बंदिशे हैं जो कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराई को उपजाने में खाद-पानी का काम कर रही हैं। इन बातों को देखने पर इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि कन्या भ्रूण हत्या आपराधिक प्रवृत्ति से अधिक कुछ सामाजिक कुप्रथाओं के शह से उत्पन्न हुई एक बुराई है। अतः यह भी स्पष्ट है कि इसका समाधान भी सिर्फ क़ानून के जरिए नहीं किया जा सकता। इस बुराई के समूल खात्मे के लिए आवश्यक है कि इसको लेकर सामाजिक स्तर पर जागरूकता लाने का प्रयास किया जाए। केन्द्र व राज्य सरकारों को चाहिए कि वो इस संबंध में शहर से गाँव तक सब जगह जागरूकता कार्यक्रम चलाएँ जिनके जरिए लोगों को यह समझाने का प्रयास किया जाए कि दुनिया में आने से पहले ही एक जान को नष्ट करके वो न सिर्फ अपराध कर रहे हैं, बल्कि देश के भविष्य को भी संकट में डाल रहे हैं। उन्हें लड़का-लड़की में कोई अंतर नहीं जैसी बातों से भी अवगत कराना चाहिए। इन सबके अलावा दहेज आदि सामाजिक कुप्रथाओं को समाप्त करने की दिशा में भी कानूनी स्तर से लेकर जागरूकता लाने के स्तर तक ठोस प्रयास करने की आवश्यकता है। यह सब किया जाय तो निश्चित ही देश की बेटियों को न सिर्फ बचाया जा सकता है, बल्कि एक सम्मानित व स्वतंत्र जीवन भी दिया जा सकता है। अतः यदि प्रधानमंत्री वाकई में महिलाओं की स्थिति को लेकर गंभीर हैं तो इन बातों पर गौर करें और इनके  क्रियान्वयन की दिशा में ठोस कदम उठाएं। केवल ‘मन की बात’ करने से महिलाओं की स्थिति नहीं बदलने वाली। 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

‘डिजिटल इण्डिया’ के लिए कितने तैयार हैं हम [दैनिक जागरण राष्ट्रीय में प्रकाशित]



  • पीयूष द्विवेदी भारत

दैनिक जागरण
देश के जन-जन को सूचना प्रोद्योगिकी से जोड़ने और अमीर-गरीब के बीच कायम तकनीक के फासले को ख़त्म करने के उद्देश्य से विगत २ जुलाई को देश के शीर्ष उद्योगपतियों समेत हजारों लोगों की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपनी महत्वाकांक्षी योजना डिजिटल इण्डिया का आगाज किया गया। इसके आगाज़ के बाद से एक सप्ताह तक पूरे देश में डिजिटल इण्डिया सप्ताह मनाया जाएगा, जिसके तहत देश भर  इससे सम्बंधित कार्यक्रम आयोजित होंगे। इस योजना के तहत फ़िलहाल लगभग दर्जन भर आईटी सम्बन्धी सेवाओं की शुरुआत की गई है जिनको देश भर में पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इनमे चार मोबाइल गवर्नेंस से सम्बन्धी सेवाएं भी शामिल हैं, जिनमे प्रमुखतः मोबाइल के जरिये ही अपनी पहचान को सत्यापित कराना भी शामिल है। इस योजना में निवेश के लिए देश के उद्योगपतियों की तरफ से अपनी तिजोरियां खोल दी गईं है और कुल मिलाकर इस योजना में ४.५ लाख करोड़ के निवेश की घोषणा हो चुकी है। इन बातों को देखते हुए दो चीजें तो एकदम स्पष्ट होती हैं - पहली, सरकार की यह योजना काफी अच्छी और भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेष तौर पर लाभकारी है एवं दूसरी कि उद्योगपतियों द्वारा निवेश के ऐलान के बाद फ़िलहाल इसके लिए पैसे की भी कोई दिक्कत नहीं है। अब प्रश्न यह है कि इतनी सहूलियतों के बावजूद डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम कठिन क्यों लग रहा है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि योजना और पैसे से किसी काम को शुरू तो किया जा सकता है, पर वो होगा तभी जब उसे किया जाएगा। और जब काम को किया जाता है तो उसकी राह में छोटी-बड़ी अनेक व्यावाहारिक कठिनाइयाँ सामने आती हैं। इन्फॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट इंडेक्स के अनुसार  इंटरनेट कनेक्टिविटी,  साक्षरता और बैंडविड्थ जैसे मामलों में १६६  देशों की  लिस्ट में भारत का स्थान १२९वां है। इस मामले में भारत मालदीव, मंगोलिया, केन्या, कजाख्स्तान आदि देशों जिनकी आर्थिक स्थिति भारत की तुलना में कत्तई अच्छी नहीं है, से भी पीछे है। आज के वक्त में देश की करीब १५% आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही है, जबकि चीन में ४४% आबादी इंटरनेट का उपयोग करती है। इस रिपोर्ट के बाद अगर हम देखें तो डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम को सरकार गांव-गांव तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित की है। इसके तहत देश के लगभग ढाई लाख गांवों को इंटरनेट से जोड़ने की योजना है, जबकि फिलवक्त भारतीय गांवों की स्थिति यह है कि निरपवाद रूप से वे इंटरनेट से नाम मात्र के लिए ही जुड़े हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल के जरिये आज की पीढ़ी के अधिकांश लड़के कौतूहलवश कुछ सोशल साइट्स का भ्रमण अवश्य कर ले रहे हैं, मगर उसे उनके इंटरनेट ज्ञान के रूप में देखते हुए यह समझ लेना  कि वे ई-गवर्नेंस से जुड़ेंगे, बेहद जल्दबाजी और भ्रमपूर्ण निर्णय होगा। उपर्युक्त रिपोर्ट में ही स्पष्ट है कि देश की इंटरनेट साक्षरता बेहद ख़राब है। इसके अलावा समुचित नेटवर्क व्यवस्था के अभाव में देश के अधिकाधिक ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट स्पीड भी बेहद स्लो हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्पीड की हालत यह है कि पचास-सौ केबी का एक पेज खुलने में ही कई मिनटों का  समय लग जाता है। स्पष्ट है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट ज्ञान और स्पीड दोनों का अभाव है, जिसको दूर किए बिना देश के गांवों को  ई-गवर्नेंस से जोड़ने की सोचना दिवास्वप्न देखने जैसा है। वैसे इंटरनेट स्पीड के मामले में तो पूरा देश ही अभी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है, इसका प्रमाण क्लाउड कम्यूटिंग फर्म एकमाई टेक्नोलॉजी की एक ताज़ा रिपोर्ट है, जिसके मुताबिक भारत में  मिलने वाली इंटरनेट की औसत स्पीड भी इसे दुनिया की सबसे धीमी स्पीड में शुमार  करती है। रिपोर्ट के मुताबिक नेट स्पीड के मामले में भारत की स्थिति इतनी बदतर है कि वह छोटे-छोटे गुमनाम देशों से पिछड़ा हुआ है। रिपोर्ट के ही अनुसार, अगर पूरी दुनिया के इंटरनेट की औसत स्पीड निकाली जाए तो वह १०.६ एमबीपीएस होती है। यह भी  भारत की पिछली तिमाही की इंटरनेट स्पीड से २७  प्रतिशत तेज है। मोटे तौर पर कहें तो अभी भारत में ४जी भी ठीक से नहीं आ सका और दुनिया के बहुतायत देश ५जी और १०जी तक पहुँच चुके हैं। तिसपर विडम्बना तो यह है कि यहाँ इस स्लो स्पीड इंटरनेट के लिए भी लोगों को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। अतः चुनौती यह भी है कि स्वीकार्य मूल्य में हाई स्पीड इंटरनेट उपलब्ध कराया जाय।
  उपर्युक्त तथ्यों को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि सरकार का डिजिटल इण्डिया का सपना तभी साकार हो सकता है, जब कि उपर्युक्त समस्याओं से पार पाया जाय। दिक्कत यह है कि इन समस्याओं को एक दिन में या किसी जादुई छड़ी को घुमाकर नहीं ख़त्म किया जा सकता है। अगर इनको ख़त्म करने के लिए ठीक ढंग से प्रयास हों तो इनसे धीरे-धीरे अवश्य निजात मिल सकेगी। जैसे कि देश में इंटरनेट साक्षरता को बढ़ाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में इस सम्बन्ध छोटे-छोटे अस्थायी केंद्र व कार्यशालाओं का आयोजन सरकार को करवाना चाहिए जिसके जरिये ग्रामीण लोगों, खासकर युवाओं को यह समझाया जा सके कि इंटरनेट का अर्थ सिर्फ सोशल साइट्स व गाने वगैरह की डाउनलोडिंग ही नहीं है, वरन इसके  जरिये वे अपने तमाम काम जिनको करने में काफी समय और श्रम लगता है, घर बैठे चुटकियों में कर सकते हैं। साथ ही, सस्ते और हाई स्पीड इंटरनेट को गांवों में पहुंचाने के लिए भी वैज्ञानिक स्तर पर प्रयास किए जाने की जरूरत है। इस दिशा में इसरो द्वारा किया जा रहा ‘गगन’ नामक उपग्रह का निर्माण कार्य उल्लेखनीय है, जिसके अगले वर्ष प्रक्षेपित होने की सम्भावना है। इस उपग्रह का सफल प्रक्षेपण और स्थापन होने की स्थिति में देश में इंटरनेट स्पीड में सुधार की संभावना व्यक्त की जा रही है। अंततः कुल मिलाकर इतना कहेंगे कि मोदी सरकार का डिजिटल इण्डिया मिशन है तो बहुत ही अच्छा, मगर यदि सरकार इसको वाकई में उतने ही अच्छे से जमीन पर भी उतारना चाहती है तो उसे उपर्युक्त बातों या चुनौतियों को ध्यान में रखकर चलना होगा। क्योंकि इन चुनौतियों से पार पाए बिना ‘इण्डिया’ सिर्फ कागजों में ही ‘डिजिटल’ हो सकती है, वास्तव में नहीं।