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सोमवार, 20 अगस्त 2018

भारतीयता के रचनाकार [दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित]

  • पीयूष द्विवेदी भारत

देश का बहत्तरवां स्वतंत्रता दिवस एक ऐसी तारीख के रूप में इतिहास में दर्ज हो चुका है, जिसके अगले ही दिन राजनीतिक जीवन में नैतिक निष्ठा और वैचारिक शालीनता के पर्याय, समावेशी राजनीति के अग्रदूत, जनप्रिय नेता, प्रखर वक्ता, काल के कपाल पर जीवन के गीत लिखने वाले मूर्धन्य कवि और देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 93 वर्ष की अवस्था में मृत्यु की महानिद्रा में सदा-सदा के लिए सो गए।

राजनेता, पत्रकार, वक्ता आदि अटल जी के व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं, परन्तु इन सबसे पूर्व वे एक कवि थे। कविता के संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे। पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी अपने जमाने और इलाके के ख्यातिप्राप्त कवि थे। बड़े भाई अवध बिहारी वाजपेयी भी पिता के प्रभाव में आकर कविता करने लगे थे, फिर छोटे अटल पर इस कवितामय वातावरण का प्रभाव क्योंकर न पड़ता! छोटी-मोटी तुकबन्दियाँ करते-करते किशोरवय अटल ने आखिर एक दिन अपनी पहली कविता लिख डाली जिसका विषय था – ताजमहल। ताजमहल का नाम सुनकर यह विचार स्वाभाविक रूप से आ सकता है कि कविता में उसकी सुन्दरता का बखान होगा और कम से कम जिस उम्र में अटल जी ने यह कविता लिखी थी, तब ऐसा होना भी कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिन इस कविता में ‘ताजमहल’ की निर्माण-प्रक्रिया में हुए शोषण की ऐतिहासिक कथा को स्वर दिया गया था। अटल जी के कविता संग्रहों ‘मेरी इक्यावन कविताएँ’, ‘न दैन्यं न पलायनम’ आदि में तो यह कविता नहीं मिलती, लेकिन भाजपा नेता प्रभात झा की पुस्तक ‘हमारे अटलजी’ में अटल जी के हवाले से ही इसके कुछ अंश अवश्य प्राप्त होते हैं। कुछ पंक्तियाँ देखें, ‘यह ताजमहल यह ताजमहल/ यमुना की रोती धार विकल/ जब रोया हिंदुस्तान सकल/ तब बन पाया यह ताजमहल’ इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि इस कविता के वक्त किशोर अटल बिहारी में कवि का करुणामय ह्रदय और संवेदना की सूक्ष्म दृष्टि विद्यमान थी, जिसके कारण उनका ध्यान ताजमहल के सहज आकर्षित करने वाले सौन्दर्य की बजाय उसके शोषणपूर्ण इतिहास की तरफ गया तथा यमुना को उस शोषण का साक्षी मानकर उन्होंने ‘यमुना की रोती धार विकल’ जैसी गहरी पंक्ति लिखी। ऐसे में कह सकते हैं कि अटल जी के काव्योन्मुख होने में पारिवारिक काव्यमय वातावरण की तो भूमिका थी ही, परन्तु इसमें उनके करुणा और संवेदना से भरे ह्रदय का प्रमुख योगदान था। 

एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, ‘कविता एकांत चाहती है, लेकिन प्रतिदिन भाषण देने की जो मजबूरी है, वो कविता को घुमड़ने नहीं देती...’ इस बात से समझा जा सकता है कि अटल जी सिर्फ वातावरण के प्रभाव से पैदा हुए शौकिया कवि नहीं थे जो अन्य सभी कामों से अवकाश मिलने पर अपना शौक पूरा करता रहे; वे स्वभाव के कवि थे। स्वराघातों के साथ रुक-रुक कर बोलने का प्रभावशाली ढंग उनमें अनायास नहीं था, बल्कि ये उनके व्यक्तित्व में रचे-बसे एक कवि की वैयक्तिक अभिव्यक्ति थी। हालांकि उन्हें कविता के लिए जिस एकांत की कामना थी, वो राजनीतिक सक्रियताओं के बढ़ते जाने के कारण मिला नहीं। इसीलिए तो वे अक्सर कहा करते थे, ‘राजनीति के रेगिस्तान में आकर मेरी कविता की धारा सूख गयी है’।

अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं में पारम्परिकता और आधुनिकता दोनों के रंग दिखाई देते हैं, परन्तु रंग कोई भी हो उसके मूल में भारतीयता का भाव विद्यमान रहा है। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय छंदों से लेकर आधुनिक मुक्तछंद और छंदमुक्त तक हर प्रकार की रचनाएं लिखी हैं। आपातकाल के दौरान जब वे जेल में बंद थे, तब ‘कैदी कविराय’ के नाम से कुण्डलिया लिखा करते थे। बाद में कुण्डलिया के लिए यह उनका तखल्लुस ही बन गया। अटल जी की कुण्डलियों की धार कितनी तेज होती थी, इसका अंदाजा इस एक कुण्डलिया से लगाया जा सकता है जो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ द्वारा ‘इंदिरा इज इंडिया’ कथन के बाद लिखी थी। उन्होंने लिखा, ‘इंदिरा इंडिया एक है, इति बरुआ महाराज/ अकल घास चरने गई, चमचों के सरताज/ .कह कैदी कविराय, स्वर्ग से जो महान है/ कौन भला उस भारतमाता के समान है’। स्पष्ट है कि अटल जी ने कुण्डलिया रचना में उसके पारंपरिक शिल्प विधानों का भी बराबर ध्यान रखा है, जिससे उसकी स्वाभाविक लय में कहीं अवरोध नहीं नजर आता। लेकिन उन्होंने इसके एक नियम कि जिस शब्द से ये शुरू होती है उसीसे इसका अंत भी होता है, की उपेक्षा भी की है। विचार करें तो कुण्डलिया का यह नियम उसकी रचनागत कठिनाइयों में अनावश्यक वृद्धि करने और भावाभिव्यक्ति को कठिन बनाने के अलावा और कुछ नहीं करता है; इससे छंद के सौन्दर्य में कोई विशेष वृद्धि नहीं होती है, ऐसे में इसकी उपेक्षा उचित भी है। इस नियम की अनदेखी के द्वारा उन्होंने यह भी जाहिर किया है कि परम्परा का पालन तो उचित है, परन्तु उसको पकड़कर बैठ जाना ठीक नहीं।

आओ फिर से दीया जलाएं, गीत नया गाता हूँ, हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन, मौत से ठन गयी जैसी अनेक कविताएँ अटल जी ने लिखी हैं, जो शास्त्रीय छंद-विधान से तो मुक्त हैं, परन्तु तत्सम हिंदी के प्रवाहपूर्ण शब्द-संयोजन से पुष्ट होकर अपनी एक स्वतंत्र और प्रभावी लय का निर्माण व निर्वाह करती हैं। ‘गागर में सागर’ भरने का कौशल भी अटल जी की कविताओं में प्रभावी ढंग से मौजूद है। इस सम्बन्ध में उनकी एक लघु कविता ‘कौरव और पांडव’ उल्लेखनीय होगी जिसमें वे लिखते हैं, ‘...बिना कृष्ण के, आज महाभारत होना है/ कोई राजा बने, रंक को तो रोना है’। क्या इन पंक्तियों के बाद वैश्विक युद्धों से लेकर छोटे-छोटे गृहयुद्धों तथा राजनीतिक घमासानों के विद्रूपकारी स्वरूप के विषय में कुछ कहने को रह जाता है?

अटल जी को मनाली से ख़ासा लगाव था और अक्सर वहाँ समय बिताने जाया करते थे। बताया जाता है कि एकबार मनाली जाते हुए अव्यवस्था के कारण उन्हें कुछ परेशानी उठानी पड़ी तो इसपर उन्होंने कविता लिखी – मनाली मत जइयो गोरी, राजा के राज में। इस कविता की लय लोकगीतों के निकट और बड़ी मधुर है। लोकगीतों से परिचित लोग इसकी लय को पकड़कर इसे सस्वर गा सकते हैं। अटल जी के काव्य के उपर्युक्त छंद, लय, भाषा, विषय आदि सब पक्षों पर दृष्टिपात करने पर वे अपनी मौलिकता के बावजूद निराला के बाद रिक्त पड़ी उनकी परम्परा के निकटस्थ कवि  प्रतीत होते हैं। 

अटल जी की काव्य-रचना का विषय इतना विस्तृत है कि उसे समेटने में एक पुस्तक भी कम पड़ सकती है, परन्तु एक पंक्ति में कहें तो उनकी कविताओं का मूल भाव भारतीयता थी। भारत और भारतीयता का कण-कण तथा क्षण-क्षण उनकी कविताओं का विषय बन जाता था। बावजूद इसके साहित्य में एक ख़ास विचारधारा का अनुकरण व स्थापन करने वाले कविजन जब अटल जी की कविताओं को हल्का कहते हैं, तो उनकी सोच की संकीर्णता पर तरस ही आता है। अटल जी की कविताओं को वही खारिज करेगा जिसमें भारत और भारतीयता के भावों के प्रति समझ और लगाव का अभाव हो, अन्यथा भारतीयता से पुष्ट कोई भी ह्रदय इन कविताओं पर मुग्ध और भाव-विभोर हुए बिना नहीं रह सकता।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

आइन्स्टीन ने कभी गांधी जी के लिए जो लिखा था, वो अब अटल जी के लिए भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा!

पीयूष द्विवेदी भारत

आने वाली पीढ़ियों को मुश्किल से यकीन होगा कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इंसान कभी इस धरती पर चला था” 

महात्मा गांधी के 75वें  जन्मदिन पर उनके बड़े प्रशंसक, महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन ने अपने सन्देश में यह उक्त बात लिखी थी जो कालांतर में गांधी के विराट व्यक्तित्व को परिभाषित करने के लिए एक उपयुक्त सूत्र वाक्य बन गयी। लेकिन अब आइन्स्टीन का यह कथन गांधी के अलावा एक और विराट व्यक्तित्व को परिभाषित करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है, वो हैंभारतीय राजनीति के अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी।

अटल जी के गुणों और विशेषताओं पर बात करना सूरज को दीया दिखाने की कोशिश करने जैसा है। सात्विकता से दीप्त तेजस्वी चेहरा, प्रभावी स्वराघातों से पुष्ट ओजस्वी वाणी, शब्दों का सम्मोहन-जाल और विचारों का अभूतपूर्व प्रवाहये अटल जी के व्यक्तित्व के वो पहलू हैं जिनके कारण उन्हें सुनने की उत्कंठा समर्थकों के साथ-साथ विरोधियों को भी रहती थी। आक्रामक से आक्रामक बात को भी कहने के लिए वे शब्दों की ऐसी मोहिनी रचते थे कि विरोधी पर आक्रमण भी हो जाता और वैचारिक शालीनता भी बनी रहती। आज की राजनीति में यह वैचारिक शालीनता दुर्लभ हो चली है।

एक वोट से सरकार गिरने के बाद ‘...अध्यक्ष महोदय, मैं अपना इस्तीफा राष्ट्रपति जी को देने जा रहा हूँ जैसा तेजस्वी और ऐतिहासिक वक्तव्य देने के मूल में अटल बिहारी वाजपेयी की नैतिक निष्ठा की शक्ति ही विद्यमान थी। ये नैतिक निष्ठा उनका दूसरा सबसे प्रमुख गुण थी। तब संख्याबल के मामले में तो छल-छद्मों से विपक्ष ने बाजी मार ली, लेकिन अपने वक्तव्य के जरिये नैतिकता की जो मिसाल वाजपेयी जी ने पेश की, वो भारतीय राजनीति का एक स्वर्णिम अध्याय बन गयी। राजनीति में यह नैतिक निष्ठा भी अब कहाँ  दिखती है। क्या जोड़-तोड़ के इस दौर में अब एक वोट से किसी सरकार का गिरना संभव रह गया है?

गांधी जी की ही तरह अटल जी भी साफगोई में यकीन रखते थे। दुराव उन्हें नहीं भाता था। उनकी जिन्दगी एक ऐसी खुली किताब थी, जिसमें कुछ भी छुपा नहीं था। किसीको अच्छा लगे या बुरा, वे जो थे वैसे ही सबके सामने भी होते थे। यह बात उनके साक्षात्कारों को देखने पर साफ़-साफ़ महसूस की जा सकती है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहते हुए तब पत्रकार रहे राजीव शुक्ला से बातचीत में जब उनके सामने सवाल आया कि नरसिम्हा राव से उनकी दोस्ती पार्टी को पसंद नहीं है इसपर क्या कहेंगे ? तो उनका कहना थामैं पार्टी से पूछकर दोस्तियाँ नहीं करता और पार्टी को इससे आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 

जब बाबरी मस्जिद ध्वंस पर स्टैंड बदलने को लेकर एक प्रश्न आया तो बड़ी साफगोई से इस बात को स्वीकारते हुए उन्होंने कहामैंने जब देखा कि इस विषय में विरोधी अपने गिरेबान में झाँकने को तैयार नहीं हैं, तब मैंने थोड़ा सा स्टैंड जरूर बदला था। इसी तरह उनके अफेयर्स को लेकर जब सवाल पूछा जाता है तो एक तरह से इस बात को स्वीकृति देते हुए भी वो कहते हैं कि अफेयरों की चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं की जाती। क्या वर्तमान राजनीती में किसी नेता जो प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार हो, से ऐसी स्पष्टवादिता की उम्मीद की जा सकती है? आज बयान देकर पलटने वाली राजनीति में ये कहीं से भी संभव नहीं लगता।

ऐसी अनेक बातें हैं जो अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व को वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक असंभव कल्पना सिद्ध करती हैं। इसीलिए कह रहे कि तब आइन्स्टीन के लिए इस धरा पर दूसरा गांधी होने की कल्पना जैसे संभव नहीं थी, उसी तरह भारतीय राजनीति के वर्तमान स्वरूप को देखते हुए अब इसमें दूसरे अटल का होना भी संभव नहीं लगता।