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शनिवार, 9 जून 2018

प्रणब दा की बातों पर जितना खरा संघ उतरता है, उतना कांग्रेस नहीं [हरिभूमि में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

कांग्रेसी नेताओं की तमाम आपत्तियों और यहाँ तक कि अपनी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी की चेतावनी को भी अनदेखा करते हुए देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी संघ के कार्यक्रम में पहुंचे और स्वयंसेवकों को संबोधित किए। जबसे प्रणब दा ने संघ के आमंत्रण को स्वीकृति दी थी, देश के राजनीतिक महकमे में एक उथल-पुथल का वातावरण बन गया था। भाजपा के खेमे प्रसन्नता देखी जा रही थी, तो कांग्रेसी खेमा सन्न था। ख़बरों के अनुसार, कांग्रेस के कई नेताओं ने प्रणब दा को चिट्ठी और फोन के जरिये संघ के कार्यक्रम में जाने की सलाह दी थी। हालांकि पी. चिदंबरम, वीरप्पा मोइली, सुशिल शिंदे जैसे कुछ कांग्रेसी नेताओं ने संभवतः प्रणब मुखर्जी का सम्मान करते हुए ही उनके इस निर्णय के प्रति समर्थन व्यक्त किया। प्रणब मुखर्जी का इन सब बातों पर केवल इतना कहना था कि वे संघ के कार्यक्रम में जा रहे हैं और वहीं अपनी बात कहेंगे।

बहरहाल, अब जब प्रणब मुखर्जी का संघ के कार्यक्रम में सम्मिलित होना और वक्तव्य देना, इतिहास में दर्ज हो चुका है, तब आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उनकी बातों से सब संतुष्ट नजर आ रहे। कांग्रेसी उनके संबोधन को संघ-भाजपा को आईना दिखाने वाला बता रहे, तो भाजपा का कहना है कि डॉ. मुखर्जी की बातें उसके विचारों के अनुरूप हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्रणब मुखर्जी ने ऐसा क्या कह दिया, जो एकदूसरे के खिलाफ तलवारें ताने रहने वाले देश के इन दोनों राष्ट्रीय दलों को अपने-अपने विचारों के अनुरूप प्रतीत हो रहा।

वास्तव में, प्रणब मुखर्जी ने किसी राजनीतिक दल की वैचारिकता पर आधारित  व्याख्यान नहीं दिया है, बल्कि उन्होंने सीधे ढंग से केवल राष्ट्र और राष्ट्रभक्ति जैसे विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। वे इस समय किसी राजनीतिक दल से सम्बंधित नहीं हैं, इस नाते भी यह विशुद्ध रूप से उनके व्यक्तिगत विचार माने जाएंगे कांग्रेस हो या भाजपा अथवा कोई और दल, सबकी  विचारधारा में उनके इन व्यक्तिगत विचारों से सम्बंधित कोई कोई तत्व मिल ही जाएगा, बस इसी आधार पर हर दल उनके वक्तव्य को अपने अनुकूल बताने में लगा है।

प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के नेता रहे हैं, इस कारण कांग्रेस उनके विचारों पर अपना ज्यादा अधिकार जताने की कोशिश कर रही, लेकिन देखा जाए तो पूर्व राष्ट्रपति ने जो बातें कहीं, संघ उनपर जितना खरा उतरता है, उतना कांग्रेस नहीं।

प्रणब मुखर्जी ने सहिष्णुता की बात की तो कांग्रेस, जो संघ को असहिष्णु बताती रहती है, को जैसे मुँह मांगी मुराद मिल गयी। लेकिन, देखा जाए तो प्रणब मुखर्जी को अपने कार्यक्रम में आमंत्रित करना संघ की वैचारिक सहिष्णुता का ज्वलंत उदाहरण है, जबकि कांग्रेस द्वारा प्रणब के कार्यक्रम में जाने का विरोध करना उसकी असहिष्णुता को ही उजागर करता है।

प्रणब मुखर्जी ने कहा कि हम वैचारिक विविधता को दबा नहीं सकते। संघ के इतिहास में एक अध्याय भी ऐसा नहीं मिलेगा, जिसमें उसने आचरण के स्तर पर किसी के विचारों को दबाने या उसपर अपने विचार थोपने का प्रयास किया हो, जबकि कांग्रेसी शासन के इतिहास में संघ पर दो-दो बार प्रतिबन्ध लगाना वैचारिक विविधता को दबाने का ही उदाहरण है। प्रथम प्रतिबन्ध को अगर हम तात्कालिक परिस्थितियों की उपज भी मान लें, तो आपातकाल के दौरान लगाए गए दूसरे प्रतिबन्ध को विपरीत विचारधारा को कुचलने की कोशिश के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता।     

प्रणब मुखर्जी ने वसुधैव कुटुम्बकम, विविधता में एकता आदि की बात की, तो इसका जिक्र ठीक उनके पहले सर संघचालक मोहन भागवत ने भी अपने वक्तव्य में किया था। प्रणब मुखर्जी का कहना था कि भारतीय राष्ट्रवाद में सब लोग समाहित हैं, इनमें जाति-धर्म-नस्ल-भाषा आदि के आधार पर कोई मतभेद नहीं है। अब आप संघ की किसी शाखा में जाकर देखिये, वहाँ आपको एक साथ उठने-बैठने और खाने-पीने वाले हजारों-हजार लोगों के बीच कोई भेदभाव नजर नहीं आएगा। वे लोग एकदूसरे की जाति जानते हैं और धर्म, बस अपने-अपने ढंग से राष्ट्र-निर्माण के कार्य में निस्वार्थ भाव से जुटे रहते हैं। ये बातें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी कह चुके हैं। उल्लेखनीय होगा कि 1934 में जमनालाल बजाज के आमंत्रण पर संघ के एक शिविर में महात्मा गांधी पहुंचे थे, जिसमें वे संघ की कार्य-पद्धति से अत्यंत प्रभावित नजर आए। महात्मा गांधी ने एकबार इस घटना का जिक्र करते हुए कहा था, ‘बरसों पहले मै वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में गया था। वहां मैं उन लोगों का कड़ा अनुशासन, सादगी और छुआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर अत्यंत प्रभावित हुआ था। मैं तो हमेशा से मानता आया हूं कि जो भी सेवा और आत्म-त्याग से प्रेरित है, उसकी ताकत बढ़ती ही है।संघ के खिलाफ जो भी आरोप लगाए जाते हैं, उसमें कोई सच्चाई है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। यह संघ का काम है कि वह अपने सुसंगत कामों से इन आरोपों को झूठा साबित कर दे।

कुल मिलाकर प्रणब मुखर्जी और संघ के विचारों में मूलतः वैसा भेद नजर नहीं आता जैसा कि प्रचारित किया जाता है, जबकि कांग्रेस प्रणब दा के विचारों के विपरीत ध्रुव पर ही खड़ी नजर आती है। प्रणब मुखर्जी ने संघ के कार्यक्रम में शामिल होकर संघ के स्वयंसेवकों के प्रति जो कुछ कहा सो तो है ही, लेकिन साथ ही उन्होंने कांग्रेस को भी एक अप्रत्यक्ष सन्देश देने की कोशिश की है कि वो दुराग्रहों को छोड़ते हुए संघ की शक्ति और महत्व को स्वीकार कर वैचारिक सहिष्णुता का परिचय दे।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

मनमोहन सिंह पर मोदी के कड़वे सच से बिलबिलाई कांग्रेस [हरिभूमि में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत
संसद का बज़ट सत्र चल रहा है। प्रधानमंत्री ने इस सत्र में दोनों सदनों के समक्ष अपना वक्तव्य रखा। अबसे पूर्व सदन में प्रधानमंत्री के जो भी संबोधन हुए थे, उनमें प्रायः विपक्षी दलों के प्रति उदार दृष्टि और सहयोग का आग्रह ही दिखायी दिया था। किन्तु, उनके विनम्र और उदार संबोधनों का कांग्रेस-नीत विपक्ष पर कोई विशेष प्रभाव पड़ता कभी नहीं दिखा। हर सत्र में विपक्ष का अनावश्यक असहयोग कमोबेश जारी ही रहा और बात-बेबात सदन की कार्यवाही को बाधित की जाती रही।

खैर, इस बज़ट सत्र में जब प्रधानमंत्री ने पहले लोकसभा और फिर राज्यसभा में अपनी बात रखी, तो अबकी उनका अंदाज़ बदला हुआ था। उनका रुख विपक्ष पर पूरी तरह से हमलावर था। यह हमला न केवल तथ्यों-तर्कों से पुष्ट था, बल्कि इसमें तीखे व्यंग्य का भी समावेश था। उनके निशाने पर थी कांग्रेस और उसकी नकारात्मक राजनीति। उन्होंने पूरे तथ्यों के साथ कांग्रेस को आईना दिखाने का काम किया। कांग्रेस का इतिहास से लेकर वर्तमान तक, सब प्रधानमंत्री के निशाने पर रहा। नोटबंदी के कांग्रेसी विरोध के संदर्भ में प्रधानमंत्री ने एक पुस्तक के हवाले से कहा कि एकबार जब इंदिरा गांधी के समक्ष नोटबंदी की ज़रूरत बतायी गयी थी, तो उन्होंने राजनीतिक हानि होने की बात कहकर इसे टाल दिया था। लेकिन, भाजपा की सरकार के लिए राजनीतिक हित से कहीं अधिक महत्वपूर्ण देश हित है, इसलिए यह सरकार नोटबंदी करने का साहस कर सकी। प्रधानमंत्री की इस बात से कांग्रेस बौखला उठी और किताब की सत्यता पर ही सवाल उठाने लगी। इसपर प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर किताब गलत है, तो कांग्रेस ने अपने शासन के दौरान इसे रोका क्यों नहीं ? कांग्रेसी खेमा निरुत्तर नज़र आया।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि कांग्रेस राजीव गांधी को मोबाइल क्रांति लाने वाला बताती है और जब वर्तमान सरकार उस मोबाइल से बैंक आदि को जोड़ने की बात करती है, तो कांग्रेस कहने लगती है कि देश के लोगों के पास तो मोबाइल है ही नहीं। प्रधानमंत्री की इस बात ने कांग्रेस की दुखती रग पर ऊँगली रख दी थी और उसके साठ साल के शासन के दौरान की विफलताओं को आईना दिखाने का काम कर दिया।

इसी तरह प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी के बचकाने बयानों समेत और भी अनेक बिन्दुओं पर तंज़ भरा हमला बोला। लेकिन, सबसे ज्यादा बिलबिलाहट कांग्रेस को तब हुई, जब राज्यसभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को निशाने पर लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार के दौरान हुए घोटालों पर मूकदर्शक बने रहे मनमोहन सिंह पर कटाक्ष करते हुए कहा कि रेनकोट पहनकर नहाने की कला मनमोहन सिंह ही जानते हैं। दरअसल कांग्रेस अक्सर मनमोहन सिंह की ईमानदार और साफ़-सुथरी छवि का ढिंढोरा पिटती रहती है, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि संप्रग शासन के दौरान जो रिकॉर्डतोड़ घोटाले हुए, उनपर मनमोहन सिंह रोकने की सामर्थ्य होते हुए भी मूकदर्शक बने रहे और इतिहास के लिए खुद को एक बेहद लाचार प्रधानमंत्री साबित कर गए। अब गलत होते हुए देखकर शक्ति रहते हुए भी उसे नहीं रोकना और मौन बने रहना, मनमोहन सिंह की किस प्रकार की ईमानदारी है, इसका जवाब उन्हें और कांग्रेस को देना चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी के तंज़ भरे लहज़े और कटाक्षपूर्ण बातों को लेकर कांग्रेस उनकी भाषा पर सवाल उठा रही है, लेकिन ऐसा करने से पहले कांग्रेस को एकबार अपनी गिरेबां में झाँक लेना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने तो सिर्फ हलके-फुल्के व्यंग्य के लहज़े में अपनी बात कही है और उसमें कुछ भी अभद्र या आपत्तिजनक नहीं है। मगर, क्या कांग्रेस यह भूल गयी है कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की तरफ से प्रधानमंत्री मोदी के प्रति ‘खून की दलाली’, ‘मौत के सौदागर’ आदि किस तरह की भाषा इस्तेमाल की जाती रही है। क्या कांग्रेस को यह भी याद दिलाना पड़ेगा कि आज जिन मनमोहन सिंह पर प्रधानमंत्री मोदी के कटाक्ष भर से कांग्रेस बिलबिलाई हुई है, उन मनमोहन सिंह ने अपने शासनकाल की अंतिम प्रेसवार्ता में कहा था कि नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए विनाशकारी होगा। क्या ये सब आपत्तिजनक बयान नहीं थे ? उचित होगा कि कांग्रेस अपने नेताओं के इन बयानों पर एकबार दृष्टिपात कर ले। इसके बाद अगर उसमें ज़रा भी नैतिकता-बोध होगा तो वो प्रधानमंत्री मोदी की भाषा पर सवाल उठाने का साहस नहीं कर सकेगी।